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शीर्षक हीन

स्तब्धता बढ़ती ही जाती है जैसे जैसे जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की संविधान सम्मान यात्रा अलग अलग क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ती है। गुजरात में वाइब्रेंट गुजरात की जो असलियत खुलकर सामने आती हैं, खुली खदानों से लोग परेशान, मीठी विर्दी में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ बड़ा आंदोलन, भरूच में मच्छीमारों की समस्या तो उनके खिलाफ पूरी लड़ाई, जिसकी साथी कृष्णकांत बताते हैं कि अभी जापान सरकार ने बुलेट ट्रेन के लिए पैसा रोका है क्योंकि विस्थापन को लेकर किसानों की बहुत समस्याएं हैं।

ये यात्रा 2 अक्टूबर को दांडी से, जहां पहुंचकर गांधीजी ने अंग्रेजो के खिलाफ नमक तोड़ो कानून का आरंभ किया था, वही से आरंभ हुई।

जयपुर की रोटरी सभा भवन में मौन हो गया था। आंख में आंसू बाहर निकलने से मना कर रहे थे। पूरे राजस्थान में सरकारी गौरव यात्रा की धमक इस मंच पर आकर चुप हो गई थी।

पांतों की आति गांव के 75 वर्षीय दाकू ने अपने कमजोर लडख़ड़ा पैरों पर खड़े होकर कहा कि उनको ना पेंशन मिल पाई। ना राशन का गेहूं मिल पाया। मजदूर किसान शक्ति संगठन के शंकर भाई ने उसी गांव के ऐसे पांच लोगों से रूबरू कराया। दाकू की पत्नी की मृत्यु के बाद पूरा सरकारी अमला यह सिद्ध करने पहुंचा था कि उसके पेट में अनाज था 10 महीने की रुकी पेंशन मृत्यु के बाद अधिकारी लाए और क्योंकि मृत्यु हो गई है इसलिए पैसा वापस ले गए।

100 करोड़ रुपया हर साल वापस हो जाता है क्योंकि आधार के लिए बूढ़े लोगों के अंगूठे निशान नहीं बन पाते। दूसरी तरफ लोग भूख से तड़पते पड़े हैं। एक तरफ बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा के लिए विशेष सुविधाएं दी जाती हैं मगर सबसे निचले पायदान के मात्र हिलती हड्डियों जैसे शरीर जो सिर्फ खाना मांग रही है। जिसके नाम पर सरकार ने खूब घोषणाएं कर रखी हैं। इन सब को देख पूरा सदन सकते में था। राजस्थान की बड़ी आबादी इन परिस्थितियों को झेल रही है। साथियों ने बताया कि पंचायतों के अधिकारी हड़ताल पर हैं, राजस्थान रोडवेज के लोग हड़ताल पर हैं, मनरेगा के अधिकारी हड़ताल पर हैं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हड़ताल पर हैं, राजस्थान हड़तालो का राज्य है। आज सिर्फ एक काम बहुत तेजी से हो रहा है। अल्पसंख्यक और दलितों पर हर तरह से दबाव। नफरत खूब बोई गई है।

उड़ीसा के नियमगिरि आंदोलन के प्रफुल्ला समन्त्रा जी जिनको गोल्डमैन अवार्ड से कुछ दिन पहले ही नवाजा गया है, ने एक सभा में कहा की भारत की स्थिति पर कहा कि यह सरकार हिंदु मुसलमान के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है।और साथ में खास पूंजीपतियों को देश बेच रही है।

समाजवादी किसान नेता डॉ सुनीलम ने बहुत साफ तौर पर कहा कि सरकार बदलना ही अब एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। राजस्थान रोडवेज के 17,000 कर्मचारी हड़ताल पर हैं रात 12 बजे सरकारी कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। मोदी अजमेर में जनता जेल में।

उदयपुर जिले की में एक करोड़ से ज्यादा आदिवासी हैं सूखी खेती के चलते गुजरात में काम करने जाते हैं जंगल तो वैसे भी कम हो गया और जो है उस पर 1 अधिकार की लड़ाई जारी है राजस्थान मध्य प्रदेश में भाजपा शासन में के दौरान मुख्यमंत्रियों का आत्म प्रचार और सरकारी योजनाओं का विज्ञापन यह दो बहुत बड़े काम हो रहे हैं।

मध्यप्रदेश में यात्रा बालागुड़ा गांव से में पहुंचकर पहली सभा की जहां 6 जून 2017 को पुलिसिया जुल्म के शिकार किसान और शहीद हुए अभिषेक जैसे युवाओं के माता पिता ने शिरकत की अब किसान क्या करें 75 पैसे किलो लहसुन कहा बेचे।

टमाटर की तरह लेसुन को भी फेंकना पड़ रहा है। गाय का नारा देने वाली सरकार दूध का सही दाम भी नहीं दे पा रही है। फसल का गोदाम छोडि़ए मौसमी संतरा भी ₹2 किलो बेचना पड़ता है। किसान बहुत चोट खाए और उद्विग्न हैं।

महू बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी की जन्म-स्थली पहुंच यात्रियों ने जब बाबा साहब की मूर्ति को फूल चढ़ाए तो गौरव का अनुभव हुआ। संविधान का हो सम्मान, संविधान सम्मान यात्रा जिंदाबाद, ऐसे नारे और संविधान की चर्चा, शब्द और भावना सब एक हो गए।

ग्राम सभा के अधिकार और स्वायतत्ता पर सरकार हमले कर रही है। लगभग 12000 पंचायत सदस्यों के पद खाली है।

पीथमपुर मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है

प्रतिभा सिंटेक्स के बाहर मजदूरों के धरने पर यात्रा पहुंची कल रात को ही धरना दे रहे मजदूरों का तंबू उखाड़ा गया था और मारपीट की गई थी। आचार संहिता का भय दिखाकर। पूरे पीथमपुरा क्षेत्र में मजदूरों के अधिकार व सुविधाओ, महिलाओं की गरिमा और नागरिक अधिकारो का खुले आम उल्लंघन हो रहा है। पीतमपुर में 80त्न मजदूर ठेका मजदूरी पर है। ये पूंजीपतियों और सत्ता कि गलबहियों का नतीजा है।

मजदूरों के साथ पीतमपुरा जलूस निकाला गया। संविधान सम्मान यात्रा ने बाद में हुई सभा में आम लोगो से कदम से कदम मिलाकर संघर्ष करने का किया आवाहन। मेधा पाटकर ने मजदूर, आदिवासी, किसान विरोधी सरकार को मृत करार दिया।

जब आप अपने अधिकारों से वंचित लोग, बिना पानी सूखे खेत और पानी से भरे बांधो के पानी को कंपनियों की ओर मुड़ते देखते हैं, महीनों से सड़क पर बिना तनख्वा के पड़े मजदूरो, रेप पीडि़त महिलाएं जिनके केस पुलिस दाखिल नही करती, बरसो से पुनर्वास नही हों पाया ओर ऐसी अनेकानेक समस्याएं बिना हल के पाते है फिर भी समाधान कि जगह हिन्दू मुसलमान की घुट्टी दी जाये तो क्या होगा?

बस में 15 राज्यों के लोग हैं समन्वय के कुछ वरिष्ठ साथी लगातार चल रहे हैं प्रफुल्ल सामन्त्रा, मीरा संघमित्रा, भूपेन्द्र रावत, डॉ सुनीलम, मेधा पाटकर, महाराष्ट्र की स्वास्थ्य कार्यकर्ता सुहास कोल्हेकर, गुजरात से कृष्णकांत जिनका बुलेट ट्रेन पर काम है।

40 से 50 साथी बराबर रहते हैं कुछ संगठनों के साथी आते हैं, नए जुड़ते हैं, कुछ 2 दिन 4 दिन के बाद वापस होते हैं। पहले चरण में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ होंगे।

मजदूर किसान शक्ति संगठन के शंकर भाई और उनकी मंडली जुड़ी, अपने गीतों से भरी कठपुतली के माध्यम से सरकारी योजनाओं की सारी असलियत बता देते हैं और लोगों की ताकत का भी एहसास कराते हैं राजस्थान के अलावा देशभर में उनकी कठपुतली और गीत प्रसिद्ध हैं। मनरेगा मजदूर यूनियन बनारस से आये साथी महेंद्र भाई व सुरेश भाई

