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मध्यप्रदेश आरक्षण विरोध मामा जी की चिकनी चुपडी बातों का भी असर नहीं

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी सार्वजनिक सभाओं में बड़े ही अंदाज से भाषा का रंग दिखाते हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 2016 में शिडयूल कास्ट और शिडयूल ट्राइब के सरकारी कर्मचारियों को आरक्षण के आधार पर तरक्की देने में रोक लगाई थी।

इसके बाद इस समुदाय के सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की एक बैठक में बोलते हुए उन्होंने उन्हें भरोसा दिया कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद आरक्षण जारी रहेगा। चौहान ने खुली चुनौती दी ‘कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता’।

इस सप्ताह मध्यप्रदेश के ज़्यादातर हिस्सों में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति कानून में संशोधन पर बंद रहा। चौहान के पुराने निर्वाचन क्षेत्र विदिशा में आंदोलनकारियों ने टी-शर्ट पहन रखी थी जिस पर लिखा था ‘हम है माई का लाल’। काले रंग की टीशर्ट पर लिखी यह इबादत हर तरह मुख्यमंत्री के ही खिलाफ जाती थी। यह टीशर्ट राज्य के कई हिस्सों में पहने हुए आंदोलनकारी देखे गए। उधर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कानून पर आंदोलन तेज होता गया।

भाजपा-कांग्रेस दोनों ही चिंता में

लेकिन इससे सिर्फ चौहान ही नहीं चिंतित हुए बल्कि पूरे राज्य में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कानून पर चले ‘बंद’ आंदोलन की कामयाबी से सत्ता पार्टी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस को सांप सूघ गया है। इन दोनों पार्टियों ने संशोधन को समर्थन दिया था। राज्य विधानसभा चुनाव दो महीने बाद ही होने हैं। राजनीतिक पार्टियां अब इस गुणा-भाग में पड़ गई हैं कि कैसे इस नई हालत से निपटा जाए। क्योंकि यह तो जंगल में आग की तरह फैल रही है और यह उनके वोटों पर भी असर डालेगी।

यह बंद भाजपा और कांगे्रस के नेताओं के खिलाफ लगभग एक पखवाड़े तक चले राज्य की सड़कों- गली स्तर के आंदोलन के समापन पर आयोजित था। रतलाम, मंदसौर, नीमच, खरगेस और ग्वालियर में घरों पर पोस्टर लगे थे जिन पर लिखा था कि घरों के मालिक ऊँची जातियों के हैं, इसलिए किसी भी नेता को जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून का समर्थक है उसे उनसे वोट नहीं मांगने चाहिए।

गलियों में विरोध

आंदोलनकारियों ने भाजपा के सांसद प्रभात झा और रूस्तम सिंह का मुरैना में काले झंडे दिखा कर स्वागत किया। कांगे्रस नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को भी राज्य के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन झेलना पड़ा। नौकरशाह से सांसद बने भागीरथ प्रसाद को भी भिंड में ऐसे ही प्रदर्शन से निपटना पड़ा। आंदोलनकारी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के घर में घुस गए उन्हें उन्होंने चूडिय़ां भेंट की। आक्रामक भीड़ को भांपते हुए अशोक नगर के अनुसूचित जाति के विधायक गोपीलाल जाटव को एक बयान जारी करना पड़ा कि वे आंदोलनकारियों की मांग के पक्ष मे हैं।

मंदसौर से सांसद सुधीर गुप्त अपने इलाके में खासा विरोध झेल रहे हैं। भाजपा सांसद प्रहलाद पटेल और रिति पाठक को भी काले झंडों और नारों का सामना करना पड़ा। आंदोलनकारी खास तौर पर राजनीतिक बैठकों को निशाना बना रहे हैं। ग्वालियर में उन्होंने उस सभा को तितर-बितर करने की कोशिश की जिसमें भाजपा के महासचिव विनय सहस्त्रबुद्धे थे। प्रदर्शनकारियों ने एमजे अकबर और थावर चंद गहलोत का भी घेराव किया। यह पूरी स्थिति इतनी विस्फोटक थी कि कई राजनीतिज्ञ तो अपने इलाकों में जाने से ही घबड़ा रहे हैं।

चेहरा विहीन नेतृत्व

प्रशासन अलग चिंता में है। आरक्षण विरोधी आंदोलन में कहीं कोई चेहरे नहीं नजऱ आते। यह नेता विहीन आंदोलन है जिसे ऐसे संगठन चला रहे हैं जो राजनीतिक प्रणाली से अलग- थलग हैं। एक भीड़ जिसमें दो दर्जन लोग दिखते हैं और लगता है कि वे अराजक प्रवृति के लोग हैं। उन्होंने छह सितंबर को बंद का आहवान किया। ये लोग बहुत खिसियाए और डरे हुए थे कि बंद कामयाब होगा या नहीं। कारण बगैर नेतृत्व वाली भीड़ को नियंत्रण कर पाना आसान नहीं होता।

मध्यप्रदेश में आरक्षण विरोधी आंदोलन की कामयाबी की सबसे बड़ी वजह यह है कि इसके पीछे सक्रिय भूमिका रही है सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के संगठन की जिसमें जनरल, ओबीसी और अल्पसंख्यक श्रेणी के लोग भी हैं। इसे एसएपीएके नाम से जाना जाता है।

यह संगठन तब बना था जब सरकार ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को मानने से इंकार कर दिया था जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि तरक्कियों में आरक्षण आधार नहीं होगा। यह एक प्रतिक्रिया थी उन सरकारी संगठनों की जो जाति के आधार पर बने थे। मसलन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का संगठन एजीएकेएस और एपीएकेएस जो ओबीसी जातियों का था।

बीएसपीके पूर्ववर्ती संगठन डीएस 4 ने भी अपनी शुरूआत सरकारी कर्मचारियों के संगठन बतौर की थी। एसएपीएकेएस ने अब अपनी राजनीतिक शाखा बना ली है और चुनाव आयोग के पास आवेदन कर दिया है। यह मध्यप्रदेश मेें 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा। यदि यह न भी जीते तो भी यह उन क्षेत्रों में परेशानी खड़ी कर देगा जहां प्रत्याशी पांच हजार से कम वोट से जीतेंगे।

ऊँची जाति की डेमोग्राफी

ऊँची जातियों का राज्य में अलग-अलग जगह प्रभुत्व है। मसलन बहुत कम लोग ही यह जानते होंगे कि विंध्य प्रदेश में भारत के सबसे ज़्यादा ब्राहमण यानी चौदह फीसद हैं। यह जाति आधारित जनगणना हैं जो 1931 में कराई गई थी। इसके अनुसार- मध्य भारत में राजपूत सिर्फ नौ फीसद हैं- राजस्थान से भी ज़्यादा । सागर में कोई नहीं जीत सकता यदि जैनियों का समर्थन न हो।

ऊँची जातियों के मत में विभाजन का सबसे ज़्यादा असर भाजपा पर पड़ेगा बनिस्बत कांग्रेस के, क्योंकि यह पार्टी भोपाल में भी है और नई दिल्ली में भी। भाजपा को यह बर्दाशत करना होगा। इसे अलग अलग महसूस करना होगा, क्योंकि यह ऊँची जातियों के मतों पर इसकी पकड़ ढीली हो जाएगी।

