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तिवारी को सुप्रीम कोर्ट का अवमानना नोटिस

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी को पूर्वी दिल्ली में कथित तौर पर एक परिसर की सील तोड़ने के मामले में अवमानना नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है की मनोज तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने मंगलवार को ऐसा किया था। उनके खिलाफ  मंगलवार को मकान की सील तोड़ने के आरोप में गोकुलपुरी थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। तिवारी के खिलाफ एमसीडी ने पुलिस शिकायत दर्ज कराई है। तिवारी के खिलाफ़ आईपीसी की धारा

 १८८, डीएमसी एक्‍ट ६६१ और ४६५ के तहत मामला दर्ज किया गया था।

 याद रहे तिवारी के कथित तौर पर एक सीलबंद घर का ताला तोड़े जाने का कथित वीडियो सामने आने के बाद रविवार को विवाद खड़ा हो गया था। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने इस वीडियो को दिल्ली के भाजपा शासित नगर निगमों से जोड़ते हुए आरोप लगाए थे।

उधर तिवारी ने कहा था कि वह गोकुलपुर गए थे जहां लोगों ने उन्हें बताया कि १००० के बीच केवल एक घर को निगम ने सील किया है। उन्होंने कहा था, ‘मैंने निगम की चुनिंदा नीति के विरुद्ध सील को तोड़ दिया। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि सभी मकान अवैध रुप से बनाये गए हैं लेकिन खास मकान को ही निगम ने कार्रवाई के लिए चुना।’

तीन तलाक पर अध्यादेश

एक बड़े राजनीतिक दांव में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन तलाक़ को अध्यादेश के जरिये क़ानून बनाने का रास्ता साफ़ कर दिया है। केंद्रीय केबिनेट की बुधवार को दिल्ली में हुई बैठक में तीन तलाक पर अध्यादेश लाने का फैसला किया गया। इसका स्वरुप नहीं बदला गया है और इसे जल्दी ही राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। अध्यादेश के जरिये यह क़ानून छह महीने तक अस्तित्व में रह सकता है हालाँकि उसके बाद सरकार को इसे पास करने के लिए संसद में लाना होगा।

दिल्ली में आज पीएम मोदी के नेतृत्व में केबिनेट ने अध्यादेश का फैसला किया। गौरतलब है कि तीन तलाक (ट्रिप्पल तलाक) का बिल राज्य सभा में पिछले दो सत्र से अटका हुआ है क्योंकि वहां भाजपा का बहुमत नहीं था। चार राज्यों में छह महीने से पहले ही विधानसभा चुनाव होने हैं और लोक सभा के चुनाव को भी लगभग ६-७ महीने ही बचे हैं लिहाजा भाजपा सर्कार के इस दांव को चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है।

भाजपा आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस और विपक्ष के अन्य दल मुस्लिम महिलाओं का कल्याण नहीं चाहते इसलिए वे इस बिल का विरोध करते रहे हैं जबकि कांग्रेस और कुछ अन्य दल इस बिल में कुछ फेरबदल की मांग करते रहे हैं।

तीन तलाक को लेकर सबसे पहले कोर्ट में जाने वाली सायरा बाणों ने सर्कार के अध्यादेश वाले फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इससे उन महिलाओं को नयाये मिल सकेगा जो पुरुषो  की तलाक के मामले में जयादती का शिकार होती रही हैं।

‘ निर्वाचन आयोग को अपने तरह से काम करने दिया जाये ‘

निर्वाचन आयोग कांग्रेस या उसके नेता जैसा चाहते हैं उस तरीके से देश में चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग बाध्य नहीं है। यह बात इलेक्शन कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल हलफनामे में कही है।
मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में पारदर्शिता की मांग को लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ की तरफ से दायर याचिका का विरोध करते हुए ईसी ने यह भी कहा कि यह एक संवैधानिक निकाय है जिसे नियमों के अनुसार काम करना है न कि राजनीतिक दल के निर्देशों के अनुसार। .
आयोग के मुताबिक़ कांग्रेस की याचिका आधारहीन है और इसलिए सुप्रीम कोर्ट कमलनाथ की याचिका खारिज करे। दरअसल, मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की मांग को लेकर कांग्रेस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
चुनाव आयोग ने कोर्ट में दिये गये अपने हलफनामे में कहा कि याचिका में आयोग पर लगाए गए आरोप गलत, बेबुनियाद और भ्रामक हैं। मतदाता सूची का प्रकाशन मतदाता सूची की जांच पडताल का अभिन्न हिस्सा है।
ईसी ने कहा, ‘कमलनाथ और उनकी पार्टी भारत के निर्वाचन आयोग को किसी विशेष तरीके से चुनाव आयोजित करने (वीवीपीएटी के कार्यान्वयन सहित) के लिए निर्देशित नहीं कर सकते।’
चुनाव आयोग ने कहा कि याचिका में आयोग पर लगाए गए आरोप गलत, बेबुनियाद और भ्रामक हैं, क्योंकि वह ईसी को अपनी निजी इच्छाओं और प्रशंसकों के अनुसार चुनाव करने के लिए निर्देशित कर रहे हैं।
इससे पहले कांग्रेस की मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की इकाइयों के प्रमुखों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर कहा था कि चुनाव आयोग फर्जी वोटरों का नाम वोटर लिस्ट से हटाए।
अपील में कमलनाथ, सचिन पायलट और भूपेश बघेल नेकहा था कि चुनाव आयोग इन राज्यों में निष्पक्ष चुनाव कराना सुनिश्चित करे।
कांग्रेस नेता कमलनाथ ने कहा था कि हम चुनाव आयोग को सबूत देंगे कि राज्य में 60 लाख फर्जी वोटर हैं।
मामला सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने मामले में जांच करवाने का भरोसा दिया था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इसी साल चुनाव होने है।

सात रंगों में खिलेगी हमारी प्रेम कहानी

उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आखिर एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना अपराध बताया गया था। न्यायालय ने कहा कि यह प्रावधान संविधान में दिए गए समता के अधिकार का उल्लंघन करता है। कोर्ट के इस फैसले के बाद देश में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आईं। फैसले का लेस्बियन, गे, बॉयसेक्युल, ट्रांसजेंडर और किन्नर (एलजीबीटीक्यू) समुदाय के सदस्यों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है जबकि धार्मिक संगठनों ने इसे ‘प्रकृति के खिलाफ’ बताया।

