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भंवर में भाजपा

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बात पिछले महीने की है. पटना के गांधी मैदान में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में विराट कार्यकर्ता सम्मेलन होने के अगले दिन की. पटना के भाजपा कार्यालय में हर दिन की तरह जमावड़ा लगा था. उस रोज के सम्मेलन में पटना के सांसद शत्रुघन सिन्हा के गायब रहनेवाली खबर चर्चा में थी. भाजपा के ही दूसरे सांसद अश्विनी चौबे के मंच पर चढ़ने के बाद जगह और पूर्व इजाजत के अभाव में वहां से हटा देनेवाली खबर भी अलग से ‘मजावाद’ को बढ़ाए हुए थी. एक तरीके से हर्ष व्यक्त करने के दिन मायूस होने का माहौल था, क्योंकि आपसी खींचतान और अनुशासित पार्टी के नियंत्रणहीन होने की कथा सबके सामने आ चुकी थी और अमित शाह से लेकर राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को भी बिहार के भाजपा सांसद कितना भाव देते हैं, यह सार्वजनिक तौर पर सबको पता चल चुका था.

भाजपा कार्यालय के पास ही अवस्थित जदयू कार्यालय मंे इस पर चुटकी लेनेवालों की जमात बैठी थी और पास के राजद कार्यालय में भी यही चर्चा का विषय था. भाजपा कार्यालय में भी इस बात पर बतकही चल रही थी लेकिन विषय बदलने के लिए एक छुटभैये नेता ने बात बदली. फटाफट सीटों का अनुमान लगना शुरू हुआ. राजद-जदयू के महाविलय में खींचतान पर मजा लेने की बात शुरू हुई. बात होती रही और बातों-बातों में ही बैठे-बैठे यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि भाजपा इस बार अपने दम पर इतनी सीट लाएगी कि सहयोगी दल लोजपा या राष्ट्रीय लोक समता पार्टी जैसे दलों के नेता भी फिर सरकार चलाने में ब्लैकमेल करने या दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहेंगे. खुद से ही विजयी समीकरण बिठा लेने और खुद को तसल्ली देने के बाद सभी निश्चिंत मुद्रा में आए. तभी एक सवाल किसी ने हवा में उछाल दिया कि सब तो होगा लेकिन किसके नाम पर? नेता कौन होगा बिहार भाजपा का, नीतीश कुमार के मुकाबले भाजपा की ओर से कौन रहेगा? यह सवाल आते ही फिर माहौल तनाव का बना, जिस नेता ने यह सवाल उठाया था, उसे सभी ने घूरकर देखा और बतकही की चौकड़ी वहीं खत्म हो गई. भाजपा कार्यालय में हर दिन ऐसी ही बैठकों का दौर चलता है. सुबह राजद-जदयू के महाविलय में आनेवाली पेंच और परेशानियों पर मजा लिया जाता है. दोपहर बाद लगनेवाली चौकड़ी में सवर्णों का इतना, कुशवाहा का इतना, वैश्यों का इतना, पासवानों का इतना, मांझी के जरिए इतना, पप्पू यादव के बिदक जाने पर इतना, फलाना के जरिये इतना, वहां से इतना आदि का अनुमान लगाया जाता है और फिर सरकार बना ली जाती है और शाम आते-आते जब नेता का सवाल सामने आता है तो माहौल तनाव में बदल जाता है और सबके विदा  हो जाने की बारी आती है.

 एक अदद नेता की तलाश

भाजपा की यह परेशानी यूं ही नहीं. पहली बार सत्ता पाने की आस लगाए उसे एक अदद नेता की तलाश है. बात शुरू होती है तो सबसे पहला नाम सुशील मोदी का आता है, जो स्वाभाविक भी है. सुशील मोदी बिहार में भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं. बोलक्कड़ हैं, सरकार का अनुभव रहा है. नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं. लेकिन तर्क ये भी है कि सुशील की सीमा है. वे अभी तक ऐसे नेता नहीं बन सके हैं, जो भाजपा के कोर व कैडर वोट के अलावा किसी दूसरे वर्ग में अपील कर वोट निकलवा सकें. नीतीश कुमार के मुकाबले उनकी छवि ऐसी नहीं कि वे पूरे बिहार में अपने व्यक्तित्व से अपील कर सके. और फिर सबसे बड़ा पेंच यह है कि उन्हें लेकर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में संकट अलग है. मोदी वैश्य समुदाय से आते हैं और पास के झारखंड में भी रघुवर दास वैश्य नेता ही हैं, जो सीएम बने हैं. दो पड़ोसी राज्यों में वैश्य का ही प्रयोग भाजपा करना चाहेगी, इसमें संदेह है.

सुशील मोदी और नंदकिशोर यादव की छवि कभी राज्यव्यापी अपीलवाली नहीं रही. दोनों में किसी एक को सीएम उम्मीदवार बनाने पर पार्टी में लड़ाई तय है

यह बात एक वरिष्ठ भाजपा नेता ही बताते हैं. वह कहते हैं कि सुशील मोदी को सामने करने का मतलब होगा कि भाजपा के अंदर साफ-तौर पर तीन खेमे का हो जाना, जिसमें एक खेमा गिरिराज सिंह, अश्विनी चैबे जैसे नेताओं का होगा तो दूसरा खेमा नंदकिशोर यादव जैसे नेताओं का. सुशील मोदी को लेकर भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी एक खेमा है, जिनमें नाराजगी का भाव रहता है, क्योंकि जब वे नीतीश कुमार के साथ सत्ता में थे तो कई बार ऐसे लगते थे जैसे वे भाजपा के नेता कम, जदयू के नेता या नीतीश कुमार के ‘पोसुआ हनुमान’ ज्यादा हैं. और तो और नरेंद्र मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार को बेहतर प्रधानमंत्री उम्मीदवार बतानेवाले बयान का इतिहास भी उनके साथ जुड़ा है, जो आए दिन भाजपा कार्यालय में उनके विरोधी नेता सुनाते रहते हैं. सुशील मोदी के बाद नंदकिशोर यादव का नाम भाजपा खेमे में उठता है. नंदकिशोर संघप्रिय भी हैं और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके हंै, सो कार्यकर्ताओं पर भी पकड़ है. इन्हें सामने करने से यादव मतों में बिखराव की भी उम्मीद की जाती है लेकिन उनकी सीमा सुशील मोदी की तरह ही मानी जाती है. उनके व्यक्तित्व में भी कभी राज्यव्यापी अपील नहीं रही. इन दोनों नेताओं के बाद एक लंबी फेहरिस्त है भाजपा में, जो समय-समय पर सीएम उम्मीदवार बन जाने का सपना देखते रहते हैं. इनमें लोकसभा में हार चुके शाहनवाज हुसैन, पटना सांसद व दुर्लभ बने रहनेवाले सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत कई नेता हैं. अब भाजपा तय नहीं कर पा रही कि किसे सामने लाए. बात इतनी भी नहीं, अगली बात यह है कि अगर नंदकिशोर यादव या सुशील मोदी में किसी का नाम सामने लाया जाता है तो भाजपा में खुलेआम लड़ाई तय है और िभतरघात को रोकने मंे कोई सक्षम न हो पाएगा, क्योंकि भाजपा में अंदरूनी तौर पर बिहार में किस स्तर की लड़ाई और खेमेबाजी ने कितनी दूरियां बढ़ा दी हैं, यह भाजपा का एक सामान्य कार्यकर्ता भी जानता है.

तो क्या बिन नेता पार कर लेंगे नैया

तब सवाल उठता है कि क्या बिना किसी नेता को सामने किए ही भाजपा बिहार में बेड़ा पार करना चाहेगी? यह सवाल इसलिए भी अहम बन जाता है, क्योंकि इसका संकेत भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने विराट कार्यकर्ता सम्मेलन में दिया था. शाह ‘जय-जय बिहार- भाजपा सरकार’ का नारा देते हुए विदा हुए थे और यह कह गए थे कि जब तक दो तिहाई बहुमत नहीं आता है, तब तक किसी कार्यकर्ता को चैन से नहीं बैठना है. शाह गांधी मैदान में नसीहतों की घुट्टी तो पिला गए थे लेकिन भूल गए थे कि वे खुद पहले ही एेलान कर चुके हैं कि बिहार में वे चुनाव नेता की घोषणा कर लड़ेंगे. भाजपा के एक खेमे का मानना है कि नरेंद्र मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ना ठीक होगा और बाद में महाराष्ट्र या हरियाणा की तर्ज पर किसी नेता को सामने करना ठीक होगा. लेकिन भाजपा के लिए बिहार में यह प्रयोग करना आसान न होगा, क्योंकि बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मिलन के बाद यह तय हो चुका है िक इस बार चुनाव विशुद्ध रूप से जातीय गणित के आधार पर होगा और जातियों की गोलबंदी मजबूत एजेंडे के साथ सामने एक मजबूत नेता के रहने पर ही होती है.

दूसरी बात यह भी कि बिहार में अब चुनावी लड़ाइयां व्यक्तित्वों के आधार पर लड़ने का ट्रेंड हो चुका है. लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की भी लड़ाई एजेंडे से ज्यादा व्यक्तित्व की लड़ाई थी. विगत लोकसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की ही लड़ाई हुई थी. हालांकि वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं कि लड़ाई एजेंडे पर होगी और उसमें भाजपा पिछड़ जाएगी. राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि लड़ाई एजेंडे पर भी होगी तो भाजपा अब पहलेवाली नहीं रही है. नीतीश और लालू एक हो गए हैं लेकिन महाविलय में मांझी का बाहर रहना भाजपा के लिए रामबाण का काम करेगा.

और अगर लड़ाई एजेंडे पर हुई तो…

बिहार का चुनाव इस बार जाति के आधार पर होना है यह तय है लेकिन ऊपरी तौर पर विकास और सामाजिक न्याय का एजेंडा रहेगा. सामाजिक न्याय के एजेंडे पर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव एक मजबूत नेता हैं और उनकी पहचान रही है. उन दोनों नेताओं से मुकाबला करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन मानते हैं कि राजनीति में कभी भी लड़ाई व्यक्तित्व और एजेंडे पर होती है और लालू सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत करनेवाले नेता रहे हैं. नीतीश कुमार ने उसमें विकास, गवर्नेंस आदि का मामला जोड़कर न सिर्फ बिहार बल्कि उत्तर भारत की राजनीति को प्रभावित किया है, इसलिए वे बड़े नेता हैं और एजेंडा सेटर भी. महेंद्र सुमन की बात सही है. नीतीश इस मामले में एक बड़े नेता रहे हैं और उनकी पहचान भी वही रही है. सामाजिक न्याय के एजेंडे पर लड़ने के लिए भाजपा के पास नरेंद्र मोदी की जाति, बिहार के भाजपा नेताओं में सुशील मोदी, नंदकिशोर आदि का पिछड़ी जाति से आना और उपेंद्र कुशवाहा-रामविलास पासवान जैसे नेताओं के साथ रहने से उम्मीद जगती है. भाजपा को यह भी उम्मीद है कि वह ‘जंगलराज’ का नारा लगाकर लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के साथ आने के मसले को भुनाएगी और इसे प्रचारितकर बेड़ा पार कर लेगी. जैसा कि भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन कहते हैं, ‘नीतीश कुमार और लालू प्रसाद अकेले चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं, डरे हुए हैं, इसी से पता चलता है कि वे खुद पर कितना भरोसा खो चुके हैं.’ भाजपा नेताओं के ऐसे तर्क होंगे, और यही तर्क चलाने की कोशिश भी होगी. भाजपा के नेता यह भी बताने की कोशिश में लगे हुए हैं कि नरेंद्र मोदी से लेकर बिहार तक में पिछड़े नेताओं की भरमार है. इसका असर भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर इस बार नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद होंगे. नीतीश कुमार अगर मौन साधकर भी खुलेआम कुछ नहीं बोल सकेंगे तो लालू प्रसाद उसकी भरपाई करते हुए सामाजिक न्याय की आक्रामक बातों को रखकर गोलबंदी की कोशिश करेंगे, जिसे करने में भाजपा को कई बार सोचना होगा, क्योंकि भाजपा अपने बड़े वर्ग सवर्णों को किसी भी हाल में हाथ से निकलने नहीं देना चाहेगी. सामाजिक न्याय के बाद विकास के एजेंडे पर बात होगी तो इस मसले पर भाजपा नेताओं को थोड़ी राहत मिल सकती है और वे इस बात का प्रचार अभी से ही कर रहे हैं कि नीतीश कुमार ने बिहार में तब तक ही कोई काम किया, जब तक भाजपा उनके साथ रही. भाजपा से अलगाव के बाद वे बिहार में कोई काम नहीं कर सके हैं. साथ ही भाजपा इस बात का भी प्रचार करेगी कि जो नीतीश कुमार, लालू प्रसाद के कुशासन और जंगलराज और विकास का काम खत्म हो जाने का एजेंडा बनाकर शासन में आए थे, वे फिर से उसी लालू प्रसाद के साथ हो गए हैं तो बिहार में विकास का काम फिर से भंवरजाल में फंस जाएगा. इसके अलावा भाजपा को एक उम्मीद पहली बार केंद्र की ओर से बिहार के लिए मिले खास पैकेज को प्रचारित कर फल पाने पर है. हालांकि सूत्र यह बताते हैं कि भाजपा विकास को लेकर एक दूसरे एजेंडे पर भी काम कर रही है और संभव है कि अगले दो माह में नरेंद्र मोदी खुद बिहार में आकर ऐसी लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा करेंगे, जिससे माहौल बदलेगा. अभी भी सच्चाई यही है कि बिहार में विकास के एजेंडे को जब नीतीश कुमार मसला बनाने की कोशिश कर रहे हैं, भाजपा उन्हें घेर लेने में सफल हो जा रही है. यही उम्मीद भाजपा को सपने पालने की छूट दिए जा रही है. लेकिन सामाजिक न्याय का एजेंडा हो या विकास का मसला, इस बार चुनाव में यह दूसरे मसले होंगे, सारा गणित जातियों के आधार पर लगना है और वह गणित इस बार लगातार उलझता हुआ दिख रहा है. मांझी फैक्टर अलग समीकरण बना रहा है. पप्पू यादव की बगावत अलग कहानी कहेगी.