कांगे्रस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘यह विकास जो दिख रहा है उसका नुकसान भाजपा और कांग्रेस दोनों को होगा। नुकसान की यह दर अस्सी फीसद भी हो सकती है। इस अंदेशे से कांग्रेस में कुछ राहत सी है।’

‘गौरव’ की ‘पाखंड यात्रा’

राजनीतिक यात्रा की मुहर लगाते हुए अब जबकि हाईकोर्ट ने भी ‘गौरव यात्रा’ को सवालों से मुक्त कर दिया है लेकिन ये सवाल तो सार्वजनिक निर्माण विभाग के अफसरों के चेहरों की रंगत उड़ा रहे हैं जो ‘यात्रा’ पर खर्च की गई रकम का हिसाब देने के लिए गलियां तलाश कर रहे हैं कि नई सरकार को क्या कह कर बचेंगे? फिलहाल यह भी कहना सच है कि कमोबेश रूप से ‘गौरव यात्रा’ तकरीबन हर मुकाम पर पथराव और विरोध का शिकार हो रही है। इसकी बड़ी वजह है, ‘वसुंधरा राजे के शक्कर में लिपटे झूठ और उन्हें खरोचते हुए तर्क? वसुंधरा सरकार ने मनरेगा के तहत लाखों को रोजगार देने की बात हर कदम पर दोहराई, लेकिन कैग की रिपोर्ट इन दावों की बखिया उधेड़ते नजर आती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, ‘पांच साल में मनरेगा के तहत सिर्फ एक व्यक्ति को बेरोज़गारी भत्ता दिया गया है। नियम-कायदों की बात करें तो प्रत्येक परिवार को एक वर्ष में न्यूनतम सौ दिवस का रोज़गार उपलब्ध कराना चाहिए किन्तु वर्ष 2013 से 2017 तक सौ दिन रोज़गार उपलब्ध कराने का प्रतिशत मात्र 9.91 ही रहा। वहीं आंकड़ों की मानें तो पांच साल में प्रदेश में मात्र एक व्यक्ति को बेरोजगार माना गया है जबकि मनरेगा में प्रावधान है कि रोजगार चाहने वालों की पहचान के लिए डोर-टू-डोर सर्वे होना चाहिए और रोजगार के लिए जारी जॉब कार्ड का नवीनीकरण होना चाहिए लेकिन कैग रिपोर्ट कहती है कि, ‘मनरेगा के तहत दोनों ही नियमों की पालना की कोशिश ही नहीं हुई? रिपोर्ट में तो यहां तक खुलासा हुआ है कि, ‘रोजगार मांगने पर रोजगार देने की कोई व्यवस्था ही नहीं है…।’ ऐसे में मुख्यमंत्री के दावों का क्या कहें जो पांच साल में 15 लाख को रोजगार देने की मुनादी करती फिर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, ‘गौरव यात्रा’ के मायने हैं, सरकार के ऐसे कार्यों का प्रचार-प्रसार जिन पर गौरव किया जा सके। क्या शहरों की स्वच्छता पर गौरव किया जा सकता है? पिछले दिनों मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को ‘गौरव यात्रा’ में अपनी पूरी ताकत को बुलावा देते, वक्त और उर्जा झोंकते हुए देखते हैं तो लाजमी तौर पर यह सवाल उठता है कि, ‘अपने कार्यकाल के साढ़े चाल साल बीत जाने के बाद ही उन्हें जनता की सुध क्यों आई?’ दरअसल वसुंधरा की यह बेताबी बगदाद के सुल्तान हारून अलरशीद की तरह नहीं है बल्कि बेजान हाथों से फिसलती सत्ता को थामने की नाकाम कोशिश है। 40 दिन की गौरव यात्रा एक झूठ को सच में तब्दील करने के लिए हर पड़ाव पर इस बात को दोहराती है कि, ‘हमने 16 लाख युवाओं को रोजगार दिया है, लिहाजा हमारी वापसी तय है।’ लेकिन जब भी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने रोजगार दिए जाने वाले लोगों के नाम बताने को कहा, उन्होंने इस सवाल से ही मुंह चुरा लिया। पायलट के सवालों का तकाजा तेज हुआ तो राजे जुदा जवाब देते हुए ‘गौरव यात्रा’ का मकसद बताने लगी कि, ‘जनता को पांच साल के काम-काज का हिसाब देने की खातिर ‘गौरव यात्रा’ निकाली जा रही है। फिलहाल वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री की हैसियत में पूरे लवाजमें और लाव लश्कर के साथ अपनी यात्रा निकाल रही है, लिहाजा लोग कितने उनके साथ है, कारिन्दों और अफसरों की भीड़ में यह सवाल ही गुम हो जाता है। कांग्रेस के नेता सचिन पायलट इस झूठ को यह कहते हुए बेनकाब करते हैं कि मुख्यमंत्री और भाजपा आचार संहिता लगने के बाद यात्रा या सभा निकाल कर दिखाएं? पता चल जाएगा जनता किसके साथ है? ‘गौरव यात्रा पर स्वच्छ भारत मिशन के ब्रांड एम्बेसेडर डी.पी. शर्मा ने यह कहते हुए सरकार के दावों के धुर्रे उड़ा दिए कि, ‘शहर की सड़कों की हालत देखकर लगा जैसे मैं किसी गोशाला में आ गया? दिलचस्प बात है कि कोटा नगर निगम शहर की सफाई पर 50 से 60 करोड रुपए खर्च कर रहा है, बावजूद इसके सफाई सर्वे में पिछले साल 341वीं पायदान पर रहा और इस बार 101वीं पायदान पर है। डा. शर्मा का कथन गौरव यात्रा को बुरी तरह लज्जित करता है कि, ‘कोटा में एक तरफ सड़कें खंदके बनी हुई है, कीचड़ गोबर और गड्ढे हैं तो दूसरी तरफ गायें अैर सांड बेखौफ बैठे हुए हैं।

‘गौरव यात्रा’ में विकास की दुहाई देने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सत्ता मे वापसी के दावों की तो इंडिया टुडे टीवी और एक्सिस द्वारा किए गए चुनावी सर्वेक्षण के आंकड़े ही धुर्रे उड़ा देते हैं कि, ‘राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में स्थिति बेहद खराब है। राजस्थान जिन प्रमुख समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें जल विकास

व्यवस्था, स्वच्छता और कृषि समस्याओं के अलावा बेरोजगारी, महंगाई और पेयजल बंदोबस्त मुख्य है। विश्लेषक कहते हैं कि, ‘क्या ऐसे हालात पर ‘गौरव’ किया जाना चाहिए? पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत कहते हैं कि, ‘वसुंधरा राजे को गौरव यात्रा निकालने की बजाय क्षमा यात्रा निकालकर जनता से माफी मांगनी चाहिए। बावजूद इसके वसुंधरा राजे का यह कथन चौंकाता है कि, ‘सभी मिलकर साथ देंगे तो आने वाले पांच सालों में ऐसा राजस्थान बनाएंगे जिस पर सभी को गर्व होगा। लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि, ‘….तो पिछले पांच साल में उन्हें ऐसा राजस्थान बनाने से किसने रोका था?’

