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मोदी, भाजपा या राजनीति तो महज हथियार हैं, राष्ट्रवाद का उन्माद तो पूंजीवादियों को चाहिए : सच्चिदानंद सिन्हा

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देश में इन दिनों राष्ट्रवाद का हो-हल्ला कुछ ज्यादा ही मचा हुआ है. आपने इस बारे में सुना और पढ़ा ही होगा लेकिन इस विषय पर कुछ कहा नहीं. क्या सोचते हैं आप?

इस विषय को अगर प्रचलित तौर-तरीकों से समझने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि यह शब्द ‘फलां’ के आ जाने से उछला और बढ़ा है. हालांकि मैं इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखता हूं. यह कोई नई बात नहीं है. 18वीं सदी में इंग्लैंड में जब औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई, तब यह शब्द उछला था. यूरोप में पांचवीं-छठी सदी में फॉल्करवॉन्डरुंग (लोगों का पलायन) नाम का आदिवासी आंदोलन हुआ था, जिसके बाद सभी आदिवासी बिखर गए थे. राज्यों की तरह अलग-अलग रहने लगे थे. इसका असर यूरोप में था. यही कारण था कि यूरोप में पहले कोई भी राजा, कहीं का राजा बन सकता था. फ्रांस का राजा किसी दूसरे देश का भी राजा बन सकता था. लेकिन 18वीं सदी में जब औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई तो राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा सामने आई. इसका मकसद कर आदि से बचाना था. नतीजा यह हुआ था कि स्कॉटलैंड, उरुग्वे, इंग्लैंड जैसे कई देश आपस में मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बन गए थे. लेकिन जिस ब्रिटेन से इस राष्ट्रवाद की बात चली थी वहां हाल और हालात बदल चुके हैं. अब तो स्कॉटलैंड में एक स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी है, जो इसी आधार पर चुनाव लड़ती है कि वह चुनाव जीती और उसकी सरकार आई तो वह स्कॉटलैंड को एक अलग देश बनाएगी और लोग उसका समर्थन भी करते हैं.

ये बातें तो आपने वैश्विक परिवेश में कहीं लेकिन भारत में अचानक यह शब्द उफान मारने लगा है और इसका रूप-स्वरूप अलग है. इस पर क्या कहेंगे?

सतही तौर पर देखेंगे तो इसके केंद्र में मोदी दिखेंगे, भाजपा दिखेगी, राजनीति दिखेगी लेकिन ये परिधि भर हैं. केंद्र कुछ और है. ये सब तो हथियार और औजार भर हैं. राष्ट्रवाद की जरूरत हमेशा से पूंजीवादियों को रही है. उन्हें एक राष्ट्र ज्यादा सूट करता है. इसकी वजह भी है. अब एक इंडस्ट्री लगाने के लिए कोयला एक राज्य से चाहिए, बिजली का कारखाना किसी दूसरे राज्य में लगता है, लौह अयस्क कहीं और से चाहिए और कुछ दूसरी चीजें किसी अन्य राज्य से. इसके लिए जंगल उजाड़ने होते हैं, नदियों को खत्म करना होता है, आदिवासियों के गांव उजाड़ने होते हैं. यह सब अलग-अलग खंड में बंटे इलाके में इतनी आसानी से तो होगा नहीं, इसलिए एक राष्ट्र और उसमें व्याप्त राष्ट्रवादी धारणा उनके लिए फायदेमंद होती है. छत्तीसगढ़ का उदाहरण लीजिए. अब वहां बार-बार कहा जाता है कि माओवादी हैं, इसलिए आसानी से सेना को उतार दिया जाता है. छत्तीसगढ़ का राष्ट्र का हिस्सा होने का यह फायदा है कि वहां प्राकृतिक संसाधनों को लेना है तो राष्ट्र की धारणा का इस्तेमाल कर सेना उतारिए, अपना काम कीजिए. इसलिए मैं कह रहा हूं कि राजनीति वगैरह सिर्फ औजार भर होते हैं. पूंजीवाद को अनंत विस्तार चाहिए और जल्दी भी चाहिए, इसलिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.

आप प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल का हमेशा विरोध करते हैं. एक बड़ा वर्ग सवाल उठाता है कि प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल नहीं होगा तो तरक्की कैसे होगी, जीवन कैसे चलेगा?

पहली बात तो ये है कि मैं प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल का विरोधी नहीं, मैं उसके दोहन का विरोध करता हूं. रही बात तरक्की की तो कैसी तरक्की? क्या ऐसी तरक्की कि कुछ सालों बाद दुनिया ही न बचे? आप खुद सोचिए. ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं. जब दुनिया में आबादी लगातार बढ़ रही है और धरती के अंदर जो प्राकृतिक संसाधन हैं या कि धरती की सतह पर जल, जंगल, जमीन जैसे संसाधन हैं, वे बढ़ नहीं रहे तो कोई भी क्या कहेगा? यही न कि इनका इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए ताकि यह दुनिया लंबे समय तक चले. लेकिन हो तो उलटा रहा है. आबादी बढ़ने के साथ साधनों की भूख बढ़ती जा रही है और इसलिए संसाधनों का दोहन भी बढ़ता जा रहा है. सीधी-सी तो बात है. अब अगर एक आदमी को अथाह संपदा चाहिए, कई मकान चाहिए, कई गाड़ियां चाहिए तो उसके लिए यह संसाधन तो बस सीमित समय के लिए ही है. बाकी अगर मैं गलत कहता हूं तो मान लीजिए, गलत कहता हूं.

जब आबादी लगातार बढ़ रही है और प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं तो सीधा फॉर्मूला होना चाहिए कि संसाधनों का इस्तेमाल कम हो ताकि लंबे समय तक दुनिया चले लेकिन हो उलटा रहा है और यही देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है

आपने राष्ट्रवाद पर बातें कहीं. उभार तो क्षेत्रवाद का भी इन दिनों तेजी से हुआ है और कहा जा रहा है कि इस देश में ही कई देश बनते जा रहे हैं.

क्षेत्रवाद तो स्वाभाविक है. राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की बात आरोपित है.

लेकिन एक समय तो ऐसा था जब गांधी जैसे लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का अभियान चला रहे थे तो उसके केंद्र में भी यही था कि इससे भारत एक देश जैसा बनेगा. या कि एक समय में विवेकानंद जब धर्म की अवधारणा प्रस्तुत कर रहे थे तो कहते थे कि धर्म लोगों को जोड़ता है, भारत एक राष्ट्र बनता है इससे.

देखिए, चीजें समय-संदर्भ के हिसाब से देखी जाती हैं. जब अंग्रेज आए थे तो हमारी लड़ाई उनसे थी. उस समय कई तंत्र ऐसे विकसित किए जा रहे थे, जिसके जरिए अंग्रेजों से लड़ा जा सके. अच्छा आप एक उदाहरण देखिए, चीजें शायद स्पष्ट होंगी. भारत में मुगलों की सत्ता खत्म हो चुकी थी. मुगलिया साम्राज्य सिर्फ दिल्ली तक सिमटकर रह गया था. उस समय मुगलों से सारे लोग लड़ रहे थे लेकिन जब 1857 की लड़ाई हुई तो मुगलों से लड़ने वाले राजाओं, जमींदारों आदि ने भी सर्वसम्मति से मिलकर उसी मुगल साम्राज्य के बहादुरशाह जफर को भारत का शासक बना दिया. ऐसा इसलिए कि उस समय स्थिति अलग थी. अंग्रेजों से लड़ने के लिए भारत को एक सूत्र में बांधना जरूरी था. 

आपने राष्ट्रवाद को पूंजीवाद से जोड़ा लेकिन इन दिनों तो  ‘वंदे मातरम’  और  ‘भारत माता की जय’  कहने पर भी जोर दिया जा रहा है और जो नहीं कह रहा उसे देशद्रोही बताया जा रहा है.

कुछ मूर्ख भाजपाई और कुछ संघी हैं, यह सब उनकी बात है. नासमझ हैं तो क्या कीजिएगा. मुसलमान ‘भारत माता की जय’ कह देंगे या ‘वंदे मातरम’ कहने लगेंगे तो इससे भाजपा को क्या फायदा होगा, यह समझ से परे की बात है. ऐसी बातें जो कहते हैं उन्हें मुसलमानों की भावनाओं का भी ध्यान रखना चाहिए. उस धर्म में बुतपरस्ती की पाबंदी है तो इस भावना का ख्याल करना चाहिए. लेकिन क्या कीजिएगा. आरएसएस जैसे संगठन का तो उदभव ही धर्म विशेष के विरोध में हुआ था इसलिए उनके लोग दूसरे धर्म वाले को उकसाने के लिए ऐसा कहते रहते हैं. हम तो 88 की उम्र में पहुंच गए हैं, इसलिए थोड़ा अनुभव है. हमने आजादी की लड़ाई देखी है. अब आज राष्ट्र की चिंता आरएसएस के लोग इतना करते हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि जब आजादी की लड़ाई चल रही थी तो उसमें उसने क्या भूमिका निभाई थी. मैंने तो कहीं नहीं देखा था. दरअसल आरएसएस तो मुस्लिम लीग के पूरक संगठन की तरह रहा. मुस्लिम लीग वाले कहते थे कि हिंदू के साथ हम कैसे रहेंगे, अलग देश दे दीजिए तो वही आरएसएस वाले कहने लगे कि मुस्लिम इस देश में कैसे रहेंगे, यह तो हिंदुओं का देश है.

मनमोहन सिंह और मोदी में नीतियों के स्तर पर कोई फर्क नहीं. अंतर यह है कि मनमोहन कुछ बोलते नहीं थे और मोदी चूंकि प्रचारक रहे हैं तो आक्रामक तरीके से अपनी चीजों का प्रचार करते हैं

हाल ही में आरएसएस के एक बड़े पदाधिकारी का बयान आया कि राष्ट्रीय झंडा तो तिरंगा है ही लेकिन भगवा झंडे को भी राष्ट्रीय झंडे की तरह मान सकते हैं.

चलिए, अब यह तो कम से कम कहने लगे कि तिरंगा राष्ट्रीय झंडा है. यह कहने में या मानने में भी तो उन्हें इतने साल लग गए.

देश में एक शोर यह भी चल रहा है कि मोदी के आने के बाद खतरे बढ़ गए हैं. असहिष्णुता बढ़ गई है. धर्मांधता बढ़ गई है. आप क्या मानते हैं? क्या वाकई में मोदी के आ जाने के बाद देश अचानक इस कदर असुरक्षित हो गया है?

अभी हाल में असहिष्णुता वाला जो मसला उठा था, उसका संदर्भ दूसरा था. देश में कई लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की हत्या होने लगी थी. ऐसे लोगों की हत्या हो रही थी जो धर्म की संकीर्णता के खिलाफ आवाज उठा रहे थे लेकिन वे किसी एक धर्म का विरोध तो कर नहीं रहे थे. मैं एक बात कहूं. असल में मोदी के साथ जो कुनबा है और उनका जो अतीत रहा है, उससे लोगों को डर लगता है. अब देखिए, मोहन भागवत आए तो कहने लगे कि आरक्षण पर ही पुनर्विचार होना चाहिए. उनके कुनबे में और भी कई लोग हैं, जिनसे लोग डरते हैं. लेकिन असहिष्णुता या अराजकता वाली जो स्थिति है, वह एकबारगी से मोदी के आ जाने से ही देश में आ गई है, ऐसी बात नहीं. यह तो वर्षों से दुनिया में फैली है. अब बताइए जर्मनी दार्शनिकों का ही देश रहा और उससे ज्यादा असहिष्णु देश कौन हो सकता है, जहां हिटलर के समय में हजारों कत्ल हुए. दुनिया के और भी देशों में असहिष्णुता इसी तरह देखी जाती रही है.

आरक्षण पर आप क्या सोचते हैं? इसमें किसी बदलाव की जरूरत है?

आरक्षण तो अस्थायी व्यवस्था है. इसमें अभी बदलाव क्यों चाहिए? लोहिया कहते थे कि तीन चीजें चाहिए ताकि जो वंचित हैं उनका आत्मबल बढ़ सके. एक- सहभोज, दूसरा आरक्षण और तीसरा अंतरजातीय विवाह. आरक्षण न होता तो जो आज थोड़े-बहुत दलित या वंचित जाति के लोग कुछ अच्छी जगहों पर दिख रहे हैं, वे दिखते क्या? या किसी दलित या वंचित का बेटा बड़े संस्थानों में पढ़ने जाता क्या? नहीं. पीढ़ियों से जिस समाज का आत्मबल ही मरा रहा है, आकांक्षाओं को मारा जाता रहा है, उसे विशेष अवसर तो चाहिए ही ताकि उसमें आकांक्षा तो जगे, आत्मबल तो जगे. किसी एक जाति अथवा समूह का कोई एक आदमी जब किसी अच्छे पद पर जाता है तो उस जाति अथवा समाज के लोगों का आत्मबल बढ़ता है. उसमें भी आगे बढ़ने की आकांक्षा जगती है. इसलिए आरक्षण अभी तो चाहिए ही.

मोदी शासन के तकरीबन दो साल हो गए. मनमोहन सिंह भी दस साल रहे थे. आप आर्थिक-सामाजिक स्तर पर होने वाले बदलाव पर बारीक नजर रखते हैं. दोनों में क्या फर्क है?

दोनों की तमाम नीतियां एक हैं. बस एक ही फर्क है कि मनमोहन सिंह बोलते नहीं थे लेकिन काम वही करते थे जो आज मोदी कर रहे हैं. मोदी चूंकि प्रचारक रहे हैं इसलिए अपने कामों का आक्रामक तरीके से प्रचार करते हैं. मेक इन इंडिया का मोदी इतना शोर मचा रहे हैं. यही काम तो मनमोहन सिंह भी कर रहे थे. दुनिया भर से उद्योगपतियों को भारत बुलाकर निवेश करने को कह रहे थे लेकिन वे बता नहीं रहे थे. मोदी उसे बता रहे हैं. स्टाइल का फर्क है, बाकी कुछ नहीं. वैसे गहराई से देखें तो कांग्रेस और भाजपा में ही कोई फर्क नहीं है. बस दोनों के स्टाइल में ही फर्क है. कांग्रेस भाजपा के कम्युनल कार्ड का विरोध करती है तो भाजपा वाले भी कांग्रेस के शासन में हुए कार्यों का विरोध करते हैं. अब भाजपाई तो कम्युनल आधार पर भी कांग्रेस को घेर रहे हैं. सिख दंगों की फाइल उसी लिए तो खुली है. दोनों एक से ही हैं.

मार्क्स यूरोप से बाहर नहीं गए, सिर्फ फैक्ट्री की लड़ाई देखी, उसी पर अवधारणा दी, कम्युनिस्टों ने उसे इकलौता सूत्र मान लिया, इसलिए वे सिर्फ मजदूर संगठनों तक सिमट गए और राजनीति में मिट रहे हैं

कांग्रेस-भाजपा एक जैसे ही हैं. समाजवादियों को देखा ही जा रहा है. वामपंथियों से एक उम्मीद बचती है कि वे शायद आधारभूत सवालों को सुलझाएं. आप क्या सोचते हैं?

आप वामपंथियों से किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं और ऐसा सवाल पूछ रहे हैं तो यह सवाल ही निरर्थक है. इस उम्मीद के साथ रहना ही बेमानी है. दुनिया में वामपंथियों के दो मॉडल रूस और चीन में हैं, दोनों का हाल देख लीजिए. रूस घोर तानाशाही का शिकार हुआ. चीन घनघोर पूंजीवादी राष्ट्र बन गया. कम्युनिस्ट तो राजनीतिक तौर पर दुनिया में खत्म हो रहे हैं, फिर उनसे क्यों उम्मीद कर रहे हैं. वे दुनिया में राजनीतिक तौर पर खत्म होंगे भी. उन्होंने मार्क्स के सिद्धांत को ही इकलौते सूत्र के रूप में आत्मसात कर लिया है और उसी से दुनिया में बदलाव चाहते हैं. ऐसा होगा क्या? मार्क्स तो यूरोप में रहते थे. यूरोप से बाहर गए नहीं. उन्होंने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के समय फैक्टरियों की लड़ाई देखी. कहा कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ,  पूंजीपति हार जाएंगे. अब पूंजीपति सिर्फ मजदूरों पर जुल्म तो करते नहीं. वे गांव उजाड़ते हैं, नदी खत्म करते हैं, जंगल खत्म करते हैं, किसानों को खत्म करते हैं, आदिवासियों को उजाड़ते हैं. अब तो सिर्फ फैक्टरी के संघर्ष की बात रही नहीं. लेकिन कम्युनिस्ट अब भी वर्ग संघर्ष के नाम पर सिर्फ मजदूरों के एकीकरण से क्रांति की उम्मीद करते हैं तो उनका फैलाव या उनके जरिए बदलाव होने से रहा. इसलिए आप गौर कीजिए कि वामपंथी दलों के जो ट्रेड यूनियन हैं या मजदूर संगठन हैं, वे अभी भी बहुत मजबूत स्थिति में हैं लेकिन उनका राजनीतिक आधार सिमटता गया.

कास्ट बनाम क्लास में किसे महत्वपूर्ण मानते हैं?

