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जल संकट बरकरार सरकार के प्रयास नाकाफी

हिमाचल की राजधानी शिमला में जल संकट बरकरार है। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक लोगों को चौथे दिन पानी मिल रहा था। अभी तक के सबसे गंभीरतम संकट सेे स्थानीय लोगों और सैलानियों को भी दिक्कत झेलनी पड़ी है। नई समस्या बारिश शुरू हो जाने के बाद गाद (सिल्ट) की आई है जिससे पानी लिफ्ट करने में दिक्कत आ रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए पांच विभागों के समन्वय से एक योजना बनाई है।

ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने शिमला को भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था तब इसे सिर्फ 16-17 हजार की आबादी के हिसाब से विकसित किया गया था। शिमला नगर की आबादी 2011 की जनगणना में 1,69,570 बताई गयी है जो अब निश्चित ही कुछ हजार ज्यादा होगी। पर्यटन सीजन में यह एक लाख के आसपास आबादी बढ़ जाती है। इन दशकों में आबादी तो दस गुणा बढ़ गयी लेकिन सुविधाओं का विकास उस हिसाब से नहीं हो पाया।

राजधानी में पानी की कुल जरूरत 450 लाख  लीटर प्रति दिन (एमएलडी) है।  यह रिपोर्ट लिखे जाने के वक्त नगर को 31-32 एमएलडी के करीब ही पानी मिल रहा है। पानी के पाँच स्रोत गुम्मा, गिरी, अश्वनी खड्ड, चुरट, चेयड़ और कोटी ब्रांडी हैं जिनमें सबसे ज्यादा 17-18 एमएलडी के करीब गुम्मा से मिलता है। जल आपूर्ति के मुख्य स्रोत अश्वनी खड्ड से सप्लाई दो साल से बंद है जब इसके पानी के गंदले होने से करीब 24 लोगों की पीलिया से मौत हो गयी थी। सर्दियों में कम बर्फबारी और बारिश भी इस बार मुसीबत का कारण बनी है।

कनेक्शन कटने शुरू

हाई कोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने वे सभी कनेक्शन काटने शुरू कर दिए हैं जिन्हें सीधे लाइन से अवैध रूप से लिया गया है। प्रभावशाली लोगों ने इस तरह के अवैध कनेक्शन का जुगाड़ किया था। यह ज़रूर हैरानी की बात है जो सरकारी अफसर और कर्मचारी इसके लिए जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई अभी तक नहीं की गयी है। निगम अधिकारियों के मुताबिक अब तक दो दर्जन से ज्यादा अवैध कनेक्शन काटे जा चुके हैं।  इसके आलावा सीधे लाइन में टुल्लू पम्प लगाने वाले लोगों पर भी कार्रवाई की जा रही है।

सरकार की योजना

जय राम सरकार की बड़ी पेयजल योजना पर सेंट्रल वाटर कमीशन (सीडब्ल्यूसी) के फैसले का इन्तजार है। प्रदेश के आईपीएच विभाग ने इसी महीने 4751 करोड़ की पेयजल योजना का ड्राफ्ट केंद्र सरकार को भेजा था। इसकी डीपीआर तैयार होने जा रही है। इस योजना पर केंद्र सरकार के साथ पहली बैठक 13 जून को दिल्ली में सेंट्रल वाटर कमीशन के साथ हुई। सरकार उम्मीद कर रही है कि इसका बेहतर नतीजा सामने आएगा और इसके लागू होने से शिमला से पानी की समस्या कमोवेश खत्म हो जाएगी।

केंद्र में बीजेपी और प्रदेश में भी बीजेपी की सरकार होने के नाते सबसे बड़ी पेयजल और सिंचाई योजना पर सीडब्ल्यूसी मुहर लगा सकती है। विभाग के मंत्री महेंद्र सिंह का दावा है कि इस योजना के शुरू होने से प्रदेश में पेयजल और सिंचाई के लिए संकट से नहीं गुजरना पड़ेगा। ‘इस योजना के तहत प्रदेश में चैकडैम, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सहित सूखे प्रोजेक्ट्स को रिचार्ज करने का प्रावधान हैÓ।

 

jasbeer kaur chalak

जसबीर का जीवट

शिमला में गंभीर जल संकट है, एक महिला टैंकर चालक ने अपनी जीवट से लोगों की मदद की है। पंजाब के संगरूर जिले की जसबीर कौर अपने पति लक्खा सिंह के साथ शिमला में पानी का टैंकर चला रही है। वह हर रोज 16 घंटे ड्राइविंग कर 25000 लीटर के करीब पानी सतलुज से गुम्मा पहुंचा रही है जहाँ से यह पानी फिल्टर करके शिमला में सप्लाई किया जाता है। जसबीर के इस जज्बे के लिए उन्हें 11 जून को सम्मानित किया गया। वैसे तो जसबीर मैदानी इलाके में ट्रक चलाने की अभ्यस्त है परन्तु शिमला में लोगों की दिक्कत देखते हुए उसने यह साहस भरा फैसला किया। जसबीर कौर इन दिनों काफी चर्चा में है और शिमला के लोगों की वह हीरो बन चुकी है। वह पति लक्खा सिंह के साथ टैंकर चलाकर शिमला में लोगों की प्यास बुझा रही है। लोगों की सहायता के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आई हैं जो टैंकर्स से पानी सप्लाई कर पानी उपलब्ध करवा रही हैं। जसबीर 35 साल की हैं और दिलचस्प यह है कि उन्हें ड्राइविंग करते हुए तीन महीने ही हुए हैं। उनके पास ड्राइविंग का हेवी मोटर व्हीकल (एचएमवी) लाइसेंस है।

सवाल है कौन मारेगा बाजी तेलंगाना में

कर्नाटक में जिस फिल्मी अंदाज में केसरिया का राज्यारोहण थमा उसकी कसर अब दो तेलुगु राज्यों में अपनी जीत के परचम से भाजपा पूरी करना चाहती है। दक्षिण भारत में घुसने में कामयाब होने के लिए कर्नाटक में नाकाम भाजपा अब आंध्र प्रदेश और खासकर तेलंगाना के जरिए प्रवेश की हरचंद कोशिश कर रही है। पार्टी अब सब जगह इस प्रचार में लगी है कि उन्हें सबसे ज़्यादा मत तेलुगुभाषी क्षेत्रों में मिले। भाजपा संगठन को भरोसा है कि दक्षिण भारत विजय का सपना तेलंगाना के जरिए ही संभव है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ज़मीनी स्तर पर गऱीबों के लिए कई कल्याणकारी और विकास की योजनाएं शुरू की। पहले से चल रही योजनाओं के नामों  में यथा अनुरूप सुधार किए। फिलहाल राज्य में केसरिया पार्टी विशिष्ट संपर्क अभियान और कुछ और भी अभियान चला रही है। इसका आरोप है कि ‘राज्य की सत्ता चला रही टीआरएस पार्टी अपने चुनावी वादे पूरे नहीं कर सकी। इसने 2014 के चुनाव में सार्वजनिक सभाओं में कहा कि यह बीपीएल परिवारों को दो कमरे का घर देगी। मुख्यमंत्री के सी आर  ने कहा कि नवगठित तेलंगाना का मुख्यमंत्री अनुसूचित जातियों का ही नेता होगा । लेकिन उन्होंने अपना वादा पूरा नहीं किया।Ó भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. के लक्ष्मण ने आरोप लगाते हुए कहा। अब भाजपा के विशिष्ट संपर्क अभियान कार्यक्रम में पार्टी नेताओं ने स्थानीय गांवों और अनुसूचित जाति के लोगों की बस्तियों में खाने और सोने का कार्यक्रम शुरू कर दिया है, और सहपंक्ति में बैठ कर भोजन करना प्रारंभ किया । इससे  उन्हें उम्मीद है कि उनका वोट हासिल होगा। हमने इन कार्यक्रमों जब में केद्र सरकार की योजनाएं बताई तो बस्तियों के नौजवान और बुजुर्ग हतप्रभ से रह गए । अब तक तीन सौ गांवों में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता दौरे कर चुके हैं। उन्हें केंद्र की योजनाओं पर गांव के लोगों की प्रतिक्रिया भी मिली है। ये लोग चार साल में भाजपा राज की उपलब्धि भी बताते हैं और उसकी पुस्तिका बांटते हैं। पार्टी नेे एक सांस्कृतिक शाखा भी बनाई है। इसमें 80 टीमें हैं। इन  टीमों के अभिनय के जरिए पार्टीे के नेता मानते हैं कि अनपढ़ लोगों को पार्टी से जुडऩे में खासी मदद मिलती है। राज्य   भाजपा के नेता मानते हैं कि उज्जवला योजना जिसे 14 अप्रैल को केंद्रीय मंत्री धमेंद्र प्रधान ने संविधान निर्माता बी आर अंबेडकर के जन्म दिन पर सूर्यपेट में शुरू किया था उसका लाभ आगामी चुनावों में पार्टी को मिलेगा।

