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आम लोगों के लिए मुसीबत बनी बड़ी जल परियोजनाएं

उत्तराखंड में यमुना पर लखवाड़ व्यासी परियोजना पर 6 राज्यों ने अपनी स्वीकृति दे दी है। जल संसाधन मंत्रालय के अंशकालिक मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि गंगा नमामि गंगा योजना के तहत यमुना को साफ रखने के लिए 24 योजनाएं हैं। जिसमें 12 मैदानी क्षेत्र में बनेंगी। लगभग चार हजार करोड़ लागत वाली इस परियोजना से तीन सौ मेगावाट बिजली उत्पादन होगा। बिजली पर पूरा अधिकार उत्तराखंड का होगा जबकि पानी छह राज्यों-उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच बांटा जाएगा। परियोजना के तहत 204 मीटर ऊंचा बांध बनाया जाएगा। 1976 में योजना आयोग की मंजूरी और 1986 में पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद 1987 में जेपी समूह ने उत्तर प्रदेश ंिसंचाई विभाग के पर्यवेक्षण में 204 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण शुरू किया। 1992 में जेपी समूह पैसा न मिलने को लेकर परियोजना से अलग हो गया। 2008 में केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया, जिसके तहत 90 फीसद धन केंद्र सरकार खर्च करेगी और बाकी दस फीसद राज्य करेंगे। 300 मेगावाट बिजली को इससे अलग रखा गया। यमुना पर महाकाय बांधों में 214 मीटर ऊंचा किसाउ बांध भी प्रस्तावित है।

कुमांउ क्षेत्र में भारत व नेपाल के बीच बहने वाली महाकाली नदी पर 315 मीटर उंचा पंचेश्वर बांध और 95 मीटर उंचा रुपाली गाड बांध को बहुउद्देशीय परियोजना बनाए जाने का प्रस्ताव है। इस परियोजना की जनसुनवाई में पर्यावरणीय कानूनों, लोगों की जानकारी के मौलिक अधिकार व न्यूनतम जनतांत्रिक अधिकारों को तिलांजलि दे दी गई। सामाजिक आकलन की प्रक्रिया के लिए गांवों में समिति बनाने और खुली बैठक करने की प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया। फिर भारत और नेपाल के बीच भी बहुत सारे पेच फंसे हैं। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी पूरी नहीं हो पाई है। जनसुनवाई के बाद रूपाली गाड परियोजना के बांध स्थल की जगह दो किलोमीटर बदल दी गई।

बड़ी बांध परियोजनाओं से देश को बहुत ज़्यादा फायदा देने के दावे किये गये हैं। इसी साल जून में यमुना की सहायक टौंस नदी और उसकी सहायक सुपिन नामक छोटी सी नदी पर 44 मेगावाट के बांध की जनसुनवाई 12 जून, 2018 को आयोजित की गई। जहां मात्र आंकड़ों के अनुसार पांच गांव की ज़मीन ही प्रभावित दिखाई गई। इसकी पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंधन योजना और सामाजिक आकलन रिपोर्ट 650 पन्नों की है। बांध कंपनी और सरकार ओर से वही किया गया जो पंचेश्वर परियोजना में किया गया था। किंतु यहां लोगों के सख्त विरोध के कारण जनसुनवाई नहीं हो पाई। कई अन्य बांध परियोजनाओं में भी यही किया गया। किसी तरह जनसुनवाई कर ली गई और बाद में लोग परेशान हैं पुनर्वास और पर्यावरण की समस्याओं को लेकर।

उत्तराखंड में जो भी मुख्यमंत्री आता है उसकी प्राथमिकता किसी तरह बांधों के मुद्दे पर ही आगे बढऩे की रही है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने भी उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए सत्तासीन होने के तुरंत बाद लखवाड़ व्यासी परियोजना और अन्य परियोजनाओं पर केन्द्र से बात की। पिंडर नदी पर प्रस्तावित है 252 मेगावाट का देवसारी बांध, इसमें पांच मेगावाट की एक जलविद्युत परियोजना डूब रही है।

सभी मुख्यमंत्री, सभी सांसद व विधायक बड़े बांधों की पैरवी कर रहे हैं। किंतु जल विद्युत परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय और जनहित के सवालों को सुलझाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव नजर आता है।

किसी भी बांध परियोजना में न तो पर्यावरणीय नियम कानूनों का पालन किया जा रहा है न ही बन चुकी परियोजनाओं की लंबित समस्याओं के समाधान के लिए कोई गंभीर प्रयास नज़र आता है। गंगा घाटी में चल रही लगभग दस बड़ी और 46 परियोजनाओं की यही स्थिति है।

हाल ही में राज्य की ऊर्जा सचिव ने यह कहा है कि राज्य को 1,000 करोड़ की बिजली खरीदनी पड़ रही है। जिसके लिए नए बड़े बांधों की आवश्यकता को सही सिद्ध किया जा रहा है। किन्तु पुराने बांधों की समस्याओं के समाधान पर क्यों कोई बात ही नही करना चाहता?

टिहरी बांध से जुड़े प्रश्नों की सूची ही बहुत लंबी है जिनमें से कुछ ज्वलंत सवाल सामने है। भागीरथी और भिलंगना नदी के 10 पुल टिहरी बांध की झील में डूबे जिसके बदले में चार पुल बनने थे। जो 12 वर्ष के बाद भी अभी तक पूरे क्यों नहीं हुए? सरकार को बताना होगा 2005 से टिहरी बांध का काम चालू हो गया था। पुनर्वास पूरा न होने के कारण 2017 नवंबर में बांध के जलाशय को 815 मीटर की ऊंचाई तक ही रखने का फैसला किया गया यानी 815 मीटर के बीच के लोगों का भविष्य अनिश्चित और असुरक्षित कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल शपथ पत्र के अनुसार 418 लोगों को भूमि आधारित पुनर्वास क्यों नहीं दिया? बांध जलाशय के दोनों तरफ के लगभग 40 से ज़्यादा गांव नीचे धसक रहे हंै जिन गंावों में मकान गिर गए, भूस्खलन हुआ, उनका मुआवजा भी अभी तक क्यों नही दियां? टिहरी बांध की झील में तार बाड़ न होने के कारण कितने ही लोग और मवेशी मारे गए हैं। टिहरी बांध जलाशय के ऊपर हरित पट्टी का पता नहीं। इन गांवों के लिए प्रस्तावित सम्पाषर्विक नीति पर आगे काम क्यों नहीं बढ़ा? जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी जिम्मेदारी केंद्र, राज्य सरकारों व पुनर्वास निदेशक पर डाली है। हरिद्वार के पुनर्वास स्थलों के हजारों विस्थापितों को आज तक भूमिधर अधिकार क्यों नहीं दिया गया? जबकि 2003 में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र देकर यह अधिकार तुरंत देने की बात कही थी।

ज़्यादातर ग्रामीण पुनर्वास स्थलों पर जैसे सुमननगर और शिवालिक नगर में बहुत कम लोग बचे हैं। सुमननगर में पानी की समस्या है, शिवालिक नगर के विस्थापितों ने अपनी सारी ज़मीनें बेच दी है चूँकि वहां मूलभूत सुविधायें नहीं थी। यहंा रहने वाले प्रभावित वापस चले गए। यानी समाज पूरी तरह से बिखर गया। ये शब्द पूरी स्थिति नहीं कह पा रहे हैं। क्योंकि समाज का बिखरना इतनी आसानी से लोगो को समझ में नहीं आ पाता।

टिहरी बांध से व्यापारियों खास कर ग्रामीण व्यापारियों की स्थिति बहुत खऱाब हुई। उनका आकलन सही नहीं हो पाया था और जहाँ पर उनकों पुनर्वास दिया गया और दुकानें दी गयी, वे दुकानें चलने जैसी स्थिति में नहीं थी। टिहरी बांध विस्थापित क्षेत्र 45 किलोमीटर भागीरथी घाटी में और 25 किलोमीटर भिलंगना घाटी में है। भागीरथी घाटी का छाम बाजार व भिलंगना घाटी का घोंटी बाजार पर 25-25 से ज़्यादा गांवों के आश्रित थे। इन बाजारों का काम चारधाम यात्रामार्ग से भी बहुत चलता था।

ग्रामीण व्यापारियों का सर्वे बहुत आंदोलनों के बाद हो पाया। मुआवज़ा भी सही से नही मिल पाया और दुकानें किसी को कहीं मिली तो किसी को कहीं मिली। इस लम्बी प्रक्रिया में लोगों ने अपनी आजीविका खो दी। जहां दुकानें मिली वहंा ग्राहक नहीं हैं। तो दुकानदार क्या करेंगे?

शहरी विस्थापन के लिये जो टिहरी शहर बसाया गया वहां पर भी 40 प्रतिशत ही पुरानी टिहरी शहर के लोग हंै। बाकी अलग-अलग जगह से आये। जो व्यापारी थे उनका व्यापार छूटा या बेच कर कहीं चले गए। लोगों को वापस बसने और व्यापार बसाने में भी एक लम्बा समय लग गया।

उत्तराखंड के दूसरे तमाम बांधों की समस्याओ का समाधान क्यों नहीं किया? मनेरी भाली एक और दो कि अनियमितताओं के कारण छह से ज्यादा लोग मारे गए हैं। एक मज़बूत निगरानी व्यवस्था की ज़रूरत है। श्रीनगर बांध में अलकनंदा नदी का पानी रोक दिया गया। बांध से शहर की ज़रूरत के लिए पानी की उचित व्यवस्था नहीं है। लोगों के मुआवजें रुके हुये है। अलकनंदा, भागीरथी और दूसरी नदियों में बांध कंपनियां पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करते हुए मलबा डाल रही हैं। एनजीटी के जुर्माना लगाने पर सरकार बांध कंपनियों के ही पक्ष में खड़ी नजर आती है। विष्णुप्रयाग बांध की सुरंग से प्रभावित चाई व थैंग गांव के लोगों का उचित पुनर्वास क्यों नहीं किया गया? विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के प्रभावित अपनी जमींन मकानों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठाने के कारण क्यों मुकद्दमे झेल रहे हैं?

