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एकला चलो रे…

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सीताराम येचुरी के पास स्पष्ट नजरिया है लेकिन उन्हें धुंधलकों से भरे रोडमैप के सहारे संघर्षों से पार पाना होगा. हालांकि येचुरी अपार क्षमताओं से भरे हुए हैं और वे तमाम कठिनाइयों और विरोधाभासों से पार पाने के लिए जाने जाते हैं. वे अपने नजरिए और मान्यताओें को स्थापित करने के लिए जाने जाते हैं. नेतृत्व कौशल से भरपूर 62 वर्षीय येचुरी को यह पता है कि उनके सामने अलीमुद्दीन स्ट्रीट से लेकर एके गोपालन भवन तक चुनौतियों का पहाड़-सा खड़ा है. संभव है कि इन चुनौतियों को दूर करने के लिए उन्हें पार्टी में पुनर्निर्माण की प्रक्रिया चलाने की दरकार होगी.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी माकपा के नए प्रमुख को इस बात का भी खयाल रखना होगा कि पार्टी के अंदर वरिष्ठ नेता वीएस अच्युतानंदन सहित दूसरे बड़े नेता भी हैं, जो पार्टी के अंदर निर्णय लेने की भूमिका में रहे हैं, उनकी किसी तरह की उपेक्षा न हो और तत्काल तकरार जैसी कोई स्थिति न पैदा हो.

येचुरी की कुशाग्रता और उनकी प्रतिभा का जश्न मनाया जा चुका है और उनकी बुद्घिमत्ता वामपंथ के करीबी लोगों के बीच स्वीकार्य है. वे इस बारे में टिप्पणी भी कर चुके हैं. येचुरी के हाथ में व्यावहारिक चुनौतियां ये हैं कि वे अपनी प्रतिभा से पार्टी की साख को कितना विस्तार दे पाएंगे? क्या वे ग्रीस और लातिन अमेरिका में वामपंथ के अनुभवों से सीख लेंगे और उसके आधार पर नेतृत्व दे पाएंगेे?

वामपंथ को कमजोर छवि से बाहर निकालने का जिम्मा

येचुरी का लोगों से मेलजोल का कौशल बहुत बड़ा है. वामपंथ के पुराने लोग एक कहानी याद करते हैं कि कैसे ज्याेति बसु ने येचुरी को ‘खतरनाक’ कॉमरेड बताया था. श्रद्घेय ज्योति बसु ने येचुरी के लिए ऐसा कहने के पीछे यह वजह बताई थी कि वे बहुत सारी भाषाओं में बहुत सहजता से संवाद कर सकते हैं. वे बंगाल के कॉमरेडों के साथ बांग्ला में बात कर सकते हैं. ठीक इसी तरह वे दूसरी भारतीय भाषाओं में अच्छी तरह संवाद कर लेते हैं. लेकिन माकपा प्रमुख होने के नाते उन्हें उत्साह व प्रेरणा से भर देनेवाली भाषा में बात करनी होगी ताकि वामपंथ की कमजोर छवि से उसे बाहर निकाला जा सके.

2004 में कांग्रेस नेतृत्ववाली केंद्र की यूपीए सरकार को माकपा ने समर्थन दिया था तो फिर वह पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव में कांग्रेस का साझीदार क्यों नहीं बन सकती है

क्या इस तीक्ष्ण बुद्घिवाले प्रबंधक के नेतृत्व में वामपंथ नया रोडमैप बनाने के बारे में पुनर्विचार करेगा? येचुरी बहुत विकट परिस्थितियों में आत्मविश्वास से भरे होते हैं और अखंडित वामपंथ और माकपा को बदलने में उनकी सकारात्मक सोच महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. संभव है कि पार्टी जड़ता और समस्याओं से घिरी हो लेकिन पार्टी की पतवार अब जोरदार नए प्रमुख के पास तो है ही. यहां एक बुनियादी सवाल यह पैदा होता है कि अकेले दम पर येचुरी पार्टी (माकपा) का भविष्य बदलने में कहां तक कामयाब हो पाएंगे? इस बारे में पार्टी के एक सक्रिय कार्यकर्ता तंज कसते हुए कहते हैं, ‘प्रकाश करात के जमाने से चली आ रही विरासत के तौर पर समस्या का अंत तो हुआ. अब हम कम से कम नए क्षितिज की ओर देख तो सकते हैं.’

पहाड़-सी चुनौतियां

वाम की दिलेरी मात्र से नव-उदारवाद और घोर पूंजीवाद की समस्याओं  से निपट पाने में शायद ही कामयाबी मिल पाएगी और इसके दम पर तुरत-फुरत शायद ही बदलाव की संभावना निकाली जा सकेगी. माकपा के महासचिव ने राजग सरकार को राष्ट्रपति के धन्यवाद अभिभाषण के दौरान एक संशोधन के लिए दबाव डालकर मुश्किल में डाल दिया था. इस तेजतर्रार नेता को असली चुनौती तो पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति में मिलनेवाली है जहां उन्हें गैर-समझौतावादी कॉमरेडों से नई राजनीतिक चुनौतियों से पार पाने के लिए तौर-तरीकों में बदलाव लाने के बारे में उनकी हठधर्मिता से जूझना होगा.

पार्टी के विशाखापत्तनम सम्मेलन को लेकर थोड़ा गौर फरमाना जरूरी होगा. येचुरी को अच्युतानंदन के अलावा केरल इकाई की घोर नकारात्मक ताकतों से भी जूझना होगा. लेकिन सच तो यह है कि पार्टी खुद भी इनको लेकर उधेड़बुन में रही है और करात भी व्यक्तिगत तौर पर इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि बुद्घिमत्ता, हठधर्मिता पर जीत दर्ज कर लेगी.

माकपा का पार्टी कांग्रेस (सम्मेलन) इस मायने में ऐतिहासिक हो गई कि इसमें पहली बार ऐसा हुआ जब पोलित ब्यूरो इस निर्णय पर एकमत नहीं हो पाया कि पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा और यह असमंजस की स्थिति तब है जब पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. प्रतिस्पर्द्घी केरल इकाई ने एस. रामचंद्रन पिल्लई के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया. यहां तक कि उन्होंने बंगाल इकाई के लोगों से सीताराम येचुरी को अगले महासचिव के तौर पर प्रस्तावित नहीं करने का अनुरोध भी किया था.