चुनावी बेला में आत्मनिरीक्षण के लिए वसुंधरा सरकार ने भी एक खुफिया एजेंसी से सर्वेक्षण करवाया है। इस सर्वेक्षण में वसुंधरा राजे को आईना तो दिखाया, लेकिन आधा अधूरा! दरअसल यह आईना ज़्यादातर विधानसभा क्षेत्रों पर ही केन्द्रित रहा। एजेंसी के सूत्र सिर्फ इतना ही बता पाए है कि, ‘सर्वेक्षण में अधिकांश क्षेत्रों में जन प्रतिनिधियों का निगेटिव फीडबैक सामने आया है कुछ विधायकों से तो क्षेत्र की जनता ही बुरी तरह खफा है। ऐसे में कितने सिटिंग विधायकों और मंत्रियों के टिकट कटेंगे? फिलहाल कहना इसलिए मुहाल है कि, ‘अगर जातिगत समीकरण हावी होते है तो फिर सर्वेक्षण ढाक के तीन पात ही रह जाएगा। अलबत्ता चौंकाने वाली बात है कि वसुंधरा सरकार के आठ मंत्री पूरी शिद्दत के साथ इस बार सीट बदलने की तैयारी में हैं। इनमें बीकानेर,जयपुर, जोधपुर और कोटा के मंत्री प्रमुख है। सवाल फिर अपनी जगह कायम है कि, ‘सरकार ने अगर गौरव का कोई काम किया होता तो सीट बदलने की नौबत क्यों आती? बहरहाल विश्लेषकों का साफ कहना है कि, ‘वसुंधरा राजे का राजनीतिक भविष्य पूरी तरह खतरे में है।

चालीस दिन की ‘गौरव यात्रा’ पर सचिन पायलट के चालीस सवाल भी वसुंधरा चालीसा की तरह पढ़े जा रहे हैं। मसलन पायलट का यह सवाल है, ‘क्या चिकित्सा और शिक्षा का व्यावसायीकरण गौरव की बात है? पायलट पूछते हैं, ‘जनता के धन से बनाए गए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की आधी सीटों पर 35 लाख रुपए फीस तय कर प्रतिभाशाली छात्रों को चिकित्सक बनने से वंचित करना कौन से गौरव का काम है?

गढ़वाल छात्रसंघ में उपाध्यक्ष पद पर आइसा

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर, उत्तराखंड में छात्रसंघ में उपाध्यक्ष पद पर आइसा के अंकित उछोली को जीत मिली। वामपंथी रूझान को अंकित ने अपने छात्रोपयोगी आंदोलनों से छात्रों के मन में अंकित करके बनाया। उन्होंने पिछले साल पुस्तकालय का समय पांच बजे शाम की बजाए रात में आठ बजे तक कराया छात्राओं के छात्रावास के बंद होने का समय रात आठ तक कराया।

आइसा ने श्रीनगर में शराब विरोधी आंदोलन चलाया। नगर में पेयजल शुद्ध करके सप्लाई करने और चिकित्सा सेवाओं में सुधार के भी आंदोलन चलाए। शराब विरोधी आंदोलन के दौरान तो आंदोलन कर रहे छात्रों पर मुकदमे भी राज्य सरकार ने दर्ज किए।

छात्रसंघ चुनावों में भी लिंगदोह समिति की सिफारिशों के लागू होने के बाद भी धन बल का भोंडा प्रदर्शन हुआ। लेकिन आइसा ने बेहद सादगी से छात्रसंघ चुनाव को भी कलात्मक प्रचार सामग्री से सजा दिया। चुनावी खर्च के लिए गढ़वाल में श्रीनगर के आम नागरिकों ने भरपूर सहयोग दिया। आईसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे इंदे्रेश मैखुरी खुद हेमवती नंदन बहुगुणा (गढ़वाल) विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने इस जीत पर खुशी जाहिर करते हुए बताया कि इस जीत को कामयाब करने में उन आम छात्र छात्राओं की भागीदारी थी जो भाजपा के आई टी सेल से नहीं डरे। उनकी विध्वंसक राजनीति का मुकाबला करते हुए दिन-रात खामोशी से एक-एक छात्र और छात्रा से मिलते-जुलते रहे। उन्हें अपना बनाते गए। उनसे जुड़ते गए।

उन्होंने कहा कि यह बात उपाध्यक्ष पद पर जीते अंकित उछोली के बड़े विजय जुलूस में भी दिखी जिसमें शामिल छात्र छात्राओं के नारे थे, ‘नई सदी का नया खून है – आइसा, आइसा, लड़ो पढ़ाई करने को, पढ़ो समाज बदलने को’। शिक्षा पर बजट का दसवां हिस्सा खर्च करो। उन्होंने कहा कि ये नारे बताते हैं कि आइसा छात्रहित और जनहित में भरोसा रखती है।

पीयू छात्र परिषद में नारी शक्ति जीती, सूरत बदली

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस बार धनपति और बाहुबली ताकतों को भारी शिकस्त दी है। इस जागरूकता से इस बार विश्वविद्यालय में दक्षिणपंथी कामयाब नहीं हो पाए। तमाम विरोध और शोरगुल के बावजूद वहां एक छात्रा कनुप्रिया पंजाब विश्वविद्यालय छात्र परिषद के अध्यक्ष पद पर जीती है। उन्हें 2802 वोट मिले।

पंजाब विश्वविद्यालय में काफी लंबी लड़ाई के बाद छात्र राजनीति में ऐसे वामपंथी कामयाब हो सके जो छात्रों की समस्याएं जानते थे। पहले सिर्फ एनएसयूआई और एसओआई छात्र इकाइयां थी जो छात्रों के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाती तो थी लेकिन छात्रों को वे जोड़े नही रख पाते थे।

तकरीबन आठ साल पहले पंजाब विश्वविद्यालय के परिसर में सचिंदर पाली और उनके चार साथियों ने स्टूडेंट्स फेडरेशन फार सोसाइटी (एसएफएस) की शुरूआत की। आज इनमें से सिर्फ सचिंदर पाल पाली ही सक्रिय है। वे कहते है कि इस बार की जीत बताती है कि बाहुबल, धन की बारिश और यह ठसक की महिलाएं पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यक्ष नहीं बन सकती जैसी सोच को तोडऩे में हमें इस बार कामयाबी मिली है। एसएफआई को 2013 में परिसर में ज़्यादातर छात्रों ने अपना साथी संगठन माना था। जब फीस बढ़ाए जाने के विरोध में छात्र एकजुट हुए। लेकिन अप्रैल 2017 में इसे ‘अराजकतावादी’ और ‘पत्थरबाज’ कहकर बदनाम किया गया। पहली बार एसएफएस ने 2014 में महिला अध्यक्ष के तौर पर अमनदीप कौर को छात्र संघ चुनाव में उतारा। हालांकि वह हार गई। एक साल बाद 2016 और 2017 में भी एसएफएस के छात्र चुनाव में उतरे। लेकिन वे हारते रहे।

लेकिन पार्टी ने उम्मीद नहीं खोई। अपनी रणनीति बदल ली। अपने नेताओं को छात्रों के बीच प्रचार में डाला और उन्हें रुपयों और बाहुबल का मुकाबला करने की प्रेरणा दी।

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र स्ंाघ चुनाव में हमेशा ताकत, रुपया और बाहुबल छाया रहा है। एसएफएस ने अपने न्यूनतम कार्यक्रमों के तहत दूसरी पार्टियों के लोगों से भी बातचीत करके उन्हें प्रेरित किया कि वे परिसर में अपना खर्च भी सीमित करें। इन्होंने हर समस्या पर आपसी संवाद बढ़ाने पर ज़्यादा से ज़्यादा जोर दिया। इनकी मांग थी कि लड़कियों के लिए चौबीस घंटे की छात्रावास में छूट हो। हर किसी को छात्रावास की सुविधा मिले। स्वंय वित्तपोषी कोर्स की पढ़ाई में फीस का ढांचा नियमित हो। छात्रों को स्कालरशिप मिले। सीनेट में उनका प्रतिनिधित्व हो।