भाजपा ने पिछले चुनावों में तेलुगु देशम पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन इस बार यह अपने दम पर अकेले चुनाव लडऩा चाहती हैं। राज्य पार्टी अध्यक्ष ने पहले ही घोषणा कर दी है कि पार्टी राज्य की 119 विधानसभा सीटों और लोकसभा की सत्तरह सीटों पर चुनाव लड़ेगी। पिछले चुनाव में एक सांसद (बंढारू दत्तारेय, सिकंदराबाद जिन्हें हैदराबाद के शोध छात्र रोहित बेमुला कांड से भी जुड़ा माना जाता हैं) विजयी रहा। पार्टी को विधानसभा में मुशीराबाद, गौशमहल, उपल, खैरताबाद और अंबरपेट में सीटें मिली। ये सारी सीटें हैदराबाद के आसपास के इलाकों की हैं।

सबसे बड़ा सवाल आज यह है कि क्या पार्टी विधानसभा की सभी सीटों पर जीत हासिल कर सकेगी। क्योंकि इतिहास बताता है पहले कभी इसने चुनाव नहीं लड़ा और कई ग्रामीण इलाकों में तो पार्टी के पास अपने नेता नहीं हैं जो चुनाव लड़ सकें। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह राज्य का दो बार दौरा कर चुके हैं। पहली बार उन्होंने नालगोंडा जिले का पिछले साल दौरा किया था फिर वे जून की 22 तारीख को आए लेकिन मतदाताओं में उत्साह नहीं झलका। दूसरी और पार्टी नेतृत्व ने  काकातिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वैकुंठम कुछ गैर निवासी भारतीय और एनजीओ चलाने वालों को पार्टी में शामिल किया और पार्टी के प्रचार प्रसार को बढ़ावा दिया।

कांग्रेस ने शुरू की बस यात्रा

राज्य के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस ने चरणों में बस यात्राओं के जरिए तेलुगु भाषी लोगों के बीच जाकर उन्हें  कांग्रेस का महत्व और देश के विकास में इसके अवदान से परिचित कराया है। पार्टी ने राज्य में सत्ता चला रही टीआरएस सरकार की चार साल में खेती, किसानी में इसकी नाकामी को मुद्दा बनाया है। अब मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव अचानक  राज्य के किसानों के लिए रायतू योजना लाए हैं। जबकि उन्हीं की सरकार के राज में चार हजार किसानों ने आत्महत्या की। कांग्रेस का कहना है कि सरकार दो लाख मात्र तक का कजऱ् माफ कर देगी बशर्ते  उनकी सरकार राज्य में बन जाए। राज्य में तीन स्तरों में कांगे्रस ने 80 विधानसभा क्षेत्रों में यात्रा कर ली है। इन बस यात्राओं में तेलंगाना की जनता खासी रूचि इसलिए भी ले रही है क्योंकि वह जानती हैं कि राव किस तरह अपना पूरा परिवार राज्य सरकार पर हावी करने में जुटे है।

टीआरएस को किसानों और सिंचाई परियोजना से उम्मीद

बहुत ही कम अंतर से बहुमत पाकर तेलंगाना राष्ट्र समिति ने राज्य में सरकार बनाने का न्यौता चार साल पहले पाया था। इस दौरान मुख्यमंत्री ने पार्टी पर और शासन में अपनी गिरफ्त बनाए रखने के इरादे से बेटे और बेटी को साथ लिया। उधर पार्टी में परिवार तो हावी हुआ पर दूसरे नेता कमजोर। चार साल में मुख्यमंत्री ने तमाम तरह के कई दिन चलने वाले भव्य यज्ञ कराए और खूब पूजा-पाठ किया। बताया गया कि यह सब राज्य की खुशहाली और समृद्धि के लिए हैं। लेकिन इन सबसे राज्य के अधिकांश मतदाता खिन्न रहे। टीआरएस के कई विधायकों ने यह महसूस किया कि वे चुनाव में हार सकते हैं।

टीआरएस राज में कई विधायकों और बाहर से आकर विधायक बने नेताओं (दूसरे दलों से आए) में मतभेदों का सिलसिला सुनाई देने लगा। राज्य में मुख्यमंत्री ने कई नए जिले विकास के आधार पर तो बना दिए लेकिन उस आधार पर विधानसभा सीटें नहीं बढ़ी।

दूसरी ओर जनप्रिय योजनाएं मसलन कल्याण लक्ष्य, शादी-मुबारक, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, किसानों के लिए पांच लाख रुपए मात्र का बीमा और इन्सेंटिव सब्सीडी योजनाएं चैथे साल में शुरू की । जाहिर है ऐसी योजनाओं की होड में कुछ मझोली और बड़ी सिंचाई योजनाएं शुरू की। इनसे नेताओं में एक आत्मविश्वास ज़रूर बढ़ा । महत्वपूर्ण सिंचाई योजना कालेश्वरम को तो पार्टी आने वाले चुनावों में बतौर नारे इस्तेमाल भी करेगी।

टीडीपी क्या टीआरएस या कांग्रेस के साथ होगी

तेलुगु देशम पार्टी क्या विपक्षी दलों की एकता को और मज़बूत करेगी।  इसके सुप्रीमो और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के अनुसार इस गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि उन्होंने अपनी ओर से कोई इशारा नहीं किया कि वे खुद किसके साथ हैं और वे किसके साथ हो सकते हैं।  लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह समझौता तेलंगाना राज्य की टीआरएस सरकार या फिर कांगे्रस के साथ संभव है। तेलुगु देशम वह पार्टी है जिसने आंध्र प्रदेश के बंटवारे का विरोध किया था। दो बार लगातार सत्ता में रहने के कारण इसकी अपनी पहचान पर अब संदेह होता है। बहुत से महत्वपूर्ण नेता और विधायक कांग्रेस और  टीआरएस में चले गए। राज्य के विभाजन के पहले पिछले चुनाव के दौर से पहले इन नेताओं को विभाजन के बाद अच्छे पद और जगहें भी मिल गई।

हालांकि ‘वोटों के बदले नकदीÓ का मामला दो साल पहले उभरा और आज भी दिखता है। इससे पार्टी की ताकत पर असर पड़ा है। पार्टी के 15 विधायकों ने जो पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था। अब उनमें सिर्फ दो बचे हैं। जो पार्टी में आज भी हैं। इसी बीच 31 जि़लों के 20 जि़ला पार्टी अध्यक्ष या तो टीआरएस से जा मिले या फिर कांग्रेस से। इससे यह पता लगता है कि राज्य में आज  तेलुगु देशम पार्टी की क्या स्थिति है।

ब्रह्मपुत्र में बाढ़ के दिनों के डाटा का अध्ययन करेंगे भारत और चीन

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के किंगडाओ में चल रही शिखरवार्ता में पहुंच कर अपनी धाक और जमाई। कुछ ही दिनों पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बुहान प्रांत मेें जिन मुद्दों पर दोनों देशों के प्रमुखों मेें बातचीत हुई थी उन मुद्दों को नरेंद्र मोदी ने फिर दुहराया। भारत और चीन मे चल रहे असंतुलन को कुछ कम करने के लिए गैर बासमती चावल की दूसरी किस्मों के निर्यात पर भी समझौता हुआ साथ ही ब्रह्मपुत्र नदी के जल के बाढ़ के समय के आंकड़ों के लेन देन पर भी सहमति हुई। दोनों देशों ने मिल कर अफगानिस्तान में किसी परियोजना पर काम करने की योजना भी बनाई। भारत और चीन में इस बात पर सहमति बनी और समझौता हुआ कि ब्रह्मपुत्र नदी के जल संबंधी तमाम डाटा दोनों देशों में (मई 15 से अक्तूबर 15 तक) आदान प्रदान होगा। मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग में हुई बातचीत में इस बात पर सहमति बनी कि चीन भारत से चावल, चीनी और फार्मास्यूटिकल सामग्री खरीदेगा। चावल का निर्यात करने पर हुआ समझौता व्यापारिक संतुलन बनाने की दिशा में एक पहल है।