केरल और बंगाल के मतांतर को तवज्जो नहीं

येचुरी को केरल इकाई का जोरदार विरोध झेलना पड़ा लेकिन अंत में व्यक्तिगत प्रसिद्घि की वजह से उन्हें जीत मिली. येचुरी की जीत से बंगाल इकाई गदगद है और यही कारण है कि बंगाल में पार्टी को फिर से मजबूत स्थिति में ला पाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. वे यह जानते हैं कि इस उदासीन और बंटे हुए माहौल के बीच पार्टी को अगले साल होनेवाले चुनाव की भी तैयारी शुरू करनी हैै. वास्तविकता तो ये है कि हर कोई प्रकाश करात और उनके अंतर्मुखी स्वभाव को वामपंथ की दुर्गति के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है. हालांकि पश्चिम बंगाल में मिली हार के समय येचुरी पार्टी के पश्चिम बंगाल इकाई के प्रभारी थे. येचुरी और बंगाल पार्टी इकाई ने हार के तत्काल बाद यूपीए-1 से समर्थन वापसी लेने के निर्णय के वक्त को जिम्मेदार ठहराया था. उनका कहना था कि यूपीए-1 से समर्थन वापस लेने के तुरंत बाद राज्य में चुनाव संपन्न होना था और कांग्रेस ने वाम की हार को सुनिश्चित करने के लिए तृणमूल का दामन थाम लिया था.

पश्चिम बंगाल में इस समय पार्टी की हालत बहुत खराब है और इसका जनाधार तेजी से सिकुड़ रहा है और दूसरी ओर राज्य में भाजपा अपना दखल तेजी से बढ़ा रही है. इस बिगड़ती हुई तस्वीर को येचुरी कैसे संभाल सकेंगे?  क्या वे दुर्जेय हरकिशन सिंह सुरजीत से सीख लेकर ऐसी राजनीतिक रणनीति बनाएंगे जिसके बूते बंगाल को फिर से फतह किया जा सकेगा? पार्टी के पुनर्गठन की दिशा में यह सबसे जरूरी कदम होगा.

नवउदारीकरण से समझौता नहीं

वाम खुद को दलदल में फंसा हुआ महसूस कर रहा है, यह आसानी से कहा जा सकता है लेकिन उसे इस स्थिति से बाहर निकल पाना उतना ही मुश्किल होगा. माकपा ने अपने 21वें पार्टी सम्मेलन में यह निर्णय लिया है कि वह नव-उदारवादी नीतियों काे बढ़ावा देनेवाली कांग्रेस और किसी भी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ समझौता नहीं करेगी. मार्क्सवाद-लेनिनवाद की पुरानी किताबों में लिखी बातों पर गौर करते हुए पार्टी यह मान रही है कि नव-उदारवादी नीतियों के खिलाफ लोगों को एकजुट किया जा सकता है. लेकिन पार्टी को अपने गढ़ में राजनीतिक हड़ताल के आयोजन में भी बहुत मुश्किलें पेश हो रही हैं. क्या पार्टी अपने इस धर्मनिष्ठ तौर-तरीकों के जरिए इस संकट से पार पा सकेगी?

माकपा में बहुत सारे लोग चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के पक्ष में हो सकते हैंै. बंगाल की पार्टी इकाई पिछले चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने में दिलचस्पी दिखा रही है. येचुरी के लिए यह अकेले रस्सी पर चलने जैसा होगा. पश्चिम बंगाल में अगर पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर पाने में किसी वजह से सक्षम नहीं होती है तो यह तय है कि केरल इकाई को इससे चिढ़ मचेगी और उसे प्रतिरोध का मौका देने जैसा होगा. केरल माकपा की सबसे पुरानी इकाई है.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का साथ !

गौरतलब है कि माकपा ने 2004 में केंद्र में कांग्रेस की नेतृत्ववाली यूपीए सरकार को समर्थन दिया था. अगर पार्टी केरल और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा लेती है और केंद्र में कांग्रेस को समर्थन देती है तो फिर यह सवाल बहुत लोगों के मन में उठ सकता है कि फिर समर्थन के उन्हीं तर्कों के साथ बंगाल चुनाव में इस बार पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ क्यों नहीं कर सकती है? लेकिन येचुरी, सुरजीत नहीं हैं और ज्योति बसु जैसे लोग अब जिंदा नहीं हैं जो अपनी कुशाग्र और व्यावहारिक बुद्घि के बल पर पार्टी को केंद्र में बनाए रख पाने में सक्षम थे और अब उनकी प्रतिकृति तैयार कर पाना भी आसान नहीं है.

भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध करने के लिए विपक्ष को एक करना बहुत जरूरी होगा. अधिग्रहण के मसले पर राज्यसभा में सीताराम येचुरी को विरोध का परचम लहराने के लिए कांग्रेस और दूसरी बुर्जुआ पार्टी को अपने साथ लेना बहुत जरूरी होगा. राष्ट्रपति द्वारा संसद को संबोधित करने के समय विपक्ष को एकजुट करने का काम येचुरी बखूबी निभा सकेंगे. वे उत्प्रेरक का काम भलीभांति कर पाएंगे. सदन के पटल पर इससे इतर येचुरी के लिए दूसरी वामपंथी पार्टियों के बड़े नेताओं का दबाव झेलना एक बड़ी चुनौती होगी और यह सीपीएम के लिए कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी के साथ गठजोड़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इसी साल पश्चिम बंगाल में होनेवाले सीपीएम के विशेष प्लेनम (कुछ खास स्थिति में छोटा सम्मेलन आयोजित किया जाता है) में संगठन की दिक्कतों के बारे में चर्चा की जाएगी. येचुरी पार्टी के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने और उसे दूर करने को लेकर लंबे समय तक इंतजार नहीं करना चाहेंगे.

 कैडर सिस्टम पड़ा कमजोर

पार्टी के केंद्रीय कमेटी के सदस्य सुनीत चोपड़ा ने सीपीएम छोड़ने के बाद जो प्रतिक्रिया दी थी, उसके बाद यह महसूस किया गया था पार्टी में कैडर सिस्टम ढीला पड़ गया है. पार्टी को अनुशासन को लेकर सख्ती करनी होगी. सुनीत चोपड़ा लगभग दो दशकों तक पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य रहे. उन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद यह आरोप लगाया था कि वह पार्टी इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि वे करात की चापलूसी नहीं कर सकते हैं. उन्होंने नेतृत्व के मोर्चे को लेकर कई बार सवाल उठाए थे.

येचुरी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह माकपा के जनाधार का कितना विस्तार कर पाते हैं और वह दूसरी पार्टियों से रिश्ते कितने बेहतर बनाकर रख पाते हैं

केरल के विद्रोही लोकप्रिय नेता अच्युतानंदन इस बात के लिए बाध्य होंगे क्योंकि उनके और येचुरी के बीच घनिष्ठ संबंध हैं. नए महासचिव अगर गैर-कृषक नेता को तवज्जो देंगे तब केरल इकाई किस तरह प्रतिकिया देगा, यह देखने वाली बात होगी. केरल इकाई में यह चर्चा है कि येचुरी राज्य समिति में अच्युतानंदन को शामिल करने के लिए जोर डालेंगे. लेकिन येचुरी केरल इकाई की इच्छाओं का भी जरूर ख्याल रखना चाहेंगे क्योंकि पोलित ब्यूरो में चार और केंद्रीय समिति में 14 सदस्य इसी राज्य से आते हैं. येचुरी बंगाल और केरल के बीच समन्वय बिठा पाने में समर्थ होंगे और अगर वे ऐसा कर पाएं तो उनके लिए यह सफलता की बड़ी कुंजी होगी. पार्टी की चुनौतियों से पार पाने में येचुरी की बुद्घिमत्ता की परीक्षा होनी तय है.