छात्रों के मुद्दों को चुनावी मुद्दों में बदलना और उनका लाभ छात्रों तक पहुंचाने का काम खासा कठिन होता है। लेकिन अब एसएफएस पर है कि कैसे वह इसे हासिल कर पाती है। यह सब मुश्किल तब और हो जाता है जब विश्वविद्यालय का वाइस चांसलर खुद छात्र विरोधी जान पड़ता हो।

एसएफएस की पंजाब विश्वविद्यालय में जीत से यह बात ज़रूर साबित हुई है कि वहां के छात्रों ने कितनी हिम्मत करके उस छात्र राजनीति से तौबा किया जिसमें मार-पीट-हिंसा ओर रुपयों की बरसात होती दिखती थी। अब वे समझ चुके हैं कि परिसर में पढ़ाई-लिखाई का शांत माहौल होना चाहिए। जहां समस्याएं है उन पर ठंडे दिमाग से बातचीत करते हुए उनका निदान करना चाहिए। तभी समाज स्वस्थ और खुशहाल हो पाता है। एसएफएस के नेता हरमनदीप सिंह का मानना है कि उनकी छात्र संस्था की जीत पंजाब विश्वविद्यालय के परिसर में लोकतंत्र की जीत है।

पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष कनुप्रिया ने अपने पहले ही इंटरव्यू मे अपने इरादे साफ कर दिए। उन्होंने कहा कि अब पंजाव विश्वविद्यालय में आरएसएस का एजेंडा नहीं चलेगा। अब छात्र ही राजनीति करेंगे और छात्रों के ही मुद्दे लिए जाएंगे। विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ बातचीत करके जो मॉडल निकलेगा उसे ही आगे बढ़ाया जाएगा। इस सवाल के जवाब में कि उनका छात्र राजनीति के प्रति लगाव कैसे बढ़ा तो उनका जवाब था कि छात्रों के मुद्दों की वजह से ही मैं चुनाव लड़ी। उन्होंने आगे कहा कि छात्रों के मुद्दे उठाना और उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएं दिलवाना मेरी प्राथमिकता होगी। कनुप्रिया ने कहा विश्वविद्यालय के विभागों में जो भी खामियां है उन्हें दूर करने का प्रयास करूंगी। इसके अलावा छात्रों के अधिकारों के लिए भी मेरी और एसएफएस की लड़ाई जारी रहेगी। छात्रावास देने मेें पारदर्शिता लाने का काम किया जाएगा। लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव दूर करने का प्रयास करेंगे। लड़कियों के छात्रावास में 24 घंटे प्रवेश के लिए मेरी मांग मेरी प्राथमिकता होगी। इसके साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता कराने का प्रयास भी किया जाएगा। जनरल हाउस की बैठक के बाद कामों को करवाने के लिए वीसी ऑफिस में फाइल भेजी जाएगी।

एसएफएस के अध्यक्ष दमनप्रीत और हरमनदीप ने बताया कि कनुप्रिया कुछ सालों से काफी सक्रिय है। राजनीतिक मुद्दों पर उनकी अच्छी पकड़ है और उनमें नेतृत्व के सभी गुण हैं। छात्रों के सभी मुद्दों पर वे अपनी राय बेबाकी से रखती हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय छात्र परिषद के चुनाव के परिणाम

अध्यक्ष:

कनुप्रिया (एसएफएस)    2802

आशीष राणा (एबीवीपी) 2083

जीत अंतर     719

उपाध्यक्ष:

दलेर सिंह (सोई)      3155

प्रदीप सिंह (एनएसयूआई) 2227

हरआशीष चाहल (एसएफपीयू)    1739

जीत का अंतर   333

सचिव:

अमरिदंर सिंह (सोई)    2745

अरूण कादियान (एनएसयूआई)   2409

सहिल जगलान (एसएफपीयू)     2180

सहसचिव:

विपुल आत्रेय (एनएसयूआई)     2357

हेंमत शर्मा (एचएसए)   2274

नीती धीमान (हिमासू)   2072

रोहित सिंह राणा (एचपीएसयू)   1600

जीत का अंतर   83

(एचएएस का गठबंधन एबीवीपी के साथ था। जबकि हिमाचल स्टूडेंट यूनियन (हिमासू) सोई के साथ मिली थी। हिमाचल प्रदेश स्टूडेंट यूनियन (एचपीएसयू) ने पुसु के साथ गठबंधन किया था)

पुल टूटा दो भागों मेंन जाने कितना नुकसान हुआ

दक्षिण कोलकाता में माजेरहाट पुल के एक हिस्से के धराशायी होने की खबर चार सितंबर शाम को मिली। इस पुल के नीचे एक बस्ती थी। हाल-फिलहाल इस हादसे में दो व्यक्तियों की मौत की बात मानी गई है। 31 लोग घायल हंै। मृतकों और घायलों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि मलबे में असंख्य लोगों के दबे होने का अंदेशा है। राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी तत्काल घटना स्थल पर पहुंचे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

दक्षिण कोलकाता का यह सबसे व्यस्त पुल है। यह हादसा शाम पौने चार से पांच के बीच हुआ। तब बारिश भी हो रही थी। हावड़ा-बेहला रवींद्रनगर रूट की मिनी बस, कई कारें और मोटर साइकिलें और पैदल चलने वालों को खासी चोटें आई। स्थानीय लोगों ने फौरी मदद की। कारों से लोगों को निकाला गया। कुछ घायलों को एसएसकेएम और कुछ को सीएमआरआई अस्पतालों में भर्ती कराया गया।

याद रहे 2016 में 31 मार्च को पोस्ता इलाके में निर्माणाधीन विवेकानंद फ्लाई ओवर का एक हिस्सा ढह गया था। उसकी जंाच रपट पर अमल नहीं हुआ। सिलिगुड़ी में भी एक निर्माणाधीन फ्लाई ओवर का हिस्सा ढह गया था। राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी ने कोलकाता में 40 साल पुराने इस पुल के एक हिस्से के ढह जाने पर अफसोस जताया और राज्य के आला अफसरों को निर्देश दिया कि वे राज्य के सभी छोटे बड़े जि़लों के पुलों की देखरेख करें और उनकी सुरक्षा के लिए कारगर कदम उठाएं जाएं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने माजेरहाट पुल हादसे की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। उन्होंने राज्य के मुख्यसचिव की निगरानी में जांच के आदेश जारी किए हैं। जब यह हादसा हुआ तो मुख्यमंत्री दार्जिलिंग में थीं और वहीं से उन्होंने पूरी घटना और राहत कार्यों पर नजऱ रखी। लेकिन बुधवार को ही वे लौट आईं। उन्होंने बताया कि कोलकाता नगर निगम, पुलिस, आपदा राहत प्रबंधन और दमकल के लोग राहत कार्य में जुटे रहे हैं। पूरे हादसे की विडियोग्राफी की गई है। जिस महकमें को राज्य के सभी पुलों की निगरानी, उनकी टूट-फूट मरम्मत का काम देखने की जिम्मेदारी है उसे जल्द से जल्द अपनी रपट देने को कहा है। उन्होंने कहा कि इस पुल से बड़ी तादाद में लोग, आते-जाते हैं। गाडियां गुज़रती हैं। ऐसे में इस पुल का टूटना गंभीर हादसा है।