भारत और चीन के जल संसाधनों, नदी विकास और गंगा सफाई के मंत्रालयों में हुए समझौते के तहत चीन इस बात के लिए राजी हुआ है कि चीन बाढ़ के दिनों में भारत से डाटा लेगा और अपनी नदियों का डाटा भारत को देगा। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि बाढ़ के मौसम में नदी जल का स्तर दोनों देशों में बनी सहमति से यदि ज्य़ादा हो तो डाटा का आदान प्रदान ज़रूर है।

इसी तरह चावल के निर्यात पर यह समझौता हुआ कि भारत बासमती के अलावा चावल की दूसरी किस्मों के चावल भी अब निर्यात कर सकेगा। चावल निर्यात पर 2006 में एक सहमति दोनों देशों में बनी थी।

पिछले दिनों चीन में ही बुहान प्रांत में भारत के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई सहमति के मुद्दों पर अमल की बात की जाएगी। इस साल के आखिरी दिनों में चीन से विदेश रक्षा और सुरक्षा महकमों के अधिकारी भारत आएंगे। दोनों देशों के नेताओं के बीच बनी सहमतियों पर अमल का खाका फिर तैयार होगा।

अफगानिस्तान में दोनों देश मिल कर किसी प्रोजेक्ट पर काम करने पर भी सहमत हुए। इस मुद्दे पर पहले बुहान में बात भी हुई थी। पिछले चार साल में दोनों देशों के प्रमुखों के बीच एक दर्जन मौकों पर बातचीत हुई है। दोनों ही देश अब उस कुहासे से बाहर आकर परस्पर संबंध और विकसित करना चाहते है जो आज की ज़रूरत है।

दुनिया को बेहतर बनाने की ट्रंप और किम की ऐतिहासिक पहल

सहसा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जांग उन की सिंगापुर में मंगलवार 12 जून को हुई मुलाकात से एक इतिहास रच गया। धुर दक्षिण पूर्व एशिया में शांति के लिहाज से दो एटमी ताकतों का मिलना ज़रूरी था। इसके लिए ट्रंप ने जो पहल की उसका स्वागत होना ही चाहिए। दोनों देशों के अध्यक्षों के बीच तकरीबन पांच घंटे बातचीत हुई। यह दुनिया की बेहतरी की चिंता में हुई एक शुरूआत थी।

अपने पश्चिमी मित्र देशों को एक तरह से झिड़कते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सिंगापुर में किम से मुलाकात करके यह जता दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप राजनीति में अव्वल हैं। उत्तर कोरिया को झुकाने के बाद वे अब ईरान पर भी अमेरिकी हितों के अनुरूप और विश्व शांति पर ज़ोर देते हुए दबाव बनाए रखने में कामयाब होंगे। दोनों देशों में इस बात पर भी सहमति बनी कि एक दूसरे देश के युद्धबंदियों की जल्द रिहाई की जाए।

इस बात पर ज़रूर यह चिंता रही कि बातचीत के इस दौर में अमेरिका ने जहां उत्तर कोरिया को तवज्जुह दी वहीं दक्षिण कोरिया से संपर्क नहीं रखा। एक दिन चली बातचीत में इस बात पर सहमति बनी कि अमेरिका अब दक्षिण कोरियाई सेना के साथ अपना सैनिक अभ्यास रोक देगा। हालांकि संयुक्त युद्ध अभ्यास रोकने से दक्षिण कोरिया में खासी निराशा हुई है।

उत्तर कोरिया ने कहा कि अपने एटमी मिसाइलों के प्रक्षेपण के सारे कार्यक्रम उसने पहले ही रद्द कर दिए हंै। और तेजी से वह उन तमाम अड्डों को भी नष्ट कर देगा जहां से ये प्रक्षेपित होते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उत्तर कोरिया पर लगाई गई आर्थिक पाबंदियां जारी रहेंगी जब तक उत्तर कोरिया अपनी सारी मिसाइल नष्ट नहीं कर देता।

किम से हुई बातचीत से उत्साहित ट्रंप ने कहा कि हमें खुशी है कि उत्तर कोरिया से हमारे पूरे संबंध ही नई तरह से बन रहे हैं और पहले की तुलना में कोरिया के प्रायद्वीप में खासी अलग तस्वीर होगी।

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या वाकई किम इस बात पर राजी हुए हैं कि वे एटमी हथियारों का अपना जखीरा नष्ट कर देंगे। तो ट्रंप ने उस पर कहा कि वह सिलसिला शुरू हो रहा है। जल्दी, बहुत जल्दी।

ट्रंप और किम में बातचीत चली तो पांच घंटे लेकिन दोनों राष्ट्राध्यक्षों ने मानवाधिकारों के हनन पर ज़्यादा बातचीत नहीं की। अनुमान है कि आने वाले दिनों में अमेरिका फिर से इस संबंध में उत्तर कोरिया बातचीत करे।

दोनों देशों ने अपने संयुक्त बयान में कहा कि बातचीत का दौर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और उत्तर कोरियाई अधिकारियों के बीच चलता रहेगा। मुलाकात की अगली तारीख की घोषणा जल्दी ही होगी जिससे पूरे प्रायद्वीप में शांति का आलम रहे।

ट्रंप ने इस मुलाकात पर अपनी खुशी जताई। किम के कंधों पर उन्होंने अपना हाथ रखा और कहा, मेरे लिए यह खासी महत्वपूर्ण बातचीत है। हमारे बीच संबंध और भी प्रगाढ़ होंगे। उधर किम ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा कि बातचीत की मेज़ पर दोनों देशों का आ पाना आसान नहीं था। पुरानी सोच, पुरानी मान्यताएं और पुराने रीति-रिवाज हमारे संबंधों को उस तरह पनपने नहीं दे रहे थे जिस तरह उन्हें पनपना था। लेकिन हमने तमाम बाधाओं पर कामयाबी पा ली है।

तहलका ब्यूरो

राजीव गांधी हत्याकांड और नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश में समानता का मुद्दा

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अभी हाल दिल्ली में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के आला अधिकारियों की बैठक ली। उन्होंने यह समीक्षा बैठक राजीव गांधी सरीखी घटना न होने देने के लिहाज से की। उन्होंने यह बैठक प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की माओवादी धमकी के संदर्भ में बुलाई थी। अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई अंदेशा वाकई है जिसके चलते एक घटना के बहाने दूसरी घटना को ध्यान में रख कर सरकार विचार करे।

महाराष्ट्र पुलिस से सरकार को कुछ मुद्दे मिले। मसलन कार्यकर्ता रोनी विल्सन के दिल्ली के आवास की तलाशी के दौरान ऐसी जानकारी मिली है जिससे यह जानकारी मिली है कि राजीव  गांधी की हत्या की ही तरह क्या प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश संभव है। विल्सन को भीमा कोरेगांव हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप में दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी योजना से साफ इंकार किया है। उन्होंने अनुरोध किया है कि इसकी जांच कराई जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी पत्र के होने की संभावना नहीं है। यह सिर्फ हमदर्दी पाने के लिए ऐसी बात कही गई है। उन्होंने कहा कि भाजपा को जब यह लगा कि वे अपना लोकप्रिय समर्थन खो रहे हैं तो उन्होंने ऐसी साजिश की बात गढ़ी। उधर कांग्रेस ने मांग की है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न किया जाए।

शिवसेना ने भी ऐसे किसी कथित माओवादी पत्र के होने की संभावना से इंकार किया है कि ऐसी कोई साजिश थी जिसमें राजीव गांधी हत्याकांड की घटना का दुहराव हो यह पूरी कहानी एक आतंकवादी कहानी है जिसे सुनकर सिर्फ हंसा जा सकता है। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामनाÓ में यह लिखा गया। चुनाव के मौके पर ऐसा जिक्र अमूमन होता ही है।