सुरजीत को छोड़कर अबतक माकपा के सभी महासचिव दक्षिण भारत के हुए हैं लेकिन येचुरी को राज्यसभा का टिकट पश्चिम बंगाल से मिला. येचुरी इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे अपने पूर्व के लोगों की तुलना में लोगों की आसान पहुंच में हैं और वे विचारधारा के सवाल पर अपनी खिड़की खुली रखते हैं. येचुरी को शीर्ष पर पहुंचने से रोकने की हरसंभव कोशिश इनके पूर्ववर्ती नेताओं ने की. येचुरी अब मुक्त हैं और उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह माकपा  के जनाधार का विस्तार कर पाने में कितने कारगर होंगे. उनकी सफलता इसपर निर्भर होगी कि वे दूसरी पार्टियों से कितना अच्छा रिश्ता कायम रखने में कामयाब हो पाते हैं. क्या वे इस असंभव काम माकपा को पराभव के कीचड़ से बाहर निकालने में कर पाएंगे? अगर वे आंशिक तौर पर भी सफल होते हैं तो यह उनकी जोरदार सफलता होगी.

करिश्माई कॉमरेड

क्या ‘लेफ्ट हैंड ड्राइव’ के लेखक पार्टी को सही दिशा में ले जा पाएंगेे? पूरी दुनिया में वामपंथी आंदोलन के बहुत सारे नायक और नायिकाएं हुए हैं जिनकी अपनी एक छवि रही है, इनमें से एक नाम पार्टी के नए चुने गए महासचिव का भी है.

मौजूदा भारतीय राजनीति में सीताराम येचुरी को लोग जलवाफरोश के बतौर याद करते हैं. वे कभी भी बहुत हड़बड़ी में नहीं दीखते हैं. अलग-अलग भाषा में अपनी निपुणता बढ़ाने के अलावा माकपा के नए प्रमुख की छवि कुछ-कुछ ज्योति बसु की तरह बनती जा रही है. उनकी सौम्यता और मधुरता से अपनी बात रखने की कला क्या वामपंथ को सुरक्षा दे पाएगी? वे राज्यसभा में अक्सर हस्तक्षेप करते हैं. येचुरी 1984 -1992 तक माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य रहे और 1992 से पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं. उनके कई रंग हैं. वे राजनेता, अर्थशास्त्री, लेखक और स्तंभकार के तौर पर पहचाने जाते हैं.

येचुरी का जन्म तत्कालीन मद्रास (अब तमिलनाडु) राज्य के एक तेलगु परिवार में 12 अगस्त 1952 को हुआ था. उनके पिता का नाम सर्वेश्वर सोमायाजुला येचुरी है. उनके पिता आंध्रप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में इंजीिनयर थे. येचुरी ने स्कूल की पढ़ाई आंध्र प्रदेश में पूरी की और सीबीएससी द्वारा आयोजित बारहवीं कक्षा में वे प्रथम आए. इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई के लिए हैदराबाद स्थित निजाम कॉलेज पहुंचे. उन्होंने मुल्की और गैर मुल्की के आंदोलन में शामिल होने के लिए कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी.

येचुरी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए. की पढ़ाई पूरी की और अर्थशास्त्र में एमए. की पढ़ाई के लिए जवाहर लाल नेहरू (जेएनयू), नई दिल्ली में दाखिला लिया. वे यहां आकर वामपंथी आंदोलन से प्रभावित हुए और 1974 में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़ गए. युवा नेता को आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी की वजह से अपनी पीएचडी की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. बाद में वे जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए.

येचुरी 1978 में एसएफआई के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बनाए गए और कुछ समय के बाद उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. 1984 में येचुरी को माकपा की केंद्रीय समिति में शामिल कर लिया गया और उसके बाद अगले ही साल उनका चयन पार्टी की फैसला लेने वाली इकाई के लिए हो गया.

वे राज्यसभा के लिए पहली बार 2005 में चुने गए और इस दौरान वे कई संसदीय समिति के सदस्य रहे और वहां अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दीं. वे 2011 में राज्यसभा के लिए दोबारा चुने गए. इस वामपंथी नेता ने विपक्ष की ओर से अहम भूमिका निभाई.

‘लेफ्ट हैंड ड्राइव’ के अलावा येचुरी ने ‘ह्वाट इज हिंदू राष्ट्र?’ पुस्तक लिखी है. येचुरी ने पत्रकार सीमा चिश्ती से शादी की और उनके लेख नई दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर प्रकाशित होते हैं. पार्टी ढलान पर है लेकिन येचुरी के पाठकों का दायरा अभी भी व्यापक है. येचुरी को एक बेटी और दो बेटे हैं. वे अपने कॉलेज के दिनों में टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हुआ करते थे.

अपना दल से पराई हुईं अनुप्रिया

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अपना दल में पारिवारिक कलह चरम पर पहुंच चुका है. पार्टी मां-बेटी की लड़ाई का मैदान बन चुकी है. मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया पटेल को उनकी मां कृष्‍णा पटेल ने गुरुवार को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. मां-बेटी के बीच काफी दिनों से मचे घमासान के चलते पार्टी दो फाड़ होती नजर आ रही है.

जानकारी के मुताबिक गुरुवार को लखनऊ के लालबाग में मां कृष्‍णा पटेल ने पार्टी कार्यालय का ताला तोड़कर कब्जा जमा लिया. इसके बाद एक प्रेस विज्ञप्‍ति जारी कर उन्होंने बताया कि अनु‌प्रिया पटेल को पार्टी से निकाल दिया गया है. इससे पहले बुधवार को अनुप्रिया पटेल ने कृष्‍णा पटेल के कब्जे वाले पार्टी के कार्यालय में ताला जड़ दिया था.

विरासत संभालने की जंग

पार्टी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाली अनुप्रिया पटेल को पार्टी की विरासत सौंपने की तैयारी पिछले साल ही शुरू हो गई थी, लेकिन चार नवंबर 2014 को हुए वाराणसी अधिवेशन में मां कृष्णा पटेल ने अपनी विरासत अनुप्रिया पटेल की जगह दूसरी बेटी पल्लवी पटेल को सौंपते हुए उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित कर दिया. इसी के बाद से पार्टी में विरासत संभालने की जंग छिड़ गई. इसके अगले महीने पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते कृष्‍णा पटेल ने अनुप्रिया को महासचिव पद से हटा दिया. इसे गलत बताते हुए अनुप्रिया ने कृष्णा को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाते हुए खुद को पाट्री का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया था. उसके बाद से मां-बेटी में पार्टी के अंदर ही वर्चस्व की लड़ाई का दौर जारी है.

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर विवाद

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राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) क्या है?