माजेरहाट पुल कमांड अस्पताल- तराताला के पास हादसे के बचाव काम में पुलिस के आने से पहले ही स्थानीय लोग राहत कार्य में जुटे। पुलिस के बड़े अधिकारी कई थानों के ओसी, सिविल डिफेंस और नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स की टीम भी पहुंची। पश्चिम बंगाल के मंत्री फिरहाद हकीम भी वहां पहुंचे। पुल के गिरे हुए हिस्से को हटाने के लिए पुलिस ने बीम काटने के लिए गैस कटर का इस्तेमाल किया। चूंकि अंधेरा हो चला था इसलिए जनरेटर की रोशनी में बचाव कार्य की कोशिश की गई। बचाव कार्य के लिए पर्याप्त संख्या में लोग नहीं मिले इसलिए उसे रोका गया। दूसरे दिन फिर राहत बचाव कार्य शुरू हुआ।

बंगाल के मंत्री फिरहद हकीम जो पुल गिरने के मौके पर मौजूद थे। उन्होंने कहा राहत कार्य और खोज का काम तेजी से चल रहा है। जब यह हादसा हुआ तो पुल पर और पुल के नीचे भी कई गाडिय़ां थी। ज़्यादातर लोगों को तत्काल गाडिय़ों से निकाल लिया गया और जो घायल थे उन्हें आस-पास के अस्पतालों में भेजा गया। राज्य आपदा टीम तत्काल पहुंची और स्थानीय लोगों ने भी काफी मदद की। दमकल की छह गाडिय़ां भी वहां तैनात थीं। राज्य सरकार ने सेना से मदद नहीं मांगी थी, फिर भी आर्मी फील्ड अस्पताल पास ही है। वहां से फौरन एक टुकडी आ गई जिससे राहत काम में काफी सहयोग मिला। आसपास ही मैट्रो का निर्माण कार्य भी चल रहा है। इस कारण क्रेन और जेसीबी लाने में भी बड़ी मुश्किल हुई। दूसरे दिन सड़कें बंद कर मलबा हटाने का काम ठीक से शुरू हुआ।

भाजपा नेता मुकुल राय ने तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया कि सरकार शहर में रख-रखाब में कोताही बरत रही है। इस हादसे की जिम्मेदार राज्य सरकार है। अभिनेत्री से नेता बनी रूपा गांगुली ने कहा कि राज्य सरकार ने हादसे के तथ्यों पर पर्दा डाल दिया है। जबकि यह बहुत दुखद घटना है।

सरकार को फासीवादी कहनेे पर विदेश में पढ़ रही छात्रा को सज़ा

चेन्नई से तूतीकोरीन में अपने घर लौट रही एक लेखक और शोध छात्रा को भाजपा सरकार को फासीवादी कहने पर तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ भाजपा की एक नेता ने पुलिस में कथित शिकायत की थी। इस गिरफ्तारी की द्रमुक नेता स्तालिन और अभिनेता-राजनेता कमल हसन ने भाजपा की इस असहिष्णुता की निंदा की। सोशल मीडिया में भी यह मामला खासा चर्चा में रहा।

कनाडा की मांट्रियल यूनिवर्सटी में शोध कर रही 28 वर्षीय भारतीय छात्रा लुई सोफिया को भाजपा की नेता प्रांतीय अध्यक्ष तमिलिसई सुंदरराजन की शिकायत पर तमिलनाडु पुलिस ने एयरपोर्ट पर ही गिरफ्तार कर लिया। वह चेन्नई से अपने घर तुथूकुडी जा रही थी। दोनों दोपहर में एक ही फ्लाइट से उतरे। तमिलिसई सुंदरराजन ने उतरते ही एयरपोर्ट पर मौजूद पुलिस में लुई के खिलाफ रपट लिखाई। लुई सोफिया कनाडा से अपने घर अपने मां-बाप के साथ जा रही थी।

सुंदरराजन को पुलिस ने भी समझाया कि वे पढ़ रही एक छात्रा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज न करें लेकिन वे अपनी पार्टी के खिलाफ किसी युवा की बात सुनना उनके लिए असहिष्णु हो रहा था। वे टस से मस नहीं हुई। उन्होंने लुई सोफिया के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी, कि उसने जोर से कहा था कि भाजपा की सरकार फासीवाद है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक तौर पर इस लड़की ने एक पार्टी की निंदा की है। उसे सज़ा मिलनी चाहिए।

पुलिस में दर्ज रपट के अनुसार तमिलिसई सुंदरराजन पार्टी के कार्यक्रम में भाग लेने तिरुनेलवेली जि़ले को जा रही थी। तुथुकुडी एयरपोर्ट पर पहुंचने पर भाजपा नेता ने लुई पर आरोप लगाया कि उसने भाजपा सरकार को फासीवाद सरकार कहा। वहीं उन्होंने पुलिस में तत्काल शिकायत लिखाई। जबकि लुई लगातार इस बात से इंकार करती रही कि उसने भाजपा सरकार को फासीवाद कहा है। उसके माता पिता ने भी कहा कि ऐसा उसने नहीं कहा भाजपा नेता ने संदेह जताया कि ज़रूर वह किसी गैर कानूनी संगठन से जुड़ी हुई भी हो सकती है।

इस पर सोशल मीडिया पर खासी सरगर्मी रही। विपक्ष ने भी इस घटना की खासी निंदा की ।

लुई सोफिया के वकील ने बताया कि चेन्नई पुलिस ने उसे दो सितंबर को हिरासत में लिया और पंद्रह दिन के लिए उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। सोफिया के पिता सेवानिवृत 65 साल के सरकारी डाक्टर हैं उन्होंने कहा कि विमान उतरने के बाद यह ड्रामा हुआ। हम चेन्नई से अपनी बेटी को साथ लेकर लौटे थे। तभी भाजपा की प्रांतीय अध्यक्ष को मेरी बेटी ने देखा। वह मुझसे धीरे से बोली, फासिस्ट सरकार डाउन,डाउन। इसके बाद वह कुछ नहीं बोली। लेकिन भाजपा की प्रांतीय अध्यक्ष को लेने आए करीब दस -ग्यारह लोग हमारे पास पहुंचे और उन्होंने बेटी को गालियां दी और धमकाना शुरू कर दिया। तमिलिसई भी उन्हीं में थी। उन्होंने मार डालने की धमकी भी दी। बाद में एयरपोर्ट पुलिस ने हमें बचाया और एक कमरे में ले गए। इसके बाद तमिलिसई ने रपट लिखाई। पुलिस ने हमें बताया और मेरी बेटी को ले गए। उन्होंने कहा तूतीकोरिन में प्रदूषण फैलाने वाली घातक फैक्टरी का विरोध कर रहे श्रमिकों और स्थानीय लोगों पर यह सरकार गोलियां चलाती है। इसका प्रतिनिधि झूठा आरोप लगा कर मेरी बेटी को गिरफ्तार कराता है। यह कितना शर्मनाक है। यह सही है कि उनकी बेटी ने उस घातक फैक्टरी के खिलाफ लेख लिखे हैं। लिखना उसका शौक है।