अभी हाल ही में एक आयोजन में गया था. वहां वक्ता के तौर पर बुलाया गया था. विषय था- हिंदी इलाके में वामपंथियों की हालत ऐसी क्यों हुई? उसमें मैंने कास्ट बनाम क्लास पर ही बात कही थी. मैं यह मानता हूं कि जो क्लास है उसे ही इकलौता और मूल आधार नहीं माना जा सकता. क्लास में तो आज जो  मजदूर है वह कल पैसा आने से भूमिहीन न होकर भूपति हो सकता है, फैक्टरी का मालिक बन सकता है. क्लास तो बदलता रहता है लेकिन कास्ट एक स्थायी तत्व है. इसकी शिफ्टिंग नहीं होती. जो हरिजन है, वह हरिजन ही रहेगा. जो भूमिहार है, वह भूमिहार ही रहेगा और उस आधार पर जो सामाजिक भेदभाव होते हैं, वह होते रहेंगे. वामपंथियों ने सिर्फ क्लास फैक्टर को पकड़ा, जो रूप-स्वरूप बदलता रहता है. कास्ट को पकड़ा ही नहीं, इसलिए वे हिंदी इलाके में राजनीतिक तौर पर कमजोर हुए और लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे नेताओं का उदय हुआ, वे बड़े नेता बन भी गए.

लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने तो मिलकर बिहार में सरकार भी बना ली.

हां, वोट के लिए ऐसा मेल-मिलाप होता रहता है. नारे बदलते रहते हैं. कभी सामाजिक न्याय का नारा तो कभी कुछ. लेकिन नीतियां बदलंे तब तो. वैसे मैं नीतीश कुमार के एक काम का असर तो देख रहा हूं. उन्होंने लड़कियों को साइकिल देने का जो फैसला लिया था, उसका असर अब दिख रहा है. नीतीश को उसका फायदा भी मिला. महिलाएं उनके साथ हुईं. लेकिन अभी जो शराबबंदी का फैसला उन्होंने लिया है, वह बहुत हड़बड़ी में लिया. शायद बाद में बुद्धि आए. अब ताड़ी पर भी प्रतिबंध लगा दिया है. एक बड़े समूह के जीविकोपार्जन पर ही रोक लगा दी. किसानों के पास भी बड़ी संख्या में ताड़ आदि के पेड़ हैं, वे उनका क्या करेंगे? ताड़ का कई तरीके से उपयोग किया जा सकता है. इस ओर उन्हें विचार करना चाहिए.

देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

बताया तो पहले ही. प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दुरुपयोग और दोहन देश के भविष्य को दांव पर लगा रहा है. कुछ लोग बहुत ताकतवर हो जाएंगे लेकिन यह देश और दुनिया रहने लायक ही नहीं बचेगी, तब क्या होगा? बाकी सारे मसले तो आते-जाते रहते हैं. यह बेसिक सवाल है, इस पर सोचना चाहिए. अब हम लोग गांधी के सत्याग्रह की शताब्दी वर्ष मना रहे हैं. बस रुककर सोचना चाहिए. गांधी की प्रतिमाएं बनाकर और गांधी के विचारों को मारकर गांधी को याद करने का मतलब नहीं. गांधी के नाम पर स्वच्छता अभियान चलाकर गांधी युग लाने का शोर करने का मतलब नहीं. गांधी को पहले ही डर था कि यह जो पूंजीवादी सभ्यता आएगी, वह शैतानी सभ्यता होगी. इसी शैतानी सभ्यता से बचना और लोगों को बचाना होगा.

‘गांधी’ जो नाव डुबोए…

Photo : Tehelka Archive
फोटो : तहलका आर्काइव
फोटो : तहलका आर्काइव

कहावत है कि राजनीति में कुछ भी पुराना नहीं होता है. भारतीय राजनीति में तो नारे, जुमले, भाषण आदि में से कुछ भी पुराना नहीं हो रहा है. गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसी बातों पर साठ-सत्तर के दशक में जैसे नारे और भाषण दिए जाते थे वैसे आज भी दिए जा रहे हैं. अब कांग्रेस पार्टी का उदाहरण लीजिए. लोकसभा चुनाव से कुछ दिन पहले 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के तुरंत बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘इस चुनाव के माध्यम से जनता ने हमें एक मैसेज दिया है. इस मैसेज को मैंने और पार्टी ने सिर्फ दिमाग से नहीं, दिल से लिया है. कांग्रेस पार्टी में खुद को बदलने की क्षमता है. कांग्रेस के पास यह क्षमता है कि वह लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरे और कांग्रेस पार्टी यह करने जा रही है. हम और हमारे नेता कांग्रेस के संगठन में बदलाव करके एक ऐसी पार्टी आपके सामने लाएंगे जिस पर आपको गर्व होगा. मुझे लगता है आम आदमी पार्टी अपने साथ लोगों को जोड़ने में सफल रही है, जो हम लोग नहीं कर पाए हैं. हम उनसे सीख लेते हुए अपने आप में बेहतर बदलाव करेंगे.’

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को यह भाषण दिए हुए करीब तीन साल का वक्त बीत चुका है. इसके बाद से उनकी सरकार को लोकसभा चुनावों समेत कई राज्यों में पराजय का सामना करना पड़ा है. उस समय देश की अगुआई कर रही पार्टी आज लोकसभा में दहाई के आंकड़ों में सिमट गई है. कहा जाए तो कांग्रेस इतिहास के सबसे खराब दौर में है. दस से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है. लोकसभा में हार के बाद से कई नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है. उसके एक के बाद एक गढ़ ढह रहे हैं. जिन राज्यों में उनकी सरकार हैं, वहां असंतोष की खबरें आ रही हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता के आरोप लग रहे हैं. नेतृत्व के स्तर पर भी असमंजस की स्थिति है. बूढ़े हो चुके नेताओं और नए चेहरों के बीच गुटबाजी चल रही है. विपक्ष के रूप में उसकी भूमिका भी बेहतरीन नहीं रही है. भ्रष्टाचार का आरोप अब भी पार्टी को परेशान कर रहा है.

भाजपा सरकार के दो साल पूरे होने के साथ यह कांग्रेस की हार के दो साल पूरे होने का वक्त है. अब हमें यह भी देखना होगा कि पार्टी ने इन दो सालों में अपने आप में कितना बदलाव किया? बेहद खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस ने अपने पुनरोदय के लिए क्या किया? क्या इस दौरान कांग्रेस ने खुद को मजबूत किया या फिर वह और बुरे दौर में पहुंच गई है. जिन वजहों से उसे हार का सामना करना पड़ा था उन पर कितना काम किया गया?

2014 के मई महीने में ही लोकसभा चुनावों का परिणाम आया था. यानी भाजपा सरकार के दो साल पूरे होने के साथ यह कांग्रेस की हार के दो साल पूरे होने का वक्त है. अब हमें यह भी देखना होगा कि पार्टी ने इन दो सालों में अपने आप में कितना बदलाव किया. बेहद खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस ने अपने पुनरोदय के लिए क्या किया? क्या इस दौरान कांग्रेस ने खुद को मजबूत किया या फिर वह और बुरे दौर में पहुंच गई है? जिन वजहों से उसे हार का सामना करना पड़ा था, उन पर कितना काम किया गया? राहुल गांधी ने अपने द्वारा कही गई बातों पर कितना अमल किया और जनता के साथ उनका संवाद कितना बेहतर हुआ है या अगले तीन साल में कांग्रेस ऐसा क्या करेगी जिससे वह दोबारा सत्ता के करीब होती नजर आए?

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, ‘2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद से कांग्रेस और कमजोर हुई है. इन दो सालों के दौरान राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा है. इन दौरान महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली जैसे कई राज्य उसके हाथ से फिसल गए हैं. कांग्रेस के लिए सिर्फ बिहार से कुछ अच्छी खबर आई, लेकिन इसका भी श्रेय उसके सहयोगी पार्टियों जेडीयू और राजद को जाता है. फिलहाल अभी कांग्रेस के लिए संतोष करने लायक कुछ भी नहीं है. हालांकि अगले कुछ सालों में कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में जाने से पहले कांग्रेस को इन राज्यों में जीत हासिल करनी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन से लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा. कांग्रेस के पास भाजपा से बड़ा संगठन है लेकिन राज्य उसके हाथों से फिसल रहे हैं तो इसका असर पार्टी और संगठन दोनों पर पड़ेगा. कांग्रेस के साथ यह दिक्कत है कि उसके पास कई राज्यों में स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा नेता नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार में उनके पास कोई बड़ा नाम नहीं है. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट जैसे नाम हैं, लेकिन उन्हें आगे बढ़ाने का काम पार्टी को करना पड़ेगा. लेकिन राहुल गांधी के सामने उन्हें कितनी तवज्जो पार्टी में दी जाएगी यह देखने वाली बात होगी. कुछ मिलाकर कांग्रेस पार्टी अभी कई विसंगतियों का शिकार है. उसे इसका तोड़ ढूंढ़ना होगा. इसका एक विकल्प परिवार के बाहर के कुछ नेताओं को तवज्जो देकर आगे बढ़ाने का भी हो सकता है.’

फोटो : विजय पांडेय
फोटो : विजय पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई इन दो सालों को अलग तरीके से देखते हैं. वे कहते हैं, ‘एक कहावत है रस्सी जल गई लेकिन बल नहीं गए. कांग्रेस में किसी ने भी हार की स्पष्ट जिम्मेदारी नहीं ली है. जो भी लोग 2014 की हार के लिए जिम्मेदार थे, वे आज भी अहम पदों पर बने हुए हैं. इसके चलते बहुत सारे कार्यकर्ताओं और विधायकों में असंतोष है, जो विभिन्न राज्यों में टूट के रूप में सामने आ रहा है. लोकसभा चुनावों में हार के लिए जिम्मेदार नेता वास्तव में नहीं चाहते हैं कि शीर्ष नेतृत्व कभी उन पर कोई कार्रवाई करे. कुल मिलाकर चाटुकारों का यह धड़ा शीर्ष नेतृत्व को नीचे स्तर पर संवाद करने ही नहीं दे रहा है. शीर्ष नेतृत्व के साथ यह दिक्कत है कि उसे लगता है कि ये लोग हटें तो उसे दिक्कत हो जाएगी. क्योंकि एक युवा टीम इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं है.’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार मनोहर नायक कहते हैं, ‘अगर पुराने राजवंशों की कमियों की झलक आज देखनी हो तो आप कांग्रेस को देख सकते हैं. यह पार्टी उन सारी बुराइयों का शिकार हो गई है. परिवारवाद, गुटबाजी, चुगलखोरी, भितरघात, आपसी कलह से सब इस पार्टी में दिख रहे हैं. सबसे खराब बात यह है कि पार्टी इन सबमें सुधार के लिए कुछ नहीं कर रही है. वह पिछले दो साल से इस इंतजार में बैठी है कि भाजपा सरकार बुरा करेगी तो हमारा भला होगा.’

‘कांग्रेस नेता एके एंटनी ने एक बात कही थी कि पार्टी की हिंदूविरोधी छवि बन रही है तो इसके बाद यह हुआ कि राहुल गांधी कुछ मंदिरों में घूम आए. मतलब आप जनता से संवाद करने के बजाय छवि बनाने के लिए मंदिर और मस्जिद की शरण ले रहे हैं. यह भी राजनीति को निचले स्तर पर ले जाने वाली बात हुई. फिलहाल कांग्रेस अभी वह सूत्र नहीं पकड़ पा रही है जो उसे मजबूती दे’

हालांकि विश्लेषकों के इस नजरिये से कांग्रेस के नेता इनकार करते हैं. कांग्रेस सचिव नसीब सिंह कहते हैं, ‘हम सब लोग मिलकर बेहतर काम कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर और उन राज्यों में जहां हम सत्ता में नहीं हैं पार्टी एक अच्छे विपक्ष की भूमिका अदा कर रही है. इन जगहों पर हम सरकार की कमियों को जोर-शोर से उजागर कर रहे हैं. हमने हार से सबक लिया है और पार्टी में बदलाव की प्रक्रिया जारी है. जहां भी लोग निष्क्रिय थे उन्हें हटाकर सक्रिय लोगों को लाने का काम पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा किया गया है. यह काम लगातार चल रहा है. हमें बहुत सारा बदलाव देखने को भी मिल रहा है. हाल के चुनावों में जिन राज्यों में हमें हार का सामना करना पड़ा है वहां दो-दो, तीन-तीन बार हमारी सरकारें रही हैं. ऐसे में वे राज्य हमारी बपौती नहीं थे. लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं. इसमें किसी एक पार्टी के पास ठेका थोड़े ही रहता है. यह सिर्फ एंटी इनकंबेंसी का मामला है.’

वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, ‘कांग्रेस पूरे देश में अपना जनाधार बढ़ा रही है. बिहार को देख लीजिए, गुजरात में हुए स्थानीय चुनावों में हमारा प्रदर्शन बेहतर रहा है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुए विधानसभा उपचुनावों में हमने बढ़िया प्रदर्शन किया है. तो कुल मिलाकर पिछले दो साल में मामला संतोषजनक है.’

कांग्रेस से जुड़े नेताओं का कहना है कि इन दो सालों के दौरान कांग्रेस पार्टी जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से मेलजोल भी बढ़ा रही है. इंडियन यूथ कांग्रेस के पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के सचिव श्रीनिवास बीवी कहते हैं, ‘इन दो सालों के दौरान कांग्रेस ने जमीनी स्तर पर बहुत सारा काम किया है. यह काम पिछले कुछ सालों में बंद था. अब आप उत्तर प्रदेश को ही लें. इन दो सालों में हमने सारी विधानसभाओं का दौरा किया है. हमारा प्रयास है कि हर बूथ पर युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता तैनात रहें. इस दौरान हमें अपार जनसमर्थन भी मिल रहा है. बड़ी संख्या में युवा हमारे साथ जुड़ रहे हैं. लोगों ने हमारे ऊपर भरोसा किया है और अब भी उनकी उम्मीदें हमसे जुड़ी हुई हैं. देश की जनता को पता है कि हम उनके एकमात्र विकल्प हैं.’

कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत नेतृत्व को लेकर है. राहुल गांधी अब भी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद और उसके पहले भी हर दो-तीन महीने पर ऐसी खबरें आती रही हैं कि वे अध्यक्ष बनने वाले हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बीमार होने के बावजूद अभी कमान सोनिया गांधी के हाथ में है. पार्टी के वरिष्ठ नेता अभी राहुल के साथ कम ही दिखाई देते हैं.

कांग्रेस पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक इस पर कहते हैं कि कांग्रेस में लीडरशिप को लेकर भ्रम की स्थिति है. राहुल गांधी ने अभी पूरे तरीके से कमान संभाली नहीं है और सोनिया गांधी इस इंतजार में अब भी बैठी हैं कि वे सत्ता कब राहुल को सौप दें. इसके अलावा शीर्ष स्तर पर जो नेता हैं जैसे जर्नादन द्विवेदी, अहमद पटेल, मनमोहन सिंह, एके एंटनी आदि उनका संवाद सोनिया के साथ तो बेहतर है लेकिन वे राहुल गांधी के साथ सामंजस्य बिठा पाने में असफल रहे हैं. यानी अभी कांग्रेस को पुरानी लीडरशिप ही चला रही है. नई लीडरशिप जिसका आना बहुत जरूरी है, वह कमजोर ही रह गई है. राहुल गांधी की एक खराबी यह भी है कि वे लोकसभा में नियमित रूप से बोलते भी नहीं हैं. वहां कांग्रेस की तरफ से मोर्चा सिर्फ मल्लिकार्जुन खड़गे संभालते हुए दिखते हैं. इसके मुकाबले राज्यसभा में आनंद शर्मा, गुलाम नबी आजाद और अंबिका सोनी ज्यादा बढ़िया ढंग से सरकार को चुनौती देते नजर आते हैं. यानी पार्टी के नेता के रूप में जो आभामंडल उनको बनाना चाहिए वह बनाने में वे बुरी तरह से असफल रहे हैं. राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस और देश को निराशा ही हो रही है. सोनिया गांधी अनंत काल तक कांग्रेस का नेतृत्व नहीं कर सकती हैं.

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इस पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘हार-जीत तो राजनीति का एक हिस्सा है, लेकिन अभी कांग्रेस की स्थिति शुतुरमुर्ग की तरह हो गई है. जैसे वह खतरा देखते ही मिट्टी में अपना सिर छिपा लेता है वैसे ही कांग्रेस खतरे को देखकर झोल-मोल वाली स्थिति में आ जाती है. कांग्रेस इससे पहले भी इंदिरा और राजीव के जमाने में हारी थी, लेकिन इस बार की हार से कांग्रेस का आत्मविश्वास डगमगा गया है. इसमें सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व को लेकर है. इसे सुलझाने का प्रयास कभी नहीं किया गया. 2004 में ही सोनिया गांधी ने कह दिया था कि वे प्रधानमंत्री पद की दावेदार नहीं हैं. अभी हमारे यहां जो प्रणाली चल रही है उसके हिसाब से पार्टी नहीं प्रधानमंत्री पद के दावेदार को भी ध्यान में रखकर जनता वोट देती है. अब ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि 2019 में कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री का दावेदार कौन होगा. अभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं. राहुल गांधी नेता के रूप में सबके सामने हैं लेकिन उनके नाम की विधिवत घोषणा नहीं की गई है. इसको लेकर क्या कारण हैं इसका खुलासा नहीं हुआ है.’