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए प्रस्तावित निकाय का नाम राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग है. इस आयोग में कुल छह सदस्य होंगे. भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) इसके अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश इसके सदस्य होंगे. केंद्रीय कानून मंत्री को इसका पदेन सदस्य बनाए जाने का प्रस्ताव है. दो प्रबुद्ध नागरिक इसके सदस्य होंगे, जिनका चयन प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्षवाली तीन सदस्यीय समिति करेगी. अगर लोकसभा में नेता विपक्ष नहीं होगा तो सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता चयन समिति में होगा. आयोग सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद हेतु उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा, जिसके नाम पर दो सदस्यों ने सहमति नहीं जताई होगी.

क्या है विवाद?

आयोग को लेकर विवाद के कारण सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं. मुख्य विवाद आयोग में कानून मंत्री को शामिल किए जाने को लेकर है. मामले में याचिकाकर्ता के वकील राम जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट आयोग में कानून मंत्री की मौजूदगी पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि भ्रष्ट सरकार भ्रष्ट न्यायपालिका चाहेगी और भ्रष्ट जजों की नियुक्ति करेगी. नेताओं को जजों की नियुक्ति में शामिल नहीं होना चाहिए. नेताओं के हितों का टकराव हमेशा रहता है और ये सिस्टम पूरी न्यायपालिका को दूषित करेगा. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश एचएल दत्तू का कहना है कि जब तक शीर्ष अदालत इस मामले में कोई निर्णय नहीं सुनाती तब तक वह इस आयोग में शामिल नहीं होंगे. आयोग बनाने के लिए नया कानून कॉलेजियम सिस्टम खत्मकर 13 अप्रैल से लागू किया गया.

पहले क्या थी व्यवस्था?

वर्तमान में न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण का निर्धारण एक कोलेजियम व्यवस्था के तहत होता है. इसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं. यह प्रक्रिया वर्ष 1998 से लागू है. इसके तहत कोलेजियम सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति की अनुशंसा करता है.

पप्पू यादव राजद से छह साल के लिए बाहर

Pappu Yadav with wife by Shailendra 2

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरणों के बनने बिगड़ने का खेल शुरू हो चुका है. जनता परिवार के निर्माण के साथ राज्य की राजनीति में आए बदलाव ने एक और नया मोड़ ‌ले लिया है. दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद से पप्पू यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. पार्टी ने उनके लिए अपने दरवाजे छह सालों के लिए बंद कर दिए हैं. जानकारी के अनुसार, पार्टी विरोधी ‌गतिविधियों में लिप्त होने और अनुशासनहीनता के आरोप में यह कदम उठाया गया.

पप्पू यादव बिहार की मधेपुरा सीट से सांसद हैं. पिछले कुछ दिनों से पप्पू और पार्टी हाईकमान के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे थे, जिसके बाद से उनका पार्टी से निकाला जाना तय हो गया था. हाल के दिनों में कुछ मौकों पर वह लालू के राजनीतिक उत्तराधिकारी होने का दावा पेश करने लगे थे. इसके अलावा जनता परिवार के विलय के आलोचक और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के मुखर समर्थक के रूप में उभरने लगे थे. अब कयास लगाया जा रहा है कि पप्पू यादव मांझी के साथ मिलकर नई पार्टी बना सकते हैं. राजद ने 18 अप्रैल को पप्पू यादव को नोटिस दिया था. नोटिस में उनसे ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के बारे में सफाई मांगी गई थी. बहरहाल इस कार्रवाई से राजद को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. पप्पू यादव की कोसी इलाके में अच्छी पैठ है. ऐसे में वे राजद के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं.

पढ़ें पप्पू यादव के साथ तहलका की बातचीत

चार महिला खिलाड़ियों ने की खुदकुशी की कोशिश, एक की मौत

saiकेरल के साई सेंटर (भारतीय खेल प्राधिकरण) में चार महिला खिलाड़ियों ने खुदकुशी करने की कोशिश की है. इनमें से 15 साल की एक एथलीट की अस्पताल में मौत हो गई है, ज‌बकि अन्य तीन खिलाड़ियों का इलाज चल रहा है. जानकारी के अनुसार वरिष्ठ खिलाड़ियों की प्रताड़ना से तंग आकर उन्होंने ये कदम उठाया.

चारों युवा खिलाड़ी साई के जलक्रीड़ा केंद्र में तैराकी का प्रशिक्षण ले रही थीं. पुलिस के मुताबिक चारों ने बुधवार शाम ‘ओथालांगा’ नाम का जहरीला फल खाया था. इसके बाद से उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. बेहोशी की हालत में शाम सात बजे उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिसके बाद एक की मौत हो गई. पुलिस ने हॉस्टल से सुसाइड नोट भी जब्त किया है. पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. उधर, खिलाड़ियों के परिजनों ने आरोप लगाते हुए कहा है कि कुछ वरिष्ठ खिलाड़ी उनका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न कर रहे थे. हालांकि हॉस्टल वार्डन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उत्पीड़न का कोई मामला नहीं है. मामले की गंभीरता को देखते हुए खेल मंत्रालय ने जांच के आदेश दे दिए हैं.

किशोरों को अपराध की जघन्यता के अाधार पर सजा

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कैबिनेट ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी प्रदान कर दी जहां 16 से 18 साल आयु वर्ग के किशोर अपराधियों पर भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, अगर वे जघन्य अपराधों के आरोपी हैं. इस विधेयक को सरकार इसी सत्र में संसद में लाने की तैयारी में है. सरकार ने यह फैसला देश में बढ़ते बाल अपराध को मद्देनजर रखते हुए किया है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2002 में देश-भर में 484 नाबालिग, महिलाओं के खिलाफ अपराध में शामिल थे, वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर 1149 हो गई.

वर्तमान कानून में गंभीर अपराध करने वाले नाबालिग को किशोर न्याय बोर्ड के तहत महज तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया जाता है. निर्भया दुष्कर्म मामले के बाद यह बहस छिड़ी कि गंभीर अपराध करनेवाले नाबालिग को सिर्फ तीन साल में कैसे रिहा किया जा सकता है. निर्भया मामले में सबसे ज्यादा हैवानियत करनेवाला आरोपी भी नाबालिग है. इस विधेयक के पास होते ही नाबालिग अपराधियों पर वयस्क की तरह ही सामान्य अदालत में भारतीय दंड संहिता के तहत मुकदमा चलाया जा सकेगा. सरकार के इस फैसले का महिला संगठनों ने स्वागत किया है वहीं बाल अधिकार के लिए काम करनेवाली संस्थानों ने इसका विरोध किया है.

गुरुवार को केंद्र सरकार ने बाल न्याय अधिनियम संशोधन विधेयक को लोकसभा में पास करा लिया. महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने लोकसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा, ‘इस कानून में न्याय और बाल अधिकार में तालमेल बैठाने की पूरी कोशिश की गई है. विपक्ष की आपत्ति के बाद केंद्र ने इस विधेयक के अनुच्छेद 7 को हटा दिया है.’ अब किशोरों से हुए अपराधों की प्रकृति (जघन्यता) के आधार पर उन्हें कठोर सजा दी जा सकेगी.