निकाय चुनाव होंगे, भले कांफ्रेंस और पीडीपी विरोध करे

जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में नेशनल कांफ्रेंस ने स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों का बॉयकॉट करने का फैसला लिया है। इसके अलावा पीडीपी ने भी इन चुनावों में भाग नहीं लेने का मन बनाया है। दोनों ही पार्टियों की मांग है कि धारा 35ए पर केंद्र सरकार अपना रूख साफ करे। नेशनन कांफ्रेंस ने यह धमकी भी दी है कि यदि केंद्र सरकार यह भरोसा नहीं देती कि यह संवैधानिक व्यवस्था में छेड़छाड़ नहीं करेगी कि अनिवासी कश्मीर में अचल संपति नहीं खरीद सकते। तो नेशनल कांफ्रेंस लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी भाग नहीं लेगी।

नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दल्ुला ने कहा कि एक ओर केंद्र यहां चुनाव कराना चाहता है और दूसरी ओर यह धारा 35ए हटाना चाहता है। धारा 370 को कमज़ोर कर दिया गया है और जम्मू और कश्मीर के संविधान पर हमले किए जा रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के अभी हाल के बयान को अपवाद माना जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि संविधान दोषयुक्त है तो भारत में जम्मू-कश्मीर का विलय भी दोषयुक्त है।

दूसरी ओर राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने ‘बॉयकॉट’ की धमकी दी है। जब तक नई दिल्ली धारा 35ए की रक्षा करने के मुद्दे पर भरोसा नहीं देती। वर्तमान हालात चुनाव के उपयुक्त नहीं है। आखिरी फैसला तभी लिया जाएगा, जब पार्टी के डर को सरकार दूर करेगी।

नए राज्यपाल ने स्थानीय चुनावों के लिए तारीखों की घोषणा कर दी है। म्युनिसिपल चुनाव चार स्तरों में होंगे। मतदान अक्तूबर एक से पांच के बीच होगा। पंचायत चुनाव आठ नवंबर और चार दिसंबर के दरम्यान आठ स्तरों में होंगे।

नेशनल कांफ्रेंस और पीडपी का घाटी में दो तिहाई मतदाताओं पर अपना राजनीतिक असर है। साथ जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में भी इनका खासा असर है। इतना ही नहीं राज्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर ने भी शक जताया है कि सरकार चुनाव कराने पर क्या वाकई गंभीर है। उन्होंने ज़मीनी हालात को मद्देनजऱ रखते हुए सभी राजनीतिक दलों को साथ लेकर ही चुनाव में उतरने की सलाह दी।

बहरहाल राज्य और केंद्र सरकार ने स्थानीय दलों से बातचीत करने से इंकार कर दिया है और धारा 35ए पर कोई आश्वासन भी नहीं दिया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान 27 अगस्त को भारत के एटार्नी जनरल ऑफ इंडिया के के वेणुगोपाल और अतिरिक्त सालिसिटिर जनरल (एएसजी) तुषार मेहता जो केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट बेंच में कहा कि धारा 35ए काफी नाजुक मुद्दा है और इसकी सुनवाई जनवरी या मार्च 2019 में हो जाए तो बेहतर होगा।

इसके साथ ही कानून और व्यवस्था का भी ध्यान रखा जाए जिससे शहरी, स्थानीय और पंचायत चुनाव कराए जा सकें। यह मामला अब जनवरी 2019 तक टाल दिया गया हैं

इससे राज्य और नई दिल्ली सरकार के सामने यह समस्या आ गई है कि वे इन चुनावों को विश्वसनीय नहीं बना पाएं। ज़्यादातर बड़ी पार्टियों ने इसके बॉयकॉट करने का ही फैसला लिया है। इतना ही नहीं ये धारा 35ए पर भी कोई भरोसा नही दे सकते। इसकी दो बड़ी महत्वपूर्ण वजहें हैं – एक पूरा मामला न्यायालय में है। और वे कोई भी प्रभाव डाल कर न्यायालय से फैसला नहीं दिलवा सकते। दूसरे भाजपा अपनी वैचारिक वजहों से संवैधानिक व्यवस्था का पक्ष नहीं ले सकेगी। अपनी स्थापना के दिन से ही यह

पार्टी जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के तहत विशेष व्यवस्था के विरोध में रही है। यह चाहती रही है कि जम्मू-कश्मीर का भारतीय महासंघ में पूरी तौर पर विलय हो जाए।

पिछले दो वर्षों से भाजपा धारा 35ए को हटाने की तैयारी में है। वह धारा 370 के भी पक्ष में उतनी नहीं है जिसके तहत देश के दूसरे हिस्सों से भारतीयों को जम्मू-कश्मीर में नहीं बसाया जा सकता। उनका मानना है कि कश्मीर समस्या का समाधान राज्य में डेमोग्रफिक बदलाव से ही संभव है।

इसीलिए केंद्र ने कानून के पक्ष में कुछ नहीं कहा। राज्यपाल शासन के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर कानून के पक्ष में बोलने में कमज़ोर भी पड़ता है। इस कारण राज्य के ज़्यादातर लोग धारा 35ए की रक्षा की बात नहीं कर पाते।

यह सही है कि अदालत ने जनवरी 2019 में सुनवाई की तारीख तय की है लेकिन इससे यह संभावना घटी नहीं है कि कानून का असर क्या होगा। नई दिल्ली इस मुद्दे पर खामोश ही है। जिससे संदेह बढ़ा है।

‘ऐसे माहौल में यदि मुख्यधारा की पार्टियां चुनाव में भाग लेती हैं तो यह माना जाएगा कि हम ही धारा 35ए को हटाने में सहयोग दे रहे हैं।’ मुख्यधारा के एक नेता ने कहा। सुप्रीम कोर्ट से सरकार ने यह अनुरोध किया था कि इस धारा पर सुनवाई टाल दी जाए जिससे राज्य में शांति से चुनाव हो सके। एक तरह से इस बात से यह संकेत भी मिला कि अदालत इस मुद्दे पर विपरीत फैसला दे सकती है। हम यह नहीं चाहते।

बहरहाल सरकार के लिए चुनाव कराने का मंसूबा तब बना जब अखिल जम्मू और कश्मीर पंचायत ने इस आशय का फैसला लिया कि ‘चुनाव गैर दलीय आधार पर कराए जाएं और राजनीति से इनका कोई लेना-देना न हो’।

‘हमारा जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह की राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। हम विधानसभा की तरह के संस्थान भी नहीं है कि कानून बना सकें। हमारी भूमिका तो अपने गांवों में विकास संबंधी कामकाज करना मात्र है।’ एजेेकेपीसी के अध्यक्ष शफीक मीर ने कहा। उन्होंने फारूक अब्दुल्ला की इस बात के लिए आलोचना भी की कि वे स्थानीय पंचायतों के चुनाव का विरोध कर रहे हैं। पंचायत और यूएलबी चुनाव महज लोगों की ज़मीनी भागीदारी के लिए होते हैं। ऐसे चुनावों से पार्टी की राजनीति को जोडऩा बेमतलब है।

राज्य सरकार ने अब तक खामोशी के साथ राज्य में बन रहे पूरे परिदृश्य को देखा है। यही काम केंद्र सरकार भी कर रही है। सरकार का इरादा तो यह है कि किस तरह एक ऐसी सुरक्षा योजना अमल में आए जिससे चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की रक्षा की जा सके। लेकिन जल्दी ही या कुछ देर में इन्हें यह जवाब तो उन सवालों का देना ही होगा जो नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने उठाए हैं और पूरे ताम-झाम को एक विश्वसनीयता भी देने की बात कही है।

