Home Blog Page 1288

‘मीटू के जमाने में आधी आबादी को संस्कृति के नाम पर सजा’

पिछले दिनों जाना हुआ जिसे भूतड़ी अमावस्या या सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से जाना जाता है. मालवा में नर्मदा नदी का बहुत महत्व है अमरकंटक से निकली और गुजरात की खाड़ी में जाकर समुद्र में मिल जाने वाली यह नदी जब मालवा जनपद से निकलती है तो पूरे इलाकों को हरा भरा करके समृद्ध करके जाती है. नदी किनारे बसे गांव और शहरों में इसकी संस्कृति, सभ्यता और परंपराएं देखने लायक हैं. जहां एक और नर्मदा की सैकड़ों कथाएं लोक में श्रुति के रूप में दर्ज है वहीं कुछ परंपराएं ऐसी हैं जो स्त्रियों के बिल्कुल खिलाफ हैं साल में एक बार आने वाली यह भूतड़ी अमावस्या अर्थात श्राद्ध पक्ष की समाप्ति पर होने वाला यह अवसर मालवा महत्वपूर्ण नदी और जीवनदायिनी माँ नर्मदा के किनारों पर विशेष महत्व का होता है – जहां बड़े-बड़े मेले ही नहीं लगते बल्कि देश प्रदेश से लोग आकर यहां नहान करते हैं और ऐसी मान्यता है कि नर्मदा में नहाने से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती हैं और मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता सुलभ हो जाता है

देवास जिले के अंतिम छोर पर बसा ग्राम नेमावर, हरदा जिले को देवास से जोड़ता है साथ ही इसके पास में सीहोर जिले की भी सीमा है. यह स्थान नर्मदा नदी के लिए जाना जाता है और नदी के किनारे यहां ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर है. साथ ही साथ इन दिनों यहां जैन समुदाय के मंदिरों का निर्माण वृहद स्तर पर चल रहा है कहते हैं नर्मदा नदी में जैन संप्रदाय की 3 प्राचीन प्रतिमाएं मिली थी. उनकी स्थापना को लेकर देवास हरदा और सीहोर के जैन समुदाय में चर्चा हुई और उन्हें एक जगह स्थापित करने की बात तय हुई, परंतु कुछ लोग उससे सहमत नहीं थे अत: यह निर्णय लिया गया कि तीनों प्रतिमाओं को बैलगाडिय़ों पर रखा जाए और जहां बैलगाड़ी सबसे पहले रुकेगी उस स्थान पर प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा. संदलपुर के अजय जैन बताते है कि श्रुति है कि खुदाई के बाद जब बैलगाड़ी से मूर्तियों को रवाना किया गया तो पहली बैलगाड़ी नेमावर रुकी, दूसरी बैलगाड़ी खातेगांव और तीसरी बैलगाड़ी हरदा रुकी. मूर्तियाँ जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ, भगवान मुनिसुब्रतनाथ और भगवान शांतिनाथ जी की थी. कालान्तर में जब नेमावर में आचार्य विद्यासागर जी आये तो उन्होंने देखा तो उन्होंने यहाँ मंदिर बनकार मूर्ति को पूर्ण सम्मान के साथ प्राण प्रतिष्ठा करने का निर्णय लिया और आज यह एक बड़े प्रकल्प के रूप में निर्मित हो रहा है. हिन्दुओं का नेमावर में ऐतिहासिक सिद्धनाथ भगवान की मूर्ति है जिनका एक वृहद और पुरातात्विक महत्व का मंदिर बना हुआ है. इसके अलावा नर्मदा के दोनों घाटों पर असंख्य धर्मशालाएं, मंदिर, सुन्दर घाट बने हुए है और नदी की संस्कृति बहुत गहरे में स्थापित हैं. प्राकृतिक रूप से माँ नर्मदा के नेमावर में दर्शन करना एक सुखद अनुभव है. वर्षभर नेमावर में पूजा आयोजन चलते रहते हैं और लोग लगातार यहां आकर अपनी मनोकामनाएं मां नर्मदा से मांगते हैं और कहते है माँ नर्मदा किसी को खाली हाथ नहीं भेजती है.

नेमावर से लगभग सौ किलोमीटर की धुरी में पांच बड़े – बड़े घाट हैं – जो मां नर्मदा की ख्याति को दूर दूर तक फैलाते हैं. सलकनपुर के पास आंवली घाट, नसरुल्लागंज के पास नीलकंठ घाट, खातेगांव के पास छिपानेर घाट. नेमावर में कई घाट और बागली के पास पीपली घाट. प्रतिवर्ष भूतड़ी अमावस्या पर लोग पांचों घाट पर नहाते हैं और इसके लिए साल भर से तैयारियां की जाती है. सुबह उठकर या तो वे आंवली घाट से शुरू करते हैं या पीपली घाट से और रात बारह बजे तक पांचों घाट में नहाने का क्रम पूरा करते हैं, इस तरह से यह माना जाता है कि उनकी आत्मा मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्त होगी और वे मनुष्य योनि से छुटकारा पा जाएंगे और मोक्ष मिलेगा.

मानने के लिए तो यह बहुत अच्छी परंपरा है परंतु इसी के साथ जुड़ा है लोगों के शरीर में देव आना. इस दिन हर घाट पर बड़ी तादाद में ऐसे लोगों का हुजूम आता है जो प्रेतबाधा से ग्रस्त होते है और ठीक इसके विपरीत ऐसे भी लोग यहाँ बहुतायत में आते है जो देव का रूप लिए इन प्रेत बाधा से ग्रस्त लोगों को ठीक करते है. पडियार लोगों का एक बड़ा हुजूम इस दिन यहां होता है, पडियार अर्थात वो लोग जिनके शारीर में देव आते है और वे इलाज करते है. जिनके शरीर में बाहरी बाधा है वह परिवार और समाज में कुछ अलग तरह का व्यवहार करने लगते हैं. ऐसा कहते हैं कि उन पर बाहरी बाधा है भूत प्रेत या चुड़ैल की छाया है जो उन्हें जीवन जीने नहीं दे रही और अलग तरह से परेशान कर रही है इनकी वजह से पूरा परिवार और समाज भी त्रस्त रहता है. भूतड़ी अमावस्या इन्हें ठीक करने का सबसे मुफीद दिन होता है. इसमें कई प्रकार के अनुष्ठान होते हैं जो भूतड़ी अमावस्या के एक दिन पहले की रात को शुरू होते हैं. जिनको देवता आते हैं वह नर्मदा के पानी में आकर नीर लेते हैं अर्थात लाल रंग का चोला पहनकर पानी में खड़े होते हैं, वे इस चोले को धोकर पवित्र पहनते हैं, माँ नर्मदा की आरती करते हैं. उनके साथ जो लोग जाते हैं उन्हें रजालिया कहते हैं.

नेमावर में इस बार जो भूतड़ी अमावस्या गई, उसमें प्रशासन ने लगभग डेढ़ लाख की भीड़ को साधने के लिए कई प्रकार के इंतजाम किए थे हर घाट को पुलिस और तैराकों से तैयार रखा था सी सी टीवी कैमरों से सुसज्जित किया जाकर निगरानी रखी थी ताकि कोई डूबने न पाए. सिद्धनाथ मंदिर के सामने वाले घाट पर और हंडिया की तरफ से आने वाले घाट पर ऐसे परिवारों की भीड़ थी जिनके यहाँ बाहरी बाधाएं किसी सदस्य को परेशान आकर रही थी. पडियार और उनके रजालिये थे जो घाट पर ढोल, झांझ – मजीरे बजाकर लोगों को आकर्षित कर रहे थे पूरे घाटों पर छोटे-छोटे समूहों में बैठे पडियार फैले हुए थे. कहीं-कहीं तो तीन या चार पडियार भी थे और उनके अनुयाई अर्थात रजालिये बड़ी मात्रा में थे. हर समूह में लगभग अथ से दस पीडि़त थे सबसे दुखद यह था कि इन पीडि़तों में नब्बे प्रतिशत मात्र स्त्रियां थी जो किसी बाहरी बाधा से परेशान थी. इन पीडि़तों को उनके परिजनों ने पकड़ कर रखा था, कहीं-कहीं बांध कर रखा था और कहीं-कहीं उन्हें लिटा कर रखा था ताकि वे इधर उधर भाग न जाए. पडियार देवी की आरती उतारकर उन्हें ठीक करने का काम कर रहे थे.

यह लोग सीहोर, हरदा, देवास, शाजापुर, उज्जैन, भोपाल, होशंगाबाद, बैतूल और राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, पाटन आदि जगहों से आए हुए थे. लगभग सभी लोग समाज के निम्न तबकों से थे दलित लोग थे और देखने से लगता था कि ये या तो अनपढ़ हैं या अशिक्षित. पूरे डेढ़ लाख लोगों की भीड़ में बहुत कम ही समाज के उच्च वर्ग से लोग होंगे जो इस मेले में आए होंगे और जो थे भी वे या तो व्यापारी थे या इस मेले को देखने समझने के लिए आए थे.