जाति की राजनीति में कहां टिकेगी भाजपा

भाजपा के सामने तमाम बातों के बीच लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के मिलन के बाद बड़ा सवाल होगा कि जाति की राजनीति में वह कहां टिकेगी? भाजपा किसी तरह बिहार में तीन ध्रुवों की लड़ाई चाहती है, जिसमें एक ध्रुव पर लालू प्रसाद-नीतीश का गठबंधन हो, दूसरे ध्रुव पर भाजपा हो और तीसरे ध्रुव पर जीतन राम मांझी के साथ विद्रोहियों-बगावतियों का खेमा हो. इसलिए बार-बार जीतन राम मांझी द्वारा भाजपा को समर्थन देने का एेलान करने के बाद भाजपा नेता उस बारे में कुछ भी कहने से बच रहे हैं. भाजपा नेताओं को पता है कि मांझी को बैक सपोर्ट करके अलग से ही चुनाव लड़ाने से फायदा हो सकता है, सीधे साथ आ जाने से नुकसान की संभावना ज्यादा है, क्योंकि तब दो ध्रुवीय लड़ाई होगी और भाजपा की राह आसान नहीं रह जाएगी. भाजपा नेताओं का गणित है कि सवर्ण, वैश्य, कुशवाहा, पासवान तो सीधे उसकी झोली में हैं. पप्पू यादव के बगावत के बाद कोसी इलाके का नीतीश और लालू प्रसाद का समीकरण गड़बड़ा सकता है. जीतन राम मांझी के कारण महादलितों का वोट इधर-उधर होगा और इतना मैनेज करने के बाद रास्ता आसान रहेगा. यह कहने-सुनने में तो आसान लगता है लेकिन इस रास्ते मंे दुविधा और पेंच ज्यादा हैं. उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान, दो ऐसे संगी साथी भाजपा के हैं, जो भाजपा की वजह से जीवनदान पाकर तो राजनीतिक रूप से पुनर्जीवित जरूर हुए हैं लेकिन अब उनकी अपनी महत्वाकांक्षा है. लोजपा कार्यालय के बाहर चिराग पासवान बिहार के भावी सीएम के रूप में टंगे मिलते हैं तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा की कोई मीटिंग इस नारे के बिना अधूरी रहती है कि बिहार का सीएम कैसा हो-उपेंद्र कुशवाहा जैसा हो, इन नारों का मतलब साफ है कि उपेंद्र या रामविलास पासवान जानते हैं कि चुनाव में बेड़ा पार करने के लिए अपने आधार के विस्तार के लिए भाजपा को उन पर निर्भर रहना पड़ेगा, इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा मोलभाव करना चाहेंगे. दूसरा पेंच जीतन राम मांझी को लेकर है, जो अपनी रैली में तो खुलेआम कहते हैं कि वे भाजपा के साथ जा सकते हैं लेकिन बाद में यह भी कह देते हैं कि अगर उनका नेतृत्व स्वीकार हो तो वे लालू-नीतीश के साथ भी जा सकते हैं. यानी जीतन राम मांझी को लेकर भाजपा भी निश्चित नहीं है िक वे आखिरी समय तक किधर रहेंगे और अगर मांझी ने पलटी मारी तो भाजपा का सारा का सारा खेल गड़बड़ा सकता है. पप्पू यादव जैसे नेता भले ही आज बगावती तेवर अपनाकर कोसी इलाके में लालू-नीतीश के लिए परेशानी बनते दिख रहे हों लेकिन वह भाजपा के लिए मददगार साबित होंगे या रास्ता कुछ और तलाशेंगे, अभी कहना मुश्किल है.

चुनाव में सारा गणित जातियों के आधार पर लगना है. मांझी फैक्टर अलग समीकरण बना रहा है. पप्पू यादव की बगावत भी अलग रंग दिखाएगी

भाजपा के लिए जातियों की राजनीति साधने में तीन बिंदुओं को ही साधना सबसे बड़ी चुनौती है. एक तो किसी तरह से महादलितों के वोट को लालू-नीतीश के पाले में जाने से रोकना. दूसरा मुस्लिम मत, जो एकमुश्त इस बार लालू-नीतीश के खाते में जाएंगे, उसमें बिखराव लाना और तीसरा यादव मतों का बिखराव कराना. इसके लिए भाजपा अपनी ओर से तैयारी कर रही है. मुस्लिम मतों के बिखराव के लिए साबिर अली जैसे नेताओं को प्रोमोटकर भाजपा अलग से मुस्लिम नेताओं की पार्टी बनवाना चाहती है. यादव मतों के लिए रामकृपाल यादव और नंदकिशोर यादव को अपने पाले में रखने के बाद वह पप्पू यादव में संभावनाओं के सूत्र तलाश रही है और महादलितों के लिए एकमात्र उम्मीद के तौर पर जीतन राम मांझी हैं. लेकिन इन तीनों योजनाओं में से कोई भी एक योजना ऐसी नहीं है, जिस पर आखिरी समय तक भरोसा किया जा सके.

 …और यह भाजपा के भविष्य का चुनाव है

भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इस बार आरएसएस की ओर से दत्तात्रेय होसबोले जैसे  संगठनकर्ता कमान संभाल रहे हैं. पार्टी के एक नेता बताते हैं कि बिहार मंे हम किसी भी तरह से हार नहीं चाहते. इसलिए बिहार भाजपा के एक खेमे में यह सुगबुगाहट भी है कि कोई रास्ता न दिखे तो फिर नीतीश के साथ ही जाने में कोई बुराई नहीं. अगर नीतीश के साथ गए तो फिर बी टीम ही बनकर रहना होगा. हालांकि नीतीश कुमार से मिलन की बात आगे नहीं बढ़ पा रही, क्यांेकि दोनों को पता है कि अगर बिहार के भाजपा नेताओं का साथ नहीं मिलेगा, वे िभतरघात करेंगे तो फिर कोई समीकरण काम नहीं आ सकेगा.            l

सेक्स प्रेम की अभिव्यक्ति हो हिंसा की नहीं

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वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) की बात करते समय यह तो जान लें कि विवाह कहते किसे हैं? कानून के अनुसार विवाह उस व्यवस्था को कहते हैं जिसके भीतर जन्म लेनेवाली संतान जायज संतान कही जाती है. जाहिर है कि जब विवाह को संतान के जन्म से जोड़कर ही परिभाषित किया गया है तो इसमें पति-पत्नी के बीच का दैहिक रिश्ता ही है जो उन्हें दंपति बनाता है. दांपत्य के भीतर पति-पत्नी के बीच प्यार, मित्रता, शत्रुता, उदासीनता, उनमें आयु, शिक्षा, पृष्ठभूमि और विचारों के अंतर के बारे में कानून मौन रहता है. ऐसे में इच्छा-अनिच्छा और सहमति-असहमति का प्रश्न जटिल हो जाता है.

वैवाहिक बलात्कार का मसला मीडिया में भले ही आज उठ रहा है, लेकिन यह कोई नया मसला नहीं है. महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा को रोकने के लिए बने हमारे नारीवादी संगठन ‘सुरक्षा’ ने 1989 में लखनऊ में वैवाहिक बलात्कार पर गोष्ठी आयोजित की थी, जिसमें तत्कालीन डीआईजी कंचन चौधरी और कानून के प्रो. बलराज चौहान भी शामिल हुए थे. प्रोफेसर चौहान ने बताया था कि कानून 498 ए, के तहत शारीरिक और मानसिक क्रूरता के लिए दंड की व्यवस्था है, इसलिए अलग से कानून नहीं बनाया गया. मगर हमारा मूल प्रश्न अनुत्तरित रह गया था. जहां परस्पर प्रेम के अभाव, वैमनस्य, उदासीनता और अपमानजनक व्यवहार के कारण दैहिक संबंध ही क्रूरता मालूम हो, वहां क्या हो? जहां न हिंसा हो, न मारपीट वहां क्या सेक्स को क्रूरता कहकर 498 ए में दंडित कर देंगे?

पिछले तीस सालों में परिवार के भीतर शोषण की शिकायत लेकर आई हजारों किशोरियों, युवतियों और महिलाओं के लंबे बयान बताते हैं कि दिन भर गाली-गलौज और मारपीट करनेवाले निम्न आयवर्ग के पति से लेकर, सारा दिन घमंड में चूर रहकर पत्नी से सीधे मुंह बात तक न करनेवाले अमीर पति तक रात में शयनकक्ष में स्त्री को यौनदासी के रूप में इस्तेमाल करते हैं. ऐसे पति, पत्नी को बेवफा और बदचलन बताते हैं पर उन्हें घर छोड़कर जाने भी नहीं देते. वह चली जाएगी तो उनकी रोज की खुराक कैसे पूरी होगी? इस तरह स्त्री शरीर उनके रोजाना उपयोग की चीज है. स्त्री रोग विशेषज्ञ भी बताती हैं कि किस प्रकार जच्चा-बच्चा अस्पताल में बच्चे को जन्म देने के लिए भर्ती पत्नी के पति अस्पताल में ही बलात्कार करते हैं और और उन्हें क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा रहने देते हैं. यह बातें हम सब जानते हैं, पर कहते नहीं.

वैवाहिक बलात्कार का मामला इतना सरल नहीं है. यह जानना भी रोचक होगा कि यदि पत्नी घर छोड़कर चली जाए तो उसे वापस बुलाने के लिए हिंदू विवाह कानून की धारा 9 के तहत दावा किया जाता है जिसे बोलचाल की भाषा में तो रुखसती का दावा कहा जाता है मगर उसका कानूनी नाम है ‘रेस्टिट्यूशन ऑफ कांजुगल राइट्स’ यानी दैहिक संबंधों पर अधिकार की पुनर्स्थापना यानी पति का पत्नी से दैहिक संबंध रखने का हक. यदि वह प्रताड़ित होकर भी घर छोड़कर गई है तो भी वापस आकर पति को यह हक सौंपे. यह हक पत्नी को भी है मगर हम सब जानते हैं कि यह दावा पति ही करते हैं. यह स्पष्ट है कि विवाह शरीर पर हक देता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था चलाने के लिए परिवार ही सबसे ताकतवर इकाई है. पितृसत्तात्मक और पैट्रीलोकल व्यवस्था में विवाह का अर्थ स्त्री का सब कुछ पीछे छूट जाना है और पुरुषों को सबकुछ मिल जाना. अपने पुराने परिवार के साथ एक स्त्री भी जो प्रेमिका, पत्नी, संगिनी भी है और सेविका और यौनदासी भी. वह जायदाद का हिस्सा है जिसे जैसे चाहे इस्तेमाल करे.

एक स्त्री ने बताया, उसका पचास वर्ष का पति 16-17 साल की निर्धन लड़कियों को घर लेकर आता है और उसके और बच्चों के सामने ही उनसे संसर्ग करता है

दिल्ली में जब निर्भया कांड हुआ तो उसमें बलात्कार के अलावा मिसोजिनिस्ट (नारी द्वेषी) क्रूरता, बर्बरता, नृशंसता और वहशत शामिल था. हमारे संगठन में हुई चर्चा में अनेक संपन्न परिवारों की प्रतिष्ठित पतियों की पत्नियों ने बताया कि उनके पति तो पिछले 20 वर्षों से इस प्रकार का अस्वाभाविक आचरण कर रहे हैं. बस वे मरी नहीं हैं. माथे पर बिंदी लगाकर, मांग में सिंदूर भरकर, बार्डर और पल्ले की साड़ी पहनकर संभ्रात होने का नाटक रचती इन महिलाओं के कारण ही ‘प्रसन्न भारतीय परिवार’ की छवि बनी रहती है.

वैवाहिक बलात्कार सहते रहने का एक कारण मां होना भी है. कुछ वर्ष पहले हमारे पास एक युवा सिख दंपति का मामला आया था. पति दुकान पर गया हुआ था तो उसकी अनुपस्थिति में सास ने बहू पर उबलता हुआ दूध डाल दिया, फिर तेल छिड़क कर आग लगाने दौड़ी. बहू ने जेठानी के बेटे को दुकान पर भेजकर पति को बुलाने भेजा. पति नहीं आया. रात को लौटा. किस्सा सुनने के बाद भी बैठकर खाना खाता रहा. पत्नी मायके चली गई. पुलिस की मदद से जब हमने पति को बुलवाया तो वह माफी मांगने लगा, पैर छुए और कहने लग, ‘तू बस एक बार घर चल.’ हम लोग द्रवित हो गए और हमें लगा कि संभव है उसका मन बदल गया हो. हमने उससे घर लौट जाने को कहा. वह बोली इसके कहने का मतलब है एक बार तू घर चल जब मां बना दूंगा तो फिर देखता हूं कहां जाएगी? वह भाग्यशाली थी, घर नहीं गई. आज जीवित है और खुश भी. वह अन्य महिलाओं के केस भी सुलझाती है. यदि मां बन गई होती तो क्या वह घर छोड़ पाती?

बलात्कार का अर्थ है कि स्त्री की असहमति से संसर्ग करना, या उसे झांसा देकर संसर्ग करना. पत्नी असहमत क्यों है? असहमत है तो यहां क्यों पड़ी है? घर क्यों नहीं छोड़ देती? क्या आदमी हर बार बाॅन्ड पेपर पर लिखकर सहमति मांगेगा? औरतें भी तो ऐसी हैं, सहूलियतें तो सारी चाहिए और इस बात पर नखरे. ऐसा कहने वाले कई हैं और ऐसा सोचने वाले अधिकांश. इस बात पर स्पष्टता से कह पाना नामुमकिन है कि पति-पत्नी का संबंध किस दिन बलात्कार कहलाएगा और किस दिन संबंध- मगर जानते समझते हम सब हैं कि वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था में पत्नी के शरीर पर पुरुष का वर्चस्व है. यह विधि सम्मत है और समाज सम्मत भी. इसी कारण 376 की धारा में पति को शामिल नहीं किया गया है. आज यदि हमारे देश की सरकारें और न्यायपालिका यह कर रही हैं कि ऐसा कानून भारतीय संस्कृति के खिलाफ है, तो क्या वे यह कह रही हैं कि हमारी संस्कृति बलात्कार को प्रश्रय देती है, या वे यह कह रही है कि बलात्कार का इल्जाम लगाएगी तो औरत जाएगी कहां? वह बेघर हो जाएगी. इसका अर्थ तो यह हुआ कि यदि इस घर में रहना है तो अपनी मर्जी के विरुद्घ यौनदासी बनकर रहना होगा. रोटी और छत के बदले यौन सेवा. यह एक सोचने की पद्धति है जिसमें हम मानव को शरीर के रूप में एसेंशियलाइज करते हैं. पुरुष भोक्ता है और स्त्री भोग की वस्तु. इन सारी बातों के आलोक में जब घरेलू हिंसा निवारण विधेयक बन रहा था, उसमें उत्तर भारत के सलाहकारों में हम लोग भी शामिल थे. उसमें शारीरिक, मानसिक हिंसा के साथ-साथ खासतौर पर यौन हिंसा को भी शामिल किया गया था. यौन हिंसा का दायरा बलात्कार से ज्यादा व्यापक है. और फिर बलात्कार भी क्या केवल पति करता है? ‘चादर डालना’, ‘रख लेना’, ‘चूड़ी पहनाना’ आदि क्या है? क्या किशोरियों का बलात्कार चाचा, फूफा और उनके बेटे नहीं करते? यदि न्यायपालिका घरेलू हिंसा कानून (2005) को इसकी पूर्ण भावना से लागू करे तो वैवाहिक बलात्कार करनेवाले को भी दंडित किया जा सकेगा. मेरी राय में यह कानून पर्याप्त है.