नदी वाला गीत व पुरवइया की बाहर जैसे गीतों से मिट्टी की सुगंध लाते हैं। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में सेंचुरी मिल मजदूरों की जो लंबी लड़ाई साल भर से चली है जिसमें जीत हासिल हुई। आज कंपनी फंसी है अपनी वायदे में। एक रुपए में पूरी कंपनी मजदूरों को देने का वादा सेंचुरी मिल मालिक बिरला जी ने किया था। आंदोलन के लोग अपने को नर्मदा बचाओ आंदोलन का हिस्सा मानते हैं। मेधा पाटकर अपने 33 वर्ष के अनुभवों को लेकर इस आंदोलन में ऊर्जा दे रही है। सेंचुरी मिल मजदूरों में बहुत लोग बिहार और उत्तरप्रदेश के हैं उनमें से नवीन भाई भी है। आंदोलन के ढेर सारे गीत, उनकी दर्द भरी आवाज में बस यात्रा के साथ कार्यक्रम और तब असली गूंज रहे हैं।

यात्रा में युवाओं की भागीदारी पूरी वैचारिक सोच और जिम्मेदारी के साथ है। उमा और हिमशी यात्रा की जिम्मेदारी लेकर चल रही हैं। यात्री कब कहां उतरे? कार्यक्रम कैसे हो? कौन से पर्चे बांटने हैं? बस कहां रुकनी है? अगला पड़ाव कौन सा होगा? पूरी यात्रा का प्रबंधन उनके पास है। साथ में कई युवा भी हैं।

हाल ही में चुने गए डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष पल्लव ज्योति हजारीका है, देवजानी बोडो, रिंपी बड़ठाकुर, आर्यमन, आर्यन, रोहित, अक्षित, भागीरथ यह सब 30 वर्ष से कम के युवा संविधान की प्रस्तावना सभा के अंत में पढ़ते हैं। संविधान सम्मान यात्रा क्या है? क्यों है इसके बारे में सभा में बात रखते हैं। यात्रा की वीडियो शूट करते हैं। फेसबुक पर अपडेट करते हैं। मगर काम सुगठित रूप से हो, उसकी जिम्मेदारियां बांटकर चलते हैं।

यात्रा बस में खूब गीत गाते हैं। ऐसी सकारात्मक ऊर्जा देश में फैले जहर को दूर करने निकली है।

ऐसे युवाओं की टोली यात्रा की दूसरी और तीसरी चरणों में थोड़ी बढऩे वाली है।

जयपुर में गौरव यात्रा के समापन तक चुनाव आयोग ने अपनी प्रेस वार्ता भी रोकी थी। जो बताता है कि जब कहीं हद तक आज मीडिया सत्ता न्यायपालिका चुनाव आयोग तक एक मु_ी में कैद है जो संविधान को बदलना चाहते हैं इसीलिए संविधान सम्मान यात्रा बाबा साहब के विचारों और सपनों सम्मानित करना और बचाना यह यात्रा का संदेश है।

लेखक सिर्फ साहित्य का नहीं, व्यापक स्वतंत्रता का चौकीदार भी

स्वतंत्रता और लेखक का संबंध आवयविक है। कुछ इस तरह कि एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता। यह भी सही है कि लेखक के लिए स्वतंत्रता एक साथ स्थिति और संभावना होती है।

पुणे में हुई पीईएन इंटरनेशनल के अधिवेशन में विश्वविद्यालय के सभागार में बोलते हुए मैंने कहा कि लेखक के लिए स्वतंत्रता एक अनिवार्य ज़रूरत है क्योंकि जैसा वह चाहता और महसूस करता है वैसा ही लिख भी सके। उसका विश्वबोध, सच्चाई की समझ और अहसास जैसे उसे लगते हैं, वैसे ही हमारे समय के मानवीय हालात, अपनी जटिलताओं, तनावों, अंतविरोधों और बेचैनियों के साथ उसे नज़र आते हैं। उसे लगता है कि उसे स्वतंत्रता चाहिए जिससे वह साहस, कल्पना और विश्वास के साथ मानवीय विडंबना के बारे में लिखे और खोज भी कर सके। कल्पना का जो लोकतंत्र लेखक रखने की कोशिश करते हैं वे दिए हुए के वरिक्स विकल्प का सपना देखते हैं। वह संभव ही नहीं अगर स्वतंत्रता न हो।

परम स्वंतत्रता संसार में संभव नहीं है। हर जगह वह कंटी-छंटी ही मिल पाती है। हो सकता है कि राजनीतिक कानूनी स्वतंत्रता हो पर आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता न हो। आर्थिक स्वतंत्रता हो पर मुक्त चिंतन की आध्यात्मिक स्वतंत्रता  न हो। नयाचार और प्रयोग पर मुमानियत हो। लेखक इन सीमाओं के अंदर रह कर ही अपनी स्वतंत्रता अर्जित करने और उसे व्यापक बनाने की चेष्टा करते हैं।

लेखक वैसे भी कुछ विभिन्न जीव होते हैं। उनके लिए जीवन और अस्तित्व, यथार्थ और कल्पना, अनुभव, और संघर्ष, भावना और विवेक, सच और निश्चय बेचैनियां और दबाव आदि प्रश्नांकन के पात्र होते हैं। साहित्य की विश्वसनीयता और नैतिक औचित्य निकलते ही इस सच्चाई से हैं कि साहित्य यथासंभव सच कहने की हिम्मत और हिकमत करता है पर अपने सच पर संदेह भी। उसका सत्य संशय विद्ध सत्य होता है जो उसे राजनीतिक नैतिक और आर्थिक वैज्ञानिक और सामाजिक सत्यों से बिलकुल अलग कर देता है।

सत्य और संशय से घिरे लेखक मजिस्टे्रेट या जज होने से इंकार करते हैं। सत्य हमारे समय में लगातार संकट में है। वह लगभग हर क्षेत्र में अल्पसंख्यक होता जा रहा है। यह शायद इतिहास में अभूतपूर्व है। झूठ को इससे पहले शायद ही कभी ऐसे अवसर, तकनीकी सहायता और मानवीय समर्थक मिले होंगे कि झूठ न इस सत्यतीत समय में सत्य को बुरी तरह से ढांक घेर लिया। लगने लगा है कि दुनिया झूठ से ज्य़ादा तेजी से बदल रही है बजाए सत्य के। इस समय लेखक अल्पसंख्यक हैं तो सत्य के साथ है। वे सत्य की सचाई पहचानते, सत्य के गलत और स्वपन गढऩे और उसकी उपस्थिति पर इसरार करने का अलोकप्रिय काम कर रहे हैं। राजनेता, विचारधारियों, टेक्नोक्रेट, धर्मनेताओं की तरह वे झूठ सत्य को छुपाने के लिए नहीं, जाहिर करने के लिए गढ़ते हैं। उनके गल्प सत्य के गल्प होते हैं। लेखकों के बोलने, सुने गुने जाने, उनके सतय के प्रश्नों से दो चार होने के अवसर निरंतर घट रहे हैं। कई बार लगता है कि पाठक और समाज लेखकों  द्वारा खोजे पाए सत्य को जानना चाहता है। यह मात्र खासख्याली है।

एक पहल यह भी है कि हमारा समय और समाज इस समय भीषण विस्मृति की चपेट में है। उसे सांस्कृतिक और सामाजिक स्मृतियों से वंचित किया जा रहा है। राजनीति और मीडिया ने मिल कर एक अभियान चला दिया है कि लोग भूलते जाएं। उनके जहन में कुस्मूतियां और गंदगी भर जाए और विस्तृति बढ़ती रहे। दूसरी तरफ साहित्य और स्मृति में बंदमूल होता है। वह भूलता नहीं है। भले, क्षमा करता चलता है। साहित्य में स्वतंत्रता का सीधा संबंध सत्य और स्मृति से होता है। आप स्वतंत्र नहीं है। अगर आप सत्य बोल व्यक्त नहीं कर सकते कल्पित और याद  नहीं कर सकते।

यों तो दुनिया भर में उदार शक्तियां बेहद दबाव में हैं। लेकिन भारत में हिंसा-हत्या-लिंचिंग घृणा की एक नई नागरिक शैली विकसित हो गई है। चार लेखकों बुद्धिजीवियों की दिन दहाड़े हत्या और उनके अपराधी बरसों बाद भी न पकड़े गए, न दंडित हुए, इस भयक्रांत परिवेश में लेखकों में आत्म सेंसरशिप घर कर सकती है। यह स्वतंत्रता का एक और हनन होगा। यह विचित्र है कि घृणा कि वे अपने पर प्रहार करें और लेखक बुद्धिजीवी स्वतंत्र नहीं है कि सत्य पर इसरार या उसकी अभिव्यक्ति करें।