देश में धारा 377 का मुद्दा कोई नया नहीं था। 2001 में पहली बार एक गैर सरकारी संस्था नाज फॉउंडेशन ने इसे लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि देश में समलैंगिक यौन सम्बन्ध के करीब 7200 मामले देश भर में दर्ज हैं। धारा 377 ‘अप्राकृतिक अपराधों’ से संबंधित है जिसमें किसी महिला, पुरुष या जानवरों के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाने वाले को आजीवन कारावास या दस साल तक के कारावास की सजा और जुर्माने का प्रावधान था। इनमें सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश के हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकार्ड के मुताबिक 2014 से 2016 के बीच ही 4690 मामले दर्ज किये गए। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन मामलों पर राज्य सरकारों को फैसला करना होगा। हालाँकि इनमें कई मामले समलैंगिक संबंधों से इतर आपराधिक दृष्टिकोण से जुड़े हैं जिनमें बच्चों से जबरी सम्बन्ध बनाने के मामले भी शामिल हैं। यह फैसला आने के बाद इस संवाददाता ने लोगों से बात की। चंडीगढ़ में सेक्टर 21 की कंचन (बदला नाम) ने इसे सही फैसला करार दिया। कंचन के पति उन्हें छोड़ चुके हैं और वे अकेली रहती हैं। उन्होंने कहा कि रिश्ता एक नितांत निजी फैसला है। ‘आप किसके साथ रहेंगे और किससे प्यार करेंगे, यह आपको तय करना है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने इस पक्ष का ख्याल रखते हुए फैसला किया है जिसका समर्थन करते हैं’। उन्होंने नाम न छपने की शर्त पर स्वीकार किया कि वे महिला मित्र के साथ रिश्ता रखती हैं।

हालाँकि शिमला सचिवालय में कार्य करने वालीं कमला धारटा ने इसे प्राकृतिक नियम के खिलाफ बताया। ‘दो समान लिंग के लोगों के बीच सेक्स संबंध प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है। इसे धार्मिक दृष्टि से न देखकर वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो भी यह गलत लगता है’।

उधर दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहे रोहिणी के अतुल (बदला नाम) ने इस फैसले को सही बताया। उनके मुताबिक यह फैसला कानून की बेवजह की बेडिय़ों से बाहर निकलने वाला फैसला है जिसका अभिनन्दन किया जाना चाहिए। जब उनसे पूछा कि क्या वे खुद अपने बारे में ऐसे समलैंगी रिश्ते को स्वीकार करेंगे, उन्होंने कहा कि वे समलैंगी दोस्त के साथ ‘मित्रता’ रखते हैं।

वैसे जिन लोगों से इस संवाददाता ने बात की उनमे से काफी ने यह तो कहा कि बड़ी अदालत का फैसला है लिहाजा कुछ विचार करके ही आया होगा, हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से ऐसा रिश्ता नहीं रखना चाहेंगे जबकि कुछ ने कहा कि इसमें कुछ गलत नहीं। इनमें लड़कियां भी शामिल थीं।

दिल्ली के मोहन गार्डन इलाके के एक मंदिर में पुजारी रामानंद रणाकोटी ने इसे ‘आफत को बुलावा देने वाला’ बताया। मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले रणाकोटी ने कहा कि दुनिया गलत दिशा में जा रही है। ‘यह महापाप है। आने वाले समय में इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी’।

समलैंगिक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भले इसे आपराधिक मामला नहीं माना है लेकिन इस मसले पर धार्मिक संगठनों ने विरोध के स्वर उठाये हैं। पुलियाकुलम गिरिजाघर के फादर फेलिक्स जेबासिंह जिला अदालत परिसर पहुंचे और गलियारे में खड़े होकर नारेबाजी शुरू कर दी और लोगों से समलैंगिक विवाह का समर्थन ना करने की अपील की। पुलिस के घेरने के बाद भी फादर ने चीखते हुए कहा, ‘धारा 377 (भादंवि की) पर उच्चतम न्यायालय के फैसले का समर्थन ना करें। ईसा मसीह आ रहे हैं। उनका आगमन निकट है। इस तरह की शादी से सामज पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।’ उन्होंने कहा, ‘परम पिता ने सोडोम और गोमोरा के शहर आग तथा सल्फर से बर्बाद कर दिए थे क्योंकि वह समलैंगिकता का समर्थन करते थे। समलैंगिकता का समर्थन न करें’।

साल 2001 में जब नाज फॉउंडेशन ने कोर्ट का इस मसले को लेकर रुख किया था तो उसने इसे सही ठहराने का पक्ष लिया था। कोर्ट ने समान लिंग (पुरुष-पुरुष या महिला-महिला) के दो वयस्कों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित करने वाले प्रावधान (धारा 377) को ‘गैरकानूनी’ बताया था। हालांकि दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 में आये इस फैसले को सुप्रीम

कोर्ट ने 2013 के अपने फैसले में गलत ठहराते हुए पलट दिया जिससे धारा-377 का अस्तित्व बना रहा।

इसके बाद यह मसला देश भर में दो विचारधाराओं के बीच बहस का मुद्दा बना रहा। कोर्ट में इस पर मामला पहुंचा। संविधान पीठ ने इसी साल 10 जुलाई को इन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू होते ही स्पष्ट कर दिया था कि वह सुधारात्मक याचिकाओं पर गौर नहीं कर रही है और इस मामले में सिर्फ नयी याचिकाओं पर ही निर्णय करेगी। इन याचिकाओं का अपोस्टालिक अलायंस ऑफ चर्चेज और उत्कल क्रिश्चियन एसोसिएशन तथा कुछ अन्य गैर सरकारी संगठनों और व्यक्तियों ने विरोध किया था।

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर में आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखते हुए कहा कि ‘हमें एक व्यक्ति की पंसद का सम्मान करना चाहिए’। कोर्ट ने कहा – ‘दो बालिगों का सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाना जायज है इसलिए समलैंगिक संबंध अपराध नहीं है’।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने धारा 377 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का संयुक्त रूप से निपटारा करते हुए कहा कि एलजीबीटी समुदाय को हर वह अधिकार प्राप्त है, जो देश के किसी आम नागरिक को मिला हुआ है। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति रोहिंगटन एफ नरीमन, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने अलग-अलग परंतु सहमति का फैसला सुनाया।

संविधान पीठ ने नृत्यांगना नवतेज जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, शेफ ऋतु डालमिया, होटल कारोबारी अमननाथ और केशव सूरी और व्यवसायी आयशा कपूर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के 20 पूर्व और मौजूदा छात्रों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। इन सभी ने दो वयस्कों द्वारा परस्पर सहमति से समलैंगिक यौन संबंध स्थापित करने को अपराध के दायरे से बाहर रखने का अनुरोध करते हुए धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। संविधान पीठ ने आम सहमति से 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत परस्पर सहमति से अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध था।

न्यायालय ने हालांकि पशुओं और बच्चों के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के अपराध के मामले में धारा 377 के एक हिस्से को पहले की तरह अपराध की श्रेणी में ही बनाए रखा है। न्यायालय ने कहा कि धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण इनसे भेदभाव होता है।

यदि इस मसले पर नजर दौड़ाई जाये तो इससे जुड़े मामलों की बात भी सामने आती है। धारा 377 के तहत आज की तारीख में अनुमानता 7200 मामले दर्ज हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) के रिकार्ड का अध्ययन करने से पता चलता है कि 2014 से 2016 के बीच 4690 मामले धारा 377 के तहत दर्ज हुए। ब्यूरो की वेबसाइट पर 2016 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस धारा के तहत दर्ज मामलों में उत्तर प्रदेश और केरल सबसे आगे हैं। साल-दर-साल इन मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