राजीव के संबंध में पहली जानकारी

राजीव गांंधी के बारे में जो पहली बात पकड़ में आई उसमें लिखा है कि राजीव गांधी अवरु दे मंडलाई एडीपोडलम। डंप पन्निडुंगो। मरानाई वेचिडुंगो (राजीव गांधी का सिर, फिर उड़ा दो, उसे खत्म कर दो, उसे मार डालो)। यह बात उभरी थी तमिल ईलम, एक सरकार समर्थक अर्धसैनिक संगठन के वायरलेस संदेश से। इसका संबंध एलटीटीई से था। इसे पहली बार 1990 की अप्रैल में सुना गया था। इसकी तत्कालिक सूचना इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) को श्रीलंका में दी गई थी। उसके बाद खुफिया एजेंसी इस वायरलेस संदेश की तहकीकात में जुट गई थीं। उन्होंने चेन्नई और जाफना के उन गैर अधिकृत स्टेशनों का भी जनवरी 1991 में पता लगा लिया गया था। लेकिन इसके कोड का पता नहीं लग सका। फिर राजीव की हत्या तक कोई संदेश नहीं मिला। उनकी हत्या के बाद सीबीआई की विशेष छानबीन टीम ने महीनों की अपनी जांच पड़ताल में संदेश कोड खोलने में कामयाबी पाई और पाया कि इसमें एलटीटीई की भागीदारी है।

मोदी के खिलाफ साजिश

अब लगभग 27 साल बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद वह घटना एक पत्र में फिर याद की जाती है। जिसे पुणे पुलिस ने दिल्ली के एक कार्यकर्ता रोनी विल्सन के कंप्यूटर से हासिल किया। विल्सन और विस्थापन विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ता महेश राऊत, नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोभा सेन, नागपुर के ही एक वकील सुरेंद्र गाडलिंग और मुंबई के कार्यकर्ता सुधीर ढावले को दिल्ली, नागपुर और मुंबई से गिरफ्तार किया गया। इस पूरे मामले ने एक नया तूल तब पकड़ लिया जब मीडिया के एक वर्ग ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की संभावना की कथित साजिश का पता लगा लिया और राजीव गांधी हत्याकांड से उसकी समानता की जानकारी हासिल कर ली। फिर इस संबंध में कथित दोषियों की गिरफ्तारी हुई।

अलगाव?

राजीव गांधी की हत्या का मामला एक ऐसे संचार से जुड़ा था जो गंभीर तौर पर कोडेड था। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साजिश की जो बात है उसमें कतई कोई गोपनीयता नहीं है। विल्सन के कंप्यूटर से जो माओवादी पत्र मिलने की बात है उसमें घटना का स्पष्ट उल्लेख है और राजनीतिक नेताओं के नाम हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख है। महाराष्ट्र पुलिस के डायरेक्टर जनरल सतीश माथुर ने बताया कि पत्र विश्वसनीय है।

आंध्रप्रदेश की खुफिया विभाग के एक उच्च स्तरीय आईपीएस अधिकारी जिनकी माओवादी पर विशेषज्ञता है उन्होंने भी यह कहा कि ‘माओवादी पत्र लिखते हैं लेकिन वे इतने लंबे चौड़े पत्र नहीं लिखते। एम-4 बंदूकों और चार लाख चक्र बुलेट खरीदने का ब्यौरा और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जैसी बातें भी विश्वसनीय नहीं लगती। उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने पूरे जीवन में माओवादियों के पत्र देखे हैं लेकिन ऐसा पत्र पहली बार ही देखा।Ó  फारेंसिक महकमे के एक अधिकारी ने कहा, हमने पत्रों की कोई छानबीन नहीं की है। हमने सिर्फ हार्ड डिस्क और दूसरे डिवाइस की क्लोनिंग की है। हम यह भी नहीं जानते कि पत्र हाई डिस्क में था भी या नहीं।

सशस्त्र सीमा बल के पूर्व महानिदेशक एमवी कृष्णराव जो सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी भी रहे हैं, उनका कहना रहा कि तमाम सीपीआई (माओवादी) उन लोगोंं को नहीं बहाल करते जो सार्वजनिक तौर पर जाने जाते हैं। ये पांचों लोग और प्रकाश अंबेडकर जिनका उल्लेख इस पत्र में है वे सभी जनजीवन में जाने जाते है। माओवादी ऐसे लोगों की कभी अपने साथ नहीं जोड़ते जो कुछ मशहूर हों।

‘पार्टी या सेंट्रल कमेटी का सदस्य होने वाले के सामने यह दुविधा हमेशा रही है कि उसे कोई भी न पहचाना हो। जहां तक मेरी जानकारी है छह-सात साल से सेंट्रल कमेटी का कोई सदस्य कप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करता। यदि इस बीच उन्होंने फिर शुरू किया हो तो यह बात मेरी जानकारी में नहीं है। सेंट्रल कमेटी के सदस्य उस तरीके को भी नहीं अपनाते कि ई मेल के जरिए संदेश भेजें। वे सेंट्रल कमेटी के 2-3 विश्वसनीय लोगों के जरिए संदेश भेजते हैं। जिनका काम आम संदेश पहुंचाना होता है। ये संदेश भी एक या दो लाइन के ही होते हैं। एक साधारण आदमी तो उन्हें समझ भी नहीं सकता। क्योंकि शब्दों में ही होते हैं ‘छिपे होते है अर्थ भीÓ, राव ने बताया।

इन तमाम टिप्पणियों और अनुभवों से लगता है कि असल मामला कुछ और है जिनकी छानबीन की जानी चाहिए।

प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर उठे सवाल गृहमंत्री ने कहा पूरा है ध्यान

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा पर पूरी तौर पर ध्यान दिया जाता रहा है। वे प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर माओवादी साजिश के अंदेशे पर बोल रहे थे। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने शुक्रवार आठ जून को जानकारी दी थी कि दो दिन पहले गिरफ्तार किए गए एक व्यक्ति के पास से इस आशय का एक पत्र मिला है। कांग्रेस ने मांग की है कि साजिश के इस दावे की पूरी तौर पर जांच की जाए।

उधर महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने दावा किया है कि उन्हें एक ई मेल मिला है जिससे इस साजिश का पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजीव गांधी की हत्या की घटना की ही शैली में खत्म करने की माओवादी योजना रही है। इस दावे के कुछ ही समय के अंदर भाजपा ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह माओवादी साजिश  पर कतई गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं जो हिंसा के जरिए देश में अस्थिरता लाना चाहते हैं। उधर भाजपा के प्रमुख नेता और देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि माओवादी फिलहाल हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। जल्दी ही यह खत्म होगी।

जम्मू में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि हम अपने प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर बराबर गंभीर रहते हैं। जहां तक माओवादियों की बात है उनके बारे में कहना चाहूंगा कि इस समय वे एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे है। माओवादी हिंसा लगातार कम हुई है। इसमें 85 फीसदी कमी आई है। पहले 135 जिलों में इनका प्रभाव था। अब यह घट कर 90 जिलों में हैं। इनमें भी दस में ये ज्य़ादा सक्रिय है। इस उग्रवाद का समापन हो रहा है। जैसे उत्तर-पूर्व में इसका समापन हुआ।

गुरूवार (7 जून) को कथित माओवादी संगठनों से संपर्क रखने वाले पांच लोगों को पुणे पुलिस ने जिला अदालत में उन्हें हिरासत में रखने के लिए पेश किया गया था। जिले के सरकारी वकील उज्जवला पवार ने बिना मोदी का नाम लिए अदालत में कहा था कि इन पांच लोगांं में किसी के लैपटॉप में राजीव गांधी टाइप घटना का जि़क्र आता है। जिन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है वे हैं एल्गार परिषद के सुधीर ढावले। वे मुंबई में रिपब्लिकन पैंथर्स जाति अवताची चालवाल (आरपी), दिल्ली स्थित कमेटी फार रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिज़नर्स (सीआरपीपी) नागपुर स्थित इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स (आईएपीएल) के वकील सुरेंद्र गाडलिंग और नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोभा सेन, और प्रधानमंत्री की ग्रामीण विकास (पीएमआरडी) के फेलो रहे महेश राउत। पुलिस का आरोप है कि ये पांचों लोग 31 दिसंबर 2017 को पुणे में शनिवारबड़ा में एल्गार परिषद की ओर से हुई सभा में हुए भाषणों में भी शरीक हुए थे। इसके बाद ही पहली जनवरी को भीमा कोरेगांव के युद्ध की 200वीं बरसी में हिंसा हुई।

भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार चला रही एनडीए में सामाजिक न्याय के राज्यमंत्री रामदास अठावले ने सात जून को इन गिरफ्तारियों पर कहा था कि दलित अधिकारों की रक्षा के लिए लडऩे वाले दलित कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी अनुचित है। उन्होंने कहा कि पुलिस को भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा पर हिंदू नेता संबाजी भिडे की भूमिका की पड़ताल करनी चाहिए। पहली जनवरी को भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में पुलिस को किसी दलित को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए था। अंबेडकर के आदर्शों के लिए आंदोलन करने वाले कार्यकर्ताओं को नक्सली बता कर उन पर कानूनी कार्रवाई करना अनुचित है।

महाराष्ट्र पुलिस ने पहले ऊँ ची जाति के नेता संबाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे को पहली जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव युद्ध की 200 वीं बरसी पर हुए आयोजन में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया था। लेकिन अब जांच करने वाली एजंसियों ने जांच का रु ख अचानक बदल दिया है और शहरी माओवादी समर्थकों में पांच की गिरफ्तारी की। इसके बाद नए-नए खुलासे हो रहे हैं।

अठावले के अनुसार वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव हिंसा में क्या संबंध है जिसे पुलिस अब आपस में जोड़ रही है। मैं मानता हूं कि कानून से बड़ा कोई नहीं है। अपने एक भाषण में संबाजी भिडे ने कहा, ‘सर्वधर्म समभावÓ कुछ नहीं होता। यह बात संविधान विरोधी है। पुलिस क्यों नहीं उस पर कार्रवाई करती। समाज में विवाद पैदा करने वाले भाषण पर कार्रवाई होनी चाहिए। संबा जी भिडे पर कार्रवाई करनी चाहिए।

सरकारों को परवाह नहीं किसानों की

आज़ादी के बाद के 70 सालों में देश ने कई मोर्चों पर तरक्की की है। खासतौर पर उद्योग और सेवा क्षेत्र में भारी निवेश आया है। पर दुख की बात यह है कि इन क्षेत्रों में उठाया गया हर कदम किसानों में निराशा ही लेकर आया।

भारत एक विशाल देश है। इसमें सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक तानाबाना भी अलग तरह का है। हर क्षेत्र में अलग तरह की समस्या नजऱ आती है। अलग क्षेत्र में शहरीकरण, औद्योगीकरएा, स्वास्थ्य और शिक्षा की विभिन्न समस्याएं हैं। किसानों की आत्महत्याएं यदि तमिलनाडु में हो रही हैं तो पंजाब भी उनसे अछूता नहीं है।

यहां एक तरफ धरती के नीचे घटते जलस्तर की समस्या है तो दूसरी तरफ किसानों को मिलने वाले न्यूनतम मूल्य में सुधार न होने की। इसी कारण किसानों को शोषण से भी दो चार होना पड़ता है।

इंडियन नेशनल सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) के मुताबिक 2003 में किए अध्ययन के मुताबिक 40 फीसद किसान खेती का काम छोड़ कर कोई और धंधा करना चाहते हैं क्योंकि खेती में अब कोई लाभ का काम नहीं रह गया है।

खाद और बीजों की लगातार बढ़ रही कीमतें और फसलों की कीमतों में बढ़ोतरी न होना, बीजों का समय पर न मिलना, ये मुख्य कारण हंै कि किसान खेती से दूर होने की कोशिश कर रहा है। लेकिन समस्या यह है कि पुश्तों से खेती कर रहे किसान को और कोई काम आता भी नहीं है।

इन सब बातों से परेशान किसान ने अब आंदोलन की राह पकड़ी है। देश के हर भाग मेें आंदोलन चल रहे हैं। छह जून 2017 को मध्यप्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से छह किसान मारे गए थे। इस घटना में आठ घायल भी हुए। तमिलनाडु में जबरदस्त सूखे के हालात हैं। पिछले 140 सालों से वहां ऐसा सूखा कभी नहीं पड़ा। यहां भी किसानों का भारी आंदोलन चल रहा है ताकि उन्हें कुछ राहत दी जाए।

पिछले साल नवंबर में तेलंगाना के किसानों ने दिल्ली आकर आंदोलन किया। उनकी समस्या यह थी कि अक्तूबर के महीने में हुई गैर मौसमी बरसात से सारी फसलें बरबाद हो गई थी। सरकारी एजेंसियों ने गीला होने के कारण इसे नहीं खरीदा। दूसरी और निजी अदारे 4,320 रुपए प्रति क्विंटल के न्यूनतम मूल्य की जगह उन्हें 2800 से 3500 रुपए प्रति क्विंटल का भाव दे रहे थे।

किसान चाहे विभिन्न मंचों में लड़ रहे हो पर उन सभी की मांगें समान हंै। इस समय 26 फसलें एमएसपी के तहत आती हैं पर सरकारी खरीद केवल गेंहू और चावल की होती है।

गोदामों की कमी के कारण किसान अपना अनाज संभाल कर नहीं रख सकते। इस कारण उन्हें अपना अनाज औने-पौने भाव में बेचना पड़ता है। इस समस्या के हल के लिए गांवों में अच्छे गोदाम बनाने ज़रूरी है।

मौसम के कारण किसानों को होने वाले नुकसान को रोकना तो मुश्किल है पर बीजों, खाद और भंडारण की व्यवस्था तो किसान के लिए सरकार को करनी चाहिए। पिछले साल भारत सरकार ने सुप्रीमकोर्ट को बताया था 2013 के बाद से देश में हर साल 12,000 किसान आत्महत्या करते हैं। किसानों में आत्महत्या के आंकड़े बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। पंजाब में स्थापित तीन विश्वविद्यालयों ने किसान आत्महत्या के कारणों पर काम किया। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से 2015 तक के सालों में 16,000 किसानों ने अपनी जान ली।

राज्य सरकारें किसानों के कजऱ् माफ करने की घोषणाएं करती रहती हैं। चुनावों के दौरान उत्तरप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने किसानों के कजऱ् माफी के बड़े-बड़े वादे किए थे। यही बात कर्नाटक में भी हुई। मध्यप्रदेश में राहुल गांधी ऐसी घोषणा कर आए।

खुली बाज़ार अर्थव्यवस्था के बाद कृषि क्षेत्र में निवेश कम होता गया। निजी क्षेत्र कृषि में निवेश नहीं कर रहा। भारत की 70 फीसद आबादी गांवों में रहती है। उनकी समस्याएं अत्यंत गंभीर है। भारत में मांग और आपूर्ति में भारी अंतर है। राजनैतिक दल इसका लाभ उठाते हैं।

इस मामले में मिजोरम, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के चुनाव अति महत्वपूर्ण हैं। असल में किसानों को ऋण माफी के अलावा कुछ और भी चाहिए।

उधर दक्षिण भारत में-

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में बनी भाजपा की एनडीए सरकार के तीसरे और चौथे साल भी व्यापक तौर पर किसान आंदोलन हुए। केंद्रीय कृषि मंत्री ने तो इन आंदोलनों पर यहां तक कहा कि ‘किसान टीवी कैमरे पर प्रचार पाने के लिए सड़कों पर सब्जियां फैंक रहे हैं और दूध उड़ेल रहे हैंÓ। हो सकता है मंत्री महोदय नेता बनने के गुर बता रहे हों। लेकिन पूरे देश में किसानों ने पहली से दस जून तक कई राज्यों में आंदोलन छेड़ दिया है वह अब सड़कों पर है।

किसानों की मांग है कि उन्हें उनकी लागत का ड्योढ़ मिलना ही चाहिए। उन्हें बीज, पानी, जुताई, फसल बीमा बिक्री का बंदोबस्त और कजऱ् में माफी भी दी जानी चाहिए। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने आंदोलनकारी किसानों पर गोलियां चलाई जिसमें छह किसान मारे गए। महाराष्ट्र में नासिक से मुंबई तक दवेंद्र फडणवीस सरकार के खिलाफ किसानों ने लांग मार्च किया। कुछ मांगे मंजूर हुई। कई कालीन के भीतर दबा दी गई। पंजाब सरकार ने कजऱ् माफी पर संिमति गठित की थी जिसने अपनी रिपोर्ट भी पेश कर दी लेकिन केंद्र से मदद न मिलने के कारण वह रिपोर्ट फाइलों तक ही रह गई। उसकी तरह कर्नाटक की जद(एस) सरकार ने कजऱ् माफी घोषित की। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इन्वेस्टमेंट स्कीम के जरिए खुद ही किसानों के लिए नई योजना शुरू की है।

