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महिलाओं को मिली नयी रोशनी

सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भ चिकित्सकीय समापन अधिनियम के दायरे को विस्तार देते हुए अविवाहित महिला को दी गर्भपात की अनुमति

हाल में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अविवाहित महिलाओं के गर्भपात के अधिकार पर बड़ा फ़ैसला दिया है। दरअसल न्यायालय ने मेडिकल टॅर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट यानी गर्भ चिकित्सकीय समापन अधिनियम के दायरे को विस्तार देते हुए एक अविवाहिता को 24 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि महिला शादीशुदा नहीं है, केवल इस वजह से उसे गर्भपात करवाने से नहीं रोका जा सकता। इस फ़ैसले ने ऐसी अविवाहित महिलाओं को रोशनी दिखायी है, जो ऐसे हालात से गुज़रती हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर असुरक्षित गर्भपात के तरीक़े अपनाती हैं व कई मर्तबा जान भी गँवा बैठती हैं।

ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश देते वक़्त दिल्ली एम्स के निदेशक को एमटीपी अधिनियम की धारा-3(2)(डी) के तहत एक मेडिकल बोर्ड का गठन करने का भी निर्देश दिया है। बोर्ड को यह तय करना है कि महिला की जान को बिना जोखिम में डाले गर्भपात किया जा सकता है या नहीं। अगर उसके जीवन को कोई ख़तरा नहीं होगा, तो गर्भपात कराया जा सकता है। बेशक गर्भपात कराने से पहले चिकित्सक की राय लेना अनिवार्य है; लेकिन इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़ कर दिया है कि 20-24 सप्ताह के गर्भ का गर्भपात कराने की अधिकार ग़ैर-शादीशुदा महिलाएँ को भी है।

दरअसल इस एक्ट को सही तरह से समझने की ज़रूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने जो विस्तार दिया है, उसकी दरकार एक लम्बे समय से थी। उपरोक्त मामला मूल रूप से मणिपुर की रहने वाली एक 25 वर्षीय महिला, जो फ़िलहाल दिल्ली में रहती है; ने दिल्ली उच्च न्यायालय से अपने 23 सप्ताह 5 दिन के गर्भ को समाप्त करने की इजाज़त माँगी थी। महिला ने न्यायालय को बताया कि वह लिव-इन-रिलेशनशिप के दौरान सहमति से बने सम्बन्ध की वजह से गर्भवती हुई। वह गर्भपात करना चाहती है; क्योंकि उसके साथी ने शादी करने से मना कर दिया है। महिला ने न्यायालय को बताया कि उसके माता-पिता किसान हैं और वह पाँच बहन-भाई में सबसे बड़ी है। आय के साधन सीमित हैं। इस हालात में वह बच्चे का पालन-पोषण करने में समर्थ नहीं है। पहले युवती दिल्ली उच्च न्यायालय गयी थी, जहाँ 15 जुलाई को न्यायालय ने गर्भपात की इजाज़त देने से मना कर दिया था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि सहमति से गर्भवती होने वाली अविवाहित महिला एमटीपी रूल्स-2003 के तहत 20 सप्ताह के बाद गर्भपात नहीं करा सकती। याचिकाकर्ता ने इस बात पर बल दिया कि शादी के बिना बच्चे को जन्म देने से उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ेगा। उस पर सामाजिक कलंक भी लगेगा। युवती की ओर से दलील दी गयी कि वह इस बच्चे को जन्म देने की मन:स्थिति में नहीं है, इसलिए ऐसे गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी जाए। पर दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि न्यायालय संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए क़ानून के दायरे से आगे नहीं जा सकता। पीठ ने कहा कि तुम बच्चे को क्यों मार रही हो? बच्चे को गोद लेने की एक बड़ी कतार मौज़ूद है।

उच्च न्यायालय के इसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय गयी। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायाधीष सूर्यकांत और न्यायाधीश ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले में संशोधन करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने इस मामले में अनुचित प्रतिबंधात्मक नज़रिया अपनाया। दिल्ली उच्च न्यायालय का यह कहना उचित नहीं है कि वह एक ग़ैर-शादीशुदा औरत है और सहमति से गर्भ हुआ है, लिहाज़ा उसका मामला एमटीपी क़ानून के तहत नहीं आता। न्यायाधीश डी.वाई. चद्रचूड़ ने साफ़ किया कि एमटीपी एक्ट की व्याख्या को केवल शादीशुदा महिलाओं के लिए 20 सप्ताह तक के गर्भ को ख़त्म करने तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होगा, तो ये ग़ैर-शादीशुदा महिलाओं के साथ भेदभाव होगा। क़ानून बनाते समय विधायिका की यह मंशा नहीं रही होगी कि गर्भपात क़ानून केवल विवाहित महिलाओं तक ही सीमित किया जाए। याचिकाकर्ता महिला को सिर्फ़ इसलिए गर्भपात से इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि वह अविवाहित महिला है। याचिकाकर्ता को अवाछिंत गर्भधारण की अनुमति देना क़ानून के उद्देश्य और भावना के विपरीत होगा।

ग़ौरतलब है कि देश में असुरक्षित गर्भपात के कारण मातृ मृत्यु दर के आँकड़े भी बढ़ रहे थे। ऐसे में भारत सरकार मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट-1971 लायी और इस विधेयक को लाने का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात कराना, गर्भपात सेवाओं तक पहुँच में वृद्धि करना, महिलाओं को स्वस्थ और बेहतर जीवन प्रदान करना, असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मातृ मृत्यु दर को कम करना और गर्भपात की जटिलताओं में कमी लाना आदि है। इसके तहत 12 सप्ताह यानी तीन महीने तक के भ्रूण का गर्भपात कराने के लिए एक डॉक्टर की सलाह की ज़रूरत होती थी, और 12 से 20 सप्ताह यानी तीन माह से पाँच माह के गर्भ के मेडिकल समापन के लिए दो डॉक्टरों की ज़रूरत होती थी। गर्भ अगर 20 सप्ताह से ऊपर हुआ, तो फिर न्यायालय की इजाज़त से ही गर्भपात कराया जा सकता है। इस एमटीपी एक्ट में कई बार नये नियम भी जोड़े गये।

एमटीपी (संशोधन) विधेयक-2021 में नये नियम जोड़े गये हैं। इस विधेयक के साथ संलग्न किये गये उद्देश्यों व कारणों के विवरण में इस प्रकार कहा गया है- ‘समय बीतने और सुरक्षित गर्भपात के लिए चिकित्सा प्रोद्याोगिकी की प्रगति के साथ, विशेष रूप से कमज़ोर महिलाओं और गर्भावस्था में देर से पता चलने वाले पर्याप्त भ्रूण विसंगतियों के मामले में गर्भधारण को ख़त्म करने के लिए ऊपरी गर्भकालीन सीमा को बढ़ाने की गुंजाइश है। इसके अलावा असुरक्षित गर्भपात और इसकी जटिलताओं के कारण होने वाली मृत्यु दर और रुग्णता को कम करने के लिए क़ानूनी और सुरक्षित गर्भपात सेवा तक महिलाओं की पहुँच बढ़ाने की आवश्यकता है।’

एमटीपी (संशोधन) विधेयक-2021 के नियमों के तहत कुछ विशेष श्रेणी की महिलाओं के मेडिकल गर्भपात के लिए गर्भ की समय सीमा 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह यानी पाँच महीने से बढ़ाकर छ: महीने कर दी गयी। विशेष श्रेणी की महिलाओं में यौन उत्पीडऩ या बलात्कार या घरेलू व्यभिचार की शिकार नाबालिग़ व ऐसी महिलाएँ हैं, जिनकी वैवाहिक स्थिति गर्भावस्था के दारौन बदल गयी हों (विधवा या तलाकशुदा हों) और दिव्यांग महिलाएँ शामिल हैं। इसके साथ ही इसमें मानसिक रूप से बीमार महिलाओं; भ्रूण में ऐसी कोई विकृति या बीमारी, जिसके कारण उसकी जान को ख़तरा हो या फिर जन्म लेने के बाद उसमें मानसिक या शारीरिक विकृति होने की आशंका की स्थिति में और सरकार द्वारा घोषित मानवीय संकट ग्रस्त क्षेत्र या आपदा या आपात स्थिति में गर्भवती महिलाओं को भी शामिल किया गया है। इसमें गर्भ निरोधक की विफलता के आधार को महिलाओं और उनके साथी के लिए बढ़ा दिया गया है। एक उल्लेखनीय बदलाव इसमें जो किया गया है, वह है पति के बजाय पार्टनर शब्द का इस्तेमाल। पार्टनर शब्द ने आधुनिक युग में गर्भपात कराने वाली महिलाओं की दिक़्क़तों को कम कर दिया है।

यह बदलते समय की माँग भी है। समाज के रूढिग़त ढाँचे से आगे बढऩा और क़ानून के ज़रिये ऐसे नज़रिये का विस्तार करने से महिलाएँ सशक्त होती हैं। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने गर्भपात के इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि 2021 में संशोधन के बाद मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट में धारा-3 के स्पष्टीकरण में पति के बजाय पार्टनर शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। भारत दावा करता है कि देश में प्रगतिशील गर्भपात क़ानून है; लेकिन सच्चाई सह भी है कि यहाँ असुरक्षित गर्भपात को मातृ मृत्यु के तीसरे प्रमुख कारण के रूप में देखा जाता है।

यही नहीं, क़रीब 80 फ़ीसदी महिलाओं को यह जानकारी नहीं कि 20 सप्ताह के भीतर गर्भ को ख़त्म करना क़ानून के दायरे में आता है। इसके अलावा 1.4 अरब की आबादी वाले इस देश में प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञों की संख्या क़रीब 70,000 है। इनमें से अधिकांश बड़े शहरों या क़स्बों में हैं। ग्रामीण इलाक़ों में कोई जाकर राज़ी नहीं है। वहाँ ऐसे डॉक्टरों की कमी के साथ-साथ ज़रूरी चिकत्सकीय सुविधाओं की भी बहुत कमी है। सरकार के समक्ष यह बहुत बड़ी चुनौती है। सर्वोच्च न्यायालय ने तो बड़ा आदेश दे दिया, पर इसके बरअक्स सरकार को भी गर्भपात की सुरक्षित सेवाओं के विस्तार के लिए गम्भीर होना होगा।