नया कानून असली पीड़ित को न्याय नहीं दे सकेगा. वैवाहिक बलात्कार होते ही तब हैं जब पति को विश्वास हो कि पत्नी भयभीत और निरुपाय है. अभी हाल में एक स्त्री आई जिसके दो बेटे हैं. उसका पचास वर्ष का पति 16-17 साल की निर्धन लड़कियों को घर लेकर आता है और उसके और बच्चों के सामने ही उनसे संसर्ग करता है. मां-बेटे रोते हैं. हमने कहा इस बार तुम मायके में रह जाओ. यहां कोई काम कर लो. वह बोली पति एक-एक महीने के अंतराल पर ही दो बार तलाक कह चुका है, तीसरी बार कह दिया तो बच्चों को लेकर कहां जाऊंगी? हमने कहा, फोन पर ही तो कहा है, किसने सुना, तुम कचहरी में इंकार कर देना, ‘नहीं दीदी, खुदा तो देख ही रहा है.’ खुदा से डरने वाली इस नेक बंदी ने इससे भी ज्यादा दर्दनाक बात यह बताई की तमाम अनैतिक रिश्तों के बावजूद पति उसके साथ प्रतिदिन संसर्ग करता ही है. इस कारण से उसे अपने शरीर से घृणा होती जा रही है, क्या यह सामान्य स्त्री अदालत में यह बयान दे पाएगी? लोग कहते हैं कि दहेज के झूठे केस चलाए जा रहे हैं. एक सच यह भी है कि मामला यौन हिंसा और वैवाहिक बलात्कार का होता है पर मुकदमा दहेज का लिखवाना पड़ता है.

यह समय सनसनीखेज चर्चा चलाने का नहीं है. नारी  विमर्श के नाम पर सामान्य यौन आकांक्षा और कामोन्माद में फर्क न करने वालों के लिए यह सरस चर्चा है पर जनसामान्य के लिए नारकीय यंत्रणा. अस्वाभाविक आचरण अपने चरम पर है. अनेक मामलों में पुरुष पोर्न फिल्में दिखाकर पत्नी को वैसा ही आचरण करने पर बाध्य करते हैं. एक युवा लड़की शादी के एक महीने बाद ही तलाक लेने आ गई और उसे अपने पति से शिकायत थी, ‘ही यूजेज मी लाइक अ बॉय.’ समलैंगिक लड़के भी घर की सफाई और रोटी-पराठे बनाने के लिए लड़कियों से शादी करके उन्हें इस प्रकार उत्पीड़ित करते हैं.

यह समय गंभीर अंतर्दर्शन का है. स्त्री-पुरुष समकक्षता की चेतना जगाए बिना इस समस्या का समाधान नामुमकिन है. सेक्स प्रेम की अभिव्यक्ति हो न कि हिंसा की. शादी को वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन का उपकरण न बनाएं, इस भावना के साथ चलकर ही इसे रोका जा सकता है.

दोराहे पर राय

Muslim brides sit as they wait for the start of a mass marriage ceremony in Ahmedabad

 

बलात्कार पर दो नजरिए कभी नहीं हो सकते. बलात्कार हर हालत में बलात्कार होता है, चाहें वह सड़क पर हो या किसी शादीशुदा जोड़े के बेडरूम में. अपराधी पति, पिता, भाई या प्रेमी, कोई भी हो अगर उसने घर के अंदर या बाहर बलात्कार किया है तो उसे कभी भी कमतर यौन हिंसा के बतौर नहीं देखा जाना चाहिए. अगर इस सामान्य से तथ्य को पैमाना बनाकर एक प्रगतिशील कानून और वैधानिक सुधार के लिए पहल की जाए तो हमारी न्यायपालिका और राजनीतिक संगठन एक बेहतर लोकतांत्रिक और समतामूलक समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़गी.

2012 में भयावह निर्भया बलात्कार कांड के बाद घटी बहुत सी घटनाओं ने बलात्कार को देश की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के लिए चिंता का विषय बना दिया था. आपराधिक कानून में संशोधन के लिए न्यायाधीश जेएस वर्मा के नेतृत्व में एक समिति गठित की गई. वर्मा समिति द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में बहुत सारे सुझाव शामिल किए गए. वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को लेकर कई सिफारिशें कीं जैसे यौन प्रताड़ना को परिभाषित करने की बात ताकि इसमें असहमति और यौन प्रकृति के दूसरे कृत्यों को शामिल किया जा सके. समिति ने सिफारिश की थी कि आईपीसी के तहत वैवाहिक बलात्कार को मिली छूट भी हटाई जानी चाहिए. हालांकि जब समिति की सिफारिशों को गृह मंत्रालय की संसदीय स्थाई समिति के पास भेजा गया तो समिति के दो सदस्यों को छोड़कर सभी ने इन सिफारिशों को सिरे से खारिज कर दिया. आखिर क्या कारण है कि हमारे सांसद वैैवाहिक बलात्कार का मुद्दा उठने के साथ ही असहज हो जाते हैं?

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव शकील अहमद ‘तहलका’ से बातचीत में कहते हैं, ‘मीडिया में आई बहुत सारी रिपोर्ट और सर्वेक्षण के अनुसार, हमारे यहां की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों की वजह से औरतों की स्थिति लाभवाली नहीं है. इस संबंध में वर्मा समिति ने कुछ सिफारिशें की हैं लेकिन सवाल ये है कि साथ रह रहे लोगों की गतिविधियों पर कानून कैसे नजर रखेगा. इस वजह से इस मुद्दे पर एक राष्ट्रीय स्तर पर बहस चलाने की दरकार है. किस तरह का कानून होना चाहिए इसे लेकर आम सहमति बनाने की जरूरत है.’

वैवाहिक बलात्कार को लेकर तमाम राजनेताअों ने समय-समय पर अपनी चिंता जताई  है. ये चिंताएं मुख्य रूप से दो सामाजिक मिथकों पर आधारित हैं. पहला, एक शादीशुदा महिला इस कानून का अपने पति के खिलाफ दुरुपयोग कर सकती है. दूसरा, दंपति के बेडरूम में घुसपैठ करने की इजाजत कानून को नहीं मिलनी चाहिए. भाजपा सांसद महेश गिरि के अनुसार ‘वैवाहिक बलात्कार जैसे जटिल मामले को देखते हुए थाने में बैठे पुलिस अधिकारियों को पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केस दर्ज किए जाने योग्य है या नहीं. नहीं तो अक्सर यह देखने को मिलता है कि पति से बदला लेने के लिए पत्नी उस पर दुष्कर्म का आरोप लगा देती है.’

1980 के दशक में चले जोरदार महिला आंदोलनों की बदौलत महिलाओं से जुड़े बहुत सारे मुद्दों को लेकर सीधे-सीधे कानून बनाया जा सका था. इसी दौर में विधायिका ‘दहेज हत्या’ और ‘दहेज प्रताड़ना’ को घरेलू हिंसा के तहत जोड़कर देख रही थी, जिसे समीक्षा के तहत रख दिया गया. उस दौर के कानून के मुताबिक दहेज प्रताड़ना में सिर्फ घरेलू हिंसा को जोड़ा गया था. इसलिए आईपीसी में संशोधन की जरूरत महसूस की गई. इसी संदर्भ में 1998 में घरेलू हिंसा (रोकथाम) अधिनियम अस्तित्व में आया.

परिवार के अंदर किसी भी महिला के प्रति शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक तौर पर हिंसा को घरेलू हिंसा (रोकथाम) अधिनियम, 1998 के तहत रखा गया. इसके अलावा दहेज की धारणा भर को भी घरेलू हिंसा के तहत माना गया. अिधनियम के तहत यह भी माना गया कि मां, बेटियां, बहनें और पत्नियाें के अलावा अनौपचारिक संबंधों में

रह रहीं महिलाएं भी घरेलू हिंसा की शिकार हो सकती हैं.

इस अधिनियम ने जब प्रगतिशील लैंगिक राजनीति के दरवाजे खोले तब इसके दुरुपयोग के भी सवाल उठे. इसी वजह से शकील अहमद  और महेश गिरि जैसे नेता वैवाहिक बलात्कार के संदर्भ में संदेह प्रकट कर रहे हैं, क्योंकि घरेलू हिंसा (रोकथाम) अधिनियम 1998 के तहत कई सारे ऐसे मामले भी दर्ज कराए गए जो बाद में झूठे साबित हो गए थे. हालांकि जब कोई उन झूठे मामलों की ओर देखता है तो वह इसे घरेलू हिंसा के दर्ज न होने वाले मामलों की तुलना में नगण्य पाता है.

घरेलू हिंसा (रोकथाम) अधिनियम का दुरुपयोग कोई भी महिला अपनी दुश्मनी निभाने के लिए कर सकती हैं, जैसे अनगिनत तर्क 1998 में इसे लागू होने से नहीं रोक सके बल्कि साल 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम से इसे और मजबूती मिली. बाद में इसके दुरुपयोग किए जाने का तर्क हल्का साबित होने लगा जब ये पाया गया कि इस कानून की मदद से बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू हिंसा से लड़ाई  लड़ने में सक्षम हो गईं. 2005 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, महिलाओं के साथ काेई और नहीं बल्कि सबसे ज्यादा यौन हिंसा उनके पतियों ने ही की है. वैवाहिक बलात्कार से जुड़े मौजूदा कानून के तहत पति को छूट देकर भारत में यौन हिंसा के खिलाफ लड़ाई को पंगु बनाने का काम किया जा रहा है.

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष का कहना है कि शादी किसी भी पुरुष को उसकी पत्नी की इच्छा के विरुद्घ उससे संबंध बनाने की इजाजत नहीं देती. दूसरे शब्दों कहा जाए तो जब वैवाहिक बलात्कार की बात होती है तो मुख्य मुद्दा ‘सहमति’ ही होता है. लेकिन क्या कानून ने ‘सहमति’ और स्वीकार्य यौन हिंसा के बीच दीवार खड़ी कर दी है?

दो साल पहले भारतीय शयनकक्षों में जबरन कानून तब लागू किया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को गैरअपराध मानने के खिलाफ आदेश दिया. कोर्ट ने तब यह घोषित किया था कि आईपीसी की धारा 377 के अनुसार किसी भी तरह का सेक्स, चाहें वो सहमति से हो या असहमति से और जो अप्राकृतिक हो उसे अपराध माना जाएगा. तब ‘अप्राकृतिक यौन संबंधों’ को लेकर कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आवाज उठाई थी, लेकिन इसे पूरी तरह से नकार दिया गया.

वैवाहिक बलात्कार के मामले में कानून की स्थिति जो भी हो, उनमें यही कहा जाएगा कि कोई भी जब शादी कर लेता है तब उसके मूल अधिकार खत्म हो जाते हैं

ऐसे में तमाम तरह की शैलियों में होने वाले यौन संबंधों को लेकर सवाल उठाए गए. उन्हें कानूनी और गैरकानूनी मानने को लेकर बहसों का दौर चला, लेकिन अदालत ने इन तमाम सवालों से किनारा करके सिर्फ स्त्री-पुरुष संबंधों को बरकरार रखने तक सीमित रखा है. हालांकि अपने आदेश में अदालत ने संसद में धारा 377 की प्रासंगिकता पर बहस की जरूरत पर बल जरूर दिया. ‘वैवाहिक अधिकारों की बहाली’ शीर्षक वाले हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अगर दांपत्य जीवन में पति या पत्नी में से कोई भी साथ छोड़ देता है तो ऐसी स्थिति में अदालत उसे वापस उसके साथ घर जाने का आदेश दे सकती है.

इस मसले पर 1983 में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा था कि यह कानून व्यक्तिगत यौन स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है. विवाह को पवित्र संस्था मानने से इंकार करते हुए टी. सरीता बनाम वी. वेंकटसुबैया मामले में न्यायाधीश जे. चौधरी ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि धारा 9 वैवाहिक संबंधों में यौन संबंध बनाने या न बनाने के किसी व्यक्ति के अधिकार को राज्य को सौंप देती है. उन्होंने आदेश दिया कि इस तरह से अधिकारों का हस्तानांतरण किसी व्यक्ति की संपूर्णता को नुकसान पहुंचाएगा. साथ ही उसके या उसकी वैवाहिक और घरेलू निजता का उल्लंघन करेगा. हालांकि धारा 9 दंपति (पति या पत्नी) के बीच जबरन संबंध बनाने का अधिकार नहीं देती है. न्यायाधीश चौधरी का मानना था कि महिला को ऐसा करने पर बाध्य होना पड़ता है क्योंकि स्त्री-पुरुष के बीच खासकर वैवाहिक संबंधों में शक्ति पुरुष के हाथों में ही होती है. इस मामले में निष्कर्ष के तौर पर न्यायाधीश ने एक व्यक्ति विशेष के अधिकारों को ऊपर रखते हुए कहा था कि धारा 9, संविधान के अन्तर्गत अनुच्छेद 21 के तहत देश के नागरिकों को जीवन जीने और निजी स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन है.

दुर्भाग्यवश, दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायाधीश चौधरी के फैसले को एक साल के भीतर ही पलटते हुए यह कहा था कि संविधान के प्रावधानों को बेडरूम में घुसपैठ की इजाजत देना ‘चीनी मिट्टी के बर्तन की दुकान में सांड़’ को प्रवेश की अनुमति देने जैसा है और इसके चलते विवाह नाम की संस्था बर्बाद हो जाएगी. उस साल के बाद में दिल्ली हाई कोर्ट के ‘विवाह संस्था को बचाए रखने’ की दलील से सुप्रीम कोर्ट भी सहमत दिखा. बहरहाल वैवाहिक बलात्कार के मामले में कानून की स्थिति जो भी हो, लेकिन जो स्थितियां हैं उनमें यही कहा जाएगा कि कोई भी जब शादी के बंधन में बंध जाता है तब उसके मूल अधिकार समाप्त हो जाते हैं. लोकतंत्र के लिहाज से हकीकत में यह अच्छी बात नहीं है.