स्वतंत्रता का एक ज़रूरी पक्ष बहुलता भी है। बिना संसार, अस्तित्व, आस्था विचार, दृष्टि शैली नवाचार प्रयोग आदि की विविधता की स्वंतत्रता सच्चे अर्थों में संभव नहीं, संसार की भाषाई विविधता और समृद्धि को बचाने के लिए पर्यावरण बचाओ जैसे विश्व आंदोलन की आज दरकार है।

बीसवीं सदी ने हमें सिखाया है कि सत्य, विचार, अनुभव, दृष्टि आदि की एकनिष्टता अनंत तानाशाही को प्रेत्साहित करती है। यह स्वतंत्रता नष्ट ही नहीं करती बल्कि एकनिष्ठता के नाम पर जनसंहार से बाज भी नहीं आती। एक बड़ी विडंवना यह है कि स्वतंत्रता में इजाफा करने के सभी उपकरण जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं आदि इन दिनों बहुत ही उत्साह और अचूक अनैतिक हेकड़ी से स्वतंत्रता में कटौती करने में लगे हैं।

पीईएन इंटरनेशनल

इस संस्था (जीईएनइंटरनेशनल) ने पहली बार पुणे में यानी भारत में अपना पहला वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया। उसने भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में आ रही बाधाओं, उस पर किए प्रहारों, हिंसा और हत्या की कड़ी निंदा की और कई कानूनन उपायों को करने करने की मांग की। दुर्भाग्य से मोदी मीडिया के अधिकांश ने न तो वक्तव्य छापा और न इस अधिवेशन की कोई रिपोर्ट ही। जबकि इसमें 80 देशों के लेखक प्रतिनिधि शामिल हुए।

पीईएन (यानी पोस्ट, ऐसेइस्ट, और नावेलिस्ट) की स्थापना लंदन में 1921 में हुई थी। उसका उद्देश्य लेखकों के बीच हर कहीं समझ और बौद्धिक सहयोग बढ़ाना, ऐसी समझ बढ़ाने में साहित्य की भूमिका पर इसरार करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खड़े होना और ऐसे लेखकों के लिए आवाज़ उठाना था जो परेशान, चुप होने के लिए विवश किए जाते, उन्हें कैद किया जाता हो और कई बार अपने नज़रिए के कारण मारे जाते हों। लेखकों का यह पहला विश्वव्यापी संगठन है और ऐसा पहला गैर सरकारी आयोजन जो मानव अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध रहा है। पीईएन ने लगातार यह आग्रह किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्य में अटूट संबंध है। उसने इस पर भी बल दिया कि साहित्य किन्हीं सरहदों में महदूद नहीं किया जा सकता और सारे राजनीतिक संघर्षों के बीच भी लोगों के बीच साहित्य का साझा विनियम होना चाहिए।

सुनें कथा अयोध्या की

अयोध्या में राम मंदिर को लेकर कोई विवाद नहीं है। विवाद इस बात पर है कि कभी जहां राम मंदिर था वहां मस्जिद बनी। उस मस्जिद में भी बरसों से नमाज़ नहीं पढ़ी गई। बाद में वह मस्जिद जब टूटी तो वहां की ज़मीन सरकार ने ले ली लेकिन चार साल से ऊपर होने पर भी राम मंदिर नहीं बना। टाइहिलय्ट पर अदालती सुनवाई की पहल इस महीने के अंत में सुप्रीम कोर्ट में होनी है।

पत्रकार-लेखक हेमंत शर्मा ने पुराने शहर अयोध्या के राम मंदिर विवाद के परिप्रेश्य में खासा उत्खनन कर डाला है। ‘युद्ध में अयोध्या’ उसकी किताब है। इसमें ढेरों फोटो हैं। मंदिर की आवाज़ उठाने वाले विभिन्न धर्माविलंबियों के साथ हिंदू भी रहे हैं। अपने खास अंदाज और सरलता से उन्होंने वह इतिहास समझने की कोशिश की है कि यदि सरयू नदी किनारे अयोध्या बसी, राम वहां जन्में, तो मंदिर भी वहीं था। जिसके महत्व के कारण वहां शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सभी अपने-अपने दौर में आए। राम मंदिर में भी बदलाव होते रहे। पर मंदिर रहा। लेकिन जब मंदिर की जगह पर मस्जिद बन गई तो कटुता बढ़ी। देश की आज़ादी के बाद हिंदुओं ने अपनी गौरवपूर्ण परंपरा को बचाने की पहल की। वह सिलसिला आज भी जारी है।

पत्रकार हेमंत शर्मा तब लखनऊ में थे जब मस्जिद को ताला खुला और शिलान्यास हुआ। वे अयोध्या में हुए रामभक्तों के ऐतिहासिक आंदोलन के चश्मदीद पत्रकार रहे हैं। जिन्होंने पूरे आंदोलन को, तब के राजनेताओं को और जन उत्साह को बेहद करीब से जाना-समझा और देखा। अयोध्या पर ही उनकी दूसरी किताब अयोध्या का चश्मदीद इस लिहाज से ज़रूर महत्वपूण ऐतिहासिक दस्तावेज बतौर माना जाता रहेगा क्योंकि उन्होंने वहां के पूरे घटनाक्रम को बाकायदा तिथिवार दिया है। आंदोलन की तैयारी और उस ध्वंस का भी उल्लेख जिसे अन्यत्र पाना कठिन है। रघुनाथ कथा यहीं खत्म नहीं होती। इस पूरे मामले की समीक्षा और सरकारी तंत्र की बेबसी का तारीखवार ब्यौरा इस पुस्तक को निष्पक्ष बताता है। ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ दो ऐसी किताबें हैं जिन्हें आप पढऩा शुरू करेंगे तो छोड़ नहीं सकें गे। आपको एक पुराने शहर की ऐतिहासिकता और हर दिन उसके नए होते जाने की वजहों की तभी जानकारी मिलेगी।

इन किताबों का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने 20 सितंबर को नई दिल्ली में किया। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि न्याय की उपेक्षा पर अयोध्या में महाभारत हो सकता है। उनकी बात को समझा जाना चाहिए।

किताबें – 1. युद्ध में अयोध्या

   2. अयोध्या का चश्मदीद,

लेखक हेमंत शर्मा प्रकाशन प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

उत्तराखंड में बाघों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त

उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट और राजाजी नेशनल पार्क की केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में अलग पहचान है। ऐसे में वन विभाग भी पार्क सहित जंगलों में बाघ, गुलदार, हाथी, हिरण समेत दूसरे जंगली जानवरों की देखरेख में कोई कमी नहीं छोड़ता। लेकिन हालिया सर्वे के मुताबिक उत्तराखंड में पिछले आठ साल में बाघों के मौत के आंकड़ों में बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, बीते आठ साल में अब तक कुल 82 बाघों की मौत हो चुकी है।

लेकिन इस मामले में और देरी न करते हुए सितंबर माह में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में बाघों के शिकार के मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच के आदेश दिए हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अभयारण्य में पिछले पांच साल में हुई बाघों की मौत और उनके शिकार में अधिकारियों की कथित संलिप्तता की सीबीआई जांच के आदेश दिये हैं।

क्या है हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट अपने ने इस आदेश में सीबीआई से उत्तराखंड राज्य में शिकार के सभी मामलों में प्रारंभिक जांच करने को कहा और वन विभाग के अधिकारियों के और मामले में उनकी संलिप्तता और भागीदारी का पता लगाने के लिए अनुरोध किया है। ‘अदालत ने सीबीआई से तीन महीने में एक प्रारंभिक रिपोर्ट जमा करने को कहा है। इतना ही नहीं अदालत ने पुलिस को भी आदेश दिया है कि वह तीन माह के अंदर शिकारियों को पकड़े।

इसने एनटीसीए को छह महीने के भीतर कॉर्बेट की दक्षिणी सीमा के साथ वन क्षेत्र में नुकसान का निर्धारण करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि क्षेत्र में दो रिपोर्टों के आंकड़ों में बदलाव थे। कोर्ट ने उत्तराखंड पुलिस को तीन महीनों के अंदर शिकारियों को गिरफ्तार करने के लिए एक विशेष टीम का गठन करने का निर्देश दिया।