फिर परियोजना प्रभावित लोगों के लिये बनाई गई इन लाभकारी नीतियों को न तो प्रचारित किया गया न ही लागू किया गया है जिनसे उनकी समस्याओं के समाधान हो सकता है। 1-पर्यावरण और पुनर्वास की चुनौतियों का सामना करने के लिए राज्य को मिलने वाली 12 फीसद मुफ्त बिजली। 2-स्थानीय क्षेत्र विकास कोष (परियोजना प्रभावित) के लिए परियोजना से मिलने वाली एक फीसद मुफ्त बिजली। 3-प्रत्येक प्रभावित परिवार को उत्पादन चालू होने के अगले 10 वर्ष तक 100 यूनिट बिजली या उसके बराबर पैसा प्रतिमाह मिलने का प्रावधान।

अकेले टिहरी बांध से ही दो हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपये सरकार को 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली से मिले हैं। राज्य में भूस्खलन से प्रभावित 350 गांवों को राज्य सरकार नहीं बसा पाई है चूँकि उनके लिए ज़मीन नहीं है। हर बारिश में तमाम जगह भूस्खलन से उजडऩे वालों की संख्या बढ़ रही है।

फिर बड़े बांधों में बिना ज़मींन दिए लाखों लोगों को उजाडऩे के लिए सरकार क्यों इतनी जल्दी कर रही है। राज्य सरकार को इस हरित राज्य में गंगा, यमुना से महाकाली नदियों तक बांधों की नई दौड़ से पहले इन सवालों का जवाब देना होगा, इन समस्याओं का समाधान करना होगा।

सरदार सरोवर: अधूरे बांध के उद्घाटन का एक वर्ष

बहुत बरस पहले स्व. अनुपम मिश्र ने अपने एक लेख का शाीर्षक दिया था, नर्मदा घाटी सचमुच कुछ घटिया विचार। वे बांध निर्माण को घटिया न बताते हुए बेहद व्यग्यांत्मक तरीके से उन पर्यावरणविदों को जिन्होंने सन 1983 में इस बांध के पहले चरण की डूब आने से भी पहले इससे होने वाली हानियों की घोषणा कर दी थी, को घटिया विचार की संज्ञा दे रहे थे। वे सारे घटिया विचार आज मुंह बाये खड़े हैं और किसी के पास कोई जवाब नहीं है, केरल की तबाही के बावजूद। हम सभी जानते हंै कि केरल के हालिया विनाश में सबसे सक्रिय भूमिका वहां के बड़े बांधों की रही है। अपने इस लेख में मध्यप्रदेश के पूर्व सिंचाई सचिव के एक पत्र, जिसे उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखा था, का उल्लेख भी करते हैं, जिसमें लिखा है,” इसके कारण उजडऩे वाले लोगों से जो वादा किया है, वह निभाया नहीं जा सकेगा और कुल मिलाकर नुकसान इतना ज़्यादा होगा कि 21 वीं सदी के किसान के लिए तैयार की जा रही नर्मदा घाटी कहीं बीस हजार साल पीछे न धकेल दी जाए’’। आज यह बातें सही साबित हो रही हैं।

गौरतलब है इस 17 सितंबर को अधूरे बने सरदार सरोवर बांध के उद्घाटन को पूरा एक साल हो जाएगा। इस बांध से विस्थापित हो रहे करीब 35-40000 परिवार आज भी पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। फरवरी 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे, पुनर्वास व मुआवजे को लेकर। 31 जुलाई 2017 तक राज्य सरकारों द्वारा इनका क्रियान्वयन किया जाना था। वह आज दिन तक नहीं हो पाया। पुनर्वास स्थलों की स्थिति बदहाल है। इस बार भी नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवाई में डूब में आने वाले 197 गांवों के निवासी, जो अभी तक गांवों में डटे हुए हैं, पिछले एक महीने से क्रमिक अनशन पर हैं, परंतु मध्यप्रदेश शासन की ओर से कोई पहल दिखाई नहीं दे रही। उस पर स्थिाति यह है कि मानसून विदाई की तैयारी में है और सरदार सरोवर जलाशय अभी तक भरा ही नहीं है। जो पानी आया भी है, सुना है कि वह बिना मांग के भी बिजली बनाने के नाम पर पीछे के अधूरे भरे बांधों में छोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि यदि पीछे के क्षेत्रों में और वर्षा नहीं हुई तो ये तीनों बांध, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर और महेश्वर खाली रह जाएंगे और मध्यप्रदेश के निमाड़ व आलवा अंचल में आने वाल समय में त्राहि-त्राहि मच सकती है।

वास्तविकता तो यह है कि पिछले मार्च में ही गुजरात के किसानें को जलाशय से सिंचाई के लिए पानी दिया जाना बंद कर दिया गया था और जून में तो नहरों पर सशस्त्र पुलिस बैठा दी गई थी, जिससे कि कोई किसान खेतों में सिंचाई नही कर पाए। जलाशय का जलस्तर निर्धारित न्यूनतम से भी कम हो गया था। यह स्थिति इस बांध के उद्घाटन के एक माह बाद से यानी पिछले अक्तूबर से ही बननी शुरू हो गई थी। परंतु गुजरात के अधिकांश किसान अब भी इस भ्रम के हैं कि सरदार सरोवर बांध उनको पार लगा देगा। कुछ किसानों खासकर आदिवासी किसानों को बहुत पहले ही यह षडयंत्र समझ में आ गया था, परंतु विवशता यह है कि गुजरात की किसान राजनीति का अधिकांश दारोमदार पटेलों पर है। वे अभी भी आंखों पर पट्टी बांधे हैं और उसे उतारना भी नहीं चाह रहे हैं। हालिया घटना पर गौर करिए पटेल/पाटीदार नेता हार्दिक पटेल अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। एकाएक उन्होंने तय कर लिया कि वे अब जल भी त्याग देंगे। इससे उनके समर्थकों में खलबली मच गई। उन्हीं के एक करीबी ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को फोन कर कहा कि वे व अन्य लोग हार्दिक पटेल को राजी करें कि वे पानी न छोडें़। अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद वह अनशन स्थल पर पहुंची। वहां पहुंचने पर उपस्थित एक वर्ग ने उनका विरोध किया। मेधा ने उन्हें समझाने का काफी प्रयास किया कि वे लोग अब तो असलियत को पहचाने और जो सच है उसका साथ दें। गौरतलब है बड़ौदा स्थित सरदार सरोवर बांध कार्यालय पर प्रभावित आदिवासी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं कि उन्हें पिछले 50 वर्षों से विस्थापित की तरह रहना पड़ रहा है, परंतु हार्दिक पटेल के साथियों ने अंतत: मेधा पाटकर व उनकी भेंट नहीं होने दी। इससे यह भी साबित हो गया कि गुजरात में छोटे किसानों व आदिवासियों को अपनी लड़ाई अलग से ही लडऩी पड़ रही है क्योंकि आज सरकार व बड़े किसान दोनों ही उनके बारे में कुछ भी नहीं सोच रहे हैं। यह बात राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन के हित में भी नहीं है। बहरहाल यही आज की सच्चाई है और इस अज्ञानता का खमियाजा आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ सकता है। वहां के किसान गुजरात सरकार से इस बात पर नाराजग़ी नहीं दिखा रहे हंै कि इतने वर्षों में नहरों का जाल नहीं बना पाया और जो निर्माण हुआ वह भी स्तरीय नहीं है। इसकी वजह से पिछले वर्षों में मुख्य नहर कई बार टूट चुकी है और किसानों को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा है।

परंतु गुजरात व मध्यप्रदेश सरकारों की रुचि पुनर्वास और ंिसंचाई से ज़्यादा पर्यटन में हैं। गुजरात में बांध स्थल से करीब तीन किलोमीटर दूर वल्लभ भाई पटेल की 168 मीटर ऊँची मूर्ति स्थापित की जा रही है। इस पूरी परियोजना पर दो हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा का खर्च आएगा। इससे कम में सभी विस्थापितों का पुनर्वास और पुर्नस्थापन हो सकता था। परंतु यह गुजरात सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इतना ही नहीं सीएजी ने इस मूर्ति निर्माण में लग रहे धन को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। उनके अनुसार सीएसआर का धन इसमें लगाना गलत है और इसके लिए तेल कंपनियों से सवाल जवाब किया जाना चाहिए। परंतु राज्य का राजा कौन? सवाल पूछना और वह भी सरदार सरोवर बांध – या मूर्ति पर पूर्णतया निषिद्ध है। सरदार सरोवर जलाशय के दूसरे छोर पर बड़वानी के पास बावनगजा में आज से करीब 2000 साल भगवान बाहुबली की 52 गज अर्थात 152 फीट ऊँची मूर्ति बनी थी। यह पत्थर की मूर्ति है। इसे हमारे यहां के शिल्पकारों एवं मूर्तिकारों ने बनाया था। बीस शताब्दियों के बाद जब भारत को विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है। हम मानते हैं कि हमने तकनीक में असाधारण तरक्की की है। प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया की और उनका बौद्धिक सलाहकार संगठन -”स्वदेशी’’ की बात करता है, तो दूसरे छोर पर जो मूर्ति बन रही है उसका निर्माण चीन की एक कंपनी कर रही है और बात यहीं खत्म नहीं होती, सुना है वहां पर चीनी श्रमिक भी कार्य कर रहे हैं। यह वास्तव में अचंभित कर देने वाला परिदृश्य है। सवाल तो प्राथमिकताओं का है और समझ में स्पष्ट तौर पर आ रहा है कि आम नागरिक या सीमांत नागरिक अब नीति निर्माताओं की आंख से ओझल हो चुका है। क्या वल्लभ भाई पटेल इन अपव्यय की अनुमति देते? पर उनकी किसे फिक्र है।