समलैंगिक यौन संबंध की जिस धारा को अब देश की शीर्ष अदालत ने निरस्त किया है उसके तहत 2014- 2016 के बीच कुल 4690 मामले देश भर में दर्ज हुए। एनसीआरबी के मुताबिक 2016 में धारा 377 के तहत समलैंगिक यौन संबंधों के 2195 मामले दर्ज हुए जिनकी संख्या 2015 इससे कहीं कम 1347 थी। दिलचस्प यह भी है कि 2014 में यही मामले सिर्फ 1148 थे।

ब्यूरो के रिकार्ड के मुताबिक उत्तर प्रदेश धारा 377 के तहत दर्ज मामलों में सबसे आगे हैं जहाँ 2016 में ही 998 मामले दर्ज हुए जबकि केरल में 207 मामले दर्ज किये गए। राजधानी दिल्ली में भी धारा 377 के तहत 183 मामले दर्ज हुए। महाराष्ट्र में 170 मामले दर्ज किए गए। साल 2015 में धारा 377 के तहत सबसे ज्यादा 239 मामले उत्तर प्रदेश में, 159 केरल में, महाराष्ट्र में भी 159, हरियाणा और पंजाब में क्रमश 111 और 81 मामले दर्ज हुए।

अब बात बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की। साल 2015 में देश में रजिस्टर हुए 1347 मामलों में 814 मामले बच्चों के उत्पीडऩ से जुड़े थे जिसमें सबसे ज्यादा 179 यूपी में, 142 केरल, 116 महाराष्ट्र जबकि 63 हरियाणा में दर्ज किये गए थे। यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपसी सहमति को लेकर आया है। ऐसे में जो मामले जोर जबरदस्ती से संबंध बनाने को लेकर हैं और जिनमें बच्चों का उत्पीडऩ हुआ है उसमें आरोपियों को राहत की संभावना काम है।

 

विशेषज्ञ बोले, सही फैसला

कानून के जानकार विशेषज्ञों ने कोर्ट के फैसले को लेकर अपनी राय जाहिर की है। पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने इसे ‘उत्साहजनक फैसला’ बताया। सोराबजी ने कहा कि यह एक उत्साहजनक फैसला है और यदि किसी व्यक्ति के यौन रूझान विशिष्ट हैं तो यह कोई अपराध नहीं है। उधर अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि इस फैसले से राजनीति की दशा और मानवीय मूल्यों में बदलाव आएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कहा कि इस फैसले ने लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और किन्नर (एलजीबीटीक्यू) समुदाय के लिए पूरी समानता के दरवाजे खोल दिए हैं।

समलैंगिकता और आरएसएस

समलैंगिकता पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की राय में परिवर्तन दिखा है। सुप्रीम कोर्ट के धारा 377 पर फैसले के बाद आरएसएस ने कहा कि ‘समलैंगिकता अपराध नहीं है लेकिन हम समलैंगिक विवाह का समर्थन नहीं करते क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं है’। संघ के प्रचार प्रमुख अरुण कुमार ने फैसले के बाद कहा – ‘उच्चतम न्यायालय के फैसले की तरह हम भी इसे (समलैंगिकता) अपराध नहीं मानते’। हालाँकि, उन्होंने संघ के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि समलैंगिक विवाह और ऐसे संबंध ‘प्रकृति के साथ संगत’ नहीं होते हैं। उन्होंने कहा, ‘ये संबंध प्राकृतिक नहीं होते इसलिए हम इस तरह के संबंध का समर्थन नहीं करते।’ उन्होंने दावा किया कि भारतीय समाज ‘पारंपरिक तौर पर ऐसे संबंधों को मान्यता नहीं देता है।’ कुमार ने कहा कि मनुष्य आमतौर पर अनुभवों से सीखता है इसलिए इस विषय पर चर्चा की जरुरत है और इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर से निपटने की ज़रुरत है।

टोरेंट और एल्डर पर करोड़ों की जालसाज़ी का आरोप?

आरोप है कि एल्डर फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड कंपनी जो लिक्विडेशन’ में है उसने टोरेंट फार्मास्यूटिकल कंपनी के साथ मिल कर करोड़ों रुपए की आर्थिक जालसाजी की। इसने कई सक्रिय दूसरे क्रेडिटर और 17 क्लियरिंग एंड फारवर्डिग (सी एंड एफ) एजेंट को उनकी वाजिब देनदारी भी नही दी।

‘तहलका’ को अपनी कहानी इन्होंने सुनाई कि किस तरह दोनों ही कंपनियों ने बड़े ही तरीके से सोच-समझ कर कई करोड़ की वित्तीय जालसाजी की। टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड ने एल्डर फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड का सारा काम -धंधा हड़प लिया और उसे सिर्फ एक ‘शेल’ कंपनी बतौर बना दिया। आरोप है कि अधिग्रहण होता उसके पहले ही टोरेंट फार्मा को यहा जानकारी हो चुकी थी कि एल्डर फार्मा की बकाया लायविलिटीज कितनी और क्या है। इसके जरिए उसने बड़े पैमाने पर रुपयों की हेरा-फेरी की जो कई सौ करोड़ रुपए है। दोनों कंपनियों ने मिल कर एल्डर फार्मा के ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को भी चूना लगाया।

इन दोनों ही कंपनियों ने इरादतन जालसाजी ‘बिजिनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट (बीटीए) 13 दिसंबर 2013 को किया। इस समझौते के पीछे मकसद था एल्डर का पूरा कामकाज अब टोरेंट देखेगी। यानी एल्डर सिर्फ ‘शेल’ कंपनी रह जाएगी जिसके पास न कोई चल-अचल संपत्ति होगी। यह सिर्फ एक ‘शेल’ कंपनी होगी जिस पर भारी -भरकम देनदारी होगी। परेशान हैं सी एंड एफ के 17 एजेंट जो एल्डर फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े थे और जिन्होंने 25 लाख से एक करोड़ रुपए उस कंपनी में ‘सिक्यूरिटी ‘ के बतौर जमा कराए थे। इनके तमाम सीएंडएफ समझौते 31 मार्च 2015 तक वैध थे।

बिजिनेस ट्रांस्फर एग्रीमेंट (बीटीए) जिसे टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड के साथ करने की जो तारीख थी उस दिन सीएंडएफ एजेंट में कई को एल्डर फार्मा से देनदारी लेनी थी। इसमें कमीशन, खर्च, ब्याज आदि कई चीजें थी। सीएंड एफ एजेंट का आरोप है कि बीटीए के अमल में आने के दिन (सीएंडएफ एजेंट) से ही उन्हें गलत राय दी गई और एल्डर फार्मा के अधिकारियों ने गलत सूचनाएं तो दीं, साथ ही एल्डर फार्मा के अफसरों ने भी बेबकूफ बनाया। ये कुछ ‘नोवेशन डीड’ पर अमल कर रहे थे जिनके आधार पर इस कंपनी का विलय टोरेंट से हो रहा था, और वे टोरेंट के सीएंड एफ एजेंट हो रहे थे।