 वरुण बिधुड़ी के सहयोग से

‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस !’

आज के दिन 18 साल से बड़ी (बालिग) लड़की अपनी मर्जी से विवाह कर सकती है, बिना विवाह के यौन संबंध बना सकती है, सहजीवन में किसी के भी साथ रह सकती है, बच्चा गोद ले सकती है, खुद बच्चा पैदा कर सकती है, कृत्रिम गर्भाधान का रास्ता अपना सकती है- इन सबका मतलब ये है कि कोई भी बालिग लड़की अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग कर सकती है.

1949 से 2013 तक (संशोधन से पहले) 16 साल से बड़ी उम्र की लड़की, अपनी मर्जी से किसी के भी साथ यौन संबंध बना सकती थी, जबकि लड़की के बालिग होने या विवाह योग्य उम्र 18 साल ही रही. सहमति से संभोग की उम्र, 16 साल से बढ़ाकर 18 साल इसलिए करनी पड़ी ताकि ‘देश की बेटियों’ को ‘यौन हिंसा’ से बचाया जा सके और कानूनी विसंगतियों को भी समाप्त किया जा सके.

अापराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 में सहमति से संभोग की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई है, मगर 15 साल से बड़ी उम्र की पत्नी से सहवास अभी भी बलात्कार नहीं माना जाता. सरकार ने ‘वैवाहिक बलात्कार’ संबंधी न तो विधि आयोग की 205वीं रिपोर्ट की सिफारिश को माना और न ही जेएस वर्मा आयोग की राय कि ‘भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए.’

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सवाल है कि क्या भारतीय समाज (संसद-अदालत) अपनी ‘बेटियों’ को तो यौन संबंधों से बचाना चाहता है, पर नाबालिग पत्नी से बलात्कार करने का कानूनी अधिकार (हथियार) बनाए-बचाए रखना चाहता है. 15 साल की नाबालिग पत्नी से बलात यौन हिंसा की ‘शर्मनाक’ कानूनी छूट को कैसे न्यायपूर्ण माना-समझा जा सकता है? बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देते इन अर्थहीन, विसंगतिपूर्ण और अंतर्विरोधी कानूनों से न बाल विवाह रोके जा सकते हैं और न ही बाल वेश्यावृत्ति.

नाबालिग पत्नी से यौन हिंसा की कानूनी छूट

बीते समय में दिल्ली की अदालत का एक फैसला सुर्खियों में रहा, जिसमें कहा गया था कि पत्नी से जबरन यौन संबंध बनाना बलात्कार का अपराध नहीं माना जाएगा. दरअसल इस पर बात करने से पूर्व इसके संक्षिप्त इतिहास पर गौर कर लेना ठीक होगा. 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट में पूर्ण खंडपीठ के समक्ष एक मुकदमा बाल विवाह की वैद्यता को लेकर पेश हुआ था- महादेव बनाम भारत सरकार का मुकदमा. महादेव एक गरीब व्यक्ति था जिसकी साढ़े पंद्रह साल की एक बेटी थी जिसने किसी लड़के के साथ भागकर शादी कर ली थी. पुलिस में मामला दर्ज हुआ और जब वह मिली तो गर्भवती थी. पुलिस जब लड़की को कोर्ट में लेकर आई तो मजिस्ट्रेट ने उसे पति के साथ नहीं जाने दिया. लड़की अपने पिता के साथ जाना नहीं चाहती थी. मजिस्ट्रेट ने अंततः उसे नारी-निकेतन भेज दिया. वह 18 साल की होने तक नारी-निकेतन में ही रही. उसकी डिलीवरी भी नारी निकेतन में ही हुई.

मामला मेरे पास आया तो मैंने पाया कि हाई कोर्ट के फैसले में बहुत विरोधाभास हैं. मैंने मामले को आगे बढ़ाया तब यह बाल-विवाह की वैधता को लेकर तीन न्यायाधीश की पूर्णपीठ के समक्ष प्रस्तुत किया गया था. बाल विवाह की वैद्यता के सवाल को लेकर बहुत से विरोधाभास थे और उस वक्त मुझे यह लगा कि यह एक ऐसा मामला है जिसके सहारे मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) पर बहस शुरू की जा सकती है. यहां उल्लेखनीय है कि जनता पार्टी के शासन (1978) में जब बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929 और हिन्दू विवाह अधिनियम, में संशोधन किए गए थे. 1978 में जब लड़की की शादी की उम्र 15 से बढ़ाकर 18 की गई, तब इसके कई पक्षों पर बहुत विचार-विमर्श किया गया था. मसलन मानसिक परिपक्वता से लेकर शारीरिक परिपक्वता तक.

जवाहर लाल नेहरू ने कहा है, हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं लेकिन पुरुषों से मर्यादा पुरुषोत्तम राम होने की नहीं

बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के मुताबिक, किसी भी लड़की की शादी की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 होनी अनिवार्य है. 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी 21 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कराना दंडनीय अपराध है और दो साल का सश्रम कारावास या एक लाख रुपये तक का आर्थिक दंड या फिर दोनों हो सकते हैं. मगर न तो विवाह अवैध माना जाता है और न ही शादी के वक्त यदि लड़के की उम्र 18 साल से कम है तो इसे अपराध माना जाता.

2013 के संशोधन ने विवाह और सहमति से संभोग की उम्र 18 साल कर दी है मगर धारा 375 के अपवाद में आज भी यह प्रावधान बना हुआ है कि (नाबालिग) पत्नी के साथ जिसकी उम्र 15 साल से अधिक है, जबरन यौन संबंध ‘बलात्कार’ नहीं माना जाएगा. इन कानूनों में किए गए प्रावधानों में जब सहमति से सहवास की उम्र 18 साल कर दी गई है, तब 15 साल से बड़ी पत्नी के साथ सहमति से भी यौन संबंध की स्वीकृति कैसे दी जा सकती है? 15 साल की उम्र शारीरिक और मानसिक परिपक्वता की दृष्टि से बहुत ही छोटी उम्र है और हां, इस उम्र में नाबालिग लड़की पर किसी भी तरह का दबाव बनाना ज्यादा आसान हो सकता है.

अन्यायपूर्ण कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती

मैंने दिल्ली हाई कोर्ट में एक और याचिका दायर की. इसमें मैंने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद (15 साल से बड़ी पत्नी के साथ सेक्स को बलात्कार नहीं माना गया है) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी. भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में उस वक्त यह प्रावधान किया गया था कि 12-15 साल तक की बीवी के साथ संबंध बनाने पर पति को दो साल की कैद या जुर्माना हो सकता है. यह जमानत योग्य अपराध था और इसमें अधिकारिक रूप से जमानत मिल सकती थी. इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई.

सीआरपीसी की धारा 198 (6) में यह प्रावधान किया गया था कि कोई भी कोर्ट मैरिटल रेप के मामले को संज्ञान में नहीं लेगा. इसका मतलब ये हुआ कि आप अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ अदालत भी नहीं जा सकते हैं. इसमें पत्नी की उम्र का भी कोई जिक्र नहीं किया गया था मतलब पत्नी किसी भी उम्र की हो सकती है. हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम में धारा 6(सी) के तहत एक और विचित्र प्रावधान है कि अगर पति और पत्नी नाबालिग हों तो पति, पत्नी का अभिवावक होगा. कानून के इन सभी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई. दिल्ली हाई कोर्ट में मामला चलता रहा. सरकारी वकील ने लगातार यह कहकर तारीख ली कि सरकार कानून में उचित संशोधन कर रही है. आपराधिक संशोधन विधेयक 2010, 2011 और 2012 के प्रारूप अदालत में पेश किए गए थे. सात दिसंबर 2012 को आपराधिक संशोधन विधेयक पर बहस चल ही रही थी कि 16 दिसम्बर 2012 को ‘निर्भया बलात्कार कांड’ आ खड़ा हुआ. देश भर में जोरदार आंदोलन हुए जिसके दबाव में आकर सरकार ने अध्यादेश जारी कर दिए. वर्मा कमीशन की रिपोर्ट भी आई और अंततः 3 फरवरी 2013 से आपराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 लागू हुआ. महादेव केस के तमाम मुद्दे ‘निर्भया कांड’ के पीछे कहीं दब-छुप गए. अब यहां यह समझ लेना जरूरी होगा कि अापराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 से पूर्व और संशोधन के बाद कानून के प्रावधानों में क्या फर्क आया.

 2013 से पूर्व कानून

अापराधिक संशोधन अधिनियम 2013 के लागू होने से पहले बिना सहमति के किसी औरत के साथ यौन संबंध स्थापित करना या 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ (सहमति के साथ भी) संबंध स्थापित करना बलात्कार की श्रेणी में आता था. हालांकि 15 साल से अधिक उम्र की अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता रहा. भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के अनुसार किसी महिला के साथ बलात्कार करनेवाले को आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती थी/है, लेकिन यदि पति 12 से 15 साल की अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है तो अधिकतम सजा में ‘विशेष छूट’ थी. इस मामले में सिर्फ दो साल की जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान था. बलात्कार संज्ञेय और गैर जमानती अपराध था लेकिन 12-15 साल की पत्नी के साथ बलात्कार संज्ञेय अपराध नहीं माना जाता था. इस अपराध में अाधिकारिक रूप से जमानत मिल सकती थी. 15 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ बलात्कार के मामले में भी पुलिस कोई भी कार्रवाई नहीं कर सकती थी. ऐसे मामलों में गरीब नाबालिग लड़की को खुद ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता और जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था.

 2013 के बाद का कानून

अापराधिक कानून संशोधन अधिनियम 2013 में बलात्कार को अब ‘यौन हिंसा’ मान लिया गया है. इसमें सहमति से संभोग की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई है जबकि धारा 375 के अपवाद में पत्नी की उम्र 15 साल ही है. 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में अब सजा में कोई ‘विशेष छूट’ नहीं मिलेगी. ‘निर्भया’ कांड के बाद हुए संशोधन के बाद इस प्रावधान को भारतीय दंड संहिता से हटा लिया गया। अापराधिक संशोधन अधिनियम 2013 से पहले पति को सिर्फ ‘सहवास’ करने की छूट थी, मगर संशोधन के बाद तो ‘अन्य यौन क्रियाओं’ का भी अधिकार दे दिया गया है. यह किसी भी सभ्य समाज में उचित, न्यायपूर्ण नहीं माना-समझा जा सकता. अापराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 को पारित करते समय सरकार ने ‘वैवाहिक बलात्कार’ संबंधी न तो विधि आयोग की 205वीं रिपोर्ट की सिफारिश को माना और न ही वर्मा आयोग के सुझाव. भारतीय विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद को खत्म कर दिया जाना चाहिए.

अापराधिक संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद आज भी भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का अपवाद, पति को अपनी 15 साल से बड़ी उम्र की नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार करने का ‘कानूनी लाइसेंस’ देता है, जो निश्चित रूप से नाबालिग बच्चियों के साथ मनमाना और विवाहित महिला के साथ कानूनी भेदभावपूर्ण रवैया है. यह भेदभावपूर्ण कानूनी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकार और मानवाधिकार का भी हनन करता है. परिणामस्वरूप शादीशुदा महिलाओं के पास चुपचाप यौन हिंसा सहन करने, बलात्कार की शिकार बने रहने या फिर मानसिक यातना के आधार पर पति से तलाक लेने या घरेलू हिंसा अधिनियम के अधीन मुकदमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहा जाता है, जो नाकाफी है. दुनिया के लगभग छह मुल्कों में वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है. नेपाल जैसे छोटे से मुल्क में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया है. नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था- ‘पत्नी की सहमति के बिना संभोग बलात्कार के दायरे में आएगा. धार्मिक ग्रंथों में भी पुरुषों को द्वारा पत्नी के बलात्कार की अनदेखी नहीं की गई है. हिन्दू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ पर जोर दिया गया गया है.’

अंत में एक बात और यह कि आखिर दाम्पत्य में बलात्कार कानून से पुरुष समाज क्यों डरा हुआ है? इस कानून को न बनाए जानेवाले ये तर्क देते हैं कि वैवाहिक बलात्कार कानून बन जाने से विवाह और परिवार जैसी पवित्र संस्था को खतरा पहुंच सकता है. मैं जवाहर लाल नेहरू जी के शब्दों को याद करके इसका जवाब देना चाहूंगा- ‘हम हर भारतीय स्त्री से सीता होने की अपेक्षा करते हैं लेकिन पुरुषों से मर्यादा पुरुषोत्तम राम होने की नहीं.’

स्वतंत्र मिश्र से बातचीत पर आधारित

बेडरूम में कानून का क्या काम

Demonstrators hold placards as they take part in a protest rally in solidarity with a rape victim from New Delhi in Mumbai

जॉन मोरटाइमर ने क्लासिकल रमपोल श्रृंखला में लिखा है, ‘विवाह और कत्ल दोनों अनिवार्य रूप से आजीवन कारावास की ओर ले जाते हैं.’ इसका अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल है कि वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक ठहराए जाने के सवाल पर पर होरेेस रमपोल की प्रतिक्रिया क्या होती बात को लेकर किसी को अचरज हो सकता कि यह बात रमपोल ने वैवाहिक बलात्कार के अापराधीकरण के सवाल पर क्या कहा होता? क्योंकि जिस हिल्डा रमपोल से उन्होंने शादी की थी उनके बारे में उनका कहना था कि वो एक ऐसी महिला थी जिसकी आज्ञा का पालन आपको करना ही होगा.

भारत के संदर्भ में देखें तो यहां महिला की सहमति के बिना उससे संबंध बनाने को ही मुख्यतः बलात्कार के रूप में परिभाषित किया जाता है. अगर बलात्कार का आरोप साबित हो जाता है तो अपराधी को दंडस्वरूप सात साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई जा सकती है. हालांकि भारतीय कानून विवाहित लोगों के साथ अलग व्यवहार करता है. भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ, जिसकी उम्र 15 साल से कम न हो, बनाया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं है.’ वकीलों के बीच इस परिच्छेद को बलात्कार के वैवाहिक स्तर पर मिली रियायत के रूप में जाना जाता है.