अदालत की नैनीताल खंडपीठ ने मार्च 2016 में हरिद्वार में पांच बाघों की खाल के जब्त होने के मामले में एनजीओ ऑपरेशन आई टाइगर इंडिया की याचिका की सुनवाई के बाद जांच का आदेश दिया था। जब्त हुए बाघ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और आसपास के क्षेत्रों से थे। इसके अलावा अदालत ने रिजर्व के अंदर ढिकाला जोन में कर्मशियल गाडिय़ों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया, जो बाघ के दृश्यों के कारण पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय था।

जिम कॉर्बेट से मिलने वाला राजस्व

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र ने झिरना और बिजनानी रिजर्व के क्षेत्रों में 32 वाहनों की अनुमति दी है और कोर्ट का यह फैसला आगे भी जारी रहेगा। अदालत ने तीन अगस्त को कॉर्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व में कर्मशियल वाहनों की संख्या 100 तक सीमित कर दी थी। बाद में नौ अगस्त को अदालत ने अपने आदेश में संशोधन किया और कहा कि कॉर्बेट के पांचवे ज़ोन और राजाजी टाइगर रिजर्व के एक जोन में 20 वाहनों की अनुमति होगी।

कॉर्बेट लगभग 240 बाघों का घर है और रिजर्व के दिन के दौरे के लिए 180 वाहनों की अनुमति है। रात भर रहने वाले पर्यटकों के लिए अतिरिक्त 25 वाहनों की अनुमति है। तीन लाख से अधिक पर्यटक सालाना कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में जाते हैं और पार्क नौ करोड़ रुपये से ज्यादा राजस्व कमाता है। कॉर्बेट प्रबंधन के साथ लगभग 250 से भी अधिक वाहन मालिक रजिस्टर हंै ऐसे में वाहनों की संख्या कम करने से गाड़ी मालिकों को परेशानियो का सामना करना पड़ सकता है।

वहीं इस संबंध में प्रिंसिपल चीफ कंजऱवेटर ऑफ फॉरेस्ट जय राज ने कहा कि स्थानीय लोगों की आजीविका ढि़काला और कॉर्बेट के अन्य क्षेत्रों में सवारी से जुड़ी हुई थी। ‘हम कोर्ट से पुनर्विचार करने के लिए एक बार फिर संपर्क कर सकते हैं।

बीते दिनों अखिल भारतीय स्तर पर बाघों की गणना की गई थी। जिसमें देशभर के 50 बाघ आरक्षी क्षेत्रों में उत्तराखंड सबसे आगे बढ़ा है, हालांकि यहां भी शिकार हुआ है पर अन्य बाघ आरक्षित क्षेत्रों की तुलना में यहां बाघ ज्यादा पाए गए हैं। इस गणना में उत्तराखंड में 433 बाघ मिले हैं, जो अपने आप में बाघों के लिए ही नहीं वन्य पशु प्रेमियों के लिए भी खुशी की खबर है। उत्तराखंड बाघों के संरक्षण में कर्नाटक के बाद दूसरे स्थान पर आता है, लेकिन प्रदेश में बाघों के पूर्ण संरक्षण के बावजूद बाघों की मौतों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है, यह चौकाने वाली बात है। वर्ष 2010 से 2017 के बीच बाघों की मौत का यह आंकड़ा 82 तक पहुंच चुका है, जिसमें वर्ष 2011 में 18 और वर्ष 2015 में सर्वाधिक 13 बाघों की मौत हुई।वहीं साल 2017 में 12 बाघों की मौत हुई।

जहां एक तरफ सरकार तमाम कोशिशों के बाद भी कॉर्बेट टाइगर रिर्जव में बाघों के शिकार व मरने की संख्या से परेशान हैं वहीं कुछ गैर सरकारी संस्था भी इस मुद्दे पर जम कर काम कर रहे हैं। ऐसी ही एक संस्था रुरल लिटिगेशन एंड एन्टाईटलमेंट केंद्र पिछले कई सालों से राज्य में अलग-अलग मुद्दों पर काम कर रही है। आर.एल.ई. के चेयर पर्सन अवधाश कौशल नें टाईगर पोचिंग और हाईकोर्ट द्वारा सीबीआई को जांच देने के मामले में बातचीत में कहा कि अगर हम पिछले पांच साल की बात करें तो 80 से भी ज्यादा बाघों की मौत हुई है जो की हमारे लिए चिंता का विषय है। ज़मीनी स्तर की इस समस्या का समाधान सीबीआई के हाथ में भी नहीं है। देखा जाए तो सरकार  टाईगर रिर्जव के लिए अच्छा खासा बजट देती है लेकिन इस पैसे को किस तरह से खर्च किया जाता है यह मॉनिटर करने के लिए कोई नहीं है। टाईगर रिर्जव में पोचिंग से तो बाघ मरते ही हैं लेकिन कुछ बाघ बेहतर खान-पान की कमी से भूखे भी मरते हैं और उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। आए-दिन जंगल में मिलने वाले बाघों के शव बुरी तरह से सड़े-गले होते हैं जिनमें से ज्यादातर बिना खाने पीने के मरे होते है। अवधाश कौशल ने कहा कि सरकार को इस परेशानी से ज़मीनी स्तर से लडऩे के लिए जंगल में रहने वाले वन-गुर्जरों की मदद लेनी चाहिए जबकि सरकार इन्हीं को जंगलों से बाहर निकाल रही है। जंगल में रहने वाले ये वन गुर्जर एक साधारण इंसान से ज़्य़ादा इन जानवरों को समझते हैं तभी शायद इनके घरों में जंगल में रहने के बावजूद भी दरवाजे नहीं होते। इसलिए आए दिन मरने वाले बाघों को बचाने के लिए सरकार को इन वन गुर्जरों की मदद लेनी चाहिए। बीते दिनों बागेश्वर और अल्मोड़ा में नरभक्षी बाघों को मारने की इज़ाज़त खुद सरकार ने दी। जहां एक तरफ ऐसा माना जाता है कि प्रोटेक्टेड क्षेत्र में बाघ सुरक्षित हैं वहीं बाघों को इन क्षेत्रों में ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है और जंगलों से बाहर बाघ सुरक्षित हैं। इसका मतलब साफ है कि इन बाघों की देख-रेख में बड़े स्तर पर कोताही बरती जा रही है।

रामनगर को बाघों की राजधानी कहा जाता है। इनकी अच्छी तादाद के चलते यह क्षेत्र मशहूर है। बाघों के कारण ही साल दर साल सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व मिलता है। बाघों की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट हर साल आता है लेकिन पिछले कुछ समय से बाघों की मौत ने रामनगर को सुर्खियों में ला दिया है। कभी आपसी संघर्ष में बाघ जान गंवा रहे हैं तो कभी संदिग्ध परिस्थितियों में बाघ के सड़े-गले शव बरामद हो रहे हैं। भले ही बाघों की मौत की वजह अलग-अलग हो लेकिन बाघों का लगातार मरना कई सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि कॉर्बेट के अधिकारी बाघों की मौत एक इत्तफाक ही मानते हैं।

यह मामला सीबीआई और हाईकोर्ट के अधीन होने के कारण इस मामले में किसी भी सीनियर ऑफिसर ने कुछ भी कहने से मना किया है।

जल ही जीवन है

स्वच्छ जल के बगैर न तो निजी स्वच्छता संभव है न स्वस्थता और न शौचालयों का उपयोग कर पाना संभव है। एक तरफ देश और दुनिया में वातावरण में आ रहे बदलाव के कारण बढ रहे तापमान के कारण हिमालय में गिलेशियर का क्षेत्रफल सिमट रहा है, पर्वतीय क्षेत्र में अधिकतर प्राकृतिक स्त्रोत सूखते जा रहे हैं, अधिक दोहन से भूजल का स्तर गिरने के कारण धरती की गागर खाली होने जा रही है, देश की अधिकतर नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और शहरों में बहने वाले गंदे नालों को ठिकाने लगाकर दुषित किया जा चुका है और फसलों में अत्यधिक रसायन, कीटनाशकों का छिड़काव करने और सीवेज नेटवर्क से वंचित क्षेत्र में मल-मूत्र को ठिकाने लगाने के लिए बने शौचालयों के टैंकों से रिसाव होने से भूजल दुषित हो रहा है।

