मणिपुर में पिछले साल अगस्त में पारित हुए तीन विधेयकों को लेकर हो रही हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है. अब इनर लाइन परमिट सिस्टम के लिए गठित संयुक्त समिति (जेसीआईएलपीएस) की ओर से बुलाई गई हड़ताल से मणिपुर का आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है. जेसीआईएलपीएस ने तीन विधेयकों पर कानून बनाने के दबाव के लिए आंदोलन का आह्वान किया है. पिछले साल 31 अगस्त को इन विधेयकों को मणिपुर राज्य विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया था. जेसीआईएलपीएस के संयोजक रतन ने बताया कि ये विधेयक राज्य में इनर लाइन परमिट सिस्टम के क्रियान्वयन से संबंधित हैं. इसमें राज्य की मूल आबादी को बाहरी राज्यों और म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से आने वाले लोगों से संरक्षण का प्रावधान किया गया है. गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में मणिपुर विधानसभा द्वारा पास किए गए तीन विधेयकों के विरोध प्रदर्शन ने उग्र रूप धारण कर लिया था. उस दौरान भड़की हिंसा में पुलिस फायरिंग के दौरान नौ लोगों की मौत हो गई जबकि 35 से अधिक लोग घायल हो गए थे.
अब मेघालय में कांग्रेसी असंतुष्ट!
अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बगावत का सामना करने के बाद कांग्रेस के सामने अब मेघालय में चुनौती आ खड़ी हुई है. कांग्रेस के कुछ विधायक और मंत्री मुख्यमंत्री मुकुल संगमा को हटाने की मांग कर रहे हैं. असंतुष्ट विधायकों का आरोप है कि संगमा तानाशाह के रूप में काम कर रहे हैं और बिना पूछे फैसले ले रहे हैं. हाल ही में तुरा लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद मामला और गंभीर हो गया. इस उपचुनाव में मुकुल संगमा की पत्नी दिकांची डी शिरा कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरी थीं. लेकिन उन्हें पूर्व लोकसभा स्पीकर पीएम संगमा के बेटे कोनराड के संगमा ने 1.92 लाख वोटों से हरा दिया. राज्य में यह जीत का सबसे बड़ा अंतर है. सूत्रों का कहना है कि पार्टी आलाकमान बगावत को लेकर गंभीर है. 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास 30 सीटें हैं. साथ ही उसे राकांपा के दो और 11 निर्दलीयों का समर्थन है. विपक्ष में मेघालय पीपल्स फ्रंट के 12, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के आठ, नेशनल पीपल्स पार्टी के दो और दो निर्दलीय विधायक हैं. इनके अलावा हिल्स स्टेट पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के चार और एनईएसडीपी का एक विधायक है.
लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू होतीं तो अनुराग ठाकुर कभी बीसीसीआई के अध्यक्ष नहीं बन पाते : आदित्य वर्मा
आदित्य वर्मा के बारे में शायद कम ही लोग जानते हों लेकिन यही वे शख्स हैं जो पिछले लगभग दो साल से भारतीय क्रिकेट में मची हलचल का कारण रहे. सुप्रीम कोर्ट में लगाई इनकी ही याचिका के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से एन. श्रीनिवासन की छुट्टी हुई जिनके सामने बोर्ड में मौजूद हर व्यक्ति का कद बौना नजर आता था. जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की वह रिपोर्ट जिसने बीसीसीआई को जड़ों तक हिला डाला है, आदित्य वर्मा द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई एक याचिका का ही परिणाम है. बीसीसीआई के साथ आदित्य वर्मा की अदावत पुरानी है, वे 2007 से ही बिहार में क्रिकेट को बेहतर दर्जा दिलाने के लिए बोर्ड के साथ मुकदमे लड़ रहे हैं. अपनी इस लड़ाई को वे उस मुकाम तक ले गए जिसने सिर्फ बोर्ड की अंदरूनी राजनीति का ही नजारा नहीं बदला बल्कि भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत की नींव भी रख दी है. इंतजार है तो बस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के आने का जहां वह जस्टिस लोढ़ा समिति की सिफारिशों पर अपना रुख स्पष्ट करेगा. लोढ़ा समिति की सिफारिशों, उन्हें लागू करने में बोर्ड की आनाकानी, बोर्ड की कार्यप्रणाली, अंदरूनी राजनीति, देश में क्रिकेट के विकास और बिहार में क्रिकेट के हालातों को लेकर क्रिकेट एसोसिएशन आॅफ बिहार (कैब) के सचिव आदित्य वर्मा से बातचीत.
लोढ़ा समिति की सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाए सख्त रवैये के बीच नवनिर्वाचित बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर का बयान आया है कि ये सिफारिशें व्यावहारिक नहीं हैं?
उन्हें कहने दीजिए, सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है. जल्द ही फैसला हो जाएगा. उन्हें लगता है कि व्यावहारिक नहीं हैं और हम कहते हैं कि भारतीय क्रिकेट में फैले प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दूर करने, खेल की लोकप्रियता देश के हर कोने तक पहुंचाने और क्रिकेट में सुधार लाने के लिए लोढ़ा समिति की सिफारिशों को मानना आवश्यक है. भारतीय क्रिकेट पर पिछले कुछ समय में लगे दागों से भद्रजनों के इस खेल की जो भद्द पिटी है, उससे उबरना है तो इन सिफारिशों को लागू करना ही होगा.
बोर्ड के वे कौन प्रभावशाली लोग हैं जिनके हित लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू करने में आड़े आ रहे हैं?
लोढ़ा समिति द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश रिपोर्ट में कुछ अति महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जैसे- किसी भी बोर्ड पदाधिकारी की उम्र 70 साल से अधिक न हो, सरकार में मंत्री या सरकारी अधिकारी बोर्ड में कोई भी पद ग्रहण नहीं कर सकते, एक व्यक्ति एक ही पद पर रह सकता है यानी कि वह या तो अपने राज्य क्रिकेट संघ का प्रतिनिधित्व कर सकता है या फिर बोर्ड का. और सबसे बड़ी बात, अगर कोई व्यक्ति किसी भी पैनल के तहत किसी भी कोर्ट में चार्जशीटेड है, उसके बोर्ड में दखल पर पाबंदी है.
अब जरा समझिए बोर्ड के कामकाज का वर्तमान तरीका. अनुराग ठाकुर जो हाल ही में बोर्ड अध्यक्ष बने हैं, भारतीय ओलंपिक संघ के भी उपाध्यक्ष हैं, हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ (एचपीसीए) के भी अध्यक्ष हैं और एचपीसीए स्टेडियम निर्माण घोटाले में उन पर अदालत में चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है. लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू होतीं तो अनुराग कभी बोर्ड अध्यक्ष नहीं बन पाते. ऐसे ही कई ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ वाले लोग बोर्ड में विभिन्न पदों पर बैठे हुए हैं. लोढ़ा समिति की सिफारिशें उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देंगी.
ऐसा माना जाता है कि बीसीसीआई में फैसले बंद कमरे में होते हैं. आप बोर्ड पदाधिकारियों के करीब रहे हैं, आपको इसमें कितनी सच्चाई जान पड़ती है?
दस मई को लोढ़ा समिति की सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई और शाम को शशांक मनोहर ने इस्तीफा दे दिया. कोर्ट को सूचित भी नहीं किया. ठीक 11 दिन बाद अनुराग ठाकुर अध्यक्ष पद पर विराजमान हो गए. यह सब बंद कमरे में नहीं तो कहां हुआ? बीसीसीआई कहने को तो विश्व का सबसे अधिक प्रभावशाली क्रिकेट बोर्ड है. लेकिन उसका कामकाज चंद लोगों की मुट्ठी में है. महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण फैसला बंद कमरे में हो जाता है, जिसमें न कोई पारदर्शिता होती है और न जवाबदेही. शशांक मनोहर ने अध्यक्ष बनते समय बोर्ड के कार्यों में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचारमुक्त माहौल बनाने की बातें कही थीं. पर ऐसी पारदर्शिता लाए कि बिना किसी जवाबदेही के आईसीसी निकल लिए, बीसीसीआई को मंझधार में छोड़कर. क्योंकि सिफारिशें उनके गले की फांस भी बन सकती थीं तो उन्होंने सेफ जोन में रहना चुना. सचिव अनुराग ठाकुर ने स्पेशल जनरल मीटिंग (एसजीएम) बुलाई और खुद अध्यक्ष बनकर बैठ गए. एसजीएम से पहले नियमानुसार उन्होंने बोर्ड मेंबर के साथ एक मीटिंग लेना भी जरूरी नहीं समझा.
लोढ़ा समिति की सिफारिशों को अगर सुप्रीम कोर्ट हरी झंडी दिखाती है तो क्या अनुराग ठाकुर के लिए अध्यक्ष पद पर बने रहना मुश्किल होगा?
बिल्कुल मुश्किल होगा. उनका निर्वाचन संकट में आ सकता है. सबसे पहले तो यह कि वो चार्जशीटेड हैं और बोर्ड ने सिफारिशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो अपना जवाब पेश किया है उसमें हर सिफारिश का विरोध किया है लेकिन चार्जशीट वाले मसले पर चुप्पी साध ली है. कानूनी भाषा में इसे ऐसे देखा जाता है कि अगर आप किसी चीज पर एेतराज नहीं जता रहे तो मतलब आप उसे स्वीकार कर रहे हैं. एक तरह से देखा जाए तो बोर्ड ने इस सिफारिश का समर्थन किया. जब आप समर्थन करते हैं तो फिर आप अध्यक्ष कैसे बन गए? सवाल यह भी है.
सीधी-सी बात है कि अभी भी बोर्ड पदाधिकारियों द्वारा नियमों को तोड़-मरोड़ कर अपने हित में प्रयोग किया जाता है?
हां, मतलब जिस ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ के चलते इतना बवाल मचा, वो हालात अभी भी बोर्ड में कायम हैं. अपने फायदे के लिए लोग काम कर रहे हैं.
एक बात यह भी निकलकर आती है कि बोर्ड 70-75 फीसदी सिफारिशों को मानने के लिए तैयार है. कह सकते हैं कि ये वही सिफारिशें होंगी जिनसे पदाधिकारियों के हित प्रभावित न हों?
वो क्या-क्या चाहते हैं, उससे हमको लेना-देना नहीं है. हम चाहते हैं कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें पूरी तरह से लागू हों. इसके लिए हम सुप्रीम कोर्ट में मुस्तैद हैं. हमारे वकील इसी पर बहस करेंगे.
आपकी लड़ाई बिहार क्रिकेट को उसका हक दिलाने की मांग से शुरू हुई, बताएंगे कि बिहार क्रिकेट का पूरा विवाद क्या है?
1935 से बिहार क्रिकेट एसोसिएशन बीसीसीआई का पूर्ण सदस्य था. 1975-76 में बिहार की टीम ने रणजी ट्राॅफी का फाइनल भी खेला था. सुब्रतो बनर्जी, रमेश सक्सेना, रणधीर सिंह, सबा करीम बिहार से खेलकर ही भारतीय टीम का हिस्सा बने थे. बिहार के पटना में मोइन-उल-हक स्टेडियम है, 1996 विश्वकप के मैच यहां भी हुए थे. लेकिन दुर्भाग्यवश 2000 में राज्य का विभाजन हुआ और झारखंड राज्य बना.
अगर मुझसे पूछिए तो मैं ललित मोदी को दोषी नहीं मानता. अगर वे दोषी हैं तो उनके साथ 2004 से लेकर 2010 तक बोर्ड में जितने भी लोगों ने काम किया है, वे सारे लोग दोषी हैं
इसके बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएशन का नाम बदलकर झारखंड राज्य क्रिकेट संघ कर दिया गया. 13 जिलों वाले झारखंड को बोर्ड की पूर्ण सदस्यता दे दी गई. बिना किसी नियम और कानून के जनसंख्या के लिहाज से देश के तीसरे सबसे बड़े राज्य बिहार को बाहर कर दिया गया. जबकि विभाजन उस समय उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का भी हुआ था. वे आज भी बोर्ड के पूर्ण सदस्य हैं, बस बीसीसीआई के दोमुंहे चरित्र के कारण बिहार के साथ पक्षपात किया गया. 6 करोड़ की आबादी वाले गुजरात में 3 रणजी टीमें हैं. महाराष्ट्र में चार पूर्ण सदस्य हैं, तीन रणजी टीम हैं. वहीं बिहार में एक भी रणजी टीम नहीं है.
अब रहा सवाल बिहार में कई एसोसिएशन होने का तो एसोसिएशन ऑफ बिहार क्रिकेट कीर्ति आजाद ने बनाया. राज्य विभाजन के बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन बनाया गया. 2007 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के ही हम कुछ सदस्यों ने मिलकर बिहार क्रिकेट को उसका हक दिलाने की लड़ाई लड़ने के लिए क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (कैब) का गठन किया. कैब के प्रतिनिधि के तौर पर मैंने पूरी लड़ाई लड़ी. फिर चाहे फुल मेंबरशिप का मसला हो या फिर आईपीएल में फैले भ्रष्टाचार और घोटालों का मामला हो.
मेरा एकमात्र उद्देश्य है कि बिहार के बच्चे जो हिंदुस्तान के इस सबसे लोकप्रिय खेल से कोसों दूर हैं, उन्हें भी इस खेल में अपना भविष्य संवारने का मौका मिले. उनका क्या गुनाह है? बिहार में वो पैदा हुए हैं, क्या यही गुनाह है? अगर वो बिहार में पैदा हुए भी हैं तो क्या उन्हें उनके राज्य और देश से खेलकर क्रिकेट में भविष्य तराशने का हक नहीं है? ये तो संवैधानिक अधिकारों का हनन है. जब बिहार के सांसद भारत सरकार की कैबिनेट में मंत्री हो सकते हैं तो क्या बिहार के बच्चे रणजी ट्राॅफी, आईपीएल और भारत के लिए नहीं खेल सकते? ये बोर्ड का दोहरा मापदंड है और मुझे देश की न्यायिक प्रणाली से पूरी उम्मीद है कि बिहार के साथ न्याय होगा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खेल के साथ हो रहे खिलवाड़ का अंत पूरी दुनिया देखेगी.
बीसीसीआई की बात करें तो वह पूरे देश में क्रिकेट के विकास की बात करता है लेकिन जैसा आपने बताया कि बिहार पूरी तरह विकास से वंचित है, उत्तर-पूर्वी भारत के राज्यों का भी कुछ ऐसा ही हाल है. ये कैसा विकास है?
देश में 31 राज्य हैं लेकिन बीसीसीआई के नक्शे पर भारत 20 राज्यों में ही बसता है. वहां के बच्चे ही घरेलू क्रिकेट खेलकर भारतीय टीम का हिस्सा बनते हैं. पूछे कोई इनसे कि बाकी राज्य क्या पाकिस्तान और श्रीलंका में जाकर क्रिकेट खेलेंगे? बोर्ड भारत की टीम बनाता है तो उसकी जवाबदेही है कि देश के हर राज्य के बच्चों को बराबर मौका दे.
मत भूलिए कि भारत को ओलंपिक में मेडल दिलाने वाली मैरीकॉम और सरिता देवी उत्तर-पूर्वी राज्यों से ही हैं. अगर वो भी बीसीसीआई के अंग रहते तो आज आप उनका नाम नहीं सुनते क्योंकि बीसीसीआई के लिए ये राज्य अछूत हैं, उन्हें लगता है कि राज्य देश के बाहर हैं.
बोर्ड के इन 11 राज्यों से कटे होने के पीछे आपको क्या कारण जान पड़ता है? आर्थिक कारण हैं, भौगोलिक कारण हैं या फिर स्थानीय कारण हैं?
पैसे का कारण है. पैसा ज्यादा बंटने लगेगा न. इन्हें डर है कि इनकी तिजोरी खाली हो जाएगी और इन राज्यों से राजस्व कम मिलेगा. लेकिन अब ज्यादा दिन ऐसा नहीं चलेगा. राज्यों को क्रिकेट विकास के नाम पर बोर्ड जो पैसा देता है उस पर अब सुप्रीम कोर्ट की नजर है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पिछले पांच साल में 2200 करोड़ रुपये राज्यों को दिए गए. अब वो इसका हिसाब मांग रहा है कि ये पैसा कैसे और कहां खर्च हुआ. कितना क्रिकेट के विकास पर खर्च हुआ और कितना खुद के विकास पर. इनकी रातों की नींद उड़ गई है. एक राज्य को साल में 30-35 करोड़ रुपये क्रिकेट विकास के नाम पर बोर्ड देता है. उसमें क्या पारदर्शिता बरतता है और क्या उसकी जवाबदेही है? सुप्रीम कोर्ट इस पर सवाल खड़े कर चुकी है. इसलिए इंतजार कीजिए जुलाई में फैसला आने का. जब देश की गर्मी उतरेगी और बरसात का सुहाना मौसम शुरू होगा तब बीसीसीआई में भी एक सुहाना मौसम शुरू होगा और बीसीसीआई की गर्मी को सुप्रीम कोर्ट किस तरह ठंडा करती है ये देखिएगा जुलाई में.