लेकिन न तो कभी बीटीए की शर्ते सीएंडएफ को बताई गईं, और न उन्होंने वही माना जो एल्डर फार्मा के अधिकारियों ने बताया। दोनों कंपनियां बीटीए के तहत 13 दिसंबर 2013 को एक हुई और 29 जून 2014 को बिजिनस ट्रांसफर हुआ 2004 करोड़ रुपए का। इसके साथ ही सीएंडएफ एजेंट इस उम्मीद में इंतजार करते रहे कि टोरेंट फार्मा के साथ नोवेशन डीड पर अमल हो जाएगा। सभी 17 सीएंडएफ एजेंट को नोवेशन डीड दी गई(जिस पर टोरेंट को अमल करना था) एल्डर फार्मा की ओर से जिन पर सभी सीएंडएफ एजेंट ने दस्तखत किए और इस पर अमल के लिए उसे टोरेंट को सौंप दिया।

कंप्टीशन कमीशन ऑफ इंडिया के सामने अपने एकपक्षीय प्रतिनिधित्व से टोरेंट ने कमीशन की मंजूरी बिजिनेस ट्रांस्फर (काबिनेशन) की ले ली थी। सीएंडएफ एजेंट का आरोप है कि टोरेंट ने गलत प्रतिनिधित्व कम्पटीशन कमीशन के सामने रखा और जालसाजी करके कंप्टीशन कमीशन से बिजिनेस ट्रांस्फर करने का आदेश जारी कराया।

सीएंडएफ एजेंट गलतफहमी में रहे और एल्डर फार्मा के पास अपने बाकाया के लिए दौड़ लगाते रहे। इस संबंध में उन्होंने मध्यस्तथा कार्रवाई शुरू की साथ ही दूसरी सहायक कार्रवाई भी एल्डर के खिलाफ शुरू कीं। बंबई हाईकोर्ट ने एक आदेश पास किया जिसके तहत एल्डर को सीएंडएफ एजेंट के खिलाफ बन रही कुल राशि की बैंक गारंटी बनाने को कहा गया। एल्डर ने आरबिट्रेशन में कहा कि यह बकाया देनदारी है एल्डर फार्मा की। यह पहली बार था कि एल्डर ने यह संकेत दिया कि सीएंडएफ एजेंट की सारी देनदारी को अदा करने की जिम्मेदारी टोरेंट की ही है। जो बीटीए के पहले और समझौते के बाद हुई। आश्चर्य इस बात का है कि आरबिट्रल ट्रिब्यूनल के कई आदेशों के बावजूद एल्डर ने बीटीए की प्रति सीएंडएफ एजेंट को क्यों नहीं दी। इस उस बहाने से एल्डर फार्मा ने बीटीए की प्रति कभी सीएंडएफ एजेंटों को नहीं दी।

कथित तौर पर, शायद योजना के अनुरूप कुछ महीने बाद एल्डर फार्मा बंद हो गया और ‘लिक्विडेशन’ में चला गया। इसके साथ ही तमाम कानूनी प्रक्रिया जो सीएंडएफ एजेंटों ने शुरू की थीं वे ठहरा गईं।

सीएंडएफ एजेंट का दावा है कि अप्रैल 2018 तक सीएंडएफ एजेंट को यह भी नहीं पता था कि बीटीए की स्पष्ट शर्ते क्या है इससे नोवेशन डीड क्यों ज़रूरी है और एस्क्रो समझौता क्या है जिसके तहत बीटीए और दूसरे मध्यस्तथा दस्तावेजों को जानबूझ कर टोरेंट और एल्डर फार्मा ने छिपा क्यों रखा था? लेकिन सीएंडएफ एजेंट ने किसी तरह अप्रैल 2018 में बीटीए और दूसरे दस्तावेज हासिल कर लिया। तब टोरेंट की गैरकानूनी भूमिका और तौर-तरीका और साफ हुआ। पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि टोरेंट ने ‘स्लंप सेल बेसिस’ के आधार पर यह उद्योग लिया। साथ ही इस पर अब यह अनिवार्य कर्तव्य (मैंडेटरी ऑब्लीगेशन) है कि वह सीएंडएफ का लेनदेन 17 सीएंडएफ एजेंट के साथ जारी रखे और नोवेशन डीड को अमल में लाए जो बीटीए का हिस्सा है। यानी सभी इरादों के लिए यानी देनदारी देने के लिए भी टोरेंट ने एल्डर फार्मा के ही जूतों में अपने पांव रखे हैं और ‘मैंडेट ऑव लॉ’ के आधार पर उसे 17 सीएंडएफ एजेंटों की वैध देनदारी देनी ही है।

जैसा आरोप है टोरेंट का लुका-छिपी का खेल अब खत्म हो गया है, जब से सीएंडएफ एजेंट, बीटीए की तलाश में कामयाब हुए हैं और अब टोरेंट सेवा शर्तों से नहीं माना। इसके तहत अदालत की व्यवस्था है कि यदि किसी ‘अनसिक्योर्ड क्रेडिटर’ का पैसा टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और एल्डर फार्मायूटिकल्स ने नहीं दिया तो संयुक्त तौर पर एस्क्रो एजेंट को वह धन अनसिक्योर्ड क्रेडिटर को अदा करना होगा। सीएंडएफ ऐजेंटों के मामले में हाईकोर्ट ने यह साफ आदेश जारी किया कि ‘बैंक गारंटी’ बना कर टोरेंट इसे दे।

वे हर हाल बीटीए की शर्ते और दूसरी ऐसीलरी समझौतों के चलते टोरेंट ने उस आदेश पर अमल नहीं किया। बीटीए की जानकारी मिलने के बाद सीएंडएफ एजेंटों ने यह भी पता कर लिया कि टोरेंट ने एक जाली कॉपी नोवेशन डीड की बनाई और कम्पटीशन में दी। यह नोवेशन डीड काफी हद तक अलग है उससे जो सीएंडएफ एजेंटों का मिली थी। ऐसा माना जाता है कि टोरेंट ने ऐसा इसलिए किया जिससे कंप्टीशन कमीशन ऑफ इंडिया से एक सकारात्मक आदेश हासिल हो जाए।

सीएंडएफ एजेंट मानते हैं कि उन्होंने अभी एक सिरा भर ढूंढा है भ्रष्टाचार और जाली कामों जो दोनों कंपनियों कर रही थीं। ये धोखाधड़ी कर रही थीं उन तमाम फर्म और कंपनियों के साथ जो एल्डर के क्रेडिटर थे और जिन्हें एल्डर से टोरेंट में व्यापार के बदली होने तक कोई जानकारी न तो शुरू में और न उस दौरान ही कभी मिली।

सीएंडएफ एजेंट मानते हैं कि इस सारे मामले की जांच सीबीआई, एसएफआईओ या ईओडब्लयू करे जिससे सारे गोलमाल और उसके तौर तरीकों का पता चले। जिसके तहत एक कंपनी अपना व्यापार दूसरी कंपनी को सौंप देती है। सीएंडएफ ने यह सवाल भी उठाया है जो जनता के लिए भी ज़रूरी है कि ‘क्या एक कंपनी को यह अनुमति है कि वह अपना व्यापार किसी और कंपनी को दे दे बिना अपनी देनदारी का हिसाब-किताब लिए और इसकी देनदारी इसके क्रेडिटर को पूरी तौर पर दिलाई जानी चाहिए या नहीं।