प्रतिवर्ष गरमियों के मौसम में देश की बडी आबादी को पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने को विवश हो जाती हैं वर्ष 2016 में पानी के अकाल के कारण केन्द्र सरकार को देश के 253 जिलों को सूखा क्षेत्र घोषित करना पड़ा था। सरकार न तो गर्मियों के मौसम में जल संकट के वक्त देशवासियों को पर्याप्त मात्रा में पीने के पानी की आपूत्ति कर पाती है और न देश में अब तक बन चुके शौचालयों का उपयोग करने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध करवा पाई है।

केन्द्र सरकार पिछले 4 साल से गांधी के चश्मे को स्वच्छ भारत अभियान का प्रतीक बनाकर, नारों में स्वच्छ भारत का शोर और शौचालय बनवाने पर जोर दे रही है। उसने देश में सबके लिये घर-घर में, सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय बनवा कर खुले में शौच की प्रवृत्ति पर विराम लगाकर 2 अक्टूबर 2019  की गांधी जी के 150 वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या तक देश को खुले में शौच मुक्त भारत (ओडीएफ) हासिल करने का लक्ष्य तय कर रखा है। इसको हासिल करने के लिये मोदी सरकार ग्रामीण भारत में 1.96 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से निजी,सामुहिक और सामुदायिक स्तर पर लगभग 1.2 करोड़ शौचालयों का निर्माण करवाने में जुटी हुई है।

स्वच्छ भारत अभियान के तहत देशभर में बनवाये जा चुके शौचालयों को स्वच्छ भारत के लिए सबसे अहम कार्य और अपनी उपलब्धि मानते हुए मोदी सरकार गत 26 जुलाई 2018 को संसद में 19 राज्यों गुजरात, उत्तराखंड,सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, उत्तराखंड, हरियाणा, चंडीगढ़, दमन और दीव, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, मेघालय, दादरा और नगर हवेली, पंजाब, मिजोरम, राजस्थान, अंडमान और निकोबार द्वीपों, लक्षद्वीप, महाराष्ट्र, और आंध्र प्रदेश को खुले में शौच से मुक्तÓ (ओडीएफ) घोषित कर चुकी है। संसद के समक्ष खुले मे शौच मुक्त उक्त राज्यों की सूची पेश करते हुए केन्द्रिय ग्रामीण विकास, पंचायत राज मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर कहा था कि भारत के उक्त राज्यों के 418 जिले, 4018 ब्लॉक तथा 4 लाख 125 गाँव सौ फीसदी खुले में शौच से मुक्तÓ (ओडीएफ) हो चुके हैं।

अब तक कागजातों में बन चुके शौचालयों और धरातल पर बन चुके शौचालयों का भौतिक सर्वेक्षण करने पर न केवल शौचालयों की संख्या में बडा अंतर  उजागर हो चुका है बल्कि केन्द्र सरकार संसद में जिन राज्यों को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित कर चुकी है ऐसे राज्यों में शामिल उत्तराखंड के बारे में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) अपनी रिपोर्ट व गुजरात के बारे में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की उस रिपोर्ट से केन्द्र सरकार की पोल खुल चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक उक्त दोनों राज्यों में शौचालयो से वंचित रह चुके परिवार बड़ी संख्या में खुले में शौच करने को विवश हैं।

यही नहीं देश में लाखों ऐसे घरों में शौचालय बनवाये जा चुके हैं जिन घरों में शौचालयों मे उपयोग करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं है, जिन घरों में बने शौचालयों में उपयोग करने के लिये पर्याप्त पानी तो उपलब्ध है लेकिन उनके शौचालयों के टैंक भर जाने के बाद न तो साफ करने के लिए किसी तरह की सुरक्षित व्यवस्था है और न टैंकों से निकाले जाने वाली गंदगी को ठिकाने लगाने के लिए ऐसी जगह है जिससे गंदगी के कारण बिमारियां न फैल सकें। शौचालयों के टैंकों से निकलने वाली गैस से हवा दूषित होने से वातावरण भी दूषित हो रहा है।

खुले में शौच पर विराम लगाकर महिलाओं की निजता और सम्मान की हिफाजत तो हो सकती है लेकिन इस वैज्ञानिक युग मे शौचालय बनवा कर न तो मल-मूत्र को सीवेज के माध्यम से नदियों में ठिकाने लगाकर नदियों को गंदे नालों में और न टैंक बनाकर भूजल में ठिकाने लगाकर पेयजल के अहम श्रोतों को दूषित करने की प्रवृत्ति को किसी भी दशा में न तो मानवीय, न सामाजिक, न व्यवहारिक, न वैचारिक तौर पर सही ठहराया जा सकता है तब ऐसे में इसे गांधी की दृष्टि और सपने का स्वच्छ भारत बताना  न केवल गलत है बल्कि यह गांधी की सोच और विचार धारा के भी विपरीत है।

मशीनों से पानी का रंग-रूप और स्वाद तो बदला जा सकता है लेकिन जरूरत के लिये मशीनों से पर्याप्त पानी उत्तपति संभव नहीं है। हाल में जिस तरह स्वच्छ भारत अभियान के तहत केन्द्र सरकार की संसद में की गई घोषणा की सीएजी की रिपोर्ट और आरटीआई से मांगी गई जानकारी के कारण पोल-खोल हो चुकी है उस हिसाब से देखें तो सबके लिये शौचालय बनने में अभी एक दशक से अधिक अवधि तक इंतजार करना पडेगा।

हम मशीनों से पानी को साफ कर सकते हैं गंदा कर सकते हैं रंग बदल सकते हैं लेकिन जरूरत के मुताबिक पानी को उत्तपन्न नहीं कर सकते हैं जल के बगैर न स्वच्छता संभव है और स्वस्थता यही नहीं जल के बगैर पृथ्वी पर प्राण्ी जगत की कल्पना करना व्यर्थ है। इससे बड़ा सत्य यह है कि हमें जिन्दा रहने के लिए दिनभर में औसतन 10 बार जल का सेवन करना पड़ता है।

जल के बिना इनसान कुछ घण्टो से अधिक जिन्दा नहीं रह सकता है। मानव को अन्य कार्यो के लिए भी लगभग 10 से 15 बार जल का प्रत्यक्ष उपयोग करना पड़ता हैं। यह करना मानव को स्वस्थ रहने के लिए अति आवश्यक है। जीवित रहने के लिए न केवल जल पहली अति आवश्यक वस्तु है बल्कि हमारी हर आवस्यक वस्तु का उत्पादन भी जल के बिना नहि हो सकता।

नदियों के देश में एक तरफ वर्ष 2012 में जिस वक्त तत्कालीन यूपीए सरकार ने देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 2012 से 2017 तक कुल 89,956 करोड़ रपए खर्च करने का लक्ष्य था उस वक्त बाजार में बोतल बंद पानी का कारोबार 6,000 करोड़ वार्षिक था जो पिछले सात वर्षो में बढकर 36,000 करोड़ वार्षिक पहुंच चुका है। जबकि इस अवधि के दौरान केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम में अपनी हिस्सेदारी 43,691 करोड़ और राज्य सरकारों ने अपने हिस्से के 46,265 करोड़ रूपये वर्ष 2017 तक खर्च कर सभी ग्रामीण आबादियों तथा स्कूलों तक सुरक्षित व शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूरा करना था। 50 फीसदी ग्रामीण आबादी को पाइप लाइन के जरिए और 35 फीसदी ग्रामीण घरों में कनेक्शन दिये जाने का लक्ष्य था।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक इस अवधि में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम पर 81,168 करोड़ रपए खर्च होने के बावजूद केवल 44 फीसदी ग्रामीण आबादी तथा 85 फीसदी स्कूलों को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल 18 फीसदी ग्रामीण आबादी को ही पोर्टेबल पेयजल पाइललाइन के जरिए उपलब्ध कराया जा सका है और केवल 17 फीसदी परिवारों को ही पेयजल कनेक्शन दिये जा सके हैं।