आईपीएल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में आपके द्वारा लगाई गई याचिका में आपकी मुख्य मांगें क्या थीं?
मेरा मांग तो सिर्फ ये थी कि आईपीएल में जो गड़बड़ी हुई है, उसको दबाया जा रहा है. श्रीनिवासन अपने दामाद को बचा रहे हैं, टीमों को बचा रहे हैं. यहां सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उसने श्रीनिवासन युग का तो अंत किया ही, फिर जब देखा कि बोर्ड में कितनी गंदगी भरी है तो इसके लिए लोढ़ा समिति का गठन कर इनके ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’, फंड, फंक्शन, कार्यप्रणाली सबकी विस्तृत जांच करवाई.
मतलब सुप्रीम कोर्ट से आपने जो उम्मीद जताई थी उससे ज्यादा आपको मिला?
मुझे मिला कुछ नहीं है, बस एक आशा की किरण दिखाई पड़ी है. और मुझे व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं मिलेगा. मिलेगा तो 11 राज्यों के उन वंचित बच्चों को जो चाहते हुए भी अपने राज्य या देश के लिए क्रिकेट नहीं खेल पा रहे हैं. जन्म से ही क्रिकेट टीवी में देखते हुए बड़े होते हैं और स्कूल, गली-मोहल्लों में खेलकर उनका क्रिकेट खत्म हो जाता है. क्योंकि बोर्ड कहता है कि इन राज्यों में क्रिकेट संस्कृति नहीं है और हम क्रिकेट नहीं कराएंगे. अब ये सब चीजें ठीक हो जाएंगी.
जब ललित मोदी पर खुलासा हुआ तो ऐसा माना गया कि भारतीय क्रिकेट की सारी समस्याओं की जड़ में वही थे, अब सब कुछ ठीक हो गया है. लेकिन आज हम देखते हैं कि चीजें तब से ज्यादा बिगड़ती जा रही हैं?
अगर मुझसे पूछिए तो मैं ललित मोदी को दोषी नहीं मानता. अगर वे दोषी हैं तो उनके साथ 2004 से लेकर 2010 तक बोर्ड में जितने भी लोगों ने काम किया है, वे सारे लोग दोषी हैं. वैसे भी ललित मोदी कभी भी बीसीसीआई के किसी बहुत ताकतवर पद पर नहीं थे. वे दो साल आईपीएल गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन जरूर रहे लेकिन अगर वे दोषी हैं तो गवर्निंग काउंसिल में उस समय उनके साथ काम करने वाले तमाम सदस्य भी दोषी हैं. आप ललित मोदी पर निशाना साधकर ईमानदारी की चादर ओढ़ लीजिएगा, ये चीज अब चलने वाली नहीं है. सबको दिख रहा है कि बीसीसीआई की असली दुर्दशा तो ललित मोदी के जाने के बाद ही हुई है.
क्या आप कहना चाहते हैं कि उस समय जितनी भी समस्याएं थीं उन्हें तात्कालिक तौर पर ललित मोदी के सिर पर थोपकर दिखाया गया कि सब कुछ सही है?
जी, ऐसा ही हुआ था.
टीवी पर विज्ञापन दिखाने को लेकर बीसीसीआई बिल्कुल अड़ गया है. वह लोढ़ा समिति की इस सिफारिश को मानने के लिए कतई तैयार नहीं कि मैच के दौरान केवल इंटरवल में विज्ञापन दिखाया जाए. बोर्ड का तर्क है कि वह ब्राॅडकास्टिंग अधिकारों के जरिए अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा पाता है, जिसे क्रिकेट के विकास पर खर्च करता है. अगर विज्ञापन दिखाना बंद किया जाता है तो इससे राजस्व की कमी होगी और भारतीय क्रिकेट का विकास प्रभावित होगा.
वे लोग गलत तर्क दे रहे हैं. विज्ञापन स्लॉट बेचता कौन है? बोर्ड अपने हिसाब से स्लॉट बेचता है. क्रिकेट की लोकप्रियता को देखते हुए बोर्ड जो स्लॉट निर्धारित करेगा उस स्लॉट पर बिक्री होगी. इससे बीसीसीआई को कोई घाटा नहीं होगा. देखिए बाजार में जब आलू-प्याज गायब हो जाता है तो बीस रुपये किलो बिकने वाला आलू सौ रुपये किलो में बिकने लगता है. इसलिए स्लॉटिंग समय घटेगा तो दूसरे एंगल से समय मिलेगा. उसको आप मुंह मांगे दामों पर बेचिए. मान लीजिए तीन सौ करोड़ रुपये सालाना बेच रहे हैं तो 1000 करोड़ का भी बेचेंगे तब भी लोग कूद-कूदकर अपना टेंडर भरेंगे. ये सब धोखे में रखने का हथकंडा है. घाटे की बात तर्कहीन है.
आईपीएल को तो इस सिफारिश से बाहर रखा गया है, बोर्ड चाहे तो आईपीएल के ब्रॉडकास्टिंग अधिकार अपने हिसाब से बेचकर राजस्व की उगाही कर सकता है.
इनको पैसे की लत लग गई है. इनके मुंह में खून लग चुका है और इनका एकमात्र उद्देश्य रह गया है कि किसी तरह मार्केटिंग करो, अपनी जेब भरो, तिजोरी भरो. आईपीएल तो अभी फिर से भारत के बाहर सितंबर में ही कराने जा रहे हैं. आईसीसी के कैलेंडर में 28 दिन तक कोई भी मैच नहीं है. बाकी राज्यों में क्रिकेट का विकास हो या नहीं हो, कोई मतलब नहीं है लेकिन अब इस बात की खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट इनके प्रशासनिक ढांचे में दखल दे चुका है इसलिए अब इनकी जो हेकड़ी है वो ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाली.
राज्य क्रिकेट संघों द्वारा लोढ़ा समिति की सिफारिशों पर आपत्ति जताने के पीछे क्या कारण दिखाई देता है?
उनको जताने दीजिए न. जिनका पैसा जाएगा, जो लोग दशकों से राज्य क्रिकेट संघों में जमे हुए हैं, उनकी तो दुकान बंद हो रही है तो क्यों नहीं आपत्ति जताएंगे? मेरे पूछने का मतलब है कि वे एक तरफ तो बोर्ड को सोसाइटी बताते हैं और दूसरी तरफ उसको अपनी दुकान की तरह चला रहे हैं. हिंदुस्तान में अच्छे लोगों की कमी नहीं है जो बीसीसीआई को अच्छे ढंग से चला सकें. इंतजार कीजिए ये लोग जाएं, अभी बहुत अच्छे-अच्छे लोग तैयार बैठे हैं बीसीसीआई को और ऊंचाई तक ले जाने के लिए.
बार-बार बीसीसीआई खुद के सोसाइटी होने की दुहाई देकर सिफारिशों को लागू करने से बचने का रास्ता ढूंढ़ता है, उसका तर्क कहां तक सही है?
जब हमारी लगाई याचिका से बोर्ड मुंबई में हारा, तभी से ये लोग यह बात कह रहे हैं. अगर ऐसा ही होता तो एक निर्वाचित अध्यक्ष श्रीनिवासन को सुप्रीम कोर्ट ने कैसे बाहर का रास्ता दिखा दिया! उनको जो कहना है कहने दीजिए, बाकी इंतजार कीजिए अगले आदेश का. बोर्ड किसी की निजी संपत्ति या दुकान नहीं है. अब वे कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट वाले लोग कितने ही बहाने बनाएं, जल्द ही पतली गली से अपने घर निकलेंगे.
देश में जब यूपीए की सरकार थी तब खेल मंत्री अजय माकन ने भी बोर्ड की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने और उसे आरटीआई के दायरे में लाने की वकालत अपने ‘खेल बिल’ में की थी, तब भी बोर्ड के बड़े प्रशासनिक खिलाड़ियों ने इसका जमकर विरोध किया था. बात तो ये लोग करते हैं कि बोर्ड में सब ठीक चल रहा है, जब सब ठीक है तो फिर इन्हें आरटीआई से क्या समस्या है?
आरटीआई और कैग से समस्या इसलिए है कि बोर्ड की प्रशासनिक गतिविधियों में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव है. पैसे के लेन-देन में हेर-फेर है. मुंह मांगा पैसा दिया जाता है, कोई हिसाब-किताब नहीं है कि पैसा सही जगह पर जाता है या किसी की जेब में जाता है, तिजोरी में जाता है या फिर बैंक लॉकर में जाता है. तो जब इस सबकी जानकारी बाहर आएगी तो बहुतों की रातों की नींद उड़ जाएगी, बहुतों को जेल की भी हवा खानी पड़ेगी.
ऐसा कहा जाता है कि बोर्ड की राजनीति में दखल रखने वालों ने श्रीनिवासन को अपने रास्ते से हटाने के लिए आपको मोहरा बनाकर इस्तेमाल किया?
देखिए, जब हम अपने बिहार के क्रिकेट की लड़ाई लड़ते-लड़ते श्रीनिवासन के कनफ्लिक्ट आॅफ इंटरेस्ट तक आ गए, उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन के गिरफ्तार होते ही जैसे-जैसे लड़ाई हमारे पक्ष में होती गई तो शशांक मनोहर सहित वर्तमान में बीसीसीआई में जितने भी लोग हैं मेरे करीब आते गए. किसी ने मुझे समय पर पेपर मुहैया कराया तो किसी ने कानूनी सलाह देने में मेरी मदद की तो किसी ने बोर्ड से जुड़े अहम दस्तावेज मुझे मुहैया कराए. मुझे यहां तक कहा गया कि श्रीनिवासन के जाने के बाद कैब को बिहार में क्रिकेट के संचालन की कमान सौंप दी जाएगी. लेकिन हुआ ठीक उल्टा. श्रीनिवासन तो चले गए, इनका रास्ता साफ हो गया. लेकिन उसके बाद ये लोग मेरे पीछे लग गए. मुझे रास्ते से हटाने लगे. अपने हित साधकर मेरी पीठ में छुरा घोंपा.
बिहार क्रिकेट को उसका हक दिलाने की लड़ाई लड़ने के लिए कैब का गठन किया. मेरा एकमात्र उद्देश्य है कि बिहार के बच्चे जो इस लोकप्रिय खेल से कोसों दूर हैं, उन्हें भी भविष्य संवारने का मौका मिले
मतलब इन लोगों ने आपके जरिए अपना रास्ता साफ कर लिया जब आप इनके किसी काम के नहीं रहे तो आपसे किनारा कर लिया?
अब ये उनकी सोच होगी. मेरी तो ऐसी सोच नहीं थी. लेकिन एक इंसान होने के कारण मुझे तो बुरा लगा न. मैंने सब कुछ दांव पर लगाकर ईमानदारी से लड़ाई लड़ी और बीसीसीआई को साफ करने का बीड़ा उठाया. जब इन लोगों के हाथ में सत्ता आई तो ये लोग मुझे ही बाहर करने की तरकीबें खोजने लगे. रत्नाकर शेट्टी, जो बोर्ड कार्यालय के प्रशासनिक इंचार्ज हैं, उनके द्वारा मेरे कार्यालय में दाखिल होने पर पाबंदी लगा दी गई. फिर समझ आया कि श्रीनिवासन को हटाने में इनके हितों में टकराव हो रहा था. उनके रहते ये लोग खुलकर सांस भी लेना चाहें तो नहीं ले सकते थे. अब वो तो चले गए. उनके जाने का जरिया भगवान ने मुझे और देश की शीर्ष अदालत को बनाया. अब इन लोगों ने मुझे बाहर बैठाने का मन बना लिया.
उन्हें आपसे ऐसा क्या डर हो गया?
ये तो बेहतर वही बताएंगे. उनको लगता होगा कि जो इंसान घोटाले-भ्रष्टाचार में इतनी ईमानदारी से लड़ सकता है, अगर हमारे साथ रहेगा तो कभी हमारे खिलाफ मामला उजागर होने पर हमें भी नहीं छोड़ेगा. बाहर रहकर इतना सब कुछ किया, जब बोर्ड के अंदर साथ रहेगा तो सब सामने देखेगा कि क्या गड़बड़झाला चल रहा है, रोज लड़ाई करेगा. इसको अंदर नहीं आने दो और अंदर न आने देने का एक ही जरिया था कि कैब को मान्यता न देना.
बोर्ड में श्रीनिवासन के प्रभाव के चलते किसी पदाधिकारी की हिम्मत नहीं थी कि वह उनके विरोध में एक शब्द भी बोल सके फिर आप क्या सोचकर उनके खिलाफ मैदान में ताल ठोक बैठे?
मैंने श्रीनिवासन से ये सोचकर लड़ाई लड़ी कि उनके हटने के बाद से बोर्ड में एक व्यापक सुधार आ जाएगा. लेकिन ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. जिस तरह रावण के दस सिर थे न, उसी तरह बीसीसीआई में लोग श्रीनिवासन से भी बड़े-बड़े कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट रखने वाले भरे पड़े हैं. एक श्रीनिवासन गया है, कई बाकी हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि जिस तरह से रावण का अंत हुआ है उसी तरह से बीसीसीआई में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी अंत होगा.
यदि लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू होती हैं तो देश में क्रिकेट में क्या बदलाव आने की आप अपेक्षा करते हैं?
पहला तो यह कि क्रिकेट वास्तव में भद्रजनों का खेल बनकर निकलेगा. दूसरा, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब बच्चों को भी एक उचित प्लेटफॉर्म मिलेगा अपना हुनर दिखाने का. तीसरा, बीसीसीआई के नक्शे पर जो हिंदुस्तान 20 ही राज्यों में बसा है वो 31 राज्यों में बस जाएगा, जिससे देश का सबसे प्यारा खेल क्रिकेट वहां के बच्चे खेल पाएंगे और सचिन और कोहली बनने का अपना सपना पूरा कर सकेंगे.
सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं का एक आयोग बनाए- नाकोहस यानी नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स! : पुरुषोत्तम अग्रवाल
आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा?
यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास को उसी संदर्भ में पढ़ा गया, लेकिन उसमें और भी बहुत चीजें थीं जिस पर लोगों का ध्यान कम गया. उपन्यास में प्रेम है, जीवन है, अंतर्विरोध है तो दुख और भय भी है.
उपन्यास बुद्धिजीवी समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर भी चुटकियां लेता है. बुद्धिजीवी वर्ग का अंतर्विरोध बार-बार उसमें सामने आया है. उसमें एक प्रसंग है कि आजकल प्रगतिशील लोगों की थाली में भी दो-चार राष्ट्रवादी आइटम जरूर पाए जाते हैं. ऐसा नहीं है कि यह बुद्धिजीवियों के अधिकार और आत्माभिमान का ही घोषणा पत्र है. उपन्यास में बुद्धिजीवी का मतलब वो है जो किसी न किसी रूप में धरातल पर जाकर समाज से जुड़े. उपन्यास जहां से शुरू होता है, एक पात्र सुकेत की यादें जहां से शुरू होती हैं, वह सब आपको नेल्ली (असम) तक ले जाता है कि उत्तर-पूर्व आपकी सोच में भी कहीं नहीं है. किसी को पता तक नहीं है कि 1983 में नेल्ली में क्या हुआ था. नेल्ली के बाद 1984 का सिख विरोधी दंगा, हाशिमपुरा और मलियाना का संदर्भ है.
यह उपन्यास किसी समाज में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका को रेखांकित करता है, समाज में टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट का जो आतंक है और पढ़ने-लिखने का मतलब वही समझ लिया जाता है, ये उस पर बात करता है. मैं मानता हूं कि यह उपन्यास आपको याद दिलाता है कि अगर आप साहित्य, संस्कृति, इतिहास आदि की उपेक्षा करेंगे और इन पर स्पष्ट बोलने वालों को लगभग गाली की तरह बुद्धिजीवी कहने लगेंगे तो अंतत: आप अपना ही नुकसान करेंगे. क्योंकि ऐसा समाज अनिवार्य रूप से नाकोहस की तरह है. जैसा कि नाकोहस का प्रवक्ता गिरगिट कहता है बुद्धिजीवियों के सम्मान का नाटक बहुत हो चुका. ये नहीं कि आप कुछ भी बकते रहें और हमारी भावनाएं आहत हों. उपन्यास तीनों चरित्रों की मानवीयता को भी रेखांकित करने की कोशिश करता है. उपन्यास तीन बुद्धिजीवियों का एक रात का अनुभव मात्र नहीं है.
