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राजनीति के आसमान पर जमीन

बंद्योपाध्याय भूमि सुधार आयोग बनाने के बाद नीतीश सरकार उस रिपोर्ट से किनारा तो कर चुकी है लेकिन इसने बिहार में चंपारण से लेकर बोधगया तक भूमि के सवाल पर खामोश लेकिन एक बेहद धारदार आंदोलन की शुरुआत कर दी है, निराला की रिपोर्ट

फुलकली देवी बहुत विनम्रता से ठेठ-गंवई अंदाज में परनाम बोलती हैं. फिर तुरंत घर की बात बताने लगती हैं कि उनके कितने बबुआ हैं और कितनी बबी यानी बेटी. ठेठ भोजपुरी में ही यह भी बताती हैं कि वे घास काटने गई थीं इसलिए आने में थोड़ा विलंब हो गया. कुछ पल के लिए तो लगता है कि शायद सही फुलकली से बात नहीं हो रही!

पिछले कुछ वर्षों में यहां नये भूपतियों का तेजी से उदय हुआ है, जो जमींदारों के वंशज नहीं बल्कि नवधनाढ्य राजनीति की उपज हैं और हर दल में हैंबात बदलते हुए पूछता हूं कि जमीन के कब्जे का क्या हुआ, क्या लड़ाई जीतने की कोई गुंजाइश है? इस एक सवाल के बाद उनका स्वर बदलता है. फिर जो जवाब मिलते हैं उनसे सारी शंका-आशंका मिट जाती है. फुलकली लगभग दहाड़ने के से अंदाज में बोलती हैं, ‘बबुआन लोगों का पसेना (पसीना) छोड़ा देंगे. हमको धमकी देते हैं कि मार देंगे-मुआ देंगे. मार दें-मुआ दें लेकिन जमीन पर कब्जा तो देना ही होगा. कइसे नहीं देंगे. कोई खैराती थोड़े न मांग रहे हैं! परचा है हमारे पास तो कब्जा भी हमारा ही होगा.’

फुलकली का बबुआन से इशारा चंपारण के भूस्वामियों की ओर होता है और परचे से उनका मतलब बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण तथा अधिशेष भूमि अर्जन) कानून (लैंड सीलिंग ऐक्ट या हदबंदी कानून) के तहत भूमिहीनों को दी गई भूमि के परवाने से है. फुलकली चंपारण के मंगलपुर गांव की रहने वाली हैं. जाति से मुसहर. उम्र यही करीब 50 साल. परचाधारी संघर्षवाहिनी की अध्यक्ष हैं. रतवल, रायबरी, महुअवा, चिड़िहरवा, बनकटवा, तुरहापट्टी, मंगलपुर जैसे कई गांवों के भूमिहीनों को गोलबंद करने वाली नेता. जब वह तिरंगा लेकर परचाधारी भूमिहीनों का नेतृत्व करते हुए जमीन पर कब्जे के लिए निकलती हैं तो सच में ही बडे़-बड़े जमींदारों के पसीने छूटने लगते हैं. इसी साल 26 जनवरी को रतवल गांव में फुलकली के नेतृत्व में जब सैकड़ों भूमिहीन मुसहर व अन्य पिछड़ी जाति के लोगों ने तिरंगा लेकर भूमि के कब्जे के लिए चढ़ाई की तो दशकों से चंपारण का बना-बनाया समीकरण देखते ही देखतेे भरभरा कर गिरने लगा था. यहां लगभग 400 एकड़ सरकारी जमीन पर बबुआनों का कब्जा था. ये जमींदार कसमसा कर रह गए. मजबूरी में ही सही, स्थानीय प्रशासन को करीब 300 परचाधारी परिवारों के बीच एक-एक एकड़ जमीन वितरित करनी पड़ी. चंपारण बिहार का वह इलाका है जहां गांधी जी ने 1917 में अपने आंदोलन की नींव रखी थी. चंपारण वह इलाका भी है जहां बिहार के बड़े-बड़े भूस्वामी वास करते रहे हैं. और अब चंपारण ही बिहार का वह इलाका भी है जहां समाज एक नई लड़ाई की अंगड़ाई ले रहा है. जमीन पर कब्जे की यह लड़ाई माओवादियों की तर्ज पर हरवे-हथियारों से लैस होकर लाल झंडा गाड़ने की नहीं है. 1974 के जेपी आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले और 1978 के बोधगया भूमि मुक्ति आंदोलन के अगुवा रहे पंकज जैसे समाजवादी कार्यकर्ता बहुत ही खामोशी से सत्याग्रह, उपवास और तिरंगे को हथियार बनाने की प्रेरणा देकर जमीन के लिए दलविहीन जमीनी नेता तैयार कर रहे हैं. असर यह है कि अब यहां फुलकली के साथ जब जिनिया, बियफी, जितेंद्र, संजय, गिरधारी, विनोद आदि अनपढ़, भूमिहीन और परंपरागत रूप से बंधुआ-सी जिंदगी गुजारने वाले किसानों की फौज तिरंगा लेकर निकलती है तो इलाके के बुजुर्ग बाशिंदों को गांधी जी का आंदोलन याद आ जाता है. अकेले पश्चिमी चंपारण में 35 हजार परचाधारी किसान गोलबंद हो गए हैं. 26 हजार एकड़ जमीन पर कब्जे की तैयारी है.

विपक्षी लालू प्रसाद, रामविलास पासवान हों या सत्ताधारी नीतीश कुमार और सुशील मोदी, भूमि के सवाल पर कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं

पश्चिम चंपारण के एक बड़े हिस्से में जिस तरह से भूमिहीनों का सत्याग्रही आंदोलन पिछले दो साल से चल रहा है, उसका असर तेजी से और साफ-साफ दिखने लगा है. सरकारी तंत्रों की मिलीभगत और खामोशी ने चंपारण में जिस आंदोलन की जमीन तैयार की उसकी धमक अब पूरे बिहार में सुनाई पड़ने लगी है. बिहार के अलग-अलग हिस्सों में फूलकलियों की फौज तैयार हो रही है. वर्षों से शांत पड़े और नासूर की तरह अंदर ही अंदर पक रहे जख्म को भूलवश या भविष्य की ठोस रणनीति के तहत, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भूमि सुधार आयोग बनाकर फिर से हरा कर दिया है.

बिहार में विधानसभा चुनाव सामने है. चुनावी मसला क्या होगा, तय नहीं है. विपक्षी लालू प्रसाद, रामविलास पासवान हों या सत्ताधारी नीतीश कुमार और सुशील मोदी, भूमि के सवाल पर कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं. संभव है राजधानी पटना में घूमते हुए जमीन का यह सवाल बेमानी-सा लगे, लेकिन मेटल रोड से उतरकर गांव-देहात में पहुंचते ही इसकी तपिश साफ महसूस होती है. लोगों के जेहन में अलग-अलग रूपों में भूमि का सवाल शामिल हो चुका है.

दरअसल, ठंडे बस्ते में पड़े मसले को बडे़ भूचाल का रूप बिहार में भूमि सुधार को सफल बनाने वाले देबब्रत बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में गठित भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट ने दिया है. डी बंद्योपाध्याय ने दो साल के अध्ययन, 15 जनसुनवाइयों और तमाम तकनीकी पेंचों के विस्तृत अध्ययन के बाद कुछ ऐसे सवाल उछाल दिए हैं, ऐसे निष्कर्ष दिए हैं जिन्होंने भूचाल ला दिया है. आयोग ने कहा है कि बिहार में भूदान और सीलिंग ऐक्ट वाली जमीन के अलावा जो गैरमजरुआ जमीन है उसका वितरण सरकार तुरंत करवाए. बिहार में भूमि विवाद की गहरी समझ रखने वाले और जनशक्ति पत्रिका के संपादक यूएन मिश्र, बंद्योपाध्याय  की रिपोर्ट और अन्य आंकड़ों का हवाला देते हुए बिहार में ऐसी करीब 21 लाख एकड़ जमीन के होने की बात कहते हैं. वे बताते हैं कि बिहार में जमीन का खेल कैसे-कैसे चलता रहा है. लाखों एकड़ जमीन को किस तरह और किस-किस किस्म के लोगों ने पीढ़ी दर पीढ़ी या तो अपने कब्जे में कर रखा है या चिरईं-चिरगुन से लेकर देवी-देवताओं के नाम कागजों में करवा रखा है.

अहम सवाल यह है कि क्या बिहार में कोई सरकार यह साहस दिखा पाएगी कि वह चिरईं-चिरगुन वाली जमीन को इनसान के नाम करवा दे या जबरिया कब्जे में फंसी जमीन को उसके वाजिब हकदारों को दिलवा दे. बिहार का इतिहास यही बताता है कि यह दुरूह कार्य है और कुछ हद तक नामुमकिन भी. भविष्य में क्या होगा, कुछ निश्चित नहीं है लेकिन फिलहाल बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट से उपजी शंकाओं-आशंकाओं के साथ जगी उम्मीदों की गरमाहट ने बिहार के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से चरमरा दिया है. सीलिंग ऐक्ट के तहत फाजिल जमीन का परचा-परवाना और उसकी कब्जेदारी, भूदान की जमीन पर हक और बंटाईदार बिल का मसला हर रोज किसी न किसी रूप में ग्रामीण चौपालों का प्रमुख विषय रहता है.

‘हमारे सामने इतनी जमीन परती छोड़ने से संकट तो होगा लेकिन क्या करें, हमारी भी मजबूरी है. फसल न सही, जमीन तो बची रहेगी. क्या पता किस रोज बिहार सरकार का मन बदले और बंटाईदार कानून लागू कर दे.’

औरंगाबाद जिले के महथू गांव में एक शाम गुजारने के बाद इसका एहसास बखूबी हो जाता है. यहां बहसबाज हर जगह अलग-अलग खेमे में बंटे नजर आते हैं, लेकिन ज्यादातर बात सिर्फ जमीन से जुड़े़ मसलों पर ही होती है. इस चौपाली-चर्चे को रोज ही खाद-पानी भी मिल रहा है. बेशक, बड़ी-बड़ी सभाएं नहीं हो रहीं, लेकिन पोस्टर, परचा और बुकलेट-वार पूरे बिहार में शुरू हो चुका है. भाकपा माले भूदान, बंटाईदार और हदबंदी आदि विषयों को केंद्र में रखकर पूरे बिहार में पुस्तिकाएं बांटने का काम कर रही है तो भाकपा की नेशनल काउंसिल के सदस्य एम जब्बार आलम ने एक लघु पुस्तिका भूमि सुधार आयोग का खुलासा शीर्षक से तैयार की है, जिसे गांव-देहात में वितरित किया जा रहा है. एक तीसरा खेमा नीतीश के पुराने संगी-साथियों यानी समाजवादियों का भी है जो चंपारण के आंदोलन को बौद्धिक रूप से खाद-पानी देकर उसे एक मुकम्मल मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश में है. समाजवादियों द्वारा ‘लोहिया आयोग रिपोर्ट-1950’ नाम की एक बुकलेट भी अब बिहार के ज्यादातर हिस्सों में पहुंच चुकी है, जिसमें चंपारण के किसानों की कंगाली से संबंधित व्यथा कथाओं का अध्ययन है.

रही-सही कसर महाराष्ट्र के बुजुर्ग समाजवादी नेता बाबूराव चंदावर ने तब पूरी कर दी जब वे कुछ समय पहले पटना में भूदान की जमीन के पेंच को सुलझाने की मांग के साथ भूख हड़ताल पर बैठ गए. द्वंद्व और दुविधा में फंसी राज्य सरकार को अंततः बाबूराव की हड़ताल खत्म करवाने के लिए झुकना पड़ा. बुजुर्ग बाबूराव बिहार सरकार से भूदान यज्ञ कमिटी को अधिक अधिकार देने, भूदान के तहत बंटी जमीनों का ‘म्यूटेशन’ कराने और संस्थाओं को दी गई भूदान की करीब 20 हजार एकड़ जमीन को जनता के बीच बांटने की मांग कर रहे थे. सरकार ने आश्वासन दिया है कि मार्च, 2011 तक मॉडल के तौर पर सुपौल जिले में इन मांगों को पूरा किया जाएगा. बाद में शेष बिहार में इसे लागू करेंगे. जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और बाबूराव चंदावरकर के अभियान में अहम भूमिका निभाने वाले चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी कहते हैं, ‘यदि सुपौल में यह मॉडल सफल हो गया तो इससे पूरे बिहार के आंदोलनकारियों को एक आधार मिलेगा.’

प्रियदर्शी इन दिनों बिहार की भूमि समस्या पर अनुसंधान भी कर रहे हैं. वे कहते हैं कि नीतीश कुमार जितना ही द्वंद्व-दुविधा में रहेंगे, उसका उतना ही प्रतिकूल असर पड़ेगा. उनके पास तो एक बड़ा मौका है कि वह माहौल को अपने पक्ष में कर सकते हैं. बकौल प्रियदर्शी बिहार में करीब 20 लाख परिवार ऐसे हैं जिनके पास अपना घर तक नहीं. सरकार के पास साफ तौर पर सीलिंग और भूदान की इतनी चिह्नित जमीन है, जिसका बंटवारा कर देने से करीब 7 लाख भूमिहीन परिवारों को रोजगार का नया साधन मिल जाएगा. इन चिह्नित जमीनों में कोई ज्यादा पेंच भी नहीं है. प्रियदर्शी कहते हैं, ‘सात लाख परिवार का मतलब होता है औसतन 49 लाख आबादी को लाभान्वित करना. अगर वोट बैंक के हिसाब से इसे देखें तो 28 लाख मतदाताओं को अपने पक्ष में करना. आखिर महादलित की राजनीति जब नीतीश कर रहे हैं तो इस बंटवारे से अधिकतर महादलितों को ही लाभ होगा.’

प्रियदर्शी जितनी आसानी से बातों को कहते हैं, व्यावहारिक तौर पर बिहार में वह इतना आसान है नहीं. पिछले कुछ वर्षों में यहां नये भूपतियों का तेजी से उदय हुआ है, जो जमींदारों के वंशज नहीं बल्कि नवधनाढ्य राजनीति की उपज हैं. नए भूपति राजनीतिबाज हर दल में हैं, इसीलिए गरीबों के मसीहा लालू प्रसाद हों, दलित राजनीति करने वाले रामविलास पासवान या फिर सामाजिक न्याय की वकालत करने वाले नीतीश कुमार, कोई भी भूमि के सवाल पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं क्योंकि इस पेंच में फंसने का मतलब होगा सबसे पहले अपने ही दल में बगावत का सामना करना. लेकिन दूसरी ओर पूरे बिहार में न सही, अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में ही वामपंथी दल इस मसले को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. भाकपा माले के वरिष्ठ नेता रामजतन शर्मा कहते हैं, ‘नीतीश कुमार से भूमि सुधार आयोग बनवाने की मांग किसी ने नहीं की थी, उन्होंने खुद ही उसे बनवाया. अब जब रिपोर्ट आ गई है तो उसे लागू करने में वे पीछे हट रहे हैं, लेकिन अब उनके पीछे हटने से कुछ नहीं होगा. अब उन्हें जमीन का बंटवारा करना ही होगा, बंटाईदार कानून को जमीनी स्तर पर लागू करना ही होगा.’

बंटइया ने बांट डाला

पूर्णिया जिले के अकबरपुर के रहने वाले राघव मध्यम वर्ग किसान के बेटे हैं. राघव झारखंड की राजधानी रांची में निजी नौकरी करते हैं. उनके किसान पिता अस्वस्थता के कारण इस बार ज्यादा खेती-बाड़ी करने में असमर्थ थे. राघव ने पिता को समझा-बुझाकर करीब छह एकड़ जमीन को इस बार परती छोड़ दिया है. तीन पीढ़ी से उनकी जमीन पर खेती करने वाले रामायण कहते रहे कि आप निश्चिंत होकर खेत दीजिए, हम या हमारे परिवार को बंटाई-सटाई कानून से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन ईमान, धरम, पीढि़यों के रिश्तों की दुहाई का कोई असर नहीं हुआ. राघव खेत को परती छोड़ निश्चिंत भाव से रांची नौकरी करने चले आए हैं. वे कहते हैं, ‘हमारे सामने इतनी जमीन परती छोड़ने से संकट तो होगा लेकिन क्या करें, हमारी भी मजबूरी है. फसल न सही, जमीन तो बची रहेगी. क्या पता किस रोज बिहार सरकार का मन बदले और बंटाईदार कानून लागू कर दे.’ राघव पढ़े-लिखे किसान हैं. उन्हें पता है कि बिहार में बंटाई कानून को लागू करना इतना आसान नहीं. सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं भी किसानों को बार-बार आश्वासन दे चुके हैं कि फिलहाल कोई नया बंटाईदार कानून नहीं बनने जा रहा, लेकिन बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट के बाद यहां ऐसा कोरा भ्रमजाल बना है कि राघव की तरह बिहार के कई किसानों ने अपनी जमीन परती छोड़ दी है. पूर्णिया यूं भी बंटाई के बवाल का सबसे चर्चित इलाका रहा है. 1971 में इसी जिले में रुपसपुर-चंदवा नरसंहार कांड हुआ था जिसमें 14 बंटाईदार आदिवासी खेत मजूदर-किसान मार दिए गए थे. एक तरीके से रुपसपुर-चंदवा कांड ने बिहार में भूमि संघर्ष के नाम पर होने वाले नरसंहारों की बुनियाद रखी थी, जिसका विस्तार बाद में बेलछी कांड से लेकर लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के रूप में देखने को मिला. भूमि सेना, ब्रह्मर्षि सेना, लोरिक सेना, कुंवर सेना, रणबीर सेना, सनलाइट सेना आदि भूमि विवाद के गर्भ से ही निकले.

भूमि के मसले पर सबसे बड़ा पेंच और बवाल बंटाई को लेकर ही हैं. तहलका से बातचीत में बंद्योपाध्याय खुद कहते हैं, ‘बिहार में सबसे बड़ी चुनौती बंटाईदार कानून बनाने या लागू करने की है. यह हो जाए तो देखते ही देखते बिहार बदल जाएगा. बिहार की कई समस्याएं खत्म हो जाएंगी. सामाजिक तनाव में कमी आएगी, गरीबी-बेरोजगारी भी दूर होगी.’ वे यह भी जोड़ते हैं कि इसे यदि नीतीश लागू नहीं कर पाए तो फिर किसी दूसरे से इसकी उम्मीद करना बेमानी होगा.
बंद्योपाध्याय जितनी सहजता से इस कानून से बिहार की समस्याओं का समाधान देखते हैं, असल में वैसा भी नहीं है. अभी सिर्फ बंटाईदार कानून का जिन्न बाहर निकला है तो बिहार में भूचाल आ गया है, कानून बनेगा या लागू होगा तो पता नहीं क्या होगा. यह बंटाईदारी के भूचाल का ही असर है कि सूखे की मार झेल रहे बिहार के जिन खेतों में उपज की संभावना थी, उसका भी एक हिस्सा इस बार परती पड़ा हुआ है. बंटाइदारों को भूमालिक वर्षों से अपने खेत जोतने के लिए दिया करते थे जिससे दोनों के रिश्तों में पारिवारिक संबंध जैसी गरमाहट होती थी जो अब एक झटके में बिखरने लगा है. बटाईदार बदले जा रहे हैं. औरंगाबाद और जहानाबाद जिले की सीमा पर बसे गोह इलाके के गांवों में यह स्थिति साफ तौर पर देखी जा सकती है. इस इलाके के एक बड़े किसान अनिल चौबे कहते हैं, ‘पहले तो सब-कुछ शांत ही चल रहा था. लेकिन अब सब अशांत ही है.’ तीन बार विधान पार्षद रह चुके और अब पटना उच्च न्यायालय में वकालत करने वाले रमेश प्रसाद सिंह कहते हैं, ‘इस बार बिहार में वैसे ही सूखे से पैदावार कम होनी थी. बंटाई के शोर से और भी ज्यादा कमेगा. इसका असर सामाजिक तनाव के साथ-साथ आने वाले दिनों में हिंसा और अपराध के रूप में भी देखने को मिलेगा.’ वे आगे कहते हैं, ‘पीढ़ी दर पीढ़ी से जो कमाने-जीने की व्यवस्था बनी हुई थी उसे नीतीश कुमार ने एक झटके में ढहा दिया है. उन्होंने भूमि सुधार नहीं, भूमि बिगाड़ आयोग का गठन किया था. छोटे-बड़े सभी किसानों के मन में यह भय घर कर गया है कि यदि बंटाईदारों को कानूनी मान्यता मिल जाएगी तो वह पुश्त दर पुश्त खेत को जोतने लगेगा. बंटाई जोतने वाला जमीन पर कर्ज भी लेने लगेगा और यदि इसे चुकता नहीं किया तो खेत मालिक को ही नुकसान उठाना पड़ेगा.’ वे आगे जोड़ते हैं कि यदि यह कानून लागू करने की कोशिश हुई तो बिहार हिंसा की उस आग में झुलसेगा कि उसे संभाल पाना संभव नहीं होगा. रमेश प्रसाद सिंह की तरह ही सोच रखने वाले बिहार में किसानों की एक बड़ी फौज मिलेगी, लेकिन बंद्योपाध्याय ऐसी हर आशंका को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘ऐसा कुछ नहीं होगा बल्कि बिहार में अराजकता और हिंसा को खत्म करने का सबसे कारगर औजार साबित होगा बंटाईदार कानून का बनना और उसका लागू होना.’