देश की 19 फीसदी आबादी अनुमानित 153 जिलों में आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश है देश के देश के 11 राज्यों की 40 फीसदी से अध्कि आबादी की प्यास बुझाने वाली गंगा को 1986 से अब तक साफ करने पर अनुमानित 4800 करोड़ खर्च हो चुके हैं खजाना तो साफ हो रहा है लेकिन गंगा साफ नहीं हो पा रही है। गर्मियों में सूख पडऩे पर देश में पानी का जो हा-हा कार मचता है उसको हाल के वर्षो में वर्ष 2016 में हम सबने देखा केन्द्र सरकार को स्वयं 253 जिलों को सूखा घोषित करना पडा। देश में भूजल का अत्यधिक दोहन से जल स्तर 150 से 950 फिट की गहराई तक पहुंच चुका है। मशीनों से पानी का रंग-रूप और स्वाद बदल सकते हैं लेकिन आवश्यकता के लिये पानी बना नहीं सकते। हमारे पास जल का भंडार सुरक्षित हो तो हम पानी को नदियों, नहरों,पाईप लाईनों, टैंकरों, बाल्टियों और बोतलों से बांट सकते हैं गरमियों में एक तरफ नदियां सूख जाती हैं और भूजल का स्तर भी गिर चुका होता है और दूसरी तरफ बांधों की झीलों का पानी प्राकृतिक तौर पर वाष्प बनने और जमीन के द्वारा सोखने के कारण कम हो जाता है

वर्षात के मौसम में 120  दिनों  को प्रकृति का सृजन काल माना जाता है। इस अवधि के दौरान नदियों में पर्याप्त पानी रहता हैं, अधिक वर्षा प्राकृतिक आपदा-बाढ़ और कम वर्षा पानी और भोजन के अकाल का का प्रमुख कारणा हैं। एक वर्षात के दौरान जल भंडारण करने के लिये एक ऐसी आधुनिक विधि को अपनाने की जरूरत है जिस विधि के तहत देशवासियों के खेत-खलियान, घर-बार और रोजी-रोठी के संसाधनों को डुबाये बगैर देशवासियों की जरूरत के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का भंडारण किया जा सके और दूसरे अति वृष्टि के कारण होने वाली बाढ़ की तवाही से देश को बचाया जा सके और मल-मूत्र को नदियों और भूजल में ठिकाने लगाने की बजाय जैविक तरीके से ठिकाने लगाने की विधि को अपनाया जाये।

*लेखक: संघर्ष वाहिनी के संपादक है।

भारत ने आसानी से जीती क्रिकेट सीरिज़

वेस्टइंडीज के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की श्रेखला भारत ने आसानी से 2-0 से जीत ली। हैदराबाद में खेले गाए दूसरे टेस्ट मैच में भारत ने मेहमान टीम को 10 विकेट से पराजित कर दिया। पहली पारी में 311 रन बनाने वाली वेस्टइंडीज की टीम दूसरी पारी में मात्र 127 रन ही बना पाई। पहली पारी में भारत ने 367 रन बना कर वेस्टइंडीज से 56 रन की बढ़त हासिल कर ली थी। भारत को जीत के लिए दूसरी पारी में 75 रनों की ज़रूरत थी जो उसके सलामी बल्लेबाजों पृथ्वीशाह (33) और केएल राहुल (33) ने बना लिए। भारत को नौ एक्सटाऊ रन भी  मिले। मैच में 10 विकेट लेने वाले तेज़ गेेंदबाज उमेश यादव को ‘मैन ऑफ दा मैचÓ चुना गया।

उमेश यादव एक मैच में 10 विकेट लेने वाले तीसरे तेज़ गेंदबाज हैं। इससे पूर्व कपिल देव (11 विकेट) ने 1980 के चेन्नई टेस्ट में पाकिस्तान के खिलाफ यह कारनामा किया था। इसके 19 साल बाद 1999 में जवागल श्रीनाथ ने पाकिस्तान के ही खिलाफ कोलकत्ता में 13 विकेट लिए थे।

दूसरे टेस्ट मैच में वेस्टइंडीज ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। मेहमान टीम के लिए रोस्टन चेज़ ने शतक (106) जमाया और जैसोन होल्डर ने 52 रन की सहासिक पारी खेली। इनके अलावा शाव होप (36) और शेन डॉरिच (30) ने भी अच्छी बल्लेबाजी की। इन चारों के सहयोग से वे अपना स्कोर 311 तक ले जाने में सफल रहे। भारत के लिए उमेश यादव ने 26.4 ओवर में 88 रन दे कर छह विकेट झटके। कुलदीप जाधव को तीन और रविचंद्रन अश्विन ने एक विकेट लिया।

इसके बाद भारत ने पृथ्वीशाह (70) अजिंके रहाणे (80) और ऋषभ पंत (92) के शानदार खेलके बदौलत 367 रनों का स्कोर खड़ा किया। इस प्रकार उसे पहली पारी के आधार पर 56 रनों की बढ़त हासिल हो गई। इस स्कोर में अश्विन के 35 और कप्तान विराट कोहली के 45 रन भी शामिल हैं।

इस समय तक मैच बराबरी की स्थिति में था। दूसरी पारी शुरू होते ही हालात बदल गए। वेस्टइंडीज के दोनों बल्लेबाज क्रेग ब्राथवेट और केरेन पावेल बिना खाता खेले पेवलियन लौट गए। ब्राथवेट ने दो और पावल ने नौ गेंदे ही खेली। होप (28) और सुनील अंबरिस (38) ने लडऩे का थोड़ा जज़्बा दिखाया पर पूरी टीम उमेश यादव की स्विंग और फिरकी गेंदबाजों रविंद्र जडेजा(तीन) अश्विन (दो) और कुलदीप जाधव (एक) का शिकार बन गई। उमेश को चार विकेट मिले। अब जीत के लिए भारत को मात्र 73 रन बनाने थे जो उसने मात्र 16.1 ओवर में बिना कोई विकेट खोए बना लिए।

 पहला टेस्ट

इस से पूर्व पहला टेस्ट मैच राजकोट में खेला गया। इसमें मेहमान टीम टिक ही नहीं पाई। भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 149.5  ओवर में नौ विकेट पर 649 रन बना कर पारी घोषित कर दी। भारत के इस स्कोर में तीन बल्लेबाजों पृथ्वीशाह (134), विराट कोहली(139) और रविंद्र जडेजा (100) ने शतक जमाए। पहला टेस्ट खेल रहे शाह ने अपनी पहली ही टेस्ट पारी में शतक बना डाला। इससे पूर्व- हमुंत सिंह, कृपाल सिंह, लाला अमरनाथ, दीपक शोधन, अब्बास अलीबेग,जीआर विश्वनाथ, सुरेंद्र अमरनाथ, मोहम्मद अजहरूदीन, प्रवीण आमरे, सौरव गांगुली, वीरेंद्र सहवाग, सुरेश रैना, शिखर धवन, और रोहित शर्मा ने अपने पहले ही टेस्ट में शतक जमाया था। भारत का यह एक बड़ा स्कोर था। इस पारी में वेस्टइंडीज के सभी गेंदबाज प्रभावहीन साबित हुए। उनकी तरफ से देवेदं्रा बीशू ने 54 ओवर में 217 रन देकर चार विकेट  लिए। लुईस को दो विकेट मिले।

इस बड़े स्कोर का पीछा करना आसान नहीं था। चेज़ (53) और कीमो पॉल (47) को छोड़ कर कोई भी बल्लेबाज टिक कर नहीं खेल सका और पूरी टीम 181 रन पर आउट हो गई। भारत के लिए अश्विन ने चार, और मोहम्मद शमी ने दो विकेट लिए। उमेश यादव, रविंद्र जडेजा और कुलदीप जाधव को एक-एक विकेट मिला।

फालोआन करते हुए वेस्टइंडीज कोई बेहतर काम नहीं कर पाई। केरेन पावेल ने ज़रूर 83 रन की पारी खेली पर बाकी बल्लेबाज कुछ काम नहीं कर पाए और पूरी टीम 196 रनों पर ढ़ेर हो गई। इस पारी में भारत के फिरकी गेंदबाज कुलदीप यादव ने 57 रन दे कर पांच विकेट लिए। रविंद्र जडेजा को तीन अश्विन को दो विकेट मिले। इस प्रकार भारत ने यह टेस्ट मैच एक पारी और 272 रनों से जीत लिया।

चुपचाप चली गईं संगीत प्रतिभा अन्नपूर्णा देवी

शारदीय नवरात्रि की चतुर्थी में संगीत की तपोपूत एकाकी साधिका और मैहर घराने के संस्थापक बाबा अलाउद्दीन खान साहिब की इकलौती पुत्री अन्नपूर्णा देवी का मुंबई में एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 93 वर्ष की थीं।