‘सलवा जुडूम’ फिर से शुरू होने के संकेत

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25 मई को महेंद्र कर्मा की पुण्यतिथि है. इसी दिन झीरम घाटी में होने वाले एक कार्यक्रम के दौरान इस अभियान को फिर से शुरू करने की घोषणा की जा सकती है. छविंद्र कर्मा की माने तो जागरूकता के अभाव के चलते बस्तर में नक्सली समस्या लगातार बढ़ रही है. तमाम गांवों में नक्सलियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है जो कानून और ‌व्यवस्‍था के लिए खतरनाक है.

कम्युनिस्ट नेता रहे महेंद्र कर्मा ने कांग्रेस में शामिल होने के बाद ‘सलवा जुडूम’ अभियान की शुरुआत की थी. 2005 में शुरू हुए इस अभियान का जनक उन्हें ही माना जाता है. इस अभियान का राज्य सरकार की ओर मदद भी मिलती है.

माओवादी ‘सलवा जुडूम’ से काफी नाराज थे. मानवाधिकार कार्यकताओं ने तो इसे खूनी संघर्ष बढ़ाने वाला अभियान बताया था. हुआ भी कुछ ऐसा ही था. नाराज न‌क्सलियों ने 2013 की 25 मई को झीरम घाटी में घात लगाकर कांग्रेस नेताओं पर हमला किया था. इस खौफनाक हादसे में 28 लोगों की मौत हो गई थी. इनमें से एक महेंद्र कर्मा थे. ‌हमले के दौरान नक्सली ‘महेंद्र कर्मा मुर्दाबाद’ के नारे भी लगा रहे थे.

 सलवा जुडूम मतलब शांति का कारवां

‘सलवा जुडूम’ एक आदिवासी शब्द है जिसका मतलब होता है- ‘शांति का कारवां’. इस अभियान में ग्रामीणों की सेना तैयार की जाती थी. ग्रामीणों को हथियार चलाने का विशेष प्रशिक्षण पुलिस देती थी. ग्रामीणों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाया जाता था, ताकि वे नक्स‌लियों से लोहा ले सकें. इसके लिए ग्रामीणों को 1500 से 3000 रुपये तक का भत्ता भी दिया जाता है.

साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार को आदिवासियों को एसपीओ बनाने और उन्हें माओवादियों के खिलाफ हथियारों से लैस करने से रोक लगा दी थी. कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया था.

‘मेरी रग-रग में बसा है साम्यवाद’

पिनाराई पिजयन | 70 | मार्सर्वादी कम्युनिस्ट पाटीर् के पोनित ब्यूरो सदस्य
पिनाराई पिजयन | 70 |
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य

राज्य पार्टी के 50 वर्ष के इतिहास में 17 वर्षों तक उसका नेतृत्व करनेवाले पिनाराई को हर कोई अपने नजरिए से देखता है. एक खास दूरी के साथ पार्टी के सदस्यों (कार्ड होल्डर) के लिए वह बेहद सम्मान और आदर के पात्र हैं. दक्षिणपंथियों के लिए वह एक ऐसे व्यावहारिक वामपंथी हैं जो प्रतिबद्धता और विचारधारा के बजाय शासन-प्रशासन को अधिक तरजीह देता है. क्रांतिकारी झुकाव रखनेवाले मध्यवर्ग के अच्छे खासे हिस्से में उन्हें एक ऐसा खलनायक बनाकर तिरस्कृत भी किया जाता है, जिसने कॉर्पोंरेट और वर्ग शत्रुओं से गठबंधन करने के चक्कर में कम्युनिस्ट मूल्यों व सिद्धांतों की बलि दे दी है.लेकिन इस सबके बावजूद पार्टी के बाहर और भीतर विरोधी खत्तों में ‘दक्षिणपंथी’ और ‘भ्रष्ट’ माने जानेवाले पिनाराई विजयन ने अपने काम करने की चाल-ढाल को नहीं छोड़ा है. मैथ्यू सैम्यूएल को दिए अपने एक खास इंटरव्यू में वह साफ कहते हैं कि साम्यवाद (कम्युनिज्म) तो उनकी रग-रग में बसा है. पार्टी में उनको एक समय नापसंद करनेवाले कट्टर विरोधी और लोकप्रिय नेता वी.एस. अच्युतानंदन के चलते भले ही उन्हें आज अपने तौर तरीकों से काम करने का मौका नहीं मिल पा रहा है. गौरतलब है कि अच्युतानंदन से झगड़े के चलते एक वक्त उन्हें अपनी पोलित ब्यूरो की सदस्यता से भी हाथ धोना पड़ा था. लेकिन बदले हालात और अच्युतानंदन व उनके बीच घटती दूरी के कारण इस 70 वर्षीय नेता की फिर से चुनावी राजनीति में आने की पदचाप सुनाई दे रही है. पिनाराई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है. केरल में अगरचे इतिहास खुद को दोहराता है तो पिनाराई ईश्वर का अपना राज्य कहे जानेवाले इस प्रदेश की अगुआई करते दिखाई पड़ सकते हैं. और अगर ऐसा हो जाता है तो निसंदेह यह कायापलट का संकेत भी होगा. पेश है उनके इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण संपादित अंश.

आपने केरल में माकपा का 17 वर्ष तक नेतृत्व किया है. आपने पार्टी के इतिहास में सबसे अधिक समय तक सचिव के दायित्व का निर्वहन किया है. उथल-पुथल के उस दौर पर बात करने से पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आप साम्यवादी (कम्युनिस्ट) आंदोलन की ओर आकर्षित कैसे हुए

मैं अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के लिए किसी व्यक्ति विशेष या फिर आत्मगत प्रभाव को तो जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहता हूं. मेरा जन्म पिनाराई में हुआ. यह केरल के पारापरम गांव के पास स्थित है. पारापरम वो गांव है जहां कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे पहली मीटिंग आयोजित हुई थी. मुझे आज भी याद है कि उस वक्त किए जा रहे पुलिसया अत्याचारों के दौरान भी हमारे इलाके से कई व्यक्ति ऐसे थे जो कम्युनिस्ट बन चुके थे.

मैं अपने गांव के आसपास कम्युनिस्ट कायकर्ताओं पर लगातार की जा रही पुलिस की ज्यादतियों व अत्याचारों की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ. यह 1948 का दौर था. उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा हुआ था. इस दौर में कम्युनिस्ट नेता भूमिगत ( अंडरग्राउंड) होकर काम कर रहे थे. पुलिस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के कार्यकर्ताओं का लगातार सुनियोजित तरीके से दमन कर रही थी.