बंद्योपाध्याय की बातों से सहमति जताते हुए एम जब्बार आलम कहते हैं, ‘सीलिंग, भूदान और गैरमजरुआ जमीनों पर भूमाफियाओं का कब्जा बना रहे, इसके लिए सारी बहस को बंटाईदार पर समेटा जा रहा है.’ वह सवाल पूछते हैं, ‘जिस बिहार में 30-35 प्रतिशत खेती-किसानी पूरी तरह से बंटाई व्यवस्था पर ही निर्भर है, उसे लेकर कोई कानून, कोई तंत्र नहीं होना चाहिए? अगर बंद्योपाध्याय ने गलत सुझाव दिए हैं तो नीतीश उनमें संशोधन करने के लिए स्वतंत्र हैं. वे संशोधन करने के लिए तैयार हों, सर्वदलीय सहमति से कोई तो नया कानून बने. लेकिन चुप्पी साध लेने से तो समस्या बढ़ेगी ही.’
बिहार के राजस्व एवं भूसुधार मंत्री नरेंद्र नारायण यादव कहते हैं, ‘कहीं कोई भ्रम नहीं है. हम बटाईदारी को लेकर न तो कोई नया कानून बनाने जा रहे हैं न कोई और नई कवायद ही हो रही है तो फिर भ्रम क्यों रहेगा किसी के मन में?’ नारायण यादव कहते हैं, ‘बिहार पूरी तरह से शांत है, यह सब कोरा भ्रम कुछ लोग फालतू में फैला रहे हैं. हम बोलने से तो किसी को रोक नहीं सकते लेकिन मुख्यमंत्री जब खुद बार-बार कह चुके हैं तो किसानों को निश्चिंत रहना चाहिए.’ नारायण यादव सही कहते हैं. चुनाव सामने है. नीतीश ऐसी कोई भी भूल नहीं करना चाहेंगे लेकिन नीतीश विरोधियों ने इस मसले को हर स्तर पर खाद-पानी देकर हरा-भरा बनाने की कोशिश की है.

आगे नतीजा जो भी हो फिलहाल बंटाईदारी का जिन्न बिहार के खेतों से उड़कर राजनीतिबाजों के कंधे पर आ गया है. यह अब खेती किसानी का कम और राजनीति का मसला ज्यादा है. इसी साल मई में पटना के गांधी मैदान में जब बंद्योपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट के खिलाफ राज्य के बड़े भूस्वामियों की ‘किसान महापंचायत’ हो रही थी तो ठीक उसी वक्त पटना जंक्शन गोलंबर पर किसान और खेतमजदूर भी अपनी सभा में आयोग की रिपोर्ट लागू कराने के लिए आर-पार की लड़ाई छेड़ने का एलान कर रहे थे. ऐसा लग रहा था मानो भूस्वामियों और जोतदारों का राजनीतिक बंटवारा हो गया हो. दरअसल, बिहार की राजनीति हमेशा से जमीन के मसले को अटकाकर रखती आई है. इस बार भी वही हो रहा है. बिहार के ‘राजनीतिबाज’ नहीं चाहते कि जमीन का मसला निपट जाए, क्योंकि तब उनके पास आम लोगों को बरगलाने के लिए क्या रह जाएगा. जमीन का असमान वितरण ही इस विवाद की जड़ में है. 10 प्रतिशत बडे़ भूस्वामियों के पास 90 प्रतिशत जमीन है, जाहिर तौर पर बंटाईदारी से ही ये भूस्वामी अपनी फसल ले पाते हैं. राजनीति करने वालों का एक बड़ा वर्ग नया या पुराना जमींदार भी है,  उनके अपने हित हैं जो बंद्योपाध्याय कमिटी की रिपोर्ट के राजनीतिक विरोध के लिए उन्हें मजबूर करते हैं. 

दबंग : यह श्रद्धांजलि है, जश्न नहीं

फिल्म  दबंग

निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप

कलाकार सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, अरबाज खान

दबंग कितनी देखी जा रही है, यह बताने की जरूरत नहीं है. एक वर्ग है जो ऐसी फिल्मों से सिर्फ इसीलिए खुश है क्योंकि छोटे शहरों के सिनेमाघरों में इनसे फिर रौनक लौटती है. कुछ उत्साही समीक्षकों के लिए वांटेड, गजनी और दबंग भदेस हिन्दुस्तानी हीरो की वापसी की फिल्में हैं जो हर वाक्य में अंग्रेजी के शब्द नहीं झाड़ता और जिसकी फाइटिंग में मर्दों वाली बात है. वही पुराना फिल्मी हीरो जिससे पूरे हिन्दुस्तान को अपनापन लगता है.

यह आसान सी बात खासी हैरत की भी है. लोग उससे अपने आपको ज्यादा रिलेट करते हैं जिसकी हड्डियां शायद फौलाद की बनी हैं और जिसे देखते हुए बचपन में कॉमिक्सों में पढ़े डोगा और नागराज के कारनामे ज्यादा याद आते हैं. हां, दबंग का चुलबुल पांडेय उन्हीं कॉमिक्सों के नायकों की तरह अपने गांव कस्बे के भले के लिए कई हजार लोगों को अकेले मार सकता है. उसके पास बड़ी पुलिस फोर्स है जो उसके साथ युद्धभूमि में जाती भी है, लेकिन उसे उसकी जरूरत नहीं. वह पहले बारी बारी से खलनायक के पचास-सौ साथियों को मारेगा और फिर खलनायक को अकेले. वह भारतीय मसाला फिल्मों का महानायक है, जिसे एक दौर में बॉलीवुड के नब्बे फीसदी नायकों ने जिया है. लेकिन वह सुपरहिट अचानक होने लगा है. इसकी वजह उसका गायब हो जाना और फिर यही वापसी ही है. दबंग एक जॉनर है. उसे सिर्फ एक्शन या ड्रामा फिल्म नहीं कहा जा सकता. वह मसाला जॉनर है, जिसमें एक्शन के चार लम्बे सीक्वेंस हैं जिनके परिणाम आपको शुरु से पता होते हैं, उसमें ओवरएक्टिंग करती एक मां है (समझ नहीं आता कि डिम्पल कपाड़िया वैसी एक्टिंग जानबूझकर हंसाने के लिए करती हैं या ऐसा ही उनसे हो पाया है), दो सौतेले भाई हैं, एक को ज्यादा चाहने वाला पिता है, एक लड़की है जिसका किरदार इतना पैसिव है कि उसे प्यार से गोद में उठाकर घर लाया जाए या जानवर की तरह हांककर, वह दोनों ही स्थितियों में हीरो से बराबर प्यार करेगी, असल में उसका जन्म ही इसीलिए हुआ है. आखिर में हैप्पी एंडिंग भी है, जिसमें हीरो का परिवार सकुशल है और सब लड़कियां अपने अपने मालिकों के पास हैं. वे सबकी सब अपने पतियों के लिए मुन्नी हैं, जो बदनाम नहीं हुई हैं. जो मुन्नी बदनाम हुई है, वह हिन्दी फिल्मों की महान मुजरा परंपरा के उत्सव की तरह आती है और दुनियादारी को गोली मारते हुए आनंदित करती है.

सलमान खान रजनीकांत हो गए हैं और दबंग उस जॉनर की फिल्म है, जिससे हिन्दी सिनेमा इतना दूर चला आया है कि ये फिल्में अब उस याद को संग्रहालय में देखने की तरह आती हैं. उसे आदर देती और हंसती हुई. गंभीर और अर्थवान सिनेमा को ये फिल्में डरा सकती हैं लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि यह किसी विलुप्त हो चुके विषय की वापसी नहीं है. यह दरअसल श्रद्धांजलि है. और मरने के बाद तो दुश्मन को भी बुरा नहीं बताना चाहिए.

गौरव सोलंकी

कुछ काम भी आई सीबीआई?

सबसे स्वस्थ वे समाज होते हैं जो किसी भी प्रकार की जांच-परख से जरा भी भयभीत नहीं होते, मामलों की तह तक पहुंचना जिनकी मानसिकता का एक हिस्सा होता है और जो इस उद्देश्य की पूर्ति के उपकरणों की व्यवस्था करने से जरा भी नहीं हिचकते. ऐसा ही एक उपकरण केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई है जिसकी स्थापना भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उद्देश्य से 1963 में की गई थी. आज 47 साल के बाद स्थिति जस की तस है. आज के भारत में बदलाव की, सुधार की उम्मीद के हरकारों की बात करें तो इनमें सबसे पहला नाम सीबीआई का होना चाहिए था. इसकी वजह से, जिनमें जरूरी है उनमें भय और हममें न्याय की लड़ाई के प्रति विश्वास का संचार होना चाहिए था.

मगर सीबीआई की वर्तमान स्थिति दोनों में से कुछ भी नहीं कर पाती. वैधानिक रूप से सीबीआई देश के कार्मिक मंत्रालय से संबद्ध संस्था है जो सीधे देश के प्रधानमंत्री के अधीन आती है. इसे अपने कार्य के लिए जरूरी शक्तियां दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना कानून, 1946 के तहत जारी एक प्रस्ताव से मिलती हैं. इसके मुताबिक संघीय क्षेत्र सीधे तौर पर सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में आते हेँ. मगर राज्यों में किसी जनसेवक की जांच और उसके ऊपर कार्रवाई के लिए उसे राज्य सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है. यहां तक कि सीबीआई अपने अधीन रहे मामलों को लेकर भी खुदमुख्तार नहीं है. वह अपने आप सर्वोच्च अदालत में विशेष अनुमति याचिका तक दायर नहीं कर सकती. उदाहरण के तौर पर, एक विशेष सीबीआई अदालत ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू प्रसाद यादव को बरी कर दिया. सीबीआई कहती है कि उसके पास उनके खिलाफ और तमाम मजबूत साक्ष्य हैं. मगर विधि मंत्रालय ने उसे याचिका दायर करने की अनुमति ही नहीं दी. इसके अलावा सीबीआई संयुक्त सचिव से ऊपर के स्तर के किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच की कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती. ऐसा करने के लिए उसे केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है. वर्तमान में ऐसे कम से कम 30 प्रार्थनापत्र सरकार के पास लंबित पड़े हुए हैं.

यहां तक कि मुकदमा चलाने के लिए भी सीबीआई को केंद्र सरकार का मुंह ताकना पड़ता है. देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का कोई अधिकारी बिना केंद्र सरकार की अनुमति के देश से बाहर जांच के लिए नहीं जा सकता जबकि आज के वैश्विक गांव वाले वातावरण में कदम-कदम पर ऐसी आवश्यकताएं आन खड़ी होना कोई बड़ी बात नहीं. देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक में सीबीआई को ओत्तावियो क्वात्रोकी के पीछे जाना था. विधि मंत्रालय ने इस मामले को ही बंद करवा दिया. क्वात्रोकी निकल गया.

संभवतः इसी सत्र में लोकसभा सीबीआई की भूमिका पर चर्चा करने वाली है क्योंकि इसके एक सदस्य ने निजी तौर पर ऐसा करने के लिए एक कदम उठाया है. ‘सीबीआई का होना ही कानूनन सही नहीं है. मैं अपने निजी विधेयक के माध्यम से एक बीज बो रहा हूं. हो सकता है कि कुछ सालों में इससे कोई फल निकल आए’, कांग्रेस प्रवक्ता और लुधियाना से सांसद मनीष तिवारी कहते हैं. सवाल उठता है कि अपने देश की सर्वोच्च जांच संस्था के नाम पर हम हर तरह की जंजीरों में गले तक जकड़ी, बात-बात पर कभी इस तो कभी उसका मुंह ताकने को मजबूर संस्था को कैसे स्वीकार कर सकते हैं. हम कड़वी लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र और समाज के लिए जरूरी सच्चाइयों को घर के पिछवाड़े दफन कर अपने साथ सब-कुछ सही होने की उम्मीदें कैसे पाल सकते हैं? 30 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका की संघीय जांच संस्था(एफबीआई) के बजट की तुलना सीबीआई से करने की सोचना भी पाप होगा. वह काफी हद तक स्वतंत्र भी है और इसीलिए दुनिया भर में प्रतिष्ठित है. मगर हमने सीबीआई को, जब कर सकते हैं तब अपने पक्ष में और विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए, किसी लायक नहीं छोड़ा. 50 सवालों के जरिए किया गया तहलका का यह आकलन भी इसी बात की पुष्टि करता है.

50.

गुजरात फर्जी मुठभेड़

सीबीआई ने अभय चुडासमा के खिलाफ मिल रही शिकायतों पर एक लंबे समय तक गौर क्यों नहीं किया?

सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में कथित तौर पर शामिल होने के आरोप में अहमदाबाद के भूतपूर्व डीसीपी (क्राइम ब्रांच) अभय चुडासमा को इस साल अप्रैल में गिरफ्तार किया गया था. एक लंबे समय तक जांच एजेंसी को चुडासमा के खिलाफ शिकायतें मिलती रही थीं मगर वह बैठी रही. चुडासमा पर उद्योगपतियों और बिल्डरों से जबरन-वसूली के लिए एक बहुत बड़ा रैकेट चलाने, इसके लिए सोहराबुद्दीन को इस्तेमाल करने का आरोप है. 23 जुलाई को सीबीआई ने अहमदाबाद में एक विशेष अदालत में एक आरोप-पत्र दाखिल किया जिसमें चुडासमा समेत कुल 15 लोगों पर अपहरण, आपराधिक षडयंत्र और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे. गौरतलब है कि चुडासमा गुजरात के भूतपूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह के भरोसेमंद पुलिस अफसर थे.

49.

इस पूरे मामले की जांच प्रक्रिया को गुमराह करने वाले पुलिस अफसर गीता जौहरी और ओपी माथुर को न तो हिरासत में लिया गया और न ही उनके बयान दर्ज किए गए, क्यों?

सीबीआई से पहले गुजरात पुलिस का विशेष जांच दल इस मामले की जांच कर रहा था. गीता जौहरी तब राज्य की पुलिस महानिरीक्षक थीं और ओपी माथुर सीआईडी (अपराध) के मुखिया. िफलहाल ये दोनों अफसर संदेह के घेरे में हैं. जौहरी को तो ठीक से जांच न करने के लिए अदालत से फटकार भी पड़ी. अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके आरोप लगाया है कि सीबीआई उन पर नेताओं का नाम लेने के लिए दबाव डाल रही है.

48. 

सोहराबुद्दीन हत्याकांड

सीबीआई ने राजस्थान के पूर्व गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया से गहन पूछताछ क्यों नहीं की जबकि सोहराबुद्दीन हत्याकांड में उनकी कथित संलिप्तता की चर्चा है?
खबरों के मुताबिक सोहराबुद्दीन केस में सीबीआई के अहम गवाह आजम खान ने बताया कि राजस्थान की एक फर्म, राजस्थान मार्बल्स ने सोहराबुद्दीन को खत्म करवाने के लिए गुलाब चंद कटारिया को 10 करोड़ रुपए दिए थे.

 

 

47.

क्या हमारी जांच एजेंसी राजनेताओं की मिलीभगत से आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले पुलिस अफसरों पर नकेल कसने में विफल नहीं रही है?

नवंबर, 2005 में हुए सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले का अकेला चश्मदीद गवाह प्रजापति एक मुठभेड़ में करीब एक साल बाद दिसंबर, 2006 में मारा गया था. गुजरात सीआईडी द्वारा अब जाकर इस साल 30 जुलाई को बनासकांठा की एक अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया. इसमें तीन आईपीएस अफसर डीजी वंजारा, विपुल अग्रवाल और एमएन दिनेश को मुख्य अभियुक्त ठहराया गया था. वंजारा और दिनेश पिछले तीन साल से पुलिस हिरासत में हैं. राजस्थान कैडर के आईपीएस दिनेश को जब 2007 में गिरफ्तार किया गया तो राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया और पुलिस महानिदेशक इस मामले में हस्तक्षेप करने गुजरात तक पहुंच गए थे.

 

46.

हरेन पंड्या हत्याकांड

सीबीआई अब तक मुफ्ति सुफियान का पता क्यों नहीं लगा पाई है?
 
गुजरात के पूर्व गृहमंत्री पंड्या की हत्या गन-मैन अशगर अली ने मुफ्ति सुफियान के इशारे पर की थी. आरोप लगे कि इस हत्या के पीछे मोदी और अमित शाह का हाथ था क्योंकि पंड्या ने एलिसब्रिज सीट खाली न करके और 2002 में हुए दंगों की जांच कर रही न्यायधीशों की एक टीम के सामने उपस्थित होकर मोदी को खुलेआम चुनौती दी थी. उसी समय युवा मुसलमान नेता सुफियान अहमदाबाद की लाल मस्जिद से उत्तेजक भाषण देते हुए कट्टरपंथियों के बीच लोकप्रिय हो रहा था. 2002 के दंगे के बाद वह पहले से भी ज्यादा कट्टरपंथी हो गया था. नमाज खत्म होने के बाद सुफियान अकसर उन्मादी भाषण दिया करता था. कहा जाता है कि उसके तार अहमदाबाद अंडरवर्ल्ड से जुड़े थे.

45.

सीबीआई का आरोप पत्र यह क्यों नहीं बताता कि मुठभेड़ के छह दिन बाद सुफियान देश से बाहर भागने में कैसे सफल हो गया?

44.

मामले की जांच कर रहे अफसरों के तबादले में नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सीबीआई ने मुख्यमंत्री से पूछताछ क्यों नहीं की?

43.

सुफियान को पकड़ने के लिए इंटरपोल से मदद क्यों नहीं ली गई?

42.

सीबीआई ने तुलसी प्रजापित हत्याकांड में जांच करके आरोपितों को क्यॊं नहीं पकड़ा जबकि उच्चतम न्यायालय ने उसे इस संबंध में निर्देश दिया था?

41.

प्रजापित मामले की सुनवाई टलने से सीआईडी को आरोपी अधिकारियों को हिरासत में लेने का वक्त मिल गया है. सीबीआई ने जांच शुरू कर दी होती तो इस स्थिति से बचा नहीं जा सकता था ?

40.

क्या सीबीआई उस समय सत्तारूढ़ बीजेपी के निर्देशों पर नहीं चल रही थी, जैसा कि हरेन पंड्या के पिता विट्ठल पंड्या का आरोप है?

रिपोर्टों के मुताबिक पंड्या की हत्या को उनके पिता विट्ठल पंड्या ने राजनीतिक षड्यंत्र बताया और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी उंगली उठाई थी. हालांकि बाद में सीबीआई ने कहा कि मोदी के हत्याकांड से जुड़े होने का कोई सबूत नहीं मिला है. मुख्य हत्यारा अशगर अली बाद में हैदराबाद से गिरफ्तार किया गया. सीबीआई के मुताबिक अशगर को पंड्या की हत्या की सुपारी मुफ्ति सुफियान ने दी थी. विट्ठल पंड्या ने गोधरा जांच समिति के सामने बयान दिया कि हरेन पंड्या के कहे अनुसार 2002 में हुआ दंगा राज्य के द्वारा प्रायोजित और मोदी द्वारा नियोजित था.