कम ही लोग जानते हैं कि  वे मशहूर सितारवाद की (स्वं)पंडित रविशंकर की पत्नी (पहली) और जाने माने स्वं उस्ताद अली अकबर खां साहिब की बहन थीं। इन दोनों संगीतकारों का अवदान आज सारी दुनिया जानती है। लेकिन इनसे भी अधिक प्रतिभा की धनी अन्नपूर्णा ने कभी संगीत के भौतिक जगत से प्रतिदान की इच्छा नहीं पाली। और न ही अपने शिष्यत्व का मोल ही लगाया। यह धुनी संगीतकार स्वेच्छा से महफिल, रिकार्डिंग या रेडियो गायन से हमेशा दूर एक तपस्विनी का जीवन बिताती रहीं। उनकी इक्का-दुक्का रिकार्डिंग ही उपलब्ध हैं वह भी यू ट्यूब पर। उनका बजाया कांसी कान्हड़ा और माझ खम्साज खराब रिकार्डिंग के बावजूद उनकी गहन संगीतिक क्षमता की झलकी पर दे पाता है।

बाबा नाम से जाने जाने वाले अलाउद्दीन खां साहिब का परिवार त्रिपुरा का रहने वाला था। आठ बरस की आयु में घर छोड़ कर सही गुरू की खोज करते वे  रामपुर जा पहुंचे। वहां उन्हें उस्ताद वजीर खां से तालीम मिली। फिर वे कोलकाता लौटे जहां संगीतप्रेमी ज़मींदारों के आश्रम में कुछ दिन रहे। वे मैहर महाराज के दरबार में जब आए और उनके राजकीय गायक और महाराज के गुरू बने तब शारदा माता के मंदिर से ऐसी लौ लगी कि बस वहीं के हो गए। उनकी प्रसिद्ध शिष्यों में उनकी दो संतानें अली अकबर और अन्नपूर्णा देवी पं. रविशंकर, पन्ना लाल घोष, निखिल बनर्जी, शरण रामी माथुर जैसे होनहार कलाकार थे।

अन्नपूर्णा मैहर में 1927 की पूर्णिमा में जन्मी। बाबा तब प्रख्यात नर्तक उदयशंकर की पार्टी के साथ विदेश में थे। महाराज ने ही गुरू पुत्री का नाम अन्नपूर्णा रखा। मैहर की कुलदेवी मां अन्नपूर्णा और शारदा मां के लिए सुबह-सुबह रियाज करने वाला बाबा के लिए मजहब की दीवारें बेमानी थी। साधनीय के साधाना और कठोर अनुशासन की बाबा शिष्यों से अपेक्षा करते थे। एक बार गलत तान लेने पर उन्होंने हाथ पर हथौड़ा मार कर उसे तोड़ दिया था। गुरू की ताडऩा ही शिष्य को निखारती है। बाबा शुरू में पुत्र को सिखाते थे। बाहर इक्कड़-दुक्कड़ खेल रही अन्नपूर्णा ने चिला कर कर भैया, यह सुर गलत लगा है। बाबा इस तरह बजाते हैं फिर पिता का पाठ उन्होंने हूबहू दोहराया। भीतर कमरे में बाबा थे। उन्होंने तब उनकी मेधा के दर्शन पाए। फिर संगीत की उनकी भी तालीम शुरू हुई। सितार और सुर बहार दोनों ही वाद्ययंत्रों में उनका हाथ सधने लगा। भाई तो सरोद में डूबे थे। पारंपरिक पद्धति की शिक्षा की ऐसी ही व्यवस्था थी। स्त्री और पुरूष की तालीम में कोई अंतर रहीं होता था। बाबा ने एक बार तो कहा भी था कि अन्नपूर्णा किसी भी मायने में दो अन्य होनहार शिष्यों रविशंकर और अलीअकबर से कमतर नहीं है। मैंने ध्रपदअंग की शिक्षा उसे खास तौर पर दी है। अपनी लंबी और कठोर तालीम के साथ बाबा ने यह सीख भी दी कि संगीत का आनंद भगवान को अर्पण करना होता है। तुममें धैर्य है इसलिए वह संगीत दूंगा जिससे आतंरिक शांति मिले।

गुणों के आधार पर अपनी प्रतिभाशाली बेटी का विवाह उन्होंने अपने शिष्य रविशंकर से कर दिया। रविशंकर के बड़े भाई उदयशंकर काफी ख्यातनाम थे। लेकिन रविशंकर संगीत जगत के लिए तब लगभग अपरिचित थे। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ। फिर ख्याति बढ़ी पर दूरियां भी। आखिर वह शादी टूट गई। तलबी बढ़ती गई। अन्नपूर्णा बेटे को पालती और तालीम देती। लेकिन रविशंकर ने बेटे को अपने पास विदेश बुला लिया। संगीत कार्यक्रमों में उसे पास बिठा कर उसकी सराहना से खुश भी होते।

अन्नपूर्णा अब संन्यासी की तरह जीवन जीने लगी थीं। लेकिन वे अनवात साधना करती रही और शिष्यों को तालीम देती रहीं। उन्होंने अंतर्मुखी हो कर खुद को अलग-थलग सा कर लिया। वे शुरू से ही पिता की तरह वैराग्य तबियत की रहीं। उनकी सांगीतिक विरासत को बढ़ाने वालों में बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया, सितारवादक निखिल बनर्जी, बहादुर खां, आशीष खां, गायक विनय राम, सरोदिया वसंत काबरा, प्रदीम बारोट, और गौतम चटर्जी आदि हैं।

जिनको अन्नपूर्णा देवी को सुनने का सौभाग्य मिला है। उनका कहना है कि सृष्टि की लय जैसी आनंदमय है वैसा ही लयदार और आनंदमय उनका बादन भी था। अपने गुरू व पिता की प्रतिमा का बडुा अंश उनमें था। बाहर गाने में उन्होंने रु चि नहीं ली। वे अपने संगीत में ही डूबी रहीं। प्रतिभाशाली महिला कलाकारों की तरह चुपचाप दुनिया छोड़ दी।

मृणाल पांडे

साभार: जानकी पुल डॉट काम

#मी टू क्रांति: एक बड़ी शुरुआत

देश में मीटू नामक सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात हो गया। ‘व्हटसऐप’ पर रोमानी संदेश भेजने वाले आज धार्मिक उपदेश भेजते देखे जर रहे हैं। हर नारी में लोगों को देवी दिखनी शुरू हो गई। आज के फिल्म उद्योग और मीडिया के बंधु रात-रात भर जाग कर अपनी 50 साल पुरानी जिं़दगी को खंगाल रहे हैं। फोन पर बातचीत का सिलसिला सिर्फ महत्वपूर्ण मुद्दों तक सीमित है। पर नारी की तो बात छोड़ो आज तो लोग अपनी पत्नी से भी मज़ाक करना भूल गए। देश पूरी तरह गंभीर नजऱ आ रहा है। अब किस की हिम्मत है कि यह गाना गा जाए-

”तेरी प्यारी -प्यारी सूरत को

किसी की नजऱ न लगे’’।

शुक्र है इन पंक्तियों के रचियता हसरत जयपुरी साहब के ज़माने में यहा क्रांति नहीं थी, वरना उनका तो जीना मुहाल हो जाता कमोवेश यही हशर ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’ के लिखने वाले शैलेंद्र का होता। पर वे बच गए, पर नाना पाटेकर नहीं बच न बचे जितेंद्र उर्फ रवि कपूर नहीं बचे।

खैर, आजकल तो लोग चलते फिरते उठते बैठते बाजारों और गलियों में कुछ इस तरह की लाइनें गा रहे हैं:-

ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी?