आपकी पहचान मुख्य रूप से आलोचक की रही है फिर आपको उपन्यास लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
मैं आलोचना लिखता रहा हूं लेकिन नियमित रूप से कविता भी लिखता हूं. ये बात और है कि उसे प्रकाशित नहीं कराता. यहां तक कि सुमन जी (अपनी पत्नी) को भी नहीं पढ़ाता. कभी मन हुआ तो ठीक-ठाक करके कहीं भेजा, वरना लिखकर रख लेता हूं. फिक्शन में मेरी रुचि शुरू से थी. कॉलेज के दिनों में दो-तीन कहानियां लिखी थीं, पुरस्कृत भी हुईं. बाद में आलोचना लिखने लगा. लोगों को लगने लगा कि ये आलोचना अच्छी लिखते हैं. चर्चा होने लगी. तत्काल की जो स्थितियां बन जाती हैं, वही पहचान बन जाती है. लेकिन परिवार और निजी मित्रों को मालूम है कि मैं 25 साल से ये धमकी देता रहा हूं कि मैं उपन्यास लिखूंगा. इसका कारण मैं ये मानता हूं कि कविता और तमाम दूसरी विधाओं के प्रति सम्मान के साथ, जीवन को उसकी समग्रता में अगर साहित्य की कोई विधा व्यक्त कर सकती है तो वह उपन्यास है.
मैं ये नहीं कह रहा कि सिर्फ उपन्यास ऐसा करता है. लेकिन उसी तरह जैसे भाषा का सबसे सघन और सर्जनात्मक उपयोग कविता में हो सकता है- ऐसा कहकर मैं दूसरी विधा का अपमान नहीं कर रहा, सिर्फ कविता की विशेषता बता रहा हूं- उसी तरह चाहे समाज हो, आपका अंतर्मन, आपकी अस्तित्वगत वेदना या चाहे आपकी ऐतिहासिक चिंता, उसका जिस समग्रता में अनुसंधान उपन्यास करता है, कोई दूसरी विधा नहीं कर सकती. उपन्यास में कई आवाजें होती हैं. गोदान में केवल होरी की आवाज नहीं है. गोदान में राय साहब, बदमाश अफसरों, थानेदार, झिगुरी, पंडित यानी होरी के शोषकों की भी आवाजें हैं. वह उपन्यास जो अपने पसंदीदा चरित्र के अलावा किसी और चरित्र को बोलने ही न दे या लेखक सिर्फ अपनी मर्जी की बात कहलवाए, वह काफी घटिया उपन्यास होगा. अच्छा उपन्यास वह होता है जिसमें ऐसे भी चरित्र हों जिन्हें आप लेखक के साथ जोड़कर देख सकते हैं. इसे देखते हुए मैं पिछले 25 साल से उपन्यास लिखने की बात सोच रहा था. एक वृहद उपन्यास पर काम करना बाकी है.
जब मैंने नाकोहस कहानी लिखी, जो 2014 में छपी, उस पर जिस तरह का विवाद या बहस हुई, वह बहुत रोचक था. जिन लोगों से मैं अपेक्षा करता था कि उसकी निंदा करेंगे, उन्होंने तो की ही, लेकिन बहुत सारे लोगों ने आलोचना की. यह ठीक भी है. लेकिन कुछ लोगों ने कहा कि रघु नाम का पात्र ईसाई है, तो आप हिंदू नायकत्व का पीछा कर रहे हैं. या उसको हिंदू परंपरा की जानकारी है तो आप खुद हिंदू सांप्रदायिकता को शह दे रहे हैं. इस पर काउंटर भी किया गया. कहानी पर चर्चा दिलचस्प रही. इस पर मित्रों-परिजनों ने सलाह दी कि इसको उपन्यास में बदलिए. फिर मैंने इस पर सोचना शुरू किया उपन्यास के रूप में और लिखा.
जब कहानी छपी थी तो सवाल उठाए गए थे कि इसमें कहानीपन नहीं है. क्या कहेंगे आप?
मुझे कहानीपन की बात बिल्कुल समझ में नहीं आती. ठीक है कहानीपन एक बात है, लेकिन कहानीपन का कोई एक बुनियादी रूप नहीं है जिसके आधार पर आप एक कहानी को खारिज कर दें और एक को कहानी मान लें. अब मुझे नहीं पता कि कहानीपन या कथातत्व पर बात करते हुए ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को उपन्यास माना जाएगा या नहीं. या ‘नौकर की कमीज’ को उपन्यास मानेंगे या नहीं. लेकिन ठीक है यह सवाल उठाने वालों की राय है.
मेरी समझ के मुताबिक एक बुनियादी घटनाक्रम है, एक वैचारिक संघर्ष है, कोई कहानी इस वजह से कहानी नहीं रहती, ऐसा मैं नहीं मानता. जब उपन्यास के तौर पर मैंने इसको सोचा तब तक चीजें काफी साफ होने लगी थीं और समाज की जिस परेशानी से मैं गुजर रहा था, जिसे गोविंद निहलानी ने उपन्यास पर चर्चा करते हुए ‘डिस्टर्बिंग डिस्टोपिया’ कहा था, शायद उसकी कल्पना कर रहा था. डिस्टर्बिंग यानी जो बुरी तरह आपको परेशान करे या डरा दे, ये डर कम से कम मेरा निजी है. इस डर को एक फैंटेसी के रूप में रचा गया है. उपन्यास का पात्र टेलीविजन बंद करना चाह रहा है लेकिन वह बंद नहीं हो रहा है. वह रिमोट का बटन दबा रहा है, पीछे से पावर ऑफ कर रहा तब भी वह बंद नहीं हो रहा है. उसके कमरे की हर दीवार टेलीविजन स्क्रीन में बदल गई है. एक टेलीविजन तुम फोड़ भी दो तो भी फर्क नहीं पड़ेगा.
पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है. इस दौरान समाज में क्रोध का विस्तार होता चला गया, समझदारी की कमी होती गई, भाषा में सपाटपन आता चला गया
जेएनयू प्रसंग या अन्य हालिया प्रसंगों में भी कुछ टेलीविजन चैनल जिस तरह का माहौल बनाते हैं, उसमें जिन लोगों का नाम लेकर इंगित किया जाता है, आपको नहीं पता कि उनके साथ कब, कैसी अनहोनी घटित हो सकती है. क्या देश की राजधानी में यह एक अनोखी घटना नहीं है कि कोर्ट परिसर में एक लड़के पर जानलेवा हमला हो और पुलिस कुछ न कर पाए? बाद में भी कुछ नहीं हुआ. यह ‘लिंच मेंटालिटी’ है. आप लिंच मेंटालिटी (मारपीट या हत्या करने की मानसिकता) का निर्माण कर रहे हैं और यह उपन्यास यही याद दिलाता है.
उपन्यास में एक वाक्य आता है, ‘जिससे भय होता है उस पर करुणा नहीं होती.’ लोगों के मन में भय बैठाया जा रहा है कि यह आदमी देश के लिए खतरनाक है, समाज के लिए खतरनाक है, आपके परिवार, बहन, बेटी के लिए खतरनाक है. भले ही वह आदमी अपने आप में कितना निर्दोष हो. उसकी जान लेने में न आपको संकोच होगा, न कोई अपराधबोध. अगर आप सचमुच ऐसा समाज बनाना चाह रहे हैं, जिसमें किसी निर्दोष को भी मार देने में उसे संकोच न हो तो वह समाज कैसा होगा?
उपन्यास में जिस तकनीकी अतिक्रमण का जिक्र है कि टीवी चैनल बंद नहीं हो पा रहा, मोबाइल स्क्रीन मन की बात जान ले रहा है, यह लिखते समय आपके दिमाग में क्या था? व्यवस्था द्वारा किया जा रहा अतिक्रमण या संचार माध्यमों का पूंजीपन जो लोगों के जीवन में निर्बाध प्रवेश कर रहा है?
मैं सीधे कहूंगा कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में ये दोनों चीजें लागू होती हैं. खुद में यह व्यवस्था भी और पूंजीवाद भी. लेकिन मैं यह मानता हूं कि अगर आपके जीवन में एकांत का कोई पल न बचे तो यह आपकी मनुष्यता के समाप्त होने की हालत है. जब आपके पास अपने भी साथ होने का थोड़ा-सा समय नहीं है, जब आप किसी से बात न कर रहे हों, फेसबुक पर किसी से दंगल न कर रहे हों, कुछ देर आप चुपचाप बैठें, संगीत सुन रहे हों, या कुछ भी करें. अपने साथ रहें. एकांत में दो चीजें होती हैं. एक तो शांत चित्त से सोचने का वक्त मिलता है. दूसरा, एकांत में आप अपनी कल्पनाओं और स्मृतियों को थोड़ा-सा व्यवस्थित होते देखते हैं. इन दोनों स्थितियों से आपको लगातार वंचित रखा जा रहा है. मनुष्य के एकांत का अतिक्रमण राजसत्ता तो कर ही रही है, लेकिन ये इस पूंजीवादी व्यवस्था या कहिए खास तरह के पूंजीवाद की बड़ी स्वाभाविक विशेषता है. उसकी हर जगह दखलंदाजी है. आपका कोई क्षण ऐसा नहीं है जो आपका अपना हो. वह एडवर्टाइजिंग कल्चर का हिस्सा है, जब आपके बेडरूम से लेकर आपका कमोड तक विज्ञापन और उत्पाद की जद में है. इसलिए जरूरी है कि वह आपकी हर चीज तक पहुंचे. इस क्रम में आपका जो भी एकांत है, जिससे आपका व्यक्तित्व परिभाषित होता है, वो
खत्म हो जाता है. ये मुझे बहुत भयावह स्थिति लगती है. मैं ऐसे परिवारों को जानता हूं जहां घर में चार कमरे हैं तो चार टीवी हैं. वेे साथ खाना नहीं खाते. सब अपने-अपने कमरे में टीवी देखते हुए खाना खाते हैं.
नाकोहस की कल्पना कैसे की?
2003 या 2004 में आपको याद हो तो एक किताब छपी थी, ‘शिवाजी हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया’. उसके लेखक थे अमेरिकी विद्वान जेम्स लेन. वे पुणे में भंडारकर इंस्टिट्यूट में रिसर्च के लिए आए थे. इस दौरान महाराष्ट्र में घूमते हुए उन्हें शिवाजी के बारे में कुछ बातें मालूम हुईं, जिन पर उन्होंने किताब लिख दी. किताब में सहयोग के लिए संस्थान का आभार प्रकट किया गया था. इस पर ‘संभाजी ब्रिगेड’ नामक एक संगठन ने संस्थान में घुसकर तोड़-फोड़ की. उस समय गोपीनाथ मुंडे जी ने बयान दिया कि हमारी भावनाएं तो जवाहरलाल नेहरू की किताब से भी आहत होती हैं.
तब मैंने एक लेख लिखा कि भावनाएं बहुत आहत हो रही हैं. भावनाएं आहत होकर कूदकर सड़क पर आ जाती हैं. इससे राष्ट्रीय संपदा का नुकसान होता है तो सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं और आक्रांत अस्मिताओं का एक आयोग बनाए, नेशनल कमीशन आॅफ हर्ट सेंटिमेंट्स (नाकोहस). तो ये विचार दस-बारह साल पुराना है. इसका पिछले आम चुनाव के परिणाम से कोई संबंध नहीं है. पिछले पांच-छह साल में जैसा माहौल देश में बनता चला गया है, उसमें सुधारवाद और प्रतिक्रियावाद में कोई भेद नहीं है. पुणे में जब यह वाकया हुआ तब वहां कांग्रेस की सरकार थी. जब सलमान रुश्दी को भारत नहीं आने दिया तब कांग्रेस की सरकार थी. एक गांव की पंचायत आदेश दे देती है कि अब गांव की लड़कियां मोबाइल फोन नहीं रखेंगी, किसी लड़की के पास मोबाइल पाया जाता है तो मार-मारकर उसकी हालत खराब कर दी जाती है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह देते हैं कि समाज के मामले में सरकार क्या कर सकती है. इन लोगों ने सरकार की धारणा ही तब्दील कर दी है. इन लोगों को आधुनिक राजसत्ता का बोध ही नहीं है. आधुनिक राजसत्ता समाज को केवल व्यवस्थित ही नहीं करती, बल्कि समाज को बदलने की कोशिश करती है. कोई आधुनिक राजसत्ता यह नहीं कह सकती कि स्त्रियों या दलितों की क्या हालत है, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है, यह तो सामाजिक मसला है.
उदाहरण से समझिए कि समस्या कहां होती है. एक सज्जन ने घोषणा की कि वे कन्हैया को मार देंगे तो उनको माला पहनाई गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक नेता जी ने घोषणा की कि वे सलमान रुश्दी को मारने वाले 51 लाख रुपये देंगे. बाद में वो बड़े-बड़े सेक्युलर नेताओं के साथ मंच पर दिखे. पिछले दस-बारह साल में जिस तरह की स्थितियां पैदा हुई हैं कि आहत भावनाओं का मामला एक तरह से किसी भी विमर्श की सर्वस्वीकार्य शर्त बन गया है. यानी विमर्श तब ही होगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हैं.
आहत भावनाओं की राजनीति और 24 घंटे का मीडिया, इसने बहुत बुरी स्थिति पैदा की है. मैं इसे असहिष्णुता नहीं कहता, यह पर्याप्त शब्द नहीं है. पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है. इस दौरान समाज में क्रोध का विस्तार होता चला गया, समझदारी की कमी होती गई, भाषा में सपाटपन आता चला गया. मैंने जनवरी में फेसबुक पर शरारत के तौर पर लिखा, विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस बार गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री जी मुख्य अतिथि होंगे. (ठहाका लगाते हुए) कुछ लोगों को पसंद नहीं आया तो उन्होंने निंदा की, कुछ ने गालियां दीं. लेकिन एक सज्जन ने बाकायदा मुझे कोसा कि आप बड़े भारी प्रोफेसर बनते हैं, बुद्धिजीवी बनते हैं, इतना भी नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री तो हर साल गणतंत्र दिवस पर होते ही हैं.
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उपन्यास के अंश
एक लेखक उसकी लिखी किताबों के साथ जिंदा जलाया जा रहा है. यह सैकड़ों साल पहले के यूरोप की बात है. एक कवि पर हाथी दौड़ाया जा रहा है, यह सैकड़ों साल पहले के भारत में हो रहा है. एक प्रोफेसर का दायां हाथ काट दिया गया है, उसके काॅलेज ने उसी को बर्खास्त कर दिया है. एक बुजुर्ग लेखक अपनी अप्रकाशित पांडुलिपि खुद ही जला रहा है; क्योंकि आहत भावनाओं के रणबांकुरे उसके साथी लेखक की देह को क्षत-विक्षत करके जा चुके हैं… यह कुछ ही बरस पहले, सुकेत के अपने देश-काल में हुआ है. चर्च धर्मद्रोही विद्वान की किताबें जला रहा है, वह विद्वान आत्महत्या कर रहा है. उसका दोस्त कह रहा है, मुझे भी फूंक डालो साथ में क्योंकि मुझे अपने दोस्त की सारी किताबें जबानी याद हैं… यह हजारों साल पहले की बात है. एक लेखक फेसबुक पर अपनी मौत की घोषणा कर रहा है, वह अपने बीवी-बच्चों के साथ आम आदमी की तरह जीना चाहता है, सो उसे लेखक के तौर पर मरना ही होगा… यह बस कल-परसों की बात है.
* * *
‘वेल’ गिरगिट इस बार, बिना जीभ लपलपाए, बिना आंख मारे, बिना रंग बदले बोल रहा था, ‘उम्मीद तो है कि आप तीनों अब सुधर जाएंगे… नहीं तो… आप जानें… वैसे, यू मस्ट एप्रिशिएट द फैक्ट कि आपके साथ नाकोहस ने कमाल की नरमी बरती है… बस जरा से दस्तखत, दस्तखत भी क्या, इनिशियल्स ही तो किए गए हैं, आप लोगों की बॉडीज पर… डू यू रियलाइज सर… कि जितना वक्त आपने नाकोहस के फ्रेंडली इंटरएक्शन में बिताया, जितना आपको वहां ले जाने, वापस पहुंचाने में लगा, यानी कुल मिलाकर आप तीनों जितनी देर इस किस्सा-ए-नाकोहस में रहे, बस उतने ही अरसे में एक जाने-माने बुजुर्ग इंटेलेक्चुअल भारत में भगवान को प्यारे हो गए, और एक अरब में अल्लाह मियां से मिलने भेज दिए गए…’[/symple_box]
ये जो सतत रूप से क्रुद्ध समाज तैयार हुआ है, ये कैसे संभव हुआ?
इसका सबसे बड़ा कारक है निर्बाध उपभोक्तावाद. मैं यह नहीं मानता कि आप प्रकृति की ओर लौट जाएं, लेकिन एक अर्थशास्त्री मित्र कहते हैं कि ओपन इकोनॉमी एक सीमा तो है ही और वह है धरती पर उपलब्ध संसाधन. उससे ज्यादा ओपन तो नहीं हो सकती.