कांवडिय़ों की भक्ति के अजब-ग़ज़ब रंग

श्रावण मास चल रहा है। हरिद्वार में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ रही है, ज़्यादा संख्या कांवडिय़ों की है। हर की पैड़ी से लेकर बाज़ार की सडक़ें और हाईवे का कांवड़ पथ भगवा हो रहा है। हरिद्वार बोल बम और बम भोले के नारों से गूँज रहा है। कोरोना काल में दो साल तक कांवड़ यात्रा पर प्रतिबंध था, उसका असर यह हुआ कि इस वर्ष यात्रा की शुरुआत के पहले दिन ही यानी 14 जुलाई को चार लाख के क़रीब कांवडिय़े हरिद्वार आये। प्रशासनिक सूत्रों की मानें, तो 14 जुलाई से 27 जुलाई तक चलने वाली कावड़ यात्रा में चार करोड़ के क़रीब कांवडिय़ों के आने का अनुमान है। कांवड़ यात्रा आसान नहीं है; लेकिन शिव की आस्था में सराबोर कांवडिय़ों का उत्साह कम नज़र नहीं आता।

पवित्र भावना से शुरू हुई इस परम्परा में अब काफ़ी बदलाव आ चुका है। कांवड़ यात्रा में नये-नये शगल शामिल हो गये हैं। रंग-बिरंगी चीज़ों से सजायी गयीं कांवड़ अलग-अलग रूपों और रंगों में नज़र आती हैं। ज़्यादातर कांवडिय़ों ने तिरंगा अपनी-अपनी कांवड़ में लगा रखा है। हालाँकि भोले के नाम पर कांवडिय़े नशे के सेवन को सही ठहराते हैं; लेकिन कांवडिय़ों की आस्था पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकते। अब कांवड़ यात्रा में पुरुष कांवडिय़ों के साथ महिला और बाल कांवडिय़े भी शामिल हो रहे हैं। कंधों पर भारी भरकम कांवड लेकर कई दिनों तक मीलों पैदल चलना। रास्ते में कहीं धूप, तो कहीं तेज़ बारिश का सामना करना। कभी-कभी या किसी-किसी कांवडिय़े द्वारा भूखे-प्यासे रहकर हरिद्वार की पग यात्रा करते हैं। जो भी हो, आस्था से भरे कांवडिय़े इन मुश्किलों के आगे हार नहीं मानते। हर कांवडिय़े यही मानते हैं कि भगवान शिव उनके दु:ख हरकर उनकी मन्नतें पूरी करते हैं।

ग़ाज़ियाबाद के कांवडिय़ा मिथुन पिछले 18 साल से कांवड़ ला रहे हैं। बचपन में उन्होंने कांवड़ उठायी थी। उन्हें अच्छा लगा, और वह हर साल कांवड़ लाने लगे। उनका मानना है कि भगवान शिव ने उसकी हर मनोकामना पूरी की है। मकान नहीं था, वह भी बना। शादी हुई और अब एक बेटी भी है, जिसकी उन्होंने मन्नत माँगी थी। बेटी ही माँगने के सवाल पर मिथुन कहते हैं कि बेटी कोई धैर्य वाला आदमी ही माँगता है। क्योंकि बेटी एक गिलास पानी दे देगी, मगर बेटा नहीं देगा। वह कहेगा उठकर ले लो। मिथुन की यह बात बेटों की चाहत में किसी भी हद तक गुज़रने वाले या बेटियों की हत्या करने वाले लोगों के लिए तमाचा है।

बहरहाल दिल्ली से शिवम, अजीत, पंकज और दीपक को भी कांवड़ उठाकर मीलों पैदल चलना अच्छा लगता है। उनकी आस्था है कि वे भोले से जो माँगते हैं, उनको मिल जाता है। वे कहते हैं कि रास्ते में कई दिक़्क़तें आती हैं, जैसे- अगर कहीं नहाने के लिए पानी नहीं मिलता, तो भूखे रहना पड़ता है। क्योंकि कांवड़ उठाने से पहले अगर खाना खाया हो, तो स्नान करना पड़ता है। कांवड़ को सजाने के लिए उन्होंने प्लास्टिक की कई चीज़ों का इस्तेमाल किया है।

प्लास्टिक का उपयोग क्यों? यह पूछने पर वे कहते हैं कि यह सब तो सरकार को देखना चाहिए। प्लास्टिक बनाना ही बन्द कर दे, तो लोग उसे क्यों इस्तेमाल करेंगे? आर्य नगर के दुकानदार अंकित पिछले 40 साल से कांवडिय़ों की इस यात्रा के गवाह रहे हैं। वह बताते हैं कि कांवड़ पहले सादे तरीक़े से लायी जाती थी; लेकिन अब काफ़ी तामझाम है। अब कांवडिय़े तिरंगा लगाते हैं। इससे लगता है कि उनमें राष्ट्रवाद का भाव है। लेकिन तीन-चार साल के बच्चे को साथ मीलों चलाना सही नहीं है।

कांवड़ में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर अंकित का भी यही कहना है कि सरकार प्लास्टिक बनाने पर रोक लगा दे; ख़ासकर जो इसके उत्पादक हैं, उन्हें रोके। छोटे-छोटे दुकानदारों का चालान काट दिया जाता है, जबकि हरिद्वार में चार प्लास्टिक फैक्ट्रियाँ हैं; लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हरिद्वार में कांवड़ यात्रा को शान्तिपूर्वक सम्पन्न कराने के लिए कांवड़ कंट्रोल रूम बनाया गया है, जिसमें प्रशासन और पुलिस व्यवस्था को देख रहे हैं। कांवडिय़ों के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं। इनमें धार्मिक भावनाओं को भडक़ाने वाले गीत बजाने, सात फीट से अधिक ऊँची कांवड़ लेकर चलने, लाठी-डण्डे और भाले आदि लेकर चलने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
ख़ासकर बिना पहचान-पत्र के किसी भी कांवडिय़ा को हरिद्वार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। एडीएम प्यारे लाल साहा ने बताया कि कांवड़ यात्रा वाले क्षेत्र को अलग-अलग क्षेत्र (जोन) में बाँटा गया है। इनमें 12 सुपर जोन, 31 जोन और 133 सेक्टर शामिल हैं। 9,000 से 10,000 तक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। कांवड़ क्षेत्रों में ड्रोन, पीएसी और सीसीटीवी कैमरे लगाये गये हैं।

नोडल अधिकारी डॉ. राजेश गुप्ता के अनुसार कांवडिय़ों के लिए अलग-अलग मेडिकल कैम्प भी लगाये गये हैं। इनमें एक्सीडेंटल इंजरी, मसल पेन, बुख़ार और डायरिया के केस ज़्यादा आ रहे हैं, जिनमें एक लाख के क़रीब कांवडिय़ों का उपचार किया गया है। कांवड़ यात्रा के अन्तिम दिन तक डेढ़ लाख का आँकड़ा पार कर सकता है।

शिव होने का अर्थ
शक्ति से युक्त अनादि देव को शिव कहा जाता है। त्रिदेवों में एक शिव ही भोले देवता माने गये हैं। हालाँकि वे संहार के देव हैं और क्रोधित हो जाने पर वे नटराज भी बन जाते हैं। वह संसार के कल्याण के लिए विष भी पी जाते हैं। पापों की अति हो जाने पर संहारकर्ता भी बन जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अपने बहुत सारे गुणों के कारण वे महादेव कहलाते हैं। प्रार्थना करने पर शीघ्र प्रसन्न होने वाले महादेव अपने भक्तों के दु:ख दूर करके उनकी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। शंकर, शिव, शम्भू, नीलकंठ, कैलाशपति, उमापति, महाकाल, जटाधारी, भूतनाथ, चंद्रशेखर आदि अनेक नामों के साथ विभूषित होने वाले महादेव शिव का एक नाम रुद्र भी है, जिसका अर्थ है- दु:ख दूर करने वाला। शिव कल्याणकारी हैं और कंद-मूल अर्पित कर देने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

हरियाणा में माफिया का आका कौन?

सरकार और पुलिस को सीधी चुनौती दे गये डीएसपी को डंपर से कुचलने वाले माफिया

हरियाणा के नूह ज़िले के पचगाँव में बेख़ौफ़ अवैध खनन माफिया ने डंपर से पुलिस उप अधीक्षक (डीएसपी) की कुचलकर कथित हत्या कर दी। नूह ज़िले के पचगाँव में अरावली पहाडिय़ों पर अवैध खनन की सूचना के बाद डीएसपी सुरेंद्र बिश्नोई तीन पुलिसकर्मियों के साथ दबिश देने गये थे। हत्या की इस कथित साज़िश में माफिया की वहशत का शिकार होने से तीन अन्य पुलिसकर्मी बाल-बाल बचे। डीएसपी सुरेंद्र सिंह बिश्नोई की डंपर से कुचलकर की जाने वाली इस कथित हत्या को क़ानून और पुलिस को सीधी चुनौती देने वाली घटना माना जा सकता है। इसी वर्ष अक्टूबर में सेवानिवृत्त होने जा रहे बिश्नोई की ड्यूटी के दौरान हत्या की वजह राज्य में अवैध खनन और बेख़ौफ़ खनन माफिया ही हैं। इसे राज्य सरकार की नाकामी और सर्वोच्च न्यायालय के कड़े आदेशों की पालना में कोताही माना जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने घटना की न्यायिक जाँच के आदेश दिये हैं। साथ ही परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद और एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की है। लेकिन क्या इससे सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गयी? भविष्य में ऐसी घटना और न हो इसके लिए अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगाने की ज़रूरत है। सरकारी दस्तावेज़ों में तो अरावली क्षेत्र में खनन का काम बन्द है; लेकिन आपसी मिलीभगत से यह धंधा धड़ल्ले से चल रहा है। ज़ाहिर है इस अवैध खनन को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। पचगाँव में किसी सरकारी कर्मचारी की हत्या का चाहे यह पहला मामला हो; लेकिन इससे पहले अवैध खनन माफिया के लोगों ने सरकारी टीमों को मौक़े से भागने पर भी मजबूर किया है।