इस बरसात में हिमाचल को १२१७ करोड़ का नुक्सान

इस बरसात में हिमाचल प्रदेश के 1217 करोड़ रूपये बारसिह और बाढ़ में धुल गए। यही नहीं २६४ लोगों की जान भी चली गयी जिनमें बारिश की बजह से सड़क हादसों में मरने वाले भी शामिल हैं।

मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने मंगलवार को शिमला में मानसून के दौरान नुकसान की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए यह जानकारी दी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि मानसून के पहली जुलाई से १७ सितंबर तक की अवधि में १२१७.२९ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह नुकसान भारी बारिश, बाढ़ और बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं  से हुआ। सीएम ने कहा कि पीडब्ल्यूडी को सड़कों, पुलों, डंगों और दीवारों को हुई क्षति से सर्वाधिक ७३५ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। भारी बारिश के साथ मलबे की अनियोजित डंपिंग भी सड़कों की क्षति का कारण रहा। सीएम ने अधिकारीयों से कहा कि उचित डंपिंग स्थल चिन्हित किए जाने चाहिए और यह भी सुनिश्चित बनाया जाना चाहिए कि मलबे का निपटान चिह्नित स्थलों पर ही किया जाए।

बैठक में दी गयी जानकारी के मुताबिक मानसून में आईपीएच को ३२८.७८ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। कृषि व बागवानी क्षेत्र को ८८.८१ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जबकि ऊर्जा क्षेत्र को

२४.५० करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा। सीएम ने कहा कि प्रदेश सरकार ने राज्य की क्षतिग्रस्त अधोसंरचनाओं की तत्काल बहाली और मरम्मत कार्यों के लिए २२९.६४ करोड़ रुपये जारी किए गए  हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में बादल फटने के ३३ और भूस्खलन के ३९१ मामले सामने आए, जिनसे संपत्ति को भारी नुकसान हुआ।

सीएम के मुताबिक इस अवधि के दौरान कुल २६४ लोगों की जाने गईं, जिनमें क्षतिग्रस्त सड़कों के कारण सड़क दुर्घटनाओं से १९९  मौतें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि कांगड़ा जिले के नूरपुर में एक एनडीआरएफ की कंपनी तैनात की गई है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व मनीषा नंदा ने कहा कि प्रदेश में हाल ही में पूर्व चेतावनी और अलर्ट प्रणाली के लिए एनडीएमए द्वारा विकसित पायलट टेस्टिंग ऑफ कॉमन अलर्ट प्लेटफार्म का प्रशिक्षण किया गया। विशेष सचिव राजस्व और आपदा प्रबंधन डीसी राणा ने इस अवसर पर राज्य में बाढ़ व वर्षा के कारण हुई क्षति पर विस्तृत प्रस्तुति दी। राज्य सरकार शीघ्र ही प्रदेश को हुए नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र सरकार को ज्ञापन प्रस्तुत करेगी।

सुरक्षित निवेश करते हैं मोदी

आम तौर पर गुजरात के लोगों को पैसे के इस्तेमाल के मामले में समझदार माना जाता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं। वे एक सुलझे हुए निवेशक हैं। पीएमओ की तरफ से मंगलवार को जारी जानकारी के मुताबिक पीएम नरेंद्र मोदी के पास कुल सम्पति २.२८ करोड़ है जबकि नकदी सिर्फ ४८,९४४ रूपये। पीएम के सर पर कोइ क़र्ज़ भी नहीं है।

करोड़पति प्रधानमंत्री ने आधे से सम्पति का धन फिक्स्ड डिपाजिट (एफडी) में लगा रखा है। प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चल-अचल संपत्ति का जो ब्योरा जारी किया गया है उसके मुताबिक पीएम के पास कुल संपत्ति २.२८ करोड़ रुपए है।

पिछले साल पीएम मोदी के पास करीब डेढ़ लाख रुपये का नकद मौजूद था। इस बार के ब्योरे के मुताबिक अब्जो यह ४८,९४४ रुपए हैं। प्रधानमंत्री ने कई जगह सेविंग की है। इसमें २०,००० रूपये के इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड डिपोजिट शामिल हैं। जानकारी के मुताबिक मोदी ने ५,१,२३५ रुपए नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट और १,५९,२८१ रुपए जीवन बीमा पॉलिसी में निवेश किए हुए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने १,०७,२८८ रुपए एसबीआई में फिक्स्ड डिपोजिट के रूप में निवेश किये हैं और गांधीनगर ( गुजरात) स्थित एसबीआई ब्रांच में उनके खाते में कुल ११,२९,६९० रुपये जमा हैं। उनके निवेश के तरके से साफ़ है कि मोदी एक समझदार निवेशक हैं और साथ ही सुरक्षत निवेश में विश्वास रखते हैं।

इस निवेश के अलावा मोदी ने साल २००२ में एक लाख रूपये मूल्य की ३५३१.४५ वर्ग गज ज़मीन की खरीदी भी की थी। जहाँ तक सोने की बात है, पीएम मोदी के पास सोने की चार अंगूठियां हैं जिनका वजन ४५ ग्राम है। दिलचस्प यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएम मोदी ने सोने के रूप में कुछ नहीं खरीदा है। जो चार अंगूठियां उनके पास हैं उनकी कीमत लगभग १.३८ लाख रूपये है।

स्मार्ट निवेशक पीएम मोदी कर्ज़दार भी नहीं हैं। किसी बैंक से उनके नाम कोइ लोन नहीं है। उनके पास कोइ दुपाहिया वाहन भी नहीं है।

गंगा की सफाई का रहा हल्ला, कुछ तो बूंदे साफ हुई!

हरिद्वार/प्रेमनगर आश्रम घाट। ब्रहमकुमारी नीलम अक्सर हर रोज यहां घंटो बैठती हैं। गंगा की स्थिति पर दुखी हैं। बताती  हैं 25-30 साल पहले गंगा इतनी मैली तो न थी। पहले लोग मां की तरह पूजते थे। पूजा तो अब भी करते हैं मगर मां के भाव से नहीं। सोचते है जितना कचरा है गंगा में बहा दें। गंदे नाले, सीवर और कई तरह की गंदगी गंगा में जा रही है।

हरकी पैड़ी के पास ही बाज़ार में फ्रांस से आए दम्पति स्टीविया और राबर्ट हरिद्वार को बनारस से बेहतर मानते हैं हालांकि गंगा स्नान के पक्षधर नहीं है, क्योंकि वे जानते है गंगा में प्रदूषण बहुत है। स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक हैं। उनका कहना है कि बच्चों को इस तरह से शिक्षित करें ताकि प्रकृति का सम्मान करना सीखें।

शहर में राह चलते किसी नागरिक से, घाटों पर सैर करते लोगों से किसी दुकानदार से, किसी रिक्शा वाले से, किसी प्रबुद्ध व्यक्ति से या किसी महिला से अगर गंगा पर प्रतिक्रिया पूछो तो हर एक का यह जवाब मिलता है: ‘गंगा में प्रदूषण तो बहुत है लेकिन क्या करें।’ गंगा नदी के संरक्षण और उसका प्रदूषण खत्म करने को लेकर सरकारी स्तर पर करोड़ों-करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन स्थिति में सुधार कुछ अंश ही हो पाया है। सरकारी स्तर पर प्रयास कछुआ चाल हैं तो आम पब्लिक भी ‘मैं न मानूं’ की तर्ज पर गंदगी फैलाने पर आमादा है। वस्तुस्थिति यह है कि गंगा जल पीने की बात तो दूर, उसमें स्नान करने को भी मन हिचकिचाता है। हां, कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत कोशिश ज़रूर हुई है मगर वह समुद्र में बंूद के समान है। गंगा निर्मलीकरण के प्रयासों को लेकर सब अपने-अपने दावे ठोकते हैं लेकिन धरातल की सच्चाई में तथ्य नजऱ नहीं आते।