39.

मायावती : आय से अधिक संपत्ति का मामला

इसी साल 28 अप्रैल को मायावती ने संसद में कटौती प्रस्ताव का समर्थन करके यूपीए सरकार को गिरने से बचाया. एक हफ्ते के भीतर ही आयकर विभाग ने आय से अधिक संपत्ति मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी. जब सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह मायावती के खिलाफ मुकदमा चलाने को तैयार है तो फिर वह पीछे क्यों हट गई?

2003 में मायावती की कुल संपत्ति एक करोड़ रुपए थी लेकिन तीन ही साल में यह पचास करोड़ रुपए हो गई यानी पचास गुना बढ़ोतरी. सीबीआई ने इसे आधार बनाकर उन पर मामला दर्ज किया था. मायावती की कई बेनामी जमीन-जायदाद के बारे में जांच करने के बाद ब्यूरो ने दावा किया था कि वह कार्रवाई करने को तैयार है. लेकिन आज तक आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जा सका.

38.

ताज कॉरिडोर मामला

यदि इस मामले की जांच का कोई नतीजा नहीं निकला तो क्या सीबीआई इससे जुड़ी केस डायरियां सार्वजनिक करेगी?

2002 में मायावती की पहल पर ताजमहल के आसपास पर्यटक सुविधाएं विकसित करने के लिए 175 करोड़ रुपए की परियोजना की शुरुआत हुई. सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 74 करोड़ रुपए खर्च होने तक निर्माण स्थल पर सिर्फ पत्थर फिंकवाने का काम हुआ था.

37.

आय से अधिक संपत्ति के मामले में 6 साल बाद भी मायावती के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल क्यों नहीं किया गया?

36.

राज्यपाल ने सीबीआई को मायावती पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी. क्या दोबारा उनसे मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी गई?

35.

जम्मू-कश्मीर सेक्स कांड

क्या उमर अब्दुल्ला 2006 के सेक्स प्रकरण मामले में आरोपित हैं?

2006 में पुलिस को कश्मीरी औरतों का यौन शोषण दर्शाती कुछ वीसीडी मिली थीं. पीडीपी ने इस घटना के बाद आरोप लगाया था कि सीबीआई के आरोप पत्र में राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का नाम भी है.

34.

सीबीआई आरोप पत्र दाखिल करने में इतना वक्त क्यों लगा रही है?

33.

इस मामले में गिरफ्तार किए गए पुलिस अधिकारियों को क्यों छूट जाने दिया गया?

32.

मिसाइल घोटाला

2006 में एफआईआर दर्ज करने के बाद दो साल तक सीबीआई ने जॉर्ज फर्नांडीस से पूछताछ क्यों नहीं की?

2000 में भारत ने इजरायल से बराक मिसाइलें खरीदी थीं. सौदे में कथित गड़बड़ी के लिए सीबीआई ने फर्नांडीस के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. फर्नांडीस का दावा था कि तब रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने सौदे को मंजूरी दी थी. सौदे में दो करोड़ की रिश्वत का आरोप है.

31.

जूदेव रिश्वत मामला

सीबीआई दिलीप सिंह जूदेव रिश्वत कांड में ढीली क्यों पड़ गई?

केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के मंत्री जूदेव कैमरे के सामने रिश्वत लेते पकड़े गए. 2005 में सीबीआई ने कहा कि इस स्टिंग ऑपरेशन के पीछे छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित का हाथ है.

30.

मुलायम सिंह : आय से अधिक संपत्ति का मामला

आखिर क्या वजह थी कि सीबीआई ने 2007 में मुलायम सिंह यादव के खिलाफ कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई और क्यों कार्रवाई रिपोर्ट अदालत में जमा करने से पहले केंद्र को भेजी गई?

ब्यूरो ने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट अक्टूबर, 2007 में दाखिल करते हुए दावा किया था कि उसके पास मुलायम सिंह पर मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं.

29.

2009 में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ केस दायर करने की अपनी अर्जी को वापस लेने की याचिका दी. क्यों?

क्या यह जुलाई, 2008 में वामदलों के केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद  समाजवादी पार्टी द्वारा केंद्र को समर्थन देने का पुरस्कार था?

28.

लालू-राबड़ी देवी : आय से अधिक संपत्ति का मामला

बिहार के इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के दावे के बावजूद सीबीआई जांच प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ा रही?

2004 में सीबीआई ने इस मामले में सालों से चल रही जांच को किनारे कर दिया और यूपीए सरकार के लिए लालू प्रसाद और राबड़ी देवी को फायदा पहुंचाने का रास्ता तैयार कर दिया. 2006 में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने दोनों को बरी कर दिया, लेकिन सीबीआई मामले को हाई कोर्ट नहीं ले गई.

27.

ओपी चौटाला : आय से अधिक संपत्ति का मामला

आरोप है कि सीबीआई ने ओमप्रकाश चौटाला के खिलाफ कार्रवाई तब शुरू की जब वे यूपीए सरकार के लिए राजनीतिक रूप से गैरजरूरी हो गए.

हरियाणा के पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके चौटाला के खिलाफ सीबीआई ने अज्ञात स्रोतों से कथित छह करोड़ रुपए अर्जित करने के मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था. आरोप पत्र विधानसभा अध्यक्ष की अनुमति मिलने के बाद दाखिल किया गया था.

26.

सीके जाफर शरीफ : आय से अधिक संपत्ति का मामला

पूर्व मंत्री सीके जाफर शरीफ के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला दर्ज करने के बाद भी सीबीआई को आगे बढ़ने की अनुमति क्यों नहीं मिली?

सीबीआई ने 1997 में सीके जाफर शरीफ के खिलाफ पद के दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था. लेकिन 2006 में उसने मामला बंद करने की अर्जी दे दी क्योंकि केंद्र से उसे आगे जांच की अनुमति नहीं मिली.

25.

एनडीए शासनकाल में लालू प्रसाद के खिलाफ सीबीआई ने काफी सक्रियता दिखाई थी, लेकिन यूपीए सरकार बनने के बाद इस मामले में ब्यूरो की रफ्तार सुस्त क्यों पड़ गई?

24.

विशेष अदालत में लालू के खिलाफ मामला खारिज हो जाने के बाद सीबीआई हाई कोर्ट क्यों नहीं गई?

23.

सीबीआई ने पप्पू यादव की जमानत याचिका के खिलाफ कार्रवाई करने में देर क्यों लगाई?

22.

जयललिता ‘उपहार’  मामला

क्या जयललिता मामले को सीबीआई बिलकुल भूल चुकी है?

सीबीआई के मुताबिक तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री को विदेश से तीन करोड़ रुपए का ‘डोनेशन’ मिला था, जिसे उन्होंने 1992-93 के दौरान इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते समय अपनी आय के रूप में दर्शाया. जब एचडी देवगौड़ा सरकार में तमिल मनीला कांग्रेस के पी चिदंबरम वित्तमंत्री थे तब उन्होंने सीबीआई प्रमुख जोगिंदर सिंह से ‘डोनेशन’ देने वाले की पहचान पता करने की बात कही थी. सिंह ने इस पर कार्रवाई भी शुरू की, लेकिन जांच आज भी बेनतीजा जारी है.

21.

भविष्यनिधि घोटाला

तकरीबन दो साल तक जांच के बाद सीबीआई आज भी दावा कर रही है कि जजों के खिलाफ मामला चलाने के लिए उसके पास पर्याप्त सबूत नहीं हैं, आखिर इसकी क्या वजह है?

अप्रैल, 2010  में सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में करोड़ों रुपए के भविष्यनिधि घोटाले से संबंधित जांच की स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की थी. ब्यूरो ने इसमें उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के तीन जजों सहित राज्य के उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष और लोकायुक्त पर करोड़ों रुपए के भविष्यनिधि घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया था. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस तरुण चटर्जी के अलावा आरोपितों की सूची में उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीश भी शामिल थे. आरोप था कि 2001 से 2008 के बीच गाजियाबाद की जिला अदालत के कोषाधिकारी आशुतोष अस्थाना ने जिला अदालत के न्यायाधीशों के साथ मिलकर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के भविष्यनिधि खाते से करोड़ों रुपए निकाले.

20.

इस मामले में ब्यूरो ने जजों से पूछताछ की कोशिश क्यों नहीं की?

19.

प्रथमदृष्टया सबूत होने के बाद भी जजों के घरों पर छापे क्यों नहीं पड़े?

18.

बोफोर्स घूसखोरी मामला

मलेशिया और अर्जेंटीना में दो बार गिरफ्तार होने के बाद भी सीबीआई ने ओटावियो क्वात्रोची के खिलाफ रेडकॉर्नर नोटिस क्यों वापस लिया?

जब-जब केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार रही, इटली के इस हथियार सौदेबाज के खिलाफ सीबीआई जांच में तेजी बनी रही. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मृत्यु के बाद भी सीबीआई, मलेशिया और अर्जेंटीना सहित जहां भी क्वात्रोची गया, उसके पीछे पड़ी
रही. लेकिन बाद में मामला धीरे-धीरे रफा-दफा कर दिया गया.

17.

हर्षद मेहता शेयर घोटाला

शेयर घोटाले में पूछताछ के दौरान हर्षद मेहता ने कई राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के नाम उजागर किए थे. सीबीआई ने मामले में उनकी भूमिका की जांच क्यों नहीं की?

शेयर दलाल हर्षद मेहता ने बैंकिंग तंत्र की खामियों का फायदा उठाकर बैंकों का पैसा शेयरों की खरीद-फरोख्त में लगाया और शेयर बाजार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. मामला खुला तो शेयर बाजार भरभराकर गिरा और निवेशकों व बैंकों को करोड़ों रुपए का घाटा उठाना पड़ा. मेहता पर 72 आपराधिक मामले दर्ज हुए.

16.

यूरिया घोटाला

1995 के यूरिया घोटाले के प्रमुख आरोपितों में शामिल पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव के भतीजे बी संजीव राव और बेटे पीवी प्रभाकर राव कैसे बच गए?

15.

संजीव राव ने माना था कि रिश्वत की रकम कहां छुपाई गई, उन्हें पता है. फिर भी आरोप पत्र में उनका नाम क्यों नहीं था?

14.

प्रधानमंत्री कार्यालय के कौन-कौन अफसर इस मामले से जुड़े थे?

13.

झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड

सीबीआई ने इस मामले में ज्यादातर अभियुक्तों के दोषी साबित हो जाने के बाद क्या किया है?

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने साफ-साफ कहा था कि रिश्वत लेने और देने वाले सांसद अपने विशेषाधिकार का फायदा नहीं उठा सकते और उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है.

12.

सीबीआई ने सत्यम मामले में राजनेताओं की भूमिका की जांच क्यों नहीं की?

7 जनवरी, 2009 को सत्यम के चेयरमैन रामालिंगा राजू ने अपने बोर्ड मेंबरों और सेबी को यह बताते हुए इस्तीफा दिया था कि आईटी कंपनी के खाते में 5,000 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का घाल-मेल है.

11.

जैन हवाला कांड

उच्चतम न्यायालय ने हवाला कांड में राजनेताओं के खिलाफ लचर जांच-पड़ताल के लिए सीबीआई की आलोचना की थी, इससे कोई सबक लिया गया?

18 करोड़ डॉलर के इस घोटाले में वह पैसा भी शामिल था जो हवाला कारोबारी जैन भाइयों ने कथित तौर पर नेताओं को दिया. इस रकम का एक हिस्सा हिजबुल मुजाहिदीन को मिलने की बात भी हुई. लालकृष्ण आडवाणी और मदनलाल खुराना मुख्य आरोपितों में से थे. अदालत ने हवाला रिकॉर्डों को अपर्याप्त सबूत माना.

10.

एनके जैन ने दावा किया था कि उसने पीवी नरसिंहा राव को एक करोड़ रु. दिए. इसके बाद सीबीआई के सबूत जुटाने की रफ्तार अचानक धीमी क्यों पड़ गई?

9.

सेंट किट्स मामला

सेंट किट्स के दौरे के बाद धोखाधड़ी के इस मामले की तफ्तीश के लिए सीबीआई को कौन-से सुराग मिले?

सेंट किट्स धोखाधड़ी मामले में भूतपूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री केके तिवारी, सिद्धपुरुष चंद्रास्वामी और उनके सचिव केएन अग्रवाल के ऊपर आरोप लगे थे. मामला था वीपी सिंह की छवि को खराब करने के लिए फर्जीवाड़ा करने का. राव पर ये आरोप 1996 में तब लगाए गए जब वे प्रधानमंत्री के पद से हट चुके थे. बाद में सबूतों के अभाव में अदालत ने उन्हें इस आरोप से बरी कर दिया. बाकी आरोपी भी आखिरकार छूट गए.

8.

बाबरी विध्वंस

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई कोई भी पुख्ता सबूत नहीं जुटा पाई. क्यों?

6 दिसंबर, 1992 को कथित तौर पर संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की शह पर बाबरी मस्जिद को गिरा दिया. सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल किया जिसमें लालकृष्ण आडवाणी समेत 24 नेताओं का नाम था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ 17 सितंबर को इस मामले पर अपना फैसला सुनाएगी. मामला इतना संवेदनशील है कि मायावती ने फैसले के बाद की आशंकित स्थिति को संभालने के लिए अर्धसैनिक बलों की 300 कंपनियां पहले से ही बुला ली हैं.

7.

पाठक धोखाधड़ी मामला

इतने बड़े नेताओं पर इतने गंभीर आरोप लगे पर सीबीआई साक्ष्य जुटाने में नाकाम क्यों रही?

इंग्लैंड में रहने वाले कारोबारी लक्खूभाई पाठक ने तांत्रिक चंद्रास्वामी, उनके सचिव केएन अग्रवाल और पीवी नरसिंहा राव पर एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप लगाया था.

6.

तेलगी स्टांप पेपर घोटाला

सीबीआई ने उन नेताओं के खिलाफ जांच जारी क्यों नहीं रखी जिनका नाम तेलगी ने लिया था?
2006 में अब्दुल करीम तेलगी की गिरफ्तारी हुई. पूछताछ में उसने शरद पवार, छगन भुजबल समेत कई और राजनेताओं और नौकरशाहों के नाम लिए जो इस घोटाले में उसके हिस्सेदार थे. कभी फल बेचने वाले तेलगी को 1994 में स्टांप पेपर बेचने का लाइसेंस मिला और तब-से उसने फर्जी स्टांप पेपर छापने शुरू कर दिए.

5.

क्या एक अकेला आदमी नेताओं की शह के बिना इतना बड़ा घोटाला कर सकता है?

4.

हजारों करोड़ के इस घोटाले की जांच में सीबीआई को क्या मिला?

3.

आरुषि हत्याकांड को दो साल हो गए हैं. सीबीआई की क्या उपलब्धि है?

2.

सिख विरोधी दंगे

1984 के सिख विरोधी दंगों के मुख्य अभियुक्तों में से एक सज्जन कुमार के खिलाफ सीबीआई अभी तक ढुलमुल रवैया ही अपना रही है. क्यों?

सीबीआई के यह कहने पर कि सज्जन कुमार गायब हैं, फरवरी, 23 को इस केस की सुनवाई कर रही अदालत ने उसे फटकार लगाई.

1.

सिख विरोधी दंगे

कांग्रेस के सांसद जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट देने में सीबीआई को 15 साल क्यों लग गए?

उत्तर भारत में चार दिन तक हिंसा हुई. खासकर दिल्ली में. कांग्रेस के इशारों पर नाचती भीड़ ने निहत्थे सिखों को मारा. औरत, मर्द, बच्चे, बूढे़ सबको. सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लूटा और जलाया गया. गुरुद्वारों तक को नहीं बख्शा गया. इस साल 10 फरवरी को सीबीआई ने दिल्ली कोर्ट में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी जिसमें भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट मिल गई. सीबीआई ने दिसंबर, 2007 में ही टाइटलर को क्लीन चिट दे दी थी पर अदालत ने इसे खारिज कर दिया था और एजेंसी को निर्देश दिए थे कि इस मामले में टाइटलर की भूमिका की दोबारा जांच हो. अप्रैल 2, 2009 को भी सीबीआई ने अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए टाइटलर को क्लीन चिट दी थी. क्लीन चिट देने के लिए सीबीआई ने जिन दस्तावेजों का सहारा लिया था उन्हें हासिल करने के मकसद से दाखिल एक पीड़ित की अर्जी पर जवाब देने के लिए दिल्ली की एक अदालत ने जांच एजेंसी को दो महीने का वक्त दिया है.

(रमन किरपाल की रिपोर्ट; राना अय्यूब, श्रीकांत एस और अनुकंपा गुप्ता के सहयोग से)

 

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आपकी पसंदीदा लेखन शैली क्या है?

कहानी मेरी प्रिय विधा है. कहानी के भीतर का स्पेस और काल मुझे एक शिशु की तरह उत्साहित करता है. हालांकि इसकी परिभाषा तय करना या इसकी व्याख्या करना मेरे लिए संभव नहीं, पर यह सच है कि स्पेस और काल में उतरते ही मुझे पंख लग जाते हैं और मैं पंछी की तरह परवाज़ भरने लगता हूं. इस क्रम में यथार्थ से, जीवनानुभवों से टकराना और फिर इस टकराव से पैदा होनेवाली छवियों को पकड़ना…. ये मेरे लिए आनंद के क्षण होते हैं, उत्सव के क्षण होते हैं…पीड़ा का आनंद, पीड़ा का उत्सव. नाटक लिखने की चुनौतियां अलग क़िस्म की हैं. वहां आपको प्रत्यक्ष रूप से मौन रहना होता है. पात्र मुखर होते हैं. अपने मौन को पात्रों की मुखरता में शामिल करना होता है. नाटक लिख भर लेने से उसकी यात्रा पूरी नहीं होती. मंचन के साथ पूरी होती है यह यात्रा. नाटक में केवल शब्द महत्व नहीं रखते. नाटक दृश्य-काव्य है.

अभी क्या पढ़ रहे हैं?

लंदन से कुछ नाटक लेकर लौटा हूँ. आयरलैंड के नाटक. उन्हें ही पढ़ने में लगा हूँ. अपने कथ्य और अपनी आंतरिक संरचना में ये नाटक विलक्षण हैं…वैसे इन दिनों पढ़ना कम और यायावरी ज्यादा हो रही है. कल ही चौदहवीं शताब्दी के नाटककार उमापति उपाध्याय के गांव कोईलख से उनकी डीह की माटी छूकर लौटा हूं. हम सब कृतघ्न लोग हैं. अपने पूर्वजों की स्मृतियों को सहेजना नहीं जानते.

वे रचनाएं या लेखक जिन्हें आप बेहद पसंद करते हों?

फणीश्वरनाथ रेणु का गद्य और शमशेर बहादुर सिंह की कविताएं मुझे प्रिय हैं. वैसे मैं कविताएं ज्यादा पढ़ता हूं. कबीर, निराला और शमशेर गहन संकट-काल में मेरे काम आते हैं. यार से छेड़ चली जाए…की तरह बाबा नागार्जुन के समग्र रचना-संसार से मेरा आत्मीय संबंध है. बाद के कवियों में विनोद कुमार शुक्ल, अरुण कमल और राजेश जोशी को पढ़ना मुझे अच्छा लगता है. बिल्कुल नए कवि मनोज कुमार झा और व्योमेश शुक्ल को लेकर बेहद उत्साहित हूं. अमरकांत और शेखर जोशी की कहानियां तथा अपने समय के गद्यकारों में दूधनाथ सिंह का कथेतर गद्य और काशीनाथ सिंह का गल्प मुझे प्रिय है. अपने साथ कहानियां लिख रहे प्रियंवद, महेश कटारे, आनंद हर्षुल, शशांक, अवधेश प्रीत, योगेंद्र आहूजा, पंकज मित्र, संतोष दीक्षित आदि की रचनाओं के प्रति हमेशा उत्सुकता बनी रहती है. इनका रंग अलग-अलग है. वंदना राग, रणेन्द्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ और चंदन पांडेय जैसे नए कहानीकारों को भी पसंद करता हूं. वंदना के पास स्मृतियों की आवाजाही है, जो आज विरल है.