अर्थशास्त्री ब्रह्मदेव जी एक बात कहा करते थे कि अगर आपको अमेरिका और यूरोप के वर्तमान जीवन स्तर पर पूरी दुनिया को ले जाना है तो यह एक ही तरीके से संभव है कि आपके पास आठ पृथ्वियां हों और उन आठों का वैसा ही दोहन हो जैसा पिछले 400 साल में हुआ. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा संभव नहीं है. तो निर्बाध उपभोक्तावाद नहीं चल सकता. आप किसी एक सेक्टर के लिए बाकी को छोटा करेंगे. दिल्ली में आॅड इवेन करेंगे लेकिन आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री पर लगाम नहीं लगाएंगे. एक परिवार में चार सदस्य हैं और बारह गाड़ियां हैं. आप निर्बाध उपभोग की स्थिति पैदा करेंगे तो जाहिर है कि समाज में अंतर्विरोध पैदा होगा.
तो एक तो इस अबाध, बेरोकटोक उपभोग की स्थिति ने समस्या पैदा की है. दूसरे, पूंजीवाद का सहज स्वभाव है कि यह मनुष्य को उपभोक्ता में बदलता है. यह उसके जिंदा रहने के लिए जरूरी है, इसलिए वह मनुष्य की मनुष्यता को कमतर करेगा. प्रतियोगिता को इस स्तर तक बढ़ाएगा कि वह गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगी.
आपसे बात करते समय मेरे मन में हल्की-सी चिंता यह है कि मेरे मुंह से कुछ ऐसा तो नहीं निकल रहा कि जिसकी वजह से कल मुझे पकड़कर ठोक दिया जाए कि हमारी भावनाएं आहत हुई हैं. असहमति व्यक्त करने में डर लग रहा है
दूसरी समस्या है हमारे अपने समाज के संदर्भ में. हमारे लोकतंत्र का एक बुनियादी अंतर्विरोध दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है कि एक स्तर पर हम लोकतंत्र हैं, चुनाव से सरकार चुनी जाती है, जनता का शासन है. लेकिन रोजमर्रा की प्रैक्टिस में सामाजिक न्याय और कानून के राज का क्या हाल है? आप निजी तौर पर हत्या करें तो आपको सजा हो जाएगी, लेकिन किसी समुदाय के प्रतिनिधि बनकर हत्या कर दें तो आपको कुछ नहीं होगा, बल्कि आपका अभिनंदन होगा. आप मुख्यमंत्री बन सकते हैं. ये हमारे अपने देश की समस्या है. एक तरह से कानून के राज की समाप्ति हो रही है. न्याय का बोध खत्म हो रहा है. तीसरी बात, पिछले 20 साल में नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद आप महसूस करते हैं कि पहले एक मध्यवर्गीय आदमी यह मानकर चलता था कि व्यापक समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी है, जो कुछ उसे मिलता है वह एक व्यापक वितरण हिस्सा है. आजकल एक बड़ा मजबूत बोध विकसित हुआ है कि हम टैक्सपेयर हैं. टैक्सपेयर मनी, ये मुहावरा बहुत झल्लाहट पैदा करता है कि सब कुछ टैक्सपेयर मनी से हो रहा है.
हमारे समाज में नई तरह की समस्या यह पैदा हुई है कि सरकार मैनेजर की भूमिका में है, संसाधनों का केंद्रीकरण हो रहा है. अमेरिका में जो बात बार-बार कही जाती है कि 99 फीसदी संसाधनों पर एक फीसदी लोगों का कब्जा है, ऐसा अमेरिका नहीं चल सकता. ऐसे समाज में गुस्सा बढ़ता है जो हिंसा या सांप्रदायिकता या दूसरे खतरनाक रूप में सामने आता है.
जिन वजहों से ऐसा समाज बनता है, जाहिर है कि वह आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था है. क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था है जिससे ऐसी स्थिति से बचा जा सके?
हां, बिल्कुल है. अार्थिक व्यवस्था से अगर आपका आशय है अर्थतंत्र तो उद्योग अनिवार्य है. अब लोग केवल प्रकृति के नहीं, बल्कि संस्कृति और प्रौद्योगिकी के नजदीक हैं. तो उद्योग होंगे, छोटे भी और बड़े भी. लोगों को वाकई अगर जीवन का एक स्तर चाहिए और विकास चाहिए तो उसके लिए एक जटिल समाज और अर्थतंत्र की जरूरत होगी. सवाल यह है कि उस अर्थतंत्र में संवेदनशीलता संभव है या नहीं. इसीलिए इस उपन्यास में बार-बार कहा गया है कि किसी भी तरह का अथॉरिटेरियन समाज, उसकी रंगत कुछ भी हो, उसका अस्तित्व नहीं हो सकता.
मोटे तौर पर आप कह सकते हैं सोशल डेमोक्रेसी या डेमोक्रेटिक सोशलिज्म. मैं निजी तौर पर मानता हूं कि नए तरह का नेहरू मॉडल हो सकता है जो अपने समय के अनुकूल हो, जो गलतियों से सीखा गया हो. मुझे अपने आपको नेहरूवादी कहने में कोई हिचक नहीं है. एक नवनिर्मित नेहरू मॉडल, एक मिश्रित अर्थव्यवस्था ही सबसे अनुकूल हो सकती है जिसका डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन का सपना हो, डेमोक्रेटिक प्रैक्टिसेज का सपना हो. देश आजाद हुआ तो लोगों ने नेहरू से कहा कि तरह-तरह की समस्याएं हैं, ये प्रेस फ्रीडम संपन्न और फैंसी देशों की लक्जरी है, इसको फ्री मत छोड़ो वरना गैरजिम्मेदार हो जाएगा और आपको परेशान करेगा. इस पर नेहरू ने कहा, मैं प्रतिबंधित प्रेस की जगह गैरजिम्मेदार मगर फ्री प्रेस को तवज्जो दूंगा. नेहरू ने गलतियां भी कीं, लेकिन उन्होंने देश की नींव रखी. विज्ञान, कला, साहित्य, सिनेमा, उद्योग हर चीज की नींव रखी.
आपने लिखा है- ‘आज के दौर का लेखक भी उन बातों को दर्ज करने से दूर है जो सच तो है लेकिन कही नहीं जा रही है’, यह अपने समय और समाज पर गंभीर सवाल है.
इसके पीछे एक वाक्य है एक इतिहासकार का, नाम याद नहीं, जो दिखता है उसे लिखना तो जरूरी है ही, लेकिन ज्यादा जरूरी है उसे लिखना जो दिखता नहीं है लेकिन जिसे लिखा जाना चाहिए. मुझे लगता है कि इतिहासकार हों, साहित्यकार, या समाजशास्त्री, सभी की मूल प्रतिक्रिया यही है कि चीजों को समग्र रूप में देख सकें और जो चीजें कही जानी चाहिए उसे कहा जाए. जैसे मिसाल के तौर पर, नाकोहस को लीजिए. असल में नाकोहस नाम की कोई संस्था तो है नहीं. लेकिन जो पूरा माहौल आपने बना दिया है कि आपसे बात करते समय मेरे मन में हल्की-सी चिंता यह है कि मेरे मुंह से कुछ ऐसा तो नहीं निकल रहा कि जिसकी वजह से कल मुझे पकड़कर ठोक दिया जाए कि हमारी भावनाएं आहत हुई हैं. क्या आज यह डर हमारे मन में नहीं है? यह बात मैं औपचारिक-अनौपचारिक, हर रूप में कहना चाहता हूं कि क्या ये सच नहीं है कि किसी भी चीज पर बात करते समय आज स्थिति ये हो गई है कि आप आसपास देख लेना चाहते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं सुन रहा जिससे खतरा हो. असहमति व्यक्त करने में डर लग रहा है. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है, जहां आपको अपनी आवाज से डर लगे. चैनलों की इसमें अहम भूमिका है. बुद्धिजीवियों को आप अपराधी घोषित करके, उन्हें राक्षस बताकर आप जो कर रहे हैं, वो कितना खतरनाक है यह बात कोई नहीं कहता. इसीलिए दुख है कि जो कहा जाना चाहिए वो बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है. इसीलिए मैंने यह उपन्यास लिखा है. मुझे नहीं पता कि यह उपन्यास, उपन्यास की दृष्टि से कैसा है, लेकिन एक लेखक के तौर पर अनुभव करता हूं कि कहीं न कहीं लोगों ने उसे खुद से जुड़ा पाया है और वे सिर्फ इसलिए नहीं जुड़े रहे हैं कि वह डर का एक सपाट चित्र प्रस्तुत करता है, बल्कि इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं कि उपन्यास के उन तीन बुद्धिजीवी चरित्रों की मानवीयता, संवेदनशीलता, मन, उनके अंतर्विरोध ये सारी चीजें कहीं न कहीं लोगों से जुड़ती हैं. यह इसलिए भी कि जिस डर को उपन्यास फैंटेसी या कल्पना के रूप में रच रहा है, वह डर लोगों के मन में कहीं न कहीं मौजूद है.
इसी से जुड़ी एक और बात लेखकों की भूमिका को लेकर है कि पहले तीन बुद्धिजीवियों की हत्या, फिर कई को धमकी और हमले, जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों की घटनाएं हुईं. ऐसे में क्या मानते हैं कि लेखक उस भूमिका में नहीं हैं जिसमें उन्हें होना चाहिए?
नहीं, ऐसा मैं नहीं मानता. लेखक की भूमिका यह नहीं है कि वह हर जगह सीधा हस्तक्षेप करेगा. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि सभी भाषाओं के लेखकों ने अपनी बात कही. विरोधस्वरूप पुरस्कार भी लौटाए. जिन लेखकों ने पुरस्कार नहीं लौटाए, उनकी प्रतिबद्धता पर भी मैं संदेह नहीं करता. मिसाल के तौर पर राजेश जोशी और अरुण कमल ने नहीं लौटाया. काशीनाथ सिंह ने लौटाया, नामवर सिंह ने नहीं लौटाया, इससे नामवर सिंह और अरुण कमल कम लोकतांत्रिक नहीं हैं. न उनकी चिंताएं कम प्रामाणिक हैं. पिछले दो-तीन साल में बुद्धिजीवियों और लेखकों ने जैसी भूमिका निभाई है, वह उम्मीद की बड़ी किरण है. आप लेखक से ये उम्मीद मत कीजिए कि वह जाकर किसी पुलिस बंदोबस्त से टकराए, लाठी खाए और जेल जाए. लेखक का बतौर लेखक वह सब कहना मायने रखता है जो कहा जाना चाहिए.
‘महिला आयोग से मदद नहीं, पुलिस उड़ाती है मजाक’

कौन
बलात्कार की शिकार युवतियां
कब
10 मई, 2016 से
कहां
जंतर मंतर, दिल्ली
क्यों
शादी का झांसा देकर बलात्कार करने के मामले में न्याय न मिलने और पुलिस द्वारा आरोपियों को बचाने और दिल्ली महिला आयोग के उदासीन रवैये को लेकर.
अर्चना, यासमीन, साधना और प्रीति कुछ समय पहले तक एक-दूसरे से अनजान थीं. चारों न्याय की आस में लंबे समय से दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) के चक्कर काट रही थीं. एक दिन आयोग के दफ्तर में ही उनकी मुलाकात हाे गई, जिसके बाद उन्हें पता चला कि उनके दर्द की दास्तान लगभग समान है.
इन युवतियों का दावा है कि इन सभी के मामलों में पुलिस ने जांच के नाम पर लीपापोती करके आरोपियों को बचाने की कोशिश की थी. खुद पुलिस आरोपियों के साथ समझौता करने का दबाव उन पर बना रही है. डीसीडब्ल्यू में भी उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. बस तारीख पर तारीख मिलती जा रही थीं. इसके बाद चारों ने फैसला किया कि वे आगे की लड़ाई साथ मिलकर लड़ेंगी. साधना बताती हैं, ‘डीसीडब्ल्यू में सुनवाई न होते देख हमने राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) का रुख किया. वहां मेरी मुलाकात पहले ही दिन आयोग की सदस्य सुषमा साहू से हुई. लेकिन यहां से भी कोई मदद नहीं मिली.’
दिल्ली पुलिस कमिश्नर, सीबीआई से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश तक को पत्र लिखने के बावजूद मदद नहीं मिली ताे इन युवतियों ने मई की चिलचिलाती गर्मी में दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू कर दी. पांचवें दिन साधना की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया जिसके बाद ये भूख हड़ताल छोड़कर अनिश्तिकालीन धरने पर बैठ गईं. उनकी मांग है कि उनके गुनहगारों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे भेजा जाए और जो जांच अधिकारी आरोपियों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं. उन्हें नौकरी से हटाया जाए. अगर उन्हें न्याय नहीं दिया जाता तो इच्छामृत्यु प्रदान की जाए. इस संबंध में वे प्रधानमंत्री को भी पत्र लिख चुकी हैं.
इनमें से एक कानपुर की यासमीन दिल्ली में नौकरी करती थीं. उनके अनुसार, दिल्ली में उनकी मुलाकात नितिन से हुई. एक दिन नितिन ने उन्हें नशीला पदार्थ खिलाकर शारीरिक संबंध बना लिए और उनकी आपत्तिजनक तस्वीरें लेकर ब्लैकमेल करने लगा. उन्होंने पुलिस से शिकायत की धमकी दी तो उसने शादी की इच्छा जताई. यासमीन के अनुसार, दो साल तक वह उन्हें शादी का झांसा देकर संबंध बनाता रहा और फिर शादी से मुकर गया. तब यासमीन ने उसके खिलाफ केस दर्ज करा दिया.
वहीं झारखंड के जमशेदपुर की रहने वाली अर्चना का परिचय दिल्ली के वरुण से 2013 में एक सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए हुआ. महीने भर बाद ही वरुण ने अर्चना से शादी करने की बात कही. अर्चना तब कर्नाटक में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थीं. कुछ ही महीने बाद उनकी नौकरी दिल्ली में लग गई. उनके मुताबिक, यहां शादी का झांसा देकर वरुण ने उनके साथ संबंध बनाए. इस बीच उसने अर्चना के माता-पिता से भी मुलाकात की. पर अर्चना को अपने परिवार से कभी नहीं मिलाया. पिछले साल नवंबर में उन्हें पता चला कि वरुण पहले ही शादीशुदा है. अर्चना बताती हैं, ‘वरुण ने अप्रैल 2015 में किसी और से शादी कर ली थी और यहां मुझे भी शादी का भरोसा देकर संबंध बनाता रहा. इसके बाद मैंने उसके खिलाफ केस दर्ज करा दिया.’
इनके इतर साधना का रिश्ता सेना में लेफ्टिनेंट शिवमंगल से 2012 में तय हुआ. आगरा निवासी साधना तब नोएडा में नौकरी कर रही थीं. साधना के अनुसार, एक बार छुट्टियां बिताने शिवमंगल दिल्ली आया और साथ रुकने की जिद की. इसके बाद संबंध बनाने पर जोर दिया. शादी से पहले इससे इनकार करने पर उसने उनकी मांग में सिंदूर भर दिया और संबंध बनाए. इसके दो साल बाद शिवमंगल और उसके परिवारवालों ने दहेज के लालच में साधना से रिश्ता तोड़कर कहीं और जोड़ लिया.
‘पुलिसवाले हमसे अछूत सा व्यवहार करते हैं. मजाक बनाते हैं हमारा. धरने के दौरान एसीपी साहब ने हमें मिलने बुलाया, पांडव नगर एसएचओ भी वहां मौजूद थे. वहां हमसे जिस अभद्रता से बात की गई उसे बता नहीं सकती. अब किससे करें शिकायत इसकी?’
चौथी अनशनकारी पुणे की 21 वर्षीय प्रीति हैं जो नौकरी की तलाश में मुंबई गई थीं. यहां एक सहकर्मी के जरिए उनकी मुलाकात आईआईएम अहमदाबाद के 40 वर्षीय प्रोफेसर रजनीश से हुई. प्रीति के मुताबिक, कुछ दिनों के बाद रजनीश ने उनसे शादी करने की बात कही. प्रीति ने मना कर दिया. लेकिन बाद में वे मान गईं. इस बीच उसी सहकर्मी ने प्रीति को एजाज नामक व्यक्ति से भी मिलाया. प्रीति को शादी के लिए मनाने में उसका भी योगदान रहा. कुछ दिनों बाद प्रीति दिल्ली आ गईं. तब रजनीश अक्सर दिल्ली आकर उनके फ्लैट पर रुकता था. उनके बीच संबंध भी बने. प्रीति के अनुसार, ऐसा करीब दो साल तक चला, फिर पता चला कि रजनीश शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं. तब प्रीति को छह माह का गर्भ था. इसके बाद रजनीश ने प्रीति से संपर्क तोड़ लिया. यह बात प्रीति ने एजाज को बताई तो वह मुंबई से गुड़गांव आया और जादू-टोना करके सब ठीक करने का आश्वासन दिया. प्रीति के मुताबिक, इस दौरान एजाज ने उन्हें ‘मांत्रिक जल’ पिलाया था जिसे पीते ही वह बेसुध हो गईं और एजाज ने उनके साथ बलात्कार किया.