बचपन में मेरी मां ने मुझे पुलिसया दमन और बर्बरता की कई कहानियां सुनाई थीं. मेरी यादों में मेरे बचपन की एक घटना आज भी ताजा है. एक दिन मेरी मां घर के कुएं के पास मेरा हाथ पकड़े खड़ी थीं और पास के इलाके में कम्युनिस्टों की खोज में जुटी पुलिस का एक किस्सा बता ही रहीं थीं कि उसी वक्त पुलिस और कुछ गुंडों ने हमारे घर पर धावा बोल दिया. उन्होंने हमारे घर के सारे समान को बाहर फेंक दिया. इसके बाद पुलिस मेरे बड़े भाई , जोकि कम्युनिस्ट समर्थक था, को बुरी तरह से पीटने के बाद गिरफ्तार करके अपने साथ ले गई. पुलिसया दमन की यह घटना और ऐसी कई घटनाओं के साथ-साथ बहादुर कम्युनिस्टों के प्रतिरोध की कहानियां आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं. ये कहानियां और जीवन के अनुभवों ने मेरे स्कूली दिनों में मुझे कम्युनिस्ट बनने के लिए प्रेरित और प्रभावित किया. .

बचपन में मुझे राक्षसों से डर लगता था. लेकिन मेरा झुकाव वामपंथ कीओर भी बढ़ रहा था. मुझे याद है कि हाई स्कूल में पहुंचने तक मैं नास्तिक बन चुका था

क्या यह कहना सही होगा कि बचपन से ही आपका वामपंथ की ओर झुकाव था. शायद आपका पालन-पोषण कुछ अलग तरह से हुआ था. क्या आप अपने स्कूली जीवन में नास्तिक थे?

बिलकुल नहीं! मेरा बचपन किसी अन्य निम्न वर्गीय बच्चे की तरह ही था. पर जैसा मैंने पहले कहा है कि मेरे बचपन के दिनों से ही मेरा दिल -दिमाग साम्यवाद की ओर आकर्षित हो गया था. कई पौराणिक कथाओं को सुनते हुए मैं बड़ा हुआ हूं. मुझे राक्षसों और शैतानों से बहुत डर लगता था. मुझे आज भी याद है कि मैं अपने स्कूली दिनों में रसोई के पास बैठकर पढ़ा करता था क्योंकि मेरे मन में उस समय यह डर समाया हुआ था कि अगर मैं अकेला रहा तो शैतान मुझे पकड़ लेंगे. रसोई में मेरी मां काम करती रहती थी. इस वजह से मुझे कुछ संतोष मिलता था. जब मैं बड़ा होने लगा उसी दौरान मैंने थैयम देखने के लिए कवयूकल ( ये वो मंदिर हैं जहां छोटी जाति के लोग पूजा के लिए जाते हैं. थैयम इनके वार्षिक उत्सव का एक अनुष्ठान या एक किस्म की रस्म होती है) जाने लगा. अगर मुझे सही याद पड़ता है तो मैं हाई स्कूल में पहुंचने तक नास्तिक बन चुका था.

अपने राजनीतिक विकास के आरंभिक दौर में आपको किन दिग्गज नेताओं ने प्रभावित किया? उस वक्त वो कौन से प्रमुख मसले थे जिनसे पार्टी जुझ रही थी?

केरल पार्टी के संस्थापक सदस्य पी. कृष्णापिल्लई वो नेता थे जिनके बारे में हम अपने बचपन से सुनते आ रहे थे. जब मैं पार्टी में सक्रिय हुआ तो ई.एम.एस नंबूदरीपाद, ए.के .गोपालन और ई.के नाॅयनार जैसे कई दिग्गज नेता , पार्टी के प्रतीक बन चुके थे. पट्टीयम गोपालन जैसे प्रमुख नेता भी थे जब मैं छात्र था. यह वो वक्त था जब साम्यवादियों को कांग्रेस व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दोनों की ओर से हमले झेलने पड़ रहे थे. खासकर आरएसएस केरल के उत्तरी भाग को टारगेट कर रही थी. थलासेरी में मुसलमानों के खिलाफ हुए सांप्रदायिक दंगे उनकी कार्य प्रणाली का एक बेहतरीन नमूना थे. ये सोच-समझकर भड़काए गए दंगे थे. इन दंगों में हमने अपने दो कामरेडों को हमेशा के लिए खो दिया. वे दोनों मुसलमानों का बचाव करने के दौरान मारे गए. मैं भी उन पार्टी कार्यकर्ताओं में से एक था जिसने आरएसएस से अल्पसंख्यकों को इस नरसंहार से बचाने की कोशिश की थी. यह एक मुश्किल काम था. लेकिन हम इसमें सफल इसीलिए हो पाए क्योंकि हमारे साथ जनता पीछे खड़ी थी.

इस तरह के अनुभवों ने शायद आपको सैद्धांतिक हठधर्मी बना दिया है या फिर माकपा जैसी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए इस तरह की हटधर्मिता आवश्यक है? क्या जब आप चुनावी राजनीति में शिरकत करेंगे तो अपने कामकाज के तरीके बदलेंगे?

(मुस्कुराते हुए) ये सब व्यक्तियों के व्यक्तिगत गुण होते हैं. अच्छा अब क्या तुम यह भी मानते हो कि मैं कभी हंसता नहीं हूं? अरे, भई मैं भी हंसता हूं पर तभी जब उसकी कोई वजह होती है. चुनावी राजनीति में जाने से संबंधित तुम्हारे सवाल का जो दूसरा हिस्सा है, उसका मैं अभी जवाब नहीं दूंगा. हां पार्टी का नेता होने के नाते मैं वर्तमान परिस्थितियों पर टीका-टिप्पणी अवश्य कर सकता हूं. मैं नॉयनार मंत्रिमंडल में थोड़े समय के लिए मंत्री था. इस दौरान जिन्होंने भी मेरा विरोध किया वे आज मेरे कार्यों और प्रयासों की सराहना कर रहे हैं. 1996 में जब लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सत्ता में आया तो राज्य गहरे बिजली संकट से जुझ रहा था. यहां बिजली की भारी कमी थी. सो तब हमारी सरकार की प्राथमिकता थी कि बिजली के क्षेत्र (पॉवर सेक्टर) में सुधार किए जाएं और यह जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई. और मुझसे जो भी बेहतर बन पड़ा मैंने किया.

राज्य सचिव के तौर पर 17 वर्षों तक काम करने के बाद, आपके नेतृत्व में पार्टी में आए बदलावों के बारे में आपकी क्या राय है? माकपा को मजबूत बनाने में आपका क्या योगदान है?

केरल में माकपा के पास एक लंबी परंपरा रही है जिसमें वरिष्ठ नेताओं जैसे ईएमएस नम्बूदरीपाद, एके गोपालन, सीएच कनरन और कई अन्य नेताओं की शानदार विरासत शामिल है. पार्टी के संस्थापक पी कृष्णापिल्लई और अन्य नेताओं द्वारा झेली गई तमाम कठिनाइयों की वजह से पार्टी मजबूत हुई. पार्टी की मौजूदगी के इन सभी वर्षों के दौरान, केरल के सामाजिक उतार-चढ़ाव और यहाँ के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ में माकपा का एक विशेष स्थान रहा. माकपा ने कभी भी अपने आप को जनता से दूर नहीं होने दिया. लोगों के मुद्दे उठाने में पार्टी सबसे आगे रही और जब हम सत्ता में नहीं रहे तब भी हमने आगे बढ़कर जनता के मुद्दे उठाए. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सत्ता में रहने के बावजूद संघर्ष जारी रखने के लिए हमारी आलोचना भी करते हैं.