अधूरे बांध के उद्घाटन की बरसी होने को आई। मध्यप्रदेश के शिकायत निवारण प्राधिकरण (सरदार सरोवर बांध) में हजारों बांध प्रभावितों की शिकायतें लंबित हैं और मध्यप्रदेश सरकार इस प्राधिकरण को ही समाप्त कर देना चाहती है। सुनवाई की गुंजाइश ही नहीं बचेगी तो शिकायतकत्र्ता भी धीरे-धीरे अपनी गति को प्राप्त हो जाएंगे। लेकिन सरकारें तो शाश्वत होती है, वे तो हमेशा अनंत तक सक्रिय ही रहेंगी। डूब में आए गांव जलसिंधी के बाबा महरिया कहते हैं,” पीढिय़ों से हम जंगलों में रहते आए हैं। जंगल ही हमारा साहूकार और बैंक हैं। संकट के दिनों में हम उसी के पास जाते हैं। अब तो उनके जंगल भी डूब गए हैं। साहूकार और बैंक तो सरकार के कब्जे में है, तो फिर ये पीडि़त कहां जाएं? इसीलिए उन्होंने अब नर्मदा घाटी को खाली करने से इंकार कर दिया है और सरकारों और सर्वोच्च न्यायालय दोनों से यह सवाल पूछ रहे हैं कि नर्मदा घाटी के निवासी भारत के नागरिक हैं भी या नहीं? जवाब नहीं मिल पा रहा है।

गौरी लंकेश की शहादत का एक साल

गौरी लंकेश की हत्या सिर्फ गोली चलाने से नहीं हुई। इस हत्या की असली वजह वह विचारधारा है जिसमें गरीबी, शोषण आदि से ध्यान हटाने के लिए किसी समुदाय या देश को ही सभी परेशानियों की वजह बता दिया जाता है।

आतंकवाद के मामले में गिरफ्तार व्यक्ति का जेल से बाहर आने पर नायक की तरह उसे माला पहना कर स्वागत होने लगे तो हमें यह समझ जाना चाहिए कि गौरी लंकेश जैसी शख्सियत का हमारे बीच मौजूद होने का मतलब क्या था। भीड़ में लोकतंत्र की हत्या का जश्न मनाया जा रहा है और आज भी नागरिक खुद को ज्य़ादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। गौरी लंकेश जैसी को इसलिए मार दिया जाता है ताकि समाज में सांप्रदायिकता का ज़हर बोने का काम बिना किसी परेशानी को होता रहे।

गौरी ने जनता की भाषा में जनता से बात करने का रास्ता चुना था। यही काम मराठी में गोविंद पनसर, नरेंद्र दामोलकर और कन्नड़ भाषा में कलबुर्गी कर रहे थे। आज जनता से जो भी लोग जनता के असली मुद्दों पर जनता की भाषा में संवाद कर रहे हैं उन पर खतरा मंडरा रहा है।

जिनके शब्दों में इंसानियत की आवाज़ होती है उन्हें मार देने के बाद भी, उनकी आवाज़ चारों तरफ गंूजती रहती है। क्या गौरी लंकेश की बेखौफ अभिव्यक्ति की झलक लुई सोफिया (जिसने भाजपा सरकार को फासीवादी कहा) में नहीं दिखती। असहिष्गुता के चलते उसे गिरफ्तार कराया गया और जेल भेजने की सजा भी दी गई।

क्या गौरी लंकेश की आवाज में कैंपसों की उन लड़कियों की आवाज नहीं शामिल है जो पूरी हिम्मत से आज भी पुलिस की लाठियों का सामना कर रही हैं? क्या गौरी लंकेश के तेवर हमें देश के उन तमाम एक्टिविस्टों की हिम्मत में नहीं दिखते जो धमकियों और साजिशों का सामना करते हुए जनता के लिए संघर्ष कर रहे हैं?

लोकतंत्र में असहमति का सम्मान किया जाता है। जो विचारधारा असहमति को कुचलने की बात करती है उससे भारतीय लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करके ही हम गौरी लंकेश को सच्चा सम्मान दे पाएंगे। मुझे उनसे न केवल मां का प्यार मिला बल्कि दोस्ती का सच्चा स्नेह भी मिला।

हालात कैसे भी हों, हमें अन्याय देख कर चुप नहीं बैठना है – यही गौरी लंकेश के जीवन का संदेश है। अगर इस संदेश को हम जीवन में उतार लें तो भारतीय लोकतंत्र का कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा।

रुपया अभी और लुढ़केगा, ठहरेगा नहीं!

रुपया लुढ़कते हुए डालर के काफी नीचे जा चुका है। यानी वैश्विक बाज़ार में डालर के मुकाबले में यह आज की तारीख में 72 रुपए है। पिछले दिनों ‘तहलका’ में आवरण कथा ‘ईधन में लगी आग’ छपी थी। मुझे यह अंदेशा नहीं था कि मैंने जो कुछ संभावना तब जताई थी वे इतनी जल्दी सामने आ जाएंगी और चमत्कारिक जान पडेंगी। इतना ही नहीं ईंधन की कीमतें आज तो आकाश छू रही हैं।

रुपए का लुढ़कते हुए रुपए 72 मात्र पर आ जाना एक तरह से काफी सांकेतिक है क्योंकि भारत को आज़ाद हुए भी 72 वर्ष चल रहे है। जाहिर है कि हैश टैग इंडिया ञ्च72 और रूपी ञ्च72 युवाओं को रोचक भी लगेगा।

साल दर साल भारतीय करंसी हर साल बारह फीसद से ज्य़ादा के आधार पर घटी है। यानी तमाम उभरे बाज़ारों में इस करंसी का खेल सबसे खराब रहा है। जो संकेत फिलहाल दिख रहे हैं वे बता रहे हैं कि इसका लुढ़कना अभी और जारी रहेगा।

वित्त मंत्री अरूण जेटली का तर्क है कि रुपए के लुढ़कने की वैश्विक वजहें हैं और इस से आतंकित होने की कोई वजह नहीं है। क्योंकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) वह सब कर रहा है जो हालात संभालने के इरादे से करना चाहिए। वित्त मंत्री ने बाज़ार को यह कह कर आश्वस्त भी किया कि तुर्की में अभी हाल में हुई घटनाओं का असर सारी करंसी पर पड़ा है।

यह उम्मीद की जा रही थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता के दिन अपने भाषण में रुपए का अनुमान उल्लेख करेंगे। क्योंकि उनका भाषण भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास पर ही केंद्रित था। जिससे बाज़ार जब खुलें तो रुपए का लुढ़कना बंद हो जाए। लेकिन उम्मीदों के बावजूद रुपया दुरूस्त नहीं हुआ। वह लुढ़कता ही गया और अब तो इसने एक रिकार्ड बना लिया है।

बहरहाल वित्तमंत्री का बयान है कि भारत की बुनियादी ज़रूरतों का ख्याल रख लिया गया है। इससे ज़रूर थोड़ी ढांढस बढ़ी। खास तौर पर जब देश में विकास की ऊँचाई सकल घरेलु उत्पाद की दर 8.2 फीसद तक गई है। और करंसी इस दर से भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बना और चीन को इसने परास्त भी किया लेकिन अभी और बुरा होना थमा नहीं है।

सारे संकेत बताते हैं कि रुपए की यह गिरावट अभी और जारी रहेगी। रुपया और ज्य़ादा कमज़ोर होगा। रुपए के लिए पिछले तीन साल में सब से खराब महीना अगस्त 2018 का था। जब ईरान पर लगी पाबंदियों के चलते सारी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई में बाधा पड़ी।

कच्चे तेल के आयात का खर्च सारी दुनिया में सबसे ज्य़ादा तेल इस्तेमाल करने से जुलाई में 26 फीसद बढ़ा। इससे व्यापारिक घाटा 18 बिलियन डालर का हुआ जो पांच साल में सबसे ज्य़ादा है। सबसे ज्य़ादा बुरा वक्त अभी बीता नहीं है। उसे आना ही है क्योंकि भारत कच्चे तेल की अपनी ज़रूरत का 83 फीसद आयात करता है।

कच्चे तेल की कीमतों से देश में करंट एकाउंट घाटा और महंगाई के मेल के चलते रुपए का डालर की तुलना में लुढ़कना वाजिब था। तकरीबन तीन महीने पहले के डालर की तुलना में यह पंद्रह महीने के निचले स्तर पर पहुंचा था और अब यह 72 पर आ ही गया है।

देश में चार सौ बिलियन विदेशी मुद्रा के सुरक्षित रहने से स्थिति अपेक्षाकृत कुछ बेहतर है। अब जो डाटा आया है वह बता रहा है कि मंहगाई घटेगी। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और तुर्की और अमेरिका के बीच तनाव से चिंता और बढ़ी है। करंसी का अवमूल्यन होना विकास की ओर बढ़ रही किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बाधक है। यह ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि ऐसे कदम उठाए जाए कि निर्यात बढ़े और उत्पादक क्षेत्र को आयात पर ही आश्रित न होना पड़े।