कोई जरूरी रचना जिसपर नजर नहीं गई हो?

ऐसी ढेरों रचनाएं हैं, जो साहित्य की गिरोहबंदी के कारण उपेक्षा का शिकार हुईं. हिंदी में अधकांश संपादक गिरोहबाज हैं. पाठकों की फिक्र न करनेवाला प्रकाशन तंत्र भी इसके लिए जिम्मेवार है. आलोचना का हाल बहुत बुरा है. बहुत कम लोग हैं जो गंभीरता से काम कर रहे हैं. अभी तो अमरकांत और शेखर जोशी जैसे लेखकों पर काम नहीं हुआ.

कोई रचना जो बेवजह मशहूर हो गई हो?

तस्लीमा नसरीन का उपन्यास लज्जाऔर अरूंधति राय का उपन्यास द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’. हिंदी में अनावश्यक रूप से चर्चित होनेवाली रचनाओं की फ़ेहिरस्त लंबी है.

पढ़ने की परंपरा को कायम रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

हिंदीभाषी समाज में पढ़ने की परंपरा बेहद क्षीण रही है. यह समाज आज भी सामंती मूल्यों की जकड़न से पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सका है. जिस समाज में कवि-लेखक होना विदूषक होने की तरह हो, वह समाज पढ़ने को भला कितनी प्राथमिकता देगा?…मेरे एक पत्रकार मित्र का कहना है कि पत्रकारिता से संवेदना और साहित्य से यथार्थ ग़ायब होता जा रहा है. इसीलिए पत्रकारिता अविश्वसनीय हो गई है और साहित्य अपठनीय.यह टिप्पणी एक सीमा तक सही भी है. साहित्य नहीं पढ़े जाने का एक यह भी कारण हो सकता है. दूसरा बड़ा कारण यह है कि पुस्तकें और पत्रिकाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं. अधिकांश प्रकाशकों की रुचि, पाठकों तक पुस्तकें पहुंचाने में नहीं है….हमारे जीवन से बहुत सारी चीजें इन दिनों ग़ायब होती जा रही हैं, पुस्तकें भी इनमें शामिल हैं. मैं दृश्य या अन्य माध्यमों को पुस्तकों के लिए ख़तरा नहीं मानता. पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है. आज शिक्षा को केवल रोज़गार से जोड़कर देखने का चलन है. जाहिर है कि ऐसे में साहित्य हाशिए पर ही रहेगा. साहित्य मनुष्य को कल्पनाशील, विवेकवान और संवेदनशील बनाता है. हिंदीभाषी समाज को साहित्य  पढ़ने की परंपरा नए सिरे से विकसित करनी होगी.

रेयाज उल हक

हिंदी फिल्मों के शुक्ल और कृष्ण पक्ष

गौरव सोलंकी चार निर्देशकों के बहाने हिंदी फिल्मों की उस नई धारा के बारे में बता रहे हैं जो मनोरंजक भी है और सार्थक भी. उसका एक हिस्सा परेशान करता है, दूसरा उम्मीदें जगाता है और तीसरा दोनों काम करता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि तीनों तरह की फिल्में आखिर तक अपनी ईमानदारी नहीं छोड़तीं 

फिल्में चांद नहीं होतीं कि पंद्रह दिन उजाले की ओर बढ़ें और बाकी पंद्रह दिन अंधेरे की और उनमें से ज्यादातर फिल्में, जिनकी हम बात कर रहे हैं, यह सोचकर भी नहीं बनाई जातीं कि अबकी बार हंसी के पांच जबरदस्त सीन डालने हैं और अबकी बार रुला-रुला कर मार डालना है. यह अपने आप ही होता है कि उनमें से कुछ दिल में गुबार भर देती हैं और कुछ उसे गुब्बारे की तरह हल्का कर देती हैं. दिल हल्का कर देने वाली फीलगुड फिल्मों का एक बड़ा दर्शक-वर्ग है इसलिए वे बनती भी ज्यादा हैं. परेशान करने वाली फिल्मों का छोटा दर्शक-वर्ग है लेकिन वह वफादार है और उन्हें देखने के लिए प्रतिबद्ध, इसलिए वे चाहे कम हों, बनती जरूर हैं.

सिनेमा को मनोरंजन ही करना चाहिए या कुछ सार्थक कहने की कोशिश भी करनी चाहिए, इस पर लंबी बहसें होती रही हैं, लेकिन बहसों में पड़े बिना अस्सी और नब्बे के दशक के सतही दौर से हिंदी सिनेमा को उबारने के लिए पिछले कुछ सालों में कई हाथ खामोशी से उठते गए हैं. किसी क्रांति के दावे किए बिना उन्होंने वह बनाया है जिसे बनाने के लिए वे नागपुर, जमशेदपुर या बनारस की अपनी बेचैन रातें छोड़कर मुंबई आए थे. उसका हिस्सा पटकथा लेखक भी हैं, सिनेमेटोग्राफर, एडिटर और गीतकार, संगीतकार भी. उन सबके हिस्सों को पर्याप्त सम्मान देते हुए हम उन निर्देशकों की बात कर रहे हैं जिन्होंने बिना नारे लगाए परंपरा बदली है. जिन्होंने हिंदी फिल्मों की एक नई धारा विकसित की है जो मनोरंजन करने के लिए अपनी गहराई नहीं छोड़ती.

फिल्में चांद नहीं हैं लेकिन हम प्रतीकों में बात करने का मोह नहीं छोड़ पाए और हमने उन निर्देशकों को दो खांचों में बांटने की कोशिश की, परेशान करने वाला डार्क सिनेमा उसका कृष्ण पक्ष है और उम्मीदों पर खत्म होने वाला उजला सिनेमा उसका शुक्ल पक्ष. अगले पन्नों पर दो शुक्ल पक्ष के निर्देशक शिमित अमीन और दिबाकर बनर्जी हैं और दो कृष्ण पक्ष के निर्देशक अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज हैं. जाहिर-सी बात है कि ये चार निर्देशक मिलकर पूरा परिदृश्य नहीं रचते और वे अपने-अपने पक्ष में सर्वश्रेष्ठ हैं, ऐसा भी दावा यहां नहीं है और न ही ऐसी टॉप चार सूचियों का कोई औचित्य है. जैसे अगले पन्नों पर ‘मुन्नाभाई’, ‘सोचा ना था’ या ‘रंग दे बसंती’ के संदर्भ और राजकुमार हीरानी, इम्तियाज अली या राकेश ओमप्रकाश मेहरा नहीं हैं और यही सिद्ध करता है कि यह किसी तरह की रैंकिंग वाली सूची नहीं है. लेकिन यह जरूर है कि इन चारों निर्देशकों के काम में ऐसी निरंतरता रही है जिसने हिंदी फिल्मों में स्थायी रूप से कुछ न कुछ नया जोड़ा है. यह बस इस बहाने से इन चार महत्वपूर्ण निर्देशकों के अब तक के काम को एक साथ देखने की कोशिश है. ये चार नाम इसलिए भी यहां हैं कि इनके काम के महत्व की तुलना में मुख्यधारा के मीडिया में इनका जिक्र थोड़ा कम ही हुआ है.

बहरहाल, यदि नए और सार्थक हिंदी सिनेमा के पूरे फलक की बात करनी हो तो वह सुधीर मिश्रा की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ के आदर्शों और उनसे मोहभंग के बिना पूरी नहीं हो सकती और न ही जोया अख्तर की ‘लक बाय चांस’ की नायिका के आखिरी फैसले के बिना. उच्च वर्ग के आत्मकेंद्रित लड़के-लड़कियों की फिल्मों का जॉनर शुरू करने वाली फरहान अख्तर की ‘दिल चाहता है’ का जिक्र भी जरूरी है और तिग्मांशु धूलिया की इलाहाबाद की कॉलेज राजनीति पर बनी ‘हासिल’ का उससे भी ज्यादा जरूरी. ‘इकबाल’ और ‘डोर’ के नागेश कुकुनूर, ‘एक हसीना थी’ और ‘जॉनी गद्दार’ के श्रीराम राघवन, ‘पिंजर’ के चंद्रप्रकाश द्विवेदी, ‘आमिर’ के राजकुमार गुप्ता, ‘उड़ान’ के विक्रमादित्य मोटवानी, ‘तेरे बिन लादेन’ के अभिषेक शर्मा और ‘पीपली लाइव’ की अनुषा रिजवी भी हमारी फिल्मों को उस तरफ ले जाते हैं जहां गर्व और ढेर सारी उम्मीदें हैं. 

जहां जिंदगी प्रेमगीत नहीं रह पाती…

(अनुराग कश्यप)

कमाल अचानक नहीं होता, लेकिन लगता अचानक ही है. वह पहाड़गंज के एक बेंच जैसे बिस्तर पर होता है जहां चंदा देव को बताती है कि कैसे उसके प्रेमी ने उसका एमएमएस बनाया था, जो देश भर के लोगों ने डाउनलोड करके देखा. उन देखने वालों में उसके पिता भी थे जिन्होंने आत्महत्या कर ली, यह कहने की बजाय कि कोई बात नहीं बेटा, जो हो गया सो हो गया, अब सब भूल जाओ. देव, जो देवदास है, इससे पहले तक लोकप्रिय संस्कृति का सबसे कायर और निष्ठुर नायक, उसे गले लगाता है और कहता है- कोई बात नहीं बेटा, जो हो गया सो हो गया, अब सब भूल जाओ.

अनुराग दुनिया की हर तरह की फिल्म लिख सकता है. जरूरी नहीं कि वह अनुराग तरह की फिल्म ही लिखे. उसकी बैंडविड्थ बहुत ज्यादा है. वह हर जॉनर के साथ न्याय कर सकता है – जयदीप साहनी

क्या आपने ध्यान दिया कि ‘देव डी’ की सहानुभूति उस पिता के साथ बिलकुल नहीं है जिसे आप बेचारा समझते हैं, तथाकथित रूप से जिसे अपनी इज्जत इतनी प्यारी है कि उसके बिना वह जी भी नहीं पाया. ‘देव डी’ उसे गाली देती है. वह और भी बहुत-से नए काम करती है. मसलन पारो अपने पति के साथ खुश है और शादी के बाद अंधेरे कमरों में फूट-फूटकर नहीं रोती. और यह भी नियम नहीं है कि जिसे हीरो छोड़ दे उसे ऐसा तलाकशुदा या विधुर ही मिले जो सिर्फ बच्चों का खयाल रखने के लिए शादी करना चाहता हो. उसकी चंदा किसी मजबूरी में वेश्या नहीं बनी. यह उसके लिए करियर है, साथ में पढ़ाई और दोस्त भी हैं. वह भी छिप-छिपकर नहीं रोती. उसके सुखांत में अपने ऊपर थोपी गई सारी महानता ठुकराकर देव स्वीकार करता है कि उसने कभी पारो से प्यार किया ही नहीं. इससे पहले देवदास तो क्या, कौन-सा हीरो था जिसने यह कुबूला था?

हमारे समय की एक डार्क फिल्म में इतनी सकारात्मक चीजें हैं. भंसाली के भव्य संस्करण के बावजूद (जिसके सेट अपनी फिल्म की थीम का उदास असर काटने के लिए बेशर्मी से महंगे हैं) उसी मूल कथा पर बनी ‘देव डी’ सिनेमा की परिभाषा में डार्क इसलिए है कि उसकी आखिरी तह में गहरा अवसाद है, उसके रंगों और संगीत में वह बुखार है जिसमें अपना सिर आपको फूले हुए गुब्बारे जैसा लगने लगता है. अच्छी बात यह होती है कि एक अखबार अपनी समीक्षा में उसे पांच सितारे देता है और अखबार देखकर फिल्म देखने निकलने वाली जनता हाउसफुल कर देती है. वे अनुराग कश्यप को जानने लगते हैं. हालांकि वे ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘नो स्मोकिंग’ के बारे में नहीं जानते और न ही अगले महीने रिलीज होने वाली कहीं ज्यादा अंधेरी ‘गुलाल’ के लिए उतना उत्साह दिखाते हैं. उन्हें प्रेम कहानियां चाहिए जो अनुराग के पास ज्यादा नहीं हैं और हों भी तो शायद वे बनाना नहीं चाहते. वे शायद ‘सत्या’ और ‘शूल’ भी नहीं बनाना चाहते जो उनकी लिखी सबसे सराही गई फिल्मों में से हैं.

अनुराग का नायक ही है जो अपने पास बैठी शरीफ समझी जाने वाली औरत का बस-टिकट इस बात पर खा जाता है कि वह उसे शराब न पीने की बिन मांगी सलाह दे रही होती है. वह अपने चेहरे और नाम बदलता है लेकिन गुस्सा नहीं छूटता. ‘पांच’ के केके में वह चरम पर है, ऊपरी सतह पर लगभग बेवजह लगता हुआ, जो नैतिकतावादियों को अपनी सीट पर आराम से नहीं बैठना देता. ‘गुलाल’ में उस गुस्से के पीछे विश्वासघात और मोहभंग है. ‘ब्लैक फ्राइडे’ में वह गुस्सा सामूहिक है इसलिए सबसे ज्यादा तार्किक लगता है. ‘नो स्मोकिंग’ में वही गुस्सा खूबसूरत है. उसका जादुई यथार्थ उसे कोमल बनाता है. सायास-अनायास जब साहित्य में भी कविता हाशिए पर जा रही है तब ‘नो स्मोकिंग’ अनुराग की सबसे काव्यात्मक फिल्म है. उसके बनने के बाद भी वैसी किसी फिल्म का बॉलीवुड में बनना असंभव-सा लगता है. वही है जिसे देखकर आप अनुराग की हदें जान सकते हैं. वही है जिसे देखकर आप बेहतर समझ सकते हैं कि क्यों अनुराग कश्यप अचानक फिल्म-निर्देशक बनने की चाह रखने वाले युवाओं के आदर्श हो गए हैं. यदि नई तरह का सिनेमा वह है, जो अपने दर्शकों से इतनी मोहब्बत करता है कि उनकी परवाह ही नहीं करता, जो हर घटना की वजह बताने को वक्त को जाया करना समझता है, जो इशारों में बात करने से पहले या बाद उनके मतलब नहीं समझाता तो हां, ‘नो स्मोकिंग’ उस नए सिनेमा की अगुआ फिल्मों में से एक है. वह जिंदगी की तरह है, जो आपको नहीं बताती कि कलम पकड़ने वाली आपकी उंगलियां और सच बोलने वाली जुबान क्यों काटी जा रही हैं?

नए दौर के फिल्मकारों में अनुराग और विशाल सबसे ज्यादा असहज करते हैं. उनकी फिल्में हिंसा और जटिलताओं के बीच मासूम और निरीह हैं. अपनी गालियों के बीच वे सबसे साफ और निर्दोष जुबान हैं.  

जग जा री गुड़िया…

(विशाल भारद्वाज)

विशाल भारद्वाज के भीतर दो तरह के विशाल भारद्वाज हैं. कमीने के गुड्डू और चार्ली की तरह, लेकिन दोनों हकलाते या तुतलाते नहीं हैं. एक के पास अपार दुख, विश्वासघात और क्रोध की कहानियां हैं और दूसरे के पास बच्चों की कहानियां. आप ‘ब्लू अम्ब्रेला’ देखते हुए शायद नहीं कह सकते कि ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ से उसका इतना करीबी रिश्ता है. लेकिन आप संवादों पर ध्यान दें तो यह इतना मुश्किल भी नहीं है.

उनकी फिल्मों की अभूतपूर्व क्षेत्रीय बोली, स्थानीय गालियां और मुहावरे जिसके जरूरी हिस्से हैं, उन्हें विश्वसनीय बनाती है. यही बात है जो ‘ब्लू अम्ब्रेला’ को ‘ओमकारा’ से जोड़ती है. दूसरी बात सिनेमेटोग्राफी और लगातार गहराता हुआ दुख और अकेलापन है. अपनी कमजोर कहानी के बावजूद ‘कमीने’ भी यही खूबियां साझा करती है. ‘कमीने’ और ‘ब्लू अम्ब्रेला’ के बेचैन हैंडहेल्ड शॉट दिबाकर की ‘एल एस डी’ की तरह ही असहज करते हैं और आपकी आराम की आदतों को तोड़ते हैं.

विशाल के अंदर मेरठ उसी तरह बसा हुआ है जैसे दिबाकर के अंदर दिल्ली. मुझे उन लोगों की फिल्में देखना अच्छा लगता है जिनके काम में दिखता है कि वे कहां से हैं –    अनुराग कश्यप

नए दौर के कई और फिल्मकारों के साथ विशाल का असली विद्रोह हिंदी फिल्मों के अवास्तविक लगते डायलॉग से ही है. वे अपनी और इसीलिए हमारी भाषा बोलते हैं. बच्चों के मासूम सवाल और बड़ों के अश्लील मजाक, उतनी ही सच्चाई से. उनके अपराधी तमीज से बात नहीं करते और शायरी की उपमाएं नहीं देते. उनकी नायिकाएं अपने नायकों को प्यार से हरामखोर, भेडि़या या संपोला कहती हैं. भाषा की वास्तविकता के प्रति उनका यह आग्रह इतना पुख्ता है कि ‘कमीने’ में बंगाली भाई कई मिनट बंगाली में ही बात करते हैं. इससे बिलकुल बेफिक्र कि दर्शक उसे समझते हैं या नहीं. इसी तरह वे ‘ओमकारा’ की भाषा में लगातार एक खेल खेलते हैं. अपनी कहानी और किरदारों के प्रति ईमानदार रहना उनके लिए दर्शकों की सहूलियत का खयाल रखने से ज्यादा जरूरी है.

उदासी उनकी फिल्मों का स्थायी भाव है. ‘मकबूल’ और ‘ओमकारा’ के अंत से काफी पहले शुरू होकर, खत्म होने के बहुत बाद तक वह उदासी आपके भीतर पैठ जाती है. इसमें शायद शेक्सपियर के उन नाटकों का भी काफी असर है जिनसे ये फिल्में प्रेरित हैं. लेकिन एक बड़ा हिस्सा विशाल का भी है. आत्मा से आत्मा तक पहुंचता उनका संगीत उनकी फिल्मों को और बड़ा कर देता है.        

उनमें दुखांतों के प्रति गहरा मोह भी है. एक न खत्म होने वाला गुस्सा और दुख, जिसका इसके अलावा कोई प्रायश्चित नहीं कि वह अपने साथ सबको खत्म कर ले. उनके यहां यथार्थ इतना नंगा है कि झूठ बोलकर उसे छिपाया भी नहीं जा सकता. उनके किरदारों के प्रेम में इतना जुनून है कि उसके लिए वे अपनी और दूसरों की सब सल्तनतें जलाकर राख कर सकते हैं. सबसे दुखद यह है कि सामान्य दुखांतों की तरह मरकर भी उनके नायक शांति नहीं पाते. खुद को गोली मारने से पहले ओमी जानता है कि उसे न यहां चैन मिलेगा न मरने के बाद. यही मकबूल भी जानता है. बस गुड्डू और चार्ली के पास वे गलतियां और विश्वासघात नहीं हैं, इसलिए न वैसी अशांति है और न ही इतना दुख. इसलिए उसका मृत्यु से पगा हुआ अंत बाद में महीनों तक दुखी नहीं करता, लेकिन शायद विशाल के लिए हर कथा में वह जरूरी है.