पहले भी इसी नूह ज़िले में जाँच के दौरान एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के क़ाफ़िले के वाहन पर डंपर से भारी पत्थर गिरा दिये थे। इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ; लेकिन सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त हो गया था। पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास में मुक़दमा दर्ज किया है। यमुनानगर में वर्ष 2020 में एक ऐसा ही मामला हुआ, जिसमें जाँच करने गये प्रशासनिक अधिकारी की टीम पर खनन माफिया के लोगों ने हमला कर दिया।

अवैध खनन को रोकने का ज़िम्मा खनन और भूगर्भ विभाग का होता है। कई बार शिकायत मिलने पर इनका दल (टीम) मौक़े पर जाता है; लेकिन वहाँ उनका मुक़ाबला हथियारबंद लोगों से हो जाता है, और मजबूरन बिना कार्रवाई के आना पड़ता है। ऐसी घटनाओं के बाद विभाग पुलिस दल को साथ लेता है। पचगाँव की घटना निंदनीय है। लेकिन इसमें कहीं-न-कहीं पुलिस की भी चूक मानी जा सकती है। अवैध खनन की सूचना पक्की थी, तो डीएसपी सुरेंद्र बिश्नोई का केवल तीन लोगों के साथ वहाँ जाना ठीक नहीं था। पर्याप्त पुलिस बल होता, तो यह घटना नहीं होती। पुलिस टीम ने मामले को हल्के में लिया, जिसका बड़ा ख़ामियाज़ा सामने आया।

बिश्नोई ज़िले के तावड़ू में तैनात थे और अवैध खनन रोकने की समिति के सदस्य होने के नाते उनकी ज़िम्मेदारी भी थी। ज़िले के पंडाला, ककरोला, बड़ गुज्जर और तावड़ू के अरावली क्षेत्र में अवैध खनन ख़ूब होता है। डंपर का नंबर स्पष्ट तौर पर न दिखने या बिना नंबरों के डंपर और अन्य वाहन इस धंधे में लगे हैं। पत्थरों से लदे ये वाहन क्रशर जोन में या फिर सीधे निर्माण क्षेत्र में जाते हैं। जब मेवात के इलाक़े में खनन पर पूरी तरह से रोक के आदेश हैं, तो पत्थरों का अवैध खनन कैसे हो रहा है? देर रात या सुबह जल्दी ऐसे वाहनों की भरमार देखी जा सकती है। पुलिस ने पचगाँव के ही छ: डंपरों को ज़ब्त किया है, जो इसी काम में लगे हुए हैं।

खनन के लिए प्रतिबंधित अरावली क्षेत्र में यह काम क्या डंपर चालक, ख़लासी या मज़दूर टाइप के लोग नहीं कर रहे; बल्कि समाज के सफ़ेदपोश लोग करा रहे हैं। डंपर चालक, ख़लासी या मज़दूर तो काम के बदले वेतन पाते हैं। ज़्यादातर ऐसे लोग ग़ुरबत में ज़िन्दगी बिता रहे हैं। डीएसपी सुरेंद्र बिश्नोई को रौंदने वाले डंपर के चालक शब्बीर उर्फ़ मित्तर और ख़लासी इक्कर को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। घटना के दौरान डंपर पर चार और लोग भी थे। पुलिस उन्हें भी गिरफ़्तार कर लेगी। न्यायालय दोषियों को दण्डित भी करेगा; लेकिन क्या इससे अवैध खनन का यह काला कारोबार रुक जाएगा? हत्या की घटना के बाद इस क्षेत्र में भले कुछ समय के लिए काम थम जाए, पर बाद में यह फिर उसी तरह से जारी रहेगा; जैसा अब तक चलता आ रहा है।

वर्ष 2022-23 में अब तक इस क्षेत्र में अवैध खनन के आरोप में 123 एफआईआर दर्ज हो चुकी है। सैकड़ों वाहन ज़ब्त किये जा चुके हैं। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की पालना नहीं हो पा रही है। या पालना के लिए यह सब किया जा रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 01 जुलाई से 15 सितंबर तक हरियाणा में किसी भी तरह से अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। पचगाँव की बड़ी घटना इसी दौरान हुई है। अरावली क्षेत्र में किसी तरह से निर्माण पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ बेहद कड़ा है।

जून, 2021 में खनन के लिए प्रतिबंधित ज़िले फ़रीदाबाद के खोरी गाँव के 500 से ज़्यादा घरों को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद गिरा दिया गया था। हज़ारों लोग प्रभावित हुए थे; लेकिन राज्य सरकार ने न्यायालय के आदेश की पालना करायी। वह तो एक सीमित क्षेत्र की बात थी; लेकिन अरावली के बड़े और बीहड़ जैसे इलाक़े पर पूरी तरह से खनन गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगाना असम्भव कैसे हो रहा है? हाँ, यह काम थोड़ा मुश्किल ज़रूर है; लेकिन सरकार की मंशा हो, तो यह किया जा सकता है। समस्या यह है कि अवैध खनन से जुड़े लोग किसी तरह राजनीतिक और सरकारी संरक्षण हासिल कर ही लेते हैं। अरावली क्षेत्र में फार्म हाउसेस के लिए बन रही पक्की सडक़ों के काम को भी न्यायालय के आदेश के बाद बन्द करना पड़ा था। इस धंधे के लोग किसी भी तरह के दुस्साहस कर जाते हैं, उन्हें ऊपर से संरक्षण मिला होता है। लाखों-करोड़ों रुपये के इस धंधे में डंपर चालक, ख़लासी, मज़दूर या अन्य छोटे मोटे लोग नहीं होते इन्हें चलाने वाले बड़े रसूख़ वाले होते हैं। यह भी जगज़ाहिर है कि ऐसे धंधे सरकारी संरक्षण में ही फलते-फूलते रहे हैं। अवैध खनन की एक सूचना पर वे पचगाँव डंपर चालक ने क़ानून से बचने के लिए यह दुस्साहस किया या फिर अवैध खनन माफिया के संरक्षण के चलते यह सब हुआ।

सबसे बड़ा सवाल यह कि हरियाणा में अरावली की पहाडिय़ों में अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक के बावजूद मिलीभगत से यह धंधा चल रहा है। वर्ष 2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने गुडग़ाँव, फ़रीदाबाद और नूह में अवैध खनन पर पूरी से रोक लगा दी थी। बावजूद इसके बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा है। पिछले एक दशक में अवैध खनन में लगे हज़ारों वाहन ज़ब्त हुए हैं। इनसे लाखों रुपये की वसूली भी हुई; लेकिन अवैध खनन बदस्तूर जारी रहा। नूह ज़िले के पचगाँव की घटना को देखते हुए राज्य सरकार को बेलगाम होते खनन माफिया पर लगाम लगानी पड़ेगी; नहीं तो फिर डीएसपी सुरेंद्र बिश्नोई की तरह कोई और अफ़सर इनका शिकार बनेगा।


“पचगाँव की घटना के दोषियों पर सख़्त कार्रवाई होगी। कोई भी दोषी क़ानून से नहीं बच पाएगा। सरकार ने न्यायिक जाँच के आदेश जारी कर दिये हैं। अवैध खनन पर जल्द ही कड़े क़दम उठाये जाएँगे।’’
अनिल विज
गृहमंत्री, हरियाणा


“डीएसपी सुरेद्र बिश्नोई को डंपर से कुचलने की घटना राज्य में बदहाल क़ानून व्यवस्था का नतीजा है। जब पुलिस अधिकारी ही सुरक्षित नहीं, तो आम लोगों की क्या बिसात है? राज्य में अवैध खनन का जारी रहना सरकार की नाकामी है।’’
भूपेंद्र सिंह हुड्डा
पूर्व मुख्यमंत्री

अरावली को नष्ट कर रहे माफिया
अरावली की पहाडिय़ाँ लगभग 700 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैं। इस पर्वत का तीन-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा राजस्थान में है, तो एक-तिहाई से कम हिस्सा हरियाणा में है। दोनों ही राज्यों में अवैध खनन होता है। इस क्षेत्र में खनन से दिल्ली सीमा से जुड़े बड़े भूभाग के पर्यावरण सन्तुलन के बिगडऩे का ख़तरा है। दिल्ली सीमा क्षेत्र के साथ लगते फ़रीदाबाद, गुडग़ाँव और नूह में इन पहाडिय़ों के अवैध खनन पर सर्वोच्च न्यायालय रोक लगा चुका है। अवैध खनन न होने पाये, इसके लिए खनन और भूगर्भ विभाग, पुलिस, वन विभाग पर आधारित समितियाँ गठित की गयी हैं। अवैध खनन रोकने की इनकी सीधी ज़िम्मेदारी है। यह सब कुछ होते हुए भी अरावली क्षेत्र में अवैध तौर पर खनन हो रहा है। सरकारी तंत्र में लालची अफ़सरों, कर्मचारियों और सरकार में भ्रष्ट मंत्रियों, नेताओं और विधायकों पर लगाम कसकर सरकार को कड़े क़दम उठाने होंगे। लेकिन ये क़दम उठायेगा कौन? बड़ा सवाल यह है कि हरियाणा में अवैध खनन माफिया का आक़ा कौन है?