‘प्रशांत किशोर जी का अलग रोल है. अब जमाना बदला है. ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य माध्यम ज्यादा प्रभावी रोल अदा कर रहे हैं. इन्हें मैनेज करने में पार्टी की मदद करने के लिए उन्हें लाया गया है. ऐसा नहीं है कि पार्टी में उनको जगह दी जा रही है. वे सिर्फ सहायक की भूमिका में हैं. उत्तर प्रदेश में हमारी स्थिति थोड़ी खराब थी ऐसे में उनकी सेवाएं लेकर हम खुद को बेहतर बनाएंगे’

इसके अलावा कांग्रेस की एक समस्या परिवारवाद भी है. कुछ विश्लेषक कांग्रेस के पतन का कारण परिवारवाद बताते हैं. उनका मानना है कि कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि पार्टी परिवार के बाहर के लोगों को आगे बढ़ाना नहीं चाहती है. उसे लगता है कि इससे पार्टी में टूट हो सकती है. राशिद किदवई कहते हैं, ‘परिवारवाद कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी और मजबूरी है. गांधी परिवार के बगैर वह एकजुट नहीं रहेगी तो परिवार घोटालों में फंस रहा है. कार्यकर्ता उम्मीद लगाए बैठा है कि शीर्ष नेतृत्व से उसे कुछ बेहतर बदलाव के संकेत मिले तो गांधी परिवार चाह रहा है कि पार्टी भ्रष्टाचार के मामलों पर उसका बचाव करे. इस चक्कर में लीडरशिप गायब है. राहुल को अभी पूरी तरह से कमान सौंपी नहीं गई है. यह भी उलझन पैदा करता है. अभी कांग्रेस में शीर्ष 150 लोगों में वही लोग शामिल हैं जिन्हें सोनिया गांधी लाई थी. राहुल जब कमान संभालेंगे तो इनमें इनके लोग शामिल होंगे. वे जीत और हार की जिम्मेदारी लेंगे लेकिन यह हो नहीं रहा है. ऐसा नहीं है कि इन लोगों से राहुल का कोई मतभेद है. पर हमें ऐसा देखने को मिलता है. जब इंदिरा ने कमान संभाली तो जवाहरलाल नेहरू के करीबी संगठन से दूर हुए. इसके अलावा जब राजीव नेता बने तो संजय गांधी द्वारा लाए गए लोग दूर हुए. सोनिया के आने पर भी ऐसा हुआ. अब राहुल गांधी के आने के बाद भी यह होगा लेकिन इसमें जितना वक्त लगेगा कार्यकर्ताओं में उतनी ही निराशा फैलेगी. वैसे भी टीम राहुल और टीम सोनिया में एक तरह की अंतर्कलह चल रही है. एक समूह कोई नया आइडिया लेकर आता है तो दूसरा उसे खारिज कर देता है.’

हालांकि बेनी प्रसाद वर्मा इन आरोपों को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘जहां तक नेतृत्व पर सवाल उठाया जा रहा है तो हम जहां तक महसूस किए हैं सोनिया और राहुल गांधी दोनों का कांसेप्ट क्लियर है. उन्हें पता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. दरअसल कांग्रेस का उत्थान तो होना ही है. वह आज होगा या कल होगा इसकी परवाह शीर्ष नेतृत्व को नहीं है. अब क्षेत्रीय पार्टियां तो हर चीज के लिए जल्दबाजी में रहती हैं लेकिन कांग्रेस कभी जल्दबाजी में नहीं रहती है.’

दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद दिए गए अपने भाषण में राहुल गांधी ने संगठन में सुधार करने की बात की थी. हालांकि पिछले काफी समय में कांग्रेस संगठन की कोई बैठक नहीं हुई है. न ही पार्टी पदाधिकारियों की स्थिति में बड़े पैमाने पर बदलाव किया गया है. राहुल गांधी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 2014 में पार्टी की करारी हार के बावजूद वे कार्यशैली में बदलाव लाने में असफल रहे हैं. जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में चितंन शिविर करने की परंपरा रही है. इस दौरान संगठन की बैठक होती है, लेकिन आखिरी शिविर बुराड़ी में 2010 में लगा था. इसके बाद ढंग से एक बैठक जयपुर में लोकसभा चुनावों से पहले हुई थी. चुनाव में हार के दो साल बीत चुके हैं. कांग्रेस संगठन की कोई बैठक ही नहीं हो रही है.

Photo : Tehelka Archive
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‘कांग्रेस निश्चित तौर पर इस समय बेहाल स्थिति में है. भ्रष्टाचार के आरोप उसके ऊपर साबित हो या न हो लेकिन इसका संदेह ही उसे राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है. भाजपा इस समय सरकार में है. संघ जैसा राष्ट्रव्यापी संगठन उसके पास है. वह संगठित और सुव्यवस्थित तरीके से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने का काम करेगी. भाजपा यह चाहेगी कि अगस्ता वेस्टलैंड मामले में जल्दी कुछ परिणाम न आए’

प्रमोद जोशी कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने प्राइमरी की बात की थी यानी कि कार्यकर्ताओं से पूछा जाएगा कि चुनाव में प्रत्याशी कौन बनेगा. यह एक अच्छा प्रयास था लेकिन यह विफल रहा. फिर कुछ दिनों बाद से ही हाईकमान ने खुद ही फैसले लेना शुरू कर दिया. संगठन का दूसरा चुनाव 2015 मार्च-अप्रैल तक होना था, वह चुनाव हुआ. राहुल गांधी को अध्यक्ष बनना था पर वे बने नहीं मतलब राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रयास भी विफल रहा. अब अगर राष्ट्रीय स्तर पर ही चीजें सुव्यवस्थित नहीं रहें तो नीचे के स्तर पर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कार्यकर्ताओं यहां तक कि विधायकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर के नेता उनसे मिलते ही नहीं हैं. मणिपुर कांग्रेस में जो विवाद हुआ वह यही था. उस दौरान विधायकों ने आरोप लगाया कि हम तीन हफ्ते तक राहुल गांधी से मिलने का इंतजार करते रहे लेकिन उन्होंने मिलने का वक्त ही नहीं दिया. यही हिमाचल प्रदेश में हो रहा है. कुछ ऐसा ही उत्तराखंड में देखने को मिला जहां बागी विधायकों ने आरोप लगाया कि नेतृत्व उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हो रहा है. अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक के विधायकों की यही शिकायत रही है.

अब शीर्ष स्तर पर ही नेतृत्व को मजबूत नहीं बनाएंगे तो संगठन में निचले स्तर पर बुरा प्रभाव पड़ता है और कार्यकर्ता ही आपकी बात जनता तक पहुंचाता है. इसके अलावा कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कहा था कि वे हार के कारणों पर मंथन करेंगे पर ऐसा कोई मंथन हुआ या नहीं हुआ पता नहीं चल पाया है. दरअसल ऐसा मंथन अंदरूनी होता भी है. निस्संदेह इसमें कांग्रेस की कमजोरियां सामने आएंगी और पार्टी चाहेगी कि यह सार्वजनिक न हो. लेकिन एक बार एके एंटनी ने एक बात जरूर कही थी कि पार्टी की हिंदूविरोधी छवि बन रही है तो इसके बाद यह हुआ कि राहुल गांधी कुछ मंदिरों में घूम आए. मतलब आप जनता से संवाद करने के बजाय छवि बनाने के लिए मंदिर और मस्जिद की शरण ले रहे हैं. यह भी राजनीति को निचले स्तर पर ले जाने वाली बात हुई. फिलहाल कांग्रेस अभी वह सूत्र नहीं पकड़ पा रही है जो उसे मजबूती दे.’

हालांकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता और कांग्रेस से जुड़े रमेश यादव इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता अपने शीर्ष स्तर के नेताओं से नहीं मिल पाते हैं. हर पार्टी में कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की एक प्रक्रिया होती है और यह प्रक्रिया एक दिन में नहीं निर्मित होती है. आप दिल्ली में रहने वाले किसी भी शीर्ष नेता से वक्त लेकर मुलाकात कर सकते हैं और यह बेहद आसान है. मैं इलाहाबाद में रहता हूं और कांग्रेस के किसी भी नेता से दिल्ली में वक्त लेकर मिल सकता हूं और मिलता रहा हूं. कांग्रेस का संगठन बहुत बड़ा है. इतना बड़ा संगठन होने पर तमाम कमियां होती रहती हैं लेकिन संवादहीनता का जो आरोप लगाया जा रहा है वह गलत है. दरअसल ऐसे विधायक जो दूसरी पार्टियों से डील कर चुके होते हैं वो ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाकर पार्टी को बदनाम करने की कोशिश करते हैं.’

इसके अलावा कांग्रेस और उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले किसी से छिपे नहीं हैं. यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों की कतार लग गई थी. कांग्रेस सत्ता से दो साल से दूर है लेकिन आज भी भ्रष्टाचार का मसला उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है. अगस्ता वेस्टलैंड के मामले पर एक बार वह फिर बैकफुट पर है.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ‘कांग्रेस निश्चित तौर पर इस समय बेहाल स्थिति में है. भ्रष्टाचार के आरोप उसके ऊपर साबित हो या न हो लेकिन इसका संदेह ही उसे राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है. भाजपा इस समय सरकार में है. उसके पास मशीनरी है. संघ जैसा राष्ट्रव्यापी संगठन उसके पास है. वह संगठित और सुव्यवस्थित तरीके से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने का काम करेगी. भाजपा यह चाहेगी कि अगस्ता वेस्टलैंड मामले में जल्दी कुछ परिणाम न आए ताकि वह कांग्रेस को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाती रहे. सोनिया गांधी का इटली से कनेक्शन भी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है. मजेदार यह है कि इटली का जो कनेक्शन भाजपा के लिए हानिकारक होना चाहिए वह उल्टा हो रहा है. मतलब मुसोलिनी के फासीवाद से भाजपा और संघ के जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है. भाजपा की भी समझ में आ रहा है कि उन्हें भ्रष्टाचार का मामला धर्म और राष्ट्र के मसले से ज्यादा फायदा दे रहा है, इसलिए वह इस आरोप को बरकरार रखना चाह रही है.’

वैसे भी जहां तक बात भ्रष्टाचार की है तो कांग्रेस हमेशा नुकसान की स्थिति में रहती है. अब अगस्ता का मामला ले लीजिए. कानूनी तौर पर इसमें सोनिया गांधी का नाम कहीं नहीं है लेकिनराजनीतिक तौर पर इसका फायदा भाजपा उठा रही है. अब कांग्रेस भले ही कहे कि इसमें सोनिया शामिल नहीं हैं पर भाजपा यह समझा रही है कि इटली की अदालत ने सोनिया गांधी का नाम लिया है. इससे पहले बोफोर्स जैसा मामला हो गया है तो जनता आसानी से यह बात मान लेती है.

जानकार कहते हैं कि अगस्ता वेस्टलैंड का मामला भाजपा अब तीन साल तक चलाएगी. 2010 में कॉमनवेल्थ घोटाले का खुलासा हुआ था और उस समय कहा जा रहा था कि भाजपा 2014 तक इसे कैसे चलाएगी. लेकिन बाद में टूजी, कोल, रेलवे भर्ती, जमीन के घोटाले आते रहे और मामला लोकसभा चुनाव तक पहुंच गया. मजेदार यह है कि आज जब कांग्रेस विपक्ष में है तब भी घोटाला करने का आरोप उसी पर लग रहा है. जाने-अनजाने कांग्रेस की छवि भ्रष्टाचार करने वाली पार्टी की बन गई है. अब जैसे रॉबर्ट वाड्रा का मामला है. उनके खिलाफ कोई केस अभी तक फाइल नहीं हुआ है लेकिन आरोप लगता रहता है कि उन्हें कम दामों पर जमीन दी गई. हालांकि भ्रष्टाचार के मसले पर पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है. वह इसे सिर्फ कांग्रेस को बदनाम करने वाली साजिश के रूप में देखते हैं.

अमेठी के रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक और कांग्रेस के कार्यकर्ता राम पियारे कहते हैं, ‘राजनीतिक रूप से भ्रष्टाचार जनता के लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं है. सभी को पता है कि ऐसे आरोप सिर्फ वोट लेने-देने के लिए लगाए जाते हैं. जनता अब समझ चुकी है कि भ्रष्टाचार का पाखंड करके भाजपा ने सत्ता तो हथिया ली लेकिन उसे सिर्फ बेवकूफ बनाया गया है. पिछले दो सालों में किसी भी कांग्रेसी नेता के ऊपर मुकदमा नहीं दायर किया गया है. जितने भी मामले चल रहे हैं वे पूर्व की कांग्रेस सरकार द्वारा ही दायर किए गए थे. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ भाजपा का पाखंड तोड़ पाने में असफल रही है. भले ही आज कांग्रेस को भ्रष्टाचार करने वाली पार्टी कहा जा रहा है लेकिन यह सच नहीं है. देश भर में हम जैसे गांधीवादी कार्यकर्ता और नेता भी इसी पार्टी से जुड़े हुए हैं. जो लोग कांग्रेस के कुछ भ्रष्ट लोगों के चलते पूरी पार्टी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं वे लोग इतिहास नहीं जानते. कांग्रेस एक संगठन नहीं, बल्कि सोच है जो हमारे दिल में है. दिमाग में है. यह भाईचारे, प्रेम, धर्मनिरपेक्षता, विकास और सबको साथ लेकर चलने की सोच है.’

Photo : Tehelka Archive
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कांग्रेस पार्टी भाजपा का पाखंड तोड़ पाने में असफल रही है. शायद इसी सोच के चलते हाल में उसने चुनावों का मैनेजमेंट करने वाले प्रशांत किशोर की सेवाएं ली हैं. हालांकि कांग्रेस एक ऐसी पार्टी  है जिसके पास पूरे देश भर में संगठन है. भले ही वह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हो. आपको देश के हर हिस्से में कांग्रेस के लोग मिल जाएंगे. कई दशकों तक कांग्रेस ने देश पर राज किया है. ऐसी पार्टी द्वारा प्रशांत किशोर की सेवाएं लिए जाने को राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिये से देख रहे हैं. उनका कहना है कि प्रशांत किशोर आइडियोलॉजिकल व्यक्ति नहीं बल्कि मैनेजर हैं. वे मोदी, नीतीश के लिए काम कर चुके हैं अब वे कांग्रेस के लिए काम करेंगे. कल हो सकता है वे फिर मोदी के लिए काम करें. दूसरी बात हमें यह देखनी है कि प्रशांत किशोर करते क्या हैं. वह जो काम कर रहे हैं वह तो कायदे से पार्टी कार्यकर्ता का है. अब अगर पेड वर्कर लेकर आप काम करेंगे तो ऐसे कार्यकर्ताओं पर बुरा असर भी पड़ेगा जो आपके लिए मुफ्त में काम करते रहे हैं. इसके अलावा वे नारे दे सकते हैं, बैनर बना सकते हैं, सोशल मीडिया कैंपेन चला सकते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से लोगों को जोड़ने का काम तो पार्टी को ही करना होगा. अगर प्रशांत किशोर यह भी करेंगे तो यह लोकतंत्र के लिए तो खतरनाक है ही कांग्रेस के लिए बहुत बुरा है.

‘कांग्रेसी नेता आपस में मजाक करते हैं कि बीजेपी के मंत्री हमें सत्ता में लाने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं. भाजपा इसलिए हाथ पर हाथ रखकर बैठी थी कि कांग्रेस उसके लिए सत्ता का रास्ता खोल देगी. कांग्रेस इसलिए हाथ पर हाथ रखे बैठी है कि भाजपा उसके लिए सत्ता का रास्ता खोल देगी. तो हमारे यहां ये विपक्ष की भूमिका हैे. कम्युनिस्ट पार्टियों की हालत खस्ता है. जो क्षेत्रीय शक्तियां हैं, उनकी केंद्र में कोई दावेदारी नहीं है’

पत्रकार अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने में बुराई नहीं है लेकिन कार्यकर्ताओं को जोड़ने का काम हमेशा पार्टी का नेतृत्व करता है. अभी भारत में जनता पार्टियों को वोट करती है. आप जुमले गढ़कर, बैनर-पोस्टर लगाकर कितने लोगों को अपने साथ जोड़ पाएंगे यह देखने वाली बात होगी. उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस के इस प्रयोग का भी खुलासा हो जाएगा.’

वैसे भी राजनीति में सफलता बहुत मायने रखती है. राहुल गांधी अपनी छवि को बदलने के लिए तमाम प्रयोग पहले भी कर चुके हैं. ऐसे में उनकी टीम द्वारा उन्हें यह सुझाव दिया गया है कि एक बार जो प्रयोग सफल रहा है उसको आजमाकर देखा जाए तो वे प्रशांत किशोर की शरण में आ गए हैं. उन्हें लगता है कि अगर वे एक बार सफल हो गए तो तमाम आरोप जो उन पर लग रहे हैं उनसे उन्हें निजात मिल जाएगी. पार्टी में भी उनके कद को लेकर सवाल उठना बंद हो जाएगा. हालांकि प्रशांत किशोर जो काम अब पैसा लेकर करेंगे ऐसे कैंपेन की अगुआई कांग्रेस के कई नेता जैसे दिपेंदर हुड्डा, संदीप दीक्षित आदि और कार्यकर्ता बिना पैसे लेकर कर रहे थे. इस बात से पार्टी के नेताओं में असंतोष भी फैलेगा और उनमें अपने कद को लेकर असुरक्षा की भावना भी विकसित होगी.

हालांकि कांग्रेस के नेता इसे मानने से इनकार करते हैं. नसीब सिंह कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर जी का अलग रोल है. अब जमाना बदला है. ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और दूसरे अन्य माध्यम ज्यादा प्रभावी रोल अदा कर रहे हैं. इन्हें मैनेज करने में पार्टी की मदद करने के लिए उन्हें लाया गया है. ऐसा नहीं है कि पार्टी में उनको जगह दी जा रही है. वे सिर्फ सहायक की भूमिका में हैं. उत्तर प्रदेश में हमारी स्थिति थोड़ी खराब थी ऐसे में उनकी सेवाएं लेकर हम खुद को बेहतर बनाएंगे.’ तो बेनी प्रसाद वर्मा कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर से अभी हमारी मुलाकात नहीं हुई है. सुना है कि उसने नीतीश और मोदी की बढ़िया पब्लिसिटी की है. अब उसके आने के बाद से उत्तर प्रदेश में हर दिन हमारी कोई न कोई खबर होती है. यह बढ़िया बात है.’