टोरेंट ने हमें जवाब दिया

तहलका ने टोरेंट फार्मास्यूटिकल लिमिटेड के सुधीर मेहता, समीर मेहता और अशोक मोदी को नौ जुलाई और 27 जुलाई 2018 को पत्र भेजे थे। इस पर कार्यकारी निदेशक जयेश देसाई ने जो जवाब दिया। उसके मुख्य हिस्से –

एल्डर ने कई सीएंडएफ एजेंटस की नियुक्ति फार्मास्यूटिकल फारम्यूलेशंस के वितरण के लिए की थी। इन एजेंटस का यह आरोप है कि उनका कमीशन, सिक्यूरिटी डिपॉजिट आदि एल्डर ने नहीं दिया।

यह साफ है कि बिजिनेस ट्रांस्फर एग्रीमेंट (बीटीए) और उससे जुड़े नोवेशन डीड के तहत सीएंडएफ एजेंट के तमाम बकाए का समाधान एल्डर को समझौते की आखिरी तारीख 29 जून 2014 तक करना था। उसे टोरेंट के जिम्मे नहीं किया जा सकता। यह ध्यान दें कि सीएंडएफ एजेंट का समझौता पूरी तरह से एल्डर के ही साथ हुआ था। सीएंडएफ या एल्डर ने भी अपनी कानूनी कार्रवाई में कभी टोरेंट को नहीं जोड़ा और न ही यह कहा कि टोरेंट फार्मा की इसकी कोई जिम्मेदारी ही है।

इसी तरह एस्क्रो एकाउंट के तहत बंबई हाईकोर्ट के आदेश के तहत आए आदेश के संबंध में उल्लेखनीय है कि यह एक अलग आदेश था उन सपेसिफाइड अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स के दावों पर न कि सभी अनसिक्योर्ड क्रेडिटर्स पर। इस संबंध में एल्डर का पत्र न तो प्रासंगिक है और न एस्क्रो समझौते की शर्तों के ही तहत है।

हमारे 31 जुलाई 2018 के मेल के जवाब में आया जवाब है-

 नोवेशन डीड का मसविदा बीटीए का ही हिस्सा है।

 बीटीए की शर्तों के तहत, एल्डर के लिए ज़रूरी था कि वह नोवेशन डीड पर सीएफए के दस्तखत एक निश्चित तारीख तक करा ले। चूंकि वह शर्त मानी नहीं गई। हमने उस पर फिर जोर नहीं दिया।

‘तहलका’ ने 13 दिसंबर 2013 को एक पत्र टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स को स्कैन कर बीटीए का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भेजा था। इस पर टोरेंट और एल्डर दोनों के ही दस्तखत थे। टोरेंंट के जयेश देसाई न इस पर जवाब दिया-

हमें उस पत्र की जानकारी है। विक्रेता की ओर से कुछ करार ज़रूरी थे। जिनकी जानकारी हमने आप के दूसरे नंबर के सवाल का जवाब देते हुए दे दी है।

कौन बचा रहा है ‘बलात्कारी’ बिशप को?

बिशप फ्रांको मुलाक्कल के खिलाफ गली-गली में नन जलूस निकाल रही हैं कि कौन कथित बलात्कारी को बचा रहा है। काफी पहले यानी 28 जून को जलंधर के कैथोलिक बिशप के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज हुई थी। जब मिशनरीज ऑफ जीसस की एक नन ने उस बिशप पर आरोप लगाया था कि बिशप ने उसके साथ 2014 से 2016 तक तेरह बार बलात्कार किया।

अभी हाल में वेटिकन के भारतीय प्रतिनिधि को भेजे गए पत्र में नन ने लिखा है कि बिशप अब अपना सारा पैसा और ताकत लगा कर इस मामले को खत्म करने में जुटे हैं। वे इन आरोपों से बचने में यह सब खर्च कर रहे हैं। दुखद यह है कि 80 दिन बाद भी आरोपी गिरफ्तार नहीं किया जा सका है और अब 19 सितंबर को उसे केरल में पुलिस के सामने बुलाया जा सकता है।

बलात्कार की शिकार नन का आरोप है कि उसे दिल्ली के आर्क बिशप अनिल कोटो और जार्ज एलेनकेरी जो कोच्चि में सीरियो मला बार चर्च के अध्यक्ष हैं उनको भी शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ। दरअसल बिशप मुलाक्कल पीडि़ता पर लांछन लगाते रहे और राष्ट्रीय टीवी चैनेल और अखबारों में यह दावा करते रहे कि उनके खिलाफ बलात्कार की शिकायत सिर्फ बदला लेने की भावना के चलते है। वे बलात्कार की शिकार महिला के खिलाफ आरोप लगाते रहे और उसकी इज्जत को मटियामेट करते रहे।

सून्जार के एक बड़बोले विधायक पीसी जार्ज ने तो नन को ‘वेश्या’ कहा जिसने ’12 बार तो आनंद लिया और तेरहवीं बार उसे बलात्कार’ बताया। कानून बनाने वाले विधायक ने यह तक कहा कि ‘यदि यह बलात्कार था तो उसने पहली ही बार शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई?’

मिशनरीज ऑफ जीसस कांग्रिगेंशन ने भी नन का समर्थन करने की बजाए बिशप का समर्थन किया और आरोप लगाया कि उस नन के एक स्थानीय टैक्सी ड्राइवर और एक संबंधी के पति से भी आपत्तिजनक संबंध थे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि नन बिशप मुलाक्कल के साथ एक आयोजन में भी शामिल हुई।

बलात्कार की यह शिकायत सिर्फ एक नन की नहीं बल्कि चार और नन की भी है जो उसके समर्थन में आ खड़ी हुई हैं और केरल में चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई। जहां एक नन ने आरोप लगाया कि बिशप ने उसके साथ तेरह बार बलात्कार किया है। वहीं दूसरी नन ने कहा कि बिशप ने उसके साथ छेड़छाड़ की।

तीसरी नन ने कहा कि बिशप ने अपने पद का दुरूपयोग किया जबकि चौथी नन ने आरोप लगाया कि बिशप ने उसे जबरन आलिंगन में लिया। पांचवीं नन ने कार्डिनाल को इस बिशप के बारे में लिखा भी। आज चर्च विश्वसनीयता के दौर से गुजर रहा है। यह एक स्पष्ट मामला है जहां नन का अपना ही संस्थान उसे बदनाम कर रहा है। मान भी लें कि यदि बिशप बेगुनाह है तो वह क्यों नहीं इस्तीफा देता और जांच में सहयोग करता।

क्या बिशप कानून से ऊपर है? हम पुलिस की बात न भी करें, तो चर्च ने भी कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया है। इससे जाहिर है कि इसने अपनी विश्वसनीयता को अपवाद के दायरे में डाल दिया है। इसे इस विवाद में खरा उतरना ही होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो लोगों का भरोसा धार्मिक संस्थाओं पर से उठ जाएगा। सच्चाई का यही मौका है कैथोलिक चर्च के सामने।