कर्नाटक में कुमारस्वामी ने फिर कहा है कि किसान उन्हें 15 दिन का समय दें वे किसानों के 73 हजार करोड़ के कजऱ् ज़रूर माफ करा ले जाएंगे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के किसानों की औसत आय बमुश्किल सौ रुपए रोज भी नहीं है। किसानों की उपज की आय से तीन गुना आमदनी बिचौलिए उठाते रहे है।

कर्नाटक ने 2013 से 2017 के बीच चार साल तक लगातार सूखा झेला और इन सालों में देखी 3,515 किसानों की आत्महत्याएं। किसानों की मंाग है कि उनके सारे कजऱ् माफ कर दिए जाएं क्योंकि वे पिछले चार सालों में सभी कुछ खो चुके हैं। यहां तक कि जब फसलें तबाह नहीं भी हुई थी तब कीमतों की भारी गिरावट ने उन्हें कजऱ् के जाल में उलझा दिया। राज्य में फसल का कुल कजऱ् 53,000 करोड़ है। पर यदि इसमें उनके घरेलू और पारिवारिक कजऱ् को भी जोड़ा जाए तो यह रकम इससे दुगनी भी हो सकती है।

कांग्रेस और भाजपा की तरह जनता दल (एस) ने भी चुनावों के दौरान कजऱ् माफी का वादा किया था। असल में पिछले साल तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्दारामैया ने उन किसानों में कजऱ् माफ किए थे जिन्होंने सरकार द्वारा चलाए जाने वाले सहकारी बैंकों से 50,000 रुपए तक का कजऱ् लिया था लेकिन इसमें वे किसान कवर नही हो पाए थे, जिन्होंने राष्ट्रकृत बैंकों से कजऱ् ले रखा था।

स्वभाविक तौर से अब किसान कर्नाटक सरकार से पूर्ण कजऱ् माफी की आस कर रहे हैं। इसके साथ ही वे वित्तीय संस्थाओं से भी इसी आधार पर कजऱ् माफी की मांग करते हैं। मुख्यमंत्री को अभी अपना वादा पूरा करना है। हालांकि उन्होंने कहा है कि वे अपने वादे मुताबिक कजऱ् माफ करने के इच्छुक हैं।

इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने मांग की है कि मुख्यमंत्री एक दम कजऱ् माफ करें या फिर अपने खिलाफ कार्रवाई के लिए तैयार रहें। 28 मई को भाजपा ने राज्य में बंद का आह्वान किया था पर कुछ हिस्सों को छोड़ बंद विफल ही रहा।

सवाल यह है कि क्या कुमारस्वामी कजऱ् माफ कर सकते हैं, और फिर इस बोझ को कौन ढोएगा? कांग्रेस शासित पंजाब में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी किसानों से कजऱ् माफ करने का वादा किया पर केंद्र ने हाथ पीछे खीच लिए। उधर भाजपा ने भी कजऱ् माफी की घोषणा की थी। जैसा कि उत्तरप्रदेश में। योगी आदित्यनाथ ने बहुत तामझाम के साथ किसानों के कजऱ् माफी की योजना की शुरूआत की थी, पर धरातल पर यह एक मज़ाक ही बन गया क्योंकि किसानों को चंद रुपयों के चेक ही मिले। यहां एक किसान ऐसा भी है जिसे मात्र 19 पैसे का चेक मिला। इससे योगी सरकार की कजऱ् माफी योजना की असलीयत पता चलती है।

बाकी दलों की सरकारों की भी स्थिति ऐसी ही है। हर राज्य में यह एक ही तरह से चल रहा है। असल में नौकरशाही ने इसे सिस्टम में इस तरह डाल दिया है कि राजनेताओं की घोषणाएं केवल हवा में ही लगती हैं। पर फिर भी किसानों पर राजनीति लगातार जारी है क्योंकि ये लोग एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं, और हर राजनैतिक दल इसका लाभ उठाना चाहता है।

तो यदि भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा किसानों की कजऱ् माफी की बात करते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। इसका लाभ असल में कुमारस्वामी ने उठाया और वह कांग्रेस की सहायता से मुख्यमंत्री बन गया।

ग्रामीण कर्नाटक में सूखा और किसानों की आत्महत्या मुख्य मुद्दे हैं इसी कारण कजऱ् माफी का मुद्दा चुनावों में उठा और उसके बाद भी उठ रहा है। पर किसानों के लिए कहीं राहत नहीं चाहे वह कर्नाटक हो या भाजपा शासित प्रदेश। किसानों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं और वे लोग आत्महात्यायें करते जा रहे हैं। हर राजनैतिक दल उनसे वादे करता है केवल तोडऩे के लिए।

किसान उस समय बहुत प्रसन्न हुए थे। जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने किसानों को न्यूनतम कीमत स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर देने की घोषणा की थी। पर चार साल बीत जाने के बाद आज तक नरेंद्र मोदी के वादे पूरे नहीं हुए। इक्का-दुक्का स्थानों पर इन वादों पर कुछ काम हुआ लेकिन ज़्यादातर स्थानों पर नहीं। इससे देश भर के किसानों में आक्रोश व्याप्त हो गया है।

तमिलनाडु के किसान कई महीनों तक दिल्ली में आंदोलन चलाते रहे लेकिन एक मिनट के लिए भी प्रधानमंत्री का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाए। यह राजनेताओं की गद्दी पर आसीन होने के बाद किसानों की अनदेखी की जि़ंदा मिसाल है। राहुल गांधी की तरह जब सत्ता से बाहर होते हंै तो वही भाषा बोलते है जो किसानों के हक की हो लेकिन सत्ता पर काबिज होते ही उनकी बोली बदल जाती है।

ऐसा नहीं कि अपने सलाहकारों से सलाह लेने वाले ये नेता किसानों के सवालों के जवाब नहीं दे सकते पर ये लोग किसानों की परवाह नहीं करते। उनके लिए किसानों का गुस्सा भी दूसरी समस्याओं में से एक है।

एक बात समझ में नहीं आ रही कि किसानों के लिए भली-भांति तैयार एमएस स्वामीनाथन की रिपोर्ट देश की दो प्रमुख राजनैतिक दलों के शासन काल में धूल क्यों चाटती रही है। उस पर न तो कांगे्रस सरकार ने अमल किया और न ही अब भाजपा की सरकार कर रही है। इस बीच हरित क्रांति के जन्मदाता इस रिपोर्ट के लिखने वाले स्वामीनाथन का कहना है कि विवेकपूर्ण तरीेके से किसान की उपज की कीमत तय करके ही उसकी आय को बढ़ाया जा सकता है। उन्हें अभी भी उम्मीद है कि सरकार किसानों के लिए कीमत निर्धारण की नई नीति लाएगी जिससे उनकी आय दुगनी हो जाए। स्वामीनाथन के पास 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने की खास योजना है, जिस का खुलासा वे कई बार कर चुके हैं, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हुआ है।

देश के सभी किसानों ने शायद स्वामीनाथन से न तो मुलाकात की होगी और न ही उन्हें सुना होगा लेकिन 2014 के चुनावों में भाजपा ने उनका नाम घर-घर तक पहुंचा दिया। सरकार ने स्वामीनाथन की सिफारिशों को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया। सिफारिशों में मोटे तौर पर कहा गया है कि फसल पर आई किसान की कुल लागत में 50 फीसद जोड़ कर फसल का न्यूनतम मूल्य तय किया जाए। सबसे पहले 2007 में ‘नेशनल कमीशन फॉर फारमर्सÓ के तहत बने ‘पैनलÓ के प्रमुख स्वामीनाथन ही थे। उन्होंने उस समय इस तरह फसल की कीमत तय करने की सिफारिश की थी।

सत्ताधारी भाजपा ने 2014 के चुनावों में अपने घोषणापत्र में स्वामीनाथन फार्मूले को लागू करने की बात कही थी, पर आज तक इस पर कोई काम नहीं हुआ। 2017-19 की रबी की फसल के लिए जो न्यूनतम मूल्य तय किया गया है वह किसान के औसत खर्च के 40 फीसद से भी कम है। इसके अलावा स्वामीनाथन की और भीे कई सिफारिशे नहीं मानी गई हैं। स्वामीनाथन ने कृषि भूमि को उद्योपतियों के हाथ में जाने से रोकने के लिए विशेष कृषि ज़ोन की सिफारिश की थी, जो आज ठंडे बस्ते में पड़ी है। उद्योगपतियों को इस बारे में कोई पूछता नहीं क्योंकि वे एक संगठित क्षेत्र के लोग हैं, जबकि किसान एक संगठन में नहीं हैं। यही कारण है कि बैंक के अधिकारी जो कजऱ् वसूली के लिए उद्योगपतियों से बात तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वे कजऱ् की एक किश्त टूटने पर ही किसाल का ट्रेक्टर अपने कब्जे में ले लेते हैं। यह सही है कि कई किसानों की तरफ कजऱ् की राशि बकाया है। पर प्रश्न यह है कि उद्योग और कृषि को लेकर बैंकों की दोहरी नीति क्यों है?