प्रधानमंत्री की ‘मेक की इंडिया’ को और ज्य़ादा बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जिससे उत्पादन क्षेत्र को खासा बढ़ावा मिले और आयात पर ही देश आश्रित न रहे।

अमेरिकी डालर की मजबूती, विदेशी निवेश (एफडीआई) का अभाव और तेल की तेजी से बढ़ती कीमतों के चलते रुपए पर खासा दबाव है। यह हकीकत है विभिन्न देशों की सभी करंसी पर आज दबाव है। हालांकि कि इससे ज्य़ादा नुकसान रुपए को ही हुआ है। विदेशी पोर्टफोलियों का घरेलु इक्किटी मार्केट में घुसना भी इधर कम हुआ है अमेरिकी चीनी व्यापार युद्ध के चलते।

पुराने सहयोगी का हमला

एन चंद्र बाबू नायडू जो तेलुगु देशम पार्टी के सुप्रीमो हैं। वे एनडीए के साथ अभी हाल तक देश में सत्ता संभाल रहे थे। उन्होंने भाजपा के नेतृत्व में बने राष्ट्रीय गठबंधन को डालर के मुकाबले रुपए को कमजोर पडऩे का जिम्मेदार ठहराया है साथ ही देश में ईधन की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी की निंदा भी की है। हम आखिर किधर को जा रहे हैं। भाजपा के कभी सहयोगी रहे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नायडू आज की तारीख में भाजपा के सबसे बड़े विरोधी हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की गलत नीतियों के चलते ऐसा हुआ। हर दिन बीतने के साथ रुपए का लुढ़कना भी जारी रहता है। मुझे कतई आश्चर्य नहीं होगा यदि आने वाले दिनों में सौ भारतीय रुपए के बराबर एक डालर हो जाएगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें रोज ही आसमान छू रही हैं। पेट्रोल की कीमतें भी बढ़ रही है। जल्दी ही यह सौ रुपए लीटर हो जाएगा। नायड्ू आंध्र प्रदेश भी नई राजधानी अमरावती में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।

‘ये लोग शतक बनाने जा रहे हैं। और रुपया शतक भी बना लेगा। आप एक डालर देकर मात्र एक लीटर पेट्रोल ले सकेंगे। नायडू ने केंद्र में सरकार चला रही भाजपा की आर्थिक नीतियों पर अपनी निराशा जताई। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था एकदम चौपट हो गई है। विकास की दर भी तेजी से घट रही है। देश में कहीं कोई वित्तीय अनुशासन नहीं है।’

तेलुगु देशम पार्टी ने इसी साल के शुरू में भाजपा से अपना चार साल पुराना नाता तोड़ लिया था। उनका आरोप था कि प्रधानमंत्री मोदी ने आंध्रप्रदेश को विशेष का दर्जा नहीं दिया जबकि उन्होंने इसका वादा किया था।

तेलुगु देशम ने राष्ट्रीय गठबंधन से बाहर होने के साथ ही केंद्र की आर्थिक नीतियों और प्रधानमंत्री के रातों रात बड़ी कीमत वाले करंसी नोटों को रद्द करने के फैसले की निंदा भी शुरू कर दी। आंध्र के मुख्यमंत्री पहले काला धन निकालने के केंद्र सरकार से इस फैसले के प्रशंसक थे। लेकिन अब वे पूछते है कि केंद्र को विमुद्रीकरण (नोटबंदी) करके क्या हासिल हुआ? देश के हर नागरिक को इसके चलते काफी कुछ झेलना पड़ा। आज भी एटीएम से नकद नहीं निकाला जा सकता।

नायडु विमुद्रीकरण के बाद ही बनी कमेटी के तब संयोजक भी बनाए गए थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने तब यह सलाह दी थी कि दो हजार रुपए की करंसी और पांच सौ के विमुद्रीकरण के बाद अब ज्य़ादा संख्या में दो सौ और सौ रुपए के नोट छापे जाएं जिससे आम आदमी को राहत पहुंचे। ज्य़ादा बड़े सौदों में डिजिटल तरीके से लेनदेन हो। लेकिन एनडीए सरकार ने मेरी सलाह के उलट किया। जबकि डिजिटल अर्थव्यवस्था का मैं संयोजक था। मेरी मांग थी कि मोदी सरकार रुपए दो हजार और रुपए पांच सौ मात्र के ही नोट पर तब पाबंदी लगाती तो आम आदमी को परेशानी नहीं होती। छोटी करंसी लोगों की पहुंच में रहती।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने डालर की दर के मुकाबले रुपए को लुढ़कते देख कर बेचैनी जताई और पेट्रोल और डीजल की कीमतों के बढ़ोतरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा जिन चीजों के लिए कांग्रेस की वे निंदा करते थे आज वे खुद वही कर हैं। आप (आम आदमी पार्टी) के नेता ने कहा, प्रधानमंत्री पहले रुपए की बड़ी चर्चा करते थे, पेट्रोल डीजल की कीमतों का उलाहना देते थे। भाजपा कहती थी कि कांग्रेस ने महंगाई बढ़ाई इसके लिए वही जिम्मेदार है। और अब भाजपा वही कर रही है। साधारण जनता तकलीफ झेल रही है।

बैंकर्स क्या कहते हैं

बैंकर्स का यह मानना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को भी खासी बेचैनी इस बात से है कि भारतीय करंसी प्रति डालर की तुलना में 70 रुपए पर कैसे पहुंच गई। उन्होंने चिंता जताई कि महंगा कच्चा तेल लेने से रुपए पर व्यापक असर पड़ा है। जो अमूमन बड़े आयातक हैं उनके कारण भी रुपए पर खासा दबाव पड़ा है। एक बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक ने कहा, कि तेल कंपनियों की डालर की मांग के चलते रुपए की कीमत पर असर पड़ा है। इस कंपनियों को अपनी बाहरी वाणिज्यिक कर्ज की वापसी करनी होती है इसलिए उन्होंने अमेरीकी करंसी इकट्ठी कर ली।

एसेक्स बैंक ने हमेशा यह कहा कि वह किसी भी स्तर पर घरेलू करंसी को लक्ष्य नहीं बनाता लेकिन विदेशी मुद्रा पर नज़र रखने के लिए दखल ज़रूर देता हूं। भारत के फारेक्स रिजर्व अमेरीकी डालर 406.058 मात्र जून 29 तक था। इससे आरबीआई को फारेक्स मार्केट में दखल देने के लिए काफी वक्त भी मिला। लगातार डालर की मांग के कारण रुपया लुढ़कने लगा। उधर कच्चे तेल की कीमत को पंख लग गए। इधर अमेरिका ने अपने तमाम सहयोगियों को नवंबर तक ईरानी तेल न खरीदने पर फैसला लेने को कहा। लीबिया और कनाडा से सप्लाई आने से बाधा हुई जिसके चलते कीमतें और बढ़ी।

भारत दुनिया में तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा देश ही वैश्विक तेल कीमतों के बढऩे से आयात का खर्च बढ़ता है।

विपक्ष का विरोध

राफेल सौदे, बेरोज़गारी, खेती में समस्याएं आदि मुद्दों के साथ ही कांग्रेस विभिन्न विपक्षी दलों के साथ महंगाई पर विरोध जताती रही है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का कहना है कि यदि सरकार तेल की कीमतें कम नहीं करती तो पार्टी पूरे देश में आंदोलन छेड़ेगी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक विरोध होगा।

उन्होंने बताया कि स्टेटिक्स ऑफिस के अनुसार जुलाई महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 4.17 फीसद बढ़ा था जो साल पर पहले जून में पांच महीने की ऊंचाई पर जून में 4.9 फीसद था। फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद आम लोगों की जिंदगी पर असर दिखा।

ओडिसा में बीजू जनता दल भी एनडीए सरकार पर बिफरी हुई है। उसने आरोप लगाया कि यदि इस महंगाई को रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए तो राज्य व्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा। पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने भी केंद्र सरकार को पेट्रोल और डीजल में मूल्य बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आश्चर्य जताया कि विपक्ष इस मुद्दे पर सड़क पर क्यों नहीं उतरता?