केंद्र पेट्रोल-डीज़ल के दाम कम नहीं करेगा राज्य सरकारें करें तो करें

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में रोज़ उछाल पर छिटपुट घटनाओं को छोड़कर भारत बंद सफल रहा। बंगाल, तेलंगाना, चंडीगढ़ में ज़रूर बंद कामयाब नहीं रहा। कैलाश मान सरोवर तीर्थयात्रा से लौटे कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने वहां से लाए जल को राजघाट पर गांधी समाधि पर चढ़ाया फिर वहीं भारत बंद की घोषणा की। उन्होंने रोज पेट्रोल -डीजल के दाम में बढ़ोतरी, महंगाई, नोटबंदी, जीएसटी से रोज़गार छिनने, छोटे उद्योग धंधों के बंद होने, बैंकों से भारी घपलों किसान आदि के लिए नरेंद्र मोदी की चार साल की सरकार को जम कर कोसा। राजघाट से एक किलोमीटर दूर इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंप तक गए। वहां उन्होंने तीन घंटे धरना दिया।

कांग्रेस के नेतृत्व में तकरीबन 21 पार्टियों ने ‘भारत बंद’ (दस सितंबर) को कामयाब बनाया। यह ज़रूर है कि तृणमूल बहुजन समाज और समाजवादी पार्टी इस बंद में शामिल होने से हिचकते रहे। वामपंथी नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया। उधर केंद्र सरकार ने यह साफ कर दिया है वह पेट्रोल-डीजल के दामों में कोई कटौती नहीं करेगी। भले राज्य सरकारें इसमें अपनी ओर से कमी करें। याद रहे केरल सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार ने एक रु पए प्रति लीटर कटौती घोषित की है।

कर्नाटक में सरकारी बसें नहीं चलीं। महाराष्ट्र में नवनिर्माण सेना के एक गुट ने पुणे में म्यूनिसिपल कारपोरेशन की एक बस के साथ तोड़ फोड़ की। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र केरल में सरकारी बसें नहीं चलीं। सड़कों पर शांति थी। दुकानों, बाजारों और कार्यालयों में बंद था।

बिहार के कई हिस्सों में राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथी दलों की अपील पर बंद कामयाब रहा। पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में बंद बहुत कामयाब नहीं रहा। इस ‘भारत बंद’ का सबसे व्यापक असर यह ज़रूर दिखा कि पूरी सरकारी व्यवस्था के बाद भी बड़ी तादाद में लोगों ने अपनी गाडिय़ां बाहर न निकाल ‘भारत बंद’ का समर्थन किया।

चुनाव में विपक्ष कोई चुनौती नहीं: मोदी

अजय भारत, अटल भाजपा’। यह नारा पीएम नरेंद्र मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रविवार को दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद भाजपा अटलजी के नाम के प्रति सम्भवता इसलिए भी ज्यादा आकर्षित हुई है क्योंकि देश ने जिस तरह अटल के जाने का शोक जताया वह अभूतपूर्व था। एक रोज पहले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ‘अजय भाजपा’ का नारा कार्यकारिणी में दिया था और मोदी ने इसमें कुछ फेरबदल कर दिया। जाहिर है भाजपा में अंतिम आवाज मोदी हैं और नारे गढऩे में उनका कोई सानी नहीं।

मोदी ने कार्यकारिणी में कांग्रेस और विपक्ष को कमजोर बताया और कहा कि इस चुनाव में उनके लिए कोर्ई चुनौती ही नहीं है। भाजपा के खिलाफ बन रहे साझे विपक्ष पर हमला करते हुए मोदी ने कहा – ‘महागठबंधन में नेतृत्व का पता नहीं, नीति अस्पष्ट है और नीयत भ्रष्ट है।’ जाहिर है मोदी भाजपा के बीच तो अपने नेतृत्व के प्रति आश्वस्त हैं हीं, उन्हें यह भी पक्का भरोसा है कि देश में उनके नेतृत्व का कोई तोड़ नहीं! मोदी ने कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा कि वे अगले लोक सभा चुनाव में ‘किसी भी तरह की’ चुनौती नहीं देखते। लोकतंत्र में विपक्ष होना जरूरी है लेकिन जो सरकार चलाने में असफल रहें, वे विपक्ष की भूमिका में भी असफल रहे।

बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वित्तमंत्री अरुण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत अनेक मुख्यमंत्री, वरिष्ठ नेता मौजूद थे।

बैठक के आखिरी दिन कार्यकारिणी बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि 2022 तक देश से जातिवाद, संप्रदायवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म होगा। प्रस्ताव के मुताबिक केंद्र सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है और इसकी वजह से उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ रहा है। एनआरसी के मुद्दे पर भी चर्चा हुई जिसमें कहा गया कि घुसपैठियों के लिए देश में कोर्ई जगह नहीं है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के सिख, बौद्ध, क्रिश्चियन, हिंदू शरणार्थी अगर देश में आते हैं तो उनकी मदद की जाएगी।

इसकी जानकारी वरिष्ठ नेता प्रकाश जावड़ेकर ने प्रेस कांफ्रेंस में दी। उनके मुताबिक प्रस्ताव में  विश्वास जताया गया है कि न्यू-इंडिया का सपना पूरा होकर ही रहेगा। उन्होंने कहा कि विपक्ष सिर्फ नकारात्मकता की राजनीति में जुटा है।

जावड़ेकर ने बताया कि चार साल पहले एक कमजोर अपारदर्शी और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी जिसे मोदी सरकार ने सुधारों के जरिये मजबूत अर्थव्यवस्था में बदल दिया है। सुरक्षा के मोर्चे पर भी देश मजबूत हुआ है और जम्मू कश्मीर में सख्त कदम उठाने से आतंकवाद कमजोर हुआ है।

मोदी ने देश में राजनीतिक और आर्थिक माहौल बनाया- फोब्र्स पत्रिका

देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भारतीय उतरे हैं ‘सीढ़ी से’ । फोब्र्स पत्रिका मेें प्रकाशित गैलप सर्वे के अनुसार पूरे देश में भारतीयों की जि़ंदगी बहुत अच्छी नहीं रही फिर भी मोदी के साथ रही है।

यदि औसत देखें तो 2017 में यह 4.0 स्तर पर 0 से 10 की माप पर थी जो 2014 में 4.4 पीछे है।

गैलप सर्वे के अनुसार जब से मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय संभाला तब से उन भारतीयों की तादाद इतनी घटी है जो जि़ंदगी बहुत खुशनुमा नहीं मानते। सिर्फ तीन फीसद भारतीय 2017 में अपनी जि़ंदगी को खुशहाल बता सके। जबकि 2014 में ये चौदह फीसद थे।

सर्वे में जो जानकारी मिली है वह एकदम अलग ही है। भारतीय सकल घरेलू उत्पाद सालाना 8.2 फीसद की दर पर रहा। यह 2016 की पहली तिमाही में था। यह सबसे ज्य़ादा विकास दर है।

भारत का इक्विटी बाजार पिछले पांच साल में 70 फीसद हो गया। इसने मार्केट इंडेक्स को खासा पीछे छोड़ दिया। (स्रोत: 09.07.18 फाइनेंस.याहू.कॉम)