विशाल के सिनेमा को जानने के लिए उनके संगीत को जानना भी उतना ही जरूरी है. वे मूलत: कवि ही हैं जो हिंसा दिखाते हुए भी अपनी कोमलता नहीं छोड़ता. ‘माचिस’ के ‘छोड़ आए हम वो गलियां’ की तरह उनके संगीत और फिल्मों में बार-बार वही नॉस्टेल्जिया है जो उनकी फिल्मों को बॉलीवुड की अब तक की मुख्यधारा से अलग दुनिया देता है. ऐसा लगता है कि उनका कुछ ‘ओमकारा’ में मरती डॉली के साथ या ‘ब्लू अम्ब्रेला’ में गाना गाकर चंदा मांगते बच्चों के साथ छूट गया है. वे देर तक ‘जग जा री गुडि़या’ गाना चाहते हैं और समय बार-बार उनकी गुड़िया के मुंह पर तकिया रखकर उसका दम घोट देता है. उनका सारा सिनेमाई संघर्ष इसी गलती के कभी न हो सकने वाले प्रायश्चित से है. वे इस मजबूरी पर फिल्में खत्म करते हैं कि काश! पीछे लौटकर कुछ बदला जा सकता. एक नीली छतरी की चोरी (यह सब तब है जब मूल कहानियां उनकी नहीं हैं) पंकज कपूर को हत्यारे जितने अवसाद से भर देती है. वह मकबूल जितना ही अकेला है. अंधेरा और बाहर की दुनिया उसे उतना ही डराती है. वही बाहर जिसके उत्सवों से उसे बेदखल कर दिया गया है क्योंकि उसने शिद्दत से कुछ चाहा है और इस चक्कर में दुनिया और दुनियादारी को बिलकुल भूल गया है. विशाल उसका पक्ष भी नहीं लेते और इसीलिए आपको एक लंबी उदासी में डुबो देते हैं. वे हिंसा का सौंदर्यशास्त्र गढ़ते हैं, जिसमें दुख कुछ ज्यादा हो गया है. यही उन्हें हिंदी सिनेमा में जरूरी भी बनाता है.

खोसला, लकी और धोखा

(दिबाकर बनर्जी)

दिबाकर को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता. बड़ी वजह यह है कि आप उनकी फिल्मों को बाकी निर्देशकों की तरह खास जॉनर या खांचों में नहीं बांट सकते. वे एक फिल्म बनाते हैं और उसे चाहने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग और फिर उसे भूलकर बिलकुल अलग किस्म की दूसरी फिल्म बनाते हैं, जिससे दूसरा वर्ग जुड़ता है और दिबाकर अगली बार उसके भी वफादार नहीं रहते. इसीलिए उनके काम में हर बार स्थायी रहे तत्वों को पहचानना भी मुश्किल है. यही चुनौती दिबाकर को सबसे खास बनाती है. आप न कॉमन चीजें ढूंढ़कर दूसरों को चमत्कृत कर सकते हैं और न ही उनके अगले काम के बारे में ज्यादा अनुमान लगा सकते हैं. आप ज्यादा से ज्यादा यह खोज कर सकते हैं कि उनकी फिल्मों में कॉमेडी कॉमन है (इस पर शायद आप बहस करना चाहें) और दिल्ली अपनी पूरी असलियत के साथ हर बार है. वे दर्शकों की आदत का खयाल रखते हुए उसे उस तरह नहीं दिखाते कि सब महत्वपूर्ण दृश्य कुतुब मीनार या पुराने किले में ही घटित हों. ‘ओए लकी लकी ओए’ में कुतुब मीनार या इंडिया गेट बस लकी के बड़े होने की तस्वीरों में है और वहां भी वह इसे मजाकिया अंदाज में पेश करती है.

दिबाकर हमें दिल्ली को उस तरह दिखाते हैं, जिस तरह हम दिल्लीवाले भी उसे  नहीं देख पाते. उनके किरदार इतने वास्तविक होते हैं कि पहली बार में वे हमें नकली लगते हैं – राजा सेन, फिल्म समीक्षक

उनकी फिल्मों की भाषा और लहजे में इतना अपनापन है कि वह अपने आसपास का होते हुए भी अजीब-से आश्चर्य से भर देता है और बिना कोई अतिरिक्त प्रयास किए हंसाता है. इसीलिए ‘खोसला का घोंसला’ एक त्रासद कहानी होते हुए भी – एक रिटायर हुए आदमी का एक बेटा बेकार है, दूसरा विदेश जा रहा है और उसकी सारी जमा-पूंजी से खरीदा गया गुड़गांव का प्लॉट एक अमीर बिल्डर ने हथिया लिया है – पारिवारिक कॉमेडी फिल्म के रूप में ज्यादा जानी जाती है. ऐसा ही कुछ ‘ओए लकी लकी ओए’ के साथ है, लेकिन थोड़ा कम. वह हंसाती है लेकिन मध्यमवर्ग वाले पारिवारिक मूल्यों को तोड़ती है. लकी के पिता की नई पत्नी की नजर किशोर लकी पर है. शायद हिंदी सिनेमा में ऐसा पहली बार ही होता है कि एक ही चेहरे वाले तीन अलग-अलग किरदार हैं. वे लकी की जिंदगी के तीन अध्यायों की तरह हैं या तीन खलनायकों की, जो सिर्फ पैसे से प्यार करते हैं. लकी चोर है लेकिन वह पैसे से नहीं, चोरी से प्यार करता है इसीलिए हमें उससे प्यार हो जाता है.

‘लव सेक्स और धोखा’ कहानी और फॉर्म, दोनों के स्तर पर उनकी सबसे ज्यादा परंपरा तोड़ने वाली फिल्म है. उसके नाम में सेक्स है लेकिन सेक्स देखने के लिए उसे देखने वाले लोग गालियां देते हुए लौटते हैं. वह ‘चर्चगेट की चुड़ैल’ और ऐसे ही वीडियो की घोषणाओं के साथ फुटपाथी उपन्यासों की शैली में शुरू होती है और आपको किसी भी तरह की बौद्धिक बहस का न्यौता नहीं देती, लेकिन फिर भी आश्चर्यजनक रूप से इस साल की सबसे ज्यादा परेशान करने वाली फिल्मों में से एक बन जाती है.

हां, यही दिबाकर की खासियत है. उनकी फिल्मों में लगातार एक दुख है, एक जिद्दी ईमानदारी जो उसे हंसकर झेलती है और समझ में नहीं आता कि चुटीले डायलॉग से वह तकलीफ कम होती है या गहरी. कभी-कभी उल्टा भी होता है. खोसला साहब की बेचारगी और खुराना का कमीनापन दोनों हंसाते ही हैं, वहीं ‘एलएसडी’ में बॉलीवुड की प्रेम कहानियों का मजाक आगे पड़ने वाली चोट का असर और गहरा करता है. वहां वे आपकी खाल को पहले इतना नर्म करते हैं कि जब उसे काटा जाए तो दर्द बड़ा हो. इसीलिए ‘एलएसडी’ के पहले हिस्से का अंत कम से कम आधे घंटे का ब्रेक मांगता है. वह तो नहीं मिलता क्योंकि फिल्म को आगे बढ़ना है लेकिन आप यह नहीं मान पाते कि वह फिल्म है.

अगर उनकी पहली दोनों फिल्मों को देखा जाए तो उनके पास एक अच्छी दुनिया है, बहुत सारी मुश्किलें, लेकिन इतनी नहीं कि जिसके साथ आपकी सहानुभूति है, वह थोड़ा ज्यादा रो दे. एकाध आंसू तो चलता ही है. खासकर ‘खोसला का घोंसला’ अच्छाई की जीत की ऐसी फिल्म है जो नए सिनेमा के अच्छे हिस्से में से खत्म होती जा रही हैं. वह नई जुबान के साथ, सब अच्छे अर्थों में पुरानी तरह की फिल्म है. दिबाकर नए दौर के अकेले ऐसे फिल्मकार हैं जिनका कोई करीबी विकल्प हिंदी सिनेमा के पास नहीं है. इसी तरह उनकी फिल्मों का भी.

सत्तर मिनट का धुनी

(शिमित अमीन)

शिमित अमीन लॉस एंजिल्स में रहते थे. वहीं से ‘भूत’ की एडिटिंग करते हुए रामगोपाल वर्मा ने उन्हें ‘अब तक छप्पन’ का निर्देशक बनने को कहा. अपने निर्देशक बनने को शिमित महज एक संयोग मानते हैं, लेकिन यदि ऐसा है तो यह दशक के सबसे खूबसूरत संयोगों में से एक है. ’अब तक छप्पन’ पुलिसवालों की ‘सत्या’ ही है, जो आपको चौंकाती है लेकिन उसके लिए उसे लंबे एक्शन दृश्यों की जरूरत नहीं है. उसके किरदार आम हैं, उनकी मजबूरियां, इच्छाएं और बातें भी आम. फिल्म की शुरुआत के एनकाउंटर में गोली इस तरह मारी जाती है, हंसकर बातें करते हुए, जैसे आप बातें करते हुए अपने दफ्तर की कोई फाइल निपटा रहे हों. यह सपाट और आम होना ही एक खास ठंडक आपकी रगों में दौड़ा देता है. यूं तो ‘अब तक छप्पन’ पर रामगोपाल वर्मा का कुछ असर है लेकिन उसकी कई खूबियां आप शिमित के आगे के काम ‘चक दे इंडिया’ और ‘रॉकेट सिंह’ में हर बार देख सकते हैं, मसलन बहुत सारे किरदारों की फिल्म और उसमें कई छोटे किरदारों पर भी उतना ही ध्यान. उनकी फिल्मों के दो मिनट के रोल वाले किरदार भी बेवजह और मामूली नहीं होते. उनकी फिल्में प्रेम कहानियों को ज्यादा से ज्यादा पांच फीसदी रील देती हैं और संगीत पर भी उतनी निर्भर नहीं हैं जितनी अनुराग या विशाल की फिल्में हैं. इसलिए फिल्म का सारा दारोमदार उसकी कहानी पर होता है और वह आपको निराश नहीं करती. अपनी गंभीर कहानियों के बावजूद – गौर कीजिए कि उनकी तीनों फिल्में तीन बिलकुल अलग प्रोफेशनों की फिल्में हैं. उनकी फिल्में माहौल को बोझिल होने से बचाने की हर संभव कोशिश करती हैं, उनकी एडिटिंग इतनी सहज होती है कि नजर नहीं आती और उनका मुख्य किरदार अपने सफर में बहुत-कुछ खोता है, लेकिन हार नहीं मानता और आखिर में जीतता है. हां, रास्ते में एक-दो नाटकीय चीजें (जिन्हें फिल्मी टाइप की घटनाएं कहा जाता है) जरूर होती हैं लेकिन वे फिल्म को नकली नहीं बनातीं और न ही उन घटनाओं का असर कम करती हैं. उनकी फिल्में राजकुमार हीरानी या इम्तियाज अली जितनी फीलगुड नहीं हैं और न ही अनुराग या विशाल की फिल्मों जितनी उदास. हां, वे अपनी सादगी और ईमानदारी नहीं छोड़तीं. वे अपने अच्छे लोगों के साथ इतनी मजबूती से खड़ी होती हैं कि नियति को भी बदल देती हैं. वे अच्छाई की जीत की फिल्में हैं, इस तरह हिंदी फिल्मों की परंपरा के सबसे नजदीक और फिर भी अपनी वास्तविकता नहीं खोतीं.

शिमित खुदा का बंदा है. उसे पुरस्कारों और शोहरत से कोई मतलब नहीं है. उसके लिए यही सबसे बड़ी सफलता है कि आपको अपने कमरे में डीवीडी पर उसकी फिल्म देखकर अच्छा लगे –            जयदीप साहनी

इन लगातार दिखती खूबियों के बावजूद उनकी तीनों फिल्में एक-दूसरे से इतनी अलग हैं कि शिमित के काम के बारे में एक आम राय देना मुश्किल हो जाता है. दिबाकर की तीनों फिल्में अलग होने के बावजूद अपनी भाषा और दिल्ली की कड़ी से बंधी तो हैं, शिमित के यहां वैसी कोई कड़ी भी नहीं दिखती. इसकी एक वजह यह भी है कि यहां जिन चार निर्देशकों का जिक्र हुआ है उनमें से शिमित ही ऐसे हैं जो अपनी फिल्में खुद नहीं लिखते. इसलिए यदि उनकी तीन फिल्मों को थोड़ी समानताओं के आधार पर (हालांकि वे समानताएं भी दो-चार फीसदी होंगी) दो हिस्सों में बांटा जाए तो संदीप श्रीवास्तव की लिखी ‘अब तक छप्पन’ एक तरफ होगी और जयदीप साहनी की ‘चक दे इंडिया’ और ‘रॉकेट सिंह’ दूसरी तरफ. उनकी फिल्मों का यदि कोई आसानी से नजर आने वाला सिग्नेचर है तो वह शायद उनके लेखकों का है. लेकिन शिमित के काम में उन कहानियों की हर डीटेल के प्रति उतनी ही आस्था है और यह उनकी खासियत है कि उनका निर्देशक ‘चक दे इंडिया’ के हॉकी मैचों को एक जैसा होते हुए भी एक जैसा नहीं दिखने देता. वे ‘रॉकेट सिंह’ की उबाऊ दफ्तरी जिंदगी में से भी एकरसता निकाल फेंकते हैं और कहानी को भी समझौता नहीं करने देते. आप ‘चक दे इंडिया’ के हर राज्य की लड़की में क्षेत्रीय स्टीरियोटाइप भले ही तलाश लें, लेकिन आप उन जुनूनी लड़कियों की लड़ाई में उनके साथ ही खड़े होते हैं (वैसे ‘चक दे इंडिया’ अपनी मूल कहानी में ही कई स्टीरियोटाइप तोड़ती है- हॉकी पर फिल्म और वह भी लड़कियों की हॉकी).

शिमित की एक बड़ी सफलता यह भी है कि वे पहली बार शाहरुख खान को शाहरुख खान बने रहने की सीमा से बाहर खींचकर लाते हैं. ‘रॉकेट सिंह’ का हरप्रीत इतना विश्वसनीय है कि आपको रणबीर कपूर नामक व्यक्ति का अस्तित्व याद नहीं आता. इसी तरह वे नाना पाटेकर को उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ भूमिकाओं में से एक थमाते हैं.

शिमित सत्तर मिनट वाली उस बेफिक्र, और साथ ही जिद्दी लड़ाई से हमें जोड़ते हैं और किसी भी पारंपरिक ढंग से स्त्रीवादी हुए बिना हिंदी फिल्मों के परदे पर औरत को उसके हिस्से का सम्मान देते हैं. वह ‘रॉकेट सिंह’ ही है, जिसमें आइटम गर्ल होने की तमाम खूबियों के बावजूद गौहर खान के किरदार का विद्रोह आइटम गर्ल होने से ही है.    

आंतरिक लोकतंत्र का फटा ढोल

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का सपना भले कांग्रेस पार्टी में जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान देने का हो लेकिन कम से कम उत्तराखंड में तो हकीकत इससे कोसों दूर है. यहां हाल ही में संपन्न हुए कांग्रेस के संगठन चुनावों में एक बार फिर से निष्ठावान कार्यकर्ताओं के स्थान पर अवसरवादियों को हर स्तर पर खूब मौके दिए गए. उपेक्षा से खफा कांग्रेसी जिलों में हंगामा करने के साथ-साथ हाईकमान तक अपनी शिकायतें पहुंचाने में लगे हुए हैं.

एक नजर संगठन चुनावों की प्रक्रिया पर डालें तो प्रत्येक पोलिंग बूथ तक संगठन को पहुंचाने की मुहिम के तहत राज्य के हर बूथ से एक सक्रिय सदस्य को बूथ प्रभारी के रूप में चुना जाना था और एक सदस्य को ब्लॉक कांग्रेस कमिटी के डेलीगेट के रूप में. (कांग्रेस ने संगठनात्मक दृष्टि से पूरे राज्य को160 चुनावी ब्लॉकों में बांटा था, इसलिए राज्य के 5 लोकसभा क्षेत्रों में से प्रत्येक में औसतन 32 ब्लॉक होते हैं). पोलिंग बूथों से चुने गए डेलीगेट ब्लॉक स्तर पर कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष चुनने के साथ-साथ एक प्रदेश कांग्रेस कमिटी (पीसीसी) व छह जिला कांग्रेस कमिटी (डीसीसी) के सदस्यों को चुनते हैं. बाद में जिला कांग्रेस कमिटी के सदस्य जिलाध्यक्ष का चुनाव करते हैं और हर ब्लॉक से चुने गए पीसीसी सदस्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और एआईसीसी के सदस्यों का. इसके बाद एआईसीसी के सदस्य ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चुनते हैं.

वर्ष 2008-09 से शुरु हुए राज्य कांग्रेस के सदस्यता अभियान में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए फॉर्मों पर फोटो चिपकाना अनिवार्य बना दिया गया था. इन्हें जमा करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर, 2009 थी.

राज्य कांग्रेस में असंतोष के सबसे बड़े कारण पीसीसी सदस्य व जिलाध्यक्षों के पद हैं. हर बड़ा व मझोला कांग्रेसी नेता पीसीसी में जाना चाहता था ताकि वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सके और प्रदेश का हर कांग्रेसी क्षत्रप अपने प्रभाव के जिलों में ‘अपने अनुकूल’ जिलाध्यक्ष को चाहता था ताकि वह आगामी चुनावों में अपने चहेतों को टिकट दिलाने का रास्ता साफ कर सके. पहले कांग्रेस में लोकसभा सांसदों या संभावित प्रत्याशियों को अपनी सीटों वाले जिलों में अपने मुताबिक टीम बनाने की छूट थी. लेकिन राहुल गांधी की पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने की मुहिम से उत्साहित कांग्रेसी इस बार चुनावों में ‘क्रांतिकारी परिवर्तन’ के साथ ‘पूर्ण आंतरिक लोकतंत्र’ की उम्मीद कर रहे थे.

अकेले देहरादून में कांग्रेस प्रत्याशियों के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले चार कांग्रेसियों को पीसीसी भेज दिया गया लेकिन ऐसा हुआ नहीं. हालांकि पीसीसी सदस्यों की सूची 28 अगस्त को को ही सार्वजनिक की गई है मगर इसके बारे में अखबारों में जानकारियां पहले से ही छपती रही हैं. प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता व कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी बताते हैं, ‘इस बार भी लोकसभा सदस्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अपने चहेतों को सभी पदों पर काबिज करा दिया.’ राज्य कांग्रेस के खजांची रहे ब्रह्मचारी हरिद्वार में कई राज्य स्तरीय कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं. पर वे इस बार हरिद्वार से पीसीसी को सदस्य बनने में सफल नहीं हो सके. ब्रह्मचारी के अनुसार वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में अधिक से अधिक समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए ‘कागजी परिस्थितियां’ निर्मित करने के फेर में इन क्षत्रपों ने अपने क्षेत्र के अलावा अन्य लोकसभा क्षेत्रों में भी जमकर दखलअंदाजी की.

असंतुष्टों में सबसे मुखर खेमे के कांग्रेसियों ने पूर्व विधायक कुंवर सिंह नेगी, प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट, राजेंद्र शाह व सब्बल सिंह राणा के नेतृत्व में प्रदेश के 13 जिलों में से 10 में बैठकें कीं. पिछले दिनों इन नेताओं ने नौ जिलों में संगठन के चुनावों में हुई अनियमितताओं की एक रिपोर्ट बनाकर उत्तराखंड में कांग्रेस चुनाव के लिए गठित प्राधिकरण के अध्यक्ष मुकुट मिथी को दिल्ली में सोंपीं.