सम्मानजनक अन्तिम विदाई
हिसार ज़िले के सारंगपुर गाँव में डीएसपी सुरेंद्र बिश्नोई की पूरे राजकीय सम्मान के अन्तिम विदाई की गयी। सैकड़ों लोगों के अलावा इस मौक़े पर राज्य के पुलिस महानिदेशक भी मौज़ूद रहे। विश्नोई के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा एक बेटा और बेटी हैं। परिवार में घटना से सदमे जैसी हालत है। सुरेंद्र बिश्नोई हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के परिवार से रिश्तेदारी थे।

दोराहे पर झारखण्ड की राजनीति

हेमंत सरकार के गिरने की चर्चा के बीच बहने लगी उलटी गंगा

झारखण्ड की राजनीति को समझना आसान नहीं है। झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन की सरकार है। झामुमो के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। भाजपा विपक्ष में है। पिछले कुछ दिनों से हेमंत सरकार के गिरने की चर्चा झारखण्ड से लेकर दिल्ली तक हो रही है। चर्चा यहाँ तक है कि महाराष्ट्र की तरह झारखण्ड में भी सत्ता परिवर्तन की तैयारी है। इस सत्ता परिवर्तन में कांग्रेस टूट रही या झामुमो टूटेगा, यह फ़िलहाल साफ़ नहीं है। दिख यह भी रहा है कि हेमंत सोरेन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से ज़्यादा समझदार हैं। वह स्थिति को भाँपकर सँभाल रहे हैं। क्योंकि इस दौरान राजनीतिक धरातल पर उल्टी ही गंगा बहती दिख रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भाजपा के साथ हैं, या भाजपा के ख़िलाफ़? यही साफ़ नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देवघर दौरा हो या राष्ट्रपति चुनाव मुख्यमंत्री का व्यवहार कई सवाल खड़े कर रहे हैं। वहीं, सरकार में मुख्य सहयोगी दल कांग्रेस की अंदरूनी हालत समय-समय पर सार्वजनिक मंच पर दिख जाता है। हर समय कांग्रेस विधायकों के टूटने की चर्चा रहती है। यहाँ तक कि राष्ट्रपति चुनाव में जम कर क्रॉस वोटिंग भी हुई। जो पार्टी नेताओं के माथे पर बल ला दिया है।

हेमंत पर शिकंजा
हेमंत सोरेन की सरकार संकट में है। उनकी ख़ुद की विधानसभा की सदस्यता ख़तरे में है। चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन से खनन पट्टा लेने के मामले में जवाब तलब किया है। राज्यपाल ने संज्ञान लिया है। उधर, सोरेन के आसपास के लोग, उनके भाई विधायक बसंत सोरेन, सम्बन्धित अधिकारी सबके ख़िलाफ़ ईडी की कार्रवाई चल रही है। हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में हिरासत में ले लिया है। पूछताछ चल रही है। हाईकोर्ट में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ पीआईएल पर सुनवाई चल रही है। सीबीआई जाँच की भी कोर्ट से माँग की गयी है। चर्चा है देर सवेर क़ानूनी शिकंजा हेमंत सोरेन पर कसेगा। यानी हेमंत सोरेन चौतरफ़ा घिरे हैं और उनकी सदस्यता जानी तय मानी जा रही है।

मनमुटाव और खींचतान
पार्टी स्तर पर भी मनमुटाव और खींचतान की बात सामने आ रही है। विधायक लोबिन हेंब्रम जैसे झामुमो के कुछ वरिष्ठ नेता गुरुजी यानी शिबू सोरेन को अपना नेता मानते हैं; लेकिन हेमंत सोरेन को नहीं। लोबिन हेंब्रम ने यहाँ तक कह दिया कि हेमंत सोरेन सदन के नेता हैं, हमारे नहीं। हमारे नेता तो गुरुजी हैं। उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी ही पार्टी के सरकार के विरोध में सार्वजनिक तौर पर मोर्चा खोल रखा है। वहीं हेमंत की भाभी सह विधायक सीता सोरेन ने भी मुख्यमंत्री और सरकार के कामकाज पर कई बार सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी ज़ाहिर की है। वह भी कई मुद्दों पर लगातार सरकार के ख़िलाफ़ बोल रही हैं।
इसी तरह झामुमो के कई वरिष्ठ विधायक और नेता कई मुद्दों पर पार्टी लाइन से अलग सरकार के ख़िलाफ़ दिख रहे हैं।

मोदी की तारीफ़ में पढ़े क़सीदे
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के तेवर इन दिनों बदले-बदले से हैं। देवघर हवाई अड्डे के उद्घाटन मौक़े पर सार्वजनिक मंच से जिस तरह से उन्होंने भाषण दिया, वह तो यही दिखा रहा कि हेमंत महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे की तरह ग़लती करना नहीं चाहते हैं। क्योंकि अगर उनकी कुर्सी गयी, तो पार्टी (झामुमो) के जो हालात हैं, उसे भी बचा पाना कहीं मुश्किल न हो जाए। उन्होंने देवघर हवाई अड्डे के उद्घाटन मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि अगर इसी तरह से केंद्र और राज्य की सरकारें मिलकर काम करती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखण्ड देश के अग्रणी राज्यों में से एक होगा। इतना ही नहीं, देवघर के लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे, जिनके साथ इन दिनों हेमंत का 36 का आँकड़ा है; की भी तारीफ़ करने से नहीं चूके।

राष्ट्रपति चुनाव में केंद्र के साथ

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को समर्थन देने पर फ़ैसला करने से पहले हेमंत सोरेन अपनी पार्टी की बैठक में नहीं गये। पार्टी के नेताओं से मिलकर फ़ैसला नहीं हुआ। इस पर फ़ैसला करने के लिए वह दिल्ली आये। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले। अमित शाह से मिलने के बाद उनको अचानक याद आया या ज्ञान बोध हुआ कि द्रौपदी मुर्मू तो झारखण्ड की राज्यपाल रह चुकी हैं। आदिवासी समाज से आती हैं। हमारी पार्टी आदिवासी समाज का विरोध कैसे कर सकती है। आदिवासी समाज से एक महिला राष्ट्रपति भवन पहुँच रही है, तो उसका समर्थन हम कैसे नहीं करेंगे।
यशवंत सिन्हा को विपक्ष ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था। राजग द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा के बाद भी सोरेन कांग्रेस, यूपीए और बाक़ी विपक्षी दलों के साथ थे। तब उन्हें याद नहीं आया कि द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समाज से आती हैं। वह कह रहे थे कि इस पर विचार किया जाएगा। पार्टी फॉरोम पर बात होगी, फिर फ़ैसला लिया जाएगा। इससे तो यही लगता है कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात के बाद कुछ खिचड़ी पकी है।

कांग्रेस पड़ रही ढीली
कांग्रेस कमज़ोर होने के साथ ढीली पड़ रही है। पार्टी राज्य गठन के बाद सबसे अधिक सदस्यों के साथ विधानसभा में है, इसके बाद भी विधायकों और मंत्रियों का मतभेद समय-समय पर सार्वजनिक होता रहता है। जब भी हेमंत सोरेन सरकार गिरने की बात आती है, कांग्रेस विधायकों के ही टूटने की बात निकलती है। बीते वर्ष कांग्रेस के कुछ विधायकों पर सरकार गिराने की साज़िश का आरोप लगा। विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की चर्चा हुई। पुलिस ने मामला दर्ज किया।

हालाँकि वह मामला ठण्डे बस्ते में चला गया। कांग्रेस के विधायक अपनी सरकार होने के बाद भी जनता का काम नहीं करवा पाने का आरोप सार्वजनिक मंच से हमेशा लगाते हैं। इन सब के बीच कांग्रेस विधायक राष्ट्रपति चुनाव में एक और आरोप में घिर गये हैं। उन पर पार्टी लाइन से हटकर भाजपा का साथ देने और राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट करने के आरोप लग रहे हैं। यह हक़ीक़त भी है। क्योंकि जितने वोट झारखण्ड से द्रौपदी मुर्मू को मिले, वह उम्मीद से अधिक था। उधर, कांग्रेस कोटे के मंत्री आलमगीर आलम भी ईडी के निशाने पर आ गये हैं। अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच कर रही ईडी ने आलमगीर के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज कर लिया है।

कांग्रेस नहीं कर सकती ऐतराज़
कांग्रेस की राज्य में स्थिति बड़ी विचित्र है। पार्टी सरकार में है। झामुमो के साथ गठबंधन में है; लेकिन खुलकर किसी मामले में ऐतराज़ जताने की स्थिति में भी नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव में झारखण्ड की दलीय स्थिति के अनुसार भाजपा के 25 विधायकों के अलावा झामुमो के 30, आजसू पार्टी के दो सदस्यों के अलावा दो निर्दलीय का समर्थन पहले से ही द्रौपदी मुर्मू को था। इस तरह से द्रौपदी मुर्मू को 59 मत (वोट) मिलना पहले से ही तय था। इसमें से भाजपा के एक विधायक इंद्रजीत मेहता बीमार रहने के कारण अस्पताल में भर्ती हैं और वह मतदान करने नहीं पहुँचे थे। इस तरह से द्रौपदी मुर्मू को 58 मत मिलना तय था। लेकिन उन्हें झारखण्ड से 70 विधायकों का समर्थन मिला और एक मत निरस्त हो गया। इस तरह से 12 वोट अधिक मिले। कांग्रेस के 17 विधायक हैं। यानी निश्चित रूप से कांग्रेस विधायकों ने ही पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग की है। कांग्रेस की एकजुटता पर ही सवालिया निशान है। ऐसे में मुख्यमंत्री के बदले तेवर पर ऐतराज़ करने की स्थिति में भी पार्टी नहीं है। लिहाज़ा पार्टी के नेता चुप्पी साधे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हमारा गठबंधन झामुमो के साथ सरकार में है राष्ट्रपति चुनाव में नहीं। वह स्वतंत्र थे जिसे वोट डालना चाहें। अपने विधायकों की एकजुटता पर कहते हैं, मामले को देख रहे हैं। किस-किस ने क्रॉस वोटिंग की है।