बाधा उतारने से पहले पडियार पहले पीडि़त को सामने खड़ा करता है और उसे उसका नाम पता पूछता है यह देखा गया कि पीडि़त यानी वह महिला कुछ भी बोलने से मना कर देती है, साथ ही साथ थोड़ी – थोड़ी देर में वह उठकर भागने की कोशिश करती है तो साथ आए लोग उसे जकड़ कर रखते हैं और कुछ जगहों पर पुरुष उनके बाल भी खींच कर रखते हैं. जब महिला जवाब नहीं देती है तो पडियार और उसके रजालिए उस महिला पर चावल के दाने फेंकते हैं, उसके चेहरे पर सिंदूर और कुंकू बड़ी मात्रा में फेंका जाता है. आरती उतारी जाती है और जोर जोर से उसके सामने झांझ मजीरे बजाए जाते हैं ताकि वह महिला थोड़ी झूमने लगे. इसके बाद वह महिला की आंखें और चेहरे के भाव बदल जाते हैं, आंखें फट जाती है, बाल सारे अस्त-व्यस्त हो जाते हैं बहुत भयानक और विद्रूप चेहरा हो जाता है. वह मुंह से बड़बडाने लगती है और सबको लगता है कि उसके शरीर में भूत पिशाच आने लगा है. इस समय पडियार का असली खेल चालू होता है और वह उसे सवाल पूछता है कि वह कौन है, कहां से आया है, क्यों इस महिला को परेशान कर रहा है, क्या कर्जा बाकी रह गया था, क्या परिवार ने पाप किए हैं और उस महिला को छोडऩे का वह क्या लेगा. महिला बहुत भौंडी आवाज में जवाब देने लगती है और कहती है कि वह पिछले जन्म का कोई रिश्तेदार है और उसे पितृ पक्ष में भोजन नहीं दिया गया या उसका श्राद्ध नहीं किया गया या उसे जमीन का हिस्सा नहीं दिया गया, उसे या उसके बच्चों को परिजनों ने प्रताडि़त किया है. एक दो महिलाओं पर आई बाहरी बाधा ने असमय हुई मृत्यु और अधूरी इच्छाओं का भी जिक्र किया, इसलिए वह इस परिवार की बहू पर तब तक लगा या लगी रहेगी जब तक कि उसके साथ न्याय नहीं होता, मै शरीर को नहीं छोडूंगा और अपने साथ ही इसके प्राण ले कर जाऊंगा. ये सारे संवाद जोर जोर से चलते है और फिर पडियार भी खड़ा हो जाता है और हाथों में ढेर सारा सिंदूर या कुमकुम लेकर चावल लेकर पुन: उस महिला पर बार-बार फेंकने लगता है. आरती होने लगती है आसपास की भीड़ ताली बजाने लगती है और इस तरह से इस क्रम में शरीक सभी लोग बेहद रोमांचित होने लगते हैं.

महिला और परिवार के बीच में एक तरह का द्वंद्वात्मक युद्ध की स्थिति बन जाती है और पडियार पीडि़त महिला को नींबू और मिर्ची लगी तलवार दे देता है. प्रेत बाधा से ग्रस्त महिला उस तलवार को हाथ में लेकर बुरी तरह से चारों ओर घूमाने लगती है और भीड़ डरकर पीछे हटते जाती है. पडियार और उसके रजालिए भी डरते तो हैं परंतु पडियार हिम्मत दिखाते हुए आगे बढ़ता है और उसकी तलवार को पकडऩे की कोशिश करता है, उसे बार-बार ललकारता है कि वह इस महिला को छोड़कर जाए. इसके बदले में जो भी पूजा सामग्री, धन-धान्य, या मन्नत होगी. घर के लोग उस महिला के बाल भी खींचकर रखते हैं जब वह जवाब नहीं देती है तो पडियार और उसके रजालिये उस महिला पर चावल के दाने फेंकते रहते हैं . इधर परिजन लगातार पडियार को कुछ न कुछ भेंट करते रहते हैं जमीन पर रखें जलते दिये, अनेक प्रकार की पूजन सामग्री लगातार उस प्रेत बाधा से ग्रस्त महिला पर फेंकी जाती है और प्रेत को भगाने के प्रयास किए जाते हैं.

तस्वीर में दिखाई गई यह महिला सीहोर जिले के कुसमानिया के पास की है जिसने पडियार से तलवार छीनकर बहुत देर तक आसपास घुमाई और अंत में अपनी जीभ पर लगा कर अपनी जीभ बुरी तरह से घायल कर ली. जीभ घायल करने के पश्चात उसमें से इतना खून निकला कि लग रहा था कि जीभ टूट कर गिर पड़ेगी परंतु ऐसा नहीं हुआ, थोड़ी देर के बाद कई प्रकार के अनुष्ठान करने के पश्चात वह महिला थोड़ी सामान्य हुई और उसके परिजनों ने और भीड़ ने यह माना कि उसके ऊपर जो प्रेत का साया था वह चला गया. पडियार ने उस महिला को शांत कर बिठाया और फिर दो हरी मिर्च खाने को दी और वह बहुत सामान्य तरीके से खा गई जिससे ऐसा लगाही नही कि उसकी जीभ अभी पांच मिनट पहले बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गई थी और उसमें से खून बह रहा था.

विज्ञान का यह अजूबा शायद समझ से सचमुच परे है परंतु ठीक यहीं पर कई प्रकार के प्रश्न हैं जो शाश्वत है और उनका जवाब तलाशा जाना बहुत आवश्यक है. क्या सच में भूतड़ी अमावस्या जैसा त्योहार या प्रसंग हमें इस समय मनाने की जरूरत है. इस मेले में प्रशासन लाखों रुपया व्यवस्था बनाने के लिए खर्च कर देता है, क्या जनता की गाड़ी कमाई का इस तरह से दुरुपयोग ठीक है. लोगों के त्यौहार में क्या प्रशासन को हस्तक्षेप करना चाहिए – यद्यपि लोगों की आस्था और विश्वास पर चोट ना की जाए, फिर भी जान माल की सुरक्षा के लिए थोड़ा खर्च करके इस तरह के आयोजनों को धीरे धीरे हतोत्साहित करना चाहिए. इस पूरे प्रसंग में समाज का दलित और हाशिये पर पड़ा हुआ वर्ग ही हिस्सेदारी क्यों करता है – इसका अर्थ यह है कि ज्यादा रूढि़वाद और परंपरा बोध क्या सिर्फ दलितों में बचा है. श्राद्ध पक्ष में मालवा में संझा माता जैसे त्यौहार मनाये जाने की परंपरा है जिसे बेटियों की भलाई और अच्छे जीवन की कामना में मनाया जाता है, वहीं क्या इस भूतड़ी अमावस्या पर सभी महिलाओं को जो प्राय: यहां आती है और उन पर बाहरी प्रेत बाधा है यह मानकर इस तरह से क्रूर एवं मानवीय तरीके से ठीक करना बेहतर है, महिलाओं पर जिस तरह के हथियार और डंडों का प्रयोग करके उन्हें मारा जाता है, पीटा जाता है और वाहियात सवाल, जिनमे निजी जीवन के गोपनीय पक्ष भी होते है – एक भीड़ के सामने पूछे जाते हैं – क्या वह वाजिब है? एक ओर जहां “मीटू” की बहस पूरे देश में इस समय चल रही है – उस प्रसंग में ग्रामीण क्षेत्र की इन महिलाओं को आवाज को और इस तरह से प्रताडि़त होने की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की जानी चाहिए ? वर्तमान में चुनाव आचार संहिता लगी हुई है तो इतनी बड़ी मात्रा में दर्शक बनी पुलिस और प्रशासन क्यों नहीं इन परिवारों के हथियारों को, डंडों को जप्त कर लेते हैं – क्योंकि यह सब तो इस समय में बिल्कुल ही वर्जित होते हैं, फिर आखिर इस नेमावर क्षेत्र और आसपास के घाटों पर भूतड़ी अमावस्या के दिन लोगों के पास इतनी बड़ी संख्या में देशी हथियार जैसे तलवार, त्रिशूल, फरसा आदि कहां से आते है और अगर वह लेकर भी आए हैं तो क्या पुलिस का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह इन्हें जप्त कर ले ?

नीतीश के पाँव क्या अब लालू के जूते में?

सबका साथ, सबका विकास का नारा देने वाले दूरदर्शी राजनीतिक नीतीश कुमार कई सवालों से घिरते नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ दिनों वे जाति के नाम पर बने संघठनों के कार्यक्रमों को तरजीह देने लगे हैं। सामने लोकसभा चुनाव है। उसमें अपनी ताकत का प्रदर्शन करने में कामयाब नहीं हुए तो लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में उनका संकट कम नहीं होगा। ताकतवर होने के लिए क्या वे विकास की बजाय जाति आधारित रणनीति अख्तियार कर रहे हैं? क्या वे लालू प्रसाद की राह पर चल कर अपना मकसद पूरा करना चाहते हैं? इन्हीं सवालों के चलते उनकी पार्टी के युवकों की सभा में एक युवक ने उनकी ओर चप्पल भी उछाला और जातिवादी होने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि  वे किसके बल पर सत्ता में बने हुए हैं?