कांग्रेस पार्टी पिछले दो साल से विपक्ष में है. विश्लेषक इस दौरान भी उसकी भूमिका को लेकर सवाल उठाते हैं. पिछले साल सोनिया गांधी पार्टी के सवालों को लेकर दो बार सड़कों पर भी उतरीं. इससे पार्टी कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ा, पर इतना पर्याप्त नहीं था. हाल ही में वे अगस्ता वेस्टलैंड के मुद्दे पर जंतर-मंतर पर थीं लेकिन यह अटैक से ज्यादा बचाव का मामला था. लोकसभा चुनावों में हार के बाद लंबे अज्ञातवास से वापस आए राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की आक्रामकता पिछले साल संसद के मानसून और शीत सत्र में दिखाई पड़ी. पार्टी ने छापामार रणनीति का भी सहारा लिया पर यह भी सड़कों पर नजर नहीं आया. कांग्रेस की विपक्ष की भूमिका और विपक्ष की पूरी राजनीति पर राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कुछ सवाल खड़े करते हैं. वे कहते हैं, ‘मेरा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि विपक्ष की भूमिका कैसे निभाई जाए, ये लोग बिल्कुल भूल गए हैं. भाजपा दस साल तक विपक्ष में थी. विपक्ष के तौर पर उसकी भूमिका ठीक नहीं थी. उसके नेताओं पर आरोप लगते थे कि वे सोनिया गांधी की पे-रोल पर हैं. जो लोग दस साल तक विपक्ष के नेता की भूमिका में रहे, उनमें से कोई ऐसा नहीं निकला जो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन सके. जो केंद्र में विपक्ष की भूमिका में नहीं था, जो गुजरात में सत्ता में था, उसको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया. उस समय विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेटली थे. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो इनके बीच से आना चाहिए था. यही एक अपने आप में सबसे बड़ी आलोचना है कि भाजपा ने विपक्ष की भूमिका कितने खराब तरीके से निभाई. कांग्रेस की विफलताओं की वजह से भाजपा को बहुमत प्राप्त हो गया. दूसरे, क्षेत्रीय शक्तियों की कमजोरी से. भाजपा ने तो कोई ऐसा काम नहीं किया. चुनाव अच्छी तरह लड़ा, यह सही बात है, लेकिन दस साल तक कोई ऐसा उल्लेखनीय काम नहीं किया जो विपक्ष में रहकर करना चाहिए था. अब यही कांग्रेस कर रही है. कांग्रेसी नेता आपस में मजाक करते हैं कि बीजेपी के मंत्री हमें सत्ता में लाने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं. भाजपा इसलिए हाथ पर हाथ रखकर बैठी थी कि कांग्रेस उसके लिए सत्ता का रास्ता खोल देगी. कांग्रेस इसलिए हाथ पर हाथ रखे बैठी है कि भाजपा उसके लिए सत्ता का रास्ता खोल देगी. तो हमारे यहां ये विपक्ष की भूमिका है. कम्युनिस्ट पार्टियों की हालत खस्ता है. जो क्षेत्रीय शक्तियां हैं उनकी केंद्र में कोई दावेदारी नहीं है. विपक्ष की भूमिका निभाने वाली जो आम आदमी पार्टी है, वह भी छोटी पार्टी है, छोटे स्टेट में आधी-अधूरी सरकार है. वह कुछ आवाज उठाती रहती है. दरअसल विपक्ष की राजनीति हो नहीं रही है.’

Photo : Tehelka Archive
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वहीं विपक्षी दलों को एकजुट करके नेतृत्व करने में भी कांग्रेस कई बार असफल दिखाई देती है. जदयू, राजद से गठजोड़, उत्तर प्रदेश में साथी दल की तलाश, बंगाल में वाम दलों का सहारा या फिर संसद में विभिन्न दलों को साथ लेकर चलने की कवायद इसी का परिणाम है. कांग्रेस को यह लग रहा है कि वह अभी भाजपा का सीधा मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है. कांग्रेस के लिए फायदेमंद बात यह है कि अभी तमाम क्षेत्रीय दलों की सहानुभूति उसके साथ है. डीएमके, राजद, जदयू, रालोद, बसपा, वाम दल अभी उसके साथ खड़े नजर आ जाते हैं. जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को उत्थान के लिए क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना पड़ेगा. कांग्रेस को एकला चलने का सिद्धांत छोड़ना पड़ेगा. उसके लिए नुकसानदेह बात यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल गांधी अभी कांग्रेस का नेता नहीं बन पा रहे हैं. अभी सारा दारोमदार सोनिया गांधी पर है. वही पार्टी को अपने तरीके से आगे बढ़ा रही हैं.

हालांकि राशिद किदवई इसे दूसरे तरीके से देखते हैं. वे कहते हैं, ‘कांग्रेस के पास विभिन्न मुद्दों को लेकर स्पष्टता का अभाव है. अभी वह यह नहीं समझ पा रही है कि उसे धर्मनिरपेक्ष पार्टी रहना है कि उसका झुकाव हिंदुओं या मुसलमानों की तरफ रहे. भाजपा और संघ इस मामले में बाजी मार जाते हैं. उनका एजेंडा स्पष्ट है. भले ही वह सही या गलत हो. ऐसा आप राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ को लेकर भी देख सकते हैं. कांग्रेस बंगाल में वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है, तो केरल में उन्हीं के खिलाफ मैदान में है. अब यह गठजोड़ किस बुनियाद पर किया गया है. यह समझ में नहीं आता है. यह कार्यकर्ताओं के लिए भ्रम की स्थिति पैदा करता है.’

‘अभी इस पार्टी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अगर यहां कुछ गलत भी हो रहा है तो हमारे सामने ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके सामने अपनी बात कह सकें और सुधार की उम्मीद कर सकें. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक आत्मकेंद्रित और चाटुकार तंत्र के नियंत्रण में है. कोई भी अगर इस तंत्र को चुनौती देने की कोशिश करता है तो सब मिलकर उसको निपटा देते हैं’

हालांकि कांग्रेस के साथ परेशानियां और भी हैं. दिल्ली के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है, ‘अभी इस पार्टी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अगर यहां कुछ गलत भी हो रहा है तो हमारे सामने ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके सामने अपनी बात कह सकें और सुधार की उम्मीद कर सकें. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक आत्मकेंद्रित और चाटुकार तंत्र के नियंत्रण में हैं. कोई भी अगर इस तंत्र को चुनौती देने की कोशिश करता है तो सब मिलकर उसको निपटा देते हैं. यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है. इस कारण कोई सही बात करने की हिम्मत ही नहीं कर पाता है. इस सबका परिणाम यह हुआ है कि आत्मकेंद्रित, आत्मसंतुष्ट, दंभी और चाटुकार नेताओं का अखाड़ा बन गई है. यही कारण है कि पार्टी अपने पतन के शीर्ष पर है.’

हालांकि वक्त बुरा हो तो कई चुनौतियां सामने खड़ी हो जाती है. कांग्रेस के साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है. हालांकि पार्टी के भीतर बदलाव के लिए अब भी वक्त है. कई राज्यों में चुनाव होने हैं जहां बेहतर करके कांग्रेस भाजपा का खेल बिगाड़ सकती है. देश में अगले साल हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा विधानसभाओं के चुनाव होंगे. कांग्रेस को पंजाब में कुछ उम्मीद हो सकती है. पर सफलता तभी मानी जाएगी जब वहां उसकी सरकार बने. राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से उत्तर प्रदेश और गुजरात के चुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे. कांग्रेस ने यहां के लिए तैयारियां भी शुरू कर दी हैं. परिणाम अगर उसके पक्ष में रहे तो निस्संदेह 2019 के लोकसभा चुनावों की तस्वीर दूसरी होगी. इसके अलावा 2017 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव भी होंगे. इन चुनावों से कांग्रेस के रसूख का पता लगेगा. राज्यसभा में कांग्रेस की बढ़त धीरे-धीरे कम होती जाएगी. अभी तक कांग्रेसी राजनीति का बड़ा सहारा यह सदन है. अगले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले 2018 में जिन राज्यों के चुनाव होंगे वे माहौल बनाएंगे. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर है. यहां कांग्रेस की असली परीक्षा होगी. कर्नाटक में प्रतिष्ठा की लड़ाई होगी, क्योंकि यही एक बड़ा राज्य अभी कांग्रेस शासित है. दरअसल कांग्रेस को अगर सफल होना है तो इन राज्यों पर अभी से ध्यान देना होगा. अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘कांग्रेस को पुनरोदय के लिए कोई बहुत बड़ा काम नहीं करना है. उसे बस आगामी तीन सालों में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों पर ध्यान देना है. इन राज्यों में यदि वह बेहतर प्रदर्शन करती है तो यह प्रदर्शन उसके लिए ताकत के टैबलेट का काम करेगा. अगर ऐसे ढेर सारे टैबलेट कांग्रेस ने जुटा लिए तो 2019 की तस्वीर दूसरी होगी.’

गलत नक्शा दिखाने पर 7 साल जेल!

अब भारतीय मानचित्र का गलत चित्रण करना भारी पड़ सकता है. केंद्र सरकार इस संबंध में एक विधेयक तैयार कर रही है. इसके पारित हो जाने के बाद कंपनियां और एजेंसियां सरकार की तरफ से बिना लाइसेंस के कोई मैप ऑनलाइन नहीं दिखा सकेंगी. इस विधेयक के अनुसार भारत का गलत नक्शा दिखाने वालों को अधिकतम सात वर्ष की जेल हो सकती है और उन पर 100 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. भू-स्थानिक सूचना नियमन विधेयक, 2016 के मसौदे के अनुसार भारत से जुड़ी किसी भू-स्थानिक सूचना को प्राप्त करने, उसका प्रचार-प्रसार करने, उसको प्रकाशित करने या उसमें संशोधन करने से पहले शासकीय प्राधिकार से अनुमति लेना आवश्यक होगा. कुछ सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों द्वारा हाल ही में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान और अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताए जाने की पृष्ठभूमि में सरकार ने यह कदम उठाया है. हाल ही में ट्विटर ने कश्मीर की भौगोलिक स्थिति को चीन में और जम्मू को पाकिस्तान में दिखाया था, जिसका भारत सरकार ने विरोध किया था, जिसके बाद इसमें सुधार किया गया था.

भारत-चीन के बीच सेतु बने टैगोर

चीन ने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की संपूर्ण रचनावली का 33 खंडों में अनुवाद प्रकाशित किया है. इन 33 खंडों में कुल 1.6 करोड़ शब्द हैं. टैगोर की 155वीं जयंती से पहले जारी हुए इस अनुवाद को पांच साल से ज्यादा का वक्त लगाकर चीन के इंटरनेशनल रेडियो, वहां की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ, कम्युनिस्ट पार्टी के नेशनल पार्टी स्कूल और यहां तक कि चीनी फौज से जुड़े 18 अनुवादकों ने संपन्न किया है. अनुवादकों ने इस काम में भारत सरकार या किसी भी भारतीय संस्था का कोई सहयोग नहीं लिया. अलबत्ता बांग्लादेश के बौद्धिकों ने इस परियोजना में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और चीनी अनुवादकों को जहां भी भाषा की कोई समस्या हुई, वहां अपनी क्षमता भर उनकी सहायता की. अनुवादकों का कहना है कि उन्हें उन शब्दों का भाव समझने में सबसे ज्यादा मुश्किल आई जो संस्कृत के ज्यादा करीब हैं, क्योंकि बांग्लादेशी विद्वान इस काम में उनकी कुछ खास मदद नहीं कर पाते थे.

ये देखकर दुख होता है कि अभिनेत्रियों का इस्तेमाल डिजाइनर कपड़े बेचने के लिए किया जा रहा है : श्रेया नारायण

Shreya

एक राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद अभिनय का ख्याल कब आया?

मैं बिहार के मुजफ्फरपुर शहर से हूं. मैं ऐसे परिवार से हूं जिसने एक ही काम सीखा है और वो है पढ़ाई-लिखाई. मैंने दिल्ली में रहकर पढ़ाई की है. मैं एक अच्छी स्टूडेंट रही हूं और एमबीए किया है. कॉलेज के समय में थियेटर करने के दौरान ही मुझे लगा कि अभिनय ही करना है. मेरे परिवार का कला और संगीत से दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है. हमारे यहां ये परंपरा रही है कि हमने आपको पढ़ा दिया है. इसके आगे की जिम्मेदारी आपकी है कि आप जो करना चाहें, जैसे चाहें, कर सकते हैं. परिवार की ओर से ऐसा कोई बंधन नहीं था कि तुम ये नहीं कर सकती, वो नहीं कर सकती. इसलिए पढ़ाई-लिखाई के बाद मैंने अभिनय को बतौर करियर चुना क्योंकि मुझे लगता है कि ये एक ऐसा पेशा है जो आपको कई जिंदगियां जीने का मौका देता है. बाकी आप अगर डॉक्टर या इंजीनियर बनते हो तो ताउम्र उसी भूमिका में होते हो.

राजनीतिक घरानों से तमाम लोग फिल्मों में अभिनय की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन ऐसे घरानों से आए लोगों में से कुछ को ही इस डगर पर सफलता मिल पाती है. आपका क्या ख्याल है?

मेरे परिवार से तमाम लोग राजनीति में हैं फिर भी बॉलीवुड में कदम रखने के लिए परिवार से मुझे कोई खास मदद नहीं मिली. यहां तक पहुंचने का मेरा संघर्ष खुद का है जो आज भी जारी है. हालांकि मैं ये भी कहूंगी कि ये संघर्ष ऐसा भी नहीं रहा कि मुंबई में मुझे कभी खाने या फिर रहने की दिक्कत हुई हो. जहां तक राजनीतिक परिवारों से आने वाले कलाकारों के इंडस्ट्री में स्थापित न हो पाने की बात है तो मुझे लगता है कि ये राजनीतिक परिवार से आने का मसला नहीं है. जो भी कलाकार यहां (इंडस्ट्री से) के नहीं हैं उन्हें इस तरह की दिक्कत पेश आती ही है. बॉलीवुड में एक फिल्म बनती है तो या तो स्थापित कलाकारों को लिया जाता है या फिर उन लोगों को जो फिल्म में पैसा लगाते हैं. मतलब ये पूरी दुनिया लेन-देन पर चल रही है.’

रेखा की फिल्म  ‘सुपर नानी’  के तकरीबन दो साल बाद आपकी फिल्म  ‘लाल रंग’ रिलीज हुई है. कोई खास वजह?

जो भी आप काम करते हो उसके पीछे एक प्रेरणा होती है. बीच में मां का निधन हो जाने के बाद लगा था कि अब ये काम किसके लिए करूंगी. ऐसा लग रहा था कि अब फिल्मों से वैसा जुड़ाव नहीं रख पाऊंगी. इसलिए कुछ दिनों तक इंडस्ट्री से दूर रही लेकिन ऐसा भी नहीं था कि पूरी तरह से गायब थी. बीच में रेखा जी के साथ फिल्म ‘सुपर नानी’ करने के बाद टीवी के लिए काम किया. पिछले साल ही रबींद्रनाथ टैगोर की कहानियों पर आधारित और अनुराग कश्यप के निर्देशन में बने टीवी सीरियल ‘दुई बोन’ (दो बहन) में काम किया. यशराज फिल्म्स की टीवी सीरीज ‘पावडर’ में भी अभिनय किया. इसके अलावा तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘यारा’ इसी साल रिलीज होने वाली है. ये विद्युत जामवाल, श्रुति हसन और अमित साध की फिल्म है. इसमें मैं अमित के अपोजिट कास्ट की गई हूं. हालांकि इस फिल्म में लड़कियों का कोई खास रोल नहीं था, लेकिन तिग्मांशु सर ने बोला कि मुझे इसमें काम करना चाहिए इसलिए मैंने काम किया और फिर मुझे फिल्म ‘लाल रंग’ मिल गई. ‘लाल रंग’ में मेरा किरदार रणदीप हुडा और अमित ओबरॉय की मदद खून की तस्करी करने में करता है.

2009 में फिल्म  ‘एक दस्तक’  से बॉलीवुड में दस्तक देने के बाद अभी भी फिल्मों में आप छोटे किरदारों में ही नजर आती हैं?

फिल्म ‘एक दस्तक’ में मेरा लीड किरदार था. इसके अलावा जो भी रोल मुझे मिला मैंने उसे पूरी ईमानदारी से निभाया है, इस बात की परवाह किए बगैर कि वे छोटे किरदार हैं या फिर बड़े. मुझे लगता है कि हम जैसे लोग जो ऑडिशन से आते हैं उन्हें भी बड़े और अच्छे रोल मिलने चाहिए. मैंने अलग-अलग तरह का अभिनय किया है. ‘लाल रंग’ में भी मेरा किरदार काफी मजेदार और प्रभाव छोड़ने वाला है, पर अभी उस तरह का मामला नहीं बन पाया है कि मुझे और अच्छे किरदार मिल सकें. अभी अभिनय में बहुत विकल्प नहीं मिल रहे हैं तो अभी असली लड़ाई इसी बात को लेकर है कि मुझे अच्छे किरदार मिलें और मैं अच्छा परफॉर्म कर सकूं.

बीते दिनों आपने बॉलीवुड के बिजनेस मॉडल पर एक रिपोर्ट भी लिखी है? क्या सौ करोड़ क्लब का मॉडल बॉलीवुड और इसके दर्शकों के लिए ठीक है?