खिचड़ी पकने का है इंतज़ार
झारखण्ड की राजनीति में कुछ खिचड़ी तो पक रही है। इसके पकने का इंतज़ार है। तभी ऊँट किस तरफ़ करवट लेगी यानी कांग्रेस टूट रही या झामुमो बँटेगा। या फिर हेमंत सोरेन स्थिति को सँभाल लेंगे। इसकी सटीक जानकारी लगेगी। क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को राष्ट्रपति चुनाव में अचानक दिल्ली दौरे के बाद आदिवासी हित का ख़याल आना, अतिथि देवो भव: की बात कहते हुए प्रधानमंत्री की प्रशंसा करना जैसे तमाम घटनाक्रम के रहस्य को फ़िलहाल साफ़-साफ़ समझना थोड़ा मुश्किल है। मुश्किल इसलिए क्योंकि जब किसी के सरकार जाने वाली हो, और पार्टी पर संकट हो, तो विरोधी पर हमले तेज़ हो जाते हैं। यह पहला मामला होगा, जब जहाँ सरकार जाने की चर्चा तेज़ हो। मुख्यमंत्री पर चौतरफ़ा हमला चल रहा हो। ख़ुद की पार्टी भी ख़तरे में है और बहुत से क़रीबी लोग जेल जाने की डगर पर हों। ऐसे में विरोधी पर किसी आक्रमण या आलोचना के बजाये प्रशंसा हो रही है।

इसका मतलब है कि हेमंत सोरेन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मुलाक़ात में कोई-न-कोई फ़ैसला हुआ है। कोई सौदेबाज़ी या समझौता हुआ है। इतना तय है कि झारखण्ड एक अलग ही राजनीति की ओर बढ़ रही है, जिसमें किसी भी सम्भावना को इन्कार नहीं किया जा सकता है। सम्भव है कि नयी सरकार बनने में गोवा और महाराष्ट्र मॉडल की जगह कोई तीसरा ही मॉडल निकल आये।

विधानभा में दलगत स्थिति
पार्टी सीटें
झामुमो 30
भाजपा 25
कांग्रेस 17
झाविमो 2
आजसू 2
सीपीआई(एमएल) 1
एनसीपी 1
निर्दलीय 2
मनोनीत 1
राजद 1
कुल 82

बता दें कि झाविमो का भाजपा में विलय हो चुका है। एक सदस्य बाबूलाल मरांडी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। दूसरे प्रदीप यादव कांग्रेस में गये हैं। अभी इन पर सदन में दल-बदल का ममाल चल रहा और सदन में इन्हें झाविमो छोड़ दूसरे दल के सदस्य के रूप में मान्यता नहीं मिली है।

उत्तर प्रदेश का अगला भाजपा अध्यक्ष कौन?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में छोटे-मोटे बदलाव होते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। मगर जब प्रश्न सत्ता का हो, तो दावेदारों की कमी नहीं होती। कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश पर शासन करना न आसान है तथा न छोटी बात; क्योंकि यह बड़ा प्रदेश केंद्र की सत्ता का दरवाज़ा है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चाहे जो भी रहा हो, उसने प्रधानमंत्री बनने का सपना अवश्य देखा होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी यह सपना पिछले कई वर्षों से देखते आ रहे हैं। सच तो यह है कि उनके समर्थक इस पर बेझिझक खुलकर बात भी करते हैं तथा यह भी मानते हैं कि आने वाले समय में योगी आदित्यनाथ ही देश के प्रधानमंत्री बनेंगे।

योगी आदित्यनाथ की यह राह कितनी कठिन है तथा कितनी सरल? यह तो नहीं पता; मगर उनकी उत्तर प्रदेश में चलती कितनी है, इस पर कई बार प्रश्नचिह्न लगे हैं। कहा जाता है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अवश्य हैं, मगर उनकी इच्छा से हर काम नहीं होता। क्योंकि उनके मंत्रिमंडल में कई मंत्री ऐसे हैं, जिनका चुनाव केंद्र की सत्ता ने किया है। एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की विनती करते हुए बताया कि इस वर्ष विधानसभा चुनावों में अधिकतर टिकट देने का निर्णय भी दिल्ली से ही हुआ था तथा मंत्रिमंडल में भी वहीं का दख़ल अधिक रहा।

जो भी हो, अब बारी एक ऐसे पद पर चयन की आ चुकी है, जिसका क़द बहुत बड़ा माना जाता है। यह पद है- उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष का। किसी पार्टी की सत्ता हो, तो उसका अध्यक्ष स्वयं को मुख्यमंत्री के समकक्ष ही समझता है। समझे भी क्यों नहीं, उसके वारे-न्यारे होते हैं। उत्तर प्रदेश में वर्तमान में स्वतंत्र देव सिंह प्रदेश अध्यक्ष हैं तथा जल शक्ति मंत्री भी। मगर अब जल्द ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से त्याग-पत्र देना होगा। सभी जानते हैं कि भाजपा में एक व्यक्ति-एक पद की परम्परा आरम्भ हो चुकी है। इसके अतिरिक्त स्वतंत्र देव सिंह तीन साल का अपना कार्यकाल भी पूरा कर चुके हैं। अतएव नये अध्यक्ष का चुना जाना तय है। मगर नया अध्यक्ष कौन होगा, इस पर अटकलों तथा उड़ती सूचनाओं ने लोगों को कानाफूसी करने का अवसर प्रदान कर दिया है। प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या योगी आदित्यनाथ की इच्छा से उनका कोई पसन्दीदा व्यक्ति प्रदेश अध्यक्ष बनेगा या दिल्ली की सत्ता प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करेगी? क्योंकि एक तो दिल्ली दरबार में प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा की हाज़िरी चर्चा का विषय बनी हुई है, तो दूसरे कई नेताओं में वहाँ हाज़िरी लगाने की छटपटाहट भी देखी जा रही है।

इस महत्त्वपूर्ण पद पर पिछले तीन महीने में कई नाम चर्चा में आ चुके हैं, जिनमें केंद्र सरकार व राज्य सरकार के नेताओं, मंत्रियों, विधायकों व सांसदों तक के नाम सामने आ रहे हैं। इनमें सांसद डॉ. रामशंकर कठेरिया, केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर, सांसद विनोद सोनकर, केंद्रीय मंत्री बी.एल. वर्मा, केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, सांसद सुब्रत पाठक, सांसद हरीश द्विवेदी, प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र चौधरी, डॉ. दिनेश उपाध्याय, गोविंद नारायण शुक्ला, ब्रज बहादुर शर्मा जैसे कई नाम भी सामने आ रहे हैं।

अब तक देखा गया है कि किसी विशेष पद पर अचानक सामने आये नाम तथा जानकारों के अनुमान धरे-के-धरे रह जाते हैं तथा एक ऐसा नाम निकलकर सामने आता है, जिसको कोई कल्पना तक नहीं कर रहा होता है। हालाँकि इस वर्ष दिल्ली की सत्ता पिछड़ा वर्ग तथा अनुसूचित जाति के लोगों को प्रसन्न करने के बारे में सोच सकती है। ऐसे में हो सकता है कि इन वर्गों का कोई बड़ा चेहरा चुन लिया जाए।

भारत ने बार-बार झेला बँटवारे का दु:ख

कितना विशाल था अखण्ड भारत, यह जानना दिलचस्प है

हाल ही में ट्विटर यूजर्स ने एक दिलचस्प सवाल उठाया कि भारत का विभाजन कितनी बार हुआ? अधिकांश लोगों ने जवाब दिया कि भारत का विभाजन एक ही बार सन् 1947 में हुआ था, जब भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग राष्ट्र बन गये, जिन्हें भारत गणराज्य और इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है।
क्या आप जानते हैं कि 61 साल में अंग्रेजों ने भारत का सात बार विभाजन कर दिया था? यह निश्चित रूप से सन् 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने के अलावा है। इसके अलावा इसमें पहले का बर्मा अब म्यांमार और पहले का सीलोन अब श्रीलंका भारत का हिस्सा नहीं हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, जो अभी भी अनुत्तरित हैं। इस सवाल के के हैरान करने वाले जवाब हैं।

भारत से निकले कितने देश
अखण्ड भारत हिमालय से हिन्द महासागर तक और ईरान से इंडोनेशिया तक फैला हुआ था। ब्रिटिश हुकूमत के दौर सन् 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग किलोमीटर था, जो वर्तमान में सिमटकर महज़ 33 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया है। यानी भारत का 50 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अब भारत का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि पड़ोसी देशों के रूप में हमारे सामने है। इस बँटवारे में कितने देश बने? कब बने? यह जानना इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि वर्तमान में अखण्ड भारत की बात भी चल रही है और विश्व गुरु बनने की भी। आइए, जानते हैं कब, कौन-सा देश भारत से अलग होकर बना :-

श्रीलंका : सन् 1935 में अंग्रेजों ने श्रीलंका को भारत से अलग कर दिया। श्रीलंका का पुराना नाम सिंहलद्वीप था। बाद में सिंहलद्वीप नाम का नाम बदलकर सीलोन कर दिया गया। सम्राट अशोक के शासनकाल में श्रीलंका का नाम ताम्रपर्णी था। सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और उनकी बेटी संघमित्रा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका गये थे। श्रीलंका अखण्ड भारत का अंग था।

अफ़ग़ानिस्तान : अफ़ग़ानिस्तान का प्राचीन नाम उपगणस्थान व कंधार का नाम गांधार था। अफ़ग़ानिस्तान एक शैव देश था। महाभारत में वर्णित गांधार अफ़ग़ानिस्तान में है, जहाँ से कौरवों की माता गांधारी और मामा शकुनि थे। कंधार (गांधार) का वर्णन शाहजहाँ के शासन-काल तक मिलता है। यह भारत का हिस्सा था। सन् 1876 में रूस और ब्रिटेन के बीच गंडामक सन्धि पर हस्ताक्षर हुए थे। संधि के बाद, अफ़ग़ानिस्तान को एक अलग देश के रूप में स्वीकार कर लिया गया था।