नीतीश कुमार ने जब कुशवाहा जाति के संगठनों के कार्यक्रमों के प्रति रुचि दिखाना शुरू किया तभी से उन पर जाति की राजनीति का सहारा लेने का अंदेशा होने लगा है। उसके पहले से महादलित के कार्यक्रम को लेकर उन पर जाति की राजनीति करने का आरोप लग ही रहा है। लेकिन कुशवाहा जाति के संगठनों की उनकी करीबी से उनके विरोधी मुखर हो गए हैं। पिछड़े वर्ग में यादव की सबसे ज्यादा आबादी है उसके बाद कुशवाहा की आबादी है। कुर्मी पिछड़े वर्ग में ताकतवर माने जाते हेैं लेकिन आबादी मामूली हेै। यादव 15-16 फीसद है, तो कुशवाहा 9-10 फीसदी हैं। कुर्मी दो-तीन फीसदी से ज्यादा नहीं है। महादलित की संख्या कुशवाहा के कुछ ज्यादा है। नीतीश कुमार 1980 के बाद कुशवाहा जाति की वजह से राजनीति में ताकतवर हुए थे। उस समय कुशवाहा समुदाय के जिन नेताओं ने उन्हें ताकतवर बनाने में साथ दिया था, वे आज उनसे अलग है और उनके लिए चुनौती भी हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद एक साथ थे। चुनाव में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए नीतीश कुमार ने सूबे में विकास का नारा दिया था लेकिन उनके इस नारे से अलग लालू प्रसाद ने जाति की राजनीति के आधार पर यादवों को एकजुट किया ही, अपने पुराने रणनीति मुस्लिम-यादव समीकरण को दोहराया। लालू प्रसाद की रणनीति का अच्छा नतीजा निकला और नीतीश कुमार को भी उसका फायदा हुआ। उसी समय यह भी साफ हो गया कि जाति की राजनीति विकास की राजनीति की चुलना में उन्नीस नहीं है।

नीतीश कुमार 2005 में लालू प्रसाद को पछाड़ कर सत्ता में आए थे। उस समय सूबे मे लालू प्रसाद की पार्टी की सरकार थी। उनकी पार्टी केंद्र में भी कांग्रेस के साथ सत्ता में थी। नीतीश कुमार न्याय और विकास के नारे पर भाजपा के साथ सूबे में सत्ता में आए थे। लालू प्रसाद के साथ के समय को छोड़ दें तो वे लगातार भाजपा के साथ ही ज्यादा समय तक सत्ता में रहे और उन्होंने लालू प्रसाद से अलग अपनी छवि पिछड़े नेता की नहीं बल्कि अगड़ों के नेता के रूप में बनाई। उन्होंने लगातार सामाजिक समरसता और सबका साथ, सबका विकास की बात की। उन्होंने जाति की राजनीति नहीं की, ऐसी बात भी नहीं है। उन्होंने चुपचाप और सरलता-सहजता से जाति की ऐसी राजनीति की जिससे उनकी अगड़ों के नेता वाली छवि पर आंच न आ सके।

राजद को 2005 में सत्ता से बाहर करने के बाद उन्होंने पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद किया। राजद के खिलाफ रामविलास पासवान ने अति पिछड़ो को गोलबंद करना शुरू किया था। और उनको इसका फायदा भी हुआ था। लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों की राजनीति में पासवान को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने कुशवाहा-कुर्मी के नेताओं को आगे बढ़ावा देने के साथ अति पिछड़ो को हिस्सेदारी देने पर जोर दिया। सामाजिक न्याय धारा की पार्टी होते हुए भी राजद नीतीश कुमार की शिकार हो गई। नीतीश कुमार की पार्टी जद (एकी) भी सामाजिक न्याया धारी की पार्टी है। नीतीश कुमार ने सामाजिक न्याय धारी की रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी को भी महादलित की राजनीति से अपना शिकार बनाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दलितो में कुछ जातियों को छोड़ कर बाकी जातियां सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। दलितों के दिए जाने वाले फायदे उन्हें ज्यादा से ज्यादा मिले। रामविलास पासवान को काफी राजनीतिक नुकसान हुआ क्योकि उनकी जाति पर ज्यादा ज्यादा फायदा पाने का आरोप मढ़ा गया।

जानकारों का कहना है कि जाति वोट की राजनीति के मद्देनजर नीतीश कुमार पिछडे वर्ग में कुशवाहा को ज्यादा आगे बढ़ा कर यादव के मुकाबले ला खड़ा करना चाहते हैं। यादव की काट कुशवाहा के साथ कुर्मी ही है। अति पिछड़ी जातियों और दलितों का साथ उन्हें ज्यादा से ज्यादा ताककवर बना सकता है। पिछड़े वर्ग की तुलना में अति पिछड़ों का वोट ज्यादा है। अति पिछड़े और दलित के वोट अगड़ों के वोट की तुलना में बहुत ज्यादा हैं।

जानकार बताते हैें कि नीतीश कुमार की दूर की सोचते हैें। लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की दोस्ती नीतीश कुमार के लिए केवल फायदेमंद ही नहीं होगा, जाति समीकरण का नक्शा भी बदल सकता है। नीतीश कुमार चाहते भी हैं कि उन्हें किसी पर निभज़्र न रहना पड़े। लालू प्रसाद 1990 में जब सूबे में सत्ता में आए थे, तब उन्होने पिछड़े वर्ग को सिरे से सवर्णों के खिलाफ संगठित किया। बाद में उन्होंने उसमें मुस्लिम समुदाय को जोड़ लिया। इसमें उन्हें कामयाबी मिली और इसी के बल पर 15 साल सत्ता में बने रहे। लेकिन जब अति पिछड़े उनसे छिटक गए और दलितों की नाराजगी बढ़ी तब उन्हें काफी नुकसान हुआ। जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार अति पिछड़ों और दलितों को दूर नहीं होने देंगे। उन्हें कुर्मी और कुशवाहा से जोड़ कर लालू यादव की बनी जाति समीकरण के सामानांतर अपनी अलग जाति समीकरण बना लालू प्रसाद को जबाव देंगे ही, भाजपा को भी शरणापन्न बनाए रखेंगे। विकास का नारा से फायदा होता है, तो हो लेकिन जाति समीकरण से फायदा की गारंटी है।

निवेश आए या न आए, दावे तो होंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देहरादून में  आयोजित उत्तराखंड के पहले दो दिवसीय निवेशक सम्मेलन का उद्दघाटन करते हुए कहा कि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में हो रहे बडे बदलावों के साथ भारत आज निवेशकों के लिए उपयुक्त निवेश गंतव्य बन गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दशकों में भारत विश्व की आर्थिक वृद्धि का इंजन होगा।

दो दिवसीय ‘ डेस्टिनेशन उत्तराखंड: इंवेस्टर्स समिट 2018’ में देश के उद्योगपतियों और व्यावसायियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि वर्तमान में देश अभूतपूर्व  सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि निवेशकों के लिए आज का समय बहुत अनुकूल है और आने वाले दशकों में भारत विश्व की आर्थिक वृद्धि का इंजन बन जायेगा।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि निवेश के माहौल को अनुकूल बनाने के लिए पिछले चार वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने दस हजार से ज्यादा कदम उठाये हैं। इससे कारोबार सुगमता के मामले  में भारत की स्थिति में 42 अंकों का सुधार हुआ है।

जीएसटी को स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा कर सुधार बताते हुए मोदी ने कहा कि इसके लागू होने से पूरा देश एक साझा बाजार में बदल गया है। बैंकिग क्षेत्र में भी बहुत सुधार हुआ है। ढांचा गत क्ष़ेत्र में दस हजार किलोमीटर राजमार्ग का निर्माण हुआ है जो पहले की सरकारों की तुलना में दोगुना है। 100 नये हवाई अड्डे और हेलीपैड बनाये जा रहे हैं। दूसरी ओर तीसरी श्रेणी के शहर हवाई संपर्क से जुड़ रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विभिन्न शहरों में दु्रत गति की रेल परियोजनायें और मेट्रो रेल परियोजनाएं चल रही हैं।

उन्होंने कहा,”निवेशकों को मेरा संदेश है कि वे भारत में अपने उत्पादों का विनिर्माण करें, केवल भारत के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए भारत उत्पादन का केंद्र बने।

गरीब परिवारों के लिए शुरू की गई स्वास्थ्य योजना -‘आयुष्मान भारत’ का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस योजना के जरिए भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी निवेश की संभावना बढ़ी है। आयुष्मान भारत से स्वास्थ्य सुविधा खासकर अस्पतालों, डाक्टरों, पैरामेडिक्स और दवाइयों के क्षेत्र में उत्तराखंड में अपार संभावनायें हैं।

उत्तराखंड ऐसा राज्य है जो पूरे देश को हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और सौर ऊर्जा दे सकता है। उन्होंने कहा,”आज उत्तराखंड तेज गति से आर्थिक विकास के रास्ते पर बढ़ रहा है।’’

उत्तराखंड में निवेश की संभावनाओं को तलाशनें के लिए कई औद्योगिक घराने सम्मेलन  में देहरादून पहुंचे। अडानी, आईटीसी, पतंजलि, महेंद्रा एंड महेंद्रा जैसे समूहों ने निवेश मंच को साझा किया। इसके अलावा जापान और चेक गणराज्य के राजदूत भी निवेश की संभावनाओं को तलाशते दिखे। सिंगापुर ने तीन बड़े सेक्टरों- स्मार्ट सिटी, पर्यटन और एयर कनक्टिविटी में उत्तराखंड के साथ समझौता करने की बात कही।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में विशेष कर इस बात पर जोर दिया कि भारत में इंफ्रास्टक्चर पर जितना इस समय खर्च किया जा रहा है, उतना पहले कभी नहीं किया गया। उत्तराखंड हमारे न्यू इंडिया को रिप्रजेंट करता है। राज्य के विकास के लिए त्रिवेंद्र रावत की सरकार भरसक प्रयास कर रही है। वे आगे कहते हैं कि भारत ने निवेशकों के लिए बेहत्तर माहौल तैयार किया है। अब जापान की कार हिंदुस्तान में बन रही है। भारत इसे एक्सपोर्ट कर रहा है। अब जरूरत इस बात की है जो बातें और वायदे हुए हैं, वो जल्दी से जल्दी जमीन पर उतरें। जिससे उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार मिले। मुख्यमंत्री ने पर्यटन को उद्योग का दर्जा दे दिया है। वे आगे कहते हैं पिछले दो साल में केंद्र और राज्य सरकार ने ईज आफ डुइंग विजनेस के लिए 10 हजार से ज्यादा कदम उठाये हैं। जिससे इसमें 42 अंकों का सुधार हुआ है। 14 सौ से ज्यादा कानून खत्म किये। टैक्स सुधार के मानकों में सुधार की प्रक्रिया तेज की। भारत में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता है। बैंकिंग सिस्टम को ताकत मिली है। जीएसटी के तौर पर स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा टैक्स मिला। आटोमोबाइल के क्षेत्र में भारत आगे बढ़ रहा है। पीएम ने आगे स्पष्ट किया कि इस इवेंट में जापान उत्तराखंड का पार्टनर है। अगर राज्यों के पोटेंशियल को चैनलाइज किया जाए तो कोई भारत के विकास को नहीं रोक सकता है। दुनिया के कई देशों से ज्यादा हमारे राज्यों की सामथ्र्य है। भारत में सौ से ज्यादा नेशनल वाटरगेज बनाने का काम हो रहा है। भारत में हाउसिंग फोर आल, पावर फोर आल, बैंकिंग फोर आल जैसी अनेक योजनाओं  के लक्ष्य को पूरा करने की तरफ बढ़ रहा है।