देश में शिक्षा का मॉडल आपको पता है. इसके हिसाब से आप परीक्षा देते हो और पास होकर अगली कक्षा में चले जाते हो, लेकिन बॉलीवुड में ऐसा नहीं है. इंडस्ट्री में पढ़ाई, प्रतिभा या अच्छी फिल्में महत्व नहीं रखती हैं. महाराष्ट्र में सरकार ने 45 प्रतिशत का मनोरंजन कर लगा रखा है. जैसे सौ रुपये किसी फिल्म का टिकट है तो सरकार पहले ही कर के रूप में 45 रुपये ले लेती है. कुछ पैसे डिस्ट्रीब्यूटर और मल्टीप्लेक्स वालों में बंट जाते हैं. कुल मिलाकर 100 रुपये में से तकरीबन 27 रुपये ही प्रोड्यूसर तक पहुंच पाते हैं. ऐसे में जब सौ करोड़ की फिल्म वो बनाएगा तभी वह मुनाफे के बारे में सोच सकता है. छोटी फिल्मों के साथ कमाई की बात आप सोच भी नहीं सकते. ये सारा खेल पैसों का हो चला है.

‘आजकल ये हमारी मजबूरी हो गई कि हम शरीर को फिट रखें, डिजाइनर कपड़े पहनें, बाल खास तरह से बनाएं और लिपस्टिक के शेड तक का ध्यान रखें ताकि मीडिया हमें तवज्जो दे’

आपने माधुरी दीक्षित और जूही चावला अभिनीत  ‘गुलाब गैंग’  का गाना  ‘लाज शरम’  भी लिखा है. इसकी क्या कहानी है?

फिल्म ‘गुलाब गैंग’ के निर्देशक सौमिक सेन मेरे अच्छे मित्र हैं. उन्होंने मुझसे बोला था कि वे एक महिला केंद्रित फिल्म बना रहे हैं और इसके लिए एक गाना चाहते हैं जिसमें महिलाएं अपने कर्तव्य और जिंदगी को सेलिब्रेट करती नजर आएं. बोल आसान हों ताकि आम लोगों को भी समझ में आ जाएं. उस समय मुझे फिल्म का नाम तक नहीं मालूम था. मैं लिखती-पढ़ती भी रहती हूं. मैंने कविताएं भी लिखी हैं इसलिए उन्होंने ऐसा कहा था. तब मैंने उनसे कहा कि गाने का तो पता नहीं क्योंकि मैंने गाना नहीं लिखा लेकिन मैं एक कविता लिख सकती हूं. ये कविता ही ‘लाज शरम’ थी जिसे फिल्म में गाने के रूप में शामिल किया गया. मुझे इस बात की भी खुशी है कि ये गाना माधुरी दीक्षित पर फिल्माया गया है.

आप सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेती हैं. कई विज्ञापनों में नजर आ चुकी हैं और फिल्मों से जुड़ी रिपोर्टिंग भी करती रहती हैं. इतने अलग-अलग माध्यमों के काम में कैसे तालमेल बिठा पाती हैं? क्या आपको नहीं लगता कि किसी एक माध्यम पर आपको अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए?

मुझे ये देखकर दुख होता है कि इतनी इंटेलीजेंट अभिनेत्रियों का इस्तेमाल डिजाइनर कपड़े बेचने और फैशन के टूल के तौर पर किया जा रहा है जबकि वे और भी बहुत कुछ कर सकती हैं. ये हमारी मजबूरी हो गई कि हम शरीर को फिट रखें, डिजाइनर कपड़े पहनें, बाल खास तरह से बनाएं और लिपस्टिक के शेड तक का ध्यान रखें ताकि मीडिया हमें तवज्जो दे. डिजाइनर कपड़े पहनकर फोटो शूट कराने में मेरी कभी भी रुचि नहीं रही. अगर मैं इन चीजों पर ध्यान दूं तो मैं विकसित नहीं हो पाऊंगी और मेरा सारा समय इन्हीं सब कामों में निकल जाएगा, इसलिए मैं समय निकालती हूं ताकि कुछ लिख सकूं, कुछ पढ़ सकूं, सामाजिक कार्यों में शामिल हो सकूं और समाज को कुछ देकर जा सकूं. जहां तक ध्यान केंद्रित करने की बात है तो अब भी अभिनय मेरी प्राथमिकता है, लेकिन बतौर इंसान हमारी दूसरी भी जिम्मेदारियां होती हैं.     

सिंहस्थ की झलकियां

महाकाल, राजा विक्रमादित्य और कालिदास के नगर उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ महापर्व शुरू हो चुका है. उज्जयनी और अवंतिका के नाम से मशहूर क्षिप्रा तट पर स्थित धर्म और आस्था की इस नगरी में आयोजित सिंहस्थ में शामिल होने के लिए संन्यासियों के साथ गृहस्थों का भी रेला लगा हुआ है. रामघाट पर स्नान-ध्यान और पूजा-पाठ का सिलसिला अनवरत जारी है. 22 अप्रैल को पहले शाही स्नान पर अखाड़ों ने भव्य पेशवाई निकाली. इस सिंहस्थ में पहली बार किन्नरों की भी पेशवाई निकली. सिंहस्थ उज्जैन में लगने वाला पवित्र कुंभ स्नान पर्व है. 12 वर्षों के अंतराल के बाद यह पर्व तब मनाया जाता है जब बृहस्पति, सिंह राशि पर स्थित रहता है. क्षिप्रा नदी में पुण्य स्नान की विधियां चैत्र माह की पूर्णिमा से शुरू होकर पूरे महीने चलते हुए वैशाख पूर्णिमा के अंतिम शाही स्नान (21 मई) के साथ पूरी होंगी. सिंहस्थ के कुछ आध्यात्मिक क्षण.

सभी फोटो : राजेंद्र सिंह जादौन
सभी फोटो : राजेंद्र सिंह जादौन

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‘सत्ता हस्तांतरण संधि से पता चल पाएगी नेताजी की सच्चाई’ : राम तीर्थ विकल

गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी की ‘गुमनाम’ मौत के 42 दिन बाद फैजाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नये लोग’ के दो पत्रकार राम तीर्थ विकल और उनके सहयोगी चंद्रेश कुमार ने गुमनामी बाबा के नेताजी होने का दावा करते हुए पहली खबर लिखी. इस खबर को अखबार के पहले पन्ने पर जगह दी गई. इस रिपोर्ट के आने के बाद ही दूसरे अखबारों ने इस खबर को तरजीह देना शुरू किया. रिपोर्ट में विकल और चंद्रेश ने लिखा, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस जो पिछले 12 साल से अयोध्या-फैजाबाद में गुमनामी बाबा के नाम से रह रहे थे, उनकी मौत 16 सितंबर को रहस्यमय परिस्थितियों में हो गई है. मौत के बाद फैजाबाद के बस स्टॉप के पास स्थित राम भवन पर उनके तीन तथाकथित दावेदारों ने नेताजी की संपत्ति पर दावा किया है. तीनों ने घर पर अपने-अपने ताले भी जड़ दिए हैं. साथ ही वे सभी सबूतों को मिटाने में भी लग गए हैं.’ बाद में अखबार के संपादक अशोक टंडन ने ‘गुमनामी सुभाष’ नाम की पुस्तक भी लिखी. इसके कुछ अंश कमलेश्वर के संपादन में दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका ‘गंगा’ में धारावाहिक के रूप में छपे थे. टंडन का दावा है कि उन्होंने बाबा के पास से मिली 2,760 वस्तुओं की बारीकी से जांच की है और उनमें से अनेक नेताजी से संबंधित हैं.

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पत्रकार राम तीर्थ विकल

 गुमनामी बाबा के नेताजी होने की खबर कैसे पता चली और इसके सूत्र क्या रहे?

उन दिनों मैं अपने अखबार में संडे मैगजीन का पेज देखता था. इसके लिए मैं रामकथा पर कुछ लेख लिख रहा था. इसी सिलसिले में शायद पांच अक्टूबर के दिन यहां के राजकरन इंटर कॉलेज के शिक्षक कृष्ण गोपाल श्रीवास्तव के पास कुछ स्केच लेने गया था. स्केच लेने के दरमियान ही उन्होंने इस घटना का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि 14 सितंबर को राम भवन में रहने वाले गुमनामी बाबा, जो कि नेताजी थे, की मौत हो गई है. उसके तीन दिन बाद उनका अंतिम संस्कार गुफ्तार घाट पर कर दिया गया. जब हमने पूछा कि यह कैसे मान लिया जाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे, तब उन्होंने कहा कि हम आपकी मुलाकात उनकी सबसे खास सेविका सरस्वती देवी से करा देते हैं. गुमनामी बाबा के अंतिम दिनों में वही उनके साथ रही थीं. सरस्वती देवी बस्ती की रहने वाली हैं.

जब हमारी भेंट सरस्वती देवी से हुई तब उनसे बातचीत के दौरान हमें कई ऐसी बातों का पता चला जिससे लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. हालांकि इस दौरान हमारे पास कोई ऐसे साक्ष्य नहीं थे जिनसे साबित होता कि यह बात सही है. हमने इस खबर के बारे में अपने संपादक को बताया. उन्होंने कहा कि इस घटना के बारे में और पड़ताल करो. करीब 21 दिन तक पूरी पड़ताल करने के बाद 27 अक्टूबर को हमने यह खबर लिखी और 28 अक्टूबर, 1985 के अंक में यह खबर लोगों को पढ़ने को मिली. इस दौरान हमने राम किशोर पंडा, राजकुमार शुक्ला, डॉ. पी बनर्जी समेत इस मामले से जुड़े सारे लोगों से बातचीत की. खबर पढ़ने के बाद यहां जनांदोलन शुरू हो गया. उस दौरान राम भवन के जिस कमरे में गुमनामी बाबा रहा करते थे वहां पर तीन ताले लगे हुए थे. पहला ताला डॉ. पी. बनर्जी ने लगा रखा था. दूसरा डॉ. आरपी रॉय ने लगा रखा था जबकि तीसरा सरस्वती देवी ने लगा रखा था. इस दौरान भारी जनदबाव के चलते प्रशासन ने सूची बनाकर सारी चीजों को अपनी कस्टडी में रखने का निर्णय लिया. इतना होने तक सारे देश के अखबारों का ध्यान इस तरफ गया. कई अखबार इसे फॉलो करने लगे.

पहली खबर छपने के बाद से मामले में क्या प्रगति हुई?

खबर छपने के बाद प्रशासन ने गुमनामी बाबा के सारे सामान को बाहर निकालकर एक सूची बनाई और उसे बक्सों में भरकर कोषागार पहुंचा दिया गया. हालांकि ये बात आ चुकी थी तो जनता ने इस मामले काे साफ करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसी का परिणाम हुआ कि केंद्र सरकार को मुखर्जी आयोग का गठन करना पड़ा. जब मुखर्जी आयोग ने मामले की जांच शुरू कर दी तो लोगों को लगा कि सच सामने आएगा लेकिन सरकार ने इस आयोग की जांच को बीच में ही रोक दिया. तब इस मामले को लेकर नेताजी के परिवार की एक महिला और राम भवन के मालिक शक्ति सिंह अदालत की शरण में चले गए.

1985 में जब आपने यह खबर छापी तो क्या प्रशासन की तरफ से इसका खंडन आया था या जिले के अधिकारियों ने इससे इनकार किया?

उस दौरान जिले में कौन-कौन-से अधिकारी थे, यह तो याद नहीं है, लेकिन एक बात साफ है कि किसी भी अधिकारी ने इस खबर का खंडन नहीं किया था. यह सिर्फ हमारे अखबार की बात नहीं थी, देश भर के अखबारों ने इस खबर को छापना शुरू किया था. इसमें लखनऊ, नई दिल्ली और कोलकाता से छपने वाले अखबार शामिल थे. इस दौरान यह आरोप भी लगा कि बहुत सारे अधिकारी गुमनामी बाबा के अंतिम संस्कार में शामिल भी रहे लेकिन न तो किसी अधिकारी ने इन खबरों की पुष्टि की और न ही खंडन किया. जबकि उस वक्त अगर हम प्रशासन के खिलाफ कोई भी खबर छापते थे तो तुरंत अगले दिन अधिकारी उसका खंडन करते थे. इस मामले में उस परंपरा का निर्वाह नहीं किया गया.

कहा जाता है कि गुमनामी बाबा के अंतिम संस्कार में शामिल होने कोलकाता से उनका कोई भी परिजन नहीं आया था. क्या यह बात सच है?

सरस्वती देवी के अनुसार गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार दो दिन बाद किया गया था. उन्होंने बताया था कि इस दौरान कोलकाता से आने वाले उनके परिजनों का इंतजार किया जा रहा था. हालांकि जब वहां से कोई नहीं आया तो शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

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क्या वाकई में गुमनामी बाबा के मरने के बाद उनका चेहरा विकृत कर दिया गया था. उस समय मौजूद डॉ. आरपी मिश्रा इस बात का खंडन करते हैं?

हां, बिल्कुल उनका चेहरा खराब कर दिया गया था. सरस्वती देवी ने मुझे पहली मुलाकात में यह बात बताई थी कि डॉ. बनर्जी और डॉ. मिश्रा ने उनका चेहरा खराब कर दिया था. यही कारण भी था कि उनके भक्तों में इस बात को  लेकर लड़ाई हुई और यह बात दुनिया को पता चल गई. डॉ. मिश्रा आज भले ही इस बात से इनकार कर रहे हैं लेकिन उस दौरान जब लोग उन पर आरोप लगा रहे थे तब उन्होंने चुप्पी साध रखी थी या कहते थे कि यह गुमनामी बाबा का आदेश था.

इतने दिनों तक गुमनामी बाबा या नेताजी से जुड़ा यह रहस्य बना हुआ है, क्या लगता है कि इस मामले का कभी खुलासा होगा?

मुझे लगता है इस मामले का खुलासा ट्रांसफर ऑफ पावर पैक्ट (सत्ता हस्तांतरण संधि) के खुलासे से हो सकता है. मुझे यह भी लगता है कि सरकार को यह पता है कि गुमनामी बाबा कौन थे, पर वह किन मजबूरियों के चलते खुलासा नहीं कर रही है इस बारे में मुझे पता नहीं है. हालांकि अब आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद जनता को यह पता चलना चाहिए कि हमें अंग्रेजों ने आजादी किन शर्तों पर दी थी. बहुत सारे लोगों का मानना है कि इसमें नेताजी को सौंपे जाने की भी शर्त जुड़ी हुई थी. अगर यह बात सच है तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.

इतने लंबे समय तक इस मामले पर रिपोर्टिंग करने के बाद आप किस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं?

इन 30 सालों की रिपोर्टिंग के दरमियान मेरी मुलाकात तमाम ऐसे लोगों से हुई और तमाम ऐसे साक्ष्य सामने आए जिससे मुझे लगता है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. आज भी जब गुमनामी बाबा का सामान बाहर निकाला जाता है या इसे इधर-उधर किया जाता है तो एक बड़ा वर्ग यह दावा करता है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. पर अभी देखिए जो सामान रामकथा संग्रहालय भेजा जा रहा है और जिसे देखकर लोग उनके नेताजी होने का कयास लगा रहे हैं. उन्हें मैं 30 साल से देख रहा हूं. पहली बार जब वो सामान जब्त हुआ तब भी बहुत सारे लोगों की यही धारणा थी. बाद में जब मुखर्जी आयोग बना तो इस धारणा को और बल मिला. अब जब अदालत के आदेश से सामान को संग्रहालय में रखा जा रहा है तो भी कहीं न कहीं इसी बात की पुष्टि हो रही है. सरकार इस पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है तो यह बात तो साफ है कि वे जरूर ही आजादी से जुड़े नायक रहे होंगे.

दो साल की मोदी सरकार, अच्छे दिनों का इंतजार

फोटो साभारः asia361.com
फोटो साभारः asia361.com

तीस साल बाद केंद्र में प्रचंड बहुमत से आई मोदी सरकार अपने दो साल पूरे कर रही है. निजी तौर पर नरेंद्र मोदी ने सत्ता की दौड़ में अपने प्रतिद्वंद्वी गठबंधन यूपीए (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस) को काफी पीछे छोड़ते हुए एनडीए (नेशनल डेेमोक्रेटिक एलायंस) को जबरदस्त बढ़त दिलाई और प्रधानमंत्री बने. यह पहली बार था जब भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अकेले ही सरकार बनाने के लिए जितना जरूरी है, उससे ज्यादा बहुमत हासिल किया. लोकसभा चुनाव 2014 के लिए जब चुनाव प्रचार खत्म हुआ, तब पार्टी ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी ने अब तक तीन लाख किलोमीटर से अधिक यात्राएं कीं और परंपरागत व नए तरीकों से करीब 5,827 कार्यक्रमों में शिरकत की. मोदी ने कुल 437 जनसभाओं को संबोधित किया. उन्होंने प्रचार का नया तरीका अपनाते हुए 1,350 3डी रैलियां कीं. यह भारत के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा प्रचार अभियान था. भाजपा को इसका फायदा भी मिला. भाजपा ने अकेले 543 लोकसभा सीटों में  से 282 सीटें जीत लीं और एनडीए गठबंधन को कुल 336 सीटें मिलीं. इसके उलट सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को महज 44 सीटें मिलीं और यूपीए गठबंधन को कुल 60 सीटें मिलीं.

‘जब कोई सितारवादक बैठता है सितार बजाने, तो थोड़ा समय लेकर खूंटियां वगैरह कसता है. तबलावादक बैठता है तो तबले को ठीक करता है. यह समय बहुत थोड़ा होना चाहिए वरना दर्शक उकता जाएंगे. केंद्र सरकार अभी तक उसी स्टेज में है, वादन से पहले की ही स्टेज में. अभी तक उपलब्धियां सामने नहीं आ पाई हैं’ 

नरेंद्र मोदी ने देश भर में गुजरात मॉडल लागू करने, आर्थिक उदारीकरण को तेज करने, अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे ले जाने, किसानों और गरीबों का विकास करने, भारत की युवाशक्ति को वैश्विक स्तर पर ले जाने जैसे लोकलुभावन वादे किए. चुनावी वादों से जगी उम्मीद और नरेंद्र मोदी के प्रभावी व्यक्तित्व ने उन्हें ऐतिहासिक बढ़त दिलाई. अब जब नरेंद्र मोदी सरकार दो साल पूरे कर रही है, एक मजबूत सरकार और मजबूत प्रधानमंत्री का सिलसिलेवार आकलन भी किया जाना चाहिए.