भारत की आर्थिक विकास और इक्विटी बाजार भारतीयों में आज भी लोकप्रिय नहीं है। भारत में सिर्फ लिविंग वेज वाले परिवार खुश नहीं दिखते जिनकी मासिक आमदनी रु पए 17300-17400 मात्र है। हुनरमंद मज़दूर की आमदनी 2017 में घट कर रु पए 10300 मात्र रह गई। जबकि 2014 में यह रु पए 13300 मात्र थी।

देश की जनता के लिए भारतीय आर्थिक और वित्तीय बाजार में मोदी के लिए अच्छी खबर नहीं है। फिर भी देश की जनता मोदी के काम से खुश है। अभी उन्होंने कहा कि वे फिर जीतेंगे और ज्य़ादा संसदीय सीटें अगले साल के चुनाव में लाएंगे। गैलप सर्व के अनुसार, स्टीव क्रैबररी ने बताया कि भारतीयों की लाइफरेटिंग घटी है इसलिए उनका मोदी को समर्थन घटने की बजाए बढ़ा है। भारतीयों में उन्यासी फीसद भारतीय कहते हैं कि वे जो काम कर रहे हैं उससे वे संतुष्ट है। मोदी प्रशंसकों की यह तादाद 2014 में उनके सत्ता संभालने की तुलना में कहीं ज्य़ादा है। इसकी वजह यह नहीं है कि वे बड़ा काम कर रहे थे या कि विपक्ष कमज़ोर है।

यह सही है कि मोदी ने देश में राजनीतिक और मैक्रोइकॉनॉमिक माहौल तो बनाया है। कर प्रणाली दुरु स्त की हैं। विमुद्रीकरण से भ्रष्टाचार भी कुछ कम किया है। देश में व्यापारिक माहौल बनाया है और मंहगाई कम की है।

इस कारण भारत 2017 में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। यह बात वल्र्ड बैंक विश्व बैंक ने भी ग्लोबल इकॉनॉमिक प्रोस्पेक्ट में मानी है। विश्व बैंक की 2017 की रेकिंग में भारत जहां पिछले साल 130वे स्थान पर था। आज वह 100वें स्थान पर आ गया।

नीतीश बाबू क्या रोक पाएंगे राज्य में उन्माद

एक जमाना था बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुशासन बाबू कहलाते थे। अब तो प्रदेश में शराब बंदी संशोधित हो गई। पड़ोसी राज्यों की तरह उन्माद की घटनाएं भी बढऩे लगी। जैसे देश में भाजपा राहुल और कांग्रेस मुक्ति का जेहाद छेड़े है उसी तरक बिहार में भी विपक्ष मुक्त की हवा बनाई जा रही है। महिलाओं पर अत्याचार, उन्माद के चलते तीन जि़लों में मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं हो चुकी हैं।

मुख्यमंत्री बीमार थे। अचानक बाहर सितंबर को उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था पर बैठक की। जो पुलिस के आला अफसर नहीं पहुंच पाए उनके लिए वीडियों कांफ्रेंस हुआ। यह निर्देश दिया गया कि थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी अपने क्षेत्र की कानून व्यवस्था का जायजा लेंगे और कार्रवाई करेंगे। मामला गंभीर होने पर जिलाधिकारी को रपट देंगे। अब मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया है कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और मॉब लिंचिग के मामलो पर कार्रवाई हो।

जब पुलिस महानिदेशक एस द्विवेदी ने पद भार संभाला था तब उन्होंने भी यही कहा था। लेकिन थानों ने नहीं सुना। बैठक में खुला कि रोहतास, सीतामढ़ी और बेगूसराय में ज़्यादा मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर रोक लगे और दूसरे जि़लों में ज़्यादा सावधानी बरती जाएगी। यह जानकारी भी आई कि ज़मीन के विवाद के चलते हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। साथ ही सांप्रदाियक हिंसा के लिए जिम्मेदार जनता के प्रतिनिधि, विधायक, और मंत्री से जुड़े लोगों को कतई बख्शा न जाए।

गौरतलब है कि नवादा में सांप्रदायिक हिंसा की घटना में गिरफ्तार कथित अभियुक्तों से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने मुलाकात की थी। ऐसी ही एक घटना में केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने कथित अभियुक्तों को माला पहना कर सम्मान किया था। ऐसी घटनाओं से समाज में संशय और विवाद बढ़ा है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अस्वस्थ हो जाने की वजह से अपराध समीक्षा बैठक टल गई। बैठक कब होगी, इसके बारे मेें अभी तक कुछ तय नहीं है। राज्य में लगातार हो रही अपराध की घटनाओं से आम लोगों की अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। अपराध की घटनाएंं, खासकर महिलाओं के साथ होने वाली अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं, वे यह भी मानने लगे हैं। लेकिन पुलिस अधिकारियों का दावा अपराध की कई घटनाएं घटने का है। इस राज्य मेें भीड़ द्वारा किसी की हत्या करने की घटनाएं नहीं होती थी। लेकिन अब इसकी भी शुरुआत हो गई है हालांकि पुलिस प्रशसान इसे अपराधियों द्वारा हत्या बताने में जुटी है। अपराध के मद्देनज़र लोगों का पुलिस प्रशासन और सरकार पर भरोसा खत्म होता जा रहा है। लोगों को इस पर भी अचरज है कि नीतीश कुमार अपराध और अपराधियों पर काबू पाने में क्यों विफल हो रहे हैं। बारह साल पहले सत्ता के आने के शुरू में उन्होंने अपराधियों पर बखूबी नकेल कसा था। अपराध एकाएक घटे थे। जो बड़े-बड़े अपराधी किसी तरह अदालती सजा से बच गए थे, उनके मामलों को फिर से खुलवाया गया था और उन्हें सजा मिली थी। लोगों को उन पर और पुलिस प्रशासन पर नाज होने लगा था। नीतीश कुमार ने यह दिखा दिया था कि अपराधियों पर कैसे नकेल कसी जा सकता है और कानून का राज कायम हो सकता है।

कुछ खबरों पर नज़र डालिए। बेगूसराय मेें सात सितंबर को भीड़ ने तीन युवकों को पीट कर मार डाला। बताया गया कि युवकों ने एक युवती का अपहरण करने की कोशिश की। इसलिए भीड़ ने उन्हें पीट-पीट कर मार डाला। 8 सितंबर को सासाराम में एक महिला को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। उसे जादू-टोना करने वाली महिला बताया गया। 10 सितंबर को सीतामढ़ी के रीगा में एक बाइक सवार युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इसके पीछे राहजनी की घटना बताई जा रही है। 11 सिंतबर को सासाराम में ही एक कर्मचारी को गोली से भून दिया गया जब वह बैंक जा रहा था। बिहिया में एक महिला को नंगा कर घुमाया गया था, इस घटना को लोग भूल नहीं पाए हैं। बैक डकैती की घटनाएं आम घटनाओं की तरह होने लगी है। रेल में चोरी, डकैती की घटनाएं इतनी होने लगी हैं कि बिहार से गुज़रते वक्त यात्री सहमे रहते हैं। डिब्बे से यात्रियों को फेंक देने की घटनाएं आम हो गई हैं। अव्वल तो ऐसी घटनाओं को दर्ज ही नहीं करती। दूसरे लोग भी डर से थाने नहीं जाते।