किसानों को लाभ मिले इसलिए फूड प्रोसेसिंग पर हमारा ध्यान केंद्रित है। इसीलिए मैं एग्रीकल्चर में निवेश करने का आग्रह करता हूं। हम जितना ज्यादा निवेश प्राइवेट एग्रीकल्चर क्षेत्र में करेंगे उससे भारत की अर्थव्यवस्था को नया आयाम मिलेगा। दुनिया का नेतृत्व करने की ताकत भारत में है। उत्तराखंड में इतने संसाधन हैं कि वह हिंदुस्तान को पोटेंशियल बना सकता है। मोदी कहते हैं मेेक इन इेडिया केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरे दुनिया के लिए है। दुनिया के अनेक बड़े ब्रांड मेक इन इंडिया का हिस्सा हैं।

उत्तराखंड में पहली बार आयोजित हुए इस निवेश  कुंभ का पीएम नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया।

इनवेस्टर्स समिट को 12 कोर सेक्टर में बताया जा रहा है इससे लगभग 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव आये हैं।

दूसरे दिन के समिट में सीएम रावत ने कहा कि निवेशकों का राज्य को लेकर रुझान काफी बेहतर दिखाई दिया। निवेशक चाहते हैं कि राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश किया जाए। इससे राज्य सरकार भी काफी उत्साही है।

दूसरी ओर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण यहां से पलायन हुआ है। लेकिन अब जिस प्रकार से प्रयास किये जा रहे है,ं उससे पलायन तो रुकेगा ही साथ ही जो लोग यहां से गये हैं, वह भी वापस आयेंगे। इस समय उत्तराखंड और केंद्र में स्थाई सरकार है। 2019 के चुनाव में क्या होगा, यह मुझे बताने की जरूरत नहीं है। इस लिए मैं अभी दोनों सरकारों को स्थाई कह रहा हूं।

पिछली सरकरों में नारायण दत्त तिवाड़ी की सरकार ने सिडकुल बनाये थे, जो औद्यौगिक केंद्र के तौर पर स्थापित किये गये थे, बाहर से बहुत सारे उद्योग उत्तराखंड में औद्योगिक घरानों ने इस लिए लगाये कि उन्हें टैक्स होली डे की छूट केंद्र सरकार से मिली थी। जब तक यह छूट जारी रही, तब तक उत्तराखंड में चहल पहल रही। जैसे ही टैक्स होली डे की छूट की अवधि समाप्त हुई, वेसे ही वे कारखाने गायब हो गये हैं और होने की कगार पर हैं। उद्योगपति भी अपना बोरिया विस्तर ले कर किसी और राज्य की ओर ताक रहे हैं, जहां उन्हें ऐसी छूट मिल जाए। प्रदेश और विकास जाए भाड़ में। उन्हें तो अपने पर्स खाली नहीं करने हैं। यह सिलसिला उत्तराखंड में चल रहा है। मुझे तो लगता है यदि निवेशकों को आमंत्रित कर राज्य का भला सोचा जा रहा है और उसकी ओर कदम भी बढ रहे हैं, लेकिन इसके लिए ऐसी सावधानियों की जरूरत है, जिसमें प्रदेश की भूमि  पूरी की पूरी उनके हिस्से न चली जाए और उत्तराखंड का जो मूल निवासी हैं, वह अपनी भूमि से ही बेदखल न हो जाए।

एक शर्मनाक घटना उत्तराखंड की वर्तमान सरकार के पक्ष में जाती है, जिसमें अपने ही प्रदेश के धारचुला के  सात गांव चीन की कृपा से पल रहे हैं। एक राष्ट्रीय अखबार ने इस पर संज्ञान ले कर बताने की कोशिश की है कि ऐसा भी इस उत्तराखंड की भूमि पर चल रहा है। बात पिथौरा गढ़ जिले की है। चीन उनकी दैनिक जरूरतों को पूरा कर रहा है। ये गांव है-बुंदी, गुंजि, गर्बियांग, कुटि, नापल्चू, नभि और रौनकोंग, इन गांवों में नमक, खाने का तेल, गेहूं और चावल चीन में पैदा हुआ आ रहा है। यह सामान नेपाल के द्वारा आ रहा है। इसका कारण है कि वहां तक पहुंचने के लिए सभी सड़कें टूटी हैं। यह घाटी कई महीनों से बंद पड़ी है। जो थोड़ा बहुत राशन उन्हें मिलता है, वह भी पीठ पर ढ़ुलाई कर ले जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उन्हें 30 रुपये वाला एक किलो का नमक 70 रुपये में मिल रहा है। इनका नजदीक का बाजार धारचुला का है। चीन से नेपाल के जरिए आने वाला सामान भारत से महंगा है। यहां के 400 परिवरों के लिए जो राशन मिलता है, वह पूरा नहीं है। एक परिवार के लिए महीने भर का राशन 2 किलो चावल और 5 किलो आटा निश्चित कर रखा है। यहां तक पहुंचने वाली सड़के सारी टूटी हुई हैं। यह सोचने की बात है। माना एक परिवार में 5 सदस्य हैं तो महीनेभर का राशन जो  उन्हें मिल रहा है वह किसी भी तरह से पर्याप्त नहीं हो सकता। वहां के लोग मानते हैं कि हम अपने ही देश में अनाथों का जीवन बिता रहे हैं। चीन की ओर से हमें राशन पानी नहीं मिलता तो ये चार सौ परिवार जिंदा भी नहीं रह पातें।

कहने का मतलब यह है कि इन बिसंगतियों के बीच हमारी उत्तराखंड की सरकार देश और विदेश में रोड शो कर क्या दिखाना चाहती है। क्या इन रोड शो पर पैसा नहीं खर्च हो रहा है। जो पैसा खर्च हो रहा है, वह जनता का ही पैसा है। कोई अपनी जेब से नहीं खर्च कर रहा है।

आगे आने वाला समय ही बतायेगा कि निवेश की यह पूंजी जो इकठ्ठी हुई है, उसका उपयोग सही तरह से हो भी पायेगा या नहीं। और जो उद्योगपति निवेश कर रहे हैं, वह किस कीमत पर उत्तराखंड को आबाद कर पायेंगे।

सेहत पर पहरा ही पहरा

अजीब विडम्बना कहें की सरकार की उदासीनता जिसकी ड्यूटी सही मायने में बॉडर पर दुश्मनों से छक्के छुड़ाने की है वे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स में बड़े आराम से ड़्यूटी कर अपनी नौकरी कर रहे हंै। एम्स में कई माह से अर्ध सैनिक बल के लोग ड्यूटी दे रहे हैं जिससे एम्स के डाक्टरों, स्वास्थ्य कर्मचारियों सहित एम्स के ही स्थाई सुरक्षा कर्मचारी अपना विरोध एम्स प्रशासन और गृह मंत्रालय के समक्ष कर चुके हंै पर कार्रवाई के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है।

सबसे गंभीर बात यह है एम्स में लगभग दो हजार के करीब प्राईवेट सुरक्षा गार्ड है और एक सौ के लगभग एम्स के ही सुरक्षा कर्मचारी है जो एम्स में प्रोटोकॉल विभाग से जुड़े कार्य को करने में लगे हंै। पर ऐसा क्या है कि एम्स में अर्ध सैनिक बल लगे है और तो ओर अर्ध सैनिक अधिकारी को अजो बंगला दिया गया है वो प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर के लिये अलॉट होता है। ऐसे में उन डाक्टरों में बड़ी नाराजग़ी है जिनको सही मायने में अलॉट होना चाहिए पर सारे नियमों को धत्ता बताकर एम्स में अर्धसैनिक बलों का बोलवाला है। अर्धसैनिक बल आईटीबीपी से है एम्स प्रशासन का कहना है डेपुटेशन में आईटीबीपी को तैनात किया गया है। जबकि एम्स की आरडीए का कहना है कि जब एम्स में प्राईवेट और एम्स के ही सुरक्षा कर्मचारियों की लम्बी फौज है तो ऐसे में अर्ध सैनिक बलों का एम्स में तैनात होना पूरी तरह से गलत है। एम्स के ही डॉ कुलदीप का कहना है अस्पताल में मरीज दुखी हालत अपना इलाज कराने आता है ऐसे में एम्स के ही सुरक्षा गार्ड ही काफी है क्योंकि सरकार अर्ध सैनिक बलों पर करोड़ो रूपए खर्च करती है विशेष टेऊनिंग दी जाती है ऐसे में स्वास्थ्य संस्थाओं में अर्धसैनिक बलों का तैनात रहना उचित नहीं है। एम्स के सुरक्षा कर्मचारी पवन का कहना है कि जो सैनिक बल तैनात रहते है वो शस्त्र लेकर पूरे एम्स परिसर में घूमते रहते है इससे एक भय का माहौल बनना है।