क्या कहती हंै रिपोर्टस

पिछले एक वर्ष से अलग-अलग समाचार पत्रों में छपी रिपोर्टस, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देश, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जानकारी पर नजऱ डालें तो गंगा निर्मलीकरण के प्रयासों की पोल खुलती साफ नजऱ आती है। गंगा नदी में प्रदूषण के एक मामले में एनजीटी के चेयरपर्सन एके गोयल को यह कहना पड़ा है कि जिस नदी में करोड़ों भोले-भाले लोगों की आस्था है, उन्हें गंगाजल के प्रदूषण के प्रति जागरूक करना ज़रूरी है। उनका कहना है कि अगर सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी जा सकती है कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो लोगों को प्रदूषित गंगाजल के कुप्रभावों के प्रति भी जागरूक किया जाना चाहिए। गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण अंक (2016) में गंगा प्रदूषण पर डा. अशोक जी पण्डया ने उत्तराखंड की तालिका में दिया है कि ”उत्तराखंड के 450 किलोमीटर के गंगा क्षेत्र में 51.3 लाख लीटर मल-जल प्रतिदिन जाता है। ‘‘ हालांकि इन दिनों केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी बेबसाइट पर मानचित्र दिया है जो साफ और प्रदूषित जल का संकेत करता है। इसमें उत्तराखंड में गंगाजल को कई शहरों में सही बताया गया है। लेकिन स्थानीय लोगों, जानकारों और प्रबुद्धजनों की मानें जो हरिद्वार में स्थिति ऐसी सुधार वाली नहीं है।

पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. महावीर अग्रवाल मानते हैं कि गंगा में हम सबकी युगों-युगों से श्रद्धा आस्था है क्येांकि यह एक पवित्र नदी है। दुर्भाग्य यह है कि जिसे मां कहते हैं उसको अपने कर्मों से, आचरण से इतना प्रदूषित कर दिया है कि वैज्ञानिकों को कहना पड़ा है कि उसका जल आचमन के योग्य नहीं रहा। गंगा में जिन फैक्टरियों, धर्मशालाओं, भवनों, अखाड़ों, होटलों का गंदा पानी जा रहा है। वह किसी से छिपा नहीं है। गंगा निर्मलीकरण के नाम पर कई सरकारी योजनाएं चल रही है। लेकिन धरातल पर जो नजऱ नहीं आ रही बल्कि करोड़ों रुपए तो बहा दिए गए हैं लेकिन गंगा की स्वच्छता के लिए जो मानसिक शक्ति और संकल्प होना चाहिए था, वो नहीं है।

गंगा महासभा के महामंत्री आरके मिश्रा हरिद्वार को लंबे अर्से से जानते हैं। उन्होंने बताया कि हरिद्वार की भौगोलिक परिस्थिति ऐसी है कि एक तरफ पहाड है एक तरफ गंगा। इनके बीच कहीं 50, कहीं 100 तो कहीं 40 मीटर बेल्ट रह गई। पुराने भवनों में सीवर लाइन नहीं है। भीमगौडा से हरकी पैड़ी तक कुछ भवन सड़क से नीचे हैं। मायापुर से ललतारा पुल तक कई भवनों का सीवर गंगा में जा रहा है। हालांकि वर्ष 2004 में इनके सुझाव पर भीमगौडा से हरकी पैड़ी तक साढ़े चार करोड़ खर्च कर 600 मीटर घाट बनाया गया, जहां प्रदूषण नहीं है। मिश्रा बताते है कि सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जो सीवेज पंपिंग स्टेशन बने हुए हैं, वो गंगा किनारे हैं। किसी कारण मोटर खराब हो जाती है या लाइन डैमेज हो जाती है तो उनके पास कोई विकल्प नहीं होता दूषित पानी को बाहर निकालने का। मिश्रा के मुताबिक हरिद्वार में वर्ष 1936 की सीवर लाइन डली हुई है। कनखल में वर्ष 1963-64 में डाली गई थी, जिनका समय खत्म हो चुका है। नाले टेप नहीं किए गए हैं।

गंगा में प्रदूषण की ऐसी स्थिति श्रद्धालुओं के साथ सरासर धोखा है, अन्याय है। व्यापार मंडल के अध्यक्ष संजीव नैय्यर गंगा की ऐसी स्थिति के लिए दोनों वर्गों को जिम्मेदार ठहराते हैं एक जो गंगा की पूजा-अर्चना करते हैं। दूसरा सरकारी तंत्र। नैय्यर का कहना है कि सरकार जब तक हरकी पैड़ी मेला क्षेत्र से झुग्गी झौपंडियां, भिखारी, अनधिकृत फाड़ी वालों को नहीं हटाएगी, तब तक न मैदान खाली होगा और न गंगा स्वच्छ होगी। इसके चलते मेला क्षेत्र भूमि सिकुड़ती जा रही है। गंगा के नाम पर करोड़ों रुपए बहा देने की बात वो भी करते हैं। नैयर ने कहा कि पहले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई बनाई थी। 1500 करोड़ हरिद्वार में दिया गया था। अब नमामि गंगे नई सरकार का नया प्रोजेक्ट है। गोमुख से इलाहाबाद तक कहीं काम नजऱ नहीं आता। पैसे की बंदरबांट है। व्यापार मंडल अध्यक्ष ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह बात तो अटल जी भी कहते थे कि एक रुपया भेजता हूं, वहां पंद्रह पैसे पहुंचते है, पच्चासी पैसे पता नहीं कहां चले जाते हैं।

दशकों से गंगा को देखने वाले गीता मंदिर कनखल के वयोवृद्ध स्वामी चिन्मयानंद संसाधनों की कमी और बढ़ती जनसंख्या को गंगा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक परीक्षण ऋ षिकेश से उन्नाव तक गंगा में न नहाने की इजाजत देते हैं और न आचमन की।

 भाजपा युवा मोर्चा के अजय सोलंकी का कहना है कि गंगा एक्शन प्लान में करोड़ों आबंटित हुए। गंगा तो साफ नहीं हुई मगर सरकारी खजाना ज़रूर साफ हो गया। सोलंकी कहते है कि पिछले वर्षों से कुछ फर्क पड़ा है। लेकिन गंगा बहुत प्रदूषित हो चुकी है। आने वाली पीढ़ी के लिए हमें सोचना पड़ेगा।

 गंगा की इस दयनीय अवस्था पर कवियों ने कविताएं लिखीं तो किसी नज़्मकार की नज़्म को किसी ने आवाज़ दी। स्वर्गीय कवि गोपाल दास नीरज की लिखी इस नज़्म को शुभा मुदगल ने इस तरह गाया है:

अब तो कोई मजहब ऐसा भी चलाया जाए

जिस में इन्सान को इन्सान बनाया जाए

आग बहती है यहां गंगा में भी, ज़मज़म में भी

कोई बतलाए कहां जा के नहाया जाए।