मुजफ्फरपुर बाला सुधार गृह के कांड की चर्चा अभी थमी नहीं है। पटना के भी सुधार गृह की घटना पर चर्चा चल ही रही है। मौजूदा साल के जून तक महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या सात हज़ार 683 है। इनमें बलात्कार की एक हज़ार 862, अपहरण की दो हज़ार 390, हत्या की 575, दहेज प्रताडऩा की एक हज़ार 535, छेडख़ानी की 890 प्रताडऩा की एक हज़ार 611 घटनाएं हैं। पिछले साल महिलाओं के साथ हुई घटनाओं की संख्या 15 हजार 784 है। बलात्कार की एक हजार 199, अपहरण की छह हजार

817 दहेज हत्या की एक हजार 81, प्रताडऩा की चार हजार 873 और छेडख़ानी की एक हजार 814 घटनाएं हैं। इससे आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपराध के मामले में राज्य की क्या स्थिति है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद गृह विभाग को देखते हैं। वे शुरू में जब सत्ता में आए थे, तो अपराधी-राजनीतिक नेताओं-सरकारी अधिकारियो के गठजोड़ पर कसके प्रहार किया था। उसका अच्छा नतीजा भी निकला। तमाम छोटे-बड़े अपराधी पकड़े गए। कुछ अपराधी राज्य छोड़ कर किसी दूसरे राज्य मेें चले गए। पुलिस प्रशासन को राजद नेता शाहबुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई करने में कामयाबी मिली। भागलपुर सांप्रदायिक दंगों में जिन अभियुक्तों को सज़ा नहीं मिल पाई थी, उनके मामले पर फिर से विचार हुआ और उन्हें सज़ा मिली। नीतीश कुमार ने अपराधियों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण पर रोक लगवाई। यह भी उपाय किए गए कि अपराधी किसी पुलिस अधिकारी का भी आशीर्वाद प्राप्त न कर सके। अपराधियों और उनके मददगारों के खिलाफ ऐसा माहौल तैयार हुआ। लोगों में, खास कर महिलाओं में उनका खौफ खत्म हुआ था। पटना के डाक बंगाल चौराहे पर देर रात तक महिलाएं खरीदारी और तफरी करती दिखती थीं। नीतीश कुमार जब अपराध और अपराधियों पर काबू पाने की अपनी कामयाबी बावत इस बात का जि़क्रकरते थे, तो लोगों को उनकी बातों पर केवल विश्वास ही नहीं होता था बल्कि उनके प्रति आस्था भी जागती थी। लेकिन जब नीतीश कुमार का पहला शासनकाल समाप्त हुआ और दूसरा शासनकाल शुरू हुआ, उसमें स्थिति बदलने लगी। तीसरी बार सत्ता में आने के बाद राजद राज की स्थिति जैसी स्थिति वापस लौटती दिखती है।

नीतीश कुमार कानून के राज के बारे में पहले जैसा नहीं बोलते, यों कहें जिक्र तक नहीं करते। अब यह कहने लगे हैं कि अपराध तो होते रहता है। अपराध नहीं होगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन अपराध कर अपराधी बच नहीं सकता। उसे पकड़ा जाएगा और सज़ा मिलेगी।

दूसरे मंत्री यह तर्क देते फिर रहे हैं कि दूसरे राज्यों की तुलना में इस राज्य में अपराध कम ही हो रहे हैं। इस मामले में इस राज्य का स्थान बहुत नीचे 17वां है। लेकिन उनके पास इसका कोई जबाव नहीं है कि नीतीश कुमार के शासनकाल के शुरू में जो अच्छी स्थिति थी, वैसी स्थिति अभी क्यों नहीं है।

विरोधी पार्टियों को राज्य की कानून व्यवस्था को लेकर नीतीश कुमार और सरकार पर भारी पडऩे का मौका मिल रहा है। राजद और विपक्षी दल के नेता तेजस्वी यादव ने तो अपराध को एक बड़ा मुद्दा बना कर अपनी गतिविधियां तेज भी की है। भाकपा (माले) ने अपने आंदोलन का इसे बड़ा मुद्दा बनाया है।

जानकार राज्य में अपराध के बढ़ते जाने के पीछे यह बताते हैं कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा है। अपराधी पुलिस अधिकारियों से भी संबंध बनाने लगे हैं। फिर अपराधी, राजनीतिक नेता और पुलिस का गठजोड़ बनने लगा है। अपराधी खुले आम घूमने लगे हैं और अपना-अपना इलाका तय करने लगे हैं। जेलों में रह रहे अपराधियों की गतिविधियां तेज हुई हैं। वे जेल में बैठे अपने गिरोह का संचालन करने लग गए हैं। ऐसी कोई भी जेल नहीं है जहां अपराधियों के पास मोबाइल फोन न हो। उनके गिरोह के अपराधी उनसे मिलते जुलते न हों। सूबे में शराबबंदी की वजह से अपराधियों को अवैध शराब बेचने का नया धंधा मिल गया है। अपराधियों को थाने में बढ़े भ्रष्टाचार से भी शह मिली है।

तेलंगाना ने किया चुनाव का शंखनाद

तेलंगाना में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने सिर्फ अपनी भावी विजय का शंखनाद किया है। उन्हें भरोसा है कि वे पहले की तुलना में ज़्यादा वोट से जीतंगे। भारी जीत के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होंगे और उनके पुत्र और पुत्री तेलंगाना में सुशासन कायम रखेंगे। जिन्हें वे लगातार प्रशिक्षित करते रहे हैं भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में टीआरएस का मज़बूत मुकाबला करेगें। जबकि नायडु की टीडीपी कांग्रेस के साथ मैदान में उतरेगी। राजनीति के कांग्रेस के स्कूल से निकले केसीआर कांग्रेस और भाजपा दोनों की रणनीति बहुत बढिय़ा जानते समझते हैं। उन्होंने इस महीने के शुरू में ही ‘मदर ऑफ ऑल रैल्ी’ का भव्य आयोजन किसा। इसमें भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि उनके राज्य में कहीं सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई है। उन्होंने हैदराबाद को और भी सुविधासंपन्न बनाने की बात कही और राज्य में अपनी सरकार द्वारा समाज के सभी वर्गों के लिए किए गए तमाम काम गिनाए। उन्होंने कहा कि जनता का उन्हें प्रेम मिला है इसलिए वे फिर जीतेंगे।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को उन्होंने ‘बफून’ भी बताया। जिस पर कांग्रेस ने उन्हें अंहकारी कहा। केसीआर के इस फैसले से राज्य में भाजपा की भी हवा सरकी हुई है। पिछली विधानसभा में उनके पांच विधायक थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तेलंगाना में अगली सरकार भाजपा की बनवाने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को मैदान में सक्रिय कर दिया है।

केसीआर की खासियत यह है कि वे अच्छे लेखक भी हैं। खुद को कभी वे वामपंथी कहते थे फिर वे कांग्रेस में और भाजपा के करीब पहुंचे। अब वे अपनी पार्टी के जोर से तेलंगाना में सरकार बनाने में जुटे हैं। राज्य पाल ने उनका और मंत्रिमंडल का इस्तीफा मंजूर कर लिया है और उन्हें केयरटेकर मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त कर दिया है।