एम्स में इलाज कराने आए उत्तर -प्रदेश महोबा के रमन सिंह चंदेल ने बताया कि एम्स में अर्ध सैनिक कर्मचारी से उनका ओपीडी कार्ड बनवाने के दौरान काफी बहस हो गयी थी जिसके कारण उनका ओपीडी कार्ड तक नहीं बन पाया था। जिसकी शिकायत उन्होंने एम्स प्रशासन से की थी पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाने के कारण उनको बिना इलाज करायें ही वापिस जाना पड़ा ।

मौजूदा हालात में एम्स में इलाज कराना काफी दिक्कत भरा है। एक अतरक ऑन लाइन सिस्टम का दावा किया जाता है पर कई बार मरीज दूर दराज इलाके से ऑन लाइन अपॉइमेन्ट ले लेता है पर एम्स में जैसे मरीज अपना अपॉइमेंट का पर्चा व तारीख बताता है तो उसका एम्स के कम्प्यूटर में नाम ही दर्ज नहीं होता है और एम्स के सॉफटवेयर में गड़बड़ी होने के कारण मरीज का अपॉइमेंट कैंसिल हो जाता है ऐसे में मरीज इधर – उधर भटकता रहता है। ऐसे ऑन लाइन सिस्टम के दौरान अर्धसैनिक बल के लोग अपना ओपीडी कार्ड बनवाने में सफल रहते है और तो ओर उनके परिचित मरीजों को भर्ती होने तक में दिक्क्त नहीं आती है। ऐसें में ठगा असहाय सा गरीब मरीज इलाज की आस में एम्स में भटकता रहता है। दिल्ली के शाहदरा निवासी पीयूष ने बताया कि वह अपने चाचा के इलाज के लिये एम्स में गए थे तब भी उनको वहां पर प्राइवेट की तानाशाही से ऑथोपैडिक्स विभाग में दिक्कत हुई फिर एक्सरे विभाग में अर्ध सैनिक बलों से दो -चार होना पड़ा ।

एम्स के सीनियर डाकटरों ने बताया कि एम्स में वैसे ही मरीजों की भीड़ है और एम्स में सही मायने में गरीब मरीजों का उपचार बड़ी मुश्किल से हो पाता है यहां पर अप्रोच और सिफारिशी लोगों का इलाज आनन -फानन में हो जाता है ऐसे में अर्ध सैनिक बलों का बढ़ता दखल मरीजों और डाक्टरों के लिये काफी मुसीबत का सबब बना हुआ है उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय को इस मामलें में हस्तक्षेप करना चाहिये ताकि एम्स का सही मायने में मरीजों को लाभ मिल सकें।

एम्स के सुरक्षा अधिकारी ने नाम न छापने पर बताया कि एम्स परिसर में सांसदों और वीआईपी की गाडिय़ों का आना जाना स्वीकृत है पर अर्ध सैनिक के कर्मचारी जहां मर्जी वहीं गाड़ी खड़ी कर देते है ऐसे में परिसर में अक्सर जाम लगने की स्थिति बनी रहती है।

इस बारे में आईटीबीपी के ही वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आईटीबीपी के अर्ध सैनिक बलों का काम बार्डर में हैं पर ये तो सरकार का आदेश होता है कि किस से कहा काम लेना है इस बारे में सरकार जो भी आदेश करेगी उसका पालन होगा।

समाज सेवी राजेश कुमार का कहना है उन्होंने एम्स में अर्ध सैनिक बलों की तैनाती को लेकर केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लिखित में शिकायत भी की है। बार्डर में इस समय सही मायने में अर्ध सैनिक बलों की जरूरत है पर एम्स में तैनाती के कारण सरकार के पैसा की बर्वादी के अलावा कुछ नहीं है। मनोज पुड़ींर ने केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चैबे को लिखित में शिकायत भेज कर प्राईवेट सुरक्षा गार्ड की संख्या में कटौती करने और अर्धसैनिक बलों की तैनाती को लेकर सरकार के पैसा की बर्बादी बताया और तुरन्त हस्तक्षेप करने की अपील की है।

शाहदरा निवासी पीयूष ने केंन्द्रीय मंत्री डॉ हर्ष वर्धन को भी अपनी शिकायत में कहा कि एम्स में सुरक्षा के नाम पर मरीजों को परेशान किया जा रहा उनके चाचा के साथ जो अभद्रता की गई है उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियो व अधिकारियो का पहला ध्येय होता है कि वो मरीजों को साहूलियत दें पर यहां तो दिक्कत दी जा रही है ।

एम्स के रिटार्यड कर्मचारी का कहना है कि एम्स में 39 साल सर्विस की है पर उनकों यहां अब अपना काम करवाने में दिक्कत ही नहीं हो रही है बल्कि उनकों अर्धसैनिक बल के कर्मचारी धकियाने से भी नहीं चूकतें है।

एम्स के मेडिकल सुपरिडेंट डॉ डी के शर्मा ने बताया कि एम्स प्रशासन को जो भी शिकायते सुरक्षा में हो रही धांधलीबाजी और तानाशाही मिलेंगी उन पर कार्रवाई की जाएगी क्योंकि मरीजों और डाक्टरों को परेशानी नहीं होने दी जायेगी क्योंकि एम्स मरीजों की सेवाओं के लिये निरन्तर प्रगतिशील है और मरीजों को बेहत्तर स्वास्थ्य सेवाओं के लिये प्रत्यनशील है।

राजनीति में भेदभाव का असर विकास पर

लोकतंत्र में भले जनता किसी भी राजनीतिक दल को जिताती हो पर दूसरे राजनीतिक दल यदि वे केंद्र में हैं तो उनके लिए पराजय मानना कठिन हो जाता है। यह स्थिति दिल्ली, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और कमोबेश तमिलनाडु में दिखती ही है। प्रधानमंत्री ने सबका साथ, सबका विकास का मंत्र पूरे देश के लिए दिया। सिर्फ किसी एक पार्टी या विचारधारा पर इसमें जोर नहीं है लेकिन नुकसान वह जनता-जनार्दन झेलती है जिसके फैसले से कोई पार्टी सत्ता की कुर्सी पर पहुंचती है।

देश की राजधानी दिल्ली में यही सब अर्से से चल रहा है । दिल्ली में कूडा उठाना और स्वच्छता अभियान से जुड़े पूर्वी दिल्ली म्युनिसिपल कारपोरेशन के कर्मियों ने इस साल नौ अक्तूबर को अपनी हड़ताल कुल 28 दिन तक हड़ताल पर रहने के बाद उठा ली। ये कर्मचारी दरअसल 2015 से ही अपनी मांग वेतन वृद्धि, स्थायी नौकरी आदि के लिए हड़ताल पर है। गतिरोध खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा। दिल्ली में म्युनिसिपल कारपोरेशन में भाजपा जीती है। दिल्ली सरकार की फाइल उपराज्यपाल तक जाती है। और लौटने में खासी देर लगती है। केंद्र सरकार ने साफ कह दिया है कि वह कोई वित्तीय मदद नहीं दे सकती।

दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिया कि वह दो दिन में 500 करोड़ रुपए जारी करेगी। जिससे वर्तमान संकट दूर हो। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि पूर्वी और उत्तरी सिविक समितियों को कुल 7000 करोड़ रुपए मात्र का पैकेज इस मसले को खत्म करने के लिए चाहिए।

चुनावों में दो-तिहाई से भी ज़्यादा मतों से दिल्ली में जीती एक सरकार को ठीक से राजकाज न करने देना बताता है कि देश किस तरह भेदभाव की राजनीति है। लोकतांत्रिक संस्थाएं किस तरह अनुपयोगी साबित की जा रही हैं। दिल्ली में जो कुछ हो रहा है वह भारतीय राजनीति की एक नई संस्कृति है। एक पार्टी दिल्ली में जीतती है अपार बहुमत से । दिल्ली का है विशेष दर्जा और चरित्र। थोड़ी बहुत असहजता का अंदेशा भी है। दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अधिकारों और ताकतों के बंटवारे को लेकर असुविधाएं हैं। ऐसे कौन से क्षेत्र है जहां असहमतियां हंै। कैसे उनका पता लगे और कैसे दिखे कि उपराज्यपाल एक निरंकुश वायसराय की तरह काम कर सकते है। वे चाहें तो हर कदम पर चुनी हुई सरकार के काम में बाधा दे सकते हैं।

इधर सुप्रीम कोर्ट ने एक संवैधानिक पेंच निकाल दिया है। इसके तहत संवैधानिक स्तर पर तमाम भ्रष्टाचार में दिल्ली का जो स्तर होना चाहिए वह तर्क से भी परे है। चुनाव आयोग आज बेहद खोखला और अविश्वसनीय संस्थान है। वह एक आदेश जारी करता है, जिससे प्राकृतिक न्याय के तमाम आसार खत्म हो जाते हैं और आप विधायक अयोग्य करार दिए जाते हैं लेकिन संस्थागत तोड़-मरोड़ के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। हमारे लोकतंत्र में जो गंभीर रोक-टोक थे वे भी अब लगभग फेल हैं।

आप के कुछ सदस्यों के पास बहुत कुछ कहने के लिए होगा लेकिन जिस तरह सीबीआई और दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ अपनी सक्रियता दिखाई है उससे आपातकाल के दिनों की याद आती है। मुख्यमंत्री को विवादास्पद तौर -तरीकों के जरिए बाध्य कर दिया जाता है कि वे माफी मांगे। जो न्यायिक संस्थान है वे भी राजनीतिक इशारों से प्रभावित होते दिखते हैं। फिर नौकरशाह सामने आते हैं। एक घटना होती है। बताया जाता है कि एक नौकरशाह के साथ कथित तौर पर हाथापाई हुई। यह घटना भूमिका बनी पूरी नौकरशाही को राजनीतिक जामा पहनाने की कोशिश में।