हाल ही में आए सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के सर्वे में कहा गया कि 70 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं, जबकि इसके उलट 49 फीसदी लोग मोदी के कामकाज से खुश नहीं हैं. यानी मोदी अब भी सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं. लगभग हर जनमत सर्वेक्षण में मोदी की लोकप्रियता कायम है. फिलहाल किसी पार्टी का कोई नेता उन्हें चुनौती देता नहीं दिखता. इसके उलट कांग्रेस पार्टी की लोकप्रियता अपने सबसे निचले स्तर पर है. परिवारवाद और यूपीए-दो के समय हुए भ्रष्टाचार का ठप्पा कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रहा है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और सोनिया गांधी का व्यक्तित्व वह करिश्मा नहीं कर पा रहा है जो मोदी का मुकाबला करने के लिए जरूरी है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी केंद्र के दावेदारों में गिना जाता है लेकिन उनके पास मोदी जितना बड़ा तंत्र और संसाधन फिलहाल नहीं हैं.

हालांकि, मोदी की इस लोकप्रियता के बीच ही उनकी पार्टी को दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा. लेकिन केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद पार्टी ने हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में सरकार भी बनाई. जबकि भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस लोकसभा चुनाव के बाद किसी भी राज्य में चुनाव जीत सकने में कामयाब नहीं हो सकी है.

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अतुल अनजान
महासचिव, सीपीआई

मोदी सरकार के दो साल आशाओं से भरे थे लेकिन जनता निराशाओं के घटाटोप अंधेरे में पहुंच गई. अच्छे दिन आने का मतलब अगर ये है कि हम 200 रुपये किलो दाल छह महीने से खाते रहे, तो बुरे दिनों की कल्पना करना ही दु:स्वप्न है. दो करोड़ लोगों को काम दिलाने का वादा करके देश की 65 प्रतिशत युवा आबादी का वोट लिया लेकिन 2015 के आंकड़े कहते हैं कि एक लाख चौदह हजार नौकरियां ही बन पाईं. सर्विस सेक्टर के अंदर जो नौकरियां बनीं वो सिर्फ हायर और फायर की हैं.
सरकार पीने का पानी नहीं दिला सकी लोगों को, डॉक्टरों ने कहा कि आपका पानी जहरीला है, इसलिए सबको कहा कि आरओ का पानी पीजिए. 18 हजार रुपये का आरओ मध्यवर्ग के घर-घर में पहुंचवा दिया गया. निम्न मध्यवर्ग से भी कह रहे हैं कि घर में आरओ जरूर लगवाओ. फिर नौजवानों से कहा कि आरओ लगाने से काम मिलेगा. तीन से ज्यादा कोई आदमी आरओ लगा नहीं सकता. एक आरओ लगाने का 150 रुपये मिलता है. एक युवा दिन में तीन आरओ लगाता है तो एक लीटर पेट्रोल भी जलाता है. यही रोजगार पैदा हुआ, कोई स्थायी रोजगार नहीं है. यह हायर ऐंड फायर का रोजगार है. सवाल यह है कि उस दो करोड़ रोजगार का क्या हुआ.
सितंबर 2014 में सरकार ने बताया था कि हमारा हस्तकला से निर्यात 29 बिलियन डॉलर का है. 2015 में वह 29 बिलियन डॉलर से घटकर 22 बिलियन डॉलर का हो गया. इसका क्या अर्थ है? भारत की अर्थव्यवस्था तब आगे बढ़ेगी जब हमारा निर्यात बढ़ता है. अगर हमारा आयात बढ़ता है तो उसका अर्थ है कि रोजगार के साधन घटते हैं. जो बाहरी फैक्टरियां लाकर आप लगा रहे हैं, वे तो हाइली स्किल्ड हैं. उसमें तो जरूरत ही नहीं है आदमी की. ये निर्यात जो घट गया, इसका मतलब है कि लघु और मझोले उद्योग बंद हो गए हैं. हस्तकला उद्योग खत्म हो गया. राजस्थान में लाख की चूड़ियों का कारोबार खत्म हो गया. मुरादाबाद में बर्तन पर नक्काशी का काम खत्म हो गया क्योंकि इसका निर्यात बंद हो गया. हजारों-हजार परिवार खत्म हो गए.
मनमोहन और मोदी दोनों की अर्थनीति एक ही है. मोदी की अर्थनीति के पितामह तो डॉ. मनमोहन सिंह ही हैं. सारा झगड़ा कमीशन का पैसा खाने को लेकर है. मोदी ने कहा था कि सौ दिन में काला धन लाएंगे, जन-धन योजना के तहत सबका खाता खुलवा दिया. बोले 15 लाख मिलेंगे. अब लोगों को यूनियन बनाकर प्रधानमंत्री के वादों का हिसाब मांगना चाहिए. दो वर्षों में मोदी ने साबित किया कि वे कॉरपोरेट घरानों के अभिन्न मित्र हैं. गरीब लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. चोरबाजारी, कालाबाजारी, वायदा कारोबार करने वालों के साथ वे पहले भी थे, जिन्होंने उनके चुनाव की फंडिंग की, वे उनके साथ अब भी हैं. ये प्रतिबद्धता भारतीय राजनीति में कभी नहीं देखी गई.

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केंद्र सरकार के दावों और मोदी के भाषणों में देश की विकास गति काफी उत्साहजनक है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सरकार के कामकाज को अभी जमीन पर उतरना बाकी है. राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘जब कोई सितारवादक बैठता है सितार बजाने के लिए, तो थोड़ा समय लेता है, खूंटियां वगैरह कसता है. तबलावादक बैठता है तो तबले को ठीक करता है. यह समय बहुत थोड़ा होना चाहिए वरना दर्शक उकता जाएंगे अगर वह तबला ही ठीक करता रहेगा. केंद्र सरकार अब तक उसी स्टेज में है, वादन शुरू करने से पहले की ही स्टेज में. अभी तक उपलब्धियां सामने नहीं आ पाई हैं. बहुत सारी योजनाओं की घोषणा हुई है. दावे बहुत हैं. लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है कि कहा जा सके कि यह है दो साल के कामकाज का ठोस परिणाम. दावा तो यह था कि ठोस परिणाम मिलेगा. अब दो साल हो चुके हैं. लोग इंतजार कर रहे हैं, देखिए कब तक करते हैं. अभी तक किसी भी काम का कोई ठोस परिणाम नहीं मिला है. ये नहीं कहा जा सकता कि ये-ये नतीजे मिल गए हैं और जनता को इसका लाभ मिलना शुरू हो गया है.’

पठानकोट हमले पर आई संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है. देश में आतंकरोधी गतिविधि में लगे सुरक्षा तंत्र में गंभीर खामी है. भारत की कोई काउंटर टेरर पॉलिसी नहीं है. सटीक जानकारी होने के बावजूद पठानकोट पर हमला नहीं रोका जा सका 

प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल यात्रा पर नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल यात्रा पर नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं कीं. अमेरिका वे कई बार गए. कथित तौर पर बिना किसी पूर्व योजना के पाकिस्तान भी पहुंच गए. ओबामा के रात्रिभोज में नवरात्र व्रत के साथ शामिल होने का इतिहास रचा तो ब्रिटेन की महारानी के साथ भोजन कर आए. हर देश में उनकी चर्चित सभाएं हुईं, जहां प्रवासी भारतीयों ने उनकी जय-जयकार भी की. इस दौरान वे स्थायी भाव के साथ कांग्रेस के 65 साला शासन की खूब आलोचना भी करते रहे. इन विदेश यात्राओं के दौरान भाजपा और मोदी सरकार ने इसे ‘न भूतो न भविष्यति’ के अंदाज में पेश किया कि हम दुनिया में भारत की नई पहचान बना रहे हैं. शुरुआती दौर में ऐसा माना भी गया कि मोदी के ताबड़तोड़ दौरों और विदेशों में बड़ी-बड़ी भारतीय सभाओं का अपना खास मतलब हो सकता है. चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला झूलना या अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए प्रेमपूर्वक संबोधन ‘बराक’ भी खासा चर्चित रहा. नवाज शरीफ के घरेलू कार्यक्रम में मोदी की शिरकत से एक दफा कोई भी सोच सकता था कि अब पाकिस्तान से भारत के रिश्ते बेहद मधुर होने वाले हैं.

सरकार के सौ दिन पूरे होने के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज मीडिया के सामने आईं और विदेश नीति पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा, ‘कूटनीति और विदेश नीति एक-दूसरे का पर्याय नहीं हैं. विदेश नीति अक्सर वही रहती है, लेकिन काम करने का तरीका बदलता है.’ मोदी की नई विदेश नीति को ‘फास्ट ट्रैक डिप्लोमेसी’ का नाम दिया गया. नरेंद्र मोदी पुरानी ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ को अहमियत देते हुए पहली यात्रा पर भूटान गए. उसके बाद नेपाल और जापान की यात्रा की. उन्होंने कुछ ऐसे भी देशाें की यात्रा की जहां अभी तक कोई भारतीय प्रधानमंत्री गया ही नहीं था, या दशकों पहले गया था. मोदी ने इजराइल की यात्रा की जहां अब तक कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं गया था. उन्होंने आयरलैंड की यात्रा की जहां पिछले 60 साल से कोई भारतीय प्रधानमंत्री नहीं गया था. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बांग्लादेश, म्यांमार, वियतनाम, सिंगापुर आदि देशों की यात्राएं कीं. इन सब देशों के साथ पाकिस्तान का मसला मोदी सरकार की प्राथमिकता में रहा.

‘अमेरिका के बरक्स देखें तो पता नहीं हम क्या हासिल करने में कामयाब रहे हैं. द्विपक्षीय संबंध आपसी व्यक्तिगत संबंधों के मोहताज नहीं होते. ओबामा ने पाकिस्तान द्वारा जैश-ए-मोहम्मद पर कोई कार्रवाई न करने को लेकर उंगली तक नहीं उठाई है. पाकिस्तान के मुद्दे पर हम खुद को मूर्ख बना रहे हैं’ 

लेकिन इन सब विदेश यात्राओं के चलते अब तक कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज नहीं की जा सकी है. भारत सरकार द्वारा विदेश में फंसे भारतीय नागरिकों को बचाने के लिए चलाए गए अभियान जरूर सफल रहे. युद्ध और आंतरिक संकट से जूझ रहे यमन में फंसे भारतीयों को बचाने के लिए भारत सरकार ने आॅपरेशन राहत चलाया था. अप्रैल 2015 में सफलतापूर्वक खत्म हुए इस ​अभियान में 5,600 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया. इनमें 4,640 भारतीय नागरिक थे, बाकी 41 देशों के 960 विदेशी नागरिकों को भी भारतीय सैनिकों ने बचाया. युद्धग्रस्त यमन में बड़ी संख्या में भारतीय नर्सें और नागरिक फंसे हुए थे. यह किसी दूसरे देश में चलाया गया अब तक का सबसे बड़ा बचाव अभियान था. विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह की अगुवाई में चले इस अभियान में भारतीय नौसेना, वायुसेना, एयर इंडिया और भारतीय रेल शामिल थीं. इस अभियान की सफलता के चलते सरकार को खूब तारीफ मिली.

मोदी की अप्रत्याशित पाकिस्तान यात्रा के बीच अमेरिका ने पाकिस्तान की सामरिक मदद की और भारत की ओर से एक औपचारिक नाराजगी का प्रदर्शन भर हो सका. नेपाल जैसा देश, जो भारत का अनन्य पड़ोसी है, जो भारत चीन के बीच ‘बफर स्टेट’ की भूमिका निभाता रहा है, उससे रिश्ते बिगड़ गए. हालांकि, मोदी सरकार आम लोगों के बीच यह प्रचारित कर रही है कि उनकी सरकार की विदेश नीति काफी उम्दा है, लेकिन विशेषज्ञों की राय इसके उलट है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसे विदेश नीति की कामयाबी के तौर पर नहीं देखा जा सकता कि विदेशों में बहुत-से लोग मोदी को सुनने आते हैं. नेपाल से संबंध खराब होने, नेपाल की चीन से नजदीकी बढ़ने, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से संबंधों में उल्लेखनीय सुधार न होने जैसे तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता. विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति समझ में न आने वाली है. कई बार बातचीत होना, फिर टूटना, आतंकवाद के मुकदमों का आगे न बढ़ना और एक-दूसरे पर दोषारोपण करते जाना दोनों देशों की नीतिगत अगंभीरता को दिखाता है.

‘भाजपा सरकार की विदेश नीति में खामी है. ये अमेरिका से जाकर दोस्ती कर रहे हैं, जबकि नेपाल के साथ हमारा विरोध चल रहा है. यह गलत नीति के ही कारण है. इस समय तो विदेश नीति के मामले में कुछ भी ठीक नहीं है. भाजपा सरकार जिस तरह की नीति अपनाए हुए है, वह सही नहीं है’

मोदी और नवाज शरीफ की मुलाकातों, दोनों के बीच साड़ी-शॉल आदि के आदान-प्रदान और शरीफ की मां से मोदी के मिलने जाने की खूब चर्चा हुई. इस सबके बावजूद अगस्त में प्रस्तावित विदेश सचिवों की वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तान के हाई कमिश्नर ने कश्मीरी अलगाववादियों से बातचीत की और नतीजतन भारत सरकार ने 25 अगस्त की वार्ता रद्द कर दी.

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पठानकोट हमले के मामले में पाकिस्तान एक तरफ जांच का दिखावा करता रहा और दूसरी तरफ वह जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को लेकर अगंभीर भी बना रहा. इधर भारत की ओर से पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट बेस तक ले जाया गया. यह एक रणनीतिक रूप से एक भारी चूक थी. पठानकोट हमला, पाकिस्तानी जांच टीम बुलाकर जांच करवाना, जांच टीम के लौटने के बाद पाकिस्तान का वार्ता से इनकार करना, ये सभी घटनाएं सरकार की विफलताओं में दर्ज हुईं. इस उठापटक के बीच सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं वैसी ही हो रही हैं, जैसे पिछले वर्षों में होती रही हैं.

पठानकोट हमले पर हाल ही में आई संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में लचर सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा गया कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था अभी भी ठीक नहीं है. समिति ने कहा कि देश में आतंकरोधी गतिविधि में लगे सुरक्षा तंत्र में गंभीर खामी है. एसपी सलविंदर सिंह से एक बार फिर पूछताछ की जरूरत बताते हुए समिति ने कहा कि भारत की कोई काउंटर टेरर पॉलिसी नहीं है. सटीक जानकारी होने के बावजूद पठानकोट पर हमला नहीं रोका जा सका. इस हमले में पंजाब पुलिस की भूमिका की जांच होनी चाहिए. समिति के प्रमुख प्रदीप भट्टाचार्य ने बयान दिया कि पठानकोट में सुरक्षा-व्यवस्था खराब थी, एसपी पठानकोट की गतिविधि संदिग्ध थी, उनसे सवाल-जवाब ठीक से नहीं हुए. समिति ने गृह मंत्रालय को कठघरे में खड़ा करते हुए रिपोर्ट में लिखा है कि बीएसएफ ने बेशक बॉर्डर में कंटीले तार लगाए हों लेकिन आतंकवादी अंदर घुसने में कामयाब हुए. समिति ने एयरबेस की सुरक्षा को लेकर भी कई अहम सवाल खड़े किए हैं. 31 सदस्यीय समिति ने यह सवाल भी उठाया है कि जब पठानकोट हमले में पाकिस्तानी एजेंसियों की भूमिका थी तो पाकिस्तानी जांच समिति को भारत क्यों आने दिया गया. समिति का कहना है कि मंत्रालय के ज्यादातर काम कागजों में सिमटे रहते हैं, जमीनी स्तर पर नहीं दिखते. इसे बदलने की जरूरत है. यह हमला दो जनवरी को हुआ था जिसमें सेना के सात जवान शहीद हुए थे. भारत ने इसके लिए आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को जिम्मेदार ठहराया था. भारत का कहना है कि जैश प्रमुख मौलाना मसूद अजहर इस हमले का मास्टरमाइंड था.

‘सरकार की आर्थिक नीतियां गलत हैं. आज हिंदुस्तान में नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं. महंगाई बढ़ रही है. मजदूर विरोधी काम चल रहा है. कानून बदलकर उसे मजदूरों के खिलाफ किया जा रहा है. किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. यह नीतियों की पूरी तरह विफलता को दिखाता है.’