इस कारण किसान गैर औपचारिक बैंकिंग चैनलों से कजऱ् लेने को मज़बूर हो जाता है। खासतौर पर वह साहूकारों से कजऱ् उठाता है। वहां प्रक्रिया आसान है पर ब्याज बहुत ज़्यादा। इस तरह से किसान कजऱ् के मकड़ जाल में फंसता जाता है और उससे बाहर न निकल पाने की स्थिति में अपनी जान दे देता है।

हमें यह मानना होगा कि सरकारों ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को उसकी भावना के अनुरूप लागू नहीं किया है। यदि ऐसा हो जाए तो किसान का जीवन सुखद हो जाएगा।

 

कश्मीर में लग सकता है राज्यपाल शासन

बीजेपी-पीडीपी गठबंधन टूटने और महबूबा मुफ्ती सरकार के गिरने के बाद जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगना लगभग तय हो गया है।

राज्य के प्रमुख विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी सरकार बनाने से इनकार कर दिया है।

इस पर राज्यपाल एनएन वोहरा ने जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन की सिफारिश वाली रिपोर्ट राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेज दी।

राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजने से पहले वोहरा ने महबूबा, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना, नेशनल कांफ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीए मीर के साथ विचार विमर्श किया।

राजभवन के एक प्रवक्ता के मुताबिक़, ‘‘राज्यपाल को गठबंधन सरकार से भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बारे में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और भाजपा विधायक दल के नेता क्रमश: रवींद्र रैना और कवींद्र गुप्ता द्वारा संयुक्त रूप से हस्ताक्षर वाला एक पत्र फैक्स के जरिए प्राप्त हुआ.’’

प्रवक्ता ने कहा कि महबूबा ने इसके बाद इस्तीफा दे दिया लेकिन राज्यपाल ने उनसे वैकल्पिक व्यवस्था होने तक पद पर बने रहने को कहा।

उन्होंने कहा, ‘‘राज्यपाल ने कवींद्र गुप्ता और महबूबा मुफ्ती से बात करके जानना चाहा कि क्या उनकी पार्टियां राज्य में सरकार बनाने के लिए वैकल्पिक गठबंधनों की संभावना तलाशने की इच्छुक हैं, दोनों नेताओं ने इस पर ‘न’ में जवाब दिया। ”

ख़बरों के अनुसार वोहरा ने मीर से भी बात की जिन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के पास खुद या गठबंधन में सरकार बनाने के लिए संख्याबल नहीं है. इसके बाद राज्यपाल ने उमर से मुलाकात की जिन्होंने कहा कि राज्यपाल शासन और चुनावों के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

विपक्ष की एकजुटता की कोशिशें २०१९ में मोदी को उखाड़ फेंकेंगीं: अग्निहोत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक मुखौटा पहने हैं और वे खुद को जो जनता के सामने अपने शब्दजाल से पेश करते हैं, हकीकत में उनकी नीतियां और काम उसके बिलकुल उलट हैं। हिमाचल विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मुकेश अग्निहोत्री ने ”तहलका ऑनलाइन” से इंटरव्यू में यह बात कही। उन्होंने कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की विपक्ष के बड़े नेताओं को इकठा करने की कोशिशों को विपक्ष की एकता की तरफ बड़ा कदम बताया और कहा कि आने वाले विधानसभाओं के कुछ चुनावों और २०१९ के लोक सभा के चुनाव में जनता मोदी के चेहरे पर रखा मुखौटा उतार फेंकेगी।

अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि मोदी खुद तो देश की जनता का सच्चा सिपाही बताकर और चौकीदार बताकर वास्तव में इस जनता से न केवल धोखा कर रहे हैं बल्कि अपनी गलत नीतियों से उसकी कमर तोड़ कर रख दी है। कहा कि जनता को खून के आंसू रुलाना और देशवासियों से घोखा करना ही मोदी सरकार की चार साल की उपलब्धियां हैं।
यह पूछने पर कि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों के बावजूद चुनाव जीते हैं, मुकेश ने कहा कि ज्यादातर चुनाव भाजपा ने अपने बूते नहीं जीते और जो जीते वहां उन्हें पिछले चुनाव के मुकाबले काम समर्थन जनता से मिला। ” आध दर्जन से ज्यादा राज्यों में भाजपा ने दूसरे दलों की मदद से सर्कार बानी है और उसका प्रचार तंत्र इसे अपनी सरकार बताता है। भाजपा के चुनाव जीतने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे मोदी भाषणों के जिस निम्न स्तर पर जा रहे हैं उससे उनके अपने भरोसे के टूटने का संकेत मिलता है। ”
कांग्रेस नेता ने कहा कि देश में आज भय, हिंसा और अविश्वास का माहौल है। समाज का हर तबका  परेशान है और आम आदमी खुद को ठगा महसूस कर रहा है। ”क्या किसान, क्या युवा, क्या व्यापारी वर्ग सब कह रहे हैं कि उनके साथ घोखा हुआ है। देश में दलितों पर अत्याचार बढ़े हैं। देश में महिलाएं और बच्चियां खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। उनके खिलाफ यौन हिंसा के मामले बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। अपराधी बेखौफ घूमकर कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रहे हैं। मोदी सरकार के चार साल में आम आदमी से जमकर खिलवाड़ हुआ।”
अग्निहोत्री ने कहा कि ‘अच्छे दिन’लाने का वादा करके चार साल पहले सत्ता में आई मोदी सरकार के राज में देश की अर्थव्यवस्था चौपट होकर रह गई है।  ”मोदी सरकार की चार साल की उपलब्धियां हैं जनता को खून के आंसू रुलाना और देशवासियों से धोखा करना।” कहा कि मोदी सरकार 2014 में कांग्रेस की तथाकथित नाकामियां गिनाकर और ढेर सारे झूठे वादे और जुमले बोलकर सत्ता में आई थी। लेकिन उन वादों का क्या हुआ यह मोदी सरकार और भाजपा नेता नहीं बता पा रहे हैं। भाजपा के नेता विपक्ष में रहते हुए महंगाई को लेकर रोज-रोज नौटंकी और तमाशा करते थे, लेकिन आज देश में आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, लचर अर्थव्यवस्था, भय, हिंसा समेत तमाम मसलों को लेकर देश में हाहाकार मचा है और प्रधानमंत्री विदेशों में घूमने और मन की झूठी बातें करने में व्यस्त हैं।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि काले धन के मामले में मोदी सरकार चारों खाने चित हुई है। ”2014 के लोकसभा चुनाव की रैलियों में नरेंद्र मोदी का कोई भाषण कालेधन के जिक्रके बिना पूरा नहीं होता था। मोदी बार-बार कहते थे कि जब उनकी सरकार बनेगी तो विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन लाएगी और प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये डालेगी। सरकार ने चार साल पूरे कर लिए मगर लोगों को आज भी इंतजार है कि विदेशों से कालाधन कब आएगा।” कहा कि हैरानी की बात है कि सरकार बन जाने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया कि यह बात तो चुनावी जुमला थी। कालेधन के मामले में सरकार लोगों को बरगला रही है। ”उसे पता ही नहीं है कि विदेशों में कितना कालाधन जमा है और वह कब देश में आएगा”।
अग्निहोत्री ने एक सवाल पर कहा कि बेरोजगारी के मोर्चे पर मोदी सरकार बुरी तरह फेल हुई है। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया था, मगर रोजगार पैदा करने के मामले में मोदी सरकार चारों खाने चित हुई है। जब मोदी सरकार बेरोजगारी के मुद्दे पर घिरी तो प्रधानमंत्री ने फरमाया कि पकौड़े बेचना भी तो रोजगार है। ”सच तो यह है कि बेरोजगारी में मसले पर मोदी सरकार और भाजपा बैकफुट पर है”।
प्रधानमंत्री ने कालेधन और भ्रष्टाचार पर प्रहार करने की आड़ में नोटबंदी जैसा तानाशाही भरा फैसला किया था। आज तक इस फैसले के नतीजे शून्य हैं। इस तुगलकी फरमान से जहां आम लोगों को बहुत परेशानी हुई, वहीं कई लोगों को जान से हाथ धोने पड़े। नोटबंदी से उलटे अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। मोदी सरकार ने कालेधन और भ्रष्टाचार मिटाने के नामपर नोटबंदी जैसा काला फैसला किया था, लेकिन न तो कालाधन खत्म हुआ और न ही भ्रष्टाचार कम हुआ। भाजपा आज देश की सबसे अमीर पार्टी है, उसके नेता जरा बताएं कि पार्टी के पास इतना पैसा कहां से आया।लेकिन मोदी के राज में लोग भ्रष्टाचार करके देश से विदेश भाग जाते हैं। चाहे ललित मोदी हो, विजय माल्या हो, मेहुल चौकसी हो या फिर नीरव मोदी, सभी हजारों करोड़ रुपये लूट कर विदेश में जा बैठे हैं और मोदी सरकार जानबूझकर कुछ नहीं कर रही।  देश में  किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, लेकिन किसानों की हितैषी होने के दमगजे मारने वाली मोदी सरकार आंखें मूंदे बैठी है। सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं कर रही है। स्मार्ट सिटी, गंगा सफाई, स्वच्छ भारत, बुलेट ट्रेन चलाने, मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं औंधे मुंह गिरी हैं, लेकिन इनकी सफलता को लेकर भाजपाई  मोदी के गुणगान में लगे हुए हैं।
अग्निहोत्री ने दावा किया कि २०१९ के चुनाव में भाजपा को पता चल जाएगा कि बहुमत पाकर भी जनता से देखा करने का क्या नुक्सान है। ”जनता भाजपा को उसकी जगह बता देगी और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार को सत्ता सौंपेगी।”