मुद्दे को हल करने की बजाए संकट और ज़्यादा बढ़ाया गया। नौकरशाह कहते हैं कि उन्हें सताया जा रहा है। दिल्ली सरकार कहती है कि आईएएस लॉबी काम ही नहीं करना चाहती। वह हड़ताल पर भले न हो लेकिन वह किसी भी काम को होने नहीं देती। इसे क्या कहेंगे। एक चुनी हुई सरकार और केंद्र सरकार के प्रति खुद को जवाब देह समझती नौकरशाही के बीच है संबंधों में यह टूट। कुछ भी वजहें रही हों यह मसला हल हो सकता था।

मुख्यमंत्री उपराज्यपाल के कार्यालय पहुंचते हैं। उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया जाता। यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय बन जाता है। चार प्रदेशों के मुख्यमंत्री वहां पहुंचते हैं। सभी यह मानते हैं कि यह गहरा संस्थागत संकट है जो नया रूपाकार ले रहा है। यह संकट व्यक्तित्वों की लड़ाई के चलते बढ़ा।

इस पूरे मामले को कई तरह से समझा जा सकता है। एक पार्टी के तौर पर आप को (न कि दिल्ली सरकार को) पार्टी बतौर ही खारिज करना और केजरीवाल का धोखा खाने का सदमा खासा जानकारी भरा है। संस्थागत कामकाज में, अपने कुछ लोगों के कामकाज और खर्च को नहीं देखा जाता, फिर यह पार्टी दूसरी पार्टियों से काफी हद तक अलग कहलाती है। आदर्शवाद को इसने पागलपन की सीमा तक खत्म किया है। हम कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाते भले ही खुली निगाह संविधान के परे कुछ भी ये कर रहे हों। दरअसल इस हद तक घटना राजनीति ने हमें डरा दिया है कि लगता है हम लोकतांत्रिक कायदे-कानून ही भूल चुके हैं।

केजरीवाल ने इस कारण खासा नुकसान भी उठाया है। सक्रिय कार्यकर्ता की गुणवत्ता केजरीवाल में तब अनैतिक हो जाती है जब वे एक राजनेता के रूप में आते हैं। लेकिन आप यदि इन गलतियों पर घुटने टेक दें तो वे फिर से केंद्र सरकार की तानाशाही से तुलना करते हुए सारी रामकथा बताएंगे। यह एक और बड़ी गलती होगी हम अपने राजनीतिक नज़रिए को आप के ही उन संकेतों से जोड़ें जिसके कारण आज यह हालत हुई।

आज भी केंद्र सरकार आप को हासिल जनमत को बर्दाशत नहीं कर पा रही है। यही हाल उस विपक्षी दल कांग्रेस का है। जबकि सरकार में आने के बाद शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में आप ने जो सुधार किए हैं वह उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि है। हालांकि केंद्र सरकार का हमेशा विरोधी रूख ही रहा है। आप का सुशासन ज़रूर पार्टी के परिश्रम की बनिस्बत ज़्यादा काबिले तारीफ रहा।

यह एक ऐसी पार्टी है जो समय के साथ गायब नहीं होगी। इसी कारण केंद्र ने अपने प्रयास तेज कर दिए हंै जिससे यह अच्छे काम न कर पाए।

इस तथ्य की कोई और काट नहीं कि केंद्र सरकार लगातार आप पर अपना निशाना साधे हुए हैं। दूर-दूर तक कांगेे्रस की कोई संभावना नहीं नजऱ आती कि वह बहुमत हासिल कर पाएगी। उसके लिए यही बेहतर है कि वह अपनी पुरानी पराजयों की वजहों को सोचे और यह दुहराती रहे कि राजनीति में वह शुचिता की समर्थक है।

फिर 2019 के चुनावी महाभारत में भाजपा के खिलाफ सभी राजनीतिक दल मैदान में होंगे। इसके मुकाबले में आप ही नहीं होगी। बल्कि दूसरे भी होंगे। दिल्ली में आज जो भी संकट पहले दिन से दिख रहा है वह केंद्र सरकार के चलते है। खुद प्रधानमंत्री दिल्ली में आप की जीत को अपनी सबसे बड़ी हार मानते रहे हैं। इस कारण हर तरह की राजनीतिक परेशानियां पैदा करने में केंद्र सरकार जी तोड़ मेहनत करती रही है।

लोकतंत्र आज व्यक्तित्व की लड़ाई में बदल चुका है। भारत में किसी भी मसले का हल मिलजुल कर ढूंढना हमेशा कठिन रहा है। तीसरे, दिल्ली हाईकोर्ट को छोड़ दें तो तमाम जांच-पड़ताल सिर्फ रस्म अदायगी ही रह गई हैं। सुप्रीमकोर्ट से चुनाव आयोग और राष्ट्रपति भवन से सीबीआई मुख्यालय तक हाल यही है। यदि इस पर बात करें तो यही फलसफा सामने आता है। दिल्ली के उपराज्यपाल का घर और दफ्तर भी इसी दायरे में हैं।

राहुल ने जनता का दर्द साझा किया राजस्थान में उमड़ा गजब जन सैलाब

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में अब पूरी विश्वसनीयता के साथ कहा जा सकता है कि,’वे एक मंजे हुए परिपक्व राज नेता हो चुके हैं। जिन्हें कभी कोई अधकचरा नेता बताते हुए उपेक्षित करना पसंद करता था। टीवी और मीडिया में बैठे हुए अगुआ पत्रकार उन्हें संजीदगी से लेने से कतरा रहे थे, लेकिन मंगलवार 9 अक्टूबर को धोलपुर जिले के बयाना रोड शो के बाद आयोजित सभा में जिस तरह दमदार नेता की तरह जमकर बोले,’उसका अकाट्य सत्य समझे ंतो राहुल गांधी एक ऐसे प्रखर और प्रचंड नेता के रूप में उभरे है जिनका कोई सानी नहीं है।’’ राहुल गांधी ने बेहद तीखी बोली ओैर जुमलेबाजी के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी टीम और मुख्यमंत्री वसुंधरा सरकार पर जमकर हमले किए। कांग्रेस के सुप्रीमों राहुल गांधी यह कहते हुए अपने राजनीतिक प्रतिद्वंन्दियों की तुलना में एक कद्दावर नेता नजर आए कि,’मोदी सरकार ने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में झूठी घोषणाओं, जुमलेबाजी, किसानों, मजदूरों,दलितों,युवाओं महिलाओं और आदिवासियों के हितों की योजनाओं के शटर गिरा दिए और जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा उद्योगपतियों के जेबों मे डालने और उन्हें विदेश भागने में मदद करने के अलावा कोई काम नहीं किया। विश्लेषकों का कहना है कि सबसे बड़े राजनैतिक टकराव की तारीखें तय होने के बाद अपनी पहली रेली में राहुल गांधी ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत तीन राज्यों में जमीनी पकड़ मजबूत करने की नई नीति गढऩे की कोशिश की है। उनकी सभा में उमड़ती भीड़ का सैलाब इस बात का पुख्ता सुबूत है कि वे लोगों के मानस पर जबरदस्त ढंग से छा गए हैं।

राहुल की रेली से वसुंधरा के गृह क्षेत्र की 23 सीटों को प्रभावित करने की कोशिश की गई। हालांकि इसके जवाब में भाजपा मोदी रेलियां आयोजित करवाकर 34 सीटों पर असर डालने की तैयारी में है। धोलपुर में राहुल गांधी की सभा का आयोजन पिछले दिनों अजमेर में हुई मोदी की सभा का जवाबी वार था। इसकी अंर्तकथा समझे ंतो धोलपुर वसुंधरा का गृह क्षेत्र है, जबकि अजमेर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का निर्वाचन क्षेत्र है। पिछले चुनावों में जहां राहुल और मोदी अपनी-अपनी दलीय हदों में प्रचार की दृष्टि से तीसरे नंबर पर थे, लेकिन इस बार प्रचार में दोनों ही सबसे अव्वल है। कांग्रेस में मुख्य रूप से दारोमदार तीन बड़े चेहरों राहुल गांधी, अशोक गहलोत और सचिन पायलट पर रहेगा। मोदी के साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, वसुंधरा राजे, राजनाथ सिंह, प्रकाश जावेडकर, ओमप्रकाश माथुर, राज्यवर्द्धन सिंह और गजेन्द्र सिंह शेखावत मुख्य भूमिका में है। भाजपा की टीम से इस बार कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी गायब है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और राजस्थान समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है और यह 11 दिसम्बर को तय हो जाएगा कि, पांचों राज्यों में कौनसी पार्टी सरकार बनाएगी? फिलहाल तो भाजपा और कांग्रेस दोनो ही दल लोगों की आकांक्षाओं के बोझ से दोहरे हो रहे हैं। भले ही भाजपा योजनाओं और कार्यक्रमों का ऐसा भानुमति का पिटारा खोल रही है, लेकिन लोगों के सवालों की झड़ी में उनके दावे दब जाते हैं, जब लोग पूछते हैं कि,कहां दिए रोजगार बताओ? तो वसुंधरा सरकार के आगे पैना सन्नाटा खिंच जाता है। विश्लेषक कहते हैं कि ‘स्मृति और इतिहास में बहुत अंतर है। वसुंधरा सरकार इस रहस्य को समझती तो झूठे दावे नहीं करती?