चीन के साथ संबंधों में भी कोई उल्लेखनीय सुधार देखने को नहीं मिला है. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर को आतंकी घोषित करवाने के भारत के प्रस्ताव को चीन ने वीटो कर दिया. विदेश नीति के मामले में यह एक कमजोर कड़ी थी. इसके जवाब में भारत ने उइगर नेता डोल्कन ईसा को वीजा दे दिया और बाद में रद्द भी कर दिया. यह शायद चीन को एक संदेश देने की कोशिश थी. डोल्कन ईसा को चीन ने आतंकवादी घोषित किया है और उनके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया है. ईसा लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं लेकिन वे चीनी सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं. वे जर्मनी में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. चीन का आरोप है कि इस्लाम को मानने वाले उइगर समुदाय के लोग शिनजियांग प्रांत में जो आंदोलन करते हैं उसे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकी गुटों से मदद मिलती है. चूंकि डोल्कन ईसा उइगरों के नेता हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से चीन के दुश्मन हुए. चीन की नाराजगी की चिंता न करके डोल्कन ईसा को भारत आने देना शायद ज्यादा मजबूत संदेश होता, लेकिन अंतत: उन्हें नहीं आने दिया गया. उनको वीजा देने या बाद में रद्द कर देने से कोई फर्क पड़ने के संकेत अब तक तो नहीं दिखे. यह जरूर स्थापित हुआ है कि शांतिपूर्ण लड़ाई लड़ने वाले डोल्कन ईसा चीन की नजर में आतंकवादी हैं, लेकिन कंधार कांड का कारण बना मसूद अजहर, जिस पर मुंबई हमलों और पठानकोट हमले की साजिश रचने का आरोप है, वह आतंकवादी नहीं है. फिलहाल उसकी इस मान्यता में भारत कोई अड़चन खड़ी नहीं कर पाया है.

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अफगानिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके विवेक काटजू अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘डोल्कन के मामले में भारत सरकार ने जिस तरह के डावांडोल रवैये का परिचय दिया, उसका उसकी विदेश नीति और खास तौर पर चीन नीति पर खासा असर पड़ेगा. डोल्कन को वीजा देने का भारत सरकार का फैसला इन मायनों में चौंकाने वाला था, क्योंकि अतीत में ऐसा कदम नहीं उठाया गया था. भारत ने डोल्कन को वीजा देने का फैसला तब लिया था जब चीन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के भारत के आग्रह के खिलाफ वीटो कर दिया था. चीन ने ऐसा पाकिस्तान के प्रति दोस्ती निभाने के लिए किया है. डोल्कन को वीजा देने का फैसला सही था. लेकिन डोल्कन का वीजा रद्द करने के मामले में अधिकृत रूप से अभी तक कुछ भी नहीं कहा गया है. सरकार इस मामले में जो भी सफाई दे, आम धारणा तो यही बनेगी कि वह चीन के सामने झुक गई और राजनीति व कूटनीति में आम राय का सर्वाधिक महत्व होता है.’

‘अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई उछाल नहीं है. जितनी ग्रोथ रेट दिखाई जा रही है, उतनी तो 10-12 साल से चल रही है. 2004 से 09 के बीच ग्रोथ रेट इससे भी ज्यादा थी. रोजगार मिलना शुरू नहीं हुआ. बाजार पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है. बड़े पूंजीपति अपनी संपत्तियां बेच रहे हैं ताकि अपना कर्ज चुका सकें’ 

रक्षा और विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन का कहना है, ‘वास्तविक स्थिति क्या है, ये तो उन्हीं को पता है जिन्होंने ये निर्णय लिया है. चीन के साथ पेचीदगियां बहुत हैं. एक तो सामरिक स्तर पर जिस तरीके का चीन का रवैया है, उनके जो हित हैं, वो भारत के हित के साथ मेल नहीं खाते. मुझे लगता है कि चीन के साथ कई स्तर पर निपटना पड़ेगा. कई मामलों में आप चीन के साथ सख्ती दिखा सकते हैं लेकिन फिर कई में आपको नरमी बरतनी होगी.’

सुशांत सरीन का कहना है, ‘पाकिस्तान पर नीति में एक तरह से कमजोरी है. पिछले दो साल में कम से कम पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद पहल की है. हाल में भी जब रिश्तों में कड़वाहट आई तो उसे बेहतर करने की कोशिश नरेंद्र मोदी ने की. लेकिन लगता है कि पहले के प्रधानमंत्रियों की कोशिशों की तरह उनकी कोशिश का कोई असर नजर नहीं आ रहा. दूसरा पहलू है नरेंद्र मोदी का सऊदी अरब या यूएई जाकर नए सामरिक समीकरण बनाने की कोशिश करना. ये कदम इसमें एक बड़ा बदलाव है. एक सच्चाई भारत को स्वीकार करनी होगी कि अगर नेताओं के व्यक्तिगत संबंध अच्छे भी हैं तो इससे मुल्कों के संबंध बेहतर नहीं हो जाते. जिस नाटकीयता से लाहौर की यात्रा हुई, उसकी जरूरत नहीं थी. उसका एक नकारात्मक पहलू यह रहा कि जब से मोदी सरकार आई थी तब से पाकिस्तान में जो डर या हिचकिचाहट थी- मोदी की नीतियां पाकिस्तान को लेकर पिछली सरकारों से बिल्कुल अलग होंगी; वो लगभग पूरी तरह से खत्म हो गई है.’

आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के महासचिव रह चुके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दासगुप्ता कहते हैं, ‘भाजपा सरकार की विदेश नीतियों में खामी है. ये अमेरिका से जाकर दोस्ती कर रहे हैं, जबकि नेपाल के साथ हमारा विरोध चल रहा है. यह गलत नीतियों के ही कारण है. इस समय तो विदेश नीति के मामले में कुछ भी ठीक नहीं है. सरकार जिस तरह की नीति अपनाए हुए है, वह सही नीति नहीं है. चीन और पाकिस्तान दोनों एक नहीं है. पाकिस्तान से हमारे यहां आतंकी आते हैं. लेकिन चीन के साथ ऐसा कुछ नहीं है. उसके साथ कोई द्वंद्व नहीं होना चाहिए. अच्छी दोस्ती होनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है.’

‘ये सुधार की बात करते हैं तो सिर्फ आर्थिक सुधार की बात करते हैं. हमारी पूरी मशीनरी पुरानी हो गई है. नियम-कानून पुराने हो गए. प्रशासनिक सुधार, चुनाव सुधार, पुलिस सुधार, न्यायिक सुधार- ये सब मसले लंबे अरसे से लटके पड़े हैं. मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह इन सुधारों की शुरुआत करेगी’ 

वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके पत्रकार अरुण शौरी ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में मोदी की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते फिलहाल समझ से बाहर हैं. पाकिस्तान के साथ नरेंद्र मोदी की विदेश नीति न तो संवैधानिक है और न ही तार्किक. पाकिस्तान के पीएम ने अपनी चालबाजी से भारत को अब तक गुमराह किया है. पाकिस्तान ने हालिया दिनों में भारत को केवल मूर्ख बनाने का काम किया. देश के नागरिक से लेकर सेना के जवान तक संतुष्ट नहीं हैं. फिर कौन-से सुशासन की बात हो रही है?’ शौरी ने कहा, ‘अमेरिका के बरक्स देखें तो पता नहीं हम क्या हासिल करने में कामयाब रहे हैं. द्विपक्षीय संबंध आपसी व्यक्तिगत संबंधों के मोहताज नहीं होते. ओबामा ने अफगानिस्तान शांति वार्ता से भारत को अलग करने या फिर पाकिस्तान द्वारा जैश-ए-मोहम्मद पर कोई कार्रवाई न करने को लेकर उंगली तक नहीं उठाई है. पाकिस्तान के मुद्दे पर हम खुद को मूर्ख बना रहे हैं. कश्मीरी अलगाववादियों के पाकिस्तान के साथ वार्ता करने को लेकर रवैया लचर है. पाकिस्तानी जांचकर्ताओं को पठानकोट एयरबेस का निरीक्षण करने की अनुमति देना मूर्खतापूर्ण फैसला था. चीन के मुद्दे पर ध्यान और गंभीरता की कमी साफ देखी जा सकती है. मोदी को लगता है कि वे चीन को खुश कर सकते हैं लेकिन वर्तमान में चीन पुराने कश्मीर राज्य के 20 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है और हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए जब वह कहे कि कश्मीर का मसला द्विपक्षीय नहीं बल्कि त्रिपक्षीय है.’

राजनीतिक विश्लेेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘विदेश नीति के मामले में स्थिति है कि नेपाल हमारा पड़ोसी है और आज उससे हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं. पाकिस्तान से ठंडे-गरम संबंध होते हैं, वह भी आज किसी खास हालत में नहीं है. विदेश नीति के मामले में जब हम अपने पड़ोसियों से भी अच्छे संबंध नहीं रख पाए हैं तो इस मामले में और क्या अपेक्षा कर सकते हैं? मुझे नहीं लगता कि सरकार ने दो साल में कुछ ऐसा किया है जिस पर गर्व किया जा सके.’

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की सालाना बैठक में भाग लेने अमेरिका गए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन ने डाउ जोंस ऐंड कंपनी की मैग्जीन ‘मार्केटवॉच’ से एक इंटरव्यू में कहा, ‘मुझे लगता है कि हमें अब भी वह स्थान हासिल करना है जहां हम संतुष्ट हो सकें. हमारे यहां लोकोक्ति है, अंधों में काना राजा. हम थोड़े-बहुत वैसे ही हैं.’ हालांकि, कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच आईएमएफ समेत विभिन्न संस्थान भारतीय अर्थव्यवस्था को सराह चुके हैं, लेकिन रघुराम राजन की निगाह में यह फिलहाल ‘अंधों में काना राजा’ जैसी स्थिति में है. राजन के नेतृत्व में रिजर्व बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कई उल्लेखनीय उपाय जरूर किए हैं. उन्होंने अपने इस इंटरव्यू में कहा, ‘हम उस मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं जहां हम अपनी मध्यावधि वृद्धि लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं क्योंकि हालात ठीक हो रहे हैं. निवेश में मजबूती आ रही है. हमारे यहां काफी कुछ व्यापक स्थिरता है. (अर्थव्यवस्था) भले ही हर झटके से अछूती नहीं हो लेकिन बहुत-से झटकों से बची है.’

इस बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ उत्साहजनक तथ्य भी सामने आए हैं जो इसकी मजबूती को लेकर आशा जगाते हैं. चालू खाते और राजकोषीय घाटे का नियंत्रण में आना, वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) का आना, महंगाई 11 से घटकर 5 प्रतिशत से नीचे आना, इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में चल रहे सुधार, दो बैंक खातों में मोबाइल से पैसा ट्रांसफर करने का नया प्लेटफॉर्म शुरू होना आदि चीजें अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगी, ऐसे अनुमान लगाए जा रहे हैं. हालांकि, अर्थव्यवस्था के मसले पर सरकार अब तक जितना कुछ कर सकी है, उससे ज्यादा का चुनावी वादा किया गया था. दहाई अंक में वृद्धि दर, दो करोड़ नौकरियां, मनरेगा, आधार जैसी योजनाएं खत्म करने जैसे वादे अधूरे हैं.

अर्थव्यवस्था के बारे में अरुण शौरी का कहना है, ‘पुनरुद्धार के सिर्फ छोटे-मोटे संकेत प्रभावी होते दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में सरकार के दावों की जांच होनी चाहिए. निवेश को पुनर्जीवित करने की मुख्य चुनौती पर कोई प्रगति नहीं है. टैक्स सुधार और बैंकिंग सुधार नहीं हो पाए हैं.’ गुरुदास दासगुप्ता कहते हैं, ‘सरकार की आर्थिक नीतियां गलत हैं. आज हिंदुस्तान में नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं. महंगाई बढ़ रही है. मजदूर विरोधी काम चल रहा है. कानून बदलकर उसे मजदूरों के खिलाफ किया जा रहा है. किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. यह नीतियों की पूरी तरह विफलता को दिखाता है.’

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अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई उछाल नहीं है. जितनी ग्रोथ रेट दिखाई जा रही है, उतनी ग्रोथ रेट तो 10-12 साल से चल रही है. 2004 से 09 के बीच ग्रोथ रेट इससे भी ज्यादा थी. रोजगार मिलना शुरू नहीं हुआ. बाजार पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है. हिंदू में खबर छपी है कि हिंदुस्तान के दस बड़े पूंजीपति अपनी संपत्तियां बेच रहे हैं ताकि अपना कर्ज चुका सकें. जाहिर है कि बिजनेस करके अपना कर्ज चुका सकने की हालत में वे नहीं हैं. इसमें अंबानी ब्रदर्स हैं, अडाणी हैं. ये तो स्थिति है. न तो बाजार को कोई उछाल मिल रहा है. न निवेश में कोई बड़ी पहल हुई है. इन चीजों की जब आलोचना की जाती है तो सरकार कहती है, नहीं, हम अभी तक काम कर रहे थे, अब इसके नतीजे निकलने शुरू होंगे.’

घरेलू मामलों में भारतीय कानून और राज व्यवस्था में बहुत सी खामियां लंबे समय से चिह्नित की जा रही हैं. इन पर समय-समय पर चर्चा होने के साथ सुधारों की बात उठती रही है. नरेंद्र मोदी ने भी वादा किया था कि वे पुराने और अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को रद्द करके सुधारों का रास्ता साफ करेंगे. लेकिन कानून बनाने के मसले पर अब तक सरकार कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है. लोकसभा में सरकार मजबूत है, लेकिन राज्यसभा में सरकार बहुमत में नहीं है. ज्यादातर कानूनी मसलों पर सर्वदलीय आम राय कायम न हो पाने के कारण ज्यादातर कानून या तो पेश ही नहीं हो सके हैं, या फिर वे पास नहीं हो सके. नई सरकार के मुकाबले यूपीए सरकार को याद करें तो उसने देश को सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, आधार, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार जैसे कानून दिए थे जो आम जनता, खासकर गरीबों के लिए मील का पत्थर हैं. जबकि मोदी सरकार की जो भी योजनाएं या कानून अब तक सामने आए हैं वे जनपक्षीय होने की जगह पूंजीपरस्त दिखते हैं. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप और स्वच्छ भारत अभियान आदि सरकारी स्तर के नारे हैं जिनसे गरीब जनता को फिलहाल तो कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. अभी यह भी देखने में नहीं आया है कि सरकार आम जनता या गरीबों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने जा रही हो.

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो उससे उम्मीद यह थी कि जो बहुत सारे सुधार तीस-चालीस साल से लटके पड़े हैं, उन्हें सरकार पूरा करेगी. ये सुधार की बात करते हैं तो सिर्फ आर्थिक सुधार की बात करते हैं. हमारी पूरी मशीनरी पुरानी हो गई है. नियम-कानून पुराने हो गए. प्रशासनिक सुधार नहीं हुए हैं, चुनाव सुधार नहीं हुए हैं, पुलिस सुधार नहीं हुए हैं, न्यायिक सुधार नहीं हुए हैं. ये सब मसले लंबे अरसे से लटके पड़े हैं. मोदी बस औद्योगिक सुधार की बात करते हैं, लेकिन शासन चलाने के लिए तो ये सारे सुधार भी होने चाहिए. मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह इन सुधारों की शुरुआत करेगी. पहले ब्लू प्रिंट तैयारी करेगी, उसके बाद शुरुआत होगी तो दस-बारह साल लगेंगे. लेकिन मोदी सरकार ने इन सारे सुधारों को लेकर अब तक कोई ब्लू प्रिंट नहीं बनाया है.’

प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रचार करते समय नरेंद्र मोदी मंचों से कहते थे कि देश के संसाधन पर पहला हक गरीबों और किसानों का है. लेकिन उनके सत्ता में आने के बाद 13 राज्यों में सूखा पड़ा तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा कि लोगों को मरता हुआ नहीं छोड़ सकते. पिछले दो साल में किसान आत्महत्याओं के आंकड़े और बढ़े हैं. कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि सरकार कृषि के बारे में शायद भूल ही गई है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के पहले सरकारें किसानों की बात करती हैं और सत्ता में आने के बाद सिर्फ कॉरपोरेट की बात करती हैं. कृषि की हालत बेहद दयनीय है. शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट का कि उसने फटकार लगाई तो सरकार को इस बात का एहसास हुआ कि सूखा पड़ा हुआ है. 2014 में किसानों की आत्महत्या की रोजाना की एवरेज 42 आ रही थी. 2015 में यह बढ़कर 52 हो गई.’

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देविंदर शर्मा कहते हैं, ‘किसानों की समस्या उत्पादन या पानी नहीं है, समस्या आय की है. किसान की आय हमने जानबूझकर ऐसी रखी है कि उसे तो मरना ही मरना है. किसान आत्महत्या के मामले में पंजाब महाराष्ट्र से आगे निकल रहा है. इसका कारण यह है कि आपने किसान को आमदनी नहीं दी. पंजाब में खेती से जो किसान की वास्तविक आय है वह एक हेक्टेयर पर तीन हजार रुपये है. चपरासी की जो बेसिक सैलरी है वह 18 हजार रुपये है, जिसे सरकार 21 हजार करने जा रही है. इसको कोई एड्रेस नहीं करना चाहता.’ अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘कुछ योजनाओं की केवल घोषणाएं हुई हैं, कोई परिणाम नहीं आया है. जन-धन योजना मोदी की पहली योजना थी. आज तक उसकी व्यवस्थित समीक्षा सामने नहीं आई है कि कितने खाते खुले और लोग उनका कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं. क्या जमीन पर उसका कोई लाभ हुआ है? मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्किल इंडिया, ये सब सुनने में बहुत अच्छी योजनाएं हैं. मोदी की प्रवृत्ति के बारे में उनके गुरु लालकृष्ण आडवाणी, जो बाद में उनके प्रतिद्वंद्वी हो गए, ने कहा था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे इवेंट मैनेजर हैं.  मेरा कहना है कि अभी तक के दो वर्ष तो इवेंट मैनेजमेंट और रीपैकेजिंग में गुजर गए. इस इवेंट मैनेजमेंट का नतीजा क्या निकलेगा, ये देखने की बात होगी.’