म्यांमार : कभी बर्मा और अब म्यांमार का प्राचीन नाम ब्रह्मदेश था। सन् 1937 में म्यांमार यानी बर्मा को एक अलग देश की मान्यता अंग्रेजों ने दी थी। प्राचीन काल में हिन्दू राजा आनंद व्रत ने यहाँ शासन किया था।

नेपाल : नेपाल को प्राचीन काल में देवधर के नाम से जाना जाता था। भगवान बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ था और माता सीता का जन्म जनकपुर में हुआ था, जो आज नेपाल में है। सन् 1904 में अंग्रेजों ने नेपाल को एक अलग देश बनाया था। नेपाल हिन्दू राष्ट्र था और उसे आधिकारिक रूप से हिन्दू राष्ट्र नेपाल कहा जाता था। कुछ साल पहले तक नेपाल के राजा को नेपाल नरेश कहा जाता था। नेपाल में 81 फ़ीसदी हिन्दू और नौ फ़ीसदी बौद्ध हैं। सम्राट अशोक और समुद्रगुप्त के शासनकाल के दौरान नेपाल भारत का एक अभिन्न अंग था। सन् 1951 में नेपाल के महाराजा त्रिभुवन सिंह ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू से नेपाल के भारत में विलय की अपील की थी; लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

थाईलैंड : सन् 1939 तक थाईलैंड को श्याम के नाम से जाना जाता था। इसे भी इस साल अंग्रेजों ने भारत से अलग कर दिया। अयोध्या, श्री विजय आदि इसके प्रमुख शहर थे। श्याम में बौद्ध मन्दिरों का निर्माण तीसरी शताब्दी में शुरू हुआ था। इस देश में आज भी कई शिव मन्दिर हैं। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में भी सैकड़ों हिन्दू मन्दिर हैं।

कंबोडिया : कंबोडिया संस्कृत नाम कंबोज से निकला है, जो अखण्ड भारत का हिस्सा था। पहली शताब्दी से ही यहाँ भारतीय मूल के कौंडिन्य वंश का शासन था। यहाँ के लोग शिव, विष्णु और बुद्ध की पूजा करते थे। राष्ट्रभाषा संस्कृत थी। कंबोडिया में आज भी भारतीय महीनों जैसे चैत्र, वैशाख, आषाढ़ के नामों का प्रयोग किया जाता है। विश्व प्रसिद्ध अंगकोर वाट मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसे हिन्दू राजा सूर्यदेव वर्मन ने बनवाया था। मन्दिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत से सम्बन्धित पेंटिंग हैं। अंकोरवाट का प्राचीन नाम यशोधरपुर है।

वियतनाम : वियतनाम का प्राचीन नाम चंपादेश था और इसके प्रमुख शहर इंद्रपुर, अमरावती और विजय थे। वहाँ आज भी कई शिव, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती मन्दिर मिलेंगे। वहाँ शिवलिंग की भी पूजा की जाती थी। लोगों को चाम कहा जाता था, जो मूल रूप से शैव थे।

मलेशिया : मलेशिया का प्राचीन नाम मलय देश था, जो एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ है- पहाड़ों की भूमि। मलेशिया का वर्णन रामायण और रघुवंशम् में भी मिलता है। मलय में शैव धर्म का प्रचलन था। देवी दुर्गा और भगवान गणेश की पूजा की गयी। यहाँ की मुख्य लिपि ब्राह्मी थी और संस्कृत मुख्य भाषा थी।

इंडोनेशिया : इंडोनेशिया का प्राचीन नाम दीपंतर भारत है, जिसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। दीपंतर भारत का अर्थ है भारत का समुद्री हिस्सा। यह हिन्दू राजाओं का राज्य था। सबसे बड़ा शिव मन्दिर जावा द्वीप में था। मन्दिरों को मुख्य रूप से भगवान राम और भगवान कृष्ण के साथ उकेरा गया था। भुवनकोश संस्कृत के 525 श्लोकों वाली सबसे प्राचीन पुस्तक है। इंडोनेशिया के प्रमुख संस्थानों के नाम और आदर्श वाक्य अभी भी संस्कृत में चलन में हैं। जैसे- इंडोनेशियाई पुलिस अकादमी का नाम धर्म बिजाक्साना क्षत्रिय है। इंडोनेशिया राष्ट्रीय सशस्त्र बल को त्रिधर्म एक कर्म कहते हैं। इंडोनेशिया एयरलाइंस को गरुड़ एयरलाइंस कहते हैं। इंडोनेशिया का गृह मंत्रालय को चरक भुवन हैं। इंडोनेशिया वित्त मंत्रालय को नगर धन रक्षा हैं। इंडोनेशिया सर्वोच्च न्यायालय को धर्म युक्ति है।

तिब्बत : तिब्बत का प्राचीन नाम त्रिविष्टम था, जो दो भागों में विभाजित था। सन् 1907 में चीन और अंग्रेजों के बीच एक समझौते के बाद एक हिस्सा चीन को और दूसरा लामा को दिया गया था। साल 1954 में, भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीनी लोगों के प्रति अपनी एकजुटता दिखाने के लिए तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में स्वीकार किया।

भूटान : साल 1906 में अंग्रेजों द्वारा भूटान को भारत से अलग कर दिया गया और एक अलग देश के रूप में मान्यता दी गयी। भूटान संस्कृत शब्द भू-उत्थान से बना है, जिसका अर्थ है उच्च भूमि।

पाकिस्तान : 14 अगस्त 1947 को अंग्रेजों ने भारत का विभाजन किया और पाकिस्तान पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में अस्तित्व में आया। मोहम्मद अली जिन्ना 1940 से धर्म के आधार पर एक अलग देश की माँग कर रहे थे, जो बाद में पाकिस्तान बन गया। साल 1971 में पाकिस्तान फिर विभाजित हो गया और भारत के सहयोग से बांग्लादेश अस्तित्व में आया। पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत के अंग रहे हैं। यह दिलचस्प है; लेकिन हममें से कितने लोग वास्तव में इस इतिहास से अवगत हैं?

जोकोविक का कमाल

ग्रैंड स्लैम जीतने में फेडरर से आगे पहुँचे जोकोविक, पर नडाल से अभी एक क़दम पीछे

नोवाक जोकोविक जब सिर्फ़ सात साल के थे, वह ख़ुद को चैम्पियन समझने के लिए घर पर काग़ज़ और लकड़ी से टेनिस की ट्राफियाँ बनाया करते थे। तब उन्हें पता भी नहीं था कि एक दिन वह एक ऐसे चैंपियन बन जाएँगे, जिनके पास सचमुच की दर्ज़नों बड़ी ट्राफियाँ होंगी। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि सिर्फ़ चार साल की उम्र में उन्होंने टेनिस रैकेट हाथ में पकड़ लिया था और वे खेल का अभ्यास सर्बिया में उस कोपोनिक माउंटेन रिसोर्ट के सामने बने टेनिस कोर्ट में करते थे, जहाँ उनके माता-पिता का अच्छा ख़ासा व्यवसाय था। वैसे जोकोविच के मुताबिक, उन्होंने टेनिस मस्ती के लिए ही खेलना शुरू किया था; लेकिन बाद में गम्भीरता से इससे जुड़ गये। विम्बलडन उस छोटी उम्र से ही उनका पसन्दीदा टूर्नामेंट था और सपना था दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी बनना।

यही जोकोविक आज विश्व टेनिस में किवदंती होने की राह पर हैं। बेशक राफेल नडाल (राफा) उनके बराबर दौड़ रहे हैं; लेकिन जोकोविक अनथके लगते हैं। हाल ही में विम्बलडन ख़िताब जीतने वाले जोकोविक की फार्म बरक़रार रही, तो ग्रैंडस्लैम जीतने के मामले में एकाध साल में वह विश्व टेनिस के शीर्ष पर होंगे। उनका स्टेमिना अद्भुत है और जीतने का जुनून उससे भी एक क़दम आगे है। निश्चित ही सर्बिया के नोवाक जोकोविक आज टेनिस के बादशाह हैं और 21 ग्रैंड स्लैम उनके महान् होने की गाथा कहते हैं।

जुलाई के पहले हफ़्ते जब विम्बलडन टूर्नामेंट में शीर्ष वरीयता प्राप्त इस खिलाड़ी ने फाइनल में पहला सेट हारने के बावजूद जिस तरह शानदार वापसी की और पहली बार फाइनल खेल रहे ऑस्ट्रेलिया के निक किर्गियोस को शिकस्त दी, वह जोकोविक की क़ाबिलियत का सुबूत है। टूर्नामेंट का अपना सातवाँ ख़िताब जीतने के लिए सर्बिया के इस खिलाड़ी ने निक पर 4-6, 6-3, त6-4, 7-6 से जीत दर्ज की।

जोकोविक जब ग्रास कोर्ट (घास वाली सतह) पर खेलते हैं, तो अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए बहुत ख़तरनाक हो जाते हैं। इस विम्बलडन में जोकोविच के लिए ख़िताब जीतना बड़ा काम तो था ही; लेकिन उससे भी बड़ी यह एक उपलब्धि थी। क्योंकि यह उनकी लगातार 28वीं जीत थी और विम्बलडन ख़िताब जीतने के मामले में वह रोज़र फेडरर के बाद दूसरे स्थान पर पहुँच गये हैं, जिनके आठ विम्बलडन ख़िताब हैं। किसी ग्रैंडस्लैम में वह 32 बार फाइनल में पहुँचे हैं, जो किसी भी अन्य खिलाड़ी से ज़्यादा है। उनके पीछे रोज़र फेडरर (31) और आगे राफेल नडाल (30) हैं।