माकपा आज भी मजदूर वर्ग की अपनी विचारधारा पर अडिग है. हम इस देश के वंचित तबको के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं

लेकिन ऐसा केवल इस वजह से हुआ कि हम उस समय भी लोगों का भरोसा कायम रखने में सफल रहे जब हमें राज्य में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. हमारे सामूहिक राजनीतिक प्रयास महत्वपूर्ण रहे और इसका क्रेडिट (श्रेय) कोई एक व्यक्ति नहीं ले सकता है. यह समग्रता में पार्टी की उपलब्धि है. हमारी पार्टी में हर बात पर सामूहिक रूप से चर्चा करने और इसके अनुसार निर्णय लेने की व्यवस्था मौजूद है.

माकपा में अंदरूनी लड़ाई कोई नई बात नहीं है. आपके द्वारा जिम्मेदारी संभालने से पहले, केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई में गुटबाजी को लेकर तीखी भर्त्सना की थी. लेकिन निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि जिन वर्षों के दौरान आप वहाँ प्रभारी थे, तब पार्टी में अंदरूनी लड़ाई सार्वजनिक तौर पर सामने आई. आप इस विचलन का सामना किस तरह कर सके? आपके अनुसार इसके कारण क्या हैं ?

देश में किसी भी राज्य में माकपा को ऐसी अंदरूनी लड़ाई नहीं झेलनी पड़ी हैं जैसी कि उसे केरल में झेलनी पड़ी. गुटों के बीच के झगड़े ऐसी चीज थी जिसने पार्टी के आधार को हिला दिया. इस समस्या का हल ढूंढ़ने में केंद्रीय नेतृत्व भी सहयोग करने के लिए हमारे साथ आकर खड़ा हुआ. इन सभी कारणों के मिले-जुले प्रभाव से, हम धीरे-धीरे गुटबाजी को नियंत्रित करने में सक्षम हुए हैं. राज्य में पार्टी को नष्ट करने की चाहत रखने वाले लोगों ने मीडिया के माध्यम से इसे ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया. पक्षपातपूर्ण और आधारहीन रिपोर्ट प्रकाशित की गईं और आज भी प्रकाशित की जा रही हैं. मेरे विचार से, हमारी नकारात्मक छवि प्रस्तुत करने की इस कोशिश का पार्टी ने सफलतापूर्वक मुकाबला किया है. हम कभी भी अपने सामाजिक आधार से दूर नहीं हुए और संकट का सामना करने के हमारे तरीके से भी यह बात पता चलती है. केंद्रीय नेतृत्व से राज्य इकाई को मिले समर्थन को देखकर भी राज्य इकाई वाकई काफी अभिभूत हुई.

हाल ही में राज्य इकाई की बैठक से वरिष्ठ नेता वीएस अच्युतानंदन के बैठक छोड़कर चले जाने से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के विचारों में मतभेद एक बार फिर से सबके सामने आ गए. क्या अच्युतानंदन का व्यक्तिगत प्रभाव पार्टी नेतृत्व को उनके खिलाफ कार्रवाई करने से रोक रहा है?

इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया गया है. पार्टी के पोलित ब्यूरो ने भी इस मामले को काफी गंभीरता से लिया है.

राज्य में जातिवाद लगातार मजबूत हो रहा है. मध्यवर्ग के बीच भी अपनी जाति और धर्म पर जोर देने की प्रवृत्ति हावी होती दिख रही है

केरल के कम्युनिस्ट आंदोलन को निकटता से जाननेवाले लोगों का कहना है कि अब पार्टी नेताओं के काम करने की शैली बदल गई है. पार्टी लगभग पिछले दशक के दौरान अधिक बाजार-उन्मुख हो गई है. उनका कहना है कि पार्टी की ‘पेरिपुवदा’ ‘कत्तन छाया’ संस्कृति ने क्रोनी कैपिटलिजम की घुसपैठ का रास्ता खोल दिया है.आलोचक उदाहरण देते हैं कि बड़े उद्यमियों और व्यवसायियों की मदद से माकपा ने एक टेलीविजन चैनल शुरू किया है.

कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह बेहद स्वाभाविक है कि वह समय के अनुसार बदले. इसी भावना के साथ हमारी पार्टी भी बदली है. वह निश्चित तौर पर पुरानी शैली और तरीकों को छोड़कर आगे बढ़ गई है हालांकि हम मजदूर वर्ग की अपनी विचारधारा पर आज भी उसी मजबूती से डटे हैं जैसे कि हम पुराने समय में हुआ करते थे. कम्युनिस्ट पार्टी के तौर पर, हम इस देश के वंचित तबके और मजदूर वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और लगातार खड़े रहेंगे. जहाँ तक आप टेलीविजन चैनल की बात कर रहे हैं, कैराली टीवी कोई पार्टी चैनल नहीं है. जब कुछ युवा लोग एक टेलीविजन चैनल शुरू करने के विचार के साथ हमारे पास आए तो पार्टी ने इस पर विचार किया और आखिरकार हमने इसे मदद करने का फैसला किया क्योंकि न सिर्फ हम, बल्कि स्वतंत्र राय रखनेवाले कई लोग भी एक अलग तरह के टेलीविजन चैनल की जरूरत महसूस करते हैं जो समाज की समस्याएँ प्रसारित करने के लिए पर्याप्त समय दे. आज सभी ओर असर डालनेवाली संचार क्रांति से दूर रहना कोई समझदारी नहीं है. हमने चैनल के लिए फंड इकट्ठा करने को समर्थन दिया हालांकि ‘कैराली’ को माकपा चैनल के तौर पर कहे जाने की आलोचना होती है, लेकिन हमने इसे पार्टी चैनल के तौर पर बदलने की चाहत कभी नहीं रखी. जब पार्टी ने देशाभिमानी दैनिक शुरू किया तो हमने लोगों से फंड इकट्ठे किए. एके गोपालन जैसे बड़े नेता फंड इकट्ठा करने के लिए श्रीलंका जैसे देशों में गए. तो इसमें कोई विचलन नहीं है.

जिस दौरान आप माकपा के राज्य सचिव थे, उस समय कई पार्टियों ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को छोड़ दिया। कई लोगों ने कहा कि आपके हठधर्मी रवैये की वजह से ये पार्टियाँ एलडीएफ छोड़कर गईं. यहाँ तक कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी कहा कि फ्रंट छोड़नेवाली पार्टियों को वापिस लाने के लिए समझाया जाना चाहिए था.