बहरहाल यह भी सच है कि अभी तो जाति-समाज साधने में ही भाजपा और कांग्रेस नेतृत्व के पसीने छूट रहे हैं। अन्य पिछड़े वर्ग को साधने की कमान भाजपा में अभी प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी के हाथ में है तो कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट दोनों ही ओबीसी वर्ग से होने के नाते, यह जिम्मा संभाल रहे हैं। इस मामले में सबसे बड़ी मुश्किल दोनों ही दलों के समर्थकों के अलग-अलग गुट है और हर गुट दबाव की लाठी लिए खड़ा है और इस मामले में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल पंजों पर खड़े हैं। भाजपा इस मामले में हर कदम पर पस्ती मे है। जबकि कांगे्रस में महत्वाकांक्षा, प्रतिस्पर्धा और सक्रियता के तत्व समाहित हो गए है।

भाजपा और कांग्रेस दोनो ही पार्टियां ‘अन्नदाता’ का आशीर्वाद लेने के लिए ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ में जुट गई है। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व ऐसी टीम तैयार कर रहा है ताकि गांवों में जीरो ग्रांडड से फीड बैक देने के साथ ही कार्यकर्ताओं की समितियों का गठन किया जा सके। कांग्रेस ने बूथ स्तर तक की कार्यकारिणी का गठन कर फीड बैक लेना शुरू कर दिया है जबकि भाजपा में यह काम अमित शाह के दिशा निर्देश पर किसान मोर्चा कर रहा है। कांगे्रस में अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस काम का जिम्मा सांसद नानाभाऊ पटोले को सोंपा है जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए हैं। पटोले किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष है। उन्होंने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों को विशेष टास्क सोंपे है। इनमें पूर्ण कर्ज माफी और फसल खराबे का मुआवजा दिलाने के लिए आंदोलन की रणनीति बनाने के निर्देश दिए है। उधर भाजपा किसान संघ से नाराज कार्यकर्ताओं को फिर से मनाने का प्रयास करेगी।

विश्लेषकों का कहना है कि,’सरकार के लिए कामयाबी का पहला पैमाना ठोस इरादे होता है,वसुंधरा सरकार तो इसी घाट पर फिसल गई। मंशाओं की गठरी दिखा देने से क्या होता है, जब कोई काम ही ना हो? आज पंजाब से सटे इलाके श्रीगंगानगर में सियासी संग्राम पानी के सवाल, बवाल और मलाल पर टिका है। भले ही तीसरा विश्व युद्ध होगा या नहीं? अथवा होगा तो वह पानी पर लड़ा जाएगा या नहीं? लेकिन श्री गंगानगर की आबोहवा में बिखरी पानी की कहानियां साफ इशारा करती है कि, यहां सियासी संग्राम पानी पर लड़ा जाएगा। यहां पानी के मुद्दे ने ही नेताओं की नैया पार लगाई है और अब यह चुनावी हथियार के रूप में खड़ा हुआ है? बात की गहराई समझे ंतो जिले के साढ़े तेरह लाख वोटर में से एक तिहाई तो खेती-किसानी करने वाले ही है।

उधर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के महासचिवों, मीडिया प्रमुखों और प्रवक्ताओं को राजस्थान समेत मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ चुनाव में छवि के संघर्ष में आक्रामक रुख अपनाने की हिदायत दी है। सूत्रों का कहना है कि,’शाह ने पार्टी प्रवक्ताओं की क्लास लेकर उन्हें कहा है कि चाहे प्रेस कॉफ्रेंस हो अथवा टीवी शो उन्हें राफेल सौदा जैसे विपक्ष के चुनावी मुहिम के मुद्दों पर अहम लक्ष्य याद होने चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री को ‘चोर’ बताने वाले विपक्ष की आलोचना का मुंह तोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। छवि के इस खेल में मीडिया मैनेजमेंट में मास्टर माने जाने वाले नेताओं को आगे किया जाना चाहिए।

एक तरफ अमित शाह प्रतिद्वंदी पार्टी पर गोलंदाजी तैयारी करने के लिए साम-दाम-दंड भेद की नीति पर उतारू है। उधर वरिष्ठ पत्रकार रमण स्वामी की माने तो पार्टी के वरिष्ठ नेता ‘सेल्फ गोल’ करने पर आमादा है? एनडीए सरकार में काम करने वाले मंत्री के रूप में चर्चित नितिन गडकरी तो सीधे-सीधे यह कहते हुए सरकार का चेहरा नोंच रहे हैं कि, ‘मोदी सरकार झूठे बयानो ंऔर जुमलों पर बनी थी। उनका कहना था 2014 के चुनावी अभियान में हमने सिर्फ बड़े बड़े वायदे तो किए लेकिन यह बिल्कुल नहीं सोचा कि पूरे नहीं होने की स्थिति में लोग जवाबतलबी करेंगे तो हम क्या कहेंगे? दिलचस्प बात है कि भाजपा के प्रवक्ता गडकरी की इस आत्मवंचना को खिसियाते हुए ‘मजाक’ कह कर रह जाते हैं? लेकिन संभवत: प्रवक्ता इस बात से बेखबर रहे होंगे कि कुछ अर्सा पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी यही कह कर हटे थे कि,’चुनावी माहौल में कह दी जाती है ऐसी बातें? गडकरी का ‘सेल्फ गोल’ चाहे इरादतन था अथवा असावधानीवश कही गई बात? लेकिन इसने कांग्रेस के घाव पर मरहम छिड़कने का मौका तो दे ही दिया। नतीजतन राहुल गांधी ने ‘टृवीट’ किया कि,’सही फरमाया, जनता भी यही सोचती है कि सरकार ने लोगों के सपनों और उनके भरोसे को अपने लाभ का शिकार बनाया।’ भाजपा के सुब्रह्मण्यम स्वामी की आलोचना तो मजाक नहीं थी, जिन्होंने अमेरिका के एक ‘न्यूज नेटवर्क को दिए गए विस्तृत इंटरव्यू में बड़ी बेबाकी से कहा था, भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत भयावह है। उन्होंने इसके लिए मोदी, अरूण जेटली, तथा प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को दोषी ठहराया। स्वामी ने यहां तक कहा कि, पी.वी. नरसिहराव के कार्यकाल में जो प्रगति हुई थी, वो किसी भी सरकार की तुलना में अद्वितीय थी। उन्होंने कहा कि,’जेटली ने कभी अर्थशास्त्र पढ़ा होता तो जानते कि, ‘अर्थ’ का ‘अर्थ’ क्या होता है?

बीकानेर के चुनावी दौरे में राहुल गांधी ने स्थानीय उद्योगपतियों की दुखती नब्ज पर हाथ रखते हुए अपनी संवेदना और दरियादिली का इजहार किया। उद्योगपतियों और युवकों के साथ सहानुभूति रखते हुए राहुल ने अनोखे ढंग से उनकी वेदना को टटोलने के साथ उन्हें पूरी तरह आश्वस्त किया कि,’कांग्रेस की सरकार आने पर उसका मुख्यमंत्री अपने मन की बात नहीं बल्कि उनके मन की बात करेगा और उनकी उम्मीदों को पूरी करेगा। राहुल के इस संवाद ने लोगों का मन जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि,’जो आपने सुना, वो मैंने दिल से कहा….मेरा वादा है, जो कहा है वो पूरा करूंगा।

‘बेटा, अफीम लो! बेहतर है हेरोइन से’

अफीम कहीं बेहतर है हेरोइन से। नशे से अपने युवा बच्चों को छुड़ाने की बजाए हम उनमें अफीम की लत पैदा कर रहे हैं।

‘अफीम कहीं बेहतर है हेरोइन से। यह सलाह दी है कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने। अपने इस बयान के चलते उन्होंने पंजाब में एक नया विवाद पैदा कर दिया है, और पंजाब में अफीम की फसल उगाने को बढ़ावा दे दिया है। उन्होंने सलाह दी है कि चूंकि अफीम हेरोइन से बेहतर है इसलिए इस पर लगी रोक हटाई जाए और पंजाब में इसका उत्पादन हो। जब सिद्धू ने यह कहा तो वहां पुलिस के महानिदेशक सुरेश अरोड़ा मौजूद थे।

विपक्ष जिटरी

इस बयान के तुरंत बाद ही हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने सिद्धू के खिलाफ ‘मादक द्रव्यों’ के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज कर गिरफ्तार करने की मांग की है। साथ ही अपने ही मंत्रिमंडल के एक साथी के खिलाफ ऐसा न कर पाने पर पद से इस्तीफा देने की मांग की है। क्योंकि उन्होंने ही पिछले साल ‘मादक द्रव्यों’ पर रोक लगाने के मुद्दे को बढ़ावा देते हुए उसे चुनावी मुद्दे बतौर लड़ा और जीत हासिल की।

अमरिंदर सिंह को अब सिद्धू के खिलाफ एफआईआर दर्ज करानी चाहिए क्योंकि उन्होंने एक मादक द्रव्य के प्रचलन को जायज ठहराया है। अकाली दल के प्रवक्ता दलजीत सिंह चीमा ने कहा, सिद्धू का बयान ही काफी है यह प्रमाणित करने के लिए कि राज्य सरकार मादक द्रव्यों के प्रचार-प्रसार को थामने में नाकाम रही।

मुख्यमंत्री ने जबकि चुनावों के दौरान दावा किया था कि वे गद्दी संभालने के एक महीने के अंदर युवाओं को मादक द्रव्यों से छुटकारा दिला देंगे। लेकिन अब उनके ही मंत्रिमंडल के एक सहयोगी यह मांग कर रहे हैं कि अफीम की खेती को कानूनी तौर पर वैध किया जाए। मुख्यमंत्री को यह बताना चाहिए कि कैसे अफीम की खेती और उसकी सहज उपलब्धता से कैसे नशे की लत खत्म होगी।