गांवों के विकास के सवाल पर सीपीआई के महासचिव अतुल अनजान कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री ने कहा कि हर सांसद एक गांव को गोद लेगा. सात लाख गांवों में से सात सौ गांव गोद लेने वाली इस अनोखी योजना का यह हाल है कि उनके अपने ही ज्यादातर सांसदों ने कोई गांव गोद नहीं लिया. जिस गांव को मोदी जी ने गोद लिया था, वहीं उनका उम्मीदवार स्थानीय चुनाव हार गया. राजनाथ और कलराज के गांव में यही हाल हुआ. लोकसभा के सिर्फ 44 सांसदों ने गांव गोद लिया और राज्यसभा के 8 सांसदों ने, बाकी ने नहीं लिया. उनके अपने ही सांसद उनकी बात नहीं सुन रहे. इसलिए कह रहा हूं कि दो साल का कार्यकाल तो पूरी तरह असफलता का काल है.’

आॅल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘नई सरकार से आकांक्षाएं बहुत ज्यादा थीं. लेकिन दो साल में यह हालत हुई है 2008 कि मंदी के समय जितना रोजगार पैदा हुआ था, उससे कम रोजगार इनके समय में पैदा हुआ है. निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पहले जैसा बना हुआ है. श्रम कानूनों में जितने भी संशोधन हो रहे हैं वे मजदूरों के विरोध में हैं. सरकार की नीति से पावर सेक्टर में आठ लाख करोड़ का नुकसान हुआ है. 3.8 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है और 4.3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है. इसकी दो वजहें हैं. पहली- महंगी बिजली खरीदकर उपभोक्ताओं को दी जा रही है. महंगी बिजली खरीद का कारण है कि बिजली की खरीद केवल प्राइवेट सेक्टर से की जा रही है, जिससे महंगी बिजली खरीदी जा रही है. ऊर्जा नीति में संतुलन नहीं है. दूसरे, बिजली को राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. किसानों के साथ कुछ सेक्टरों में फ्री देने और बिजली चोरी को राजनीतिक संरक्षण, ये घाटे के बड़े कारण हैं. इस पर कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण यह घाटा हुआ है. क्रोनी कैपिटलिज्म तो वैसे ही बना हुआ है. चुनिंदा औद्योगिक घराने अंबानी और अडाणी को फायदा पहुंचाया जा रहा है.’

गंगा को साफ-सुथरा करने के लिए ‘नमामि गंगे’ मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है. हालांकि, गंगा की सफाई के प्रयास पिछले तीस वर्षों से जारी हैं और अब तक कोई नतीजा सामने नहीं आया है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 40 प्रमुख नदियों में से 35 बुरी तरह प्रदूषित हैं, जिनका पानी पीने लायक बिल्कुल नहीं है. कुछ समय पहले गंगा सफाई मसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मौजूदा कार्ययोजनाओं से लगता नहीं कि गंगा 200 वर्षों में भी साफ हो पाएगी. ‘नमामि गंगे’ योजना पर वर्ष 2014-15 में 324.88 लाख रुपये खर्च किए गए और अगले पांच साल के लिए 20 हजार करोड़ रुपये स्वीकृत हुए. हालांकि अभी तक ‘नमामि गंगे’ अभियान अपने शुरुआती चरण में भी नहीं पहुंचा है.

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भारत की युवा आबादी के लिहाज से शिक्षा का क्षेत्र बेहद अहम है जो कि पिछले दो साल से लगातार विवादों में है. लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में टकराव और उथल-पुथल का माहौल रहा. जेएनयू, हैदराबाद, बीएचयू, इलाहाबाद, एनआईटी कश्मीर और जादवपुर विश्वविद्यालयों में संघ-भाजपा समर्थकों और बाकी दलों या विचारधाराओं के छात्रों के बीच जबरदस्त टकराव की स्थितियां पैदा हुईं. इसके उलट शिक्षा के क्षेत्र में अब तक कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं हुई है. यूपीएससी के पूर्व सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘जहां तक मुझे याद पड़ता है, शैक्षिक नीतियों में औपचारिक रूप से कोई बुनियादी बदलाव तो आया नहीं है. उच्च शिक्षा की नीति कागज पर तो वही है जो कपिल सिब्बल के समय थी. अब सवाल ये है कि आप किस तरह के लोगों को नियुक्त कर रहे हैं. किस तरह का वातावरण विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के कामकाज में बनाया है. अब खबरें आ रही हैं कि इलाहाबाद के कुलपति ने असंतोष प्रकट किया है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का हस्तक्षेप बहुत बढ़ रहा है. ये गंभीर समस्याएं हैं. स्कूली शिक्षा समवर्ती सूची में है तो केंद्र और राज्य दोनों की ओर से कोई महत्वपूर्ण पहल नहीं हो रही है. जहां तक मुझे याद है कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुए हैं, लेकिन दोनों बजटों में शिक्षा का बजट कम कर दिया गया. एक तरफ शिक्षा बढ़ानी है दूसरी तरफ बजट में कटौती की जा रही है.’

‘जहां तक मुझे याद पड़ता है, शैक्षिक नीतियों में औपचारिक रूप से कोई बुनियादी बदलाव तो आया नहीं है. उच्च शिक्षा की नीति कागज पर तो वही है जो कपिल सिब्बल के समय थी. सवाल ये है कि आप किस तरह के लोगों को नियुक्त कर रहे हैं. किस तरह का वातावरण विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के कामकाज में बनाया है’

भाजपा के सत्ता में आने के बाद उसके कई सांसदों और नेताओं के विवादित बयान लगातार सियासी माहौल को सांप्रदायिक रंग भी देते हैं. लव जिहाद, राम मंदिर, बीफ, गोहत्या, राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्र आदि मसले इस पूरे दो साल के कार्यकाल में हमेशा न सिर्फ चर्चा में रहे हैं, बल्कि इन्हें लेकर कई जगह उपद्रव की स्थितियां बनीं. प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में इस पर कड़ा बयान देकर अपने नेताओें को सलाह भी दी थी कि ‘इस तरह की अनाप-शनाप बयानबाजी बंद होनी चाहिए’ लेकिन शायद हिंदूवादी अभियान चलाने वाले उनके सहयोगियों ने कोई सबक नहीं सीखा. केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति, सांसद योगी आदित्यनाथ, सांसद साक्षी महाराज, विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची, संगीत सोम आदि नेताओें की लगातार सांप्रदायिक बयानबाजी पर रोक न लगाना भी सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है. दादरी में अखलाक की हत्या के बाद शुरू हुई असहिष्णुता के विवाद ने सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत करवाई. कथित तौर पर कट्टरपंथी हिंदू संगठनों द्वारा तीन लेखकों की हत्या से गुस्साए लेखक खुलकर सरकार के विरोध में आए तो यह मसला व्यापक स्तर पर उठा. हालांकि, असहिष्णुता की बहस को सरकार ने राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह ठहराने का प्रयास किया. इतिहासकार एस इरफान हबीब कहते हैं, ‘आज जो संघ का राष्ट्रवाद है वह धर्म और संस्कृति के आधार पर भेदभाव करता है. जो उनके इस मानदंड को पूरा करता है वह राष्ट्रवादी है और जो नहीं कर पाता है उसे यह राष्ट्रवादी मानने से इनकार कर देते हैं. चूंकि पहली बार उनकी सरकार बनी है, तो अब इसे पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जा रही है.’ पुरुषोत्तम अग्रवाल चिंता जताते हैं, ‘देश में यह पहली बार है जब बोलना, लिखना या असहमति जताना गुनाह हो गया है. इस लिहाज से यह संकट का समय है.’ अरुण शौरी अपने इंटरव्यू में कहते हैं, ‘मुझे इस बात का डर है कि मोदी के नेतृत्व में सरकार जिस दिशा में कदम बढ़ा रही है वह भारत के लिए अच्छा नहीं है. इशारों में धमकियां देने का दौर चल रहा है. नागरिक स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के क्रम में और अधिक व्यवस्थित प्रयास भी किए जाएंगे.’  

‘डोमिसाइल नीति ने बाहरी आबादी को उनकी मुंहमांगी सौगात देने के साथ आदिवासियों के नैसर्गिक अधिकारों में कटौती कर दी है’

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झारखंड में रघुबर दास की भाजपा सरकार ने स्थानीय नीति लागू कर दी है. इस नीति के अनुसार 1985 को कट ऑफ डेट माना गया है.  जबकि झारखंडी जनता 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाने की मांग करती रही है. राज्य बनने के 15 साल बाद आई सरकार की इस नीति ने आजादी के तुरंत बाद भारी संख्या में आ बसी बाहरी आबादी को उनकी मुंहमांगी सौगात दे दी है तो झारखंड की मूलवासी और आदिवासी जनता के उस नैसर्गिक अधिकार में कटौती कर दी है, जिसकी गारंटी संविधान इस विशेष क्षेत्र के लिए करता है.

झारखंड अन्य भारतीय राज्यों की तरह सामान्य राज्य नहीं है, औपनिवेशिक समय से ही इस क्षेत्र को विशेष प्रावधानों के तहत शासित किया जाता रहा है. पांचवीं अनुसूची के द्वारा झारखंड की इस विशेष स्थिति को संविधान में बनाए रखा गया है. सन 2000 में इसका गठन भी स्वायत्तता और अलग प्रांत के लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद ही हुआ. देश का यह पहला आदिवासी बहुल राज्य है जिसने 1928 में झारखंड को अलग प्रशासनिक क्षेत्र बनाने का ज्ञापन साइमन कमीशन को दिया था. ज्ञापन में कहा गया था कि सबसे ज्यादा राजस्व (वनोपज, खनन, उद्योग से) देने के बावजूद झारखंड के आदिवासियों को शिक्षा, नौकरी और प्रशासन में भागीदारी से वंचित रखा जा रहा है. बंगाल-बिहार उनके साथ भेदभाव कर रहे हैं. इससे उनकी भाषा-संस्कृति और पहचान खतरे में है.

1940 में इन्हीं सवालों पर जयपाल सिंह मुंडा ने कांग्रेस को घेरा और 1970 तक गांधी-नेहरू नीतियों को राजनीतिक तौर पर धूल चटाते रहे. अस्सी-नब्बे के दशक में झामुमो और आजसू के उभार के पीछे भी 1932 के खतियान धारकों के मूल अधिकार- शिक्षा, रोजगार, भाषा-संस्कृति, परंपरागत स्वशासी व्यवस्था की बहाली का हनन और खनन व उद्योगों के कारण होने वाला भारी विस्थापन और बाहरी आबादी का दबाव रहा है. इसलिए डोमिसाइल का मुद्दा झारखंड के लिए कोई सामान्य मुद्दा नहीं है, यह झारखंड की विशिष्ट आदिवासी जनता के विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक अस्मिता का मसला है. यह जीवन-मरण का मुद्दा है जिसके लिए आदिवासियों का इतिहास जाना जाता है. चाहे वह 18वीं सदी के मध्य में हुआ बाबा तिलका का शहीदी विरोध हो, 1830-32 का सारंडा से लेकर चतरा तक पसरा कोल का युद्ध हो, 1855 का संताल हूल हो या 1900 में बिरसा के नेतृत्व में हुआ उलगुलान. इसी कारण 17वीं सदी के अंत से 20वीं सदी की शुरुआत तक अंग्रेज शासकों को बार-बार ‘विल्किंसन रूल 1832’ और ‘छोटानागपुर टेनेंसी ऐक्ट 1908’ जैसे कानून बनाने पड़े ताकि वे आदिवासियों का भरोसा जीत सकें. 1949 में भारतीय संविधान ने भी पांचवीं अनुसूची से आदिवासियों को भरोसा दिया लेकिन रघुबर दास ने 2016 में स्थानीय नीति बनाकर यह भरोसा छीन लिया. राज्य गठन की मूल झारखंडी भावना को सदा-सदा के लिए खारिज कर दिया. इसका दूरगामी लाभ भाजपा को मिलेगा, पर उसने हमेशा के लिए आदिवासी-मूलवासी समर्थन खो दिया है.

राजनीतिक दलों की यह मजबूरी होती है कि वे सत्ता में बने रहने के लिए विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच अपना संतुलन बनाए रखें. 1960 के बाद झारखंड की संरचना बाहरी आबादी के कारण स्पष्ट रूप से दो वर्गों- झारखंडी और गैर-झारखंडी में विभाजित हो गई है. इसलिए झामुमो, आजसू जैसे झारखंडी दल भी विरोध के जरिए अपने मुख्य मूलवासी-आदिवासी आधार को इस सवाल पर हिमायती बने रहने का आश्वासन तो दे रहे हैं, परंतु समूचे राज्य में जो आक्रोश है, उसका नेतृत्व करने को तैयार नहीं हैं. क्योंकि ऐसा करने से दूसरा सामाजिक वर्ग जो गैर-झारखंडियों का है, उनसे पूरी तरह से अलग हो जाएगा, और वे सत्ता में आने की संभावना खो बैठेंगे. भाकपा माले इस मुद्दे पर मुखर है और ईमानदार भी, परंतु उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित है. इसलिए अगर कोई संगठित राजनीतिक विरोध इस स्थानीय नीति के खिलाफ नहीं दिख रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि झारखंडी जनता ने इसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लिया है. राजनीतिक पंडितों को आने वाला समय चकित करेगा क्योंकि आदिवासी जनता धीरे-धीरे सुलगती है, वह तत्काल प्रतिक्रिया नहीं करती. देखती है, सुनती है, गुनती है और फिर जब लामबंद होती है, तो इतिहास बदल जाता है. पिछले 250 सालों की अनवरत संघर्ष परंपरा उनकी इसी मानसिकता को बताती है. क्योंकि डोमिसाइल का सवाल ऐतिहासिक है, झारखंड की आदिवासी अस्मिता से जुड़ा है. आग लगी हुई है, और तेज हवा चलेगी ही, फिर तो बहुत कुछ जलेगा.

अब नहीं हो रहा दिल पे काबू…!

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साल 2002 में आई भट्ट कैंप की फिल्म ‘राज’ की याद तो अब भी आपको रह- रहकर आती ही होगी.   फिर तो वो भूत भी याद होगा जिसका रोल मालिनी शर्मा ने निभाया था. क्यों क्या हो गया? जी ललचाए, रहा न जाए… टाइप फीलिंग आ रही है न? चलिए सस्पेंस के बादल हटा देते हैं. दरअसल भट्ट कैंप 14 साल बाद इस फिल्म को ‘राज रिबूट’ नाम से रिलॉन्च कर रहा है. हालांकि इसे फिल्म का चौथा संस्करण भी बताया जा रहा है. खैर इस फिल्म के साथ बॉलीवुड में एक नई तारिका कदम रखने काे एकदम तैयार नजर आ रही है. इनका नाम है कृति खरबंदा. फिल्म में वे इमरान हाशमी और गौरव अरोड़ा के साथ नजर आएंगी. बॉलीवुड में कृति भले ही नई हों लेकिन तेलुगु और कन्नड़ सिनेमा में वे एक जाना-पहचाना नाम हैं. लेकिन इससे हमें क्या. हमें तो मतलब फिल्म ‘राज’ से है. जैसे- क्या उनका रोल मालिनी शर्मा जैसा ‘हाहाकारी’ होगा? और फिल्म में इमरान हैं तो कुछ नहीं तो ‘वो’ सब होगा ही, अगर ऐसा है तो भाई अभी से वो गाना याद आने लगा है, अब नहीं हो रहा दिल पे काबू सनम, आपकी चाहतों में है जादू सनम… क्यों आ रहा है न याद?


 

आलिया और नीतू में कैट फाइट

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बिहारी अस्मिता के नाम पर दो हीरोइनों में भिड़ंत हो गई है. विवाद आलिया भट्ट की आने वाली फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ से जुड़ा है जिसमें आलिया एक बिहारी मजदूर का रोल निभा रही हैं. फिल्म के ट्रेलर में उनके एक डायलॉग पर कुछ लोग नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं. अब डायलॉग में क्या है ये हम नहीं बताएंगे, जाकर यू-ट्यूब पर देख लीजिए. बहरहाल इसे लेकर आलिया से नाराज हुई हैं फिल्म ‘ट्रैफिक सिग्नल’ फेम नीतू चंद्रा. ओपन लेटर लिखने के इस दौर में उन्होंने भी आलिया के नाम एक पत्र लिखा है जिसका कुल मिलाकर सार है कि आलिया के इस किरदार से बिहारियों की छवि खराब करने की कोशिश की जा रही है. आलिया ने इसके जवाब में कहा, ‘ट्रेलर से अनुमान लगाकर कुछ भी कहने से बेहतर होगा कि ऐसे लोग चुप रहें.’


 

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काम की मारी, समांथा बेचारी    

दक्षिण की कुछ खूबसूरत हीरोइनों में शुमार ‘मक्खी’ फेम समांथा रुथ प्रभु  ‘थेरी’ और ‘24’  जैसी ब्लॉकबस्टर देने के बाद कुछ समय के लिए ब्रेक लेने की बात कही तो बवाल मच गया. तब गर्मी थाेड़ी और बढ़ गई जब उन्होंने एक ट्वीट करके बोल दिया, ‘किसने कहा कि मैं सिंगल हूं?’ इसके बाद तो अटकलों का बाजार गर्म हो गया. उनके चाहने वालों के जेहन में छिपे जासूस के दिमाग में तमाम प्रश्नवाचक शब्द उमड़ने-घुमड़ने लगे. तो आपको बता दें कि ऐसी कोई बात नहीं. अरे नहीं भाई… जैसा आप सोच रहे हैं ‘वैसी’ भी कोई बात नहीं. दरअसल पिछले काफी दिनों से लगातार काम करने की वजह से कुछ दिनों के लिए उन्होंने शूटिंग से ब्रेक लेकर आराम फरमाने का मन बनाया है. इसलिए वे ट्वीट करके आपके मजे ले रही हैं. दिखावे पर न जाओ, अपनी अकल लगाओ… बूझ गए न मोहन प्यारे?