सिंह बनाम सिंह फोर्टिस विवाद और गहराया

छोटे भाई शिवेंद्र ने बडे भाई मलविंदर सिंह के खिलाफ एक मुकदमा दायर कर दिया है। उन्होंने उस पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनकी पत्नी के जाली दस्तखत किए हैं। फोर्टिस विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और यह चर्चा की शिविंदर यह शिकायत वापिस ले रहे हैं, ऐसे में एक कारपोरेट घराने में छिड़े झगड़े का जायजा ले रहीं हैं सुमन

गंभीर जालसाजी की जांच करने वाला दफ्तर सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) के वित्तीय अधिकारी फोर्टिस में अनियमितताओं की पड़ताल में जुटे हैं। सिंह भाइयों पर आरोप है कि उन्हें डाएची सैक्यो जापान की कंपनी को तकरीबन पांच सौ मिलियन डालर की रकम देनी है जो उन्होंने 2008 में रैनबैक्सी लेबोरेटरी बेच कर पाई थी। इस रकम को लेकर उन पर फ्रॉड का मामला बना है।

 दरअसल महीनों बंद कमरों में हुए झगड़े-फसाद के बाद अब यह मामला सार्वजनिक हुआ है। हालांकि तमाम बढ़े-बड़े व्यापारिक घरानों में इन दिनों ऐसे फसाद होते दिखते हैं। छोटे भाई शिवेंद्र ने बड़े भाई मलविंदर सिंह और पारिवारिक दोस्त सुनील गोधवानी पर आरोप लगाया है कि इन लोगों ने फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड के हितों की अनदेखी की है। अपनी 43 पेज की याचिका में शिवेंद्र का आरोप है कि उसकी पत्नी अदिति सिंह जो आरएचसी होल्डिंग के प्रबंध निदेशक पद पर थी उसके जाली दस्तखत बना कर हेराफेरी की गई। ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि याचिका कर्ता नंबर तीन (अदिति सिंह) को बोर्ड की बैठक में मौजूद दिखाया गया जबकि वह विदेश में थी। कुछ साल बाद परिवार को कोई भी करीबी यह मानने को राजी नहीं था कि किसी कारपोरेट हाउस में लेन देन का यह स्तर होगा। जब फोर्टिस का सौदा हुआ तो यह बताया गया कि भारतीय मरीज़ों की देखभाल उद्योग का खासा बड़ा अधिग्रहण है। इसके तहत 45 सौ करोड़ की फोर्टिस-आईएचएच सौदे से प्रतियोगिता ही बढ़ेगी। आईएचएच फोर्टिस समूह के अस्पताल देश के बड़े अस्पतालों में होंगे। जो देश के सबसे बड़े अस्तपतालों के समूह में एक होंगे। उदाहरण के लिए अपोलो कुल दस हजार बिस्तर का अस्पताल है। इसके सहयोगी मैक्स हेल्थकेयर के पास 14 अस्पताल हैं। जिसके पास कुल 2500 बिस्तर हैं। इसकी तुलना में इस समझौते के बाद आईएचएच 34 अस्पतालों को नेटवर्क मिलेगा साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी पंहुच होगी। अभी तक इन तमाम सुविधाओं के साथ 46 सौ बिस्तर की व्यवस्था है। जबकि आईएचएच की एशिया के कई देशों में खासी मौजूदगी है। नौ देशों में इसके अस्पताल हैं और दस हजार बिस्तर हैं। भारत में भी इसकी अच्छी मौजूदगी है। फिलहाल यह भारत में पांच शहरों में है और सात अस्पतालों का इसका अपना नेटवर्क है। हालांकि बिस्तर 1600 ही हैं।

किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि हालात इतने बेकाबू हो जाएंगे। तीन पेज के एक दस्तावेज में शिवेंद्र सिंह ने कहा, ‘मैंने मलविंदर सिंह सुनील गोधवानी के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में कुप्रबंध आरएचसी होल्डिंग, रेलिगेयर और फोर्टिस में करने के खिलाफ मामला दर्ज कराया है। शिवेंद्र सिंह ने कहा ‘मैं खामोशी से देखता रहा कि जिस संगठन को मैंने ही स्थापित किया वह उस स्तर पर पहुंच गया जहां उसे नीलाम करने के सिवा कोई चारा नहीं था। मेरा परिवार और खुद मैं अपने ही विरासत से बाहर कर दिए गए थे। हमारे पैसों और मेरी व्यक्तिगत विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गए थे।

मीडिया के लगभग सभी दफ्तरों में भेजी अपनी विज्ञप्ति में शिवेंद्र सिंह ने कहा है कि, ‘दो दशक तक वे और उनके भाई तो एक दूसरे से बेहद करीब थे’। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की शाखा में दायर अपनी याचिका में सिंह बंधुओं में छोटे भाई शिवेंद्र ने बड़े भाई मलविंदर (45 वर्ष के) और रेलिगर एंटरप्राइजेज लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष और सुनील गोधवानी पर आरोप लगाया कि इन लोगों ने कंपनी को कजऱ् के शिंकजे में डाल दिया है और अपने क्रेडिटर्स और शेयर होल्डर के हितों से खिलवाड कर रहे हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि मलविंदर ने अदिति सिंह के जाली दस्तखत आरएचसी होल्डिंगस प्राइवेट लिमिटेड के दस्तावेजों में बनाए। इतना ही नहीं इन्होंने ऑस्कर इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड में ऐसा ही किया। अदिति सिंह शिवेंद्र की पत्नी है। आरएचसी होल्डिंगस प्राइवेट लिमिटेड और ऑस्कर इन्वेस्टमेंट लिमिटेड की सयुंक्त तौर पर वित्तीय सेवाओं की फर्म है। रेलिगर एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अस्पताल समूह फोर्टिस हेल्थकेया लिमिटेड।

इस याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि मलविंदर और गोधवानी ने अपने पदों का बेजा इस्तेमाल करके अवैध तौर पर वित्तीय लेनदेन और कई तरह के कुप्रबंध आरएचसी में किए जिससे आरएचसी और उसकी शाखाओं में खासा नुकसान हुआ और खजाना भी खत्म हुआ।

शिवेंद्र ने एनसीएलटी से अनुरोध किया है कि मलविंदर और गोधवानी ने आपस में मिलीभगत करके कंपनी के हितों को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने एनसीएलटी से अपील की है कि वह मलविंदर मोहन सिंह और सुनील गोधवानी की उस कमाई का पता लगाए जिसके कारण याचिकाकर्ता को और आरएचसी होल्डिंग्स को नुकसान हुआ। यह भी अनुरोध किया गया कि एनसीएलटी मलविंदर और गोधवानी को आरएचसी होल्डिंग्स के खजाने को वापस लौटाएं जो उनकी गैर कानूनी हरकतों के चलते खत्म हो गया है साथ ही अपनी पूंजी, बैंक -खाते और पूरी माली हालत का ब्यौरा दें। एनसीएलटी से यह घोषणा करने को कहा गया है कि मलविंदर और गोधवानी ने आपस में मिलकर अवैध वित्तीय लेनदेन किया। शिवेंद्र की पत्नी के जाली दस्तखत बनाए। और कंपनी को कर्ज के फंदे में डाल दिया। मलविंदर और गोधवानी ने अवैध वित्तीय लेनदेन और कुप्रबंध के जरिए यह सब किया और आरएचसी और दूसरी कंपनियों का खजाना खाली कर दिया।

इजेंक्शन की मांग

यह याचिका आरआरजी एंड एसोसिएट्स की कानूनी फर्म के जरिए एनसीएलटी को दायर की गई है। उसमें यह चाहा गया कि यह मलविंदर को निर्देश दे कि गैर कानूनी तौर पर फोर्टिस हेल्थकेयर और रेलिगेर एंटरप्राइजेज से लिए गए फंड को वापस किया जाए। साथ ही एनसीएलटी से मलविंदर और गोधवानी को यह निर्देश भी दिया गया है कि वे कहीं और किसी संपति में रुचि न दिखाए जिससे उससे रिकवरी में कठिनाई आए। अंतरिम राहत की अपील करते हुए शिवेंद्र ने इजंक्शन की मांग की है जिससे आरएचसी होल्डिंग्स की शेयर होल्डिंग पूरे मामले की सुनवाई पूरी होने तक यथास्थिति रहे। शिवेंद्र ने आरएचसी होल्डिंग्स के बोर्ड के डायरेक्टरों पर भी ‘स्टेटस को’ चाहा है। यह याचिका कंपनी एक्ट 2013 की धारा 214, और 244 के तहत दायर की गई है।  अपने 43 पेज की याचिका में शिवेंद्र ने अपनी पत्नी अदिति सिंह जो आरएचसी होल्डिंग्स में प्रबंध निदेशक थी उनके जाली दस्तखत करने का आरोप भी लगाया है। याचिका कर्ता ने बताया है कि याचिका नंबर तीन (अदिति सिंह) दरअसल विदेश में थीं। जब यह सब हुआ। ध्यान रहे आरएचसी होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड एक गैर-बैंकिग कंपनी है। जिसे सिंह बधुओं का परिवार संभालता है। अभी इस फर्म के प्रबंध निदेशक मलविंदर सिंह हैं

 दूसरे सौदों का भूत

ऐसा लगता है कि फोर्टिस का भूत जो दोनों भाइयों पर अब भी सवार है। डाएची ने दोनों भाइयों से रुपए 3,500 करोड़ मात्र के लिए मामला दर्ज कर रखा है और सिक्यूरिटीज एंड एक्स्चेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) फोर्टिस और रेलिगेर की फोरेंसिक ऑडिट करा रही है। इस साल के शुरू में सिग्युलर गफ एंड कंपनी ने दिल्ली हाईकोर्ट में सिंह बंधुओं पर आरोप लगाया था कि इन लोगों ने रेलिगेर से फंड की हेरा-फेरी की है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सिंगापुर आरबिट्रेशन ट्रिब्यूनल के फैसले को उचित माना जिसमें सिंह बंधुओं पर रुपए 3500 करोड़ मात्र को छिपाने और डाएची सैंक्यों को गुमराह करने का आरोप लगाया है।

तेलंगाना हादसे में 52 की मौत

तेलंगाना के जागतियाल इलाके में सोमवार को एक बड़े सड़क हादसे में 52 लोगों की मौत हो गयी जबकि कई अन्य घायल हुए हैं।  मरने वालों में 6 बच्चे भी शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (टीएसआरटीसी) की बस में मरने वाले ज्यादातर लोग श्रद्धालु हैं। बस खाई में जा गिरी। कोंडागट्टू घाट के पास हुए इस बस हादसे में कई लोग गंभीर घायल हैं। प्रशासन और पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँच गए हैं। बचाव कार्य जारी है। बताया जा रहा है कि बस की ब्रेक के फेल होने के कारण यह हादसा हुआ। बस में 87 लोग सवार थे।