जीत के बाद जोकोविच ने कहा- ‘हर बार पहले से अधिक ख़ास होता है। मेरे लिए यह ख़िताब हमेशा सबसे विशेष होगा। यह मेरा सबसे विशेष टूर्नामेंट है। इस टूर्नामेंट ने ही मुझे सर्बिया में इस खेल से जुडऩे के लिए प्रेरित किया था।’ जोकोविक को फाइनल में अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी राफा का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि सेमीफाइनल में उन्होंने चोट के कारण निक किर्गियोस को वॉकओवर दे दिया। जोकोविच ने लगातार चौथी बार विम्बलडन ख़िताब जीता। कुल मिलाकर वह सात बार इस टूर्नामेंट का ख़िताब अपने नाम कर चुके हैं। जोकोविच ग्रासकोर्ट पर सन् 2011, 2014, 2015, 2018, 2019, 2021 और 2022 में चैंपियन बने हैं। कोरोना वायरस के कारण 2020 में इस टूर्नामेंट का आयोजन नहीं हो सका था।

नोवाक जोकोविच ग्रैंड स्लैम जीतने के मामले में अब स्पेन के राफेल नडाल से बस एक क़दम पीछे है। उनका यह 21वाँ ग्रैंड स्लैम ख़िताब था। ओपन युग में पुरुषों में सबसे ज़्यादा ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने का रिकॉर्ड राफेल नडाल (राफा) के नाम हैं, जिन्होंने 22 ख़िताब जीते हैं। जोकोविच अब उनसे महज़ एक क़दम दूर हैं; जबकि वह महान् रोज़र फेडरर से आगे निकल चुके हैं, जिनके 20 ग्रैंडस्लैम ख़िताब हैं। राफा अभी सक्रिय हैं और फेडरर भी। लेकिन उनकी असली टक्कर अब राफा से ही है; क्योंकि फेडरर सक्रिय होते हुए भी कई बड़े टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। उम्र नडाल के आड़े हैं, जो 36 साल के हैं। फेडरर तो 41 साल के होने को हैं, जबकि जोकोविक 35 साल के हैं।

इस साल राफा को विम्बलडन में दूसरी वरीयता हासिल थी। स्पेन के नडाल का इस साल ग्रैंडस्लैम में अब तक 19-0 का रिकॉर्ड था। उन्होंने 2022 में अपने सभी ग्रैंड स्लैम मुक़ाबले जीते और इस दौरान जनवरी में ऑस्ट्रेलिया ओपन और जून में फ्रेंच ओपन ख़िताब अपने नाम किया। नडाल क़रीब एक हफ़्ते से पेट की मांसपेशियों में दर्द से परेशान थे और सेमीफाइनल में उन्हें इसी कारण से वाकओवर देना पड़ा। वैसे नडाल पाँच सेट तक चले क्वार्टर फाइनल में ही टेलर फ्रिट्ज के ख़िलाफ़ असहनीय पीड़ा सहते दिखे थे, भले वह चार घंटे और 21 मिनट में मुक़ाबला जीतने में सफल रहे थे।

जोकोविक ने एक और कमाल किया है। ऑल इंग्लैंड क्लब में जोकोविच की हाल की जीत उनकी 86वीं जीत थी। अब वह चारों ग्रैंड स्लैम में 80 या इससे अधिक मैच जीतने वाले पुरुष और महिला वर्ग के पहले खिलाड़ी बन गये हैं। जोकोविच ने ऑस्ट्रेलियन ओपन में 82, फ्रेंच ओपन में 85, विम्बलडन में 86 और यूएस ओपन में 81 मैच जीते हैं। दिलचस्प यह है कि ग्रैंडस्लैम जीतने के मामले में उनसे एक ख़िताब आगे चल रहे ग्रैंड स्लैम चैंपियन राफेल नडाल ऑस्ट्रेलियन ओपन, विम्बलडन और यूएस ओपन तीनों में 80 मैच नहीं जीत पाये हैं। रोज़र फेडरर को तो फ्रेंच ओपन में 73 जीत ही हासिल हुई हैं। इसके अलावा 22 मई, 1987 को जन्मे जोकोविच सबसे ज़्यादा हफ़्तों तक एटीपी रैंकिंग में नंबर-1 पर रहने वाले खिलाड़ी हैं। वह आज भी मैदान में जमकर खेल रहे हैं। सात साल की उम्र में जब उन्होंने ठान लिया कि टेनिस ही उनका करियर बनेगा, तो उसके बाद पीछे मुडक़र नहीं देखा।

इसके अलावा 22 मई, 1987 को जन्मे जोकोविच सबसे ज़्यादा हफ़्तों तक एटीपी रैंकिंग में नंबर-1 पर रहने वाले खिलाड़ी हैं। वह आज भी मैदान में जमकर खेल रहे हैं। सात साल की उम्र में जब उन्होंने ठान लिया कि टेनिस ही उनका करियर बनेगा, तो उसके बाद पीछे मुडक़र नहीं देखा।

जोकोविच एक समय स्वास्थ्य से जुड़ी गम्भीर समस्या भी झेल रहे थे और लगता था कि उनका करियर समाप्त होने वाला है। उनके मुताबिक, साल 2010 से पहले वह खेल के दौरान भाग-दौड़ के बीच अकसर साँस लेने में कठिनाई महसूस किया करते थे। थक भी जाते थे।

हालाँकि 2010 के ऑस्ट्रेलियन ओपन के दौरान जब पाँच सेट तक चले क्वार्टर फाइनल में विल्फ्रेड सोंगा के ख़िलाफ़ उन्हें मेलबर्न की गर्मी में जब दिक़्क़तत महसूस होने लगी, तो उन्होंने इससे निजात पाने की ठान ली। इसके बाद जोकोविक ने जीवन में बड़े बदलाव किये, जो खान-पान और अन्य चीज़ों से जुड़े थे। तब जोकोविच पिज्जा और चीनी से बने सोडा के दीवाने थे। उन्होंने विशेषज्ञ से राय ली और इसके बाद ग्लूटन, रिफाइंड चीनी, डेयरी प्रोडक्ट से तौबा कर ली। अब जोकोविक वीगन डाइट अपना चुके हैं, जिसमें पशु या उनके ज़रिये तैयार उत्पाद शामिल नहीं होते, जैसे- दूध, शहद, पनीर, मक्खन, अंडे, मांस आदि। इसकी जगह जोकोविक फल, अनाज, बीज, सब्ज़ियाँ, सूखे मेवे, नट्स आदि पर निर्भर रहते हैं। मैच के दौरान ब्रेक पर जोकोविच खजूर से बने स्नैक्स लेते हैं।

सबकी नज़र अब इस बात पर है कि इस साल धमाकेदार प्रदर्शन करने वाले राफेल नडाल से आगे निकलने का सपना क्या जोकोविक पूरा कर पाएँगे? यह ज़रूर ग़ौर करने लायक बात है कि नडाल ने इस साल जो दो ग्रैंड स्लैम जीते हैं, उनमें जोकोविक किसी कारण खेल नहीं पाये थे। लिहाज़ा यह कहा जा सकता है कि यदि वह खेले होते, तो उनके ग्रैंड स्लैम की संख्या कुछ और हो सकती थी; क्योंकि नडाल ने अपना 22वाँ ग्रैंडस्लैम इसी साल फ्रेंच ओपन जीतकर नाम कमाया है।

जोकोविक के ख़िताब
 ऑस्ट्रेलियन ओपन 9
 यूएस ओपन 3
 फ्रेंच ओपन 2
 विम्बलडन 7
 कुल ग्रैंडस्लैम 21

नडाल के ख़िताब
 फ्रेंच ओपन 14
 यूएस ओपन 4
 विम्बलडन 2
 ऑस्ट्रेलियन ओपन 2
 कुल ग्रैंडस्लैम 22

उग्रता की अफ़ीम

आजकल हर कोई ख़ुद को सबसे बड़ा धार्मिक सिद्ध करने में लगा है। धर्म के मर्म को समझे बग़ैर लोग अपने-अपने धर्म का आडम्बर कर रहे हैं। चाहे वे किसी भी धर्म के लोग हों। उन्हें लगता है हो-हल्ला करना, हिंसक होना, नारे लगाना, धार्मिक लिबास पहनना और ढोंग करना ही धर्म है। इससे उनका धर्म मज़बूत होगा।

यह अब चलन में है। इसलिए हर धर्म के लोग अपने-अपने धर्म को मज़बूत करने की तुच्छ सोच से इसी तरह की बेहूदगी करने में लगे हैं; जो ख़ुद को एक दिलासा देने जैसा एक दिवास्वप्न है। लेकिन इसमें बुराई यह है कि सभी धर्मों के कट्टरपंथी एक-दूसरे पर हमलावर हैं। आज इसाई और कैथोलिक की लड़ाई प्रोटेस्टेंट से है। इसाइयों और मुसलमानों के बीच लड़ाई है। भारत में सनातनी और मुसलमान लडऩे-मरने को तैयार हैं। जिस जगह मुसलमान नहीं हैं, वहाँ सनातनियों का झगड़ा अपने ही धर्म के कथित निम्न वर्ग के लोगों, जिन्हें वे दलित कहते हैं; से रहता है। इसी तरह सुन्नी और शिया मुसलमानों में दुश्मनों की तरह लड़ाई रहती है। यह लड़ाई हर धर्म और हर जाति में है। अगर कहीं किसी दूसरे धर्म या दूसरी जाति के लोग नहीं हैं, तो वहाँ आपसी लड़ाई है।

दरअसल यह वर्चस्व की लड़ाई है, जिसकी वजह वे चंद लोग हैं, जो केवल और केवल ख़ुद को सबसे ऊपर रखना चाहते हैं। ऐसे लालची और बिना काम किये दूसरों की मेहनत पर पलने वाले लोग हर धर्म और हर जाति में हैं। इन लोगों की एक ख़ास अभिलाषा यही रहती है कि वे सब पर शासन करें; दूसरों पर अत्याचार करें और दूसरे सब उनकी गुलामी करें। वे (बाक़ी लोग) इतना अत्याचार सहें कि इन कथित ऊँचे लोगों के लात-घूँसे खाकर भी पैरों में पड़े रहें। यह मानसिकता सत्ताओं में मिलने वाली मुफ़्त और हराम की मलाई मिलने की आदत के कारण पैदा हुई है। यही कारण है कि लोगों के पथ-प्रदर्शक बने ये चंद लोग बड़े ओहदों से नीचे नहीं आना चाहते; चाहे वे धर्म की सत्ता पर विराजमान हों, चाहें राजनीतिक सत्ता पर जमे बैठे हों। ये लोग कभी नहीं चाहते कि लोगों में समरसता रहे, मानवता की भावना बढ़े और वे प्यार से मिलजुलकर रहें।