असंतुष्टों का आरोप है कि टिहरी जिले के जौनपुर ब्लॉक (थत्यूड़) में सर्वसम्मति से देवी सिंह चौहान पीसीसी सदस्य चुने गए थे. उनके पास ब्लॉक चुनाव अधिकारी(बीआरओ) प्यारेलाल हिमानी के हस्ताक्षर का पत्र भी है.  परंतु बाद में उनका नाम काट दिया गया। इसी तरह थौलधार ब्लॉक से जोत सिंह बिष्ट को निर्विरोध पीसीसी सदस्य चुना गया था. वे थौलधार के ब्लॉक प्रमुख भी रहे हैं. लेकिन बाद में वहां से टिहरी के लोकसभा सदस्य विजय बहुगुणा का नाम पीसीसी के लिए भेज दिया गया. बिष्ट का आरोप है कि ‘हर स्तर पर चुनाव में बेईमानी हुई है. संगठन की मतदाता सूचियां तक गोपनीय रखी गई. कुछ लोगों ने फर्जी सदस्यता के दम पर संगठन पर कब्जा जमाने की कोशिश की है जिससे पूरी चुनाव प्रक्रिया से जमीनी कार्यकर्ता गायब हैं.’ असंतुष्टों की रिपोर्ट के अनुसार पूरे टिहरी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव के दौरान पार्टी द्वारा तय आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया गया. यहां से आरक्षित 16 पीसीसी सीटों में से केवल 2-3 पर ही आरक्षित वर्ग के नुमाइंदे पीसीसी में भेजे गए. टिहरी में जिलाध्यक्ष कीर्ति सिंह नेगी तीसरी बार जिलाध्यक्ष चुन लिए गए जबकि आरोप है कि इस पद के अन्य दावेदार विक्रम सिंह पंवार को नामांकन फार्म तक नहीं दिया गया.

‘राज्य के लगभग सभी जिलों में पार्टी संविधान और चुनाव प्रक्रिया की घोर अवहेलना हुई है,’असंतुष्टों के नेता और पूर्व विधायक कुंवर सिंह नेगी आरोप लगाते हैं. राज्य के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नेगी भी रुद्रप्रयाग जिले से पीसीसी नहीं जा पाए हैं. उनका आरोप है कि सदस्यता फॉर्मों की छानबीन का काम जिलाध्यक्षों को दे दिया गया था जिन्होंने अपने चहेतों के तो आधे-अधूरे फार्म भी जमा कर लिए परंतु विपक्षियों के रास्ते में तरह-तरह की बाधाएं खड़ी कीं.

रिपोर्ट के अनुसार रुद्रप्रयाग जिले में डेलीगेटों की बैठक तक नहीं कराई गई और चुनाव प्रक्रिया एक दुकान से संचालित कर अखबारों में पदाधिकारियों के नाम घोषित कर दिए गए. रुद्रप्रयाग  के जिला चुनाव अधिकारी (डीआरओ) व पूर्व विधायक अनुसूया प्रसाद मैखुरी स्वीकार करते हैं कि रुद्रप्रयाग में चुनाव प्रक्रिया एक कार्यकर्ता की दुकान से संचालित की गई, मगर ऐसा किए जाने का कारण वे जिले में कांग्रेस का कोई कार्यालय न होने को बताते हैं. वे कहते हैं, ‘पार्टी के कुछ लोग चुनाव प्रक्रिया को ठीक से नहीं समझ पाए हैं, इसलिए चुने गए लोगों का विरोध कर रहे हैं.’ किंतु राज्य आंदोलनकारी रहे कांग्रेसी नेता राजेंद्र शाह खुली चेतावनी देते हुए कहते हैं, ‘पिछले दरवाजे से संगठन में घुस रहे इन दागियों, बागियों और रागियों (चाटुकारों) को पार्टी पदों पर काबिज होने नहीं दिया जाएगा.’ वे बताते हैं कि आपराधिक मुकदमों के बावजूद कई लोग पीसीसी की सूची में हैं.

संगठन के इन चुनावों में कुमाऊं के 6 जिलों में से केवल पिथौरागढ़ व चंपावत में ही नए जिलाध्यक्ष चुने गए हैं. ये जिले अल्मोड़ा के सांसद प्रदीप टम्टा के लोकसभा क्षेत्र में आते हैं. हटाए गए जिलाध्यक्ष उनके समर्थक माने जाते हैं. बाकी चार जिलों में पहले के जिलाध्यक्षों की ही फिर से ताजपोशी कर दी गई. पिथौरागढ़ से पूर्व अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट बताते हैं, ‘पिथौरागढ़ के 4,000 सदस्यों की सूची तक गायब है. उनका पैसा कहां गया यह तक किसी को पता नहीं है.’पिछले 10 साल से चंपावत की जिलाध्यक्षा रहीं निर्मला गहतोड़ी बताती हैं कि जिन लोगों ने वर्ष 2002

व 2007 के चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों के विरुद्ध खुलकर प्रचार किया, चुन-चुनकर उन्हें ही पदाधिकारी बनाया गया है. जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक इस बार पीसीसी की सूची में 8 लोग ऐसे हैं जिन्होंने 2007 में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ा था. जबकि कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े 7 लोगों के नाम इसमें हैं ही नहीं. इनमें 25 साल से एआईसीसी के सदस्य रहे दिग्गज कांग्रेसी शूरवीर सिंह सजवाण भी हैं. उनका आरोप है कि इस सूची में ब्लॉक इकाइयों द्वारा सर्वसम्मति से भेजे गए 9 राज्य आंदोलनकारियों के भी नाम काट दिए गए हैं और 11 कांग्रेसियों को दूसरे जिलों से पीसीसी में भेजा गया है.

इन असंतुष्टों ने उत्तरकाशी, नैनीताल व उधमसिंह नगर जिलों में हुई अनेक अनियतिताओं को रिपोर्ट के जरिए हाईकमान को पेश किया है. इस रपट में पौड़ी जिले की भी कुछ मामूली शिकायतें हैं परंतु चमोली, अल्मोड़ा, हरिद्वार व बागेश्वर जिलों की अनियमितताओं का कोई जिक्र नहीं है. लेकिन हरिद्वार में एकतरफा जिलाध्यक्ष घोषित करने व चुनावों में हुई धांधलियों के आरोपों को लेकर पिछले एक महीने से कांग्रेसियों का पुतला फूको कार्यक्रम चल रहा है. यहां के कांग्रेसी नेता राजेंद्र कुमार चौधरी ‘जाट’ बताते हैं कि उनके अलावा मैदान में रहे दो अन्य प्रत्याशियों में से एक ने उनके समर्थन में नामांकन वापस ले लिया था. चुनाव की घोषित तिथि 15 जुलाई को जब पांच बजे तक चुनाव अधिकारी हरिद्वार नहीं आए तो उन्होंने उसी दिन दिल्ली जाकर मुकुट मिथी और आस्कर फर्नाडीज के पास शिकायत दर्ज करा दी. राजेंद्र जाट का दावा है कि हरिद्वार में डीसीसी के 72 में से 41 डेलीगेटों का लिखित समर्थन उनके साथ है फिर भी राजेन्द्र चौधरी को फिर से जिलाध्यक्ष बना दिया गया. हरिद्वार के कांग्रेसी बताते हैं कि ब्रह्मचारी जैसे वरिष्ठ नेता को 100 रुपए की सदस्यता वाली पर्ची कटाने के लिए अपनी एड़ियां घिसनी पड़ गई थीं.

इसी तरह अल्मोड़ा जिले के वरिष्ठ कांग्रेसी व प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सचिव केवल सती कहते हैं, ‘अल्मोड़ा में चुनाव अधिकारियों ने कार्यकर्ताओं की बैठकें तक नहीं की, बस 100 रूपए और 2 फोटो ले लिए.’ अल्मोड़ा की 13 ब्लॉक व नगर इकाइयों में से आधे में तो कुल पोलिंग बूथों के 50 फीसदी सदस्य न होने के बावजूद चुनाव हो गए. पार्टी  संविधान के अनुसार यह गलत है. अल्मोड़ा के असंतुष्ट कांग्रेसी भी दिल्ली जाकर आस्कर फर्नाडीज व आरके धवन को अपना दुखड़ा सुना चुके हैं. असंतुष्ट कांग्रेसियों की जिलेवार वैठकें कर रहे इस गुट के चार कांग्रेसियों(नेगी, बिष्ट, शाह व राणा) को कांग्रेस की राज्य अनुशासन समिति ने कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है. समिति के अध्यक्ष व पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह भंडारी के अनुसार ‘इन कांग्रेसियों के अपनी शिकायतें उचित फोरम मंे न उठाने की वजह से पार्टी की बदनामी हुई है.’ असंतुष्ट खेमे का मानना है कि ‘गुपचुप व फर्जी चुनाव कराने के लिए दोषी चुनाव अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि ये कृत्य भी अनुशासनहीनता के दायरे में आते है’.

कांग्रेस कार्यकर्ता व टिहरी के एडवोकेट ज्योति भट्ट दावा करते हैं कि उन्होंने चुनावों में हुई धांधलियों की याचिका जून में राज्य चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मुकुट मिथी के सामने दायर की थी. कुछ न होने पर उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष आस्कर फर्नाडीज से शिकायत की. भट्ट धमकी देते हैं कि अगर कार्रवाई न हुई तो वे न्यायालय की शरण लेंगे क्योंकि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को संगठन के चुनाव निष्पक्ष कराना आवश्यक हैं.

‘हर लोकसभा चुनाव क्षेत्र में पदाधिकारी बनने वाले अधिकांश कांग्रेसी वर्तमान सांसद के गुट के हैं.’ वरिष्ठ पत्रकार हरीश जोशी बताते हैं कि जिस गुट की जहां चली उसने दूसरे का समूल नाश कर दिया. संगठन चुनावों से खिन्न एक कांग्रेसी कार्यकर्ता कहते हैं, ‘कार्यकर्ताओं को सम्मान देना तो महज एक नारा है. असल में जमीनी कार्यकर्ताओं की किसी को परवाह ही नहीं है.’

कीड़ा जड़ी पीड़ा सरकारी

उत्तराखंड में चमोली जिले के जोशीमठ-नीति मार्ग पर स्थित छोटे-छोटे गांवों के बाजारों में आपको मोटरसाइकिलों के महंगे से महंगे मॉडल देखने को मिल जाएंगे. ऊंचाई पर स्थित इलाकों के युवाओं ने ये बाइकें 15 दिनों से लेकर दो महीनों की कड़ी मेहनत और जबरदस्त खतरा उठा कर की गई कमाई से खरीदी हैं. ये लोग मई से लेकर जुलाई तक 3200-4000 मीटर की ऊंचाई वाले हिमालय के सब एल्पाइन क्षेत्र में पैदा होने वाली एक जड़ी निकालने जाते हैं. आकार में कीड़े जैसी होने की वजह इसे स्थानीय भाषा में कीड़ा जड़ी कहते हैं और इसका मूल्य अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 16-20 लाख रु. प्रति किलोग्राम तक है. इसके व्यापार पर प्रतिबंध तो नहीं है पर इसके लिए दोहन व विपणन की स्पष्ट नीति का अभाव जरूर है. यही वजह है कि इस जड़ी का दोहन करने वालों के लिए ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों के स्वाभाविक प्राकृतिक खतरे और सरकार के कई विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों की दहशत, दोनों रहते हैं.

औसतन बाजार भाव 4 लाख रुपया प्रति किलो भी मानें तो यह मोटे तौर पर यह 600 करोड़ सालाना की आर्थिकी है

चीन, हांगकांग, कोरिया व ताईवान के अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीड़ा जड़ी का व्यापारिक नाम यारसा गंबू है. जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान, गोपेश्वर में वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट बताते हैं, ‘उच्च हिमालयी क्षेत्रों की एक तितली के लार्वा पर फफंूद के संक्रमण से जंतु-वनस्पति की यह साझा विशिष्ट संरचना बनती है. इसका वानस्पतिक नाम ‘कार्डिसैप्स साईनोन्सिस’ है और इसे फंगस परिवार के समूह में रखा गया है.’ पिथौरागढ़ में राजकीय महाविद्यालय के जंतु विज्ञान के प्रवक्ता सीएस नेगी के अनुसार, कीड़ा जड़ी का आधा भाग जमीन के नीचे व आधा ऊपर रहता है. आम तौर पर कीड़ा जड़ी की लंबाई 7 से 10 सेमी होती है लेकिन डॉ. भट्ट बताते हैं कि इसी साल पिथौरागढ़ जिले की जौहार घाटी में वनकटिया बुग्याल (उच्च हिमालयी घास के मैदान) में दोहन करने वालों के साथ उन्हें एक फीट लंबी यारसा गंबू भी मिली है. डॉ. भट्ट के अनुसार न निकालने पर भी यह फंगस खुद ही समाप्त हो कर मिट्टी में मिल जाता है इसलिए नियंत्रित दोहन से इसके विलुप्त होने का खतरा नहीं रहता. 

चीन की परंपरागत चिकित्सा पद्धति के अलावा यारसा गंबू का प्रयोग दवा निर्माता यौन उत्तेजक  और शक्ति वर्धक दवाओं को बनाने में भी करते हैं. स्थानीय व्यापारी बताते हैं कि चीन में आयोजित पिछले ओलंपिक खेलों से पहले यारसा गंबू के भावों में जबरदस्त उफान आया था. उस समय चीनी खिलाड़ियों द्वारा इसे शक्ति वर्धक स्टेरॉयड के रूप में प्रयोग करने की खबरें भी प्रमुखता से छपी थीं. नेगी के अनुसार जंतु-वनस्पति आधारित होने के यारसा गंबू डोपिंग जांच के दौरान पकड़ में नहीं आ पाती. 

पिथौरागढ़ जिले के भेड़ पालक व चीन युद्ध से पहले तिब्बत में व्यापार करने वाले भारत के व्यापारी यारसा गंबू के औषधीय महत्व को सदियों से जानते थे. परंतु अचानक समझ में आए व्यापारिक महत्व के बाद अब वर्ष 1991 के बाद पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र के सीमांत ग्रामवासी या नेपाली बुग्यालों में कीड़ा जड़ी का दोहन व व्यापार करते हैं. उत्तराखंड में कीड़ा जड़ी के संग्रहण का कार्य मुख्यतया पिथौरागढ़, चमोली, बागेश्वर जिलों में व बहुत ही छुटपुट मात्रा में रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी जिलों में होता है. मोटे अनुमान के अनुसार स्थानीय निवासियों के द्वारा इन सभी जिलों में साल भर में लगभग 150 क्विंटल कीड़ा जड़ी का संग्रहण किया जाता है. यदि औसतन बाजार भाव चार लाख रुपए प्रति किलो भी माना जाए तो यह मोटे तौर पर यह 600 करोड़ सालाना की आर्थिकी है. यह पैसा राज्य के कुछ दर्जन सीमांत व दूरस्थ गांवों के ग्रामीणों के बीच बंटता है. इन गांवों में खेती ज्यादा नहीं हो पाती इसलिए यारसा गंबू इनके लिए वरदान बनकर आई है. एक दिन में एक ग्रामीण आम तौर पर 5-7 से 30-40 तक यारसा गंबू का संग्रह कर लेता है. बाजार में प्रति यारसा गंबू 150 रुपए के भाव से बिकती है. इस तरह 100 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी करने वाला व्यक्ति एक दिन में 4500 रुपए तक कमा सकता है और एक सीजन में किसी व्यक्ति को दो से लेकर छह लाख रुपए तक की आय हो सकती है. पिछले 10-15 साल में इस पैसे से उपजी समृद्धि  को जोशीमठ, घाट, बागेश्वर, धारचूला व मुनस्यारी तहसीलों के दूरस्थ गांवों में लोगों के जीवन स्तर में आए बदलाव से महसूस किया जा सकता है. हालांकि ग्रामीणों को इस समृद्धि की कीमत भी अच्छी-खासी चुकानी पड़ती है. यारसा गंबू ढूंढ़ने के लिए स्थानीय लोग उच्च हिमालयी बर्फीले क्षेत्र में महीनों तक खुले आसमान अथवा कपड़े के तंबुओं में रहते हैं. इस दौरान या बाद में ये ग्रामीण आम तौर पर निमोनिया, फ्रॉस्टबाईट जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं.

यारसा गंबू पर न तो आयात-निर्यात शुल्क निर्धारित है न ही इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कोई प्रक्रिया तय हुई है

लेकिन इस मुद्दे का दूसरा पक्ष यह है कि मीडिया में करीब दो दशक से चर्चित होने के बावजूद सरकार के स्तर पर यारसा गंबू के विदोहन व विपणन की कोई सुस्पष्ट नीति नहीं बन पाई है. वन विभाग द्वारा जारी राज्य में प्रतिबंधित या विदोहन होने वाली 83 जड़ी-बूटियों की सूची में यारसा गंबू को किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया है. मुख्य वन संरक्षक (प्रशासन) डॉ. राकेश शाह कहते हैं, ‘यारसा गंबू राज्य में प्रतिबंधित प्रजाति नहीं है. शासन  की नीतियों व राज्य स्तरीय जड़ी-बूटी विदोहन समिति के निर्णयों के अनुसार वन पंचायतें स्थानीय ग्रामीणों द्वारा वन क्षेत्रों में यारसा गंबू का नियमतः दोहन करा सकती हैं.’

राज्य बनने के बाद यारसा गंबू के विदोहन व विपणन के संबध में 10 जनवरी, 2001 को  सरकार ने एक आधा-अधूरा शासनादेश जारी किया था. इस शासनादेश में यारसा गंबू को बिना श्रेणीबद्व किए ही वन भूमि से इसके संग्रहण के अधिकार वन पंचायतों को दिए गए. वन पंचायतें अपनी सीमा के भीतर आने वाले सदस्यों द्वारा एकत्र यारसा गंबू के विक्रय मूल्य का पांच प्रतिशत बतौर रॉयल्टी वसूल कर इसकी बिक्री कर सकती थीं. आम ग्रामीण संग्रहणकर्ताओं को आंशिक अधिकार व राहत देने वाला यह शासनादेश दोहन को नियंत्रित करने के नाम पर 16 अक्टूबर, 2007 को प्रमुख सचिव व आयुक्त (वन एवं ग्राम्य विकास विभाग) द्वारा संशोधित कर दिया गया. नई प्रक्रिया में वन पंचायतों को सिर्फ संग्रहण के अधिकार दिए गए. संग्रहण के बाद यारसा गंबू के विक्रय का कार्य वन विकास निगम, भेषज संघ व कुमाऊं मंडल विकास निगम जैसी सरकारी संस्थाओं को दे दिया गया. वन विकास निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक एसपी सुबुद्धि के अनुसार शासनादेश में वन पंचायतों को यारसा गंबू मंडी में लाते ही 45 हजार प्रति किलोग्राम का आधार मूल्य देने का प्राविधान भी रखा गया है. बाकी का धन विक्रेता वन पंचायत को यारसा गंबू की नीलामी के बाद दिया जाता है. सुबुद्वि के अनुसार पिछले साल ऋषिकेश मंडी में चमोली जिले से एकत्र कर लाया गया 1.25 किलो यारसा गंबू  1.76 लाख रु. के भाव से बेचा गया. यह बाजार मूल्य के आधे से भी कम था. 2007 में जब यह शासनादेश जारी किया गया था तो उस समय भी खुले बाजार में यारसा गंबू 2 लाख रुपए किलो बिक रहा था जो अब 4 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है. 

यों तो इस संशोधन में ग्रामीण संग्रहकर्ताओं को दिखाने के लिए राहत यह थी कि वे 5000 रु. प्रति किलोग्राम की रॉयल्टी अदा कर अपने द्वारा एकत्र यारसा गंबू को वन पंचायत से प्रमाणित कराने के बाद कहीं से भी बिक्री हेतु रवन्ना (माल परिवहन अधिकार पत्र) प्राप्त कर सकते थे. लेकिन रवन्ना जारी करने के अधिकार वन पंचायतों से छीनकर वापस वन विभाग को देने से यारसा गंबू के बड़े व्यापारियों, माफियाओं और इस काम में मोटी मलाई खा रहे वन व पुलिस अधिकारियों के मजे आ गए. पूरे सीजन में 100-200 ग्राम से अधिकतम एक-डेढ़ किलोग्राम तक यारसा गंबू एकत्र करने वाले सीमांत आम ग्रामीण के लिए सरकारी मशीनरी से रवन्ना हासिल करना खासा मुश्किल काम होता है. माफिया इसका फायदा उठाते हुए बाजार भाव से पांचवें हिस्से से भी कम मूल्य पर ग्रामीणों से यारसा गंबू खरीदते हैं. सरकारी संस्थाएं ग्रामीणों को यारसा गंबू का उचित मूल्य दिलवाने में असफल रही हैं. 2008 में कुमाऊं मण्डल विकास निगम ने मुनस्यारी तहसील की वन पंचायतों से जमा 16.6 किलोग्राम यारसा गम्बू की नीलामी कराई जिसमें 7.9 किलो जड़ी, 1.82 लाख प्रति किलो व 300 ग्राम 1.6 लाख प्रति किलोग्राम की दर से ही बिक सकी जबकि उस साल बाजार मूल्य 3.5 लाख रु. प्रति किलो चल रहा था. कम मूल्य मिलने व पैसा मिलने की कोई समय सीमा न होने के कारण कोई भी ग्रामीण या वन पंचायत सरकारी संस्थाओं को कीड़ा जड़ी देने को तैयार नहीं होती.  मुनस्यारी में फल्याटी वन पंचायत के सरपंच बलवंत सिंह कहते हैं, ‘जब 3.50 से 4 लाख रु. घर बैठे ही मिल रहे हों तो भला कोई नुकसान क्यों उठाएगा?’