मिली जानकारी के मुताबिक बस में सभी श्रद्धालु थे और मंगलवार का दिन होने की वजह से वे एक मंदिर में गए थे। मंदिर से वापसी के दौरान यह हादसा हो गया। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक घाट रोड पर बस संचालन के लिए खासतौर से दिशा-निर्देश जारी किये गए हैं। वहीं दूसरी तरफ राज्य के सीएम चंद्रशेखर राव ने हादसे में मरने वाले परिजनों को 5-5 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक घटनास्थल पर जगतियाल के कलेक्टर शरत भी पहुंच गए हैं। अभी तक 52 लोगों की मौत की बात सामने आई है। वित्त मंत्री एतेला राजेंदर ने इसकी पुष्टि की है। उधर, घायलों को नजदीक के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बचाव कार्य जारी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक बस कोंडागट्टू के हनुमान मंदिर से जगतियाल जा रही थी। सड़क पर ढलान थी। इसी सड़क पर मोड़ते समय बस के ब्रेक फेल हो गए और बस घाटी में गिर गई। एक रिपोर्ट के अनुसार, खाई में गिरने से पहले बस चार बार पलटी। घायलों को अस्पताल पहुँचाया गया है और उनका इलाज किया जा रहा है। इनमें से कुछ की हालत गंभीर बताई गयी है।

दिमागी रोग-अल्जाइमर 21 सितंबर भरपूर जिंदगी क्यों नहीं

मैं  खुद को हल्का कर रही थी। सिर्फ कपड़ों से ही नहीं, बल्कि और भी बहुत कुछ से….। तमाम तरह के ख्यालात मन में उमड़-घुमड़ रहे थे। जबकि मैं अपना नंगापन ढांप रही थी तो भी।

उस सिंथेटिक कमीज़ को उतार फेंक कर अपने दुबले-पतले ढांचे को मैंने उस पुरानी से सूती कपड़े से ढक लिया था। जो उस उम्रदराज बिस्तर के एक कोने में थी और जो कपड़ों के बोझ से नीचे दबी फैली सी थी।

आखिर बदलना था क्यों आखिर। इसकी बजाए तो मैं तो यूं ही सड़क पर चली जाती। उस बस स्टॉप की ओर वही कमीज पहने हुए। लेकिन नहीं। रूकती हूं और बदलती हूं। और अचानक रंग खो रही उस ढीली-ढाली ब्रा को उतार फेंकती हूं – क्या ज़रूरत है इस सारे कसे कसाए बंदोबस्त की जब मेरी छातियां तो यों भी कितनी सिकुड़ी और उदास सी हैं।

मैं उदास हो जाती उस आकार में।

विचार मंडराते रहते हैं और मुझे झटके भी देते हैं। मैं सीढिय़ों के पास हूं। उन्हीं सीढिय़ों के पास जो मुझे यहां लाईं। शोर-शराबे वाले शहर से बाहर उसी के एक बेहद छोटे उपनगर में। उन तमाम टूटे हुए बंधनों से दूर, यहां एक दूसरे मोड़ पर मैं पहली बार इसी वसंत में यहां आई थी। वह टूटी हुई बाढ़ जो बाहर की चारदीवारी के पास थी। बहुत समय नहीं गुजरा… लकड़ी की बनी यह सीढ़ी उस दरकते ढांचे तक ले जाती है। मैंने खुद को उस ‘घर’ की ओर खींचा जहां अल्जाइमर के मरीज़ रहते हैं। मैं वहां खड़ी रहती हूं। देखती रहती हूं लाल रंग से पुते सामने के दरवाजे को! मैंने उस घर के बारे में सुन रखा है उस होम्योपैथ से। जो इस घर में रह रहे अल्जाइमर के मरीजों के दिमाग में दरकते तंतुओं को पूरी कोशिश से फिर सक्रिय करने में जुटा रहता है। इसी घर में उसकी अपनी पत्नी प्रेमा भी रहती है और वह आता-जाता रहता है।

रोजमर्रा की चेतावनियों के साथ ही वह मुझे यह सलाह भी देगा कि मैं जगह बदल लूं। बदलाव की कोशिश कीजिए। आप उनसे बात कीेजिए जो अल्जाइमर के मरीज़ हैं। उनकी सुनिए… वहीं काम कीजिए। कुछ महीनों के ही लिए सही। हो सकता है आपको पसंद आए। आप जब चाहे तो वापस आ सकती हैं। यह कोई नियमित नौकरी नहीं है और न यह कहीं कायदे-कानूनों से ही जुड़ी है।

हालांकि जम्मू के बाहरी इलाके में यह था। जहां मेरे अपने पिता कई साल तक अल्जाइमर के मरीज बन कर यहीं रहे। उनकी याददाश्त की कोशिकाएं आपस में उलझ गई थीं। इसी कारण मुझे भी थोड़ी बहुत जानकारी हो गई थी आपस में गुंथी उन सिकुड़ी मेमोरी सेल के बारे में।

लाल पेंट लगा वह दरवाजा एक चौकोर बड़े कमरे में खुलता था। वहां होते थे एक दर्जन मरीज़ और उनकी मिजाजपुर्सी के लिए ढेरों लोग। कोई बहुत दूर नहीं थी यह जगह। फिर वहीं होता था एक तरह का वह डाक्टर। हल्की सफेद कमीज़ पहने। वह सबको जल्दबाजी में देखता। मुझे देखते ही वह खुद को हल्का करने लगा था। इसके पहले कि मैं अपना सामान उतार पाती। उसने पूछा कि मैं क्या उसे मदद दे सकती हूं अल्जाइमर के इन पीडि़त लोगों से बातचीत करके। यह सोच कर कि मैं यह सब दून में रात के सफर सा मान लूंगी। वह तेजी से उस बालकनी की ओर बढ़ा जिसे जल्दबाजी में ढका गया था। बिना रुके वह बोलता रहता। जब ठहरता लगता कि यह तो एक तरह की कमेटरी ही हो गई।

 यह है मेरा आफिस… हर मरीज को एक कमरा दे दिया है। इन सभी चौदह लोगों की पृष्ठभूमि बहुत अच्छी है। एक है सेवानिवृत जनरल, एक है डाक्टर जिसकी सेवाएं खत्म हो चुकी हैं। दो जो मैनेनिकल इंजीनियर हैं फिर वह पुलिस प्रमुख है। और … बारह आदमी और दो महिलाएं। प्रेमा मैडम की हालत बिगड़ती जा रही है… और श्रीमती शाह अपने कमरे में लेटी रहती हैं लेकिन वे पूछती रहती हैं कि क्या तुगलकाबाद के उनके घर को दीमकों ने बर्बाद कर दिया है। दो दिन पहले ही एक नया मरीज भर्ती हुआ है। ठीक ठाक ही है। बहुत खराब नहीं लगता है बीमारी की अभी शुरूआत है। उसके अपने सगे भाई उसे लाए थे और छोड़ गए। उसे तनिक भी चैन नहीं है। खूब बात करता है… किसी उद्योग व्यापार में था.. वह रहमत रहीम है। यहां हैं फाइलें उन तमाम लोगों की हैं जो यहां है। उनमें हर एक का ब्यौरा है जो मिल सका। उन्हें पढ़ डालों … आपका कमरा दूसरी मंजिल पर है।

‘दूसरे कमरे?’ मैंने पूछा

‘प्रेमा मैडम का कमरा तो यहीं है। कुछ कमरे उस और है?’

‘और मेम साहिब?’

‘उन्होंने तुम्हारे बारे में बताया था और…’

‘उनसे मैं अब तक मिल नहीं सका। हालांकि अभी कल ही उनसे बात हुई। नई दिल्ली से चलते हुए।’

‘मेरे होम्योपैथ डा. गुरूदत ने सलाह दी थी कि मैं नीचे आ जाऊँ तो दूसरे मरीजों की मदद हो जाएगी और…’

‘वे प्रेमा मैडम के पति हैं?’

‘हां..हां… वे मेरे होम्योपैथी भी हैं?’

‘मैं एलोपैथ हूं। होम्योपैथी में मेरा भरोसा नहीं है। लेकिन क्या कहना है यदि सेन साहिब पूछे।’

‘वे यहां है या कहां हैं?’

‘अभी अभी टहलते हुए घर को गए हैं। सिर्फ पांच मिनट हुए। वहां, उस इमारत को। देखिए इस खिड़की से… वहां, नीम के उस पेड़ के पास। यह भी उनके पूर्वजों का ही घर है। वह है उनके पिता का बंगला।’

‘उनके पिता?’

‘आप उनके बारे में इतना कुछ जानते हैं?’