इन चार युवतियों में से तीन मामले पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर थाने के हैं. इन तीनों मामलों से संबंधित युवतियों का आरोप है कि उनका मेडिकल टेस्ट तक नहीं कराया गया. साधना के मुताबिक, उनकी एफआईआर 7 अक्टूबर, 2015 को दर्ज की गई थी, पर अब तक पुलिस ने इसे सेना से जुड़ा मामला बताते हुए शिवमंगल पर कोई कार्रवाई नहीं की है. साधना का दावा है कि आरोपी ने जांच अधिकारी को घूस खिलाई है, जिसके उनके पास प्रमाण भी हैं. तीनों ही मामलों में एक समानता यह भी है कि जांच अधिकारी पर एफआईआर और चार्जशीट में तथ्यों को छिपाने का आरोप है. अर्चना बताती हैं, ‘मेरे एफआईआर दर्ज कराने के बाद भी वरुण को गिरफ्तार नहीं किया गया. काफी मशक्कत के बाद मैं उसे गिरफ्तार करा सकी. फोन रिकॉर्डिंग्स, फोटो, टेक्स्ट मैसेज मामले में ठोस सबूत हो सकते थे, पर उन्हें चार्जशीट में शामिल ही नहीं किया गया. जो गवाह हो सकते थे, उन्हें नहीं बनाया. चार्जशीट देखी तो पता चला मेरे बयान बदले हुए थे. चार्जशीट में आरोपी की शादी की बात तक नहीं दर्शाई गई. इस सबका फायदा उठाकर वरुण जमानत पर रिहा हो गया. जांच अधिकारी ने मुझ पर पैसे लेकर समझौता करने का दबाव बनाया.’
यासमीन कहती हैं, ‘मुझे कानून की ज्यादा जानकारी नहीं थी. दो दिन चक्कर कटाने के बाद मेरी तीन पेज की एफआईआर को बड़ा बताकर आधे पेज में कर दिया गया. कानूनी भाषा का हवाला देकर मुझसे लिखवा दिया गया कि मैं लिव-इन रिलेशनशिप में थी. मेरी मां को अकेले में ले जाकर केस वापस लेने का दबाव बनाया और बदनामी का डर दिखाकर उनसे भी यह लिखवा लिया. इसकी शिकायत मैंने डीसीडब्ल्यू में भी की. चार्जशीट में फोन रिकॉर्डिंग्स और फोटो का कहीं जिक्र नहीं किया, पूछने पर कहा कि 376 में इनकी कोई जरूरत नहीं, धारा ही काफी है. नशे की दवाई वाली बात घुमा दी गई. मुझ पर जानलेवा हमला भी हुआ. मैंने केस दर्ज करवाया पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.’
साधना का भी आरोप है कि उनकी एफआईआर के साथ ऐसा ही खिलवाड़ किया गया था. वहीं प्रीति के मामले में आरोपी रजनीश को पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया था पर खुद को नपुंसक साबित करके वह जेल से बाहर आ चुका है. वे बताती हैं, ‘मेरी शिकायत बाराखंबा रोड थाने में 29 दिसंबर, 2015 को दर्ज हुई थी. लेकिन उसके बाद से ही आरोपी से समझौता करने का दबाव जांच अधिकारी बनाने लगीं. मैंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के जनता दरबार में न्याय की गुहार लगाई तब आरोपी को गिरफ्तार किया गया.’ प्रीति ने 3 मार्च को बच्चे को जन्म दिया. 5 मार्च को अदालत में प्रीति की गैरमौजूदगी में आरोपी जेल से रिहा हो गया.
‘बिकॉज आई एेेम अ गर्ल, हू केयर्स?’ नाम का कैंपेन चलाने वाले नवनीत शास्त्री इन युवतियों की लड़ाई में उनके साथ खड़े हैं. वे बताते हैं, ‘हमारे यहां रेप को ही कैटेगराइज्ड कर दिया जाता है. जोर-जबरदस्ती करके बनाए गए शारीरिक संबंध को ही रेप समझा जाता है. जबकि कानून कहता है कि शादी का झूठा वादा करके बनाए गए संबंध भी रेप की श्रेणी में आते हैं. इन मामलों में एफआईआर दर्ज कराना ही चुनौती होता है, दर्ज हो भी जाए तो पुलिस आरोपी पक्ष के साथ सांठ-गांठ करके उसे बचाने में जुट जाती है. चारों के मामलों में यही हुआ. जांच अधिकारियों की आरोपियों से मिलीभगत के चलते आज इन मामलों के आरोपी जमानत लेकर सलाखों के बाहर घूम रहे हैं. वहीं डीसीडब्ल्यू बस हाथी का दांत साबित हुआ.’
यासमीन कहती हैं, ‘पुलिस ने हमें न्याय दिलाने क़ा कम आरोपियों को बचाने का ज्यादा प्रयास किया. आरोपी की ओर से मुझे लगातार धमकियां मिलती रहीं. पुलिस, महिला आयोग किसी ने न सुनी. अध्यक्ष स्वाति मालीवाल से मिलने महीनों चक्कर काटते रहे. वह हमारे सामने से गुजर जातीं पर हमें उनसे मिलने नहीं दिया जाता.’
दिल्ली महिला आयोग सवालों के घेरे में
अर्चना का आरोप है, ‘दिल्ली महिला आयोग सिर्फ नाम का महिला आयोग है. वहां बैठी महिलाएं वास्तव में पितृसत्तात्मक सोच रखती हैं. आयोग की काउंसलर कहती हैं कि हमें तो हमारी मर्जी के बिना कोई चाय तक नहीं पिला सकता और तुमसे रेप भी कर लिया.’ युवतियाें का आरोप है कि जब चारों भूख हड़ताल पर बैठीं तो महिला आयोग की गाड़ी जंतर मंतर आई और उन्हें स्वाति मालीवाल से मिलाने ले गई. स्वाति मालीवाल से उन्हें जवाब मिला कि वे अब कुछ नहीं कर सकतीं क्योंकि अब मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है. यासमीन का आरोप है, ‘वहां से (आयोग) हमें कोई मदद नहीं मिली, बस यह सलाह मिली कि सुनवाई में जाओ तो बेचारियों वाला पहनावा पहनकर जाना. मैं पूछती हूं कि रेप क्या बेचारियों के साथ ही होता है? पढ़ी – लिखी, कामकाजी लड़कियों के साथ नहीं हो सकता? आयोग का काम है महिलाओं के सम्मान की रक्षा करे, पर वह तो खुद हमें अबला दिखाने पर तुला हुआ है.’ 10 मई से पहले इन लोगों की सुनने वाला कोई नहीं था. लेकिन जैसे ही वे जंतर मंतर पहुंचीं, डीसीडब्ल्यू से लेकर पुलिस के आला अधिकारी और रक्षा मंत्रालय तक की गाड़ियां वहां पहुंचने लगीं. मीडिया के कैमरों ने उन्हें घेर लिया.
यासमीन का आराेप है, ‘पुलिसवाले हमसे अछूत सा व्यवहार करते हैं. मजाक बनाते हैं हमारा. धरने के दौरान एसीपी साहब ने हमें मिलने बुलाया, पांडव नगर एसएचओ भी वहां मौजूद थे. वहां हमसे जिस अभद्रता से बात की गई उसे बता नहीं सकती. अब किससे करें शिकायत इसकी? उस आयोग से जो हमें अबला बने रहने की सीख देता है. इसलिए हम मांग कर रहे हैं कि न्याय दे दो या फिर इच्छामृत्यु का अधिकार. अब और जिल्लत हम सह नहीं सकते.’
(पहचान छिपाने के लिए नाम बदले गए हैं )
जाट आंदोलन के समय पुलिस ने उपद्रवियों को खुली छूट दे रखी थी : प्रकाश सिंह
हरियाणा में इस साल फरवरी में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी की घटनाओं के दौरान पुलिस और सिविल प्रशासन के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच के लिए पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन राज्य सरकार ने किया था. कमेटी ने दो मार्च से काम शुरू किया. इसमें आईपीएस केपी सिंह (मौजूदा डीजीपी, हरियाणा) और वरिष्ठ आईएएस विजय वर्द्धन (मौजूदा अतिरिक्त मुख्य सचिव, अभिलेखागार एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग) भी शामिल थे. यह रिपोर्ट अब सार्वजनिक हो चुकी है, जिसे हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव की वेबसाइट पर देखा जा सकता है. (देखें बॉक्स)
कमेटी ने रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद, कैथल, हिसार, भिवानी और पानीपत का दौरा कर वहां के हालात का जायजा लिया. कमेटी ने 13 मई को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. रिपोर्ट में आंदोलन के दौरान आगजनी, लूट और हिंसा के लिए प्रदेश के कुल 90 अफसरों की लापरवाही को जिम्मेदार माना गया है. इनमें आईएएस, आईपीएस, उपायुक्त, एसपी, एडीसी, एसडीएम, नायब तहसीलदार, थाना प्रभारी और एसआई इंचार्ज स्तर के अधिकारी हैं. हरियाणा के आठ जिले जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान सात से 22 फरवरी तक हिंसा और उपद्रव की आग में झुलसते रहे. कानून और व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह चौपट थी. स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए सेना को लगाना पड़ा था. कमेटी के अध्यक्ष प्रकाश सिंह असम और उत्तर प्रदेश के डीजीपी रह चुके हैं. उन्हें 1991 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा वे पुलिस सुधार के प्रयासों में भी लगे रहते हैं. जाट आंदोलन पर कमेटी की रिपोर्ट और पुलिस सुधार समेत तमाम मुद्दों पर प्रकाश सिंह से बातचीत .
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक आपकी रिपोर्ट में 90 अधिकारियों को जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के लिए दोषी माना गया है. इसके अलावा इस रिपोर्ट में क्या खास है?
मुझे हिंसा के दौरान अधिकारियों के कार्यकलापों की जांच करनी थी यानी कि इस दौरान उन्हें जो करना था वह किया था या फिर ऐसा कार्य किया जो नहीं करना चाहिए था. मैंने हर दिन के हिसाब से इन अधिकारियों के कार्यों का विश्लेषण किया. जिन अधिकारियों के कुछ करने से या कुछ न करने से हिंसा और भड़की तो मैंने उसका उल्लेख कर दिया. उदाहरण के लिए, एक जगह उन्होंने बलवाइयों को छह घंटे की खुली छूट दे दी थी. यह बहुत छोटा-सा प्रखंड है जहां एक डीएसपी आराम से एक घंटे के भीतर हिंसा पर रोक लगा सकता है, लेकिन कोई नहीं पहुंचा. हालांकि अधिकारी वहां छह घंटे बाद पहुंचते हैं और हिंसा कर रहे लोगों से कहते हैं कि अब जाओ. आपको काफी वक्त मिल चुका है. बलवाइयों को इस तरह की खुली छूट देने वाले अधिकारियों का उल्लेख हमने अपनी रिपोर्ट में कर दिया है.
इस रिपोर्ट में सिर्फ अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई है या फिर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं?
इस रिपोर्ट में सिर्फ सिविल और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की गई है. हमें सिर्फ इनकी भूमिका की जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. हमने यही किया है. जनप्रतिनिधियों की भूमिका जानने के लिए दूसरी कमेटी जांच कर रही है.
रिपोर्ट आने के बाद से हरियाणा सरकार ने कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है. क्या आपको लगता है कि सरकार सही दिशा में कदम उठा रही है?
देखिए, रिपोर्ट में इन अधिकारियों के खिलाफ ठीक ढंग से काम नहीं करने की बात कही गई है. अब इन्हें निलंबित किया गया है. यह प्रारंभिक कार्रवाई है. इसके बाद विभागीय स्तर पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है. मैं यह मानकर चल रहा हूं कि इसके बाद इनके खिलाफ विभागीय स्तर पर भी कार्रवाई की जाएगी. रिपोर्ट देने के अाठ दिन के भीतर ही अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है यह संतोष का विषय है. मैं यह मानकर चल रहा हूं कि सरकार सही दिशा में काम कर रही है.
रिपोर्ट के आने के बाद हरियाणा पुलिस के लिए काम करने वाले संगठन का आरोप था कि हर बार हिंसा होने पर पुलिसवालों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और बड़े नेताओं व उच्च अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. इस पर आपका क्या कहना है?
देखिए, इस रिपोर्ट में बड़े अधिकारियों के खिलाफ भी टिप्पणी की गई है. अभी जो अधिकारी हटाए जा रहे हैं इसमें बड़े अधिकारी ही शामिल हैं. डीजीपी हट गए. आईजी रोहतक के खिलाफ कार्रवाई की गई है तो ऐसा इस बार नहीं है. जहां तक नेताओं की भूमिका का सवाल है तो एक न्यायिक कमेटी का गठन किया गया है जो उनकी भूमिका की जांच कर रही है. रिपोर्ट आने के बाद शायद उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो. मुझे सिर्फ अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का काम सौंपा गया था.
विपक्ष का कहना है कि आपने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के कहने पर जांच की जिम्मेदारी ली और ऐसा भाजपा समर्थकों को बचाने के लिए किया गया.
मैंने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ एक नेता पर प्रतिकूल टिप्पणी की है वह भी भाजपा का ही है. अब विपक्ष ऐसे आरोप लगा रहा है तो क्या किया जाए. वैसे भी मुझसे कोई जांच करने के लिए कहे तो इसका यह मतलब थोड़े ही है कि मैं चमचागीरी करने लगूंगा. या फिर आप मेरी ईमानदारी और निष्पक्षता को खरीद लेंगे. अब हरियाणा में सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही है तो जांच के लिए वही कहेगी. लेकिन मेरी सत्यनिष्ठा बिकाऊ नहीं है.
क्या जांच के दौरान आप पर कुछ खास अधिकारियों को बचाने के लिए किसी तरह का दबाव भी डाला गया था?
दबाव इस तरह का आया कि बड़े-बड़े लोग कुछ खास अधिकारियों की सिफारिश लेकर आए. उन्होंने बड़े सम्मान से बात कही. हमने भी बड़े सम्मान से उनकी बात सुनी. लेकिन मेरे काम करने का अपना तरीका है और मैंने वही किया. मैं किसी भी तरह के दबाव में नहीं आया और पूरी तरह से निष्पक्ष रिपोर्ट सौंपी.
कांग्रेस के एक शीर्ष नेता का आरोप है कि आप विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं. इसलिए आपने संघ और भाजपा नेताओं को बचाने का काम किया है?
जिस रणदीप सुरजेवाला ने यह बयान दिया है जब वो पैदा नहीं हुए थे तब से मैं रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद केंद्र से जुड़ा हुआ हूं. यह विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन तो अब बना है. विवेकानंद बचपन से मेरे रोल मॉडल रहे हैं. अब विवेकानंद से जुड़ने पर कोई सवाल उठाता है तो मैं कहूंगा कि भाड़ में जाओ. अब इनकी सोच इतनी विकृत हो गई है कि वे स्वामी विवेकानंद पर सवाल उठाने लगे हैं. जिस देश में विवेकानंद पैदा हुए वहीं उनके नाम पर गठित किसी संस्था में शामिल होने पर सवाल उठे तो यह अफसोसजनक है.

आप लंबे समय से पुलिस सुधार की मांग कर रहे हैं. क्या केंद्र में नई सरकार आने के बाद इस दिशा में कुछ काम हुआ है?
पुलिस सुधार की दिशा में न तो पिछली सरकार ने कदम उठाया था और न ही इस सरकार ने इस दिशा में कोई उल्लेखनीय काम किया है. पुलिस सुधार की दिशा में सभी उदासीन ही हैं. न तो सत्ताधारी नेता पुलिस सुधार चाहते हैं न ब्यूरोक्रेसी. इसलिए इस दिशा में बहुत जबरदस्त रुकावटें आ रही हैं. हालांकि मैं समझत हूं कि जल्द ही ये रुकावटें कम होती जाएंगी और पुलिस सुधार एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर सबका ध्यान जाएगा. आप इसे धीमा कर सकते हैं पर रोक नहीं लगा सकते हैं.
क्या सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद भी सरकारें पुलिस सुधारों को लेकर उदासीन बनी हुई हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है कि पुलिस सुधार की दिशा में बिल्कुल भी काम नहीं किया गया है. कुछ काम हुआ है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. इस दौरान कागज पर खूब कार्रवाई हुई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकारें कागज पर यह दिखाती हैं कि इस दिशा में काम किया जा रहा है. हालांकि यह बेहतर है कि एक वैचारिक दबाव सरकारों के ऊपर बन रहा है.
अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करके सरकार ने सही दिशा में पुलिस सुधार किया होता तो क्या जाट आरक्षण या फिर दूसरे मामलों से जुड़ी हिंसा या उपद्रव से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम होती?
मैं ये नहीं कहता कि पुलिस सुधार कर दिया जाए तो ‘रामराज्य’ हो जाएगा लेकिन हिंसा से निपटने के लिए आपके पास जो मशीनरी है वह बेहतर तरीके से काम करेगी. अभी सत्ताधारी दल के नेताओं का इशारा हो जाता है तो पुलिस कमजोर पड़ जाती है. वैसे पुलिस सुधार का यह मतलब नहीं है कि पुलिस स्वतंत्र हो जाए. दरअसल पुलिस सुधार का मतलब यह है कि नीति नियंता यह तय कर दे कि पुलिस कौन-से कानून से चलेगी, किस सिद्धांत का पालन करेगी, उसकी भूमिका क्या होगी, उसके ऊपर जिम्मेदारी क्या रहेगी. उसके बाद पुलिस अपने हिसाब से काम करेगी. उसके ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जाएगा. उसके कार्य करने की स्वतंत्रता में दखलंदाजी न की जाए. जैसे आपने पुलिस से कहा कि ये घोटाला हो गया अब आप पता करिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है, लेकिन जब पुलिस ने काम करना शुरू कर दिया तो फिर बीच में आकर आप यह नहीं कहेंगे कि इसे छोड़ दो या फिर इसे फंसा दो. यह नहीं होना चाहिए. जांच के दौरान किसी भी तरह का दबाव पुलिस पर न डाला जाए.
सीवान : बिहार सरकार की सीमा समाप्त

हाल ही में सीवान जाना हुआ. मशहूर मोदियाइन की दुकान पर लिट्टी-चोखा खाया और लोगों से बतकही हुई. मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर बबुनिया रोड पर भी चहलकदमी हुई. मिट्टी के बर्तन की दुकानों पर आने वाले लोगों से मुलाकात होती है. सब जगह एक ही सवाल होता है- बताइए सीवान की पहचान के बारे में. सबके पास ढेरों बातें होती हैं अपने सीवान पर, लेकिन ज्यादातर बातें इतिहास की होती हैं. लोग राजेंद्र बाबू से बात की शुरुआत करते हैं. इतिहास के पन्ने दर पन्ने पलटते हैं. इस दौरान उनके चेहरों पर गर्व का भाव नजर आता है. बताते हैं कि पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू यहीं से हुए. मजहरूल हक साहब यहीं के हैं, आजादी की लड़ाई के दौरान जिन्होंने अपनी पूरी संपत्ति कांग्रेस को दान दे दी. उन्हीं की जमीन पर पटना में सदाकत आश्रम बना है, जो कांग्रेस का राज्य मुख्यालय है. कुछ लोग बताते हैं कि खुदाबख्श साहब का नाम सुना है, जिनके नाम पर देश में चर्चित पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी है, वे भी यहीं के थे. अतीत के और भी पन्ने खुलते रहते हैं. लोग बताते हैं कि जयप्रकाश बाबू की धर्मपत्नी जयप्रभाजी यहीं की थी न! जयप्रभा जी के बाबू जी ब्रजकिशोर बाबू भी यहीं के हुए, उन्हें भला कौन नहीं जानना चाहता. महान संगीतकार चित्रगुप्त यहीं के हैं, जिनके बेटे संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद हैं. शाहजहां के बेटे दाराशिकोह के नाम पर बसे दरौली का किस्सा बताया जाता है. सीवान शहर में बुढ़िया माई के मंदिर की कहानी बताई जाती है कि कैसे उसे पहले जंगली माई कहते थे. महेंद्रा शिव मंदिर की कहानी बताई जाती है. कुछ नई कहानियां बताई जाती हैं. जैसे- टीवी पर आने वाले ‘सिया के राम’ सीरियल में हनुमान की भूमिका निभा रहे दानिश सीवान से ही हैं. जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर की कहानी बताई जाती है कि वह भी तो इसी सीवान जिले के हैं और आज होते तो देश के एक महत्वपूर्ण नेताओं में से एक होते. चंद्रशेखर पर बात निकलती है तो हम उसका विस्तार पाने की कोशिश करते हैं. उन्हें मार दिए जाने की बात पर बात करना चाहते हैं लेकिन बैठकी में बात पलट जाती है. राजेश नामक एक नौजवान कहते हैं, ‘आप क्या जानना चाहते हैं सीवान के बारे में? यह बिहार की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाने वाला प्रमुख जिला है. आपको मालूम है न कि बिहार की अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस मनी (विदेश में काम कर रहे कामगार द्वारा अपने देश भेजी जाने वाली रकम) का योगदान कितना महत्वपूर्ण होता है. साल 2015-16 में सीवान और पड़ोसी जिला गोपालगंज रेमिटेंस मनी में पहले पायदान पर रहा था. यही ट्रेंड पिछले साल भी था. 2014-15 में जीपीओ यानी मुख्य डाकघर के जरिए सीवान-गोपालगंज में 1800 करोड़ आए थे. उसी साल वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए 62 हजार रुपये का मनीआॅर्डर पहुंचा था. जानिए कि साल 2007 से 2012 के बीच 1,98,000 पासपोर्ट अकेले सीवान जिले से वेरीफाई हुए थे और उन्हीं सालों के दरम्यान गोपालगंज जिले से 1,53,000 पासपोर्ट वेरीफाई हुए. हमारे यहां से इतनी संख्या में लोग सउदी अरब, यूएई, कतर, ओमान, कुवैत आदि देशों में जाते हैं. भारत दुनिया में रेमिटेंस मनी की अर्थव्यवस्था में पहला स्थान रखता है, बिहार देश में दूसरा स्थान रखता है और जानिए कि पूरे बिहार में जितना भी रेमिटेंस मनी आता है, उसका 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सीवान-गोपालगंज में आता है.’
बिहार के अलग-अलग हिस्सों में कितने ही दिग्गज हुए लेकिन सब मिट गए और अधिकांश का नामोनिशान नहीं है लेकिन शहाबुद्दीन दिन-ब-दिन इसलिए मजबूत होते गए क्योंकि पटना से उन्हें शह मिलती रही और सीवान में वे समानांतर सरकार चलाते रहे. जनता को उनके लोग दिनदहाड़े सताते रहे लेकिन पटना ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रखी
सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के बाद बिहार में बढ़ते अपराधीकरण की चर्चा फिर से होने लगी है. अपराधीकरण की इस चर्चा के बीच शहाबुद्दीन की भी चर्चा होती है, जो पिछले कुछ दशकों में सीवान की ‘इकलौती’ पहचान बनकर उभरे हैं. सीवान की पहचान पर बात करने में कोई भी उन्हें बीच में नहीं लाना चाहता. बातचीत में कई किस्से-कहानियां आपस में टकरा जाते हैं लेकिन शहाबुद्दीन का नाम लेने से लोग कतराते ही नजर आते हैं. यह कहने पर कि इन दिनों तो सीवान पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या की वजह से चर्चा में है तो राजेश कहते हैं, ‘आप असल बात पर अभी आए. पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के बारे में जितना आप जानते होंगे, उतना ही हम लोग भी जानते हैं. उनकी हत्या के संबंध में दर्जन भर कहानियां हवा में तैरती रहीं. कभी बताया गया कि प्रेम प्रसंग में हत्या हुई, कभी कहा गया कि शहाबुद्दीन जेल में जो जनता दरबार लगाते थे, उसकी तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई, उसी तसवीर को अखबार में छाप देने के कारण उनकी हत्या हुई. इस बीच सीवान जेल से शहाबुद्दीन को भागलपुर भेज दिया गया. जेल में जनता दरबार में भाग लेने गए 50 के करीब लोगों को भी पुलिस ने हिरासत में लिया. यह कहानी दुनिया जानती है और हम लोग भी इतना ही जानते हैं.’
इसके बाद सीवान के रहने वाले संतोष से बात होती है. वे कहते हैं, ‘सीवान का यह नाम क्यों पड़ा मालूम है? कौशल राज के समय यह सीमांत इलाका था, सीमांत से यह सीवान बन गया.’ सीवान से कुछ ही दूरी पर मैरवा नाम का कस्बा है. वहां के रहने वाले एक शिक्षक संतोष पाठक ने पिछले कुछ सालों की मेहनत के बाद एक खामोश क्रांति की है. बिहार की हैंडबाॅल टीम में अधिकांश लड़कियां मैरवा की ही होती हैं. एक बार तो बिहार की टीम में नौ लड़कियां वहीं की थीं. रानी लक्ष्मीबाई क्लब बनाकर वर्षों से यह काम पाठक कर रहे हैं लेकिन सीवान में उनका नाम उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था. संतोष आगे हमें दोन के बारे में बताते हैं. कहते हैं, दोन गुरु द्रोणाचार्य का इलाका है, उन्हीं के नाम पर इसका नाम दोन पड़ा.’ फिर पूछते हैं, ‘पिछले साल हसनपुर के बनियापट्टी गांव के शंभू महतो की बेटी पूजा महतो के बारे में तो सुना ही होगा. कितना साहस का काम किया उन्होंने. विद्या बालन रोज टीवी पर प्रचार करती नजर आती हैं कि ‘जहां सोच, वहां शौचालय’ और शौचालय नहीं तो शादी नहीं लेकिन पूजा ने उस प्रचार को हकीकत में साबित किया है. पूजा की शादी के बाद जब विदाई होने वाली थी उन्हें मालूम चला कि जिस घर में वह ब्याह कर जा रही हैं, वहां शौचालय ही नहीं है. ऐसे में पूजा मना कर देती है कि वह ससुराल नहीं जाएगी. इसके बाद पंचायत बैठती है कि पूजा गलत कर रही हैं लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रहती हैं. मजबूर होकर लड़के के पिता को कहना पड़ता है कि वे पहले जा रहे हैं, जल्द ही शौचालय बनवा देते हैं, तब बहू आएगी.’ संतोष घूमा-फिराकर शहाबुद्दीन का नाम लिए बिना सीवान की पहचान को स्थापित करने के लिए बहुतेरी कोशिश करते हैं. बात करते-करते दरौंदा की बात होती है. दरौंदा यानी वह इलाका, जो चार साल पहले तब चर्चा में आया जब वहां की विधायक जगमातो देवी का असमय निधन हो गया. वे नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से विधायक थीं. उपचुनाव होना था. जगमातो के बेटे अजय सिंह कुख्यात थे. उन पर कई आपराधिक मामले चल रहे थे, सो अजय को टिकट दिया नहीं जा सकता था. खरमास के दिन चल रहे थे. बिहार में खरमास में शादियां होती नहीं लेकिन टिकट देने के लिए नीतीश कुमार के इशारे पर फटाफट अजय ने शादी कर ली और उनकी पत्नी को टिकट मिला और वे चुनाव जीतकर विधायक बन गईं.

संतोष कई लोगों से मुलाकात करवाते हैं लेकिन कोई भी खुलकर शहाबुद्दीन पर बात करने को तैयार नहीं होता. सब आश्वस्त हो जाना चाहते हैं कि मेरा मोबाइल बंद है या नहीं. कहीं मैं किसी की आवाज रिकाॅर्ड तो नहीं कर रहा. कहीं मैं शहाबुद्दीन का ही आदमी तो नहीं. सीवान में पहले से ही शहाबुद्दीन के नाम से यह खौफ रहा है. लोग गलती से भी खुलकर उनके बारे में बातें करने से बचते रहे हैं लेकिन राजदेव रंजन की हत्या के बाद से पूरे इलाके में एक अजीब किस्म का खौफ पसरा हुआ दिखता है. कोई खुलकर यह नहीं बताता कि शहाबुद्दीन के कारण कैसे यह खूबसूरत-सा इलाका बदनामी का पर्याय बन गया है. पत्रकार राजदेव रंजन के गांव हक्कामगांव में भी सन्नाटा पसरा है, भय का माहौल है. कोई कुछ नहीं कहना चाहता, कुछ नहीं बताना चाहता. रंजन के पिता राधे चौधरी सिर्फ इतना कहते हैं, ‘हम छोटे लोग हैं. गरीब लोग हैं. बड़े लोगों से नहीं टकरा सकते. कोई मेरे बेटे को पत्रकार होने के कारण मारेगा, ऐसा तो कभी सोचा नहीं था. ऐसा संभव भी तो नहीं. इतने लोग तो खबर लिखते हैं.’ रंजन के बड़े भाई कालीचरण, जो पेशे से घड़ीसाज हैं, वे बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन वे भी बस इतना ही कहते हैं, ‘मीडिया क्या कर सकती है? सीबीआई जांच का दबाव और माहौल बनाने तक सहयोग कर सकती थी. सबको मालूम है कि मेरा भाई क्यों मारा गया, किसने मारा लेकिन कोई बताएगा नहीं!’ कालीचरण सही कहते हैं. सीवान में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं होता. सीवानवालों में यह डर और भय अकारण नहीं है. सीवानवालों ने अपने शहर को कुख्यातपन के जरिए विख्यात होते देखा है. सब जानते हैं कि शहाबुद्दीन भले जेल में हों, भले उन्हें भागलपुर शिफ्ट कर दिया गया हो, भले उनके जनता दरबार पर कड़ाई कर दी गई हो लेकिन सीवान में कहीं पत्ता भी हिलता है तो उसकी खबर उनको होती है. शहाबुद्दीन के बारे में हम जानने की कोशिश करते हैं लेकिन सभी जगह एक चुप्पी रहती है. सिर्फ शहाबुद्दीन ही नहीं, नए रंगरूट राजद नेता उपेंद्र सिंह के बारे में भी कोई कुछ नहीं बोलना चाहता. उपेंद्र सिंह तो फिर भी एक नेता हैं. छुटभैयों के बारे में भी कोई कुछ नहीं बोलना चाहता. पिछले तीन साल में ही तीन बड़ी घटनाओं को सीवानवालों ने करीब से देखा है. व्यवसायी चंदा बाबू के दो बेटों को जिंदा तेजाब से नहलाकर मार दिए जाने के बाद दो साल पहले मामले के चश्मदीद उनके एक और बेटे राजीव की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई. सबने देखा है कि सांसद ओमप्रकाश सिंह के मीडिया सलाहकार श्रीकांत भारती को कैसे नवंबर 2014 में मार डाला गया. और अब राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई है. यह तो फिर भी हालिया दिनों की बात हुई. सीवानवाले जानते हैं कि पटना में बैठकर कोई भी सरकार भले ही पूरे राज्य में कानून व्यवस्था बहाल करने की बात कहे लेकिन सीवान पिछले दो दशक से अधिक समय से पटना के नियंत्रण से मुक्त रहा है. चाहे वह लालू प्रसाद यादव का समय रहा हो, राबड़ी देवी का या फिर नीतीश कुमार और भाजपा का समय रहा हो या अब नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव के गठजोड़ का समय रहा हो. सीवान में बिहार सरकार की सीमा समाप्त हो जाती है. सब जानते हैं कि शहाबुद्दीन से असल लड़ाई जमीनी स्तर पर अब तक सिर्फ भाकपा माले जैसे दल ही लड़ते रहे हैं. बाकी भाजपा से लेकर राजद और जदयू जैसी पार्टियों को अपने उम्मीदवारों तक को तय करने में भी मुश्किलें होती हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में सीवान में यह चर्चा आम थी कि भले ही पार्टी कोई लड़े, उनके प्रत्याशियों पर आखिरी मुहर शहाबुद्दीन ही लगा रहे हैं. यह चर्चा हवाबाजी नहीं. इसे तब और बल मिला था जब भाजपा जैसी पार्टी ने, जो पटना में बैठकर शहाबुद्दीन का विरोध करती है, रघुनाथपुर विधानसभा सीट से अपने निवर्तमान विधायक कुंवर का टिकट काटकर मनोज सिंह को दे दिया था. सीवान वाले जानते थे कि मनोज सिंह कौन थे. मनोज सिंह को शहाबुद्दीन के पूर्व शूटर के रूप में जाना जाता है. मनोज की बात सिर्फ सीवानवाले ही नहीं जानते, पूरे बिहार में उनके नाम का हंगामा मचा था. आरा के भाजपाई सांसद आरके सिंह ने खुलेआम कहा था कि पैसे से भाजपा के नेता अपराधियों को भी टिकट बेच रहे हैं. मनोज सिंह कहते हैं, ‘ये आरोप बेबुनियाद था. हमें तो खुद डर रहता है इसलिए बाॅडीगार्ड लेकर चलते रहे हैं. हम तो सिर्फ शहाबुद्दीन के गांव के हैं, साथ पढ़े हैं, इसलिए आसानी से शूटर का आरोप लगा दिया गया था.’ 2003 से शहाबुद्दीन जेल में हैं. 2009 मंे उनकी पत्नी हीना चुनाव हार चुकी हैं, इस हिसाब से देखिए तो इनका जलवा कम होना चाहिए था, रुआब उतरना चाहिए था लेकिन वह कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है. ऐसा क्यों, यह कोई नहीं बताता चाहता. सब बताते हैं कि जब पूरे बिहार में लालू प्रसाद यादव का ‘माई’ समीकरण यानी मुस्लिम-यादव समीकरण बना, तब भी सीवान में उस तरह से खुलकर माई समीकरण नहीं बन सका. मुस्लिम और यादव धरातल पर एक नहीं हो सके लेकिन वोटों का गणित सेट होता रहा और उनका कब्जा बना रहा. एक-एक कर कई बातें बताई जाती हैं कि शहाबुद्दीन का गणित क्या रहा है. लोग बताते हैं कि असल में शहाबुद्दीन का उतना खौफ सीवान में कभी नहीं चलता. बिहार के अलग-अलग हिस्सों में कितने ही दिग्गज हुए लेकिन सब मिट गए और अधिकांश का तो नामोनिशान नहीं है लेकिन शहाबुद्दीन दिन-ब-दिन इसलिए मजबूत होते गए क्योंकि पटना से उन्हें शह मिलती रही और सीवान में वे समानांतर सरकार चलाते रहे. उनके लोग सरेआम कभी पुलिसवाले को थप्पड़, कभी गोलियां मारते रहे. गिरफ्तार करने गई पुलिस को उनके लोग गोलियों से मारकर भगाते रहे, आम आदमियों को उनके लोग दिनदहाड़े सताते रहे, मारते रहे लेकिन पटना ने सीवान को बिहार से बाहर किसी अन्य राज्य या देश का हिस्सा मानकर अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रखी और शहाबुद्दीन का कद बढ़ता गया.