असल में गड़बड़ लोगों के भीतर है। ख़ुद को झूठमूठ का श्रेष्ठ और ऊँचा दिखाने की होड़ में सब फँसे हुए हैं। धर्मांधता और घमण्ड ने सबको मूर्ख, क्रोधी और आपराधिक प्रवृत्ति का जानवर बना दिया है। लोगों के दिमाग़ में घुसा हुआ है कि वे ईश्वर और धर्म के रक्षक हैं। एक मांस का लोथड़ा लेकर घूमने वाले ये नाज़ुक लोग उस ईश्वर की रक्षा का दम्भ भरते हैं, जिसके इशारे पर पूरा ब्रह्माण्ड चलता है। जिसने सबको पैदा किया है, लोग उसकी सृष्टि में दख़ल डालकर दूसरे धर्म या अपने ही धर्म के कमज़ोर और मानवता की राह पर चलने वालों की हत्या करके ख़ुद को सृष्टि का संचालक समझने की भूल कर रहे हैं।

दरअसल धर्म और सत्ताओं की ठेकेदारी करने वाले लोग अपना हित साधने के लिए, दुनिया भर में हिंसा और ख़ून-ख़राबा करा रहे हैं। ये लोग मौत से इतने डरे हुए हैं कि ख़ुद को अनेक सुरक्षा घेरों में छिपाकर रखते हैं। परन्तु यह तो सामान्य लोगों को सोचना होगा, जो मूर्खों की तरह उनके अनुयायी और भक्त बने हुए हैं। रक्षा कर रहे हैं। परन्तु वे पाखण्डी पूरी दुनिया में हिंसा, दु:ख और तबाही फैला रहे हैं। क्या ऐसे दुष्टों की रक्षा करनी चाहिए? अगर दुनिया के सभी लोग अपने-अपने धर्मों के मठाधीशों, सत्ताधारियों और अपने मार्गदर्शकों के कहने पर हिंसा न करें और उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाने वालों को ही दण्डित करें, तो दुनिया में शायद इतनी हिंसा न हो। सोचिए कि सामान्य लोग किसी के दुश्मन कहाँ होते हैं? भले ही वे अपने धर्म के अनुरूप किसी भी नाम से ईश्वर को मानते और पूजते हों। असली दुश्मन तो वे लोग हैं, जो इंसानों के बीच ज़हर घोल रहे हैं। सामान्य लोग, ख़ासकर बुद्धिहीन आसानी से भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए पाखंडी लोग धर्म के नाम पर उग्रता की अफ़ीम उन्हें बहुत आसानी से खिला देते हैं; और वे धर्म के नाम पर आसानी से गुमराह हो जाते हैं। फिर उग्रता से झूठ फैलाने लगते हैं।

आजकल तो यह तय कर पाना आसान नहीं है कि सच क्या है और झूठ क्या है? दुनिया में झूठों की भरमार है। झूठ की एक मंडी-सी सजी हुई है। यही कारण है कि अब सच बोलने वालों की जान तक ले ली जाती है। यह अब बड़ा आसान हो गया है। लोग क्रूरता से भरे पड़े हैं। उनमें यह चलन बढ़ रहा है। इसलिए भी बढ़ रहा है, क्योंकि उन्हें सज़ा के बजाय सुरक्षा मिलती है। और इन्हें बहकाने वालों को तो इतना सम्मान मिलता है कि देवताओं को भी न मिले। बस अपने कुकर्मों को छुपाने और लोगों के बीच धार्मिक अफ़ीम बाँटने का हुनर आना चाहिए। आजकल अनेक पाखंडी इसी तरह अपने-अपने धर्म की अफ़ीम बाँट रहे हैं। इसे धार्मिक जाल फेंकना कहते हैं, जिसमें फँसने वाले अपनी स्वतंत्रता के लिए फडफ़ड़ाते नहीं हैं, बल्कि पाखंडियों के हर इशारे पर नाचते रहते हैं।

महंगाई, जीएसटी, राउत मामले पर दोनों सदनों में हंगामा ; 2 बजे तक स्थगित

संसद में सोमवार को महंगाई और जीएसटी के अलावा संजय राउत की गिरफ्तारी के मुद्दे पर खूब हंगामा हुआ। हंगामे के बाद लोकसभा को 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। इधर कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि वे (भाजपा) संसद को विपक्ष मुक्त चाहते हैं, इसलिए वो ऐसा कर रहे हैं, लेकिन संजय राउत कानूनी तौर पर लड़ेंगे और उन्हें जो कुछ कहना है वो कहेंगे।

दोनों सदनों में आज भी कांग्रेस सहित विपक्ष ने महंगाई आदि विषयों पर खूब हंगामा किया। लोकसभा में हंगामे के कारण कार्यवाही पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गयी। राज्यसभा में भी हंगामे के बाद कार्यवाही को 12 बजे तक स्थगित कर दिया गया।

उधर शिवसेना नेता संजय राउत की गिरफ्तारी पर लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि संजय राउत ने एक ही गुनाह किया है कि वह भाजपा के डराने-धमकाने की राजनीति के आगे नहीं झुके। वे दृढ़ विश्वास और साहस वाले व्यक्ति हैं और हम संजय राउत के साथ हैं।

महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस सहित विपक्ष ने लगातार आक्रामक रुख अख्तियार किया हुआ है। विपक्ष ने महंगाई सहित अन्य मुद्दों पर संसद की कार्यवाही बाधित की है। हालांकि, केबिनेट मंत्री अनुराग ठाकुर ने सोमवार को कहा कि मोदी सरकार में महंगाई घाटी गैस सिलेंडर भी सस्ता हुआ है। सरकार ने प्याज, खाने के तेल, वनस्पति घी, टमाटर और चाय सहित विभिन्न आम जरूरत की चीजों के छह माह के आंकड़े जारी करके यह दावा किया है।

हालांकि विपक्ष ने महंगाई और जीएसटी के अलावा सरकार पर ईडी समेत केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। कांग्रेस के राज्य सभा में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा – भाजपा संसद को विपक्ष मुक्त चाहती है इसलिए वो ऐसा कर रहे हैं। लेकिन संजय राउत कानूनी तौर पर लड़ेंगे और उन्हें जो कुछ कहना है वो कहेंगे। ये सरकार विपक्ष को दबाना चाहती है, अगर कोई प्रॉपर्टी का मामला है तो उसके लिए कानून है और उसके तहत एक्शन लीजिए न कि उसके घर जाकर 6 घंटे पूछताछ करना ये सब उत्पीड़न है और विपक्ष को खत्म करने की बातें चल रही हैं।’

उधर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने शिवसेना संसद संजय राउत की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा पर निशाना साधा और भाजपा को ‘डराने-धमकाने वाली पार्टी’ कहा। एक ट्वीट में उन्होंने लिखा – ‘संजय राउत ने एक ही गुनाह किया है कि वह भाजपा की डराने-धमकाने की राजनीति के आगे झुके नहीं हैं। वह दृढ़ विश्वास और साहस के व्यक्ति हैं। हम संजय राउत के साथ हैं।’

गिरफ्तार संजय राउत को आज सेशन कोर्ट में पेश करेगी ईडी

मुंबई की एक चॉल के पुनर्विकास में कथित अनियमितताओं से जुड़े धन शोधन के मामले में पिछली रात गिरफ्तार शिवसेना सांसद संजय राउत को आज सेशन कोर्ट में पेश किया जा रहा है। ईडी उनका रिमांड लेने की कोशिश करेगी। इस बीच शिव सेना ने राउत की गिरफ्तारी को राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए कहा है कि पार्टी बिलकुल नहीं झुकेगी।

राउत को सेशंस कोर्ट में पेश करने से पहले सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। शिव सैनिकों ने पहले ही राउत की गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। मुंबई स्थित ईडी के दफ्तर, जेजे अस्पताल और सेशंस कोर्ट परिसर में करीब 200 पुलिसकर्मियों को तैनात किया है, ताकि किसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था की दिक्कत खड़ी न हो। राउत की गिरफ्तारी पर शिवसेना प्रवक्ता आनंद दुबे ने कहा – ‘राउत झुकेंगे नहीं। हम भी देखते हैं कि दिल्ली में कितना दम है?’

याद रहे राउत (60) को दक्षिण मुंबई के बैलार्ड एस्टेट में ईडी के क्षेत्रीय कार्यालय में छह घंटे से अधिक की पूछताछ के बाद रविवार आधी रात गिरफ्तार कर लिया गया था। अधिकारियों का दावा है कि ‘राउत जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे, जिसके कारण उन्हें धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत देर रात 12:05 बजे हिरासत में लिया गया ‘

राज्यसभा सदस्य राउत को आज मुंबई में एक विशेष पीएमएलए अदालत में पेश किया जाएगा, जहां प्रवर्तन निदेशालय उनकी हिरासत का अनुरोध करेगा। ईडी ने रविवार को मुंबई के भांडुप इलाके में उनके आवास पर तलाशी ली थी और राउत से पूछताछ की थी। शाम तक उन्हें एजेंसी के स्थानीय कार्यालय में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। अधिकारियों का दावा है कि तलाशी के दौरान दल ने 11.5 लाख रुपये नकद बरामद किए।

शिव सेना ने आरोप लगाया है कि संघीय एजेंसी की कार्रवाई का उद्देश्य शिवसेना और महाराष्ट्र को कमजोर करना है और राउत के खिलाफ झूठा मामला तैयार किया गया है। याद रहे अप्रैल में ईडी ने जांच के तहत राउत की पत्नी वर्षा राउत और उनके दो सहयोगियों की 11.15 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क किया था।