यह तार्किक रूप से इस बात का अनुपालन करता है कि वर्तमान कानून के अनुसार पत्नी का बलात्कार नहीं किया जा सकता है. हालांकि आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 के बाद भारतीय दंड संहिता में शामिल की गई धारा 376 साथ ही एक अपवाद भी प्रस्तुत करती है. यह पति से अलग रह रही पत्नी के साथ बिना उसकी इच्छा के शारीरिक संबंध बनाने को सजा के दायरे में तो लाती है पर इसे बलात्कार नहीं कहती.

जस्टिस जेएस वर्मा समिति की रिपोर्ट में पति को बलात्कार के अपराध से मिली रियायत को रद्द करने का सुझाव दिया गया था. तात्कालीन यूपीए सरकार ने इस सिफारिश को पूरी तरह से स्वीकार करने से इंकार कर दिया और धारा 376 बी को कानूनी जामा पहना दिया, जो पति द्वारा जबरन शारीरिक संबंध बनाने को केवल उस परिस्थिति में अपराध मानती है जिसमें पत्नी, पति से अलग रह रही हो.

यह ध्यान में रखते हुए कि आपराधिक कानून में 2013 में हुए संशोधन को अभी दो साल भी नहीं गुजरे हैं और इसकी उपयोगिता या अनुपयोगिता के बारे में तयशुदा तरीके से कुछ कहने के लिए अभी पर्याप्त समय नहीं लिया गया है, कोई भी यह नहीं चाहेगा कि न्यायिक अवस्थिति इतनी जल्दी सवालों के घेरे में आ जाए. मैं यहां उस विवाद का जिक्र करना चाहूंगा जो अभी पिछले दिनों उस वक्त भड़क उठा जब डीएमके की कनिमोझी द्वारा पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हरीभाई पार्थीभाई चौधरी ने कहा, ‘वैश्विक स्तर पर वैवाहिक बलात्कार की जो अवधारणा है उसे समुचित रूप से भारतीय संदर्भ में लागू नहीं किया जा सकता है.’

इसके बाद स्त्रीवादी आंदोलन और इसके समर्थकों ने इस बात पर जोर देते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि वैवाहिक स्तर पर यह रियायत देना, जिसे बहुत पहले ही खत्म कर दिया जाना चाहिए था, कानून में अराजकता को बढ़ावा देता है. वे जोर देकर कहते हैं कि वैवाहिक स्तर पर यह रियायत इस सोच से संचालित है कि शादी के बाद कोई महिला हमेशा के लिए पति की इच्छा पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमत हो चुकी है. वे तर्क देते हैं कि वैवाहिक स्तर पर मिली इस रियायत को खत्म करने के लिए यह जरूरी होगा कि शारीरिक संबंध बनाने से जुड़े हर कार्य में, यहां तक की विवाह संस्था के भीतर भी, हर मौके पर विशिष्ट सहमति जरूरी हो. एक धार्मिक संस्कार के रूप में विवाह संस्था उन विचारों से अलग है जो महिला अधिकारों की कीमत पर प्रतिगामी  सांस्कृतिक और धार्मिक नियमों को थोपती है.

पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों में दोनों की सहमति मानी जाती है. ऐसा न हो कि दोनों को एक-दूसरे को छूने से पहले सहमति लेने की जरूरत पड़े

ऐसे तर्क लाभदायक ओर युक्तिसंगत दिख सकते हैं लेकिन मेरे जैसा संदेहवादी इसकी व्यवहारिकता पर सवाल खड़े करेगा. हिंसा के मामले और पति-पत्नी के अलग-अलग रहने की स्थिति को छोड़कर मेरी राय यही होगी कि पति-पत्नी के नितांत निजी क्षणों से इस कानून का कोई संबंध न हो. हिंसा हमेशा ही अपराध की श्रेणी में आती है और वैवाहिक स्तर पर ऐसी कोई रियायत नहीं हैं जो इसे छिपाए. अगर पति, पत्नी को पीटता है तो वह उसके खिलाफ उन्हीं कानूनी उपायों का सहारा ले सकती है जो किसी दूसरे व्यक्ति के खिलाफ उसे लेने का अधिकार है.  सिर्फ शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों में पति के लिए यह एक अपवाद है. वैवाहिक जीवन की किसी भी अवस्था में अगर पत्नी उस परिकल्पित सहमति से खुद को अलग करना चाहती है तो उसके लिए अलग होकर जीने का रास्ता खुला है. इसके बाद किसी भी तरह का जबरन यौन संबंध धारा 367 (बी) के तहत अपराध होगा.

वैवाहिक स्तर पर रियायत देने के लिए यह तर्क भी दिया जाता है कि यौन संबंधों के मामले में संभावित अपराध का तनाव बिस्तर पर प्रदर्शन को प्रभावित न करे. ये माना जाना चाहिए कि मानव जाति की वंश-वृद्घि के हित में वैवाहिक संबंधों के भीतर पति-पत्नी के बीच बनने वाले शारीरिक संबंधों में दोनों की सहमति है. ऐसा न हो कि हर बार पति-पत्नी को एक-दूसरे को छूने से पहले सहमति पत्र लेने की जरूरत पड़े. अगर पति-पत्नी संबंध बनाने से पहले ये सोचने लगें कि पता नहीं उनकी इस क्रिया  को न्यायाधीश या पुलिस वाले किस रूप में देखेंगे, अगर दोनों में से कोई भविष्य में किसी एक के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दे. इससे शारीरिक संबंधों की आदिकाल से चली आ रही गोपनीयता पर भी बुरा असर पड़ेगा. अगर दोनों के मन में ये भावना आ जाएगी कि उन्हें कोई  पुलिस वाला या कोई जज देख रहा है या यूं कहें कि उनकी बेहद निजी क्रिया सार्वजनिक टीका-टिप्पणी और कानूनी आखड़ों से बाहर नहीं है तो फिर ऐसी स्थिति में उस पूरी क्रिया  के आनंद का खात्मा हो जाएगा.

वैवाहिक यौन संबंधों के अपराधीकरण की स्थिति में तो इसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग उन पत्नियों द्वारा किया जाएगा जो अपने पतियों से बदला लेना चाहती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अर्नेश कुमार के मामले की सुनवाई करते हुए वैवाहिक प्रताड़ना कानून के दुरुपयोग होने पर चिंता जताई. कोर्ट की टिप्पणी थी,  ‘हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों में तेजी से वृद्घि हुई है. देश में विवाह संस्था को बहुत आदर प्राप्त है. भारतीय दंड संहिता में 498 ए को पति या परिवारवालों के हाथों किसी स्त्री की प्रताड़ना के खिलाफ हथियार के रूप में लाया गया था. 498 ए संज्ञेय धारा है. इसके तहत गिरफ्तार हुए आरोपी को जमानत नहीं मिलती है, लेकिन ऐसा देखने में आया है कि कई महिलाओं ने इसका दुरुपयोग किया है. उन्होंने पति और उसके परिवारवालों को प्रताड़ित करने के लिए इस धारा का इस्तेमाल किया. इस धारा के तहत पति और उनके रिश्तेदार की गिरफ्तारी बहुत आसानी से हो जाती है. कई मामलों में पति के निशक्त माता-पिता या दशकों से विदेशों में रहनेवाले उसके भाई-बहनों की भी गिरफ्तारियां हुईं.’ 498 ए के तहत तीन साल की कैद और बलात्कार साबित होने पर उम्रकैद की सजा होती है. मामूली प्रावधान के चलते कानून के दुरुपयोग के इतिहास को देखते हुए कोई भी इसके गलत इस्तेमाल करने की संभावनाओं से इंकार नहीं कर सकता. ज्यादातर वकील आपराधिक कानूनों के वैवाहिक क्षेत्र तक फैलने के प्रति सचेत करते हैं.

इस कानून की नीति में वैवाहिक पुनर्मिलाप की सुविधा भी होनी चाहिए एक पक्ष को आपराधिक न्याय व्यवस्था की बेपनाह छूट दे देना अनियमितताओं से भरा और बहुत ही बुरा है. स्त्री-पुरुष के बीच के संघर्ष को लेकर इस बात की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए कि यह विवाह संस्था को ही खत्म कर दे.

शादी या बलात्कार का अधिकार

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आश्रय संबंधी सामान्य नियमों के अनुसार, कहा गया है कि विवाह के साथ ही स्त्री, अपने पति को यह अधिकार दे देती है कि वो जब चाहे अपनी इच्छानुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकता है और इस नियम में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हो सकता. हालांकि कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इसे रद्द कर दिया गया है. जस्टिस वर्मा कमेटी का कहना है, ‘हमारा दृष्टिकोण ‘सीआर वी यूके’ मामले में यूरोपियन कमीशन ऑफ ह्यूमन राइट्स से प्रेरित है जिसके अनुसार एक बलात्कारी सिर्फ बलात्कारी होता है, भले ही उसका पीड़ित से कोई भी संबंध हो.’ कमेटी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की सैंड्रा फ्रेडमैन की बात का हवाला देते हुए कहती है, ‘विवाह को स्त्री के कानूनी और यौनिक अधिकारों के खत्म हो जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.’ वर्मा समिति 1993 में आए ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन की घोषणा’ और उससे पहले आए ‘महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन का समागम (सीईडीएडब्ल्यू)’ का हवाला देते हुए अपनी बात आगे बढ़ाती है. फरवरी 2007 में संयुक्त राष्ट्र की सीईडीएडब्ल्यू कमेटी ने सिफारिश की थी कि भारत को चाहिए कि वह अपने दंड संहिता में बलात्कार की परिभाषा का दायरा और बढ़ाए ताकि महिलाओं द्वारा भोगे जा रहे यौन उत्पीड़न की व्यथा को समझकर उसका कोई समाधान निकाला जा सके. साथ ही ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपवाद की श्रेणी में न रखकर ‘बलात्कार’ की श्रेणी में रखा जाए. (25 जून 1993 को भारत ने सीईडीएडब्ल्यू को अंगीकार किया था.) यहां वर्मा कमेटी का कहना था कि महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा से निपटने के लिए देश में अपेक्षित कानून का न बन पाना एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय परंपरा के उल्लंघन के रूप में देखा जाएगा. फिर भी इसके खिलाफ आवाज उठानेवालों में तमाम वकील कानूनविद, राजनीतिक दलों के सदस्य और धार्मिक गुरु और विद्वान शामिल हैं. अब तक केंद्र में रही सरकारों, चाहे वो यूपीए सरकार हो या वर्तमान की राजग सरकार, दोनों ने ही वैवाहिक बलात्कार को लेकर यथास्थिति बनाए रखने पर ही जोर दिया है. धर्म और राजनीति दोनों मिलकर इस मुद्दे को और जटिल बना रहे हैं. हाल ही में इस्लाम और ईसाई धर्म के कुछ उपदेशक सरकार के इस रवैये के समर्थन में नजर आ रहे थे.

इस्लाम के अनुसार ‘बलात्कार’ और ‘वैवाहिक बलात्कार’ में कोई फर्क नहीं है. इसलिए दोनों तरह के अपराधों की सजा एक ही होनी चाहिए. भारतीय दंड संहिता में संशोधन की जरूरत है ताकि वैवाहिक बलात्कार की स्थिति में महिलाओं को उचित न्याय मिल सके. इसके बिना स्त्री-पुरुष समानता की बात करना बेमानी है

मौलाना वहीदुद्दीन खान, इस्लामिक विद्वान

बहरहाल सरकार का अपना मत है. पिछले साल दो जुलाई को राजग सरकार ने कहा था कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 यौन हिंसा समेत सभी प्रकार की हिंसा से स्त्रियों का बचाव करता है. इसके बाद हाल ही में हुई आलोचनाओं से अपना बचाव करते हुए सरकार ने जवाब दिया कि साल 2000 में आई विधि आयोग और 2003 की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखे जाने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया गया था. बलात्कार संबंधी वर्तमान कानूनों को देखते हुए विधि आयोग का कहना था कि अगर वैवाहिक बलात्कार को अपवाद न मानकर आईपीसी के तहत अपराध की श्रेणी में रखा गया तो ये वैवाहिक संबंधों में कानून का हस्तक्षेप और ज्यादा बढ़ा देगा.

प्रख्यात अधिवक्ता राम जेठमलानी भी इस पहलू का समर्थन करते हुए कहते हैं, ‘अगर आपकी शादी में सब कुछ ठीक नहीं है और पति द्वारा पत्नी पर जोर-जबरदस्ती का आरोप है तो पत्नी के पास उसे छोड़कर जाने का विकल्प हमेशा खुला रहता है. विवाह संबंधों के बीच बलात्कार के प्रावधान को क्यों लाया जाना चाहिए? घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम और आईपीसी की धारा 498ए के तहत महिलाओं को नागरिक अधिकार मिलते हैं.’ इसके इतर समय-समय पर कई सांसदों ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की पैरवी की है, मगर उनकी पार्टी इससे इत्तेफाक नहीं रखती. सीपीएम की पोलितब्यूरो सदस्य बृंदा करात कहती हैं कि विवाह के प्रमाण पत्र को जबरन संबंध बनाने का लाइसेंस नहीं माना जा सकता. कई बार संसद में भी सांसदों ने ये मुद्दा उठाया मगर उनकी आवाज कानून में किसी तरह का बदलाव करने लायक समर्थन नहीं जुटा पाई. पिछली बार संसद में इसकी गूंज यूपीए सरकार के कार्यकाल में सुनाई दी थी. मार्च 2013 में गृह मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति की ओर से आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2012 पर 167वीं रिपोर्ट पेश की गई थी. तब समिति ने जस्टिस वर्मा कमेटी की ओर से दी गईं सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया था. आईपीसी की धारा 375 पर चर्चा करते हुए समिति के कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया था कि विवाह के समय दी गई सहमति को हमेशा के लिए नहीं माना जा सकता और अगर पत्नियों को इतनी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे संबंधों के बीच वैवाहिक बलात्कार का मुद्दा उठा सकें. हालांकि कुछ सदस्यों का ये भी मानना था कि इसे अपराध का दर्जा देने से विवाह नाम संस्था खतरे में पड़ सकती है. राजग सरकार में संसदीय मामलों और शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने इस समिति की अध्यक्षता की थी. उस वक्त आई कुछ मीडिया रिपोर्टों की माने तो नायडू का भी यही कहना था कि अगर वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया तो समाज में परिवार नाम का तंत्र खत्म हो जाएगा.

इस समिति के प्रस्तावों को लेकर तत्कालीन सांसद डी. राजा और सीपीआई के प्रसंता चटर्जी ने असहमति जाहिर की थी. उनका कहना था कि वैवाहिक बलात्कार को अपवाद मानना भारतीय संविधान के उस प्रावधान के खिलाफ है जिसमें महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया गया है और जो उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता से, किसी भी हिंसा के बिना (शादी के पहले या बाद) सम्मान से जिंदगी जीने का अधिकार देता है. उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति दर्ज कराई कि अलग रह रही बीवी पर किए गए यौन उत्पीड़न को भी आईपीसी की धारा 376बी के तहत रखा जा रहा है जो सामान्य स्थिति में उत्पीड़न की धारा है, जबकि विवाह के बाद किया गया दैहिक शोषण ज्यादा गंभीर है.

वैवाहिक बलात्कार को अपराध करार देने से शादी का स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा. यौन सुख या शारीरिक सुख लेना शादी का एक सहज हिस्सा है. मियां-बीवी दोनों को ये समझना चाहिए. इस्लाम किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या जबरन संबंध बनाने का समर्थक नहीं है. स्त्री हो या पुरुष दोनों को समानता का अधिकार है

प्रोफेसर अखतरुल वसी, पद्मश्री

वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए छिड़ी बहस में तमाम धार्मिक विद्वान और उपदेशक भी इसके विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया में ‘इस्लामिक स्टडीज’ पढ़ाने वाले पद्मश्री अख्तरुल वसी के मुताबिक वैवाहिक बलात्कार को अपराध करार देने से शादी का स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा. वे कहते हैं, ‘यौन सुख या शारीरिक सुख लेना शादी का एक सहज हिस्सा है. मियां-बीवी दोनों को ये समझना चाहिए.’ दूसरी तरफ वे ये भी कहने से नहीं चूकते कि इस्लाम किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या जबरन संबंध बनाने का समर्थक नहीं है.

जाने-माने इस्लामिक विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान एक विपरीत दृष्टिकोण रखते हैं. उनके मुताबिक, ‘इस्लाम के अनुसार ‘बलात्कार’ और ‘वैवाहिक बलात्कार’ में कोई फर्क नहीं है. इसलिए दोनों की सजा एक ही होनी चाहिए.’

सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्चेस (उत्तर भारत) के अध्यक्ष बिशप पॉलस मार डिमिट्रिअस ने वैवाहिक बलात्कार पर हो रही विवेचना में अपनी राय साझा की. इसे अपनी निजी राय बताते हुए वे कहते हैं, ‘वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाना उतना असरदार नहीं होगा जितना ये सुनने या देखने में लग रहा है. यह एक समस्या को तो खत्म कर देगा मगर दूसरी कई समस्याओं को जन्म देगा. हम लोग विवाह की पवित्रता में विश्वास रखते हैं और इसमें साथी से जबरदस्ती बनाए गए संबंधों के लिए कोई जगह नहीं है.’ वहीं अगर सैद्धांतिक तौर पर देखा-परखा जाए तो ये बात देवदूत पॉल की उस शिक्षा के बिलकुल विपरीत है, जिसमें वे कहते हैं, ‘एक पत्नी की देह पर उसका कोई अधिकार न होकर उसके पति का अधिकार होता है, इसी प्रकार पति के शरीर पर उसका नहीं बल्कि पत्नी का अधिकार होता है.’ ये वाक्य बाइबल की ‘बुक वन कोरिंथिअंस (7:4)’ में लिखा हुआ है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि विवाह हो जाने के बाद पति-पत्नी का एक दूसरे की देह पर सामान रूप से पूर्ण अधिकार होता.

इस मुद्दे पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के मीडिया सलाहकार परमिंदर सिंह भी सरकार के साथ हैं. उनका कहना है, ‘पश्चिमी परंपराओं को भारतीय परंपराओं में नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि हिंदुस्तानी महिलाएं अपने पति या उसके किए गए किसी काम पर उंगली नहीं उठातीं.’ वे साफ शब्दों में कहते हैं, ‘पत्नी की मर्जी के बिना पति द्वारा बनाए गए शारीरिक संबंधों को हिंदुस्तान में बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए. हम इसका विरोध करते हैं.’  दोनों पक्षों को सुनने-समझने के बाद यही लगता है कि वैवाहिक बलात्कार का समाधान या तो अलगाव है या शादी का खारिज होना जिसके अपने प्रभाव और नतीजे हो सकते हैं. इन्हीं नतीजों को ध्यान में रखते हुए भारत में परिवार न्यायालय के साथ मजिस्ट्रेट घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के तहत मामलों में दोनों (मियां-बीवी) को पहले सलाह देते हैं. अगर पति फिर भी नहीं सुधरते या बीवी के प्रति अपना व्यवहार नहीं बदलते तब तलाक ही एकमात्र उपाय रह जाता है.

‘लोग विवाह की पवित्रता में विश्वास रखते हैं और इसमें साथी से जबरदस्ती बनाए गए संबंधों के लिए कोई जगह नहीं है.’

एक तथ्य ये भी है कि महिलाएं ऐसे मामलों में उतनी बेबस नहीं होतीं जितनी दिखती हैं. मतलब उन्हें कई तरह के कानूनी अधिकार मिले हुए हैं. वे घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट से मदद मांग सकती हैं. वहीं आईपीसी के प्रावधानों के तहत पत्नियां जो पति से अलग हो चुकी हैं, उनके खिलाफ बलात्कार की शिकायत कर सकती हैं. इस अधिनियम में महिलाओं को दोहरा लाभ मिलता है. पहली, वे चाहें तो उसी घर में पति या फिर लिव-इन पार्टनर के साथ रह सकती हैं और दूसरी, वह व्यक्ति अपनी शारीरिक जरूरतें उसके ऊपर थोप नहीं सकता. शिक्षाविद मीनाक्षी मुखर्जी बताती हैं, ‘अग्रणी माने जाने वाले पश्चिमी देशों में भी महिलाएं वैवाहिक बलात्कार की शिकायतें दर्ज करवाती हैं मगर ठोस नतीजा तभी मिलता है जब वे तलाक ले लेती हैं. भारतीय परिप्रेक्ष्य में औरतों के आर्थिक रूप से स्वतंत्र न होने के कारण बात तलाक तक पहुंचती ही नहीं.’

इन सब के बीच एक सच यह भी है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए में साफ-साफ दर्ज है कि हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि अगर वो किसी भी महिला/महिलाओं के प्रति कोई अपमानजनक या घृणित कृत्य होते देख रहा है तो उसे उस बात का पुरजोर विरोध करना चाहिए. इन सबके बीच ये बात भी भुला दी गई है कि वैवाहिक बलात्कार मात्र भावातिरेक में किया गया अपराध ही नहीं है बल्कि सामान्य मानवधिकारों का भी गंभीर उल्लंघन है. अनिल कौल कहते हैं, ‘अगर पत्नी द्वारा लगाए गए वैवाहिक बलात्कार के आरोप पति पर सिद्ध हो जाते हैं तो उसे इस बिना पर तलाक लेने का अधिकार मिलना चाहिए. उसी तरह अगर ये आरोप किसी निजी स्वार्थ या ओछेपन की भावना से लगाए गए हों तो इनकी सजा उसी आधार पर निर्धारित होनी चाहिए.’

शादी या बलात्कार का अधिकार

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पिछले साल वैलेंटाइन डे यानी 14 फरवरी को जब पूरी दुनिया प्यार की खुमारी में डूबी एक-दूसरे को प्यार का पैगाम दे रही थी, तब सरिता (बदला हुआ नाम) बुरी तरह प्रताड़ित और अपमानित होकर खून से लथपथ अपने ही घर के एक कोने में डरी-सहमी पड़ी हुई थी. जिस आदमी से उसने टूटकर प्यार किया और दो साल पहले एक बेहद निजी समारोह में शादी की, वही अब उसे शारीरिक, मानसिक और बेइंतहां यौन प्रताड़ना दे रहा था. उस रोज सरिता के पति ने उसके निजी अंगों में टॉर्च डालकर बुरी तरह पीटने के बाद अप्राकृतिक यौन संबंध बनाया था. उसे याद करते हुए वह बताती हैं, ‘जानवरों के जैसी उसकी वहशियाना हरकत उस दिन चरम पर पहुंच गई थी. मेरे शरीर को नोच-नोचकर उसने छिन्न-भिन्न कर दिया था. मेरे सीने और पैरों पर जहां-तहां उसके काटने के निशान थे. उस वक्त शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था.’ सरिता के साथ यह वहशियाना हरकत शादी के कुछ दिनों बाद ही शुरू हो गई थी. महीनों से जारी उत्पीड़न और पिटाई के दौर के बाद इस दर्दनाक यौन प्रताड़ना ने उस दिन को सरिता की जिंदगी का सबसे भयानक दिन बना दिया था. उसकी हालत देख उसके ससुरालवाले भी डर गए थे. वे उसे लेकर तुरंत अस्पताल भागे. अस्पताल में कई दिनों बाद जब वह होश में लौटी तो पता चला कि वह अपने अजन्मे बच्चे को खो चुकी है. सरिता के दर्द का अंत यहीं नहीं था. उसके दर्द का दौर अब भी जारी है. बच्चे को खोने से बुरी तरह टूट चुकी सरिता ने पति की प्रताड़ना के खिलाफ 17 फरवरी 2015 को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, मगर यहां से भी उसे निराशा हाथ लगी. शीर्ष अदालत ने उसकी याचिका पर सुनवाई करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उसका मामला जनहित का मुद्दा नहीं बल्कि बेहद निजी है.


इस साल 29 अप्रैल को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी ने राज्यसभा में एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए बताया कि विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भारत के संदर्भ में वैवाहिक रिश्तों में बलात्कार की अवधारणा पर विचार नहीं किया जा सकता. डीएमके की सांसद कनिमोझी ने यह सवाल उठाया था. इसका जवाब देते वक्त हरिभाई चौधरी 100 ईसा पूर्व के लगभग लिखी गई ‘मनुस्मृति’ में युवतियों और विवाहित स्त्रियों के रहन-सहन और आचार-व्यवहार की सदियों पुरानी मान्यताओं को समर्थन देते नजर आ रहे थे. कनिमोझी जानना चाह रही थीं कि ‘जबरदस्ती बनाए गए वैवाहिक संबंध’ को भी ‘बलात्कार’ की श्रेणी में लाने के लिए क्या सरकार भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन करेगी?

Sanjay Hegde read बेडरुम में कानून का क्या काम |संजय हेगड़े | अधिवक्ता

इसके जवाब में मंत्रीजी का यह तर्क था कि  शिक्षा का स्तर या अशिक्षा, गरीबी, अनगिनत सामाजिक प्रथाएं और जीवन मूल्य, धार्मिक मान्यताएं, विवाह को संस्कार के रूप में देखने की समाज की मानसिकता आदि के चलते ‘विश्वस्तर पर वैवाहिक दुष्कर्म की परिभाषा को भारत में सीधे तौर पर लागू नहीं किया जा सकता.

‘सामाजिक मान्यताओं’ और ‘धार्मिक विश्वास’ के बारे में जब हरिभाई पार्थीभाई चौधरी बात कर रहे थे तो महसूस हो रहा था कि वे ‘मनुस्मृति’ में कही गई बातों को ही आगे बढ़ा रहे हैं. ‘मनुस्मृति’ में महिलाओं पर नियंत्रण रखने की बात कही गई है और ये बताया गया है कि कैसे एक महिला का कर्तव्य अपने पति को संतुष्ट रखना और उसकी आज्ञा मानना है.

सरिता कहती हैं, ‘जब एक लड़की की शादी होती है तब उसके बहुत सारे सपने होते हैं. जैसे- प्यार किए जाने का सपना और अपने साथी के साथ खुशनुमा जिंदगी बिताने का सपना… मगर हकीकत कुछ और ही होती है. मैं और मेरी जैसी दूसरी औरतें एक अलग ही खौफनाक हकीकत का सामना करती हैं.’ दफ्तर में ही सरिता को उनका प्यार मिला और उन्होंने शादी कर ली. उनकी शादी में सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि वह मुस्लिम परिवार से थीं और उनके पति हिंदू. अपने से पहले कुछ दूसरी युवतियों, जिन्होंने ऐसी ही स्थितियों का सामना किया था और जो इस दुविधा में रहीं कि अपने पति के लिए धर्म परिवर्तन करें या नहीं, सरिता ने हिंदू धर्म अपनाने का फैसला किया.

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में मिली छूट को हटाने की जरूरत है क्योंकि यह बराबरी और किसी के जीने के संवैधानिक अधिकारों का हनन करती है. आपराधिक कानून में संशोधन करने के बाद ऐसे मामलों में महिला और दोषी व्यक्ति के रिश्तों की परवाह किए बगैर उसकी ‘सहमति’ को ज्यादा तवज्जो देना चाहिए 

वृंदा ग्रोवर, अधिवक्ता

हालांकि जो एक पूर्ण प्रेम कहानी लग रही थी वो जल्द ही तमाम तरह की दुश्वारियों से घिर गई. सरिता का पति उन्हें बुरी तरह से पीटने लगा था, उन्हें अपमानित करने लगा था और कभी-कभी तो गर्म या ठंडा पानी डालकर बाथरूम में बंद कर देता था. सरिता बताती हैं, ‘मैं अपनी नौकरी पर ध्यान नहीं दे पा रही थी, क्योंकि प्रताड़ना के भयानक पल हमेशा आंखों के सामने तैरते रहते थे. मैं उन्हें भुला नहीं सकती थी. उन पलों की यादें मुझे डराती रहती थीं. वो दर्द अब भी मेरे जेहन में जिंदा है.’

सरिता उन तमाम महिलाओं में से एक हैं जो वैवाहिक बलात्कार का शिकार हुई हैं. ये एक ऐसा मुद्दा है जिसे भारत के रोजमर्रा के जीवन में जगह नहीं मिलती. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 53 देशों में वैवाहिक बलात्कार अपराध नहीं है. इसमें पाकिस्तान, सउदी अरब के साथ भारत भी शामिल है. तकरीबन 10 प्रतिशत भारतीय महिलाएं ही अपने पतियों द्वारा यौन प्रताड़ना का शिकार हुईं हैं.

सरिता के मामले ने नई दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले की भी यादें ताजा कर दी हैं. दोनों ही मामलों में दिखाई गई वहशियत लगभग एक जैसी है लेकिन कानून की नजरों में निर्भया के दोषियों को ही दुष्कर्म के मामले में सजा हो सकी. जबकि सरिता के मामले में पति को सजा नहीं हो सकी क्योंकि वैवाहिक रिश्तों में दुष्कर्म को अपराध नहीं माना जाता. आईपीसी की धारा 375 कहती है, ‘अगर एक युवती 15 साल से बड़ी हो तो उसके साथ पति द्वारा यौन संबंध बनाना, दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता.’ इस अपवाद ने कानूनी पक्षकारों, एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक धड़े को कार्यपालिका और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने पर मजबूर किया. इस मामले को लेकर बहस और कानून बनाने की चर्चा गर्म है.

 arvind jain read‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस !’ | अरविंद जैन | अधिवक्ता

अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर बताती हैं, ‘कानून की इस धारा को हटाने की जरूरत है क्योंकि यह बराबरी और किसी के जीने के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है. आपराधिक कानून में संशोधन करने के बाद ऐसे मामलों में महिला और दोषी व्यक्ति के रिश्तों की परवाह किए बगैर उसकी ‘सहमति’ को तवज्जो देनी चाहिए.’ अधिवक्ता करुणा नंदी महसूस करती हैं कि पति द्वारा पत्नी से बलात्कार और बलात्कार के दूसरे मामलों में भेद करना बेहद शर्मनाक और पूरी तरह से अतार्किक है. करुणा कहती हैं, ‘कुछ लोग का ऐसा मानना है कि कुछ बलात्कार ‘पवित्र’ और कुछ ‘आपराधिक’ होते हैं. दरअसल यह भेद महिलाओं के खिलाफ सबसे जघन्य हिंसा है.’ एनजीओ ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली विवाह संस्थाओं को सुरक्षा देने की सलाह पर गृह राज्यमंत्री को आड़े हाथों लेती हैं. वह कहती हैं, ‘यह राज्य का काम नहीं कि वह संस्कृति (विवाह संस्था) को बढ़ावा दे. बजाय इसके उसे राज्य के नागरिकों खासकर महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए.’

यह राज्य का काम नहीं कि वह संस्कृति (विवाह संस्था) को बढ़ावा दे. बजाय इसके उसे राज्य के नागरिकों खासकर महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए. गृह राज्यमंत्री बेवजह विवाह संस्थाओं की वकालत कर रहे हैं. ऐसी संस्थाओं को चाहिए कि वे महिलाओं को भी वे ही अधिकार दें जो पुरुषों को मिले हुए हैं

मीनाक्षी गांगुली , ह्यूमन राइट वाच की दक्षिण एशिया प्रमुख

16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया बलात्कार कांड के बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के तहत हुआ एकमात्र सुधार ये है कि पति द्वारा पत्नी पर अलग रहने की स्थिति में (जब तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा हो और वे न्यायिक रूप से अलग रह रहे हों) किए गए यौन शोषण को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376बी के तहत एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया. इसमें न्यूनतम दो और अधिकतम सात साल कैद व जुर्माने की सजा का प्रावधान है.

Muslim brides sit as they wait for the start of a mass marriage ceremony in Ahmedabad  readदोराहे पर राय | केएन अशोक | दीप्ति श्रीराम

हालांकि ये बात उन नारीवादियों और इस मसले को लेकर काम कर रहे दूसरे कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने में नाकाम रही है जिनका मानना है कि विवाह के भीतर बनाए गए जबरन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. कानूनी जानकार अनिल कौल कहते हैं कि ये वास्तविक मुद्दे से भटकाने के लिए बनाया गया एक पर्दा है जिससे शोषण को ढका जा रहा है.

ऐसा करना समाज में फैले पाखंडों को नीतिगत बनाने की कोशिश है. वैसे कानून के जानकारों में कुछ संजय हेगड़े (देखें पेज 46) जैसे भी हैं जो ये मानते हैं कि घरेलू हिंसा या अलग रह रहे दंपतियों के मामलों को छोड़कर कानून को किसी की भी वैवाहिक निजता में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. हालांकि उनके तर्क के खिलाफ वृंदा ग्रोवर कहती हैं, ‘आईपीसी में धारा 498ए और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 की व्यवस्था के बाद क्या निजी है और क्या सार्वजानिक, ये फर्क करना ही मुश्किल हो गया है. कानून तो उसी वक्त परिवार में आ जाता है जब वहां जान-बूझकर किसी महिला को नुकसान पहुंचाया जाता है.

पति द्वारा पत्नी से बलात्कार और बलात्कार के दूसरे मामलों में भेद करना बेहद शर्मनाक और पूरी तरह से अतार्किक है. ये कहां का नियम है कि अपराध के एक जैसे मामले को दो चश्मों से देखा जाए. कुछ लोग ये तथ्य बताते हैं कि कुछ दुष्कर्म ‘पवित्र’ और कुछ ‘आपराधिक’ होते हैं. दरअसल यह भेद महिलाओं के खिलाफ सबसे जघन्य हिंसा है

करुणा नंदी, अधिवक्ता

ग्रोवर की बात का समर्थन करते हुए अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ (एआईपीडब्ल्यूए) की सचिव कविता कृष्णन कहती हैं, ‘जब किसी बस या फुटपाथ पर हुआ बलात्कार कानून के दायरे में है तो बेडरूम में किया गया बलात्कार इससे बाहर कैसे हो सकता है?’

shalini read सेक्स प्रेम की अभिव्यक्ति हो हिंसा की नहीं | शालिनी माथुर| वरिष्ठ लेखिका

वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने को लेकर हुई बहस में अब तक की सबसे बड़ा हस्तक्षेप आपराधिक कानून अधिनियम में संशोधन किए जाने के लिए बनी जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने किया है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे स्वर्गीय जस्टिस वर्मा के प्रतिनिधित्व में बनी इस कमेटी में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ और पूर्व सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम सदस्य थे. कमेटी का गठन 23 दिसंबर 2012 को किया गया था. कमेटी ने 23 जनवरी 2013 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. कमेटी की अनुशंसा थी कि वैवाहिक बलात्कार को अपवाद की श्रेणी से हटा देना चाहिए (देखें पेज 43). तर्क ये दिया गया था कि वैवाहिक बलात्कार को माफी या छूट देना विवाह के साथ जुड़ी उस रूढ़िवादी मान्यता को पोषित करता है जिसके अनुसार बीवी को पति की जागीर या संपत्ति समझा जाता है.

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बे‘पटरी’ जिंदगी

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कोई इन्हें कुत्ता कहे या कुछ और… फुटपाथ इनका बसेरा था, है और जो हालात नजर आ रहे हैं, ये आगे भी रहेगा. फुटपाथ पर कोई शौक से नहीं साेता, ये इनकी मजबूरी है. अकेले राजधानी में ही हजारों लोग फुटपाथ पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक देशभर में 17.7 लाख लोग बेघर हैं. कई बार केंद्र और राज्य सरकारें इन तथ्यों की अनदेखी करती हुई दिखती हैं. फुटपाथ पर सोने वाले ये लोग जानते हैं कि देश में क्या चल रहा है और कौन लोग इन्हें कुत्ता कह रहे हैं. इनके मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट को सलमान की सजा पर रोक नहीं लगानी चाहिए थी. इन घटनाक्रमों को लेकर इस वर्ग में गुस्सा है.


 

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चंदू ब्यास | मधुबनी, बिहार

होटल में खाना बनाते हैं 

‘मैं सन 1986 से दिल्ली में हूं. कुछ नहीं बदला है. उस समय भी ऐसे ही सड़क किनारे सोए रहते थे और आज भी सो रहे हैं. आप मीडियावाले आते हैं, फोटो लेते हैं और चले जाते हैं. पता नहीं आप लोग फोटो खींचकर क्या करते हैं? कुछ होता तो दिखता नहीं. ये सरकारी रैनबसेरे बने हुए हैं… जाइए उसमें और वहां की फोटो लीजिए… पटरी पर सोएं तो सलमान खान या कोई दूसरा अपनी गाड़ी चढ़ा देगा. रैनबसेरों में सोया नहीं जा सकता. इसके बाद कहेंगे कि पटरी पर कुत्ते सोते हैं… हद है… करोड़ों लोग हैं इस देश के अंदर जो पटरी पर सोते हैं… क्या इतने लोग कुत्ते हैं..?

आखिर गरीब करे तो क्या करे? जाएं तो कहां जाए? जाइए… आप अपना काम कीजिए… हमको कुछ नहीं कहना है… आपसे कहने से कुछ बदलेगा तो नहीं न… जाइए..जाइए… सोने दीजिए…’


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बिशनू पंडित | पश्चिम बंगाल

बेरोजगार

‘सलमान खान ने जो किया या कहा वो गलत है. आप मेरी सुनिए. मैं 4 साल पहले अपने गांव से दिल्ली आया था. कुछ समय पहले तक रोज 400-500 रुपये कमाता था… आज बेकार हूं. दाहिना हाथ सूख गया है और दाहिने पैर का घुटना काम नहीं करता. पिछले साल अगस्त की बात है. यहीं सो रहा था. एक गाड़ीवाले ने फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा दी. किसी तरह जान बच गई. कोर्ट में केस चल रहा है. गरीब आदमी हूं. पुलिसवाले भी कुछ नहीं बताते. तारीख पर कोर्ट जाने के लिए पैसे भी नहीं रहते हैं. जिन्होंने गाड़ी चढ़ाई वो अमीर लोग हैं. पता नहीं कोर्ट में क्या फैसला होगा. हम तो चाहते हैं कि उन्हें सजा न दी जाए… हमें मुआवजा मिल जाए… अगर उन्हें सजा मिल भी गई तो उससे मेरे

हाथ-पैर काम तो नहीं करने लगेंगे न? मैं कमा तो सकूंगा नहीं. मेरा जीवन तो बर्बाद ही हो गया न?


 

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राजकुमार | रायपुर,  छत्तीसगढ़

रिक्शा चालक 

‘वर्ष 2000 में दिल्ली आ गया था. हाथ रिक्शा चलाता था. कुछ ही दिन पहले एक बसवाले ने मेरा पैर कुचल दिया. ये देखिए बैंडेज लगा है. रात में बस अड्डे के पास पटरी पर सो रहा था. नींद में पैर थोड़ा नीचे आ गया. बसवाले ने गाड़ी पीछे करते समय चढ़ा दी. अभी तो कोई काम नहीं कर पाता हूं. कभी मंदिर से लेकर खा लेता हूं तो कभी कोई दोस्त-यार खिला देता है. सलमान खान हो या कोई और. जब तक ड्राइवर लापरवाही नहीं करेगा तब तक गाड़ी पटरी पर चढ़ ही नहीं सकती. अब जब उन्हें सजा मिली है तो वो और उनके साथी लोग बेकार की बातें बना रहे हैं. उन्हें चुपचाप अपने किए की सजा भुगतनी चाहिए.’


 

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लालबाबू | बेतिया, बिहार

दिहाड़ी मजदूर 

‘पटरी पर कोई शौक से नहीं सोता है. दिनभर मजदूरी करते हैं, ट्रक से सामान उतारते और चढ़ाते हैं तो दो पैसा मिलता है. लेकिन इतना भी नहीं मिलता कि किराए पर कमरा ले सकें. दिल्ली में 1995 से हैं. हम सलमान खान के फैन हैं. उनकी सारी फिल्में देख रखी हैं. लेकिन एक बात समझ नहीं आई. पहले सलमान को पांच साल की सजा मिली और उसी दिन हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी, क्यों? जब संजय दत्त जेल जा सकता है. ओमप्रकाश चौटाला जेल में रह सकते हैं तो सलमान क्यों नहीं. गलती तो सलमान ने की ही है. बिना शराब पीए गाड़ी पटरी पर नहीं चढ़ती. ई एक गायक है न… अभिजीत. वो कहता कि जो सड़क किनारे सोएगा वो मरेगा. पटरी किसी के बाप की है क्या?’


 

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ताहिरा | आजमगढ़,

उत्तर प्रदेश

‘मेरा लड़का है, शमीम. उसे खून की उल्टी आती है. इसी का इलाज करवाने आई हूं. 14 फरवरी 2015 को दिल्ली आए थे. डॉक्टर आज-कल कर रहे हैं. भर्ती ही नहीं कर रहे हैं. भर्ती होने का इंतजार कर रहे हैं. हर रात इसी बस स्टैंड पर सोते हैं. दिन में भी यहीं रहते हैं. जब यहां धूप आ जाती है तो किनारे चले जाते हैं. क्या करें?’


 

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रमेश | हाजीपुर, बिहार

फूल विक्रेता

‘किसी को भी वैसा नहीं बोलना चाहिए जैसा सलमान खान के साथी लोगों ने बोला है. मैं खुद पिछले 3 साल से पटरी पर सो रहा हूं. क्या करूं इसके अलावे मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. पटरी पर जो सोता है उ भी इंसान होता है. उसे भी बुरा लगता है. ई लोग जैसा बोले हैं उ सही बात नहीं है. ऐसा नहीं बोलना चाहिए था. हम सिनेमा नहीं देखते हैं लेकिन पटरी पर सोनेवाले कई लोगों को जानते हैं जो हर नई फिल्म देखते हैं. खासकर सलमान खान का सिनेमा तो लोग जरूरत देखते हैं.’


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अर्जुन शर्मा | नेपाल

दिहाड़ी मजदूर 

‘सलमान खान के साथी लाेगों ने बहुत गलत बोला है… जैसे, फुटपाथ पर सोनेवाले कचरा होते हैं… कीड़े होते हैं… पटरियों पर मर जाते हैं… ये बात गलत है… मैं 1999 से दिल्ली में हूं. खूब मेहनत करता हूं लेकिन इतनी कमाई नहीं होती कि किराये के कमरे में रह सकूं. सरकार ने तो गाड़ी चलाने के लिए और पैदल चलनेवालों के लिए अलग-अलग रूट बना रखा है. पटरी पर सोनेवाले तो पैदल चलनेवालों की जगह पर सोते हैं… तो सलमान खान की गाड़ी पैदलपथ पर कैसे चढ़ गई? ये तो उनकी गलती है न? मदिरा सेवन करके अगर गाड़ी चलाएंगे तो ऐसा ही परिणाम भुगतना पड़ेगा. उनके साथी आैर चाहनेवाले कचरा बोल के हमारा इन्सल्ट कर रहे हैं… ये ठीक बात नहीं है. मैं सलमान खान का फैन था लेकिन इस बात से हमारा दिल दुख गया है. सलमान खान भी इंसान हैं और पटरी पर सोनेवाला भी इंसान है. अगर वो एक्टर है तो क्या हो गया? उन्होंने तो हिरन का भी शिकार कर रखा है. इसका भी केस चल रहा है. ऐसे एक्टर को हम पटरीवाले भी पसंद नहीं करते हैं. हम भी इन्हें दुतकारते हैं.’

 

 

‘फांसी के समय मैं बैजू में पूरी तरह खोया हुआ था’

Girija Shanker3किसी कैदी को फांसी देने के समय वहां उपस्थित होकर रिपोर्टिंग करना बहुत मुश्किलों से भरा रहा होगा? अपने अनुभव साझा करें.

मैंने जब यह रिपोर्टिंग की थी तब मेरी उम्र महज 25 साल की थी. पत्रकारिता के मेरे शुरुआती दिन थे. तब सचमुच यह पता नहीं था कि फांसी की रिपोर्टिंग करना कोई दुर्लभ काम है. देशबंधु, जहां मैं काम करता था, अखबार में रिपोर्टिंग प्रकाशित होने के बाद जब देश भर से प्रतिक्रियाएं आईं और कई पत्र-पत्रिकाओं ने उस रिपोर्ट को प्रकाशित किया तब अहसास हुआ कि हमने कोई महत्वपूर्ण व नायाब रिपोर्टिंग की है.

अखबार के संपादक ने आपको कॅरियर की शुरुआत में ही इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे दे दी?

इस रिपोर्टिंग का प्रस्ताव मैं और मेरे एक सहयोगी सुनील ने जब अपने संपादक ललित सुरजन को दिया तो उन्होंने हमारा उत्साहवर्द्घन किया और सहर्ष अपनी सहमति दी थी. मेरे वरिष्ठ स्व. राजनारायण मिश्र ने फांसी देखने व रिपोर्टिंग की अनुमति दिलाने में मदद की थी. तब रिपोर्टरों की कोई बीट नहीं होती थी. इससे रिपोर्टर किसी विषय या क्षेत्र में बंधा न होकर हर विषय और विधा की रिपोर्टिंग कर सकता था. इतना ही नहीं, प्रूफ पढ़ने से लेकर पेज जमाने तक का काम रिपोर्टर को ही करना पड़ता था. अक्सर रिपोर्टर ही इवेंट या विषय चुनता था जिसे संपादक के साथ चर्चा कर अंतिम रूप दिया जाता था. संपादक से रिपोर्ट का प्लान बनाने से लेकर काॅपी को अंतिम रूप देने तक जीवंत संवाद बना रहता था. हमारे संपादक ललित सुरजन के अनुभव का लाभ मुझे लंबे समय तक कई मौकों पर मिलता रहा.

इस रिपोर्टिंग से पहले आपने क्या तैयारी की थी?

यह वाकई बहुत मुश्किल मामला था. इससे पहले कभी फांसी की सजा दिए जाने की रिपोर्टिंग का कोई उदाहरण मेरे सामने नहीं था. यह घटना भी जीवन की आम घटनाओं से बिल्कुल अलग थी. अतः इस रिपोर्टिंग पर जाने से पहले कोई तैयारी करना संभव नहीं था. बस, मन में उठते सवालों और जिज्ञासाओं को विस्तार देते हुए उनके जवाब ढूंढ़ने का मानस बना हुआ था. टेपरिकॉर्डर, कैमरा आदि साथ रखने की अनुमति नहीं थी. डायरी भी साथ नहीं थी. केवल सारी घटना को आंखों व कानों के जरिए दिमाग में उतारने की तैयारी भर थी. फांसी की सजा दिए जाने के कुछ दिन पहले जेल अधीक्षक जीके अग्रवाल ने जब यह जानकारी मुझे दी तब से ही इस घटना की रिपोर्टिंग करने का मानस बन गया था. यह जानते हुए भी कि फांसी की सजा दिए जाने के दौरान किसी पत्रकार की उपस्थिति बिना विशेष अनुमति के संभव नहीं होगी. राष्ट्रपति द्वारा मर्सी पिटीशन खारिज होने की सूचना मिलने के साथ ही फांसी की सजा दिए जाने की तारीख तय हो जाती है और जेल में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हंै. इन तैयारियों से मैं तीन-चार दिनों से रूबरू होता रहा और जब फांसी की सजा दिए जाने के दिन से इसे देखने की अनुमति मिली तो वह रोमांचक क्षण था. इस प्रक्रिया को आप रिपोर्टिंग की मेरी तैयारी कह सकते हैं.

फांसी की रिपोर्टिंग तो क्राइम रिपोर्टिंग है. क्या उसके बाद भी आपने क्राइम रिपोर्टिंग की?

मैं क्राइम रिपोर्टर कभी नहीं रहा, न इसमें मेरी कोई दिलचस्पी रही. यह तो एक विशेष घटना थी जिसकी नवीनता ने रिपोर्टिंग के लिए आकर्षित किया था. विकास पत्रकारिता मेरा विषय था और बस्तर में आदिवासियों के विकास की विसंगति पर मेरी रिपोर्ट को 1980 में स्टेट्समैन का रूरल रिपोर्टिंग अवार्ड मिला था. बाद में चुनाव व राजनीति मेरा विषय हो गया और पिछले दो दशक से इसी विषय पर मैं काम कर रहा हूं. लोगों को यह अचरज होगा कि राजनीतिक विश्लेषण के बीच ‘आंखों देखी फांसी’ कहां से आ गई. यह मेरी रिपोर्टिंग का अपवाद भी है और विशिष्ट प्रसंग भी.

हर पत्रकार की यह लालसा होती है कि वह कोई ऐसी रिपोर्ट लिखे जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेे. उस समय यह बहुत बड़ी खबर रही होगी. क्या आज की तरह उस समय भी ब्रेकिंग न्यूज जैसी लालसा पत्रकारों के मन में रहती थी?

1978 में जब मैंने यह रिपोर्टिंग की थी तब ब्रेकिंग न्यूज की पत्रकारिता नहीं होती थी. तब नाम कमाना, कॅरियर बनाना पत्रकारों की सोच नहीं होती थी. हां, कुछ अलग, कुछ बेहतर, कुछ नया करने की ललक जरूर होती थी, जो मुझमें भी थी और उसी के चलते फांसी जैसी दुर्लभ रिपोर्टिंग संभव हो सकी.

बैजू की फांसी के समय आपकी मनःस्थिति कैसी थी?

मेरी मनःस्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण बैजू की मनःस्थिति थी जिसे पढ़ने-समझने की कोशिश मैं कर रहा था. बैजू एक अनपढ़ ग्रामीण था जो अपने मनोभावों को शब्दों में व्यक्त करने में असमर्थ था. अतः संवाद से परे दाढ़ी में छिपे उसके चेहरे, उसकी आंखों और उसकी भाव-भंगिमाओं से ही उसकी मनःस्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था. मेरी मनःस्थिति का तो मुझे खयाल ही नहीं था, मैं तो पूरी तरह बैजू में खोया हुआ था.

बैजू कीे फांसी के लगभग 36 साल बाद किताब की जरूरत महसूस क्यों हुई?

जरूरत कुछ नहीं थी. फांसी की रिपोर्टिंग की चर्चा लंबे समय तक होती रही. कुछ मित्रों ने सलाह दी कि इसे पुस्तक का रूप दिया जाना चाहिए क्योंकि यह दुर्लभ प्रसंग है. काफी समय तक मैं ऊहापोह में रहा कि वाकई ऐसा करना चाहिए और हां, तो कैसे? इसी उधेड़बुन में फांसी की सजा से संबंधित प्रकाशनों से गुजरता गया. अधिकांश सामग्री फांसी की सजा को कायम रखने या समाप्त करने के पक्ष में थी, जिससे मैं बचना चाहता था. मैं फांसी की सजा दिए जाने की घटना तक अपने आपको सीमित रखना चाहता था ताकि पुस्तक रिपोर्टिंग पर ही केंद्रित हो पाए. इसे मैं फांसी की सजा पर व्यापक अध्ययन या शोध प्रबंध नहीं बनाना चाहता था. एक पत्रकार के रूप में अपनी रिपोर्टिंग को केंद्र में रखकर फांसी की सजा से संबंधित तथ्यों को मैंने पुस्तक के रूप में शामिल किया ताकि फांसी की सजा को पाठक समग्रता में जान सकें. धीरे-धीरे पुस्तक का स्वरूप उभरने लगा लेकिन दैनंदिन जद्दोजहद में वक्त नहीं मिल पा रहा था. इसलिये इसे  तैयार करने में बरसों का वक्त लग गया. मेरा आलस्य भी इस देरी की एक वजह रही.

किताब की भूमिका में आपने लिखा है कि  लिखते समय बार-बार काट-छांट करनी पड़ी और बहुत बदलाव भी, जो आपके स्वभाव के विपरीत था. आपसे जानना चाहूंगा.

इस रिपोर्टिंग पर किताब लिखने का खयाल कभी नहीं रहा. जैसा मैंने पहले कहा था कि रिपोर्टिंग करने के पहले मुझे अहसास ही नहीं था कि फांसी की रिपोर्टिंग कोई दुर्लभ रिपोर्टिंग है. लिहाजा न तो घटना से संबंधित कोई नोट्स लिया गया था और न कोई अन्य होमवर्क. फांसी की सजा पाए कैदी बैजू द्वारा बताई गई बातों की तस्दीक करने या उसके गांव जाकर उसके परिवार से मिलने का भी काम नहीं किया जा सकता था. मेरी पूरी एकाग्रता फांसी की सजा दिए जाने की रिपोर्टिंग तक सीमित थी और रिपोर्टिंग के बाद यह चैप्टर समाप्त हो गया था. अब जब इस रिपोर्टिंग को पुस्तक का स्वरूप देेने की पहल हुई तब संकट यह था कि घटना से संबंधित संदर्भ व जानकारियां भी देनी थीं और विषय से बाहर के विस्तार से भी बचना था. कोशिश पूरी थी कि पुस्तक फांसी की रिपोर्टिंग पर ही केंद्रित हो. वैसे भी जब कोई पुस्तक टुकड़ों-टुकड़ाें में व लंबे अंतराल में लिखी जाए तब उसे अंतिम रूप देने में ऐसा होना स्वाभाविक है.

पॉजीटिव खबर चलाइए…

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बरसों बाद इन दिनों एक बार फिर फील गुड का माहौल है, देश-विदेश में फिर इंडिया शाइन कर रहा है. चमकदार लिबास है, चमकदार नेता हैं और चमकदार बातें हैं. जनता ने जितना चाहा था उससे ज्यादा मिल रहा है, पॉलीटिकल लीडर के साथ मोटिवेशनल और स्प्रिचुअल लीडर भी मिल गया है. इस फील गुड से भला मीडिया कैसे अलग रह सकता है. प्रधानमंत्रीजी देश के बाहर थे लेकिन सक्षम संचार के इस युग में एक ऐतिहासिक चिट्ठी उन तक पहुंच गई. देश के एक बड़े अखबार के मालिक ने इस चिट्ठी के जरिए सकारात्मकता के नए आंदोलन की जानकारी प्रधानमंत्री तक पहुंचाई थी. प्रधानमंत्रीजी ने इस जानकारी को विदेश से देश के ही नहीं दुनिया के लोगों तक पहुंचाया. दुनिया को पता चला कि इस वक्त भारत में ही नहीं बल्कि भारत के मीडिया में सकारात्मकता की बयार बह रही है. इस समाचार पत्र में एक पूरा दिन ही पॉजीटिव खबरों के नाम कर दिया गया है. ये बात और है कि देश में असमय बारिश और ओलावृष्टि के कारण किसान त्राहिमाम कर रहे हैं. दिल्ली में मासूमों के साथ बलात्कार का सिलसिला रुक नहीं रहा है. सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी है, नई और वैकल्पिक राजनीति की बात करनेवालों में भी कीचड़ में गिरने की होड़ मची है. और तो और दिल्ली के लुटियंस इलाके में संसद से महज दो किलोमीटर की दूरी पर हजारों की भीड़ और क्रांतिकारी नेताओं, मंत्रियों, मुख्यमंत्री की आंखों के सामने एक आदमी फांसी लगाकर खुुद को खत्म कर लेता है. बकौल मोदी जी और अग्रवाल साहब, मिट्टी डालिए इस मातमपुर्सी पर. माहौल को खुशनुमा बनाइए, अच्छे दिनों की अच्छी बातें लोगों तक पहुंचाइए. पॉजीटिव खबर चलाइए, निगेटिविटी को देश से दूर भगाइये.

करीब पंद्रह साल की पत्रकारिता और अब पत्रकारिता शिक्षण में समाचार की जितनी परिभाषाएं हमने समझी या सुनी है उनमें से पॉजीटिव और निगेटिव वाला ये गूढ़ ज्ञान हमसे न जाने कैसे छूट गया. अब तक तो यही मान कर चल रहे थे कि खबर सिर्फ खबर होती है उसे पॉजीटिव या निगेटिव कैसे कहा जा सकता है. किसी भी समाचार में सबसे प्रमुख तत्व सूचना का होता है और सूचना को निगेटिव मानकर उसे जनता तक पहुंचाने से कैसे रोका जा सकता है. जिसको नकारात्मक कहकर रोकने की वकालत की जा रही है वह नकारात्मकता की सूचना है जिसके सबके सामने आने से ही जो कुछ निगेटिव है उसको खत्म करने की कवायद और बहस समाज में शुरू होती है. पत्रकारिता के मौजूदा परिदृश्य में निश्चित रूप से कई बुराइयां हैं जिनको ठीक करना, उन पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है लेकिन खबरों के पॉजिटिव-निगेटिव वर्गीकरण की कतई जरूरत नहीं है. मीडिया एक आईना है. उसमें नजर आनेवाले सच को किसी भी प्रकार का प्रमाण पत्र देने का काम मीडिया का नहीं है.

पत्रकारिता में एक नए प्रयोग के तौर पर राजनीति, समाज और सत्ता के सकारात्मक पहलुओं को सामने लाने को नाजायज नहीं ठहराया जा सकता. शायद विकासात्मक पत्रकारिता की अवधारणा भी यही कहती है किंतु समूची पत्रकारिता को दिशा दिखाने के नाम पर समाचार को नकारात्मक या सकारात्मक ठहराए जाने का विचार बेहद अपरिपक्व है. प्रधानमंत्री जी कथित सकारात्मक खबरों को प्रोत्साहित करने के स्थान पर मीडिया संस्थानों को सच को सच की तरह पेश करने की आजादी का भरोसा देते तो शायद अधिक फलदायी होता.