‘पटना ने गुहार सुननी बंद कर दी तो भला-बुरा, न्याय-अन्याय सबकी उम्मीद बस शहाबुद्दीन के दरबार से ही बच गई थी. छोटा-बड़ा हर फरियादी उनके पास पहुंचने लगा. यह सिलसिला साल 2000 के पहले से ही शुरू हुआ, जो अब तक जारी है. 2009 से शहाबुद्दीन पर चुनाव लड़ने से रोक लगा दी गई है. हीना चुनाव हार चुकी हैं. अब उनके बेटे ओसामा नए नायक के रूप में है’

शहाबुद्दीन के बारे में सीवान में सब परोक्ष रूप में बात करना चाहते हैं, प्रत्यक्ष तौर पर नहीं. शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर के ही रहने वाले एक सज्जन नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘शहाबुद्दीन जब काॅलेज में पढ़ता था, तभी अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था. 19 साल की उम्र में यानी 1986 में ही पहली बार अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन का नाम सुना गया. फिर जमशेदपुर में तिहरा हत्याकांड हुआ तो उसमें नाम आया, शहाबुद्दीन के नाम से भय होने लगा. शहाबुद्दीन ने चतुराई दिखाई. सही समय पर राजनीति में कदम रख दिया. लालू प्रसाद ने आशीर्वाद दिया. जनता दल की युवा इकाई से जुड़े. फिर 1990 में टिकट मिल गया और चुनाव जीत गया. फिर 1995 में चुनाव जीता. लालू प्रसाद मेहरबान होते गए. 1996 में संसद में भेजने के लिए सांसदी का चुनाव लड़वा दिया और शहाबुद्दीन जीत गया. 1997 में जनता दल के बाद राष्ट्रीय जनता दल बना. शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद का साथ दिया, कद और बढ़ा. शहाबुद्दीन ने मौन की राजनीति शुरू कर दी, लेकिन एक बड़ी फौज खड़ी की, जो हर तरह का काम करती रही. 2001 में शहाबुद्दीन ने एक काम किया कि उनके एक शागिर्द मनोज यादव को जब पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो एक पुलिस अधिकारी संजीव कुमार को शहाबुद्दीन ने थप्पड़ मारा. यह बात जंगल में आग की तरह फैली. बाद में पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो शहाबुद्दीन के लोगों के साथ पुलिस को घंटों तक गोलीबारी करनी पड़ी. दो पुलिसकर्मियों समेत कई लोग मारे गए, शहाबुद्दीन फरार हो गया. ऐसी घटनाओं का असर यह पड़ा कि सामान्य लोगों की बात कौन करे, पुलिस और प्रशासन के लोग ही खौफजदा रहने लगे. नतीजा यह हुआ कि सीवान में सारे फैसले शहाबुद्दीन के लोग ही करने लगे. निजी विवाद के निपटारे से लेकर तमाम तरह के फैसले. जब प्रशासन ने काम करना बंद कर दिया था, पटना ने गुहार सुननी बंद कर दी तो भला हो या बुरा, न्याय-अन्याय सबकी उम्मीद बस शहाबुद्दीन के दरबार से ही बच गई थी. लोग साहेब कहने लगे. छोटे से छोटे, बड़े से बड़े फरियादी पहुंचने लगे. यह सिलसिला साल 2000 के पहले से ही शुरू हुआ, जो अब तक जारी है, तभी कुछ दिनों पहले सीवान जेल में जनता दरबार में पहुंचे लोगों को गिरफ्तार किया गया और बताया गया कि कार्रवाई हुई है, जबकि सच्चाई यह है कि यह दरबार कोई आज से नहीं लग रहा. 2009 से शहाबुद्दीन पर चुनाव लड़ने से रोक लगा दी गई है. हीना चुनाव हार चुकी हैं. अब शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा का नाम नए नायक के रूप में है. ओसामा साहेब नहीं कहे जाते लेकिन बिहार मंे छोटे सरकार और छोटे साहब का चलन बहुत है, सो उनके लिए भी वही उपनाम चलाया जा रहा है.’ इसके बाद प्रतापपुर के ये सज्जन कहते हैं, ‘सब यहीं भूल जाइए कि हमने आपको कुछ बताया है. सामान्य जानकारी देने के बाद भी लोग डरते हैं.’ फिर संतोष कहते हैं, ‘चलिए, शहाबुद्दीन की कहानी तो अंतहीन है. यहां उनके लोगों का नारा ही है, हम विवाह भी कराते हैं, विवाह होने के बाद पति-पत्नी मंे अनबन हो तो उसका निपटारा करवाकर वंश को चलते रहने का मार्ग भी प्रशस्त भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर वंशावली को आगे बढ़ने से रोक भी देते हैं.’
यह दुनिया 100 प्रतिशत अंक पाने वालों से नहीं चल रही है…

मध्य प्रदेश के सागर जिले के गेहुंरास गांव के 15 साल के प्रवीण रजक ने मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल के तहत 10वीं की परीक्षा दी थी. 16 मई को परीक्षा के परिणाम आए. प्रवीण गणित में पास नहीं हो पाया जबकि उसके सभी दोस्त पास हो गए थे. वह चुपचाप पास के जंगलों की तरफ चला गया. देर शाम तक जब वह वापस नहीं आया तब उसकी खोजबीन हुई. प्रवीण तो नहीं मिला, जंगल में एक पेड़ पर उसकी लाश टंगी हुई मिली. इसी तरह डिंडोरी जिले के सरसी गांव की कुंजन 12वीं की परीक्षा पास नहीं कर सकी. वह बहुत तनाव में थी. कुंजन को तनाव दूर करने का रास्ता आत्महत्या में दिखा और उसने फांसी लगा ली.
अब स्कूल के परीक्षा परिणामों में असफल हो जाने का दर्द जिंदा और सजग शरीर को आग लगा लेने से ज्यादा होता है. रीवा जिले के लालगांव हरदी की 10वीं की परीक्षा देने वाली कामना पटेल ने पास न होने पर मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग लगा ली. स्कूल की ये परीक्षाएं जिंदगी की परीक्षाओं से बहुत बड़ी और धारदार हो गई हैं. ग्वालियर जिले की कृतिका माल्या ने तो परीक्षा परिणाम आने का भी इंतजार नहीं किया. उसे महसूस हो रहा था कि वह पास नहीं हो पाएगी. उसकी शंका सच निकली, वह एक विषय में पास नहीं हुई, लेकिन परिणाम आने से पहले ही उसने खुदकुशी कर ली.
सागर की 17 साल की कंचन सूर्यवंशी को भी ऐसा ही लगा था कि वह परीक्षा में पास नहीं होगी. कंचन ने भी खुदकुशी कर ली. हालांकि दो दिन बाद परीक्षा परिणाम आने के बाद कंचन के भाई ने उसके रोल नंबर से परीक्षा परिणाम जांचा तो पता चला कि वह तो पास हो गई है. तब तक परिवारवाले कंचन की अस्थियां मां नर्मदा में प्रवाहित कर चुके थे. भोपाल के राजीव नगर का एक बच्चा रवि कुमार भी बोर्ड परीक्षा पास नहीं कर सका. उसके पिता बसंत ने उसे समझाया कोई बात नहीं; लेकिन अखबारों में मेधावी बच्चों की फोटो छापते हैं. तू भी तो कुछ ऐसा कर कि नाम अखबार में छपे. अगले दिन सुबह रवि रस्सी के फंदे पर लटका मिला और उसकी खबर अखबार में प्रकाशित हुई.
शिक्षा बेहतर समाज के निर्माण का साधन न रहकर जब क्रूर सत्ता का भागीदार बनने का रास्ता बन जाए, तब वहां भी हिंसा ही होगी. शिक्षक भी हिंसा करेगा. सरकार भी हिंसा करेगी. बाजार तो बूचड़खाना है ही. सबसे आगे रहना इसलिए जरूरी हो गया है ताकि बच्चे भी उस सत्ता में शामिल हो सकें जो संसाधन, अवसर और संभावनाओं का असमान वितरण करती है. जो पहले लोगों को कमजोर बनाती है, फिर उन पर शासन करती है. ऊंचे अंक पाना इसलिए जरूरी है
मध्य प्रदेश में मई के पहले पखवाड़े में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी हुए. मध्य प्रदेश शिक्षा मंडल और स्कूल शिक्षा के केंद्रीय बोर्ड के परिणाम आए. एक दिन परीक्षा परिणामों की खबर अखबारों में पहले पन्ने पर थी. ठीक दूसरे दिन उन परीक्षा परिणामों में खुद को असफल देख आत्महत्या करने वाले बच्चों की संख्या और कहानियां खबर बन गईं. कम अंक पाने या परीक्षा में पास न हो पाने की वजह से 30 बच्चों ने आत्महत्या कर ली थी. इसके थोड़े दिन के बाद शहर की कोचिंग और निजी शिक्षण संस्थाओं के पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन छपे दिखेंगे. बच्चों की आत्महत्याओं की खबर उनकी तेरहवीं से ही पहले अपनी सामयिकता खो चुकी होगी.
अंक जितने ज्यादा बढ़ते जाते हैं, अवसर और विकल्प उतने ही कम होते जाते हैं, अपेक्षाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं, दबाव भी उतना ही बढ़ता है. ज्यादा अंक कुछ ज्यादा करने की मानसिक-भावनात्मक क्षमता नहीं बढ़ाते, बल्कि कुछ खास और तथाकथित उच्चवर्गीय काम करने और खास होने की भावना विकसित करते हैं.
ऊंचे अंक केवल कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, विशेष डाॅक्टर, विशेष वकालती, विशेष इंजीनियर या अब बड़ा बाजारू अधिकारी बनने का सपना गढ़ते हैं. ‘विशेष’ का मतलब होता है ऊंची फीस, या ऊंचा वेतन, ऊंची कमाई और संसाधनों पर ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण कर पाने की संभावनाएं. ऊंचे अंक सामान्य और समाज के समकक्ष का शिक्षक, किसान, लेखक, प्रशिक्षक, वकील बनने का सपना नहीं गढ़ते.
जरा सोचिए ऐसा वक्त और परिस्थिति क्यों आई कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को बच्चों से यह अपील करनी पड़ रही है कि परीक्षा परिणाम आने के बाद बच्चों आत्महत्या मत करना? क्या उस अपील को पढ़ाकर असफल होने का एहसास बच्चों के मन से निकाला जा सकेगा? क्या हिंसक प्रतिस्पर्धा की भावना खत्म हो जाएगी? क्या यह विश्वास पैदा हो पाएगा कि उसके लिए भी देश-दुनिया में विविधतापूर्ण और बहुत कुछ रचने के अवसर मौजूद हैं? यह देश, समाज और विश्व 99-100 प्रतिशत अंक वालों से नहीं चल रहा है. उनमें से ज्यादातर तो वास्तव में समाज के लिए नई चुनौतियां ही खड़ी कर रहे हैं. समस्याअों से जूझने का काम तो वे लोग कर रहे हैं जिन्हें ‘अंक प्रणाली’ असफल साबित करती है.
यह शिक्षा ऐसी वैज्ञानिकता सिखाती है जिससे बना विशेषज्ञ अपनी दुकान के आगे नींबू और हरी मिर्ची की माला डालता है. महल बनवाते समय राक्षस के चेहरे वाली मटकी टांगता है. वह इतना लालची हो जाता है कि आध्यात्मिकता का भी बाजार लगा लेता है और श्रद्धा को सरे बाजार बेचता है. इतना ही नहीं, यह शिक्षा ऐसे इंसान बनाती है जो अंदर से क्रूर भी होते हैं, खोखले भी और कमजोर भी. यह शिक्षा इंसानियत को कितने गहरे तक मार देती है
सर्वोच्च श्रेणी में तो 0.1 फीसदी बच्चे आते हैं, बाकी के काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं. सर्वोच्च श्रेणी वालों को मालिक माना जाने लगा है और यह भी धारणा है कि शेष 99.99 प्रतिशत उनके दास या गुलाम होंगे. सरकार भी यही मानती है. शिक्षक भी यही मानते हैं. अब पालक भी यही विश्वास करते हैं. मौजूदा संकट बच्चों की आत्महत्या तक ही सीमित नहीं है. वास्तव में कम अंक यह डर पैदा करते हैं कि अब हम यानी बच्चे स्वतंत्र नहीं रह पाएंगे. अब हमें गुलाम हो जाना होगा. वे गुलाम होने के बजाय मर जाना बेहतर विकल्प समझते हैं.
वैसे आप जानते ही होंगे की भारत की 58 प्रतिशत पूंजी एक प्रतिशत लोगों के पास है. ऐसा इसलिए है कि हम स्कूल में यही सिखा रहे हैं कि पूंजी पर कैसे कौशलपूर्ण तरीके से कब्जा किया जाए! अपनी शिक्षा व्यवस्था इस स्थिति को बदलने की मंशा नहीं रखती है. वह इसे बनाए रखने के लिए बनी है. यही कारण है कि समाज अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर उस ‘एक प्रतिशत’ के गिरोह में शामिल करने के लिए तत्पर है. उन्हें पता है कि बच्चे को कलेक्टर क्यों बनाना है, डाॅक्टर क्यों बनाना है, एमबीए क्यों बनाना है. ताकि वह पूंजी की लूट में अपना हिस्सा कमा सके.
उनका यह डर गलत नहीं है. यह मिथ्या भी नहीं है. यह एक राजनीतिक-आर्थिक सच्चाई है. शिक्षा बेहतर समाज के निर्माण का साधन न रहकर जब क्रूर सत्ता का भागीदार बनने का रास्ता बन जाए, तब वहां भी हिंसा ही होगी. शिक्षक भी हिंसा करेगा. सरकार भी हिंसा करेगी. बाजार तो बूचड़खाना है ही. सबसे आगे रहना इसलिए जरूरी हो गया है ताकि बच्चे भी उस सत्ता में शामिल हो सकें जो संसाधन, अवसर और संभावनाओं का असमान वितरण करती है. जो पहले लोगों को कमजोर बनाती है, फिर उन पर शासन करती है. ऊंचे अंक पाना इसलिए जरूरी है ताकि शासन करने वालों की श्रेणी में शामिल हुआ जा सके. यदि अंक कम आए, तो बच्चे कमजोर और शोषितों की जमात का हिस्सा बनेंगे.
जब भारत को महाशक्ति बनाने का दावा किया जाता है तब उस भाव में एक किस्म की हिंसा ही होती है. दूसरों पर शासन करने और संसाधनों पर कब्जा करने की हिंसक भावना. महाशक्ति बनने के लिए ऐसा ही समाज चाहिए जो अपने मित्र, अपने हमउम्र और समान इंसान को यह एहसास करा सके कि तुम मुझसे पीछे हो. मैं निर्णय लूंगा. मेरी ताकत ज्यादा है. यही एहसास बच्चों को उस हिंसा के लिए तैयार करता है जो महाशक्ति बनने के लिए जरूरी है. यह एहसास मुख्यमंत्री जी की अपील से खत्म न होगा.