फ्लोर टेस्ट से पहले ही येदियुरप्पा ने दिया इस्तीफा

कर्नाटक के इस चुनाव ने देश में लोकतंत्र की नई परिभाषा लिख दी। भाजपा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर जिस स्थान पर पहुँची थी वो उसने नतीजे के बाद की घटनाओं से खो दिया। येद्दियुरप्पा के इस्तीफे ने सिर्फ उनके ही कद्द को चोट नहीं पहुंचाई है, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह शामिल हैं, की छवि को भी बड़ा धक्का लगाया है। लोगों में यही सन्देश गया है कि भाजपा सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। तय मानिये कर्नाटक के इस चुनाव ने देश में २०१९ के लोकसभा चुनाव के लिए एकजुट विपक्ष की सम्भावना के द्वार खोल दिए हैं।

इस चुनाव के नतीजों के बाद की स्थिति ने देश में राज्यपालों की भूमिका पर भी बड़ा सवाल लगा दिया है। राजनीतिक रूप से यह उन अमित शाह की क्षमता को भी बड़ा धक्का है जिनके बारे में भाजपा के आम कार्यकर्ताओं को भरोसा था कि वे ”कुछ भी” कर सकने की कूबत वाले नेता हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में शाह के अध्यक्ष पद को पार्टी के बीच से अब चुनौती मिले। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को कर्नाटक में बड़ा जख्म मिला है।
कांग्रेस भले कर्नाटक में अपनी सरकार नहीं बना पाई, उसने भाजपा की भी सरकार नहीं बनने दी जबकि वह १०४ सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। निश्चित ही यह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी रणनीतिक हार है। सरकार बनने की इस विफलता ने येद्दियुरप्पा के राजनीतिक करियर पर ग्रहण लगा दिया है, जो पहले ही ७५ साल के हो चुके हैं। पिछले चार साल में कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में पहली बार रणनीतिक मोर्चे पर बड़ी जीत हासिल की है और इसमें सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी  वाड्रा ने भी परदे के पीछे से  बड़ी भूमिका अदा की।
कर्नाटक के नतीजे से पहले ही राहुल गांधी ने वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद को बेंगलुरु भेज दिया था और ”तहलका” की जानकारी के मुतबिक उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा से बात शुरू कर दी थी। जब राज्यपाल ने भाजपा को कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की ११८ सीटों के बावजूद सरकार बनाने के लिए बुला लिया तो कांग्रेस ने उसी सुप्रीम कोर्ट का सहारा भाजपा पर मनोविज्ञानिक दवाब के लिए, जिसके प्रमुख (मुख्या न्यायाधीश ) के खिलाफ प्रस्ताव लाया था, लिया। कांग्रेस रणनीति का उसे (कांग्रेस-जेडीएस) को फायदा मिला।
भले कर्नाटक में जेडीएस के नेतृत्व की सरकार बनी है, राष्ट्रीय स्तर पर इसका राजनीतिक मनोविज्ञानिक लाभ कांग्रेस को मिला है। पिछले चार साल में भाजपा के प्रचार तंत्र ने देश में माहौल ही ऐसा बना दिया है कि भाजपा की हर जीत कांग्रेस की हार है। ऐसे में कर्नाटक में भाजपा की सरकार न बना पाने की हार कांग्रेस की जीत के रूप में ही देखी जाएगी।
येदयुरप्पा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रेस कान्फेरेन्स में कहा कि कर्नाटक में अपनी हार मानने के तुरंत बाद विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के सदस्य बिना राष्ट्रीय गान के बिना ही सदन से उठकर चल दिए। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में पिछले चार दिन की घटनाओं ने जाहिर कर दिया कि भाजपा ने दिल्ली के अपने नेतृत्व के इशारे पर विधायकों को खरीदने की कोशिश की। ”देश और कर्नाटक की जनता ने बता दिया कि उनकी ताकत भाजपा के पैसे से बड़ी है।” राहुल ने कहा भाजपा को रोकने के लिए सब (विपक्ष) मिलकर काम करेगा।
कर्नाटक के नतीजे आने के बाद जो घटनाक्रम हुआ उससे यदि राजनीतिक रूप से किसी पार्टी की फजीहत हुई तो वह भाजपा है। उसने राज्यपाल की मार्फ़त सरकार में आकर पैसे और ताकत के बूते जो करने की कोशिश की उससे लोगों में भाजपा और मोदी की छवि को बहुत धक्का लगा है। इससे विपक्ष को एकजुट होने का अवसर मिला है। कर्नाटक के नाटक में जिस तरह ममता बनर्जी, मायावती, बिहार में लालू के बेटे तेजस्वी यादव और हैदराबाद में चंद्र बाबू नायुडु ने कांग्रेस – जेडीएस का साथ दिया निश्चित ही भाजपा की चिंता बढ़ेगी। माकपा भी कांग्रेस के साथ दिखी।
इस सारे घटनाक्रम से एक और सन्देश मिला कि कांग्रेस यदि ठान ले तो भाजपा को झटका दे सकती है। गुजरात के राज्य सभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ ऐसी ही रणनीति बनाकर भाजपा को झटका दिया था।
इस सारे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य इस सारे घटनाक्रम के दौरान सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा की गहरी सक्रियता रही। दिल्ली में कांग्रेस के १० जनपथ के नजदीक सूत्रों ने ”तहलका” को बताया कि  राहुल गांधी ने ”आपरेशन कर्नाटक” की रणनीति का नेतृत्व किया और सोनिया और प्रियंका वाड्रा ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। गुलाम नबी आज़ाद, अशोक गहलोत आदि को साफ़ सन्देश दिया गया था की भाजपा की सरकार किसी सूरत में नहीं बननी चाहिए क्योंकि कांग्रेस जेडीएस के पास पर्याप्त नंबर है।