स्पष्ट नीति न होने और सरकारी संस्थाओं द्वारा कम मूल्य मिलने और बहुमूल्य होने के कारण यारसा गंबू के पूरे कारोबार का जबर्दस्त माफियाकरण हो चुका है. सरकारी संस्थाओं को कीड़ा न देकर व्यापारियों को देने में कई ग्रामीण पकड़े जाते हैं. माफिया ग्रामीणों के हर कदम की मुखबरी करते हैं और मौका लगते ही उन्हें फंसा देते हैं. चमोली के कई गांवों में विदोहन के क्षेत्राधिकार को लेकर ग्रामीणों के बीच बुग्यालों ही में हिंसक संघर्ष भी हो चुके हैं. पिथौरागढ़ जिले के भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र के कुछ व्यवसायियों की हत्या को भी इसके कारोबार से जोड़कर देखा जा रहा है. उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग प्रतिवर्ष औसतन 8-10 लोगों की मृत्यु को यारसा गंबू संग्रहण से जुड़ी दुर्घटनाओं से जोड़कर देखता है. 2006 में धारचूला तहसील के रांथी गांव की पांच महिलाओं व बच्चों की मौत यारसा गंबू ढंूढते हुए खाई में गिरने से हो गई. ऐसे कई उदाहरण हैं.

जहां ग्रामीण इसके संग्रहण में अपने स्वास्थ्य व जान का जोखिम ले रहे हैं वहीं छोटे-छोटे स्थानीय व्यापारी सरकारी व्यापारिक संस्थाओं व वन विभाग की जटिल प्रक्रिया से बच कर सीधे व्यापारियों को बेचने के लालच में पुलिस की गिरफ्त में पहुंच रहे हैं. डीडीहाट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रघुनाथ सिंह चौहान कहते हैं, ‘यों तो कानूनन  यारसा गंबू किसी भी दृष्टिकोण से अवैध या प्रतिबंधित सामग्री नहीं है. परन्तु पुलिस यारसा गंबू के मामलों को वन अधिनियम की धाराओं  2 (4) व 4/26 में पंजीकृत करती है और मामले को अधिक जटिल बनाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 379, 411 भी लगा देती है.’ पिथौरागढ़ के तीन न्यायालयों में 17, चंपावत में सात व बागेश्वर में 5 मामले इस वक्त विचाराधीन हैं. यारसा गंबू से जुडे़ जिन तीन मामलों में अब तक न्यायालयों से निर्णय आए हैं उन सभी में यारसा गंबू के व्यवसाय को वैध मानते हुए अभियुक्तों को बाइज्जत बरी किया गया है. फिर भी पुलिस नए मामले बनाते जा रही है. हाल ही में 22 अगस्त, 2010 को पिथौरागढ़ जिले के जौलजीबी थाने की पुलिस टीम ने बरम में 8.5 किलोग्राम यारसा गंबू के साथ दो लोगों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार मनोज सिंह ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस ने 13 की बजाय 8.50 किलो ही कागजों में दर्ज किया है और बाकी यारसा गंबू बिना लिखा-पढ़ी के हड़प लिया है. 26 जुलाई को एक चीनी नागरिक झा-झेन हांग को यारसा गंबू के साथ अल्मोड़ा में गिरफ्तार किया गया.

केंद्र सरकार ने यारसा गंबू पर आयात-निर्यात शुल्क भी निर्धारित नहीं किया है. न ही इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए कोई प्रक्रिया तय हुई है. पिथौरागढ़ जिले से कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग से ही भारत-चीन व्यापार भी खुला हुआ है. एक बड़ी विडम्बना यह है कि यारसा गंबू का अंतिम बाजार चीन होने के बावजूद इसको चीन-भारत व्यापार के लिए चयनित वस्तुओं की सूची में नहीं रखा गया है.  पास में यात्रा व्यापार मार्ग और बाजार होने के बावजूद भारत के व्यापारियों को अपना माल चोरी-छिपे नेपाल ले जाकर बेचना पड़ता है. पिछले वर्षों तक दिल्ली के खारी-बावली बाजार में चल रही यारसा गंबू की खरीद-फरोख्त भी इस साल वहां के व्यापारियों ने बंद कर दी है. उनका तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की स्पष्ट नीति न होने के कारण उन्हें भी यह माल चोरी से ही नेपाल पहुंचाना होता है. हालांकि कई स्थानीय व्यापारी यह भी स्वीकारते हैं कि इस कठिनाई के बावजूद मोटे मुनाफे के चलते वे इस कारोबार को छोड़ भी नहीं सकते. 

कीड़ा जड़ी का काम करने वाले ग्रामीण कहते हैं कि राज्य व केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता ने बहुमूल्य यारसा गंबू के व्यापार को ड्रग्स के काले कारोबार की तरह पेचीदा बना दिया है. उधर, दक्षिण-एशिया में यारसा गंबू की सबसे बड़ी अंतर्राष्ट्रीय मंडी में परिवर्तित हो चुके नेपाल में इसके व्यापार की एक स्पष्ट नीति है. वहां की सरकार ने यारसा गंबू को जड़ी-बूटियों के साथ सूचीबद्व करते हुए इस पर 20 हजार रु. प्रतिकिलो की रॉयल्टी निर्धारित की है. धारचूला (पिथौरागढ़) की सीमा से लगे नेपाल के दार्चूला के एक वनाधिकारी बताते हैं, ‘नेपाल सरकार ने चीन-हांगकांग, ताइवान व कोरिया के साथ यारसा गंबू के व्यापार की सहमति तय की है. इस पर निर्यात शुल्क भी तय किया गया है. इसलिए 1992 में 1.50 लाख नेपाली रु. के भाव पर खरीदा-बेचा जा रहा यारसा गंबू नेपाल में आज 10-12 लाख प्रति किलो व चीन-ताइवान में 16-20 लाख रु. प्रति किलो की ऊंचाइयां छू रहा है.’

लेकिन उत्तराखंड में हालात इतने अच्छे नहीं हैं. अखिल भारतीय किसान महासभा मुनस्यारी के अध्यक्ष सुरेंद्र बृजवाल का मानना है कि राज्य सरकार को केंद्र से मिलकर यारसा गंबू के संग्रहण व विपणन की एक सुस्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनवानी चाहिए. वे कहते हैं, ‘इसके संग्रहण व व्यापार पर लगने वाले सभी करों, वन रॉयल्टी, वैट व आयात-निर्यात करों का निर्धारण कर इसे चीन-भारत व्यापार में सम्मिलित किया जाना चाहिए. तभी स्थानीय ग्रामीण शोषण व उत्पीड़न से बच सकते हंै. नहीं तो जो यारसा गंबू राज्य के सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था के लिए कहीं बड़ा संसाधन बन सकता था वह यहां के लोगों के लिए दहशत व परेशानी का सबब बन गया है.’

(पिथौरागढ़ से जगत मर्तोलिया व हल्द्वानी से मोहन भट्ट के सहयोग के साथ)

नतीजे पर निगाह

बहुचर्चित रामजन्मभूमि/बाबरी विवाद के मालिकाना हक के मुकदमे का फैसला सितंबर में आना है. इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुईं हैं. उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों सरकारों में इस फैसले को लेकर बेचैनी दिखाई दे रही है. लेकिन अयोध्या के बाशिंदों में इसे लेकर कोई असहजता नजर नहीं आती. कुछ दिन पहले ही खत्म हुए झूलनोत्सव के मेले और रेले में आप अगर इस फैसले पर आम आदमी की रायशुमारी करते तो सामान्यतः आपको दो ही तरह के लोग मिलते. एक वे जिनका कहना है कि यह मुद्दा बहुत लंबा खिंच चुका है और अब इसका अंत होना चाहिए. और दूसरे जो इस फैसले के आने से ही नावाकिफ हैं.

अयोध्या स्थित विश्वहिंदू परिषद की कार्यशाला में मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम दो साल से बंद है

लेकिन आम आदमी के उलट उत्तर प्रदेश के ‘समझदार’ लोगों में कोई भी इस मुद्दे से नावाकिफ नहीं है. उन्हें फैसले का इंतज़ार तो है ही, इसके आगे भी सोचा जा रहा है. विवादित स्थल के मालिकाना हक के मुकदमे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 26 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था. इसके बाद उच्च न्यायालय की विशेष पूर्णपीठ ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए सुलह कराने की कोशिश भी की थी. पीठ ने इसके लिए दोनों पक्षों को अलग-अलग बुलाकर उनसे बात की. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

विवादित स्थल के मालिकाना हक़ को लेकर मुकदमेबाजी का सिलसिला 1950 में तब शुरू हुआ था जब फैजाबाद की दीवानी अदालत में गोपाल सिंह विशारद ने विवादित स्थल पर पूजा करने की अनुमति दिए जाने संबंधी याचिका दायर की थी. इसके बाद अप्रैल,1950 में दूसरा मुकदमा, जो महंत रामचंद्र परमहंस बनाम जहूर अहमद एवं अन्य का था, दाखिल किया गया (इसे बाद में वापस ले लिया गया). तीसरा दावा 1951 में निर्मोही अखाड़ा बनाम प्रियदत्त राम एवं अन्य का आया. चौथा मुकदमा 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद के नाम से चलना शुरू हुआ. और पांचवां दावा रामलला विराजमान की तरफ से 1989 में दायर किया गया. तब तक इन सभी मामलों की सुनवाई फैजाबाद की दीवानी अदालत में ही हो रही थी. इसी साल उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता शांतिस्वरूप भटनागर ने राज्य सरकार की तरफ से एक अर्जी उच्च न्यायालय में दी कि चूंकि विवादित स्थल के मालिकाना हक के ये मुक़दमे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इनकी सुनवाई उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में विशेष पूर्ण पीठ के जरिए हो. इसके बाद से इन मुकदमों की सुनवाई उच्च न्यायालय में होने लगी. अंततः 26 जुलाई को साठ साल बाद कहीं जाकर यह सुनवाई पूरी हो सकी. यहां एक उल्लेखनीय तथ्य ये भी है कि रामजन्मभूमि/बाबरी विवाद से संबंधित सबसे पहला मुकदमा आजादी से पहले 19 जनवरी, 1885 को फैजाबाद की निचली अदालत में दाखिल हुआ था. तब महंत रघुबर दास ने बाबरी मस्जिद के सामने स्थित राम चबूतरे (जिसे भगवान राम का जन्म स्थान माना जाता है) पर पूजा करने का अधिकार मांगा था. मगर अदालत ने इस मामले को ख़ारिज कर दिया था.

जमाते इस्लामी-ए-हिंद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष सैयद मोहम्मद अहमद कहते हैं कि अगर फैसला पक्ष में नहीं आता है तो सुप्रीम कोर्ट में जाया जा सकता है. लेकिन इसके खिलाफ सड़क पर उतरना ठीक नहीं

अयोध्या स्थित विश्व हिंदू परिषद् की रामजन्मभूमि कार्यशाला में मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों को तराशने का काम पिछले दो सालों से बंद है. कार्यशाला के मुख्य व्यवस्थापक नागेंद्र उपाध्याय कहते हैं, ‘यहां का सत्तर फीसदी काम तो हो चुका है. लेकिन अब यहां जगह नहीं बची है, इसलिए पत्थर नहीं तराशा जा रहा. फैसला पक्ष में आने के बाद यहां काम फिर शुरू हो जाएगा. लेकिन मुझे इस बात पर संदेह है कि फैसला आने के बाद इस मामले पर चली आ रही लंबी लड़ाई ख़त्म हो पाएगी.’ इसी कार्यशाला के परिसर में गायत्री देवी की पूजा सामग्री की दुकान है. गायत्री के मुताबिक मस्जिद ढहाए जाने से पहले तक अयोध्या में कुछ धार्मिक पृवृत्ति के लोग और साधु-संत ही आते थे. 1992 के बाद यहां अचानक भीड़ बढ़नी शुरू हो गई. गायत्री कहती हैं, ‘पूरे देश में इस मुद्दे को हिंदू बनाम मुसलमान के रूप में देखा जाता है लेकिन यह बिलकुल गलत है. यह लड़ाई उन लोगों के बीच है जो अपने फायदे के लिए इसे ख़तम नहीं होने देना चाहते. फैसला चाहे जो हो, इस बार अयोध्या में शांति रहनी चाहिए.’

कोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में शांति बनी रहे इस चिंता में प्रदेश और केंद्र सरकारों की नींद उड़ी हुई है. खासकर उत्तर प्रदेश सरकार तो कुछ ज्यादा ही बेचैन नज़र आ रही है. वह अपनी तरफ से तो शांति के इंतजाम करने में जुटी ही है साथ ही केंद्र सरकार से भी सहयोग के हरसंभव प्रयास कर रही है. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने 10 अगस्त को प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर अयोध्या फैसले के बाद शांति बनाए रखने के लिए अर्धसैनिक बलों की 350 कंपनियों की मांग की थी. इसके बाद उन्होंने 108 और कंपनियों की मांग कर दी. उत्तर प्रदेश सरकार के इस रवैए ने केंद्र की बेचैनी को भी बढ़ा दिया है. 23 अगस्त को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अयोध्या मुद्दे पर कोर्ट के फैसले से पहले एहतियातन उठाए जा सकने वाले कदमों पर विचार के लिए कैबिनेट सदस्यों और शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक भी की, जिसमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, रक्षामंत्री एके एंटनी, गृहमंत्री पी चिदंबरम, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और इंटेलिजेंस ब्यूरो के मुखिया राजीव माथुर भी शामिल थे. बैठक में तय हुआ कि उत्तर प्रदेश में शांति व्यवस्था को लेकर केंद्र की तरफ से कोई लापरवाही नहीं की जाएगी. उधर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी तरफ से एहतियाती कदम उठाते हुए प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद करना शुरू कर दिया है. इसके तहत 19 अतिसंवेदनशील जिलों में पांच-पांच और 15 संवेदनशील जिलों में तीन-तीन और अन्य जिलों में दो-दो पीएसी की कंपनियां तैनात कर दी गईं हैं. पुलिसकर्मियों की छुट्टियों पर भी अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी गई है.

फैसले को लेकर मुक़दमे के दोनों पक्ष भी तैयार खड़े हैं. हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन राव भागवत ने नागपुर में यह कहकर इस मुद्दे को और गरमा दिया है कि सहमति से बने या संघर्ष से राम मंदिर ज़रूर बनेगा. 16 जुलाई को अयोध्या के कारसेवकपुरम में समाप्त हुई विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय प्रबंधन समिति की बैठक में फैसला किया गया कि विश्व हिंदू परिषद की तरफ से राम मंदिर निर्माण के पक्ष में माहौल बनाने के लिए जनजागरण अभियान चलाया जाएगा. इसी के तहत 16 अगस्त से देश भर में विहिप की तरफ से हनुमत शक्ति जागरण शुरू किया गया है. यह जागरण 17 दिसंबर तक चलेगा. विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय मीडिया प्रभारी शरद शर्मा इसे आने वाले फैसले के साथ जोड़ते हुए कहते हैं, ‘हनुमत शक्ति जागरण से देश में मंदिर के पक्ष में माहौल तो बनेगा ही साथ ही कोर्ट का फैसला भी हमारे पक्ष में होगा. फैसला आने के बाद मंदिर निर्माण के लिए आगे की योजना पर विचार किया जाएगा.’ मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे नयाघाट अयोध्या के महंत डॉ राघवेश दास वेदांती कहते हैं, ‘वैसे तो हमें उम्मीद है कि फैसला हमारे पक्ष में आएगा लेकिन अगर फैसला हमारे खिलाफ आया तो हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे.’ इस संदर्भ में जनांदोलन करने पर भी विचार किया जा रहा है. वहीं भारतीय जनता पार्टी के तेज़-तर्रार नेता विनय कटियार फैसले के बारे में पूछे जाने पर सिर्फ इतना बोलते हैं, ‘वहां मंदिर था, वहां मंदिर होना चाहिए, वहां मंदिर बनेगा.’

दूसरा पक्ष भी फैसले का इंतजार कुछ इसी अंदाज़ में कर रहा है. विवादित स्थल के मालिकाना हक़ के सबसे पहले मुक़दमे में गवाह रहे 90 साल के हाशिम अंसारी जब इसके बारे में बात करते हैं तो उनकी आंखों में गुस्सा तैर जाता है. वे कहते हैं, ‘मैं साठ साल से सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ रहा हूं. फैसला अगर हमारे खिलाफ हुआ तो हम सड़क पर उतरने नहीं जा रहे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ज़रूर जाएंगे.’ जमाते इस्लामी-ए-हिंद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष सैयद मोहम्मद अहमद कहते हैं कि अगर फैसला पक्ष में नहीं आता है तो सुप्रीम कोर्ट में जाया जा सकता है. लेकिन इसके खिलाफ सड़क पर उतरना ठीक नहीं. बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के अध्यक्ष और इस मामले के वकील ज़फरयाब जिलानी फैसले को लेकर बिलकुल साफ़ तौर पर कहते हैं, ‘इस मामले का सुप्रीम कोर्ट जाना एकदम तय है, क्योंकि फैसला जिस पक्ष के खिलाफ आएगा वह सुप्रीम कोर्ट जाएगा ही जाएगा. इसलिए ये मामला अभी और लंबा खिंचेगा.’ इस मामले के एक दूसरे गवाह हाजी महबूब बेहद नपे-तुले अंदाज़ में कहते हैं, ‘कोर्ट का जो भी फैसला हो, दोनों पक्ष उसे स्वीकार करें तो बेहतर है. क्योंकि इतने सालों के संघर्ष के बाद तो इसमें फैसले की घड़ी आई है.’ कोर्ट के  बाहर समझौते के बारे में बात करने पर वे कहते हैं, ‘मेरे पास अयोध्या में बहुत ज़मीन है मैं उसे बिना पैसे के ख़ुशी-ख़ुशी मंदिर के लिए दे सकता हूं लेकिन विवादित स्थल को लेकर पीछे नहीं हट सकता. ऐसा करना फिरकापरस्तों के सामने हार मानने जैसा है.’

फिलहाल निगाहें कोर्ट के नतीजे पर टिकी हैं – इंसान की भी और शायद भगवान की भी. 

पीपली लाइव के बाहर

हमारे सारे गंभीर या अगंभीर, स्थूल या सूक्ष्म, उदात्त या टुच्चे उपक्रम बस एक वर्ग को संबोधित और उसी वर्ग की दृष्टि से संचालित हैं

अनुषा रिजवी और महमूद फारूकी की बनाई ‘पीपली लाइव’ वाकई एक अच्छी फिल्म है. फिल्म का खरा यथार्थवाद हमारे समय के उस वक्र विद्रूप पर उंगली रखता है जिसके एक सिरे पर कर्ज और भूख के मारे किसानों की मजबूरी है तो दूसरे सिरे पर एक संवेदनहीन तंत्र की निहायत स्वार्थी मुद्रा. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के टुच्चेपन और भारतीय राजनीति के ओछेपन के घालमेल का यह स्याह-सफेद चित्रण भारतीय मध्यवर्ग का देखा-बनाया और किसानों का भोगा हुआ यथार्थ है- इतना जाना-पहचाना कि फिल्म देखकर निकलने वाले आम दर्शकों की पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि वे फिल्म नहीं, सच्चाई देख रहे थे. इसमें शक नहीं कि फॉर्म के स्तर पर भी निर्देशकों ने इस सच्चाई में न्यूनतम कला फेंटते हुए फिर यह याद दिलाया है कि महान कला वही होती है जो जीवन के सबसे करीब होती है.