‘उनके पिता भी अल्जाइमर से पीडि़त थे और अब…’

‘अब आक्रामक हो गए हैं। उन्हें यहां से दूसरी जगह भेज दिया गया जब वे ङ्क्षहसक हो उठे। इन मरीजों में कुछ को संभालना बड़ा ही कठिन है। दूसरे तो उदास बैठे रहते हैं… आप एक मौका लें, देखिए यदि संभाल पाएं। यह काफी कठिन तो है ही।’

मैं नीचे लेटी रही उस पहली रात। इसी कमरे में। इसी पुराने बिस्तर पर। जिद की वे तमाम बातें मेरे ख्यालों में उमड़ती-घुमड़ती रहीं। मैं यह तय नहीं कर पा रही थी उन तकलीफदेह बातों को। मैं थक गई थी। मैंने करवट ली। मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि मुझे आखिरकार यहां आना चाहिए था या नहीं। नहीं पता, मैं किसी एक भी बीमार को संभाल सकूंगी या नहीं। किसी भी चीज का भरोसा नहीं और मैंने यह यात्रा की। मैंने क्यों खुद को वहां से हटाया। वहां से यहां आने के लिए ही तो मैं व्यग्र थी। …और उत्सुकता में पड़ी रही। और वह पहली रात घनी होती रही। वे यादें फिर-फिर आतीं। इन्होंने मुझे छोड़ा ही नहीं, यह क्या थकाऊ नहीं होगा, उन सभी मरीजों के बीच बैठना जिनके मेमोरी सेल यानी याददाश्त की कोशिकाएं सिकुड़ गई हैं। उनकी बातें सुनना, उन्हें हल्का होने देना। उनके अचानक एक-दूसरे से टूटे वाक्यों पर सिर हिलाना और उन कुहराए टुकड़ों को उनकी याद के टापुओं में तैरने देना।

जब पिता के साथ थी तो बात ही अलग थी। शायद यह खून का रिश्ता था जिसके चलते उनकी फुसफुसाहट के साथ ही फौरन जुड़ाव हो जाता था। वे बैठ जाते थे जैसे वे सोए हुए दुलारे जा रहे हों। एक दुखी बच्चे की तरह उदास और गमगीन। ऐसे ही वे अपने आखिरी दिन बैठे थे। इस सांघातिक अनियमितता के चलते जो लाइलाज बीमारी है सिवा इसके कि आप स्नेह और भावपूर्ण तरीके से मरीज को दुलारे और साथ रहेें। मरीज को यह अनुभव कराते रहें कि आप उसके साथ हैं और उस पर दबाव को आप भी महसूस कर पा रहे हैं।

अब मैं यह साफ तौर पर यह याद कर पा रही हूं कि इसी पुराने बिस्तर पर मैं लेटी रहती थी जब सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आती थीं। मैं दूसरे दिन का मुकाबला करने से डरती थी। मैं नर्वस हो उठी। मैंने अचानक दरवाजा खुलने की आवाज सुनी। दरवाजा ज़ोर लगा कर खोला गया हो और यह भड से खुल गया कोई अंदर आता है उसे बड़े ही इत्मीनान से देखती हूं मैं।

‘नहीं, सेन नहीं सेन साहिब, नहीं। मैं रहमत हूं… रहमत रहीम आप यहां आई है हमारी देखभाल के लिए। आप हमारी देखरेख करेंगी या हमारी रखवाली। क्या हम बच्चों की तरह हैं। आप क्या सो रही हैं। बे्रकफास्ट हो गया और …’

‘दंग सी रह गई मैं। मैंने यूं ही खुद पर शाल डाली ली। बिस्तर के किनारे से मैं लगभग कूद सी गई। मेरे अनधुले मुंंह से अजब सी गंध उसे लग रही होगी। बहुत ज्य़ादा तो नहीं। फिर भी वह वहीं खड़ा रहा। एक अजीब तरीके से लगातार घूरता हुआ। मुझे लगा कि यह यहां से हिलेगा नहीं, भले ही मैं आक्रामक तरीके से उस पर हमला करूं तो भी।’ आप क्या मरीज?

‘मरीज़। मैं कोई मरीज नहीं। यहां मुझे सिर्फ रख दिया गया है। मेरा भाई सोचता है कि मेरी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। नहीं, यह डिमेंशिया भी नहीं है। वह इस सिर की जांच करा लेता। मैं कोई बच्चा तो नहीं। इस बीमारी का उसे भय है। सोचता है मैं उसकी चीजें लेकर भाग जाऊंगा। मैं राह भूल भी जाऊंगा तो एक बार या दो बार। लेकिन इसका यह…’

मैं वहां चुपचाप खड़ी थी। बड़ी असहज सी। इस मरीज को देखती हुई जो कुछ मज़बूत इरादों का लग रहा था। यह जताते हुए कि उसके साथ सब कुछ ठीक ठाक है। वह धाराप्रवाह बोल रहा था। वह तो वहां से हटने को तैयार भी नहीं था, जबकि मैं कई बार इशारा दे चुकी थी कि बाद में मिलते हैं लाउंज में।

मैंने न तो मुंह धोया था और न बालों में कंघी की थी। मैंने कोशिश की पीछे जाने की, आगे आने की। लेकिन वह वहीं जमा रहा। ढेरों और वाक्य सुनाता हुआ। तमाम किस्से सुनाता हुआ और साथ में तरह-तरह की भाव-भंगिमा बनाता हुआ। एक भी ब्यौरा वह ऐसे न छोड़ता कि आप उससे बच कर निकल जाएं।

यह एक दिन का वाक्या नहीं था। उसकी लंबी और छोटी कहानियां कभी खत्म नहीं होती। टहलते हुए, खाते हुए, बातचीत करते हुए। इसके पहले कभी मैंने ऐसी लंबी- मोड़ लेती कहानियां नहीं सुनी थीं – चाहे यह रहमत रहीम की टूटी सगाई के बारे में हो। या फिर अपनी महिला दोस्तों में से किसी एक के साथ उसके भाग जाने की हो। उसका अपने दोस्तों के बीच से निकल भागने का हो।

जब वक्त आता उसकी कहानी के खत्म होने का। वह थका सा नज़र आता। लगता गहरे अभाव अपनी मियाद पूरी कर रहे हों। हालांकि वह उस गिरोह में गलत सा था। ऐसे जमे-जमाए खेल में अनफिट सा। जो अचानक आने वाले समय में एक किनारे छोड़ दिया गया हो। दूसरे अनचाहे भी सेवा निवृत सिपाही नील देव और दूसरे सहयोगी (इनमेट) महताब ने कई बार कोशिश की अपनी दर्दनाक कहानियां अपनी याददाश्त के झरोखे से सुनाने की। लेकिन हर बार वह उनकी बात लपक लेता और वे अपनी कहानियों को सुनाने के शब्द तलाशते रहते कि इसकी अपनी कहानी सुनानी शुरू हो जाती।

इस दौरान वह खासा असहाय सा लगता। अनजाने में वह मेरा हाथ पकड़ लेता। आश्चर्य हो कि न हो मैं भी वैसा ही करती। मैं महसूस करती अजीब सा खालीपन। यदि उसका हाथ मेरे हाथ की ओर न बढ़ता या वह मेरा ध्यान नहीं खींचता। दरअसल मुझे खुशी होने लगी थी जब वह मेरे किसी हाथ को अपने हाथ में ले लेता और उसे मजबूती से पकड़े रहता।

मैं शरमा जाती जब वह मेरे चेहरे को घूरता। उसकी निगाहें सीधी मेरे अंदर आती। उन निगाहों के तेज से मैं चकरा जाती। घंटों मैं बैठी उसकी कहानियां सुनती रहती। मानो वे उसकी अपनी हों या फिर उसके मन में अंदर ही अंदर बनी हों। वह उन्हें सुनाता। दूसरे साथी अपने रखवालों के साथ पास ही खड़े होकर सुनते रहते।

उन कहानियों के अंदर जटिल ब्यौरे वह बड़ी खूबसूरती से सुनाता। उसकी कहानियों में दुष्ट शासक, खलनायक, पर्वतारोही और सोने वाले लोग होते। वे धूर्त सिपाही होते जो माल लेकर रफूचक्कर हो जाते। और फिर साथ ही होता फांसी घर और गोपनीय कब्रिस्तान। और यहीं नहीं, कहानियों में ढेरों अजीबों-गरीब नाम होते शासकों के और तब के राजनीतिक माफिया के। और इन सबके बाद भी वह कहता, ‘नाम में क्या रखा हैं।’

खास दिन ही था वह जब उसने कहा, ‘शादी में क्या रखा है।’ उसने अपना हाथ मेरे हाथों में दिया और मेरी आंखों में सीधे देखने लगा। यह फुसफसाते हुए और बोला फिर दुहराया उन आठ अफसरों के बारे में जिनके चलते मेरी बर्बादी हुई थी।

‘नहीं, शादी नहीं!’ मैं चीखी। शायद ज्य़ादा ही ज़ोर से वहां मौजूद साथी हमारी ओर आए यह सोच कर कि रहमत की कहानी में ज़रूर कहीं ऐसा कोई मोड़ आ गया होगा जिसके कारण मैं चीखी। वे यह देख-समझ कर कि ऐसी कोई बात नहीं है वे उधर चले गए जहां महताब भट्ट और नीलदेव परेशान और बेचैन से बैठे थे। क्योंकि रहमत उनके पास गया था अपनी एक लाइन के वाक्य के साथ शायद आपके लिए दुबारा शादी। मेरे लिए तो पहली बार।’

मुझे इस पूरे वाक्य पर एक साथ हंसी भी आए और रोना भी। कमरे में मौजूद उन सभी लोगों के लिए जिनकी मेमोरी सेल सक्रिय थीं वे बड़े ही रहस्यपूर्ण तरीके से हमें देख रहे थे। कभी उसे और कभी मुझे। अगली शाम तक यह सिलसिला चलता रहा जब तक मैंने यह तय नहीं कर लिया कि इसी आदमी से मैं करूंगी विवाह।

वे तमाम चेतावनियां, शब्दों के कुहासों में कहीं खो गईं। कोई भी हमारे रास्ते में नहीं आया। या कहें, मैंने ही नहीं आने दिया। न तो वे संदेहास्पद निगाहें जो मुझ पर और उस पर डाली जाती थीं। बड़ी ही तेज़ी से।

उसका हाथ मेरे हाथ को मजबूती से पकड़ पाता उसके पहले ही अल्जाइमर के इस ‘घर’ को तब्दील कर दिया गया एक किले में। उसे घसीटा गया पुलिस की एक जिप्सी गाड़ी की ओर। उसमें उसे उछाल कर इस तरह फेंका गया मानो हड्डियों का वह एक ढेर हो। उसमें और भी कई पड़े होंगे जिनके नाम दर्ज किए गए या लिखे गए उन गिरफ्तार लोगों की सूची में जिसमें खोए हुए लोगों के नाम दर्ज थे।