यह बुरा और खतरनाक एहसास खत्म करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का बाजारीकरण रोकना होगा. समान शिक्षा प्रणाली, जहां सभी परिवारों के बच्चे एकसमान शिक्षा परिवेश में शिक्षा हासिल कर सकें, को विकसित करना होगा. शिक्षा को धार्मिक कट्टरपंथ से बचाकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना होगा. हर बच्चे को समझने की क्षमता विकसित करनी होगी कि उसकी खासियत और क्षमताएं क्या हैं; वह एक चित्रकार हो सकता है, संगीतकार या कहानीकार, या मिट्टी का वास्तुकार, या किसान, या अच्छा यात्री, या शिक्षक, या फिर अच्छा मनोवैज्ञनिक.
आप बच्चों में बड़ी कार लेने की क्षमता विकसित करना चाहते हैं, साथ ही आप यह भी मानते हैं कि जब वह कार खराब हो जाएगी तो उसे ठीक करने वाला या उसका पंक्चर बनाने वाला व्यक्ति ‘निकृष्ट’ होता है. आपकी शिक्षा व्यवस्था ऐसी है जो यह नहीं सिखाती कि अगर इंजन और पंक्चर ठीक न हुआ, तो तुम्हारी बड़ी कार कबाड़े से ज्यादा कुछ नहीं है! सवा तीन लाख किसानों की आत्महत्या से समाज को कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता? क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे स्कूल, हमारे शिक्षक बच्चों को यह बताते ही नहीं हंै कि किसानी और किसान होने का मतलब क्या है. आजकल स्कूल में पढ़ाया जाता है कि खाना किसी कंपनी या डिपार्टमेंटल स्टोर या बड़े माॅल से आता है! किसानी को एक निकृष्ट काम बनाने का काम राजसत्ता और शिक्षा व्यवस्था ने मिलकर किया है. यह शिक्षा व्यवस्था नाव खरीदना, नाव चलाने वाले नाविक को नौकरी पर रखना, उस नाविक का खूब शोषण करना सिखाती है; पर यह शिक्षा तैरना और नाव की मरम्मत करना नहीं सिखाती. वह बच्चों को सिखाती है कि अच्छे अंक लाओगे तो तुम नाव और नाविक दोनों के मालिक बनोगे. तुम्हें तैरना सीखने की जरूरत नहीं है. यह शिक्षा व्यवस्था बच्चों को ऐसा बना देती है कि वे लहरों के ऊंचे उठने, नदी में भंवर के बनने और तूफान आने पर बौखला जाते हैं. उन्हें तैरना नहीं आता. नाविक तैरकर भंवर से निकल सकता है. उसे नदी और तूफान के सिद्धांत पता होते हैं.
सवा तीन लाख किसानों की आत्महत्या से समाज को कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता? क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे स्कूल, हमारे शिक्षक बच्चों को यह बताते ही नहीं हैं कि किसानी और किसान होने का मतलब क्या है. आजकल स्कूल में पढ़ाया जाता है कि खाना किसी कंपनी या डिपार्टमेंटल स्टोर या बड़े माॅल से आता है! किसानी को एक निकृष्ट काम बनाने का काम राजसत्ता और शिक्षा व्यवस्था ने मिलकर किया है
यह शिक्षा ऐसे इंसान बनाती है जो अंदर से क्रूर भी होते हैं, खोखले भी और कमजोर भी. यह शिक्षा इंसानियत को कितने गहरे तक मार देती है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लग सकता है कि शिक्षित होकर व्यापारी, अधिकारी, नौकरशाह या जन प्रतिनिधि बनने के बाद वह बेहद निष्ठुर व्यवहार करता है. कई मामलों में महिला, महिला के प्रति असंवेदनशील हो जाती है, दलित, दलित के ही प्रति असंवेदनशील हो जाता है, नौकरशाह उपेक्षितों के प्रति असंवेदनशील हो जाता है. कुछ बिरले ही मामले होते हैं जहां शिक्षित व्यक्ति इंसान की तरह व्यवहार करता है. बाद में हम लड़ते हैं कि आरक्षण बनाए रखो या आरक्षण खत्म कर दो. माननीयों, यह बताइए आखिर में पैदा कौन हो रहा है? यह शिक्षा ऐसी वैज्ञानिकता सिखाती है जिससे बना विशेषज्ञ अपनी दुकान के आगे नींबू और हरी मिर्ची की माला डालता है. महल बनवाते समय राक्षस के चेहरे वाली मटकी टांगता है. वह इतना लालची हो जाता है कि आध्यात्मिकता का भी बाजार लगा लेता है और श्रद्धा को सरे बाजार बेचता है.
कुछ नीतिगत सवाल; मध्य प्रदेश में निजी शिक्षण संस्थाएं हर साल शिक्षण शुल्क में खूब बढ़ोतरी कर देती हैं. लोग खूब हल्ला मचा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि फीस की वृद्धि को नियंत्रित किया जाए. इसके लिए मध्य प्रदेश सरकार फीस नियंत्रण के लिए नियामक व्यवस्था बना रही है. यह व्यवस्था पांच साल से बस बन ही रही है, लागू नहीं हो रही है; क्योंकि सरकार की मंशा ही नहीं है कि स्कूली शिक्षा का बाजारीकरण रुके. पिछले 17 साल से सबको यह पता है और सामने दिखता है कि बच्चों के बस्ते का वजन उनके अपने वजन से ज्यादा होता है. उसे कम करने के लिए कमेटियां बनीं. बच्चों पर यह वजन इतना बढ़ा कि उन्हें आत्महत्या आसान लगने लगी. बस्ते का वजन इसलिए कम नहीं होगा कि स्कूलवालों का गिरोह किताब छापने वालों के गिरोह के साथ मिलकर धंधा करता है. बच्चों पर से दबाव कम करने के लिए एक नीति बनी कि आठवीं कक्षा तक किसी भी बच्चे को फेल नहीं किया जाएगा और उसको किसी कक्षा में रोका नहीं जाएगा; ऐसा लगता है कि यह नीति सरकार की बुद्धि में पड़ी नहीं! उन्होंने सोचा कि जब कोई बच्चा फेल ही नहीं होना है तो शिक्षक और प्रशिक्षक की क्या जरूरत. तो शिक्षक से पढ़ाई का काम छोड़कर हर किस्म का बाबूगीरी का काम करवाया जाने लगा. परिणाम यह हुआ कि बच्चा आठवीं तक पास है, लेकिन क्षमता के नाम पर उसे पंगु बना दिया गया. सरकार ने यह बहुत सुनियोजित ढंग से किया ताकि निजी शिक्षा क्षेत्र पनप सके. और जब बच्चे 9वीं, 10वीं या 12वीं में पंहुचे तो उनकी नींव बहुत कमजोर रही. हमारी सरकारों का बहुत बड़ा और अक्षम्य अपराध है शिक्षा का बाजारीकरण करने में पूरी मदद करना और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नेस्तनाबूत करना.
मानवीय संवेदनाओं का जीवन अब बहुत छोटा है. सुबह अखबार में बच्चों की आत्महत्या की खबर पढ़ते हैं, थोड़ी-बहुत बातचीत की जाती है, थोड़ा ज्ञान पेलते हैं और अपने धंधे पर चल देते हैं. क्योंकि आत्महत्या की आज की खबर उनके बच्चे के बारे में नहीं, किसी और के बच्चे के बारे में होती है. बात को आत्महत्या तक ही सीमित रखना अनुचित है. बात उससे कहीं बड़ी है. मुझे भी पता है और आपको भी कि अब 8वीं कक्षा से बच्चों को कोचिंग संस्थान और मार्गदर्शी संस्थान नामक ‘प्रताड़ना गृहों’ में डाला जाने लगा है ताकि वे आईआईटी, एमबीए, डाॅक्टर, इंजीनियर ही बनें. अब बच्चों को तय करने का अधिकार नहीं है कि उनकी रुचि और सक्षमता किस क्षेत्र में है; यह तो बाजार के साथ मिलकर मम्मी-पापा तय करते हैं. वे गर्व से कहते हैं कि हमारी बेटी या बेटा तो इतनी तैयारी कर रहा है कि वह 3 साल से घर से बाहर ही नहीं निकला, कहीं रिश्तेदारी में नहीं जाता, शादियों में नहीं जाता. उसने तो दीवाली भी नहीं मनाई. जरा सोचिए तो सही कि क्या यह स्थिति अच्छी है? जो बच्चा समाज और रिश्तों को ही नहीं जानता-मानता वह डाॅक्टर बनकर क्या करेगा; बीमारों को देखकर उसकी लार ही तो टपकेगी! यह शिक्षा बच्चों को मानव समाज और उसके मूल्यों से काटकर अलग कर देती है.
जब सरकारें शिक्षा व्यवस्था के इस सच को छिपाने की कोशिश करती हैं, तब अपील जारी करती हैं, कमेटी बनाती हैं. अभी मध्य प्रदेश में भी एक नई कमेटी बनी है जो बच्चों की आत्महत्या रोकने के लिए रास्ता सुझाएगी! यह तय है कि वह कमेटी भी इस षड्यंत्र पर चुप ही रहेगी. वे ऐसा व्यवहार करती हैं, मानो उन्हें सच पता न हो. उन्हें पूरा सच पता है. उन्हें यह भी पता है कि हर बच्चे को आत्महत्या के लिए उनकी असमान शिक्षा नीतियों ने मजबूर किया है. शिक्षा के बाजारीकरण और मशीनीकरण ने मजबूर किया है पर वह चुप रहेगी!
राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो के सालाना प्रतिवेदनों का अध्ययन करने से जो कुछ भी पता चलता है वह डरा देने वाला है. वर्ष 2001 से 2014 के बीच भारत में परीक्षाओं में फेल हो जाने के कारण 31,877 बच्चों ने आत्महत्या कर ली. इसी अवधि में मध्य प्रदेश में 2,118 बच्चों ने खुद को खत्म कर लिया. यह सही है कि ज्यादातर बच्चे आत्महत्या के विकल्प के बारे में नहीं सोचते होंगे, लेकिन हिंसक प्रतिस्पर्धा और ताकतवर बनने-बनाने की अपेक्षाएं उन्हें किसी न किसी के प्रति हिंसा करना तो सिखाती ही हंै. जरा शिक्षा को इस नजरिये से देखिए कि क्या वह बच्चे को एक अच्छा दोस्त, एक अच्छा इंसान, एक अच्छा कलाकार, एक सहृदय इंसान, एक अच्छी संतान और एक अच्छा नागरिक बना रही है? हमारा स्कूल परीक्षा के माध्यम से यह तो जांच कर लेता है कि बच्चा कितना जान पाया, पर यह नहीं जांच पाता कि जो नहीं जान पाया उसका कारण क्या है. हमारा स्कूल यह कभी नहीं जांचता कि बच्चे की खासियत, अभिरुचि और कौशल क्या है. उसके लिए महत्वपूर्ण हैं अंक, जो अपना महत्व खो चुके हैं.
ये कैसी दुनिया है जहां भीख मांगने वालों की जेब पर भी डाका पड़ता है…

ये पिछले साल गर्मियों की बात है. रात के अंधेरे में वीराने को चीरती शिवगंगा एक्सप्रेस पूरी रफ्तार में दौड़ती चली जा रही थी. दिल्ली से इलाहाबाद का मेरा सफर थोड़ा मुश्किल था क्योंकि रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हुआ था. खचाखच भरी बोगी में कहीं भी बैठने की जगह नहीं थी. सीट न मिलने से मेरी मुश्किलें और बढ़ गई थीं. खैर, मीडिया का नाम लेकर मैंने टीटी से कहीं बैठाने की गुजारिश की तो उन्होंने अपने लिए आरक्षित एक बोगी की सात नंबर सीट पर मुझसे बैठने को कह दिया था.
उनका आभार व्यक्त करते हुए मैं सीट पर पहुंचा, तो वहां पहले से कोई मुसाफिर लेटा हुआ मिला. पूछने पर पता चला कि वो रेलवे में असिस्टेंट ड्राइवर हैं और मेरी तरह उनके लिए भी टीटी ने उसी सीट पर लेटने या कहें कि बैठने का इंतजाम किया था. अब हम एक सीट पर दो लोग थे. वो लेटे हुए थे लेकिन सज्जनता दिखाते हुए उस सहयात्री ने मुझे ठीक से बैठने की जगह दी. हममें कुछ बातें भी हुईं. उन्होंने मुझसे मेरी नौकरी के बारे में पूछा. पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा होने की बात पता चलने पर उन्होंने मेरे न्यूज चैनल और वहां काम के तरीकों की जानकारी ली. इन सबके बीच रात के एक बज चुके थे. हम दोनों एक छोटी-सी बातचीत के बाद चुप थे. मैंने बैठे-बैठे आंखें बंद ही की थीं कि एक छोटी-सी बच्ची का रुदन कान तक पहुंचा. मैं चौंका, मन में ये ख्याल आया कि इतनी रात गए ट्रेन में बच्ची के इस तरह रोने की वजह क्या है. ट्रेनों में महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाली घटनाओं से हम समय-समय पर वाकिफ होते रहते हैं.
जेहन में ये ख्याल आते ही पूरा शरीर सिहर उठा. इन सारी जिज्ञासाओं के बीच बच्ची का रोना सुन साथ लेटे यात्री की नींद भी खुल गई. उन्होंने कहा, ‘भाई साहब! जरा देखिए तो कौन रो रहा है.’ तब तक मैं भी सीट छोड़कर उठ चुका था. आगे बढ़कर देखा तो सात-आठ साल की एक मासूम वॉश बेसिन के पास सिर पर हाथ रखे रो रही थी. मटमैली फ्रॉक पहने वो एक भीख मांगने वाली बच्ची थी. मैंने रोने की वजह पूछी. उसने बताया कि वो फर्श पर सो रही थी, इस बीच किसी ने उसका सारा पैसा चुरा लिया. हैरानी, गुस्से और अफसोस के मिले-जुले एहसास मेरे दिल में तैर गए. ये कैसी दुनिया है जहां भीख मांगने वालों की जेब पर भी डाका पड़ता है.
उस बच्ची के माता-पिता नहीं थे. चाची की मारपीट की वजह से उसने घर छोड़ दिया था और भीख मांगकर अपना पेट भरती थी
खैर, मैंने उसे चुप कराया और उसके हाथ में पचास रुपये रखे. उस क्षणिक अपनत्व को पाकर गरीब, बेबस लड़की के आंसू रुक गए. मेरे पूछने पर उसने अपना नाम ‘आकांक्षा’ बताया. और पूछने पर पता चला कि उसके मां-बाप नहीं हैं. चाचा-चाची के साथ रहती थी लेकिन चाची की मारपीट और जुल्म से तंग आकर उसने घर छोड़ दिया था. वो दोबारा घर नहीं लौटी और शायद उसे ईमानदारी से ढूंढ़ने की कोशिश भी नहीं हुई. आकांक्षा अब भीख मांगकर अपना पेट भरती है. नींद आने पर ट्रेन और प्लेटफॉर्म से लेकर स्टेशन के बाहर तक, जहां जगह मिले, सो जाती है. अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि वो बच्ची कभी भी किसी हैवान की वहशत का शिकार हो सकती है. इस बात की भी गारंटी नहीं कि पूर्व में उसके साथ कुछ गलत न घटा हो. लेकिन जो दुनिया के फेंके चंद सिक्कों की मोहताज हो वो अपना हाल कहे भी तो किससे? वो तो किसी भी हालत में अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं है.
पढ़ने-लिखने और भविष्य के सपने देखने का हक आकांक्षा को भी है. उसकी पेट की भूख और शिक्षा का प्रबंध करना बेशक सरकार की ही जिम्मेदारी है. लेकिन हक और इंसाफ की बातें तो किताबी हैं. व्यावहारिकता को देखें तो ना जाने कितनी ‘आकांक्षाएं’ बेबसी के आलम में जीने को मजबूर हैं. मेरे जैसे चंद लोग कभी मेहरबान हुए, तो पचास-सौ रुपये पकड़ाकर उनकी मदद कर देते हैं और बात वहीं की वहीं खत्म हो जाती है. इससे उनकी समस्या का कोई खास हल नहीं निकल पाता. उनकी समस्याओं की जड़ तक पहुंचकर उसे मिटाने का बीड़ा कौन उठाता है? ट्रेन के अंदर जो मंजर मैंने देखा वो देश के हर हिस्से में देखा और महसूस किया जा सकता है. कोई पूछने वाला नहीं है. न कोई व्यवस्था और न ही बड़ी-बड़ी बातें करने वाले गैर – सरकारी संगठन. शायद सरकारें ही नहीं, हम सभी अपने स्वार्थ के लिए जी रहे हैं. समाज की डगमगाती नैया को धारा के विपरीत खींचकर ले जाने की हिम्मत किसी में भी नहीं है.
(लेखक टीवी पत्रकार हैं और नोएडा में रहते हैं)





