या फिर कुछ के मुंह से यह गीत भी निकलने लगा है:- मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हिनयां। प्तमी टू ने शेर को घास चरना सिखा दिया। देश की बड़ी हस्तियां परेशान हंै। क्या करें? किसी का 48 साल पुराना कारनामा सामने आ रहा है। तो किसी का 20 साल पुराना। अब यह प्रश्न बेमानी है कि 48 साल पहले जो हुआ उसे इतने सालों तक क्यों सामने नहीं लाया गया। कारण है साहस का न होना तब महिला अबला थी अब सबला बन गई है, उस समय साहस नहीं था। अब जब से प्तमी टू की शुरूआत हुई है, तब से सभी में साहस का संचार हो गया है। आजकल हर व्यक्ति जो किसी भी क्षेत्र में काफी नाम कमा चुका है। वह सवेरे का अखबार काफी घबराहट में खोलता है, पता नहीं वह कब प्तमी टू की चपेट में आ जाए। दूसरों की तो छोड़ो आजकल तो अपनी पत्नी से भी दब कर रहना पड़ रहा है, पता नहीं कब कह दे ”शादी के लिए परपोज़ करते समय आपकी नजऱों सही नहीं थी। आपने मेरी इज़ाजत लिए बिना मेरा हाथ पकड़ा था’’। मतलब यह कि पुरूष वर्ग में घबराहट फैल चुकी है।

यह भय और घबराहट जारी रहे तो अच्छा है, नही ंतो मीं टू जैसे अभियान किसी खास मकसद के लिए शुरू कर के अचानक गायब कर दिए जाते हैं। खैर अभी तो यह अभियान अपने यौवन पर है और मर्दों को उनके यौवन की गलतियों का एहसास करवा रहा है। अभी तक इस की पकड़ में फिल्मी और पत्रकारिता की दुनियां के लोग ही आए हैं। इससे यह लगने लगा है कि समाज में स्त्रियों का शोषण इन दो वर्गों के लोग ही करते हैं। समाज के किसी भी दूसरे क्षेत्र में ऐसा नहीं होता। खासतौर से राजनेता तो बिलकुल संत-महात्मा हैं। हालांकि कई संत भी आजकल धारा-376 के तहत सलाखों के पीछे हैं, पर फिर भी महात्मा होना एक अच्छे चरित्र का परिचायक माना जाता है। राजनेता को देश चलाना होता है उस पर भारी जिम्मेदारी है, इस कारण शायद उस पर आंच नहीं आ रही। एक केंद्रीय मंत्री पर आरोप लगा है, पर वह उसके मंत्री काल का नहीं बल्कि उस समय का है जब वह सज्जन एक अखबार के संपादक थे।

देश में हर रोज़ महिलाओं से छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और बलात्कार के सैंकड़ों मामले सामने आते हैं। हमारे इस देश के कुछ राज्य तो ऐसे हैं जहां पंचायतें ही किसी महिला से बलात्कार करने की सज़ा सुना देती है। फिर होता है उस महिला का सामूहिक बलात्कार। ऐसी हज़ारों महिलाओं को आज भी मीं टू से कोई साहस नहीं मिला। गांवों के जमीदार और सामंत आज भी बेखौफ जी रहे हैं। इसी प्रकार किसी पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अफसर का नाम किसी महिला ने नहीं लिया है। जबकि थानों में क्या कुछ नहीं होता।

यहां बलात्कार की शिकार आठ साल की लड़की के गुनाहगारों को बचाने के लिए मंत्री तक सड़क पर उतर आते हैं। यहां अदालत कुछ बलात्कारियों को इसलिए छोड़ देती है क्योंकि वे उच्च जाति के होते हंै, जबकि पीडि़ता निम्न जाति से। अदालत ने कहा कि उच्च जाति के लोग निम्न जाति वाली के साथ शारीरिक संबंध बना ही नहीं सकते। गलत काम की सज़ा मिलनी ही चाहिए। वैसे कहते हैं -‘जस्टिस डिलेड,जस्टिस डिनाईड’। मतलब यह कि ‘देर से मिला इंसाफ जैसे नहीं मिला’। यहां स्थिति यह है, कि मीं टू ने व्यवस्था को कुछ हिलाया है। इसका कानूनी रूप क्या होगा, यह तो देखना है पर सामाजिक तौर पर गुनाहगार प्रताडि़त हो रहा है। यह दीगर बात है कि इनमें से असली गुनाहगार कितने हैं।

ज़रूरत है इसे इंडिया से भारत में ले जाने की। जहां रोज़ इस प्रकार की घटनाएं होती रहती हैं। वहां की पीडि़त महिलाएं यदि यह साहस जुटा पाएं और अपने पर अत्याचार करने वालों के नाम उजागर कर सकें तो इस मुहिम की सार्थकता बनती है। महानगरों और उच्च स्थानों पर बैठे लोगों पर आरोपों से यह अभियान पूर्ण नहीं हो सकेगा। उम्मीद करनी चाहिए कि जो होगा अच्छा ही होगा।

राम मंदिर पर कानून बनाये मोदी सरकार : भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मांग की है कि मोदी सरकार आयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए क़ानून बनाये। कुछ रोज पहल ही राम मंदिर से जुड़े एक नेता ने कहा था कि यदि मोदी सरकार तीन तलाक को लेकर क़ानून ला सकते है तो राम मंदिर के लिए ऐसा क़ानून क्यों नहीं लाया जा सकता।

विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में अपने संबोधन में भागवत ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना  यह भी कहा कि वहां नई सरकार आ जाने के बाद भी सीमा पर हमले बंद नहीं हुए हैं। भागवत ने कहा कि देश के रक्षा बलों को सशक्त बनाने और पड़ोसियों के साथ शांति स्थापित करने के बीच संतुलन बनाए रखने की ज़रुरत है। ”भारत की विदेश नीति हमेशा शांति, सहिष्णुता और सरकारों से निरपेक्ष मित्रवत संबंधों की रही है”।

उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे ”समाज के बीच शहरी माओवाद और नव-वामपंथी तत्वों की गतिविधियों से सावधान रहें”। रिपोर्ट्स के मुताबिक भागवत ने कहा कि दृढ़ता से वन प्रदेशों में अथवा अन्य सुदूर क्षेत्रों में दबाए गए हिंसात्मक गतिविधियों के कर्ता-धर्ता और पृष्ठपोषण करने वाले अब शहरी माओवाद (अर्बन नक्सलिज्म) के पुरोधा बनकर राष्ट्रविरोधी आन्दोलनों में अग्रपंक्ति में दिखाई देते हैं।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अपनी सेना और सुरक्षा बलों का नीति धैर्य बढ़ाना, उनको साधन-संपन्न बनाना, नयी तकनीक उपलब्ध कराना आदि की शुरूआत हुई और उनकी गति बढ़ रही है। ”दुनिया के देशों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने का यह भी एक कारण है”। उन्होंने कहा कि रक्षा उत्पादन में पूर्ण-आत्मनिर्भरता के बगैर भारत अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकता।

फाइव स्टार होटल मामला: आशीष का समर्पण

दिल्ली के एक पांच सितारा होटल हयात में गुंडागर्दी के आरोपी बसपा नेता के बेटे आशीष पण्डे ने आखिर घटना के पांच दिन बाद गुरूवार को  पटियाला हाउस कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। उसे पुलिस हिरासत में भेजा गया है। आज सुबह ही उसने एक वीडियो जारी कर खुद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश की थी।

इस वीडियो में उसन अपनी सफाई में यहाँ तक कह दिया कि जिस जोड़े से उसका विवाद हुआ उसकी महिला सदस्य ने उसे कथित तौर पर अश्लील इशारे किये थे। उसके मुताबिक इसके बाद ही विवाद बढ़ा। उसने मीडिया पर भी आरोप लगाया की उसका ”मीडिया ट्रायल” किया जा रहा है। उसने कहा – ”मुझे ऐसे पेश किया जा रहा मनो मैं कोइ आतंकी हूँ। किसी नेता का बेटा होना गुनाह नहीं है। मेरे खिलाफ आज तक कभी थप्पड़ तक मारने का आरोप नहीं लगा है। मैं सुरक्षा के लिए हथियार लाया था”। दिल्ली पुलिस ने हयात होटल की सीसीटीवी फुटेज को जब्त कर लिया है।

आशीष ने वीडियो में कहा ”मुझे न्यायिक प्रक्रिया में पूरा भरोसा है”। गौरतलब है की आशीष पर दिल्ली के फाइव स्टार होटल हयात में एक कपल को धमकाने का आरोप है। वीडियो वायरल होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रावर्त वाड्रा भी सामने आये थे और उन्होंने इस तरह की घटना पर चिंता जताते हुए लोगों से इस तरह की घटनाओं के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी।

इससे पहले बुधवार को पूर्व सांसद राकेश पांडेय के बेटे आशीष के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किये गए थे। दिल्ली पुलिस ने पटियाला हाउस कोर्ट से इसे जारी कराया है। घटना के समय आरोपी के साथ दिख रहे लोगों से भी पूछताछ की कोशिश पुलिस कर रही है।