मैं पुलिस की उस गाड़ी के पीछे चीखती-पुकारती दौड़ती गई। जब तक मेरे दांतों से दांत टकराने नहीं लगे। ‘वह अल्जाइमर से पीडि़त इंसान है। उसकी बुद्धि बहुत कम है। वह मेरा नया पति है। वह तो आप बड़े साहबों … अधिकारियों के नाम भी नहीं ले सकता। वह अपना मुंह भी अब नहीं खोल सकता।

लेकिन एक बार उसे पूछताछ के लिए घसीटा गया। फिर वह खामोश हो गया। वापसी का कोई मौका भी नहीं। उसे गुमशुदा कैटेगरी में डाल दिया गया। कभी दिखे या न दिखे।

अपने नाम के साथ मुझे अधूरी विधवा की पदवी लटका कर वह गायब हो गया था। मैं एक कैदी शिविर से दूसरे कैदी शिविर। पूछताछ के एक केंद्र से दूसरे केंद्र का चक्कर लगाती रहती। यह उम्मीद करती कि उससे पूछताछ अभी चल रही होगी। उन बड़े नामों के साथ, बड़े-बड़े पदों के साथ और बड़े आरोपों के साथ।

शादीशुदा या बिलकुल साफ कहें तो दुबारा शादी तो हुई भले ही एक दिन के लिए। दूसरे ही दिन तो आधी विधवा की श्रेणी में आ गई। जब उसे जबरन अल्जाइमर होम के बाहर खड़ी पुलिस जिप्सी में वे घसीटते हुए ले गए थे। ‘अल्जाइमर होम’ वह जगह थी जहां ऐसे लोग रहते है। जिनकी सोच याददाश्त के झरोखों से कुछ कुछ देर के लिए बाहर आती है और फिर गुम हो जाती है। वहां रहने वाले ऐसे लोग थे जो बीते हुए को आज की वास्ताविकता से जोडऩे की कोशिश करते हैं।

आज भी मैं तैयार हो रही हूं। इस सीढ़ी से नीचे उतर कर किसी बस या मेटाडोर से जाकर अपने ‘लापता’ हो गए पति को तलाशने। ये विचार नहीं छूट पाते। ये सब हमेशा मेरे दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। रंग खो चुका एक दुपट्टा में अपनी छातियों पर डालती हूं। फिर मैं अपने सीने को देखती हूं … कितनी निराशा होती है। मानो और देखूं तो एहसास ही कि मेर बीते कल से मेरी निराशा का ही अंदाजा लगाया जा रहा है। आखिरकार, उस किशोर उम्र में मेरे सीने पर जब उभार आने लगे थे तो लगता था कि भावनात्मक दौर से उनका साथ है जिनसे मैं गुजर रही हूं।

पहली बार मैंने उनमें बदलाव तब अनुभव किया जब हाईस्कूल में मैं प्यार कर बैठी थी। ये स्तन तब बड़े फुर्तीले और बेहद सजग लगते थे। अचानक हम जब अलग हुए तो ये बेस्वाद से झुके से लगते थे, मानो सूरज की रोशनी से नई पत्तियां अचानक मुरझा गई हों। सीने पर लटकी बेमतलब। ज्य़ादा वक्त नहीं बीता जब मैं दूसरी बार आकृष्ट हुई। लेकिन यह भी देखा-देखी का प्यार नहीं था। मैं निढाल लेटी पड़ी थी।

उदासी का दौर था मुझ पर। इस बेमेल शादी का। बिना हिले-डुले मैं लेटी रही। एक रात के बाद दूसरी रात। रविवार से शनिवार तक। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब मैं चौंक कर इधर-उधर न देखती। फिर रोती ज़ोर-ज़ोर से और समय बीतता। न केवल मेरे कपड़े बल्कि मेरे जूते वगैरह भी जो शादी के समय के थे। वह शादी जिसने मुझे सदमे में डाला हर सुबह।

सब कुछ खत्म हो रहा है

भाग रहा है

बड़े शहर की उन बड़ी-बड़ी बसाहट से दूर। उधर को जहां इससे ज्य़ादा भावनाएं हैं या स्तन हैं या जो डुब के पड़े हैं।

आज मैं बैठी हूं। मेरे चारों ओर मेरे ओर आधी बेवा का तमगा लटका है। आज कुछ ही लोग मानते है कि यह पूरी तौर पर बंद है।

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष पर एफआईआर दर्ज

भाजपा के संसद और दिली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के खिलाफ मकान की सील तोड़ने के आरोप में गोकुलपुरी थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। तिवारी के खिलाफ एमसीडी ने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने मनोज तिवारी के खिलाफ़ आईपीसी की धारा १८८, डीएमसी एक्‍ट ६६१ और ४६५ के तहत मामला दर्ज किया है। यादगौरतलब रहे दिल्ली भाजपा अध्यक्ष के एक सीलबंद घर का ताला तोड़े जाने का कथित वीडियो सामने आने के बाद रविवार को विवाद खड़ा हो गया था। आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस ने इस वीडियो को दिल्ली के भाजपा शासित नगर निगमों से जोड़ दिया है।

आप संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि भाजपा की नोटबंदी और जीएसटी के बाद अब सीलिंग ने दिल्ली को बर्बाद कर दिया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि वह (भाजपा) सुबह में सीलिंग करती है और शाम में ताला तोड़ती है। क्या वह समझती है कि लोग बेवकूफ हैं।

उधर तिवारी ने कहा कि वह गोकुलपुर गए थे जहां लोगों ने उन्हें बताया कि १००० के बीच केवल एक घर को निगम ने सील किया है। उन्होंने कहा, ‘मैंने निगम की चुनिंदा नीति के विरुद्ध सील को तोड़ दिया। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि सभी मकान अवैध रुप से बनाये गए हैं लेकिन खास मकान को ही निगम ने कार्रवाई के लिए चुना।’ मांजा रहा है कि तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज होने से उनकी मुश्किल बढ़ सकती है।

यूपीए ने एचएएल को सौद्दे से बाहर रखा : रक्षा मंत्री

कांग्रेस नेता और पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के सरकार पर राफेल डील मामले में हमले के बाद रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर जवाबी हमला किया है। सीतारामन ने मंगलवार शाम कहा कि पिछली यूपीए सरकार ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को सौदे से बाहर रखा था।

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए भारत और फ्रांस के बीच समझौते के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई १० अक्टूबर तक के लिये स्थगित कर दिया है। इस याचिका में राफेल लड़ाकू विमानों के लिए २३ सितंबर, २०१६ को हुए समझौते पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है।

राफेल लड़ाकू विमान के मुद्दे पर सीतारमण ने पूर्व रक्षामंत्री एके एंटनी के आरोप कि एनडीए सरकार ने विमानों को सस्ते में खरीदा है तो फिर १२६ विमानों की जगह ३६ विमानों का सौदा क्यों किया,  सीतारमण ने कहा कि डील यूपीए के दौरान नहीं हुई। इसके अलावा यूपीए के दौरान एचएएल और डसॉल्ट के बीच प्रॉडक्शन टर्म्स को लेकर सहमति भी नहीं बन सकी थी। ऐसे में एचएएल और राफेल एक साथ काम नहीं कर सकते थे।

रक्षा मंत्री ने कहा – ”एचएएल पर कांग्रेस को जवाब देना चाहिए। ऑफसेट के रूल- जिससे आप सामान खरीद रहे हैं, वे प्राइवेट या पब्लिक सेक्टर किसी में भी कर सकते हैं। ये उनके जमाने के कानून हैं”।

इस तरह राफेल मामले पर राजनीती लगातार जारी है। पहले कांग्रेस ने कहा था कि वह शाम ४ बजे प्रेस कांफ्रेंस करके कुछ बड़ा खुलासा राफेल के मामले में करेगी लेकिन फिलहाल इसपर पार्टी की तरफ से कोइ जानकारी नहीं आई है।

सीएम केजरीवाल समेत ११ विधायकों को समन

दिल्ली के मुख्य सचिव से मारपीट के मामले में मुख्यमंत्री केजरीवाल सहित ११ विधायकों को समन जारी हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और ११ अन्य पार्टी विधायकों के खिलाफ समन भेजा है।

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कोर्ट ने इन सभी को २५ अक्टूबर को अगली सुनवाई में पेश होने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से मारपीट मामले में दायर आरोप-पत्र में इन सभी का नाम लिया था। दिल्‍ली पुलिस ने मुख्‍य सचिव मारपीट मामले में विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दायर की है। इस मामले में अमानतुल्लाह खान, प्रकाश जरवार, अरविन्द केजरीवाल, मनीष शिशोदिया, राजेश ऋषि, नितिन त्यागी, प्रवीण कुमार, अजय दूत, संजीव झा, ऋतू राज, राजेश गुप्ता, मदन लाल, दिनेश मोहनिया को आरोपी बनाया गया है।

यह घटना १९ फरवरी, २०१८ की है, जब केजरीवाल के आवास पर राशन कार्ड और अन्य मुद्दों पर बैठक के दौरान मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ कथित रूप से हाथापाई की गई। अंशु प्रकाश का आरोप है कि इस दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया वहां मौजूद थे। घटना के बाद दिल्ली के आईएएएस अधिकारियों ने केजरीवाल सरकार और मंत्रियों से मिलना बंद कर दिया था जिसके बाद सीएम केजरीवाल ने कई दिनों तक उपराज्यपाल ऑफिस में धरना दिया था।