लेकिन कम से कम दो बातें इस फिल्म में खटकती हैं. दुर्भाग्य से इन दोनों का वास्ता फिल्म की मूल कथा से है. एक तो यह कि यह फिल्म भारतीय राजनीति का, भारत के नीति-निर्माताओं और नियंताओं का काफी सपाट और इकहरा चित्रण करती है. वे मतलबी हैं, वे बेईमान हैं, वे बेमानी घोषणाएं करते हैं, उन्हें किसानों की नहीं, अपने चुनावों की परवाह है- यह सब पूरी तरह सच है, और यह सच इतना प्रत्यक्ष है कि जब फिल्म में सपाटपन के साथ भी आता है तो दर्शक इसे बेहिचक स्वीकार कर लेता है.

गैस-पेट्रोल तक की कीमतें बाजार के हवाले कर देने में विश्वास रखने वाली सरकारों को यह गवारा नहीं कि किसान अपनी जमीन की कीमत खुद तय करें लेकिन इस इकहरे सच के पीछे दूसरी और कहीं ज्यादा बड़ी विडंबना छुपी रह जाती है. जो लोग इस देश में संजीदा राजनीति करते हैं, जो अपने जानते देश की तरक्की के लिए नीतियां बनाते हैं, वे भी असल में गरीबों और किसानों के विरोधी हैं. बीते 20 साल में जो अबाध उदारीकरण अपने साथ कारोबार और रोजगार की अगाध संभावनाएं और एक नई आधुनिक जीवनशैली लेकर प्रगट हुआ है, जिसने इन वर्षों में भारतीय मध्यवर्ग का चेहरा और चरित्र लगभग पूरी तरह बदल डाला है, उसका एक उपनिवेशवादी स्वरूप भी है जो नत्था जैसे किसानों की नियति में दिखता है.

यह बात फिल्म में अलक्षित रह जाती है तो इसलिए कि यह फिल्म इस विडंबना पर नहीं, उस दूसरी विडंबना पर है जो इस नए दौर का नया मीडिया बना रहा है. लेकिन यहां भी संकट वही है. नत्था की खुदकुशी के लाइव प्रसारण के लिए इकट्ठा हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यह व्यावसायिक टुच्चापन इतना जाना-पहचाना है कि वह अपने अतिरेकों में भी विश्वसनीय लगता है. लेकिन इस टुच्चेपन से पैदा होने वाला और कुछ तमाशबीन और टीआरपी जुटाने के अपने इकलौते लक्ष्य के साथ बनाया और मिटाया जाने वाला यह तमाशा बेमानी चाहे जितना हो, उतना खतरनाक नहीं है जितना इस टुच्चेपन से अलग, खुद को संजीदा बताने वाला मीडिया-उपक्रम है. क्योंकि वह भी अपनी गंभीरता में, उस ज्यादा बड़ी सच्चाई को सामने लाने से बचता है जिसका वास्ता इस देश में मजबूत हो रहे नए साम्राज्यवाद से है- दुर्भाग्य से यह नव साम्राज्यवाद पहले की तरह सिर्फ अमेरिकी या पश्चिमी साम्राज्यवाद नहीं है, अब इसके ठेठ देसी एजेंट हैं जो एक बड़े और अविकसित भारत की छाती पर पांव रखकर एक छोटा-सा चमकता-दमकता भारत बना रहे हैं.

निश्चय ही यह सब न दिखा पाना ‘पीपली लाइव’ की कमजोरी नहीं है. एक माध्यम के रूप में उसकी अपनी सीमाएं हैं. फिर वह भी एक कारोबारी फिल्म है जिसमें मुनाफे का खयाल रखा जाना है, और इसलिए भले निर्देशिका इसे छोटे सिनेमाघरों की फिल्म बनाना चाहती थीं, आमिर खान ने इसे मल्टीप्लेक्स में ही उतारा, कोक पीने और पॉपकॉर्न खाने वाले दर्शक की वाहवाही लूटी और उनकी जेब खाली कर एक और बड़ी व्यावसायिक कामयाबी अपने नाम लिखी.

बहरहाल, इस टिप्पणी का मकसद फिल्म की समीक्षा नहीं है, बस यह याद दिलाने की कोशिश है कि हमारे सारे गंभीर या अगंभीर, स्थूल या सूक्ष्म, उदात्त या टुच्चे उपक्रम बस एक वर्ग को संबोधित हैं और उसी वर्ग की दृष्टि से संचालित हैं. यह अनायास नहीं है कि जिन दिनों ‘पीपली लाइव’ दर्शकों की वाहवाही लूट रही थी, उन्हीं दिनों अलीगढ़ के टप्पल नाम के गांव में किसान गोलियां खा रहे थे. ये महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के वे किसान नहीं थे जो कर्ज और मजबूरी में आत्महत्या कर रहे हों. ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खाते-पीते किसान थे जो विकास के नाम पर अपनी लहलहाती फसलों वाली जमीन छोड़ने को तैयार नहीं थे. सरकार ने पहले कुछ जमीन एक शानदार एक्सप्रेस हाइवे बनाने के नाम पर हथियाई और फिर बिल्डरों को देने के लिए और जमीन मांगी. इसी मुद्दे पर किसान अड़ गए. उनका कहना था कि रास्ते के नाम पर सस्ते में जमीन दे दी लेकिन बिल्डरों के लिए वे मुंहमांगे दाम लेंगे. लेकिन बाजार अर्थव्यवस्था पर भरोसा करने वाली और गैस-पेट्रोल तक की कीमतों को बाजार के हवाले कर देने में विश्वास रखने वाली सरकारों को यह गवारा नहीं हो रहा कि किसान अपने पुरखों की जमीन की कीमत खुद तय करें. मह्त्वपूर्ण बात यह है कि इन गांवों में सारे किसान जमीन बेचने को तैयार भी नहीं हैं. करोड़ों रुपए के प्रलोभन के बावजूद बहुत सारे किसानों को एहसास है कि उनकी जमीन ही उनकी जिंदगी का आधार है- इससे उजड़ेंगे तो वे हमेशा के लिए उखड़ जाएंगे. उधर सरकार को भरोसा है कि देर-सबेर, कुछ मुआवजा बढ़ाकर, कुछ डरा-धमकाकर, कुछ तरह-तरह से दबाव बनाकर- जिसकी पुष्टि अभी ही गांव वाले कर रहे हैं- वह जमीन ले लेगी और अपने मंसूबों का आशियाना बना डालेगी.

कॉमनवेल्थ खेल तो एक बीती हुई दुनिया की थकी हुई दोयम दर्जे की प्रतियोगिता का नाम है जिसकी स्मृति शायद ही किसी को रहती हो 18 दिन किसानों का आंदोलन चला, किसी ने ध्यान नहीं दिया. आखिरी तीन दिनों में मामला हिंसा तक पहुंचा तो मीडिया भी टप्पल पहुंच गया- यह बताने कि टप्पल के किसानों को नोएडा जैसा मुआवजा चाहिए. इस सुर में किसानों के लिए जितनी सहानुभूति थी, उससे ज्यादा सरलीकरण था जो यह देखने को तैयार नहीं था कि राज्य के समग्र विकास में इन इमारती मंसूबों और उनसे लगे एक्सप्रेस हाइवे पर दौड़ने वाली गाड़ियों की क्या भूमिका होगी.

फिर यह सहानुभूति उस दिन तो शत्रुता में बदल गई जब किसान दिल्ली चले आए. इसके बाद की खबर दिल्ली की मुश्किलों की खबर थी- उन कामकाजी लोगों की, जो वक्त पर दफ्तर नहीं जा पाए, उन बीमारों की जो समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाए, उन मजदूरों की, जिनकी दिहाड़ी बंद हो गई. शायद ही किसी चैनल ने यह सवाल पूछा कि आखिर अपना घर-बार, अपने खेत-खलिहान छोड़कर किसान इस तपती-बरसती दिल्ली में क्यों आए हैं. अगर पूछा भी तो इतने हल्के अंदाज में कि फर्ज भी पूरा हो जाए और किसी को फर्क भी न पड़े.

दरअसल, यह सिर्फ इकहरी या फौरी दृष्टि का मामला नहीं है, यह उस सुनियोजित उपक्रम का भी नतीजा है जिसके तहत एक ग्लोबल भारत बनाने और उसे पहचान दिलाने की कोशिश हो रही है. जब इस पहचान पर बट्टा लगता है, जब यह ग्लोबल भारतीयता शर्मसार होती है तो मीडिया अपने सबसे सख्त और तीखे रूप में दिखाई पड़ता है. इसका प्रमाण कॉमनवेल्थ खेलों की रोज ली जाने वाली खबर है. इसमें शक नहीं कि कॉमनवेल्थ खेलों की अराजक तैयारी और उसमें छुपे भ्रष्टाचार की पोल हाल के दिनों में मीडिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है. लेकिन यह अराजकता और भ्रष्टाचार सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों में नहीं, हमारी सारी योजनाओं में हर जगह मौजूद है.

कॉमनवेल्थ खेलों के भ्रष्टाचार और उनकी आधी-अधूरी तैयारी के पीछे मीडिया की केंद्रीय चिंता बस यही है कि दुनिया के सामने देश की बदनामी न हो. खेल अच्छे से हो जाएं, यह चिंता मीडिया के अलावा इस देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी तक को है जिनका कहना है कि खेल निपट जाए तो फिर वे भ्रष्टाचारियों से निपटेंगे. लेकिन कम लोग यह पूछ रहे हैं- और मणिशंकर अय्यर जैसे जो लोग यह पूछ रहे हैं उनके पीछे उनका निजी स्वार्थ और उनकी सनक खोजने की कोशिश ज्यादा हो रही है कि आखिर 70,000 करोड़ की लागत से होने वाले ये कॉमनवेल्थ खेल देश को क्या देंगे.

इतना ही जरूरी सवाल यह है कि कॉमनवेल्थ खेलों की आखिर हैसियत क्या है. ओलंपिक खेलों की एक अहमियत समझ में आती है कि वे तनावों और युद्धों से भरी बीसवीं सदी की तार-तार दुनिया को हर चार साल पर जोड़ने का काम करते रहे. जब सारे पुल टूटते-से लगे, उन्होंने खेलों के पुल बनाए रखे. एशियाई खेल भी उभरती हुई एशियाई अस्मिता के अपने सपने की तरह रहे जिनके आंकड़ों में लोगों की दिलचस्पी रही. लेकिन कॉमनवेल्थ खेल तो एक बीती हुई दुनिया की थकी हुई दोयम दर्जे की प्रतियोगिता का नाम है जिसकी स्मृति शायद ही किसी को रहती हो. हमें ओलंपिक और एशियाड का इतिहास मालूम है, कॉमनवेल्थ खेलों का नहीं- इसलिए नहीं कि उसमें खेल ऊंचे दर्जे के नहीं होते, बल्कि इसलिए कि कॉमनवेल्थ इस नई दुनिया में एक अप्रासंगिक हो चुकी संज्ञा है जिसका भार हमारी तरह के दृष्टिहीन देश ही ढोने को तैयार हैं. अब धीरे-धीरे यह बात भी खुल रही है कि कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन का अधिकार लेने के सिलसिले में हैमिल्टन को मात देने के लिए दिल्ली ने झूठ भी बोले- कहा कि इन खेलों के लिए जो खेलगांव बनेगा उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रावास में बदला जाएगा. यह घोषणा अब न जाने किन फाइलों में बंद है और खेलों के बाद खेलगांव के फ्लैट बेचने की तैयारी चल रही है.

बहरहाल, बात पीपली लाइव से शुरू हुई थी. अपनी सीमाओं के बावजूद यह एक बड़ी फिल्म है- क्योंकि यह बताती है कि तंत्र की मजबूरी और मीडिया के तमाशे के बीच नत्था अपनी जमीन से उजड़कर आखिरकार गुड़गांव में मजदूरी करने को मजबूर है- शायद वह भी किसी कॉमनवेल्थ परियोजना का हिस्सा हो जिसे किसी तरह पूरा कर हमारा यह तंत्र दुनिया की वाहवाही लूटने को बेताब है- और भीतर-भीतर इस बात से खुश कि कॉमनवेल्थ के नाम पर मची लूट का एक बड़ा हिस्सा उसके गुमनाम खातों में पहुंच चुका है. समझने की जरूरत यह है कि भारत अब भी उपनिवेशवादी ताकतों का शिकार है- पहले ये ताकतें इंग्लैंड की नुमाइंदगी करती थीं, अब इंडिया का प्रतिनिधित्व करती हैं.

उतावलेपन के चश्मे से संतुलित

कई संशोधनों के बाद अब परमाणु उत्तरदायित्व बिल काफी हद तक संतुलित है. फिर भी इसमें कई अनावश्यक जटिलताएं और कमियां हैं

परमाणु उत्तरदायित्य विधेयक कई दिनों की खींचतान के बाद 25 अगस्त को लोकसभा और 30 अगस्त को राज्यसभा में पारित होकर तमाम सवाल पीछे छोड़ गया है. विधेयक का घोषित उद्देश्य किसी परमाणु प्रतिष्ठान में दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को उचित मुआवजा और इसका तालमेल कुछ अंतर्राष्ट्रीय करारों के साथ सुनिश्चित करना था. इसके मूल विधेयक को मई में लोकसभा में पेश किया गया था. तब इसके कई प्रावधानों पर काफी हो-हल्ला मचा था जिसके बाद इसे संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था.

विपक्ष को मूल विधेयक की मुख्यतः दो बातों पर एतराज था. एक, अधिकतम मुआवजा कितना और कैसे दिया जाए और दूसरा परमाणु संयंत्र चलाने वाले (संचालक) का यदि दोष न हो तो ऐसे में अपने नुकसान की भरपाई परमाणु उपकरण बेचने वाली संस्था (आपूर्तिकर्ता) से वह कैसे कर सकता है?

मूल बिल में अधिकतम मुआवजे की सीमा करीब 2,100 करोड़ रुपए रखी गई थी जिसमें से संचालक का हिस्सा सिर्फ 500 करोड़ रुपए ही था. बाकी 1600 करोड़, यदि जरूरी हो तो, सरकार को देना था. बिल में यह स्पष्ट नहीं था कि संचालक पीड़ितों के नुकसान को पहले ही भर देगा या आपूर्तिकर्ता से उसे मुआवजा मिलने या न मिलने के फैसले के बाद ऐसा करेगा.

1986 में युक्रेन के चेर्नोबिल में विश्व की अब तक की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना हुई थी. इसमें कम से कम साढ़े तीन लाख लोग विस्थापित हुए थे और प्रभावित लोगों की कुल संख्या छह लाख पार कर गई थी. भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए कुल लोगों की संख्या करीब 20 हजार बताई जाती है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या पांच लाख से ज्यादा. भोपाल त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड से मिला मुआवजा – जिसे बहुत कम माना जाता है – भी मूल परमाणु उत्तरदायित्व बिल में ऑपरेटरों के लिए निर्धारित मुआवजे की राशि के चार गुने से ज्यादा था. इसके अलावा यह कौन-सा तरीका है कि करे कोई और भरे कोई. यानी मान लिया जाए कि गलती परमाणु संयंत्र चलाने वाले की हो तो दुर्घटना की हालत में वह तो केवल 500 करोड़  देगा और इसके ऊपर के 1,600 करोड़ जनता के पैसे से ही जनता को दे दिए जाएंगे. जाहिर सी बात है विपक्ष तो क्या किसी को भी इन बातों पर एतराज हो सकता था.

सवाल यह भी है कि विधेयक में सरकार ने ऑपरेटर और सरकार को अलग-अलग क्यों बताया है जबकि हमारे देश में सारे परमाणु संयंत्र परमाणु ऊर्जा कानून, 1962 के मुताबिक सरकारी ही हैं. तो क्या उत्तरदायित्व विधेयक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की घुसपैठ की दिशा में एक छोटा-सा कदम था?

चारों दिशाओं से उठे हल्ले के बाद संसद में पारित विधेयक में ऑपरेटरों के उत्तरदायित्व की अधिकतम सीमा 500 की बजाय 1,500 करोड़ रुपए कर दी गई है. हालांकि विधेयक में कुल क्षतिपूर्ति की सीमा अभी भी 2,100 करोड़ ही है लेकिन यह सरकार को इसे बढ़ाने के अधिकार भी देता है. पारित विधेयक की दो और महत्वपूर्ण बातें ये हैं कि एक तो अब यह केवल सरकारी संस्थानों पर ही लागू होता है और दूसरा ऑपरेटर को दुर्घटना की हालत में अपनी ओर से ही बिना आपूर्तिकर्ता को बीच में लाए मुआवजे की राशि दे देनी होगी.

दूसरे बड़े एतराज की बात करें तो मई में पेश हुए मूल विधेयक के मुताबिक संचालक को केवल उस हालत में ही ‘परमाणु सामग्री, उपकरणों या सेवाओं के आपूर्तिकर्ता’ से क्षतिपूर्ति का अधिकार था जब दुर्घटना उसके ‘जान-बूझकर किए गए कृत्यों या भयंकर लापरवाही’ की वजह से हुई हो. यह बड़ा अजीब था, गड़बड़ी तो गड़बड़ी ही है. आखिर यह कौन और कैसे तय करेगा कि गड़बड़ी जानबूझकर की गई थी. जब संसदीय समिति ने काफी विचार-विमर्श के बाद इस प्रावधान को हटाने की सिफारिश कर दी तो सरकार ने एक अलग ही शगूफा छोड़ दिया. उसने ‘जान-बूझकर’ किए गए कृत्यों को ‘क्षति पहुंचाने की नीयत’ से अंजाम दिए कृत्य में तब्दील कर दिया. मानो किसी की नीयत सही है या खराब इसका फैसला करना बेहद आसान हो. इस परिवर्तन ने सरकार की नीयत पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए. बाद में सरकार को एक बार फिर से झुकना पड़ा. अब आपूर्तिकर्ता के किसी भी कृत्य से हुई परमाणु दुर्घटना की हालत में संचालक हर्जाने का दावा कर सकता है.

हालांकि अब यह बिल काफी हद तक संतुलित है फिर भी इसमें कई अनावश्यक जटिलताएं और कमियां हैं. मसलन यदि केंद्र सरकार किसी प्रक्रिया से गुजरकर ज्यादा मुआवजे का प्रावधान कर सकती है तो फिर इस विधेयक में इसकी अधिकतम सीमा निर्धारित ही क्यों की गई है ? अमेरिका की बात करें तो यहां ऑपरेटरों के लिए क्षतिपूर्ति की सीमा करीब 50 हजार करोड़ रुपए (भारत की करीब 25 गुनी) और सरकार के लिए असीमित है. जापान में ऑपरेटरों और सरकार दोनों के ही उत्तरदायित्व की सीमा असीमित है.

विधेयक में एक ओर तो लिखा है कि यह केवल सरकारी संस्थानों पर लागू होगा मगर इसमें सरकार और संचालकों को अलग करके रखा गया है.
विधेयक  मुआवजा, उत्तरदायित्व और इसकी प्रक्रिया की बात तो करता है. लेकिन दुर्घटना की स्थिति में इलाज आदि की व्यवस्था पर कुछ नहीं कहता.

यह कहना कि हमारे देश में चाहे संचालक मुआवजा दे या सरकार बात तो एक ही है, सही नहीं है. चूंकि परमाणु उपकरणों के आपूर्तिकर्ता से मुआवजा केवल संचालक ही मांग सकता है, इसलिए विदेशी आपूर्तिकर्ता कंपनी के मुआवजे की सीमा संचालक की 1,500 करोड़ रुपए की सीमा तक ही सिमट जाती है.

परमाणु ऊर्जा के मसले पर जिस तरह की जल्दबाजी और कुछ भी दांव पर लगा देने का उतावलापन सरकार ने अब तक दिखाया है, यदि उसको ध्यान में रखा जाए तो इस विधेयक को संतुलित कहा जा सकता है.

संजय दुबे, वरिष्ठ संपादक