हमें उन लोगों से कोई समस्या नहीं थी जो हमें छोड़कर चले गए. पीजे जोसेफ की केरल कांग्रेस को माकपा या लेफ्ट फ्रंट से कोई समस्या नहीं रही और वे कोई कारण बताए बगैर फ्रंट को छोड़कर चले गए. जनता दल ने कोझिकोड संसदीय निवार्चन सीट से सीट शेयरिंग के मुद्दे पर फ्रंट को छोड़ा. यहाँ तक कि केंद्रीय नेतृत्व ने उनके सामने एक फार्मूला पेश किया लेकिन जनता दल नेतृत्व कोई समझौता करने को अनिच्छुक था. असल में हमें आरएसपी से भी कोई दिक्कत नहीं थी हालांकि वे कोल्लम संसदीय निर्वाचन सीट का मामला उठाते रहे. माकपा इस सीट से 10 से भी अधिक वर्षों से चुनाव लड़ती रही है. असल में, जब उनकी मांग पर बातचीत आगे बढ़ ही रही थी तभी आरएसपी ने फ्रंट छोड़ दिया.

मेरी साफ मान्यता है कि जो भी समाज विरोधी बात करेगा, मैं उसकी आलोचना करूंगा. मैं अपनी शैली नहीं बदलनेवाला मुझे अपने स्टैंड पर पूरा भरोसा है

क्या फ्रंट छोड़नेवाली पार्टियों को वापिस बुलाते हुए उनका स्वागत किया जाएगा?

यदि वे वाकई एलडीएफ में वापिस आना चाहते हैं तो उन्हें पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) से गठबंधन समाप्त करना होगा और यूडीएफ के साथ गठबंधन तोड़ने की अपनी नीति की सार्वजनिक तौर पर घोषणा करनी चाहिए.

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नेपाल भूकंप: त्रासदी के चश्मदीद

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फोटो: प्रशांत रवि

नेपाल में आए भूकंप से राजधानी काठमांडू के बसंतपुर इलाके काे पूरी तरह से तबाह करके रख दिया है. आपदाओं के समय आस्था ही मानव का सहारा बनती है. राजधानी के दर्दनाक मंजर काे एक पत्रकार ने कैमरे में कैद करने के साथ कलमबद्घ भी किया

25 अप्रैल को नेपाल और उसके आसपास के इलाकों में भूकंप के जबरदस्त झटके महसूस किए गए. इसी दिन मैं और मेरे साथी रिपोर्टर नेपाल के लिए निकल गए. हम पटना से रक्सौल होते हुए बीरगंज पहुंचे और फिर वहां से पालुंगवाले रास्ते से आगे बढ़े. लामीटाडा से पालुंग की तरफ बढ़ते ही हमारे सामने भूकंप से हुई त्रासदी का मंजर साफ होने लगा था. समझ में आने लगा था कि आगे का मंजर और दर्दनाक होनेवाला है. लामीटाडा, महावीरे और अघोर बाजार इलाकों से होकर गुजरनेवाले शायद हम पहले पत्रकार थे, ऐसा इन इलाकों के प्रभावित लोगों ने बताया. सब बर्बाद हो चुका था. घर जमींदोज हो चुके थे और उनके मलबों के पास बैठकर लोग विलाप कर रहे थे. वहीं कुछ लोगों की जिंदगियां उनके घरों की तरह ही खत्म हो गईं.

अब तक बर्बादी का मंजर हमारी आंखों के सामने साफ हो चुका था. हम समझ चुके थे कि इस भूकंप ने नेपाल के बहुत बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है. एक बात और, जब हम उन इलाकों से होते हुए आगे बढ़ रहे थे तब भी झटके महसूस हो रहे थे. हम समुद्र तल से करीब 1200 मीटर की ऊंचाई पर थे. तभी एक अधेड़ नेपाली हाथ हिलाता हुआ हमारी गाड़ी के सामने आ गया. नेपाली भाषा में कुछ बोलते हुए वो हमारी गाड़ी के बोनट पर चढ़ गया. आखिरकार हम उसके इशारे को समझ पाए. गाड़ी रोकी और नीचे उतरे. हमने पाया कि धरती में कंपन हो रही है. वो व्यक्ति शायद हमें इसी बारे में बता रहा था. तभी मैंने देखा कि थोड़ी दूर पर एक मकान धीरे-धीरे धरकते हुए पूरा का पूरा ढह गया.

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किसी तरह हम नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंच पाए. हमने देखा कि काठमांडू जिसे काठ का शहर भी कहा जाता है, लगभग तबाह हो चुका है. सोमवार की सुबह मैं अपने कैमरे के साथ काठमांडू के बसंतपुर इलाके में था. जीवन को मरते, लड़ते और उठते देखना बड़ा दुखदाई था. इसी इलाके में मैंने देखा कि पूरी तरह से ढह चुके एक मंदिर के बाहर एक महिला हाथ जोड़े खड़ी थी. बड़ी तबाही और बर्बादी के बीच आस्था का यह स्वरूप देखना मेरे लिए जबरदस्त अनुभव था. काठमांडू से बाहर, ऊंचाई पर ऐसे कई इलाके हैं जहां तक पहुंच पाना मीडिया और राहतकर्मियों के लिए भी एक चुनौती है. फिर भी कोशिश जारी है. मैं दो दिन तक इस तबाही के बीच रहने और देखने के बाद वापस पटना लौट आया हूं लेकिन उस मंजर को भूल पाना मुश्किल लग रहा है. बार-बार वो चेहरे आखों के सामने आ जाते हैं जिन्हें मैंने बर्बादी के बीच से उठते और संभलते हुए देखा है. जिन्हें मैंने उनके अपने ही घरों के बीच फंसकर मरे हुए देखा.

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दो हिंदूवादी नेताओं का ब्रिटेन ने रद्द किया वीजा

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ब्रिटेन ने दो भारतीय हिंदूवादी नेताओं का वीजा रद्द कर दिया है. ये दोनों कार्यकर्ता केरल के हैं. इनमें से एक हिंदू ऐक्य वेदी (संयुक्त हिंदू मोर्चा) की अध्यक्ष शशिकला टीचर और दूसरे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक हेरिटेज के निदेशक एन. गोपालकृष्‍णन हैं.

ब्रिटेन में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों ने इन दोनों की यात्रा के विरोध में शिकायत दर्ज ‌कराई थी, जिसके बाद सरकार ने यह कदम उठाया. शशिकला और गोपालकृष्‍णन क्रॉयडॉन शहर में होने वाले हिंदू धर्म महासम्मेलन में शामिल होने जा रहे थे. हिंदू ऐक्य वेदी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक हेरिटेज का विश्व हिंदू परिषद (आरएसएस) से करीबी संबंध है.

लंदन के एशियन लाइट समाचार पत्र के मुताबिक दोनों नेताओं के खिलाफ कट्टर हिंदू विचारधारा रखने की शिकायत दर्ज होने के बाद चेन्नई स्थित ब्रिटिश दूतावास ने उनका वीजा रद्द कर दिया. शिकायत के साथ अधिकारियों को दोनों नेताओं के यूट्यूब पर अपलोड किए गए भाषणों की अनुवादित कॉपी भी मुहैया कराई गई है. इससे पहले वर्ष 2002 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीजा भी गुजरात दंगे की वजह से रद्द कर दिया गया था. उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे.