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कहानी राजकुमार शुक्ल की, जिन्होंने चंपारण में तैयार की गांधी के सत्याग्रह की जमीन

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जो चंपारण में गांधी के सत्याग्रह को जानते हैं, वे राजकुमार शुक्ल का नाम भी जानते हैं. गांधी के चंपारण सत्याग्रह में दर्जनों नाम ऐसे रहे जिन्होंने दिन-रात एक कर गांधी का साथ दिया. अपना सर्वस्व त्याग दिया. उन दर्जनों लोगों के तप, त्याग, संघर्ष, मेहनत का ही असर रहा कि कठियावाड़ी ड्रेस में पहुंचे बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी चंपारण से ‘महात्मा’ बनकर लौटते हैं और फिर भारत की राजनीति में एक नई धारा बहाते हैं. गांधी 1917 में चंपारण आए तो सबने जाना. गांधी चंपारण आने के बाद महात्मा बने, उसकी कहानी भी दुनिया जानती है. गांधी चंपारण न आते तो उनकी राजनीति का रूप-स्वरूप क्या होता और किस मुकाम को हासिल करते, इस पर अंतहीन बातों का सिलसिला जारी है और रहेगा.

इतिहास के पन्ने में दर्ज भले न हो लेकिन चंपारण में यह भी सब जानते हैं कि गांधी के यहां आने के पहले भी एक बड़ी आबादी निलहों से अपने सामर्थ्य के अनुसार बड़ी लड़ाई लड़ रही थी. उस आबादी का नेतृत्व शेख गुलाब, राजकुमार शुक्ल, हरबंश सहाय, पीर मोहम्मद मुनिश, संत राउत, डोमराज सिंह, राधुमल मारवाड़ी जैसे लोग कर रहे थे. यह गांधी के चंपारण आने के करीब एक दशक पहले की बात है. 1907-08 में निलहों से चंपारणवालों की भिड़ंत हुई थी. यह घटना कम ऐतिहासिक महत्व नहीं रखती. शेख गुलाब जैसे जांबाज ने तो निलहों का हाल बेहाल कर दिया था. चंपारण सत्याग्रह का अध्ययन करने वाले भैरवलाल दास कहते हैं, ‘साठी के इलाके में शेख ने तो अंग्रेज बाबुओं और उनके अर्दलियों को पटक-पटककर मारा था. इस आंदोलन में चंपारणवालों पर 50 से अधिक मुकदमे हुए और 250 से अधिक लोग जेल गए. शेख गुलाब सीधे भिड़े तो पीर मोहम्मद मुनिश जैसे कलमकार ‘प्रताप’ जैसे अखबार में इन घटनाओं की रिपोर्टिंग करके तथ्यों को उजागर कर देश-दुनिया को इससे अवगत कराते रहे. राजकुमार शुक्ल जैसे लोग रैयतों को आंदोलित करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह की भाग-दौड़ करते रहे.’

ये राजकुमार शुक्ल ही थे जिन्होंने गांधी को चंपारण आने को बाध्य किया और आने के बाद गांधी के बारे में मौखिक प्रचार करके सबको बताया ताकि जनमानस गांधी पर भरोसा कर सके और गांधी के नेतृत्व में आंदोलन चल सके

जो तमाम नाम ऊपर वर्णित हैं, उन्होंने अपने तरीके से अपनी भूमिका निभाई और इस आंदोलन का असर हुआ. 1909 में गोरले नामक एक अधिकारी को भेजा गया. तब नील की खेती में पंचकठिया प्रथा चल रही थी यानी एक बीघा जमीन के पांच कट्ठे में नील की खेती अनिवार्य थी. भैरवलाल बताते हैं, ‘इस आंदोलन का ही असर रहा कि पंचकठिया की प्रथा तीनकठिया में बदलने लगी यानी रैयतों को पांच की जगह तीन कट्ठे में नील की खेती करने के लिए निलहों ने कहा.’ भैरवलाल आगे बताते हैं, ‘गांधी के आने के पहले चंपारण में इन सारे नायकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही.’ इनमें कौन महत्वपूर्ण नायक था, तय करना मुश्किल है. सबकी अपनी भूमिका थी, सबका अपना महत्व था. लेकिन 1907-08 के इस आंदोलन के बाद गांधी को चंपारण लाने में और उन्हें सत्याग्रही बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही राजकुमार शुक्ल की. यह बात सिर्फ भैरवलाल नहीं बताते, चंपारण के सत्याग्रह के इतिहास पर बात करने वाले सभी राजकुमार शुक्ल की भूमिका को काफी अहम मानते हैं. सब जानते हैं कि ये राजकुमार शुक्ल ही थे जो गांधी को चंपारण लाने की कोशिश करते रहे. गांधी को चंपारण बुलाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह दौड़ लगाते रहे. चिट्ठियां लिखवाते रहे. (देखें बॉक्स- मान्यवर महात्मा, किस्सा सुनते हो रोज औरों के, आज मेरी भी दास्तां सुनो)

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चिट्ठियां गांधी को भेजते रहे. पैसे न होने पर चंदा करके, उधार लेकर गांधी के पास जाते रहे. कभी अमृत बाजार पत्रिका के दफ्तर में रात गुजारकर कलकत्ता में गांधी का इंतजार करते रहते, कई बार अखबार के कागज को जलाकर खाना बनाकर खाते तो कभी भाड़ा बचाने के लिए शवयात्रा वाली गाड़ी पर सवार होकर यात्रा करते. राजकुमार शुक्ल के ऐसे कई प्रसंग हैं. खुद गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ’ में राजकुमार शुक्ल पर एक पूरा अध्याय लिखा है. (देखें बॉक्स- नील के धब्बे)

गांधी ने तो राजकुमार शुक्ल पर इतना ही लिखा लेकिन उनके बारे में तमाम लोग और विस्तार से बताते हैं. सबका लब्बोलुआब होता है कि भले ही चंपारण आने के बाद गांधी के संग तमाम लोग लग जाते हैं और सत्याग्रह की लड़ाई को आगे बढ़ाते हैं लेकिन ये राजकुमार शुक्ल ही थे जिन्होंने गांधी को चंपारण आने को बाध्य किया और चंपारण आने के बाद भी गांधी के बारे में मौखिक प्रचार कर-करके सबको बताया ताकि जनमानस गांधी पर भरोसा कर सके और गांधी के नेतृत्व में आंदोलन चल सके. खैर, यह तो एक अध्याय है. राजकुमार शुक्ल से जुड़े हुए ऐसे कई अध्याय हैं कि गांधी के आने के बाद कैसे वे रैयतों को एकजुट कर लाते थे. सबका छोटा-बड़ा केस लड़ते थे. लेकिन शुक्ल की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण अध्याय गांधी के चंपारण से चले जाने के बाद का है, जो अजाना-सा ही है, जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती.

भैरवलाल दास द्वारा संपादित राजकुमार शुक्ल की डायरी में एक बेहद मार्मिक प्रसंग है. गांधी के चंपारण से जाने के बाद भितिहरवा से शुक्ल के संगठन का काम जारी रहता है. रोलट एक्ट के विरुद्ध वे ग्रामीणों व रैयतों में जन जागरण फैलाते रहते हैं. ग्रामीणों के बीच उनकी सक्रियता 1920 में हुए असहयोग आंदोलन में भी रहती है. वे चंपारण में किसान सभा का काम करते रहते हैं. 1919 में लहेरियासराय में बिहार प्रोविंशियल एसोसिएशन का 11वां सत्र आयोजित होता है जिसमें वे भाग लेते हैं. वहां जासूसी करने गया एक अंग्रेज अधिकारी तो यह लिखता है कि राजकुमार शुक्ल ही इसके नेता हैं. शुक्ल को गांधी की खबर अखबारों से मिलती रहती है. वे गांधी को फिर से चंपारण आने के लिए कई पत्र लिखते हैं. गांधी का कोई आश्वासन नहीं मिलता है. अपनी जीर्ण-शीर्ण काया लेकर 1929 की शुरुआत में वे साबरमती आश्रम पहुंच जाते हैं. कस्तूरबा उन्हें देखने ही रोने लगती हैं. 15-16 दिनों तक शुक्ल वहां रुकते हैं, तब गांधी से उनकी मुलाकात हो पाती है. उस समय गांधी कहीं बाहर गए हुए होते हैं. गांधी को देखते ही राजकुमार शुक्ल की आंखें भर आती हैं. गांधी कहते हैं कि आपकी तपस्या अवश्य रंग लाएगी. राजकुमार पूछते हैं- क्या मैं वह दिन देख पाऊंगा? गांधी निरुत्तर हो जाते हैं.

साबरमती से लौटकर शुक्ल अपने गांव सतबरिया नहीं जाते हैं. वे उसी साहू के मकान में चले जाते हैं जहां गांधी रहा करते थे. उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था. 54 वर्ष की उम्र में 1929 में उनकी मृत्यु मोतिहारी में हो जाती है. मृत्यु के समय उनकी बेटी देवपति वहीं रहती हैं. मृत्यु के पूर्व शुक्ल अपनी बेटी से ही मुखाग्नि दिलवाने की इच्छा जाहिर करते हैं. मोतिहारीवाले चंदा करते हैं. मोतिहारी में रामबाबू के बागीचे में शुक्ल का अंतिम संस्कार होता है.

ऐमन वही अंग्रेज अधिकारी है जो राजकुमार शुक्ल को हर तरीके से बर्बाद करता है. धन-संपदा से विहीन तो कर ही देता है, मौके तलाश-तलाश कर उनको प्रताड़ित करता है और मछली मारने के जुर्म में जेल भिजवा देता है

उनकी मृत्यु की सूचना ऐमन को मिलती है. ऐमन बेलवा कोठी का अंग्रेज अधिकारी है. ऐमन वही अधिकारी है जो शुक्ल को हर तरीके से बर्बाद करता है. धन-संपदा से विहीन तो कर ही देता है, मौके तलाश-तलाश कर उनको प्रताड़ित करता है. कहा जाता है कि शुक्ल जब किसानी का पेशा कर रहे होते हैं तो वे अपने घर के आगे आलू लगाते हैं. ऐमन का एक कारिंदा आलू की मांग करता है या मालगुजारी देने को कहता है. वह दोनों ही देने से मना कर देते हैं. वे जानते थे कि नियमतः घर के अहाते की खेती में से हिस्सा देना जरूरी नहीं. ऐमन तक सूचना पहुंचती है तो वह बौखला जाता है. उसे लगता है कि राजकुमार नहीं देंगे तो देखा-देखी दूसरे किसान भी यही करने लगेंगे. इसके बाद शुक्ल को मछली मारने के जुर्म में फंसाया जाता है. तीन हफ्ते की जेल होती है. शुक्ल का घर ढहा दिया जाता है. फसल को रौंद दिया जाता है. ऐमन के लोग और भी कई तरीकों से उन्हें प्रताड़ित करते हैं.

शुक्ल की मृत्यु की सूचना जब ऐमन को मिलती है तो वह स्तब्ध रह जाता है. उसके मुंह से बस इतना ही निकलता है कि चंपारण का अकेला मर्द चला गया. वह तुरंत अपने चपरासी को बुलाता है. उसे 300 रुपये देता है. कहता है, ‘शुक्ल के घर पर जाओ और श्राद्ध के लिए पैसा देकर आओ. इस मर्द ने तो सारा काम छोड़कर देश सेवा और गरीबों की सहायता में ही अपने 25 वर्ष लगा दिए. रहा-सहा सब मैंने उससे छीन लिया. अभी उनके पास होगा ही क्या?’ चपरासी हाथ में रुपये लेकर हक्का-बक्का ऐमन का मुंह देखता रह जाता है. कुछ क्षण बाद वह बोलता है कि साहब वह तो आपका दुश्मन था. उसकी बात काटते हुए ऐमन बोलता है,’ तुम उसकी कीमत नहीं समझोगे. चंपारण का वह अकेला मर्द था जो 25 वर्षों तक मुझसे लड़ता रहा.’

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शुक्ल के श्राद्ध में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, ब्रजकिशोर प्रसाद आदि दर्जनों नेता सतवरिया में मौजूद रहते हैं. ऐमन भी वहां मौजूद रहता है. राजेंद्र बाबू कहते हैं, ‘अब तो आप खुश होइए ऐमन, आपका दुश्मन चला गया.’ ऐमन अपनी बात दुहराता है, ‘चंपारण का अकेला मर्द चला गया. अब मैं भी ज्यादा दिन नहीं बचूंगा.’ चलते-चलते ऐमन शुक्ल के बड़े दामाद को अपनी कोठी पर बुलाता है. वह मोतिहारी के पुलिस कप्तान को एक पत्र देता है जिसके आधार पर शुक्ल के दामाद सरयू राय को पुलिस जमादार की नौकरी मिलती है. ऐमन को राजकुमार शुक्ल की मृत्यु का सदमा लगता है. वह भी कुछ महीने बाद दुनिया से विदा हो जाता है.      

कुनन-पोशपोरा सामूहिक बलात्कार कांड : किताब में दर्ज हुआ दर्द

डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)
डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)
डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. जाहिर है कश्मीर भी इस घटना से अछूता नहीं था जहां बलात्कार की शिकार तमाम महिलाओं को कब का भुला दिया गया है. इस घटना ने उनके जख्मों को फिर से हरा कर दिया था. वर्ष 1991 में 23 फरवरी कश्मीर के इतिहास में काले दिन के रूप में दर्ज है. उस रोज उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के कुनन और पोशपोरा गांवों में तकरीबन 30 महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिसका आरोप सेना पर है. इस घटना के तकरीबन 22 साल बाद जनवरी 2013 में घाटी की 50 महिलाओं ने बलात्कार की शिकार इन महिलाओं की मदद के लिए एक समूह का गठन किया. इस समूह में विद्यार्थी, सामाजिक कार्यकर्ता, घरेलू महिलाएं, डॉक्टर और सरकारी कर्मचारी थे.

समूह ने इन महिलाओं को उस मानसिक सदमे से उबारने का संकल्प लिया तो वहीं मीडिया ने बलात्कार के इन मामलों की फिर से जांच करवाने की अपील की. जांच के लिए एसएसपी रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किए जाने की मांग को लेकर एक याचिका पर जागरूक नागरिकों के हस्ताक्षर लिए गए. जून 2013 में इस समूह की सक्रियता से प्रभावित होकर एक स्थानीय अदालत ने मामले में आगे की जांच करने और दोषियों की पहचान किए जाने के निर्देश सरकार को दिए. हालांकि मामले में नया मोड़ पिछले साल मार्च में तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा जांच शुरू करने पर सेना की आपत्ति के बाद इस पर रोक लगा दी.

बहरहाल पांच कश्मीरी महिलाओं- इस्सर बतूल, इफराह बट, समरीना मुश्ताक, मुनाज़ा राशिद और नताशा राथर ने उन बर्बर घटनाओं को कलमबद्ध करने की ठानी. उनकी किताब ‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा?’ का लोकार्पण बीते जनवरी में जयपुर साहित्य महोत्सव में हुआ वहीं श्रीनगर में किताब का लोकार्पण 23 फरवरी को हुआ.

भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड में  न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर बनी रही

इस्सर बताती हैं, ‘किताब उन महिलाओं के अनुभवों के माध्यम से न्याय प्रक्रिया, सरकार की जिम्मेदारी, लांछन और इस सदमे के लंबे असर की पड़ताल करती है. भारतीय सेना द्वारा कुनन और पोशपोरा में किए गए सामूहिक बलात्कारों पर दोबारा चर्चा कुछ हद तक दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड के कारण हुई. उस लड़की के साथ हुई बलात्कार की घटना ने कश्मीरियों पर गहरा असर डाला. दिल्ली की इस पीड़िता के लिए सभी ने व्यापक तौर पर एकजुटता महसूस की. ऐसे में हमारा ध्यान इस ओर गया कि दिल्ली में हुई एक घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी लेकिन कश्मीर के दो गांवों में महिलाओं के पूरे समूह के साथ हुए बलात्कार ने बीते वर्षों में शायद ही किसी का ध्यान खींचा होगा.’ इस फर्क को लेकर लेखिका इस्सर व्यथित हैं. वे कहती हैं, ‘एक ऐसे देश में जो सारी दुनिया में खुद के ‘सबसे बड़ा लोकतंत्र’ होने का दम भरता है, वहां सेना द्वारा किए गए बलात्कारों को माफ कैसे किया जा सकता है?’

किताब लिखने वाली नताशा, इस्सर और समरीना सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मुनाज़ा वकील हैं, वहीं इफराह ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों’ की पढ़ाई कर रही हैं. ऐसा नहीं था कि इन्होंने शुरू से ही किताब लिखने का फैसला कर लिया था. बलात्कार पीड़िताओं से बात करने के दौरान यह विचार उनके दिमाग में आया. समरीना बताती हैं, ‘दोबारा जांच शुरू किए जाने के लिए याचिका दायर करने के दौरान ही हम लगातार

इन गांवों में जा रहे थे. ये महिलाएं भी कुनन और पोशपोरा मामले से संबंधित कार्यक्रमों के सिलसिले में श्रीनगर आती रहती थीं. ऐसे ही कार्यक्रमों के दौरान और कभी-कभार कोर्ट में हम इन पीड़िताओं से मिलते थे. हमें उनका पूरा सहयोग मिला. अगर उन्होंने हम पर यकीन न किया होता तो हम यहां तक नहीं पहुंच पाते.’

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2013 में एक कार्यक्रम के दौरान इन लेखिकाओं की मुलाकात बलात्कार की शिकार हमीदा (बदला हुआ नाम) से हुई. हमीदा ने अपनी कहानी यूं बताई, ‘उस रात जब सेना मेरे पति को उठा ले गई तब घर में मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ अकेली थी. सैनिकों ने मेरी गोद से मेरे छोटे बेटे को छीन लिया और मेरे कपड़े फाड़कर मुझे जमीन पर धकेल दिया… मेरा बेटा ये सब देख लगातार रो रहा था, वहीं मुझे कुछ पता नहीं था कि उन्होंने मेरे दूसरे बेटे को कहां रखा था. मेरे गिड़गिड़ाने के बावजूद उन्होंने मुझे पूरी रात नहीं जाने दिया.’ 1991 की उस भयावह रात को बयान करते हुए हमीदा रो पड़ती हैं. उस वक्त वे केवल 24 वर्ष की थीं.

भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार हमीदा को न्याय की उम्मीद तब तक नहीं थी जब तक कार्यकर्ताओं के समूह ने 2013 में दोबारा न्याय की लड़ाई शुरू नहीं कर दी. न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर रही.

2012 में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट (पीएसबीटी) के बैनर तले और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सहायता प्राप्त इस घटना पर आधारित डाॅक्यूमेंट्री ‘ओशन आॅफ टियर्स’ को प्रदर्शित करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा.  कश्मीर विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में फिल्म की स्क्रीनिंग को दो बार रोका गया. पीएसबीटी द्वारा यू-ट्यूब पर अपलोड किए गए इस डाॅक्यूमेंट्री के सात मिनट के ट्रेलर को अपलोड करने के दो महीने बाद हटा दिया गया. इस दौरान इसे 1,49,000 लोगों ने देखा था. हालांकि इन लेखिकाओं के जुनून पर इसका कोई असर नहीं पड़ा बल्कि इनका अब तक का अनुभव इसके बिल्कुल उलट रहा है. उन्हें न केवल जयपुर साहित्य महोत्सव में आमंत्रित किया गया बल्कि श्रीनगर में भी बेरोकटोक किताब का लोकार्पण संपन्न हुआ. लोकार्पण के समय प्रकाशक उर्वशी बुटालिया भी मौजूद थीं. हालांकि किताब की लेखिकाएं इस भुलाए जा चुके सामूहिक बलात्कार कांड के मामले को किताब के जरिए फिर से चर्चा में लाए जाने का श्रेय नहीं लेना चाहतीं. उनका कहना है कि कुनन और पोशपोरा के लोग खामोश नहीं रहे हैं.

‘यह याचिका नए संघर्ष की शुरुआत थी; संघर्ष अपराध की अनदेखी और सरकार के झूठ के खिलाफ. यह संघर्ष अपराधियों को लोगों की नजर में लाने का भी है’

समरीना बताती हैं, ‘न्याय के लिए इन महिलाओं की लड़ाई कोई आज की नहीं है. इन महिलाओं ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज करवाई बल्कि मामले की जांच ही इसलिए शुरू हो सकी कि इन्होंने चुप रहना स्वीकार नहीं किया.’ इन पीड़िताओं में से एक ने समरीना को यह भी बताया कि एफआईआर इसलिए दर्ज करवाई कि ये महिलाएं नहीं चाहती थीं कि सेना द्वारा उनके या फिर किसी और गांव में इस तरह की कोई ज्यादती दोबारा हो. 2013 में जब इन लेखिकाओं ने दोबारा जांच के लिए याचिका दायर की तो वे एक कहीं बड़े उद्देश्य से प्रेरित थीं. इस किताब के एक अंश के मुताबिक, ‘यह याचिका एक नए संघर्ष की शुरुआत थी; एक कानूनी संघर्ष, संघर्ष लगातार मिलती सजाओं की माफी और सरकार के झूठ के खिलाफ. संघर्ष अपराधियों को भूलने और उनके अपराध की अनदेखी के खिलाफ, संघर्ष इन अपराधियों को लोगों की नजर में वापस लाने का और कुनन-पोशपोरा की पीड़ित महिलाओं के समर्थन का.’

कुनन-पोशपोरा की घटना को लेकर लोगों में आज भी गुस्सा है. लोग समय-समय पर इसके विरोध में प्रदर्शन करते रहते हैं
कुनन-पोशपोरा की घटना को लेकर लोगों में आज भी गुस्सा है. लोग समय-समय पर इसके विरोध में प्रदर्शन करते रहते हैं

कुनन और पोशपोरा में 23 फरवरी, 1991 की उस भयावह रात को कश्मीर में भुलाया नहीं जा सकता. नई पीढ़ी अपने परिवार की महिलाओं के साथ हुई ज्यादती के सदमे के साथ बड़ी हो रही है. यहां के लोग बताते हैं कि  पड़ोसी गांवों के लोग इन दो गांवों की बेटियों को अच्छी निगाह से नहीं देखते और उनके बेटे अपने साथियों और शिक्षकों के कटाक्ष सुनकर लगातार स्कूल छोड़ रहे हैं. उन यादों के घाव अब तक हरे हैं और दुखते हैं. इस्सर बताती हैं, ‘23 फरवरी को हर साल सारा गांव मातम में डूब जाता है. उस रोज शायद ही गांव में कोई चूल्हा जलाता है.’

चंपारण सत्याग्रह के 100 साल

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न जाने कितनी बार चंपारण जाना हुआ है. दोनों चंपारण. यानी पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण. हमेशा से आकर्षित करता रहा है चंपारण. संघर्ष और सृजन, दोनों एक साथ करने की जो अद्भुत क्षमता है चंपारण में, वही आकर्षण का कारण है. पहली बार फूलकली देवी का काम सुनकर यहां गया था. फूलकली, एक अनपढ़ महिला. मुसहर समाज से आने वाली. तिरंगे के जरिए जमींदारों के कब्जे से गरीबों और वंचितों की जमीन वापस लेने का अद्भुत अभियान चलाया था उन्होंने. ओह, कैसा होता था दृश्य, तिरंगे के साथ चंपारण के उन अपढ़ मजदूरों का सत्याग्रह कैसा होता था कि जमींदार हथियार-असलहा रहने के बावजूद कुछ नहीं कर पाते थे.

2010 के विधानसभा चुनाव के वक्त एक दूसरे किस्म का आंदोलन देखने गया था. एक इलाके में लोगों ने अपनी ओर से फॉर्म बनवा लिया था. अब जो भी प्रत्याशी वोट मांगने आता, उसे लोग वही पकड़वा देते कि इसे पढ़िए और इस पर अपनी सहमति जताते हुए हस्ताक्षर कीजिए. उस फॉर्म में इलाके की कुछ बड़ी समस्याओं का सिलसिलेवार जिक्र था. जो प्रत्याशी थे, उनसे वादा लिया जाता था कि वे अगर विधायक बन जाते हैं और इन मसलों को नहीं उठा पाते हैं तो फिर बीच कार्यकाल में ही विधायकी से इस्तीफा दे देंगे. प्रत्याशियों ने इसे सहज स्वीकार लिया था. भोजपुरी के मशहूर गीतकार विनय बिहारी भी चुनाव मैदान में थे. संयोग ऐसा बना कि निर्दलीय होने के बावजूद वे विधायक चुन लिए गए. विधायक चुने जाने के बाद पटना रहने लगे. इधर वक्त गुजरता गया. उन्होंने जिन बिंदुओं को विधानसभा में उठाने का वादा किया था, जिनके लिए फॉर्म भरा था, उनमें से किसी मसले को विधानसभा में नहीं उठाया. जब वे वापस अपने इलाके में जाने लगे तो लोगों ने उनके ‘स्वागत’ के लिए सैकड़ों तख्तियां बना रखी थीं. लोग कुछ नहीं करते थे, बस विनय बिहारी के पहुंचते तख्ती दिखा देते थे. उस पर लिखा होता था, ‘आपने जो वादे किए थे, उस पर अमल नहीं किया. अब तो नैतिक तौर पर इस्तीफा दे ही दीजिए.’ विनय बिहारी ने शुरू में इसे गंभीरता से नहीं लिया लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ में आ गया कि वे अपने ही इलाके के साधारण से दिखने वाले लोगों को समझ नहीं पाए और उनका अपने ही इलाके में जाना लोगों ने मुहाल कर दिया.

लोकतंत्र के लिए इस आंदोलन को देखने के पहले थारूओं के इलाके में जाना हुआ था. थारू आदिवासियों की बसाहट वाले इस इलाके को थरूहट कहा जाता है. बिहार के हिस्से में जो थरूहट है उसमें लगभग ढाई लाख थारू आदिवासी रहते हैं. वे गन्ने की खेती करते हैं. गन्ने को चीनी मिलों तक पहुंचाना होता था. चीनी मिल वालों को सिर्फ गन्ना चाहिए होता था, वे गन्ना कैसे पहुंचाएंगे इससे कोई मतलब नहीं था. थारूओं ने कई बार सरकारी अधिकारियों के चक्कर काटे कि उनके इलाके में सड़क बना दी जाए लेकिन उनकी फरियाद किसी ने नहीं सुनी. एक रात थारूओं ने फैसला किया और सुबह-सुबह काम पर लग गए और 24 घंटे में 12 किलोमीटर लंबी सड़क बन गई. थारूओं के इस काम को देखना चकित करने वाला था.

‘अंग्रेजों ने 42 प्रकार के अलग से कर लगाए. ‘बपहा-पुतहा’ जैसे कर लगे. यानी किसी के पिता की माैत हो जाती है और उसकी जगह बेटा घर का मालिक बनता है तो उसके लिए भी अलग से अंग्रेजों को कर देना पड़ता था’

चंपारण की और भी खासियतें हैं. अभी बिहार में शराबबंदी के ऐलान के पहले ही चंपारण के ही कई हिस्सों में महिलाओं ने खुद से आंदोलन चलाकर शराबबंदी करवा दी थी. ऐसे कई उदाहरण चंपारण में देखने को मिलते हैं. बार-बार लगता है कि सत्याग्रह, आंदोलन का यह तरीका कहीं 100 साल पहले गांधी के नेतृत्व में हुए चंपारण सत्याग्रह का असर तो नहीं. संघर्ष और सृजन की धार को एक साथ, एकसमान मजबूत बनाए रखना कहीं गांधी की कर्मभूमि होने का असर तो नहीं, क्योंकि गांधी भी तो 100 साल पहले चंपारण में वही कर रहे थे. आए थे निलहों की लड़ाई लड़ने, अंग्रेजों के शोषण से मुक्ति दिलाने और बिना हिंसा का सहारा लिए अंग्रेजों से भी लड़ने लगे. स्कूल खुलवाने लगे थे, लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने लगे थे, साफ-सफाई की ट्रेनिंग देने लगे थे. सत्याग्रह पर अध्ययन करने वाले भैरवलाल दास कहते हैं, ‘बिहार को लोग लाख बुरा कहें फिर भी गांधी का असर पूरे बिहार पर है.’ 

गांधी द्वारा चंपारण के जरिए बिहार की राजनीति की बुनियाद तैयार करने की बात आती है तो कई किस्से याद आने लगते हैं. पेशे से प्राध्यापक और चनपटिया के रहने वाले प्रो. प्रकाश बताते हैं, ‘भितिहरवा, बड़हरवा लखनसेन और मधुबन में गांधी ने खुद स्कूल खोले. कस्तूरबा ने खुद यहां पढ़ाया. गांधी ने एक बड़ी टीम बाहर से बुलाई. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में एक अभियान चलाया. चंपारण में वृंदावन नाम का एक इलाका है, वहां आप गए हैं. गांधी की प्रेरणा से वहां ढाई दर्जन बुनियादी विद्यालय खोले गए थे. क्या मॉडल था उन स्कूलों का. पढ़ाई भी और रोजगार के लिए हुनर भी. प्रजापति मिश्र जैसे कांग्रेसी नेताओं ने तब बुनियादी विद्यालय के लिए 100 बीघा से ज्यादा जमीन उपलब्ध कराई थी. सबने जमीन दी थी. आज जिस तरह से स्किल डेवलपमेंट आदि पर सरकार जोर दे रही है वह तो चंपारण में बुनियादी स्कूल के जरिए आजादी के पहले ही शुरू हो गया था. काश, वह चल रहा होता लेकिन वे सब तो अब सामान्य स्कूल बन गए.’

आगे की बात प्रो. प्रकाश के साथी समाजसेवी पंकज बताते हैं. पंकज चंपारण के अतीत और फिर वर्तमान को बिल्कुल दूसरे तरीके से बताते हैं. वे कहते हैं, ‘बुनियादी विद्यालय पर बात कर रहे हैं तो जानिए कि वृंदावन में 29 बुनियादी विद्यालय खुले. उस जमाने में एक इलाके में इतने सारे स्कूल भारत में कहीं-कहीं ही होंगे. सिर्फ वहीं स्कूल नहीं खुले. पश्चिमी चंपारण में कुल 43 बुनियादी स्कूल खुले, पूर्वी चंपारण में 10 स्कूल खुले. सारे बुनियादी स्कूल लोगों के सहयोग से खुले. सबके लिए लोगों ने अपनी जमीन दान दी. एक-एक विद्यालय के पास एक एकड़ से लेकर 12 एकड़ तक जमीन है. इतनी जमीन स्कूलों के पास नहीं होती लेकिन अब सारे जमीन पर कब्जा है माफियाओं का और सरकार ने सारे बुनियादी विद्यालयों को सामान्य विद्यालय बना दिया है.’

सत्याग्रह की छाप : चंपारण के भितिहरवा इलाके में बने इस कुएं का इस्तेमाल सत्याग्रह के समय कस्तूरबा गांधी करती थीं
सत्याग्रह की छाप : चंपारण के भितिहरवा इलाके में बने इस कुएं का इस्तेमाल सत्याग्रह के समय कस्तूरबा गांधी करती थीं

पंकज आगे बताते हैं, ‘यहां एक जगह कुमारबाग भी है. गांधी सत्याग्रह समाप्त करने के बाद जब चंपारण से चले गए और वर्षों बाद चंपारण आने वाले थे तो उनके आगमन के पूर्व चंपारण में कई स्कूल खोले गए थे. यह दिखाने के लिए कि गांधी शिक्षा की बुनियाद चंपारण में रख गए थे तो चंपारण अपना फर्ज निभा रहा है. उनके बताए मार्ग पर बढ़ रहा है. कुमारबाग एक ऐसा स्कूल है जिसे देखकर अब भी समझा जा सकता है कि वहां क्या माॅडल था. पढ़ाई के साथ रोजगार के लिए प्रशिक्षण तो था ही, साथ ही राजनीति की पाठशाला भी चलती थी वहां.’

सत्याग्रह के समय को याद करते हुए वे कहते हैं, ‘सिर्फ तीन घंटे का खेला था गांधी का चंपारण सत्याग्रह, बाकि समय तो वे चंपारण में आत्मबल भर रहे थे. वे तीन घंटे वही थे, जिस दिन गांधी मोतिहारी आए, उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनी और फिर अंग्रेज चाहकर भी न तो उन्हें गिरफ्तार कर सके, ना जिलाबदर कर सके. गांधी के समर्थन में ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि अंग्रेज कुछ भी न कर सके.’

वे कहते हैं, ‘यह बेतियाराज का इलाका है. बेतिया के राजा दिवालिया होने के कगार पर थे. अंग्रेजों को लगान देने का भी पैसा उनके पास नहीं था. मालगुजारी के रूप में 35 हजार पाउंड कर्ज हो गया था बेतियाराज पर. अंग्रेजी सरकार ने कार्रवाई शुरू की. गिब्सन मैनेजर बनकर आया बेतियाराज के मामले को समझने. उसने बेतियाराज को कर्ज दिलवा दिया और कहा कि कर्ज से आप अंग्रेजी सरकार की मालगुजारी भी दे दीजिए और अपना जीवन भी मजे से चलाइए लेकिन कर्ज के बदले आप अपनी जमीन पट्टे पर दे दीजिए, हम लोग नील की खेती करवाएंगेे. बेतियाराज ने वैसा ही किया. कर्ज लिया, चार लाख एकड़ जमीन पट्टे पर दे दी.’

सत्याग्रह के निशां : भितिहरवा के गांधी आश्रम में बने बुनियादी स्कूल में इस घंटे का इस्तेमाल किया जाता था
सत्याग्रह के निशां : भितिहरवा के गांधी आश्रम में बने बुनियादी स्कूल में इस घंटे का इस्तेमाल किया जाता था

पंकज के अनुसार, इसके बाद उस जमीन पर नील की खेती शुरू हुई. दोनों चंपारण, जो तब एक ही हुआ करते थे, में 68 कोठियां बनीं, जिन्हें निलहा कोठी कहा जाने लगा. सभी कोठियों के हिस्से में अथाह जमीनें आईं. पंचकठिया प्रथा शुरू हुई. किसानों को एक बीघे में पांच कट्ठे पर नील की खेती के लिए बाध्य किया जाने लगा. अंग्रेजों ने 42 प्रकार के अलग से कर लगाए. ‘घोड़हवा’ से ‘घवहवा’ जैसे कर. यानी किसी अंग्रेज को घोड़ा खरीदना हो तो उसके लिए जनता कर दे, किसी अंग्रेज को घाव हो गया हो, इलाज कराना हो तो उसके लिए भी जनता से कर लिया जाता. ‘बपहा-पुतहा’ जैसे कर लगे. यानी किसी के पिता की माैत हो जाती है और उसकी जगह बेटा घर का मालिक बनता है तो उसके लिए भी अलग से अंग्रेजों को कर देना पड़ता था. ऐसे ही कई कर तब जनता को अंग्रेजों को देने पड़ते थे.

पंकज कहते हैं, ‘सब जानते ही हैं कि पंचकठिया बाद में तीनकठिया में बदला और फिर एक समय ऐसा आया जब नील की खेती बंद करनी पड़ी. विश्वयुद्ध के बाद नील की मांग भी कम होने लगी थी, कृत्रिम नील का उत्पादन भी शुरू हो गया था और फिर चंपारण के सत्याग्रह का भी असर था कि अंग्रेजों को समझ में आ गया था कि अब नील की खेती करना चंपारण में आसान नहीं होगा, सो अंग्रेजों ने 1924 आते-आते अपनी रणनीति बदल दी थी. 1924 से 1929 के बीच अंग्रेजों ने चंपारण में नौ चीनी मिलें खोलीं. निलहे कोठियों ने चीनी मिलों को जमीन देनी शुरू की. 40 हजार एकड़ जमीन दी गई. फिर चीनी कारखाने के लिए कड़े कानून बने. जैसे यह कि जिस इलाके में चीनी का जो कारखाना होगा उस इलाके में किसानों को वहीं अपना गन्ना देना होगा. किसान सिर्फ गन्ना उत्पादन करेगा, वह अपने गन्ने से कुछ बना भी न पाएगा.’

पंकज इसे चंपारण में शोषण के दूसरे अध्याय की शुरुआत बताते हुए कहते हैं, ‘यह नील की खेती की तरह ही खतरनाक थी और आजादी के बाद शोषण के इस कारोबार का अपार विस्तार हुआ. निलहों की जो जमीन थी, उसमें से चीनी मिलों को देने के बाद सारी जमीनें कारिंदों और गुमाश्ता यानी नील कोठी में काम करने वालों को औने-पौने दामों में बेच दी गईं या फिर उन्हें दे दिया गया. असल अंग्रेज जाने लगे, दूसरे किस्म के अंग्रेजों की उत्पति शुरू हुई. गन्ने के उत्पादक किसान पुर्जी (रसीद) और सूद के फेरे में फंसने लगे. वे गन्ना तो उपजाते हैं लेकिन गन्ना बेचने जाते हैं तो उन्हें तुरंत पैसा नहीं मिलता.  पुर्जी पकड़ा दी जाती है. यह  पुर्जी जमींदार किस्म के लोग देते हैं. कलेक्शन सेंटर बना हुआ है. अब पुर्जी लेकर किसान इधर से उधर भटकते रहते हैं. उन्हें दौड़ाया जाता है.  पुर्जी के आधार पर सूदखोरों से पैसा लेते हैं.  पुर्जी गिरवी रखकर पैसे लेते हैं, बाद में पुर्जी से सूदखोर सीधे जमींदार से पैसा ले लेता है और किसानों से सूद अलग लेता है. यह शोषण का अंतहीन सिलसिला है.’

‘बिहार में गांधी की प्रेरणा से जो 494 बुनियादी विद्यालय खुले थे, उन्हें लोगों ने अपनी जमीन देकर खुलवाया था. अगर इन्हें सामान्य विद्यालय की परिधि से हटा दें तो ये स्कूल ही बिहार का कायाकल्प कर देंगे’

भितिहरवा आश्रम में रखे इस टेबल का इस्तेमाल गांधी लिखने-पढ़ने के लिए किया करते थे
भितिहरवा आश्रम में रखे इस टेबल का इस्तेमाल गांधी लिखने-पढ़ने के लिए किया करते थे

वे कहते हैं, ‘चंपारण की कहानी इतनी ही नहीं है.’ चंपारण में जमीन के इस खेल को 1950 के एक और किस्से से समझाते हुए पंकज कहते हैं, ‘1950 में लोहिया जी, खुर्शीद बेन और रामनंदन मिश्र जैसे तीन प्रमुख लोग एक जांच कमेटी बनाकर चंपारण में जमीन का अध्ययन करने आए. कमेटी ने नौ चीनी मिलों के जमीन का विवरण लिखा. जांच में पाया गया कि हरिनगर के चीनी मिल के पास छह हजार एकड़ जमीन है. इसी तरह से हजारों एकड़ जमीन को मिलों के चंगुल से निकाला गया, जिसकी कोई उपयोगिता नहीं. इन जमीनों को गरीबों को देने का फैसला हुआ. चंपारण में भूपतियों की अच्छी संख्या है तो रिकाॅर्ड स्तर पर भूमिहीन भी वहीं रहते हैं.’ पंकज के अनुसार, 22 दिसंबर, 2015 तक सरकारी रिकाॅर्ड के अनुसार पश्चिमी चंपारण में 8,514 और पूर्वी चंपारण में 2,419 परिवार ऐसे मिले जिनके पास रहने का घर तक नहीं है. और ऐसे परिवारों की संख्या तो अथाह है जिनके पास किसी तरह रहने की जमीन भर है.’ पंकज बताते हैं, ‘जमीन के लिए केस हुआ. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट से भूपति हारे लेकिन बिहार में एक कानून है कि भूमि सुधार और राजस्व मंत्री के कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट से हार जाने के बाद भी जाया जा सकता है. वही रास्ता भूपतियों ने अपनाया. सब एक-एक कर भूमि सुधार और राजस्व मंत्री के यहां दस्तक देने लगे. मंत्री जी के यहां केस पेंडिंग में पड़ता गया. भूपति अब भी जमीन पर कब्जा किए हुए हैं. दिसंबर 2015 में यह मामला बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक पहुंचा. उन्हें बताया गया कि कैसे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का आदेश भूपतियों के खिलाफ गया है फिर भी भूमि सुधार और राजस्व मंत्री के यहां 2008 से दर्जनों केस पड़े हुए हैं, करीब 25 हजार एकड़ जमीन का मामला है जो भूमिहीनों व गरीबों के बीच बांटा जा सकता है. नीतीश कुमार ने गंभीरता दिखाई. कहा कि हां, मार्च के बजट सत्र में ऐसा होगा.’

आश्रम में आज भी रखी अनाज पीसने की इस चक्की का इस्तेमाल कस्तूरबा गांधी करती थीं
आश्रम में आज भी रखी अनाज पीसने की इस चक्की का इस्तेमाल कस्तूरबा गांधी करती थीं

पंकज कहते हैं कि मार्च का बजट सत्र तो बीत गया लेकिन उस मसले पर एक बार भी बात नहीं हुई. पंकज ऐसी कई बातें बताते हैं और कहते हैं कि चंपारण में किस्से अनेक हैं. गांधी जहां चंपारण को छोड़कर गए थे, वह वहीं रुका हुआ है. शोषण का सिलसिला अब भी जारी है लेकिन सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर यह सब मसला नहीं है.

पंकज जो बातें कहते हैं वे सही हैं. 2017 का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, चंपारण छत्तर के मेले जैसा बनता जा रहा है. चंपारण को देखने दूर-दूर से लोगों का आना शुरू हो गया है. वजह है कि 15 अप्रैल, 2016 से गांधी के सत्याग्रह का 100वां साल शुरू हो गया है. लोग आ रहे हैं, मोतिहारी जा रहे हैं, बेतिया जा रहे हैं. थोड़ा भितिहरवा, बड़हरवा लखनसेन का चक्कर भी मार ले रहे हैं. भितिहरवा में गांधी का आश्रम था, स्कूल भी. बड़हरवा लखनसेन में गांधी और उनके लोगों द्वारा शुरू किया गया पहला स्कूल है. भितिहरवा-बड़हरवा के अलावा और भी दूसरी जगहों का चक्कर लगाया जा रहा है. तरह-तरह के आयोजन का रूप-स्वरूप-प्रारूप तैयार हो रहा है चंपारण में. पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधी के सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मनाने के लिए एक विशेष कमेटी बना दी है. कहा गया है कि पटना में कुछ भवनों का नाम सत्याग्रह और गांधी के नाम पर होगा. वगैरह-वगैरह.

मुजफ्फरपुर के मणिका गांव में रहने वाले समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं, ‘गांधी जिन चीजों से परहेज करते थे, वही सब क्यों किया जा रहा है. गांधी बुत बनाने की चीज नहीं. उनके नाम पर प्रतिमाएं और भवन खड़ा करने की जरूरत नहीं. गांधी को विचारों में जिंदा रखने की जरूरत है.’

इसके बाद पटना में प्रसिद्ध गांधीवादी नेता डाॅ. रामजी सिंह से बात होती है. वे कहते हैं, ‘नीतीश ने अभी शराबबंदी की है, यह स्वागतयोग्य कदम है. यह गांधी के ही काम को आगे बढ़ाने का काम है. नीतीश कुमार अगर कुछ करना चाहते हैं तो यही कर दें कि बिहार में गांधी की प्रेरणा से जो 494 बुनियादी विद्यालय खुले थे, लोगों ने अपनी जमीन देकर इन विद्यालयों को खुलवाया था, उन्हें सरकारी साजिश और छत्रछाया से अलग कर बुनियादी विद्यालय के रूप में रहने दें. सामान्य विद्यालय की परिधि से हटा दें. वे 494 स्कूल ही बिहार का कायाकल्प कर देंगे.’

रामजी कहते हैं कि उन्होंने देश में घूम-घूमकर पाठ्यक्रमों का अध्ययन करके बुनियादी विद्यालयों के लिए पाठ्यक्रम तैयार किया था लेकिन कुछ न हो सका. सरकारी अधिकारी कहते हैं कि व्यावहारिक रूप में यह अब नहीं हो सकता है.

बुनियादी स्कूल चंपारण के वृंदावन का यह स्कूल अब अपनी पहचान खो चुका है
बुनियादी स्कूल : चंपारण के वृंदावन का यह स्कूल अब अपनी पहचान खो चुका है

रामजी बाबू कहते हैं, ‘जब देश का पहला गांधी विचार विभाग भागलपुर में खोलने का निर्णय लिया गया और उसकी जिम्मेवारी मुझे सौंपी गई तब भी यही कहा गया था कि भला गांधी विचार भी कोई पढ़ाने की चीज है. लेकिन आज तो देश के कई विश्वविद्यालयों में उसकी पढ़ाई हो रही है. मैंने बुनियादी विद्यालयों के संबंध में बात करने के लिए नीतीश कुमार से कई बार समय मांगा है, वे तो मिलने का समय ही नहीं दे रहे तो क्या उम्मीद करूं. मुख्यमंत्री को कुछ करना ही है तो गांधी के सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर तो समान शिक्षा प्रणाली लागू कर दें. इसके लिए उन्होंने खुद ही कमीशन का गठन किया था. कमीशन की सिफारिशें लागू कर दें, वही एक बड़ा काम होगा.’                                  

कश्मीर में एनएचपीसी के मुनाफे पर रार

फोटो : फैज़ल खान
फोटो : फैज़ल खान
फोटो : फैज़ल खान

बीते 21 अप्रैल को जे ऐंंड के आरटीआई मूवमेंट नाम के एनजीओ ने पिछले 15 साल में जम्मू कश्मीर में एनएचपीसी के पावर प्रोजेक्टों द्वारा हुई कमाई का ब्यौरा जारी किया. एनएचपीसी की कमाई का यह आंकड़ा लगभग 194 अरब रुपये का है, जिसके सामने आने के बाद से ही राज्य में एनएचपीसी को लेकर बहस फिर शुरू हो गई. कई नागरिक और राजनीतिक संगठनों ने इस कमाई को एनएचपीसी द्वारा राज्य के संसाधनों की कथित लूट की पुष्टि मानते हुए एनएचपीसी से राज्य में उसके स्वामित्व के सभी पावर प्रोजेक्ट वापस लेने की बात का समर्थन किया है.

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सभी स्टेकहोल्डर पहले कही हुई बातें ही दोहराते हैं. कश्मीर सेंटर फॉर सोशल एंड डेवलपमेंट स्टडीज की संयोजक हमीदा नईम कहती हैं, ‘एनएचपीसी खुद को समृद्ध बनाने के लिए राज्य के जल संसाधनों का अनुचित दोहन कर रही है और हमें (राज्य को) कुछ नहीं मिल रहा. इसीलिए जम्मू कश्मीर एक गरीब राज्य बना हुआ है जो दिल्ली की खैरात पर जी रहा है.’

बिजली को लेकर राज्य में छिड़ी यह बहस तथ्यों, भ्रांतियों और राजनीति का कॉकटेल बनकर रह गया है. यह मुद्दा रह-रहकर एनएचपीसी और केंद्र सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर लोगों में नाराजगी का कारण बनता है. फिर आरटीआई के बाद सामने आए कमाई के आंकड़े ने एनएचपीसी के खिलाफ शिकायतों में इजाफा ही किया है.

यहां के नामी बिजनेसमैन शकील कलंदर कहते हैं, ‘ये सब राज्य के साथ हो रहे अन्याय को दिखाता है. यहां सवाल एनएचपीसी से पावर प्रोजेक्ट वापस लेने का नहीं बल्कि हमारे जल संसाधनों पर अवैध कब्जे का है.’

‘ये सब राज्य के साथ हो रहे अन्याय को दिखाता है. यहां सवाल एनएचपीसी से पावर प्रोजेक्ट वापस लेने का नहीं बल्कि हमारे जल संसाधनों पर अवैध कब्जे का है’

राज्य में बिजली से जुड़ी इन शिकायतों का अपना इतिहास है जो 1960 में हुई इंडस वाटर ट्रीटी (सिंधु जल समझौता) से जुड़ा है. इस समझौते में पंजाब और कश्मीर, दोनों राज्यों की तीन-तीन नदियों को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा गया था. पाकिस्तान को कश्मीर की सिंधु, चेनाब और झेलम का अधिकार मिला और भारत के हिस्से में पंजाब की ब्यास, रावी और सतलुज नदियां आईं. इस हिसाब से जम्मू कश्मीर केवल रन ऑन रिवर पावर प्रोजेक्ट ही चला सकता है यानी राज्य बिना किसी बांध, जलाशय आदि के निर्माण के सिर्फ बहते पानी के सहारे छोटे स्तर पर ही बिजली उत्पादन कर सकता है. इस संधि ने राज्य के कृषि विकल्पों को भी प्रभावित किया. राज्य में सिंचाई के लिए निर्धारित सीमा से ज्यादा पानी प्रयोग नहीं किया जा सकता. सार यह है कि इस समझौते ने राज्य के अपने बलबूते पर 20 हजार मेगावाॅट बिजली उत्पादन क्षमता के विकल्पों को सीमित किया है. और जहां तक राज्य के हाइड्रो प्रोजेक्ट निर्माण की बात थी, वह फंड की भारी कमी के चलते नहीं बनाए जा सके. फिर केंद्र सरकार ने इन परियोजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया और यहीं से एनएचपीसी राज्य में पहुंचा.

जम्मू कश्मीर ने एनएचपीसी के साथ राज्य में इन योजनाओं के निर्माण का अनुबंध किया. अब तक राज्य में एनएचपीसी ने सात प्रोजेक्ट लगाए हैं- सलाल, ऊरी-1, दुल हस्ती, सेवा-2, ऊरी-2, चतक और निम्मो बाजगो, जिनके बदले जम्मू कश्मीर को रॉयल्टी के रूप में 12 प्रतिशत फ्री बिजली मिलती है (पीक समय में जो महज कुछ सौ मेगावाॅट होती है). बाकी बिजली राज्य बाजार दरों पर एनएचपीसी, उत्तरी ग्रिड और बाकी जगहों से खरीदता है.

इस वित्त वर्ष में अब तक जम्मू कश्मीर सरकार बिजली खरीदने पर 4,600 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. 2014-15 में राज्य ने बिजली खरीद पर 4,701 करोड़ रुपये खर्च किए थे. आधिकारिक आंकड़े के अनुसार पिछले 12 साल में राज्य ने बिजली खरीदने में लगभग 32 हजार करोड़ रुपये खर्च किए हैं. 16वें ऑल इंडिया पावर सर्वे के अनुसार 2020-21 तक जम्मू कश्मीर की बिजली की जरूरत 1,9500 करोड़ यूनिट तक पहुंचने की उम्मीद है. इस पर कश्मीर चेंबर ऑफ कॉमर्स एेंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष मुश्ताक अहमद वानी कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि हमारे बजट का एक बड़ा हिस्सा हमारे ही जल संसाधनों से बनी बिजली खरीदने में जाएगा.’

इकोनॉमिक सर्वे रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार वर्तमान में राज्य की बिजली मांग 1,772.30 करोड़ यूनिट है जबकि राज्य के स्वामित्व वाले बिजली घरों द्वारा केवल 256.20 करोड़ यूनिट बिजली पैदा होती है. यही कारण है कि बिजली और एनएचपीसी राज्य की राजनीति की दुखती रग बन गए हैं. रैम्बोल कंपनी के पूर्व सीनियर डायरेक्टर और गुड़गांव स्थित कंपनी के ग्लोबल इंजीनियरिंग सेंटर के पूर्व प्रमुख इफ्तिखार द्राबू कहते हैं, ‘राज्य में स्वायत्त शासन आने के बाद से पावर प्रोजेक्ट को वापस लाने के मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस हुई है. भले ही आप किसी भी राजनीतिक विचारधारा के हों, ये मुद्दा सभी के लिए जरूरी रहा है.’

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वैसे महबूबा मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार बनाने के गठबंधन के लिए रखी गई शर्तों में सबसे पहले पावर प्रोजेक्ट की वापसी की मांग रखी थी, जिसे केंद्र द्वारा ठुकरा दिया गया. उन्हें कहा गया कि यह मांग वे मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बाद आगे बढ़ा सकती हैं. जम्मू कश्मीर 390 मेगावाॅट वाले दुल हस्ती और 480 मेगावाॅट क्षमता वाले ऊरी-1 प्रोजेक्ट को अपने नियंत्रण में लेने की मांग लंबे समय से कर रहा है. इसकी अनुशंसा रंगराजन कमेटी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कश्मीर पर हुए गोलमेज सम्मेलन द्वारा भी की गई थी. यहां तक कि पीडीपी और भाजपा गठबंधन के एजेंडे में दोनों ‘दुल हस्ती और उरी हाइड्रो पावर प्लांट के हस्तांतरण के साधन ढूंढ़ने’ की बात पर सहमत भी हैं.

हालांकि पिछले साल मार्च में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने बताया कि विभिन्न पैनलों द्वारा प्रस्तावित सिफारिशें भारत सरकार द्वारा स्वीकार नहीं की गईं क्योंकि इन प्रोजेक्टों द्वारा उत्पन्न की जा रही बिजली जम्मू कश्मीर सहित कई राज्यों को आवंटित है. ‘इसके अलावा परियोजनाओं के हस्तांतरण में काफी  वित्तीय, गैर-वित्तीय और कानूनी समस्याओं के आने की भी संभावना है.’ पीडीपी सांसद तारिक हमीद कारा के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने यह कहा था.

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पर इसके साथ राज्य में एक राय यह भी है कि इन ऊर्जा परियोजनाओं के वापस आने से न कोई आर्थिक लाभ होगा न ही कोई खास फर्क पड़ेगा. इफ्तिखार द्राबू जैसे विशेषज्ञ जो जम्मू कश्मीर के वित्त मंत्री हसीद द्राबू के भाई भी हैं, नहीं मानते कि इन परियोजनाओं की वापसी से राज्य को कोई लाभ होगा. एक अखबार में लिखे लेख में द्राबू कहते हैं, ‘इतने बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट को वापस लेने के अपने रिस्क हैं. ये लगभग दो दशक पुराने हैं, लिहाजा इसके काफी रखरखाव की जरूरत पड़ेगी.’  द्राबू ने सरकार को ऊर्जा के लिए थर्मल और हाइड्रो पावर के मेल का उचित प्रयोग न करने और हाइड्रो पावर पर ज्यादा भरोसा करने के बारे में चेताया भी है. वे लिखते हैं, ‘इन परियोजनाओं को वापस लाने के लिए लड़ने का कोई फायदा नहीं है. हो सकता है इन्हें वापस लाने के बाद एहसास हो कि हमने अपने लिए कई दूसरी परेशानियां खड़ी कर ली हैं और फिर हमें ताउम्र इस फैसले पर पछताना पड़े.’    

‘किसानों की तीन लाख आत्महत्याओं पर कभी कोई बात ही नहीं होती’

फोटोः विजय पांडेय
फोटोः विजय पांडेय
फोटोः विजय पांडेय

मुझे लगता है कि सरकार कृषि के बारे में शायद भूल ही गई है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के पहले सरकारें किसानों की बात करती हैं और सत्ता में आने के बाद सिर्फ कॉरपोरेट की बात करती हैं. बहुत उम्मीद थी मुझे कि सरकार किसानों की तरफ ध्यान देगी, क्योंकि पिछले चुनाव में वोट सारे देश से मिला था. आम तौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरों की पार्टी है लेकिन भाजपा को पूरे देश से वोट मिला था, मुझे लगा था कि भाजपा किसानों पर ध्यान देगी. लेकिन कृषि की जो हालत है वह बेहद दयनीय है. शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट का कि उसने फटकार लगाई तो सरकार को इस बात का एहसास हुआ कि सूखा पड़ा हुआ है. इसमें सिर्फ सरकार ही नहीं, मीडिया का भी रवैया वैसा ही है. मीडिया और सरकार दोनों एक जैसे चलते हैं. मीडिया में भी अगर आईपीएल पर कोर्ट का निर्णय नहीं आया होता तो शायद उसका भी ध्यान इस ओर नहीं जाता.

2015 का साल कृषि के लिए पिछले 15-20 सालों में सबसे बेहतर साल था. लेकिन इससे पहले 2014 में किसानों की आत्महत्या का रोजाना का औसत 42 था. 2015 में यह बढ़कर 52 हो गया. मुझे तो कोई ऐसी चीज नजर नहीं आ रही है कि किसानों की जीविका या कमाई में बदलाव आया हो.

पिछली सरकारों की तरह वर्तमान सरकार यह मानकर चलती है कि विकास तभी होगा जब शहरों को सारे संसाधन दे दिए जाएं. जब गांव के विकास की हम बात करते हैं तो सिर्फ बात करने से नहीं होगा. मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है. सरकार इसमें फंसी हुई है कि गांव के लोगों को जब तक हम वहां से बाहर नहीं निकालेंगे तो विकास नहीं होगा. विकास की यह तो सोच है. पिछली सरकार का भी यही सोचना था. दूसरा यह है कि ग्रामोद्योग वगैरह की जो बातें करते हैं तो यह तब तक नहीं होगा जब तक रिवर्स माइग्रेशन न हो. गांव से जो लोग शहर की ओर आ रहे हैं वे शहर से गांव की ओर जाएं, जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मुझे नहीं लगता कि गांवों का विकास होगा.

गांव का उद्योग खेती से जुड़ा हुआ है. 60 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं. जब तक खेती को आप फायदे का काम नहीं बनाएंगे तब तक विकास कैसे होगा? अब ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ एक पुराना स्लोगन हो चुका है. (पीएम बनने के बाद मोदी ने पैदावार बढ़ाने के लिए यह नारा दिया था) ये कंपनियों के स्लोगन हैं. यह मोंसैंटो का स्लोगन है. ये कहते हैं कि नीम कोटेड यूरिया होना चाहिए. अच्छी बात है, होना चाहिए, लेकिन उससे आय तो नहीं बढ़ती. दूसरा नारा है, ‘हर खेत को पानी’, वह तो जिंदगी भर नहीं हो सकेगा. समस्या पानी नहीं है, समस्या आय की है. किसान की आय हमने जान-बूझकर ऐसी रखी है कि उसे तो मरना ही मरना है. वह उत्पादन और पानी रोकने से नहीं हो सकता.

आपको उदाहरण दूं कि अमेरिका में गेहूं, धान, मक्का आदि फसलों का जितना उत्पादन है, उससे ज्यादा उत्पादन पंजाब में है. अमेरिका में 11.4 प्रतिशत एरिया इन फसलों के उत्पादन के लिए उपयोग में आता है, हमारे पंजाब में यह 98 प्रतिशत है. उसके बावजूद किसान आत्महत्या कर रहे हैं. अब तो पंजाब महाराष्ट्र से आगे निकल रहा है. इसका क्या कारण है? कारण यह है कि आपने किसान को आमदनी नहीं दी. पंजाब में खेती से जो किसान की वास्तविक आय है वह एक हेक्टेयर पर तीन हजार रुपये है. चपरासी की जो बेसिक सैलरी है वह 18 हजार रुपये है, जिसे सरकार 21 हजार करने जा रही है. और किसान की आय तीन हजार रुपये है. इसको कोई एड्रेस नहीं करना चाहता. सब अपना माल बेचने में लगे हुए हैं. उत्पादन बढ़ाने की बात करने का मतलब है कि किसी की कंपनी आएगी, नई तकनीक आएगी, नए बीज आएंगे, वह बेचेगा. किसान की आय तो तब बढ़ेगी जब उसको उत्पादन का सही दाम मिले.

एक समय था जब दुनिया भर में लोकतंत्र ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ होता था. अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गई है. अब यह ‘उद्योगों का, उद्योगों द्वारा, उद्योगों के लिए’ हो गया है

खेती को लेकर हमारी जो सोच है वह एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) सेक्टर के प्रति है. वह अगर बढ़ेगा तो हमारी खेती बढ़ रही है. यह पूरी तरह फाइनैंशियल सोच है. मूलत: खेती को बढ़ावा देने की बात नहीं है. वह तो एफएमसीजी सेक्टर को बढ़ाने की बात है. सरकार कहती है कि बारिश अच्छी होगी तो फसल अच्छी होगी, अर्थव्यवस्था ऊपर जाएगी. अब बारिश होगी तो फील गुड फैक्टर तो है ही, लेकिन उससे उन लोगों की सेल बढ़ेगी. उसमें किसान का भविष्य थोड़ा अच्छा हो जाएगा. 

एक समय था जब दुनिया भर में लोकतंत्र ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ होता था. अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गई है. अब यह ‘उद्योगों का, उद्योगों द्वारा, उद्योगों के लिए’ हो गया है. चाहे वह अमेरिका हो, चाहे यूरोप हो या फिर भारत हो, हमारी सरकारें सिर्फ उद्योगों के लिए काम करती हैं. जब तक ये अपना स्वरूप नहीं बदलेंगी, तब तक ‘सबका साथ सबका विकास’ नहीं हो सकता. सवाल है कि किसानों की आत्महत्या क्यों नहीं रुक रही. इसमें दो चीजें हैं. एक तो मीडिया- एक लड़की मर जाती है जेसिका लाल तो टाइम्स आॅफ इंडिया वगैरह दो-दो पेज की कवरेज दे रहे थे. टीवी पर सारा दिन चलता था. टीवी चैनलों ने खुद जाकर कैंडल मार्च कराया था. यहां किसानों की तीन लाख आत्महत्याएं हो चुकी हैं, इस पर कभी कोई बात ही नहीं होती. फालतू का अगस्ता डील पर लगे हैं. सबको मालूम है कि उसमें कुछ नहीं होना है. चैनल रोज बहस करा रहे हैं क्योंकि उनको टाइम पास करना है. अब तो मुझे लगता है कि देश में किसी को कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं है. सबको बोलो कि भारत माता की जय. किसानों को भी चाहिए कि भारत माता की जय बोलें. सरकार का तो संदेश यही है.

राष्ट्रवाद का अभियान तो योजना के तहत चलाया जाता है. ये जानते हैं कि किन समस्याओं पर बात करनी चाहिए लेकिन चाहते नहीं हैं. मेरा मानना है कि आप हम सब जानते हैं कि राजनेता कैसे हैं, लेकिन उससे ज्यादा अर्थशास्त्री और वैज्ञानिकों को दोष दीजिए. नेता मुख्यमंत्री बनता है तो कमेटी बनाता है. कमेटी ही गलत दिशा में ले जाएगी तो क्या करेंगे आप? समस्या अर्थशास्त्रियों की है. उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता, हम नेताओं को दोष देते हैं. उनके बारे में तो हम जानते हैं कि उनका स्तर क्या है. लेकिन मुख्य भूमिका तो ब्यूरोक्रेटों और अर्थशास्त्रियों की है.

किसानों की आत्महत्या को लेकर नेता मजाक उड़ाते हैं. समाज भी मजाक उड़ाता है. हमारी जो शिक्षा व्यवस्था है उसने हमारे दिमाग में यह भर दिया है कि गरीब आदमी देश पर बोझ है. हम यह मानकर चलते हैं कि जो भी हम गरीब आदमी के लिए करते हैं, वह उस पर मेहरबानी कर रहे हैं. यह कोई नहीं बताता कि असली बोझ तो कॉरपोरेट तबका और अमीर तबका है. हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने लिखा है कि ‘इट इज चीप टू बी रिच इन इंडिया’. सारा मध्य वर्ग सरकारी सब्सिडी पर रहता है और दोष देता है गरीब आदमी को. यह एक सोच बना दी गई है. आर्थिक विकास का जो मॉडल है हमारा, उसकी यह सोच है कि आप अमीर हैं तो आप बड़े क्षमतावान हैं. कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने ट्विटर पर लिखा कि ‘जिसने मन की बात सुनकर नहीं काम किया, और वो आत्महत्या करता है तो उसे कर लेना चाहिए.’ अब इसका क्या जवाब है. यह हमारी सोच है कि गरीब हमारे ऊपर बोझ है. हम गरीबी के चक्र से निकल आए तो हम बहुत क्षमतावान हैं.

हम आरक्षण को दोष देते हैं. लेकिन सरकारी कर्मचारी से ज्यादा आरक्षण कौन लेता है. कोई काम नहीं करता और इनको सातवां वेतन आयोग मिल रहा है. यह क्यों मिल रहा है, मुझे समझ में नहीं आता. पंजाब में 365 दिनों में से 200 दिन छुट्टियां हैं. सोचिए ये क्या काम करते होंगे. आरक्षण अन्याय है और यह अन्याय नहीं है? इन्हें सातवां वेतन आयोग किसलिए मिल रहा है? इस पर कोई बोलता नहीं है क्योंकि इससे सब लाभ ले रहे हैं. यह मानसिकता बनाई गई है. आपके मीडिया ने इसे और आगे बढ़ाया. किसान मर रहे हैं तो वह इस व्यवस्था की डिजाइन है. अगर आप उनकी आमदनी नहीं होने देंगे तो वे मरेंगे ही. उन्हें वंचित रखा जाता है और सरकारी कर्मचारी को सातवां वेतन आयोग दिया जाता है.

(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

‘अगर लिंग परीक्षण पर सजा का प्रावधान है तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं?’

सभी फोटो : विजय पांडेय
सभी फोटो : विजय पांडेय
सभी फोटो : विजय पांडेय

आपका  ‘थर्ड जेंडर’  यानी किन्नरों की जिंदगी पर आधारित  उपन्यास  ‘नालासोपारा पो. बॉक्स नं. 203’  हाल ही में प्रकाशित हुआ है. किन्नरों की जिंदगी पर उपन्यास लिखने का विचार कहां से आया? इस उपन्यास में खास क्या है?

इस उपन्यास में मैंने आजाद भारत में किन्नरों की स्थिति पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है. आजादी के पहले और बाद हमने अपनी तमाम रूढ़ियों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, दलितों और अस्पृश्यों से भेदभाव आदि को तोड़ा है लेकिन किन्नरों की जिंदगी में कोई भी परिवर्तन नहीं आया. अब हाल ही में हमारे राजनेताओं ने उन्हें अलग श्रेणी देने की कवायद शुरू की है जबकि समाज में उनकी स्थिति आज भी अछूतों से बदतर है. समाज ने उनकी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान नहीं दिया. उन्हें किसी तीज-त्योहार में शामिल नहीं किया जाता है. इसके चलते आज भी हालत यह है कि अगर मेट्रो में एक किन्नर चढ़ जाए तो सब उसे अजीब निगाहों से देखते हैं. सड़क पर भीख मांगते हुए मिल जाए तो हिकारत की नजर से देखकर जल्दी से पैसा-वैसा देकर चलता करते हैं. जब मैं मुंबई के नालासोपारा में रहती थी तब मेरा साबका एक ऐसे युवक से हुआ जिसे किन्नर होने की वजह से जबरिया घर से निकाल दिया गया था. यह उपन्यास उसी युवक के विद्रोह की कहानी है. यह युवक अपने परिवार खासकर अपनी मां से सवाल करता है कि लंगड़ा, लूला, बहरा, मानसिक रूप से विकलांग बच्चे को तो आप घर से बाहर नहीं निकाल देतीं लेकिन अगर मैं लिंग से विकलांग पैदा हुआ, जिसमें मेरा कोई दोष भी नहीं है, तो मुझे घर से बाहर क्यों निकाल दिया गया.

किन्नरों की इस स्थिति के लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं? इसका क्या हल हो सकता है?

इस उपन्यास में यह किन्नर अपनी मां का पता लगाकर उनके साथ पत्र व्यवहार करता है. मां चुपके से इस बच्चे को खत भी लिखती है लेकिन वह चाहती है इसके बारे में किसी को पता नहीं चले क्योंकि इससे उनके परिवार की बदनामी होगी, बाकी बच्चों की शादियों में अड़चन आएगी. उपन्यास का नाम उसी पत्र व्यवहार के पते के ऊपर रखा गया है. बाद में वह राजनीति का भी शिकार होता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों के लिए आरक्षण दिए जाने की बात कही है लेकिन उपन्यास का यह नायक कहता है कि हमें आरक्षण की जरूरत नहीं है. मुझे लगता है इसके लिए मां-बाप को ही कटघरे में लेने की जरूरत है. उन्हें समझाया जाए कि वे अपनी ऐसी औलाद को घूरे में न फेंकें. दूसरों को न सौंप दें. उनका सही तरीके से लालन-पालन करें. सरकार को चाहिए कि वह किन्नरों के लिए आरक्षण के बजाय मां-बाप को दंडित करने का प्रावधान करे. अगर भ्रूण के लिंग परीक्षण करने पर आप सजा का प्रावधान कर सकते हैं तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं या फिर किन्नरों को दे देते हैं?

पिछले दिनों सिंहस्थ में किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को महामंडलेश्वर की पदवी मिली है. इसे किस तरह देखती हैं?

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की बात अलग है. वे सभी काम चौंकाने वाले ही करती हैं. उनका सब कुछ फिल्मी होता है. सोचने वाली बात है कि जिस धर्म ने आपको कूड़े की तरह फेंक दिया आप अब उसी के जाल में फंसने चली गई हैं. आप ही सोचिए, लिंग पूजक धर्म में लिंग विहीन का क्या काम है? आज जिस तरह से ये (किन्नर) शोषित होते हैं उसके लिए धर्म ही जिम्मेदार है. धर्म ने उन्हें मंदिर जाने का अधिकार नहीं दिया, उन्हें पूजा करने का अधिकार नहीं दिया. हमारे समाज ने उनके साथ ठीक ढंग से व्यवहार नहीं किया. धर्म ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि किन्नर समाज से अलग होकर रहें लेकिन जब आपके यहां बच्चा हो तो वे आशीर्वाद देने आएं कि आपके यहां ऐसा न हो. अरे! जो खुद इतने बुरे हालात में जिंदा है वह दूसरों को क्या आशीर्वाद देगा.

यौनिकता का अधिकार मांगना एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता को ही बढ़ावा देने वाली बात है. समाज को यह समझना होगा कि स्त्री सिर्फ एक देह नहीं है. यौन स्वतंत्रता का विचार पश्चिम से आया है लेकिन आप देखिए क्या वहां वेश्यालय कम हैं? क्या वहां लड़कियों को सिर्फ देह समझे जाने के कारण आजादी मिल गई है? क्या उन्हें इसके चलते इज्जत मिलनी शुरू हो गई? ऐसा नहीं हुआ है

आजकल स्त्री विमर्श में यौन स्वतंत्रता की बात कही जा रही है. स्त्री की इस स्वतंत्रता से आप उसे कितना मजबूत पाती हैं?

औरत के धड़ के निचले हिस्से पर ही बात क्यों होती है? स्त्री के धड़ के ऊपर एक मस्तिष्क भी होता है. आप जब उसे बराबरी का हिस्सा देंगे, उसकी बुद्धिमत्ता को मानेंगे तब स्त्री सही रूप में स्वतंत्र होगी. यौनिकता का अधिकार मांगना एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता को ही बढ़ावा देने वाली बात है. आपको यौन स्वतंत्रता देकर पुरुष ही उसका फायदा उठा रहा है. आज अगर लड़की से कोई गलती हो जाती है तो पुरुष उसके लिए जिम्मेदार नहीं होता है. भले ही यौन स्वतंत्रता का फायदा उठाकर आप पुरुषों से बहुत सारे काम करवा लें लेकिन यह आपकी मजबूती नहीं है. समाज को यह समझना होगा कि स्त्री सिर्फ एक देह नहीं है. यौन स्वतंत्रता का विचार पश्चिम से आया है लेकिन आप देखिए क्या वहां वेश्यालय कम हैं? क्या वहां लड़कियों को सिर्फ देह समझे जाने के कारण आजादी मिल गई है? क्या उन्हें इसके चलते इज्जत मिलनी शुरू हो गई? ऐसा नहीं हुआ है.

भारत में स्त्री विमर्श पिछले कई दशकों से चल रहा है. अब 2016 में क्या ऐसे विमर्श की जरूरत है?

मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श बहुत हो गया. खासकर, कुछ संपादकों ने  इसे जिस हाल में पहुंचा दिया वह बहुत ही बुरा है. उन्होंने इसे यौन फॉर्मूला बना दिया है जबकि जरूरत है कि समाज में स्त्री की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की, उसे शिक्षित करने की, उसे कानूनी तौर पर अधिकार दिलाने की. पिछले कई दशकों का स्त्री विमर्श जिस मोड़ पर पहुंच चुका है वह हमें नहीं चाहिए था.

अगर हम कहें कि पुरुष नहीं चाहिए, लेस्बियन समाज चाहिए तो कहां तक जायज होगा? स्त्री के स्वावलंबन का मतलब पुरुष से लड़ाई थोड़े ही है. यह उनके लिए भी खतरनाक है. अब समाज में बदलाव आया है. अब पिता सिर्फ अपने बेटों को पढ़ाने के लिए लोन नहीं ले रहा बल्कि वह बेटियों के लिए भी यह कर रहा है. हालांकि अभी इसका प्रतिशत कम है. अगर पुरुष-महिला दोनों काम कर रहे हैं तो पुरुष किचन के कामों में स्त्री की मदद भी कर रहा है.

अब अंतरजातीय प्रेम विवाह को लेकर स्वीकृति बढ़ी है. आज अगर लड़की पढ़ी-लिखी है और किसी को पसंद करती है तो मां-बाप उसकी बात सुनते हैं. हमारे समय में अगर आपको ऐसा कुछ करना होता, तो कहा जाता कि घर के सामने कुआं है, बेहतर है आप उसमें कूद जाएं. पर अब बदलाव हो रहा है. नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने समाज की रूढ़ियों को तोड़ा है. यह बहुत सकारात्मक है

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आपने कई जगह जिक्र किया है कि स्त्री विमर्श को गलत दिशा देने में साहित्यिक पत्रिकाओं के कुछ संपादकों का हाथ रहा है.

मुझे आंदोलनों पर बहुत भरोसा है. मुझे लगता है कि इसके जरिए बदलाव लाया जा सकता है. स्त्री विमर्श का आंदोलन भी ऐसे आया. लेकिन जब यह कुछ खास लोगों की बपौती बन जाता है, निरंकुशता का शिकार हो जाता है तो लोग इसका इस्तेमाल अपने तरीके से करने लगते हैं. राजेंद्र यादव जैसे संपादकों ने स्त्री विमर्श के साथ यही किया. स्त्री को केवल यौन स्वतंत्रता नहीं चाहिए थी और यौन स्वातंत्र्य से ही स्त्री स्वतंत्र नहीं हो सकती. स्त्री ने आज जो भी जगह हासिल की है वह अपने ज्ञान, अपनी पढ़ाई-लिखाई और बुद्धिमत्ता से हासिल की है.

आपने लगभग 40 साल पहले काफी विरोध का सामना करते हुए अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था, तब से अब तक ऐसे विवाहों की स्थिति में कितना बदलाव देखती हैं?

मुझे लगता है कि अब अंतरजातीय प्रेम विवाह को लेकर स्वीकृति बढ़ी है. आज अगर लड़की पढ़ी-लिखी है और किसी को पसंद करती है तो मां-बाप उसकी बात सुनते हैं. लड़का उन्हें ठीक लगता है तो उनकी शादी भी आराम से हो जाती है चाहे वह किसी भी जाति का हो. हमारे समय में अगर आपको ऐसा कुछ करना होता, तो कहा जाता कि घर के सामने कुआं है, बेहतर है आप उसमें कूद जाएं. पर अब बदलाव हो रहा है. नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने समाज की रूढ़ियों को तोड़ा है. यह बहुत सकारात्मक है और यह सिर्फ शहरों में नहीं हुआ है बल्कि गांवों में भी हुआ है. आप यहां कह सकते हैं कि यह सिर्फ पचास फीसदी है, लेकिन यह कहते वक्त आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि यह सदियों पुरानी रूढ़ि है. उसको तोड़ा जा रहा है, यह जरूरी है. परिवार का स्वरूप भी बदल रहा है. अब सासें अपनी बहुओं के साथ उस तरह का व्यवहार नहीं करती हैं जैसे पिछली पीढ़ी की महिलाएं किया करती थीं.

वर्तमान सरकार आने के बाद से कहा जा रहा है कि असहिष्णुता और कट्टरता बढ़ी है. आप इस सरकार के कामकाज को कैसे देखती हैं?

आज देश में लोकतांत्रिक सरकार है. इसका मतलब यह हुआ कि हमारी चुनी हुई सरकार का शासन है. मेरा मानना है कि देश में किसी भी पार्टी की सरकार हो, अगर वह जनता के लिए काम करे तो वह बेहतर होगी. ऐसे में अगर एनडीए अपने किए हुए वादों को पूरा करती है या पूरा करने का प्रयास करती है तो ठीक है लेकिन यदि वह यह भी नहीं करती है तो वही बात हुई कि आसमान से गिरे और खजूर पर अटके. हां, वोट बैंक के लिए हिंदू-मुसलमान की जो खाई बनाई गई है वह बहुत खतरनाक है. आज हिंदू मुसलमान से डर रहा है तो मुसलमान हिंदुओं से भयभीत हैं और यह एक दिन की बात नहीं है. दरअसल पिछले कुछ समय में हमें ऐसा परिवेश दिया गया है. अब हिंदुओं और मुसलमानों को यह समझना होगा कि यह धरती किसी एक की बपौती नहीं है बल्कि दोनों को साथ रहकर मेलजोल बढ़ाना होगा. अगर भाजपा इस खाई को बढ़ा रही है तो बहुत बुरा है. जनता ने आपको देश का विकास करने के लिए चुना है. पर आप पुराने गौरव को वापस लाने की बात करते हैं. अरे! हमें हमारी बुनियादी सुविधाएं दो. हमें धर्म नहीं रोटी की जरूरत है. कोई भी मंदिर-मस्जिद हमें रोटी नहीं देगा. भगवान सिर्फ मानने वाले के लिए संबल का काम करते हैं.

पिछले साल इस सरकार के आने से बढ़ी असहिष्णुता का जिक्र करते हुए बहुत-से लेखकों ने उन्हें मिले पुरस्कार वापस किए. इस पर आपका क्या नजरिया है?

मैं अवॉर्ड वापस करने वाले लेखकों से सहमत नहीं हूं. मुझे लगता है कि उन लोगों ने कलम की ताकत को कम करके आंका है. लेखकों को सम्मान सरकार नहीं बल्कि जनता द्वारा दिया जाता है. यह सम्मान लेखकों को जनता द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से मिलता है. यह एक गलत प्रक्रिया थी. अगर विरोध करना था तो सम्मान सरकार को वापस करने के बजाय साहित्य अकादमी के सामने खड़े होकर वापस करना था कि यह पैसा जनता का है और इसकी जरूरत हमें नहीं है, इसे गरीब इलाकों में खर्च कर दिया जाए.

अब तक देश के कई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं थी. अब एक संगठन भूमाता ब्रिगेड के नेतृत्व में महिलाएं इन मंदिरों में प्रवेश कर रही हैं. इसे कैसे देखती हैं?

मैं इस मामले में भूमाता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई के साथ हूं. यह कई साल पहले हो जाना चाहिए था. धर्म ने जो अफीम महिलाओं को पिलाई है उसका नशा टूटना जरूरी है. हर जगह कायम पुरुषवादी वर्चस्व का टूटना जरूरी है. अगर भगवान के नाम पर बने प्रतीक लोगों को ताकत देते हैं तो उन पर सबका बराबर अधिकार होना चाहिए.

साहित्य का अर्थ व्यापक है, सा+हित यानी जिससे सभी का हित हो. मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट पर रचा हुआ कुछ इस पैमाने पर खरा उतरता हो. लिखने का अधिकार सबको है. जो कहानियां-कविताएं लिखते हैं, तुकबंदी करते हैं, सब साहित्यकार हैं. पर मेरे अनुसार गंभीर साहित्य इससे थोड़ा अलग है पर सभी तरह का साहित्य रचा जाना चाहिए. आसान साहित्य एक बेस तैयार करता है

इधर साहित्य में एक नए तरह का प्रयोग हुआ है. लघु प्रेम कथाएं आई हैं, जिन्हें लप्रेक कहा जा रहा है.

मैंने अब तक लप्रेक तो नहीं पढ़ा है पर साहित्यिक पत्रिकाओं में उसकी समीक्षा पढ़ी है. मुझे लगता है कि जो बातें मेरे दिल को छू नहीं पातीं, दिमाग उसे लंबे समय तक याद नहीं रखता. साहित्य का अर्थ व्यापक है. सा+हित यानी जिससे सभी का हित हो. मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट पर रचा हुआ कुछ इस पैमाने पर खरा उतरता हो. इंटरनेट पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर मेरे ख्याल से वह बेहतर साहित्य नहीं हो सकता. मुझे लगता है साहित्य शाश्वत है. लिखने का अधिकार सबको है. जो कहानियां लिखते हैं, तुकबंदी करते हैं, कविताएं लिखते हैं, सब साहित्यकार हैं. पर मेरे अनुसार गंभीर साहित्य इससे थोड़ा अलग है. यह एक प्रक्रिया है. सभी तरह का साहित्य रचा जाना चाहिए.

सबको पढ़ने का अधिकार है. जरूरी नहीं कि सभी को ‘शेखर- एक जीवनी’ या ‘नदी के द्वीप’ समझ में आए, तो ऐसे में वह आसान साहित्य पढ़कर अपनी समझ बढ़ाकर फिर उसे पढ़े. ऐसा साहित्य एक बेस तैयार करता है.

नई पीढ़ी के लेखकों में आपको कौन-कौन पसंद है. साहित्य की इस पीढ़ी से आपको कितनी उम्मीदें हैं?

अखिलेश, अल्पना मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार सिंह, संजय कुंदन, चंदन पांडेय, मनोज पांडेय आदि बेहतर लिख रहे हैं. खासकर आजकल  लड़कियां बहुत अच्छा लिख रही हैं. उनके द्वारा किया जा रहा विमर्श भी बेहतर है. नए लेखक ऐसे-ऐसे पक्षों को लेकर सामने आ रहे हैं जो अकल्पनीय हैं. नए लोगों की चीजों को देखने की दृष्टि अलग है.

आप उन्नाव को केंद्र में रखकर एक उपन्यास पर भी काम कर रही हैं. क्या होगा इस उपन्यास में?

हां, अब मैं अपने अगले उपन्यास की तैयारी कर रही हूं. यह शायद मेरा आखिरी उपन्यास होगा. इसमें मैं अपनी जन्मभूमि उन्नाव को केंद्र में रख रही हूं. यह वैश्य ठाकुरों के इतिहास पर केंद्रित होगा. ये कहां से आए,  स्वतंत्रता संग्राम में इनकी क्या भूमिका रही, इनकी स्त्रियों की हालत कैसी रही. अभी हालांकि इसमें काफी वक्त लगेगा.

आपके प्रिय लेखक?

प्रेमचंद, गोर्की, हेमिंग्वे, अमृतलाल नागर, कृष्णा सोबती, कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा…(हंसते हुए), यह सूची बहुत लंबी है.

आग का ‘झरिया’

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घनुडीह के इस इलाके को कभी झरिया का का हृदयस्थल भी कहा जाता था. अब वह लगभग खत्म हो चुका है, वहां बसने वाली बड़ी आबादी अपनी जड़ों से उखड़ चुकी है या कहें उन्हें उखाड़ा जा चुका है. सब लोग कहीं और बस गए या बसाए जा चुके हैं

धधकते अंगारों पर चलने की कला सदियों से दुनिया को आश्चर्यचकित और रोमांचित करती रही है. झारखंड के अनेक हिस्सों में यह कला आज भी जीवित है और लोगों की मान्यता है कि इसे वे लोग ही कर सकते हैं जिन्हें अलौकिक शक्ति प्राप्त है. झरिया कोयलांचल के लाखों लोग पिछले कई वर्षों से कोयले के धधकते अंगारों पर न सिर्फ चल रहे हैं, बल्कि रह रहे हैं. हमें नहीं मालूम उन्हें कोई अलौकिक शक्ति प्राप्त है या नहीं, पर यह जरूर पता है कि आग में जीवित लोगों को झोंकने वाली शक्तियां कौन हैं.

धनबाद से झरिया की यात्रा के दौरान एक मित्र साथ थे. वे बता रहे थे कि धनबाद की जाे रौनक आज है वह झरिया की देन है. झरिया न होता तो धनबाद कभी आबाद नहीं होता. उन्होंने दुख जताया कि आज के झरिया में धनबाद के जैसे तरह-तरह के उत्सव-आयोजन नहीं होते. यह शहर अगलगी के शताब्दी वर्ष में पहुंचकर बिना किसी आयोजन के घुटन और खामोशी के साथ मातमी महोत्सव मना रहा है.

झरिया की खदानों में 1916 में अाग लगी थी, अब साल 2016 है. इस बातचीत के दौरान हम झरिया शहर पार कर सुनसान इलाके में प्रवेश करके चुके होते हैं. रात के तकरीबन 11 बज रहे थे और चारों ओर सन्नाटा था. हम घनुडीह इलाके में थे. गाड़ी से बाहर निकलते ही सनसनाती हुई तेज हवा से सामना हुआ. कुछ ही देर में हम आग की तेज लपट के पास थे. लपटों से निकल रही आवाज हवा के साथ मिलकर उस सन्नाटे को तोड़ रही थी. वहां रुके कुछ ही देर हुई थी कि पुलिस की एक गाड़ी आकर रुकती है. तेज आवाज में पुलिसवाले पूछते हैं- कौन! हम लोग बताते हैं- कुछ नहीं बस फायर एरिया देखने आए थे. दरोगा ठेठ भाषा में कहते हैं, ‘ओहो! अगलगी देख रहे हैं! देखिए, बहुत लोग आता है देखने, रोजे-रोज चाहे हर कुछ दिन पर लेकिन जादा देर मत रुकिए, घुटन होगा.’ 

पास ही कुछ घर भी नजर आते हैं. किसी घर में ताला नहीं लगा होता. हम आवाज लगाते हैं लेकिन कोई आवाज नहीं आती. घरों में बल्ब की तेज रोशनी होती है और बिछौने भी रखे हुए होते हैं. मेरे मित्र टोकते हैं, ‘चलिए, कोई नहीं मिलेगा यहां. ये सिर्फ आरामखाना है. अभी सब लोग धंधे पर गए होंगे.’ आधी रात में ‘कौन-सा धंधा’ के सवाल पर वे कहते हैं, ‘इहां अउर का धंधा है. दिन-दुपहरिया हो चाहे अधरतिया, तेज जाड़ा हो चाहे गरमी, चाहे झमाझम बरसात, साल भर, चौबीसों घंटा इहां एक ही धंधा होता है कोयले का. कोयला ही यहां के लिए सब है. ओढ़ना-बिछौना, जीवन-मरण सब.’

उस फायर एरिया से आगे निकल ओपन माइंस एरिया में जाने की हमारी कोशिश सफल नहीं हो पाती. ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर तेज गति से आते-जाते बड़े-बड़े ट्रक छोटी गाड़ियों को आने-जाने के लिए जगह ही नहीं छोड़ रहे थे. दूर से ही दिखाई पड़ रहा था कि कैसे खदानों से निकाले गए सुलगते कोयले को ट्रकों पर लादा जा रहा था. यह दृश्य रोंगटे खड़ा कर देने वाला था. बताया जाता है कि आग से यहां कोई मतलब नहीं. हर हाल में बस कोयला चाहिए. खदानों में लगी आग को यहां सिर्फ अभिशाप नहीं समझा जाता. यह कइयों के लिए वरदान भी साबित हुई है. इसके बाद हम वहां से लौट आते हैं. देश की सबसे बड़ी भूमिगत आग का वह दृश्य लगातार आंखों के सामने तैरता रहता है. खासकर जलते हुए कोयले को उठाकर ट्रकों पर डालने वाला दृश्य.

2002 में झरिया आए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने आकर कहा था कि खदानों में लगी आग को अब भी फैलने से रोका जा सकता है, बस कोशिशें तेज हों

घनुडीह का यह इलाका झरिया का वह इलाका है जिसे हृदयस्थली भी कहते थे. अब वह लगभग खत्म हो चुका है, वहां बसने वाली बड़ी आबादी अपनी जड़ों से उखड़ चुकी है या कहें उन्हें उखाड़ा जा चुका है. सब कहीं और बस गए या बसाए जा चुके हैं. जो आग के पास रह रहे हैं, यह उनकी जिद ही है. यह जिद बेजा नहीं है. वे जानते हैं कि जब तक उनका घर आग में घिर न जाए, तब तक वे अपनी जगह नहीं छोड़ सकते क्योंकि अपनी जगह को पूरी तरह से छोड़ देने का मतलब है, दो वक्त की रोटी पर भी आफत.

घनुडीह जैसी 11 बस्तियां अब तक इस आग की भेंट चढ़ चुकी हैं. शहर के मानचित्र से सदा-सदा के लिए गायब. दस जगहों पर जिंदगी अभी मुश्किल के दौर में है. 4.18 लाख लोग इस आग का दंश झेल रहे हैं. बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह साल में झरिया के आसपास के करीब 1400 परिवारों को विस्थापित होना पड़ा है. आग से विस्थापित हुए लोगों को दूसरी जगह बसाने के लिए 314 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं और झरिया कोल फील्ड की आग बुझाने पर अब तक 2,311 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि हर रोज फायर एरिया से आठ से दस हजार टन कोयले का खनन और उठाव हो रहा है. घनुडीह इलाके में अभी वीरानगी है लेकिन झरिया के ही इडली पट्टी,  कुकुरतोपा,  भगतडीह,  एलयूजी पीट,  बागडिगी,  लालटेनगंज जैसे इलाके नक्शे से गायब हो चुके हैं.

अगले दिन सुबह-सुबह हम बेलगढ़िया के लिए निकल पड़ते हैं. बेलगढ़िया जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना के तहत बसाई गई पहली कॉलोनी है. झरिया से विस्थापित हुए लोगों को यहीं बसाया गया है. बेलगढ़िया, धनबाद से कोई 12-15 किलोमीटर दूर है. झरिया से भी यह दूरी लगभग बराबर है. सुबह पहली मुलाकात मोहन भुइयां से होती है. यहां बसाए गए लोग यहां मिली मूलभूत सुविधाओं से संतुष्ट नहीं नजर आते. वे यहां बसाए जाने का विरोध भी करते हैं. यहां कुल 1,360 परिवार बसाए गए हैं.

मोहन हमें अपने घर ले जाते हैं. वे कहते हैं, ‘देख लीजिए नौ बाई दस का एक कमरा रहने के लिए और 10 बाई छह का यह बरामदा. इसी में पूरी दुनिया सिमट गई है. कहां पति-पत्नी रहें, कहां अपने मां-बाप को कोई रखे और कहां अपने जवान होते बच्चे को. आप बस कमरों को देखकर ही समझ जाइएगा कि हर परिवार का परिवारशास्त्र कैसे गड़बड़ाया हुआ होगा और हर घर में कलह का माहौल रहता है.’ मोहन के घर के पास ही रहने वाले मोहम्मद जफर अली कहते हैं,  ‘दावा किया जा रहा है कि यहां झरियावालों को बसाया जा रहा है. दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना चलाई जा रही है. जाकर पूछिएगा साहब लोगों से कि यहां बसा दिए गए लोगों को क्या अमरत्व मिला हुआ है. क्या वे मरेंगे नहीं और अगर मरेंगे तो चाहे हिंदू हो या मुसलमान उनका अंतिम संस्कार कहां किया जाएगा?’ जफर नाराजगी जताते हुए कहते हैं, ‘अभी कुछ दिन पहले ही यहां तनाव का माहौल था. एक मुस्लिम की मौत हो गई थी. उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपना इलाज करा सकें. चंदे के पैसे से किसी तरह इलाज की कोशिश हुई लेकिन बचाए नहीं जा सके. तनाव इसलिए था क्योंकि यहां हिंदू मरे या मुसलमान, उसके अंतिम संस्कार के लिए कम से कम 25 किलोमीटर दूर जाना होता है. दूसरे गांववाले अपने कब्रिस्तान में या श्मशान का प्रयोग करने नहीं देते हैं. 25 किलोमीटर की यात्रा पैदल नहीं की जा सकती. शव ले जाने के लिए 1,600 रुपये किराया देना होता है. अधिकांश परिवारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वे किसी के मर जाने के बाद 1,600 रुपये किराया देकर अंतिम संस्कार कर सकें.’

जफर के साथ मिले बिजेंदर कहते हैं, ‘हमारे यहां कोई अस्पताल नहीं. बस एक पीएचसी है जो बंद ही रहता है. अगर स्कूल-अस्पताल खुल भी गए तो क्या, हम यहां रहकर करेंगे क्या, यह एक बड़ा सवाल है. हमारे यहां से झरिया जाइए या धनबाद, आने-जाने में 40 रुपये का खर्च है. रोजमर्रा की मजदूरी का काम भी उन्हीं शहरों में मिलना है. यहां से रोज लोग जाते हैं मजदूरी की तलाश में वहां जाते हैं. जिन्हें काम मिल गया, वे तो ठीक, जिन्हें नहीं मिला, उन पर क्या गुजरती होगी, सोच लीजिए. एक तो घर में एक पैसा नहीं होता, ऊपर से मजदूरी के लिए अपना पैसा लगाकर जाना और फिर वहां से भी खाली हाथ लौट आना, कितना पीड़ादायी होता होगा. हम यहां नरक की जिंदगी गुजार रहे हैं.’ मोहन भुइयां, जफर अली, बिजेंदर जैसे कई लोग मिलते हैं. सब अपनी पीड़ा और परेशानी बताते हैं. वे बताते हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. गांव छोड़कर बाप-दादा झरिया आकर बस गए थे. अब झरिया से हटा दिया गया. गांव में कोई पूछता नहीं. बाल-बच्चों के साथ यहीं हैं. शादी-ब्याह पर भी आफत है.

‘इहां अउर का धंधा है. दिन-दुपहरिया हो चाहे अधरतिया, साल भर, चौबीसों घंटा इहां एक ही धंधा होता है कोयले का. कोयला ही यहां के लिए सब है’

ये लोग खुद को आवंटित घर दिखाते हैं कि कैसे उन्हें जो घर मिले हैं, उनके टाॅयलेट को उन्होंने एक छोटा रूम बना दिया है ताकि परिवार का कोई एक सदस्य उसमें सो सके. टाॅयलेट के लिए तो फिर भी वैकल्पिक इंतजाम हो सकते हैं. बेलगढ़िया से लौटते समय बड़ा सवाल यही होता है कि जब इतने ही लोगों को अच्छे से नहीं बसाया जा सका तो दुनिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना सफल कैसे होगी.

बेलगढ़िया में इस तरह आनन-फानन में लोगों को बसाए जाने की भी अपनी कहानी है. झरिया में आग का खेल सौ वर्षों से जारी है. इस पर गंभीरता से पहली बार बात 1997 में शुरू हो सकी थी. वह भी स्वेच्छा से नहीं बल्कि तत्कालीन सांसद हराधन राय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर करने के बाद. उसी पीआईएल की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झरिया की आग को ‘राष्ट्रीय त्रासदी’ घोषित किया और आदेश दिया गया कि लोगों को बसाने के लिए योजना बने और कोर्ट को प्रगति रिपोर्ट भी दी जाए. उस आदेश के बाद ही योजना बन सकी. नतीजा, आनन-फानन में कोरम पूरा करने के लिए बेलगढ़िया बनाया और बसाया जा सका.

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1916 में पहली बार भौरा की एक कोयला खदान में आग लगी थी. झरिया में दुनिया का बेहतरीन कोयला है. पिछले सौ सालों में तीन करोड़ 17 लाख टन जलकर राख हो जाने के बावजूद एक अरब 86 करोड़ टन बचा हुआ है

सरकार ने आग और भू-धंसान वाले इलाके के लोगों को बसाने के लिए 2004 में झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकार (जेआरडीए) का गठन किया. यह जरेडा के नाम से जाना जाता है. जरेडा ने पुनर्वास के लिए 7,112 करोड़ रुपये का मास्टर प्लान तैयार किया है. इसे दो फेज में 2021 तक पूरा किया जाना है. साथ ही आग बुझाने के लिए 23.11 करोड़ रुपये का प्लान अलग से है. जरेडा का सर्वे ही बताता है कि कुल 85 हजार परिवार यानी करीब 4.18 लाख लोग अाग और भू-धंसान वाले इलाके में हैं. इतने लोगों को बसाने का लक्ष्य है, उनमें से अब तक सिर्फ 1360 लोगों को बेलगढ़िया में बसाया जा सका है. बेलगढ़िया से लौटते समय लगता है कि क्या 83,640 परिवारों को भी इसी तरह और ढेर सारे बेलगढ़िया बनाकर बसा दिए जाने की योजना है सरकार की! और फिर सोचकर सिहरन होती है कि 1,360 परिवारों से बसा बेलगढ़िया इस नारकीय स्थिति में है तो फिर जब पूरे के पूरे लोग कई बेलगढ़िया में बसा दिए जाएंगे तो वह पूरा इलाका कैसा होगा. बड़ा सवाल यह भी है कि झरिया काे उजाड़कर क्या और कई बेलगढ़िया बसा पाना संभव हो पाएगा या फिर पुनर्वास की बात तब तक कही जाती रहेगी जब तक खदानों से कोयला निकाल लिए जाने का मामला है. जवाब पेंच दर पेंच फंसता है.

बीसीसीएल के एक अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘सब खेल है. पुनर्वास इतना आसान नहीं. अपनी जमीन पर जो बसे हैं और जो आग वाले इलाके में हैं, वैसे परिवारों की संख्या 29,444 है. बीसीसीएल की जमीन पर जो लोग बसे हैं और आग वाले इलाके में हैं, वैसे परिवारों की संख्या 23,847 है. इस तरह पुनर्वास के लिए कुल 2,730 एकड़ जमीन चाहिए, जबकि बीसीसीएल मात्र 849.68 एकड़ जमीन ही दे सकी है. जरेडा ने भी अब तक सिर्फ 120.82 एकड़ जमीन ही अधिगृहीत की है, यानी अगर बेलगढ़िया की तरह ही जिंदगी और लाखों लोगों को देनी है तो वह सपने जैसा ही है.’

पुनर्वास के बाद का दूसरा सवाल ये उठता है कि क्या आग से शहर को बचा लेना एकदम असंभव-सा था. यह सवाल इसलिए भी था कि अधिकांश लोग ऐसा मानते हैं कि इस आग का फैलाव रोकना संभव था, अगर इच्छाशक्ति होती. भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 2002 में झरिया आकर कहा था कि अभी बात बन सकती है, बस कोशिशें तेज हों और सही दिशा में प्रयास हो. लेकिन कलाम की बात भी और पुरानी तमाम बातों की तरह बात बनकर ही रह गई.

‘यह जो उजड़ता हुआ शहर देख रहे हैं, जिसे झरिया कहते हैं, इसी के कारण धनबाद जैसा शहर बस सका. इस शहर ने देश भर के लोगों को रोजगार दिया’

झरिया लौटने पर रहनिहार नवल ओझा से मुलाकात होती है. वे बताते हैं, ‘हम और हमारे लोग पिछले 100 साल से ये आग और लोगों को अपनी जमीन से उखड़कर भटकते हुए देख रहे हैं. यह जो उजड़ता हुआ शहर देख रहे हैं, जिसे झरिया कहते हैं, इसी के कारण धनबाद जैसा शहर बस सका जिसे लघु भारत भी कहते हैं. इस शहर ने देश भर के लोगों को रोजगार दिया. यह कभी रंगीन शहर था. बिहार का पहला सिनेमा हाॅल यहां खुला. इस शहर पर कई लोकगीत रचे गए.’ नवल आगे बताते हैं, ‘1916 में पहली बार भौरा की एक कोयला खदान में आग लगी थी. इसके बाद एक-एक कर नए इलाकों में आग फैलती चली गई. अब 70 जगहों पर आग ही आग नजर आती है. भौरा के बाद 1941 में जोगता में, 1951 में ईस्ट कतरास में, 1952 में नदखुरकी मंें, 1956 में राजापुर में, 1957 में वेस्ट मोदीडीह में, 1965 में जोगीडीह एवं कोयरीडीह में आग लगी.’ वे आगे कहते हैं, ‘जिस वक्त पहली बार आग का पता चला, उस समय तक निजी कंपनियों द्वारा कोयला खनन का चलन था. निजी कंपनियां किसी तरह कोयला चाहती थीं, उन्हें इससे मतलब नहीं था कि कोयला निकाल लेने के बाद इलाका भी बचे तो उसके लिए क्या हो. 1971 में तब आस जगी जब कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण हुआ. तब लगा कि अब शायद सरकारी तंत्र इस पर ध्यान देगा, गंभीरता से लेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. या यूं कहिए कि उसके बाद से समस्या और बढ़ती ही चली गई.’

आग को फैलने से रोकने के लिए सबसे पहले 1954 में मेहता कमेटी बनी. उसकी बातों को दफन कर दिया गया. फिर और बातें होती रहीं लेकिन पहली बार उम्मीद तब जगी जब 1978 में झरिया के पुनरुत्थान की एक बड़ी योजना बनी. इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए पोलैंड से विशेषज्ञों की टीम आई थी. पुनर्वास के लिए बनी टीम में बीसीसीएल के भी 40 अधिकारी शामिल थे. कोयले के उत्पादन और नए शहर के निर्माण के लिए 20 अरब 85 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना में सात अरब रुपये सिर्फ सात छोटे शहरों के निर्माण पर खर्च होने वाले थे. योजना के अनुसार उजड़ने वाले लोगों को न्यू झरिया सिटी के तहत झरिया के उत्तरी किनारे, धनबाद के कोयला नगर, भूली नगर, मुनीडीह, बस्ताकोला, राजगंज तथा कुमार मंगलम सिटी के तहत दामोदर नदी के दक्षिण किनारे पर बसाया जाना था. जाहिर-सी बात है कि इस योजना की बातें जब सार्वजनिक तौर पर प्रचारित होनी शुरू हुई थीं तो यह माहौल बना था कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका. पोलैंड से आया विशेषज्ञों का दल उसी वर्ष लौट गया. सब ठंडे बस्ते में चला गया. 1983 में इस योजना की लागत बढ़कर 50 अरब 80 करोड़ रुपये हो गई. केंद्र सरकार, राज्य सरकार और बीसीसीएल के बीच इस योजना के कार्यान्वयन को लेकर फिर बातचीत हुई. उस दौरान राज्य सरकार से 25 प्रतिशत और केंद्र सरकार से 50 प्रतिशत धनराशि देने को कहा गया लेकिन दोनों सरकारों ने वित्तीय संकट का सवाल उठा दिया. इसी ऊहापोह में 1985 में योजना की लागत बढ़कर 90 अरब 73 करोड़ रुपये हो गई, जिसमें से सिर्फ पुनर्वास पर 30 अरब रुपये खर्च होते. हालांकि पुनरुत्थान का यह मामला उलझता गया और एक जीवंत शहर किस्तों में मरता रहा.

सच यही है कि इस इलाके में आग फैली थी, अपने स्वाभाविक गुण के कारण. हवा के संपर्क में आने के बाद कोयले का जल उठना स्वाभाविक गुण है लेकिन जमीन के अंदर उसे हवा मिले, वह और जले और फैले, यह सब खुद-ब-खुद नहीं हुआ, ऐसा किया गया. ओझा सवाल उठाते हैं, ‘जाकर पूछिए बीसीसीएल प्रबंधन से कि क्या सच में आग से शहर को नहीं बचाया सकता था. जाकर पूछिए झरिया के नाम पर राजनीति करने वालों से कि क्या सच में वे झरिया को बचाने और लोगों को सही जगह पर बसाने की राजनीति कर रहे हैं.’

ओझा जिन सवालों को छोड़ते हैं, उन्हीं सवालों को लेकर हम धनबाद आते हैं. ऐसा कहा जाता है कि ‘झरिया बचाओ’ की राजनीति करने वाले बड़ी हस्ती बन गए हैं. उनकी राजनीति क्या होती है? जवाब सबके मिलते हैं. कुछ बताते हैं कि सबसे दिलचस्प यह है कि जो झरिया बचाने की राजनीति करते हैं, उनमें से अधिकांश झरिया जाते भी नहीं. रहते भी नहीं. धनबाद रहते हैं. और उसमें भी अधिकांश वैसे हैं, जो जल्दी से जल्दी झरिया को वीरान होते देखना चाहते हैं ताकि कोयला अधिक से अधिक निकल सके. झरिया को उजाड़ने से और आग को फैलाने से ही अरबों का कारोबार होगा, सारा खेला बस यही है.

झरिया वाले जान चुके हैं कि उन्हें अपनी जमीन से उखड़ना होगा. शहर में रहते धुएं और धूल से तमाम किस्म की बीमारियों से गुजरकर मरना होगा

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बीसीसीएल खनन का अधिकांश काम अब आउटसोर्सिंग के जरिए कर रही है. आउटसोर्सिंग कंपनियों का अपना गणित है. उन्हें किसी भी कीमत पर कोयला चाहिए, वे सुलगती खदानों से भी कोयला निकाल लेते हैं

तस्दीक करने पर मालूम होता है कि झरिया के नाम पर ऐसे कई लोग हैं, जो दिन में तो नारे लगाते हैं कि झरिया को बचाना है, दिखावे के लिए यह भी बोलते हैं कि झरिया के लोगों को जहां-तहां नहीं बसाने देंगे लेकिन शाम ढलते ही वे झरिया के वीरानगी में डूबते जाने का जश्न भी मनाते हैं. लोग बताते हैं कि यहां राजनीति के अपने मकसद हैं. कोल माफिया इसलिए पुनर्वास का विरोध कर रहा है कि जब खदानों में बेगारी करने वाले लोगों का पुनर्वास यहां से कहीं और हो जाएगा तो फिर उनके लिए दिन-रात एक कर कोयले की चोरी कौन करेगा. कौन मजदूरी करेगा? जो चुनावी राजनीति में हैं, उनकी चिंता यह है कि झरिया से पूरी आबादी ही चली जाएगी तो फिर वे चुनाव में कैसे जीतेंगे, क्योंकि ये वही मजदूर हैं जो वर्षों पहले बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि जगहों से लाकर यहां बसाए गए थे ताकि कोयले से कमाई के साथ अपनी राजनीतिक जमीन भी तैयार की जा सके.

अमेरिका की पिट्सबर्ग कंपनी की एक रिपोर्ट के अनुसार, झरिया का इलाका इस कदर खतरनाक मुहाने पर पहुंच चुका है कि अगर दस वर्षों के अंदर इसे खाली नहीं कराया गया तो कभी भी दुनिया की सबसे बड़ी भू-धंसान की घटना घट सकती है. झरिया में रह रहे तमाम लोग इस बात को जानते हैं. उनके अनुसार, यहां धरती का सबसे बेहतर कोयला है और उस कोयले को निकालने के लिए लोगों को यहां से हटाना जरूरी है. लोग सीधे हटेंगे नहीं, इसलिए आग का फैलना जरूरी है. आंकड़े भी बताते हैं कि झरिया की जमीन में दुनिया का बेहतरीन कोयला दबा हुआ है. पिछले सौ सालों में तीन करोड़ 17 लाख टन जलकर राख हो जाने के बावजूद एक अरब 86 करोड़ टन बचा हुआ है.

सवाल अपनी जगह बना रहता है कि क्या वाकई यह आग बुझाई नहीं जा सकती थी या कोई रास्ता नहीं निकल सकता था. इसे विषय पर साउथ ईस्टर्न कोल लिमिटेड के पूर्व कार्यकारी निदेशक एनके सिंह से वर्षों पहले बात हुई थी. इसे लेकर उनका गहरा अध्ययन रहा है. उन्होंने कहा था कि ट्रेंच कटिंग कर आग से निपटने का रास्ता निकाला जाता रहा है. हालांकि यह कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि एक ओर ट्रेंच कटिंग होगी तो दूसरी ओर आग बढ़ेगी. यह सही भी है. ट्रेंच कटिंग के अलावा नाइट्रोजन छिड़काव से लेकर दूसरे और कई किस्म के प्रयोग किए जाते रहे हैं. कोई उपाय कारगर नहीं हो सका है. और सवाल यह है कि अब यह आग बुझा पाना क्या संभव या इतना आसान रह गया है. जवाब है नहीं, क्योंकि अब मामला एक जगह आगलगी का नहीं है. देश भर की नौ कोयला कंपनियों के भूमिगत आग वाले 158 क्षेत्रों में से 70 सिर्फ बीसीसीएल के झरिया कोयला क्षेत्र में हैं.

आग के खेल को समझने के लिए जितने लोगों से बात होती है, सब अलग तरीके की बात करते हैं. बीसीसीएल के लोग कहते हैं कि कोयला निकाल लेने से सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा लेकिन असल खेल कोयला निकालने का ही है और झरिया के पास जो कोयला है, उस पर बड़ी निगाहें टिकी हुई हैं. जानकार बताते हैं कि देश में घरेलू कोयले का भंडार 93 बिलियन टन है जिसका 13 फीसदी भाग ही कोकिंग कोल है बाकि थर्मल कोल है. इसमें से 28 फीसदी प्राइम कोकिंग कोल और शेष मीडियम कोकिंग कोल है. भारतीय इस्पात उद्योग के विकास में सबसे बड़ी बाधा प्राइम कोकिंग कोल की अनुपलब्धता है. फिलहाल इसका उत्पादन आठ मिलियन टन है जिसे 2024-25 तक 18 मिलियन टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जबकि इस्पात उद्योग की मांग 97 मिलियन टन हो जाएगी.

खुद बीसीसीएल के ही एक अधिकारी बताते हैं कि बीसीसीएल की यह योजना आगे को देखकर ही है. अगर इतने कोयले की मांग पूरी करनी है तो झरिया वालों को अपनी जमीन से उजड़ना ही होगा. लोग हटेंगे तभी खनन होगा. लोग सीधे निकलेंगे नहीं इसलिए आग का फैलता रहना जरूरी है. झरिया के लोग बताते हैं, ‘देखते रहिए कि कैसे लोगों को झरिया छोड़ने पर मजबूर किया जाता है. एक-एक कर सारी सुविधाएं शहर से छीन ली जाएंगी तो तब आज जिद पर अड़े झरिया वाले मजबूरी में यहां से विदा हो जाएंगे.’

झरिया में आग नाम की किताब लिख चुके अमित राजा कहते हैं, ‘पहले रेल को खतरे में बताकर झरिया में रेल परिचालन बंद किया गया लेकिन जैसे ही रेल बंद हुआ दनादन उससे कोयला निकाल लिया गया. बीच-बीच में राष्ट्रीय राजमार्ग पर खतरे की बात कही जा रही है. वहां भी ऐसे ही होगा. सारा खेल कोयले के लिए है. पुनर्वासित करना प्राथमिकता में नहीं, कोयला निकले, बस यही प्राथमिकता है. ये बातें सच लगती हैं. झरिया में घूमते हुए और वहां से बेलगढ़िया में बसा दिए गए लोगों से बात करते हुए साफ होता है कि पुनर्वास करना बीसीसीएल की प्राथमिकता नहीं बल्कि कोयला प्राथमिकता में है.’

बीसीसीएल खनन का अधिकांश काम अब आउटसोर्सिंग के जरिए कर रही है. आउटसोर्सिंग कंपनियों का अपना गणित है. उन्हें किसी भी कीमत पर कोयला चाहिए, अधिक से अधिक कोयला. वे सुलगते कोयले को भी खदान से निकाल लेते हैं. उन्हें कोयले खनन में कोई बाधा नहीं चाहिए इसलिए वे आग के बढ़ते रहने की भी कामना करते हैं ताकि आग का भय हो तो लोग जल्दी भागें अौर अधिक से अधिक खनन हो. झरिया के लोग बताते हैं कि आउटसोर्सिंग कंपनियों में कई कंपनियां ऐसी रही हैं जिसमें प्रमुख के तौर पर बीसीसीएल के वरिष्ठ अधिकारी ही रहे हैं. वे बीसीसीएल से रिटायर होते ही आउटसोर्सिंग कंपनियों के प्रमुख बन जाते रहे हैं. यानी साफ है कि वे अपने पद पर रहते हुए आउटसोर्सिंग कंपनियों को ठेका दिलवाने या दोहन करने की छूट देने में मदद करते रहे हैं या कि खुद ही आउटसोर्सिंग कंपनी में साझेदार बनते रहे हैं, इसलिए रिटायरमेंट के बाद कई अधिकारी कंपनियों में प्रमुख पद पाते रहे हैं. खेल इतना ही नहीं है, आउटसोर्सिंग कंपनियों का चेन फिक्स होता है. बीसीसीएल से लेकर पुलिस और अपराधियों तक से. कोयले में अपराध की मिलावट के बिना काम नहीं होता. और चूंकि पूरा चेन बना होता है इसलिए आउटसोर्सिंग कंपनियां वैज्ञानिक तरीके से खनन नहीं करतीं. वे अपने हिसाब से खदानों में विस्फोट करती हैं और कोयला निकालती हैं. आग न फैले, यह उनके एजेंडे में नहीं होता. हां, यह जरूर एजेंडे में होता है कि आग की वजह से जल्दी से जल्दी ज्यादातर इलाके खाली हों ताकि आगे खाली इलाके में खनन का अधिक से अधिक खेल हो सके.

कोयला खनन और लोगों के पुनर्वास की स्थितियों के संबंध में बात करने पर बीसीसीएल के सीएमडी कार्यालय से संपर्क करने पर जरेडा में बात करने को कहा जाता है. कुल मिलाकर अलग-अलग महकमों पर जिम्मेदारी टाली जाती है. इतनी बड़ी पुनर्वास योजना के लिए पैसे कहां से आएंगे, इसके जवाब में बीसीसीएल का एक पुराना डाटा पकड़ा दिया जाता है, जिसका सार कुछ इस तरह  है- बीसीसीएल की होल्डिंग कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड गत तीन वर्षों से अपनी लाभजनक इकाइयों से प्रति टन छह रुपये वसूलती है, जिस मद से कार्य को पूरा किया जाएगा. इससे हर साल बीसीसीएल को 400 करोड़ रुपये का कलेक्शन होता है. हर तरह के कोयले (कोकिंग और नाॅन-कोकिंग कोल) पर उत्पाद शुल्क 10  रुपये किया गया है, जो पहले 3.5 रुपये प्रति टन नॉन-कोकिंग और 4.25 रुपये कोकिंग कोल पर था. इससे प्रति वर्ष और 240 करोड़ रुपये जमा होने का अनुमान है. इसी तरह पैसा जमा करके नया झरिया बसा दिया जाएगा.

यह सारा खेल झरिया वाले और बेलगढ़िया वाले जानते हैं. पुनर्वास क्यों और किसलिए यह भी. वे जान चुके हैं कि उन्हें अपनी जमीन से उखड़ना होगा. शहर में रहते धुएं, धूल और गैस की वजह से तमाम किस्म की बीमारियों से गुजरकर मरना होगा या फिर शहर छोड़ देने पर बेलगढ़िया जैसे इलाके में बसकर अवसाद से.      

भाई! क्राइम पेट्रोल में दिखाता है लड़का ‘किसी और’ के साथ रहता है, फिर शादी कर लेता है और जुर्म दस्तक देता है

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इस महीने की शुरुआत में एक दोस्त की सगाई में जाने का मौका हाथ लग गया. वो दोस्त भी मेरी तरह काफी साल से घर से दूर रहकर नौकरी करता है. मेरे घर जाने का मामला पहले से ही तय था. ऐसे में सगाई के बहाने पुराने दोस्तों से मुलाकात का मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता था. एक पंथ दो काज निपटाने वाला ये मौका बहुत दिन बाद मेरे हाथ लग गया था और ट्रेन पर लदकर घर की ओर कूच कर गया था. हालांकि घर पहुंचने पर जब उस दोस्त को बधाई देने उसके घर पहुंचा तो सगाई और शादी के बारे में उसने जो कहानी बताई वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी.

दरअसल, सगाई होने के कुछ दिन पहले लड़कीवालों ने उसके परिवारवालों को बताया कि लड़की का कोई ऑपरेशन हुआ है और वे सगाई की तारीख आगे खिसकाना चाहते हैं तो लड़केवालों ने कह दिया कि ठीक है कोई बात नहीं. अपनी सुविधा के हिसाब से देख लो. इसके अलावा ‘डिमांड’ को लेकर भी लड़कीवालों की कुछ आपत्तियां थीं जिसे दोनों परिवारों ने मिलकर सुलझा लिया था. सगाई के पहले की प्रक्रिया जैसे- लड़कीवालों का लड़के के घर आना, फिर लड़का जहां नौकरी करता है वहां जाकर लड़की के पिता का उससे मिलना, इसके बाद लड़की को लड़के के परिवार और रिश्तेदारों द्वारा देखना, ‘ग्रुप डिस्कशन’ और ‘रैपिड फायर क्वेश्चन राउंड’, ‘लेन-देन’ वगैरह-वगैरह पूरी कर ली गई थी. दोस्त ने बताया कि लड़की के ऑपरेशन और सगाई रद्द करने तक की तो बात समझ में आ गई थी. सभी लोग तैयार थे कि सगाई की तारीख फिर से तय कर दी जाएगी.

जब दोस्त को सगाई की बधाई देने उसके घर पहुंचा तो उसने जो कुछ भी बताया वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी

ऑपरेशन की बात सामने आने के बाद मेरे दोस्त को झटका तब लगा जब लड़की की बुआ के लड़के का फोन उसके पास आया कि जहां वह नौकरी करता है और जहां किराये का मकान लेकर रहता है, वह देखना चाहता है. ये बात मेरे दोस्त को खटक गई कि सगाई की तारीख रद्द करने के बाद अब लड़के की जांच-पड़ताल करने का क्या मतलब. ये तो पहले चेक करना चाहिए था उसके बाद सगाई तय करनी चाहिए थी. इस फोन के बाद मेरे दोस्त के बैकग्राउंड चेक करने के मसले ने कुछ ऐसा तूल पकड़ा कि दोनों परिवारों का रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट गया. मेरे दोस्त के हिसाब से ये पूरा मामला इसलिए बिगड़ा कि सगाई होने से पहले जितनी भी बातें हुईं उसमें उसके पिता और लड़की के पिता के बीच बातचीत न के बराबर हुई. लड़के के पिता को नहीं पता था कि लड़की के पिता क्या चाहते हैं और यही हाल लड़की के पिता का था. बातचीत न होने की वजह से दोनों परिवारों के बीच जुड़ने वाले रिश्ते को संदेह के कोहरे ने घेर लिया. इस रिश्ते पर बर्फ जम गई जो पिघली तो रिश्तों में नरमी नहीं बल्कि तल्खी लेकर आई.

दोनों ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला और इसकी आंच मेरे दोस्त तक उस दिन पहुंची जिस दिन लड़की की बुआ का लड़का उसके पास आया. मेरे दोस्त ने अपना किराये का कमरा दिखाने से मना कर दिया था. तब उस पर ऐसे-ऐसे आरोप लगे कि उसकी हालत खस्ता हो गई. ऐसा इसलिए कि लड़की के बुआ के लड़के ने मेरे दोस्त से कहा, ‘भाई! हम लड़कीवाले हैं और सगाई तय होने के बाद भी हम कभी भी ये चेक कर सकते हैं कि लड़का कहां और किसके साथ रह रहा है. ऐसा इसलिए कि ‘क्राइम पेट्रोल सतर्क’ सीरियल में भी दिखाता रहता है कि लड़का घर से दूर नौकरी करता है वहां ‘किसी और’ के साथ रहता है और फिर घरवालों की मर्जी से शादी भी कर लेता है और फिर जुर्म दस्तक देता है.’ दोस्त पर इसके अलावा और भी तमाम आरोप लगे जिसके बाद उसे कहना पड़ा, ‘बात जब यहां तक आ पहुंची है तो एक बार और सोच लो उसके बाद आगे बढ़ो. इतने संदेह की स्थिति में मामले को आगे बढ़ाना ठीक नहीं है.’

इस मामले में कौन सही है और कौन गलत, कहां, किससे, क्या गलती हुई, ये कहा नहीं जा सकता है. लेकिन मुझे लगता है कि ये पूरा मामला बात करके सुलझाया जा सकता था. इस मामले से एक बात और समझ में आई कि घर से दूर शहरों में रह रहे लड़कों को शक की निगाह से देखा जा रहा है. खासकर तब जब वे थोड़ी देर से शादी को तैयार होते हैं. ये बड़ी ही अजीब और हास्यास्पद-सी स्थिति थी. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि दोस्त से क्या कहूं. खैर, विदा लेते हुए मैंने सिर्फ इतना ही कहा, ‘जो होना था, सो हो गया लेकिन अब आगे के लिए सावधान रहना और सतर्क रहना.’  

(लेखक पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं )

मोदी सरकार के दावे तो अच्छे हैं, पर जमीन पर क्या है?

फोटो साभारः पीटीआई
फोटो साभारः पीटीआई
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आर्थिक मसलों में कुछ खास तो हुआ नहीं है. इन्होंने निवेश वगैरह का जो रास्ता साफ किया, उससे निवेश तो कुछ खास आया ही नहीं है. सरकार के दावे तो अच्छे-अच्छे हैं, लेकिन आप देखिए कि जमीन पर काम कितना हुआ है. निवेश तो आया नहीं. भारत में बाहर से कंपनियां भी नहीं आईं. कारखाने लगाए जाते, नए उद्योग शुरू होते, ऐसा नहीं हुआ है. मेक इन इंडिया में इन्होंने कहा कि लोग आएंगे, यहां उद्योग लगाएंगे, लेकिन अब तक कोई आया नहीं. एक तो वैश्विक मंदी इसका कारण है. उद्योगपति यहां आने के बदले कहीं और जा रहे हैं. चीन तक में उद्योगपति नहीं जा रहे हैं. चीन का आकर्षण कहीं अधिक है, लेकिन वहीं नहीं जा रहे हैं, तो यहां क्या आएंगे. अब अगर विश्व अर्थव्यवस्था सुधरेगी, अगर लोग निवेश करना चाहें, इसके साथ बाकी चीजें भी सुधरें. जैसे जमीन की उपलब्धता हो, मजदूरों की हालत ठीक हो, सरकार की नीतियां ठीक हों, तब लोग आएंगे. भारत की पहली प्रतियोगिता तो चीन के साथ है. वहां जो सरकार है उसका अर्थव्यवस्था पर अपना कंट्रोल है, जबकि इनका कोई खास कंट्रोल नहीं है. कुछ राज्यों के हाथ में है, कुछ केंद्र के हाथ में है. इसलिए क्या होने जा रहा है, कुछ कह नहीं सकते.

विजय माल्या जैसी घटनाएं तो ये नहीं रोक सकते. सरकार और पब्लिक सेक्टर से ही लोग पैसा लेकर निवेश करते हैं और खाते-पीते हैं. सुब्रत राय सहारा, शारदा चिटफंड और ऐसे बहुत से हैं जो सरकार के या जनता के पैसे खा गए. भारतीय अर्थव्यवस्था में माल्या जैसे लोग कैसे काम कर पाते हैं, वह तो इस व्यवस्था का बड़ा लंबा-चौड़ा चक्कर है. अर्थव्यवस्था में एक होती है पोंजी स्कीम. एक थे चार्ल्स पोंजी. वे इटैलियन थे जो अमेरिका आए थे. बोस्टन शहर में उनका काफी दबदबा था. उन्होंने लोगों के पैसे-वैसे बहुत लूटे. उसने बताया कि वह यह करेगा, वह करेगा और लोग उसके झांसे में आ गए. वहीं पोंजी स्कीम का यह एक प्रकार है जो शारदा, सहारा या विजय माल्या आदि के रूप में सामने है. ये अखबारों में छपवाएंगे कि बहुत फायदा होने वाला है, बहुत लाभ मिलेगा. लोग इसमें फंस जाते हैं और पैसा लगा देते हैं. ये सब पोंजी योजनाओं के ही प्रकार हैं.

यह बात हिंदुस्तान में बहुत जमाने से कही जा रही है कि कृषि का उत्पादन बढ़ेगा. कृषि में डिमांड बढ़ेगी तो उद्योग में उत्पादन बढ़ेगा. गांवों में लोग सामान बेचेंगे. यह कोई नई बात नहीं है. लेकिन इनका फोकस कॉरपोरेट की ओर है, जो पैसा ले जाकर बाहर निवेश करते हैं. राज्यों में सूखा है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन उस पर कोई खास ध्यान नहीं है.

कृषि को लेकर सरकार की जो नीतियां हैं, उससे कोई खास उम्मीद नहीं बनती. अब भी कृषि में लगभग 60 प्रतिशत लोग लगे हुए हैं. कृषि से बहुत ज्यादा आउटपुट आता है. अगर कृषि की हालत नहीं सुधरेगी तो कुछ नहीं हो सकता. कृषि में लोग संगठित नहीं हैं. कहीं कुछ है, कहीं कुछ है. जहां तक कृषि क्षेत्र में सुधार की बात है तो एक जमाने में भूमि सुधार वगैरह की बात की जाती थी, जिस पर अब कोई बात ही नहीं करता. छोटे-मोटे किसान बंटाई पर खेती करते हैं. सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे वे आगे बढ़ सकें. अगर ऐसा नहीं होता है तो यही किसान खेती छोड़कर शहर की ओर भागते हैं. वे शहर जाएंगे और मजदूरी करेंगे. लोग गांव से शहर की ओर भाग रहे हैं. वे चाय बेचने जैसे छोटे-मोटे धंधे में लग जाते हैं. लेकिन कृषि में इतना खतरा है कि किसान खेती से भाग रहे हैं.

काले धन पर नियंत्रण कर पाने के मामले में मुझे नहीं लगता है कि कुछ हो सकता है. इन्होंने यहां से आर्थिक सीमा खोल दी है कि यहां से पैसा ले जाइए और बाहर लगाइए. इसमें दो धंधे हैं. एक तो निवेश जाता है, दूसरा काला धन यहां से बाहर जाता है और मॉरिशस रूट से धो-पोंछकर, ह्वाइट होकर वापस आ जाता है. फिर वह लीगल हो चुका होता है. कुछ छोटे-मोटे देश ऐसे हैं जहां ले जाकर निवेशक पैसा लगाते हैं. वहां पता चलता है कि एक ही बिल्डिंग पर पचासों बोर्ड लगे हुए हैं. वहां जाकर निवेश कर दीजिए. फिर वह घुमा-फिराकर यहां आ जाएगा. लेकिन जो गैरकानूनी पैसा होता है वह तो लाना मुश्किल है. यह बहुत ही जटिल है. दूसरे, उत्पादन सब का सब यहां नहीं होता. कुछ यहां होता है, कुछ बाहर होता है. तो इसे रोक पाना संभव नहीं है.  यह काला धन वापस लाने का दावा तो ऐसे ही किया गया था. अब देखिए, उस पर अब कोई बात नहीं करता. वे सब चुनावी वादे थे जिस पर अब बात नहीं होती.

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

‘लग रहा था कि विदेश नीति में कुछ चमत्कार-सा होने जा रहा है लेकिन सब कुछ मोर का नाच साबित हुआ’

China

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ​ही अद्भुत कार्य किया था. सारे पड़ोसी देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों को निमंत्रण दिया था कि उनके शपथ ​लेने के समय भारत आएं. ऐसा संकेत उनके पहले भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने ​नहीं दिया था. उस अवसर की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ यहां आए थे. जिन दो देशों के बीच संबंध बहुत ही विषम हैं, वहां से कोई प्रधानमंत्री यहां आ जाए तो इसका मतलब शुरुआत बड़ी अच्छी है. उसके पश्चात नरेंद्र मोदी का दूसरा अनन्य योगदान यह है कि जिस देश में भी गए उन्होंने कोशिश की कि वहां रहने वाले हमारे भारतीय लोग इकट्ठा हों, सभा में उपस्थित हों, भाषण सुनें, मिलें-जुलें.

ऐसा आज तक किसी प्रधानमंत्री ने व्यवस्थित तौर पर कभी नहीं किया. हुआ तो है. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी भी जाते थे तो लोगों से मिलते थे. लेकिन सभाएं हों, जिसमें पांच-दस, बीस हजार लोग इकट्ठा हों, ये सब पहली बार हुआ. इसका विदेश नीति पर गजब का असर पड़ता है. विदेशों में हमारे लोग रहते हैं. उन देशों के शासक भी जानते हैं कि वे इतनी बड़ी सभा अपने देशवासियों को लेकर बुलाना चाहें तो नहीं बुला सकते, जैसी हमारे प्रधानमंत्री ने बुलाई. तो उन पर भी बड़ा रौब रहता है और अपने लोगों को भी प्रेरणा मिलती है. उससे भी विदेश नीति के लक्ष्य सिद्ध होते हैं. मोदी ने इतने कम समय में इतने देशों की यात्राएं कीं, एक-एक यात्रा में वे तीन-तीन, चार-चार देश निपटाते रहे. ऐसे-ऐसे देशों में गए जहां भारत के प्रधानमंत्री अब तक नहीं गए थे. इस मामले में मोदी का हमारी विदेश नीति पर अनन्य योगदान रहा और उसका प्रचार भी खूब जमकर हुआ. चैनल लगातार दिखाते रहे, देश और विदेश के अखबारों में भी खूब छपा. इन्हीं सब बातों को देखते हुए लग रहा था कि विदेश नीति में कुछ चमत्कार-सा होने जा रहा है. लेकिन ये सब कुछ मोर का नाच साबित हुआ.

ये सब ऐसा लगा कि सब बाहरी तौर पर किया जा रहा है और अंदर उसके कोई खास तत्व है नहीं. मुझे तो उस वक्त भी खुशी भी हो रही थी लेकिन मैं इस कमी को सूंघ भी रहा था और मैं ​लिख भी रहा था. अब दुर्भाग्य यह है कि वही सब हो रहा है. नेपाल जो हमारे सबसे करीब होता था, जिसकी हम लोगों ने इतनी जबरदस्त मदद भूकंप के समय की थी, उस नेपाल ने आज अपने राजदूत को वापस ​बुला लिया. वहां का प्रधानमंत्री हमारे खिलाफ बोल रहा है. वहां की रूलिंग पार्टी के प्रचंड हमारे खिलाफ बोल रहे हैं. वहां की नेपाली कांग्रेस से भी हमारा संबंध ऐसा नहीं है कि हम मधेशियों के मामले में उनसे अपनी बात मनवा सकें. नेपाल में हमारा कोई नहीं. जो सबसे नजदीक का दोस्त है, वही सबसे दूर जा रहा है.

यही हाल आप देखिए कि श्रीलंका में है, यही हाल मालदीव के साथ है. यही हाल हमारा और पड़ोसी देशों के साथ है. छोटे-मोटे सभी देशों का जिक्र मैं नहीं कर रहा. कोई बहुत ही अद्भुत बात किसी भी देश के साथ हुई हो और चल रही हो, ऐसा तो लगता नहीं. पाकिस्तान के साथ तो हमारी नीति बिल्कुल विफल है. वह पल में माशा पल में तोला है. वह कब बदल जाएगी, कब पटकनी खा जाएगी, सिर के बल चलते-चलते पांव के बल चलने लगेगी, पांव के बल चलते-चलते कब सिर के बल चलने लगेगी, कुछ मालूम ही नहीं. एक मामूली बहाने के आधार पर हम वार्ताएं स्थगित कर देते हैं और एक मामूली निमंत्रण पर कहीं से कहीं चले जा रहे हैं. कब काबुल से दौड़े चले गए लाहौर. इससे यह प्रकट हो रहा है कि विदेश नीति में तात्कालिकता है, कोई दूरदृष्टि नहीं है. इसके अलावा आप यह भी देखिए कि महाशक्तियों से संबंध बनाने में मोदी ने बाह्य आडंबर बहुत फैलाया. ओबामा को ‘बराक-बराक’ कहकर बुला रहे थे, चीनी राष्ट्रपति के साथ पलना झूल रहे हैं. जापान जा रहे हैं तो 30 बिलियन डाॅलर, 40 बिलियन डालर यहां से आएंगे, वहां से आएंगे. कहां आ रहे हैं, कुछ पता ही नहीं.

नेपाल जो हमारे सबसे करीब होता था, वहां सब हमारे खिलाफ हैं. अब वहां हमारा कोई नहीं. जो सबसे नजदीक का दोस्त है, वही सबसे दूर जा रहा है

यही बात अमेरिका के साथ हो रही है. अमेरिका के साथ इतने समझौते हो रहे हैं, लेकिन कोई ठोस रूप हम देख ही नहीं पा रहे. सब चीजें निर्गुण-निराकार. इन्हीं देशों के साथ जो संबंध हमारे होने चाहिए थे, वे नहीं हैं. अफगानिस्तान के साथ हमारी कोई नीति नहीं. हम दो बिलियन डाॅलर वहां खर्च कर चुके हैं. अपने कई लोग वहां जान दे चुके हैं. लेकिन न वहां की सरकार पर गहरा प्रभाव है, न वहां के विपक्ष पर. न ही तालिबान में हमने कोई सेंध लगाई. हम अपने आपको क्षेत्रीय महाशक्ति कहते हैं. लेकिन हममें कोई दमखम ही नहीं. इसका मतलब कोई विदेश नीति है ही नहीं. यह मामला सिर्फ इन्हीं देशों तक सीमित नहीं है. जैसे हमारे प्रधानमंत्री यूएई गए. क्या मिला वहां? अब तक कुछ पता ही नहीं. बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुईं कि लाख करोड़ रुपये वे हमको दे देंगे. अरे हम रुपये का क्या करेंगे? कुछ काम करके तो दिखाएं जमीन पर. यह मेक इन ​इंडिया हो गया, स्वच्छता अभियान हो गया, ये सब कागज पर हैं. कुछ जमीन पर भी तो उतरना चाहिए न! सारा मामला हमें तो ठीक रास्ते पर चलता दिखाई नहीं दे रहा है.

हालांकि, सुषमा स्वराज काफी अच्छी विदेश मंत्री हैं. वे भाषण अच्छा देती हैं. अपनी बात बहुत ढंग से रखती हैं. लेकिन मुझे लगता है कि उनको फ्री हैंड नहीं रखा है. वे अपनी बात स्वयं नहीं रख सकतीं. उनको मोदी के इशारे पर नाचना पड़ता है और मोदी अफसरों के इशारों पर नाचते हैं. मोदी को विदेश नीति की कोई समझ है, इसकी जानकारी हमें आज तक तो हुई नहीं. अब तो भगवान भरोसे है विदेश नीति. हमारे विदेश सचिव जयशंकर बहुत पढ़े-लिखे हैं, मैं बचपन से जानता हूं, लेकिन पता नहीं दोनों में से किसकी चलती है. पूरी विदेश नीति में जो पारंपरिक आंतरिक तत्व होते हैं, ऐसा लगता है कि ​सारे निष्कर्षों में, सारे निर्णयों में, उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो रही है. जैसी मर्जी होती है वैसी नीति हम चला रहे हैं.

मुझे लगता है कि आंतरिक मामलों में भी जो वादे किए गए थे, उनको निभाने की दिशा में बहुत कम ठोस कदम उठे हैं. हालांकि, सरकार ने कई अच्छे काम किए हैं, करने का दावा भी कर रही है. जैसे नितिन गडकरी धुआंधार सड़कें बना रहे हैं. बढ़िया काम है. इसी तरह से और भी कई काम इस सरकार ने शुरू किए हैं. जैसे मुझे यह काम बहुत अच्छा लगा कि एलपीजी सिलेंडर गरीब लोगों को कम दाम पर दिए जा रहे हैं और प्रधानमंत्री की प्रेरणा से लाखों लोगों ने एलपीजी ​सब्सिडी छोड़ दी. इस तरह के काम काफी अच्छे हुए हैं. ऐसे कामों को बढ़ाना चाहिए. हर क्षेत्र में लोगों से संकल्प करवाना चाहिए कि न रिश्वत देंगे, न रिश्वत लेंगे. स्वभाषा का प्रयोग करेंगे.

मोदी के आने से शिक्षा में कोई फर्क नहीं आया. स्वास्थ्य में कोई फर्क नहीं आया. आज भी गरीब आदमी अस्पतालों में जा नहीं सकता. 80 प्रतिशत लोग आज भी बिना दवाई के जीवन बिता रहे हैं. यही हाल शिक्षा का है. अंग्रेजी का बोलबाला है. मोदी स्वयं अंग्रेजी नहीं बोल सकते, लेकिन अंग्रेजी का मोह उनको पैदा हो गया है. क्योंकि अंग्रेजीदां नौकरशाहों ने उनको घेर रखा है और वही उनको नाच नचाते हैं. तो जो नाच नचाता है उसकी बात तो सुननी पड़ेगी. उसके प्रभामंडल में आप आ ही जाएंगे. मोदी की अपनी छाप हमारी आंतरिक नीतियों पर पड़ नहीं रही. इसका मुझे बड़ा दुख है.

रिश्वतखोरी जस की तस चल रही है, शराबखोरी जस की तस चल रही है, पशुओं का वध जस का तस चल रहा है. अभी कोई बड़ा परिवर्तन, जिसके बारे में हम खुलकर बोल सकें, वे दिखाई नहीं पड़ रहे हैं. दो-तीन, छोटे-मोटे अच्छे काम हुए हैं, उनका जिक्र हमने कर दिया. मैं यह समझता हूं अब सरकार के पास तीन साल बचे हैं. आखिरी के साल में छह महीने तो चुनाव में चले जाते हैं. नीतियां बनाने और उनको लागू करने का समय ही नहीं मिल पाता. अब जो भी दो-ढाई साल का समय बचा है, उसमें नरेंद्र मोदी अपने को ठीक रास्ते पर चलाएंगे, यह इंप्रेशन हटाएंगे जनता के मन से कि ये एक आदमी की सरकार है, बाकी सब अनुवर्ती हैं. एक इंजन है, बाकी सब डिब्बे हैं. यह बात जब तक खत्म नहीं होगी, सब लोगों को सम्मान और स्वत्व नहीं मिलेगा, तो मुझे लगता है दो-ढाई साल बाद बहुत ही दुर्गति होगी. इससे एक राजनीतिक शून्य भारत में पैदा होगा. क्योंकि कोई वै​कल्पिक नेतृत्व देश में दिखाई नहीं दे रहा है. मोदी का नेतृत्व अगर जल गया, जो कि साल भर में होता हुआ लग रहा है मुझे, तो इस देश में कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन, सांस्कृतिक आंदोलन चलेगा तो शायद देश में कोई परिवर्तन हो. वरना मुझे तो भविष्य बहुत ही अंधकारपूर्ण और कांटों से भरा लग रहा है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)