ऑन ए हाई

अभी हाल ‘ग्रामीण पंजाब में अफीम का प्रचलन और तौर तरीका’ विषय पर कराए गए सर्वे में यह जानकारी मिली थी कि ज़्यादातर लोग अफीम खाने के लती हैं। पंजाब के तीन जि़लों में कराए गए इस सर्वे से यह जानकारी हुई। जिन 1400 घरों को चुना गया उनमें 1276 को इस अध्ययन में शामिल किया गया। जिन लोगों से बातचीत की गई। उनमें ज़्यादातर की उम्र 15 साल से ऊपर की थी। इस सर्वे में 2064 पुरूष और 1536 महिलाएं थी। अफीम खाने वालों का फीसद महिलाओं की तुलना में कही ज़्यादा था।

पारंपरिक तौर पर पंजाब में अफगानिस्तान के पोस्त के पौधे (पॉपी) खेतों में उपजते हैं वह भी तालिबानी संरक्षण में । उनके लिए यह पैसा कमाने का एक बड़ा जरिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ में ड्रग्स एंड क्राइम के कार्यालय में मिली जानकारी के अनुसार अफगानिस्तान में जहां यह खेती होती है। उसका पूरा क्षेत्रफल 3,28000 हेक्टेयर 2017 में था। यानी यह पिछले साल से 63 फीसद ज़्यादा था। अनुमानित अफीम उत्पादन 2017 में 9000 टन ज़्यादा यानी 2016 से भी कहीं अधिक।

पंजाब में मादक द्रव्यों का अकेला यही स्त्रोत नहीं है बल्कि और सस्ती मादक दवाएं जो कथित फार्मास्यूटिकल फैक्टरियों में बनती हैं। फिर पाकिस्तानी सीमा से ढ़ेरों तरह की दवाएं पंजाब में आती हैं

मादक द्रव्यों के विक्रेता खुद भी नशे के आदी होते हैं। मादक द्रव्यों का यह लती ही पूरे डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का बहुत अह्म व्यक्ति होता है। इस नेटवर्क में कोई सिपाही भी शामिल हो सकता है। पंजाब पुलिस के 100 से ज़्यादा लोगों को दवाओं की तस्करी या व्यापार करने के आरोपों में 2014 से अब तक गिरफ्तार किया गया है। इनमें 30 को तो पिछले साल मार्च में जीत कर आई अमरिंदर सिंह की कांगे्रस सरकार के राज में गिरफ्तार किया गया। सिर्फ सिपाही ही नहीं बल्कि प्रभावशाली राजनेता भी मादक द्रव्यों के प्रसार में सहायक नजऱ आते हैं। समय बीतने के साथ कई राजनेताओं का ब्यौरा पकड़ में आ रहा है जो मादक द्रव्यों के प्रसार में सक्रिय रहे हैं।

यह विवादास्पद बयान तब आया है जब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पंजाब में मादक द्रव्यों के खिलाफ अपनी लड़ाई को अहमियत दे रखी है। जाहिर है पंजाब के मुख्यमंत्री को ही सिद्धू के बयान पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि किसी भी कीमत पर मादक द्रव्यों को पंजाब की धरती पर वैध नहीं होने देंगे। क्योंकि राज्य मादक द्रव्यों के खिलाफ लड़ रहा है।

खफा हैं मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज ज़रूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय दवा नीति बने जिससे मादक द्रव्यों को थामा जा सके। जिसे मैं पहले भी कहता रहा हूं। यह ज़रूर अच्छी बात है कि अफीम की खेती का मामला व्यापक तौर पर उभरा है। एक राज्य जो अफीम जैसी दवा का उत्पादन करता है और उसे दूसरे राज्य में बेचता है इसे कतई मंजूर नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे युवा पीढिय़ों की बर्बादी हो रही है। आज ज़रूरी है कि हम इस मामले पर एक बार और हमेशा के लिए समझ-बूझ लेते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की अपनी अलग दवा नीति है। इस पर कड़ाई से अमल किया जाना चाहिए। फार्मा उद्योग को जो कुछ चाहिए उसके लिए सरकार अलग नीति बनाए और अमल करे। सावधानी से नीति पर अमल होना चाहिए जिससे यह राज्यों को लीक न हो और पंजाब के बाजारों में न पहुंच पाए।

मुख्यमंत्री ने 18 जुलाई 2018 को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिख कर आग्रह किया था कि सरकार एक प्रभावशाली राष्ट्रीय दवा विरोधी नीति बनाए और समन्वित प्रयास करके पंजाब में मादक द्रव्यों का प्रसार रोका जा सके। उन्होंने पड़ोसी राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को लिखकर अपील की कि वे पंजाब में मादक द्रव्यों के खिलाफ चल रही लड़ाई में सहयोग करें। पंजाब को तस्करी न होने देें। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री से यह भी अपील की कि सभी सरकारी कर्मचारियों और पुलिस के लोगों का ‘डोप टेस्ट’ कराने की छूट दी जाए। उन्होंने ऐसे कई कायदे-कानून भी जारी किए हैं जिससे राज्य के दवा कानून पर ईमानदारी से अमल हो। सभी को इस बात पर खासा अचंभा हुआ कि कैसे आप सांसद धर्मवीर गांधी ने सिद्धू को समर्थन दे दिया। उन्होंने भी पंजाब में अफीम की बिक्री और खेती की मांग को समर्थन दे दिया। सिद्धू ने कहा था कि मेरे काका को अस्पताल से बतौर दवा अफीम मिलती थी। यह कम से कम उस ‘चिट्टा’ (हेरोइन) से तो बेहतर है जिसके कारण मां-बाप को अपने बच्चों की लाशें देखनी पड़ती है।

उन्होंने गांधी की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने एक एनजीओ नोबल फाउंडेशन की ओर से मुक्तसर मंडी में हुए जलसे में अफीम की खेती की वकालत की थी और अफीम के डोडे(पॉपी) की बिक्री को उचित ठहराया था। इसी साल जुलाई में गांधी ने केंद्रीय गृहमंत्री को इस आशय का अपना प्रार्थना पत्र भी दिया था। आप के इस सांसद को पार्टी ने मुअत्तल कर दिया था।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदन सिंह ने सिद्धू को उनकी अपील के लिए आडे हाथों लिया। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कहा,कि यह कितनेे तकलीफ की बात है कि ऐसी कोई मांग पंजाब में उठ रही है। यह हो सकता है कि राज्य में अफीम वितरण केंद्रो की व्यवस्था हो। लेकिन पंजाब में अफीम की वैधता का कोई सवाल ही नहीं उठता। पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के इस बयान से तो फिलहाल यही जान पड़ता है कि राज्य के युवाओं के लिए यह व्यवस्था हो कि वे स्वस्थ जीवनयापन कर सकें। क्या हम राज्य को नशाखोरों का अड्डा बनाने दें।

जनता फिर भी पूछेगी, कहां गया वह पैसा जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता था तेल!

कुछ राज्यों में नवंबर-दिसंबर में चुनाव हैं। उसके बाद आम चुनाव होना है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने केंद्र की एक्साइज ड्य्रटी पेट्रोल और डीजल पर कुछ घटाई है। साथ ही राज्यों को कहा है कि वे भी कटौती करें। ईधन पर हो रही राजनीति पर रोशनी डाल रही हैं सुमन।

जनता के गुस्से को कुछ कम करने और 2019 के पहले तक एक बड़े कदम के तौर केंद्र ने ईधन की कीमत में कटौती डेढ़ रुपए प्रति लीटर कम किया है साथ ही यह भरोसा भी दिया है कि केंद्र सरकार का प्रयास पांच रुपए प्रति लीटर कटौती का है। वित्त मंत्री ने जो घोषणा की है उसके तहत एक्साइज ड्यूटी 1.5 प्रति लीटर कम की गई। तेल कंपनियां भी एक रुपए प्रति लीटर अलग कटौती कर रही हैं। उन्होंने जोड़ा कि वे राज्यों से भी यह अनुरोध कर रहे हैं कि वे वैट (वीएटी) टैक्सों में कटौती करके रुपए 2.5 प्रति लीटर कटौती करें इससे रुपए पांच मात्र की कटौती ईंधन में होगी। उन्होंने कहा कि इस तरह हमें उम्मीद है कि रुपए पांच मात्र की कटौती ईधन की कीमत में होगी।

बेसिक कीमत है रुपए 42 मात्र

भारत में प्रति लीटर ईधन की कीमत करों आदि के चलते लगभग दुगुनी हो जाती है। आज पेट्रोल यदि 90 रुपए प्रति लीटर की दर से मुंबई में है तो उसकी बेसिक कीमत तो महज रुपए 42 मात्र है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश में पेट्रोल पर पहली अक्तूबर 2018 से 35.93 फीसद वैट लागू है। साथ ही प्रति लीटर डीजल पर यह 23.22 फीसद है। इसी तरह दिल्ली में ईधन में पेट्रोल की कीमतें 89.41 है। इस पर जो टैक्स है वह 43.97 प्रति लीटर हो इसके अलावा कच्चे तेल की कीमत, एक्सेचेज की दर फिर केंद्र की ओर से लगाई गई एक्साइज ड्यूटी केंद्र की और राज्यों से वैट के मुद्दे डीलर का कमीशन जो तेल कंपनियां लेती हैं। जब पेट्रोल पंप के मालिक इन सबको मिला देते हैं तो ईधन की कीमत लगभग दुगुनी हो जाती है। इंडियन आंएल कंपनी (आईओसी) की वेबसाइट के अनुसार, एक ग्राहक को दिल्ली में प्रति लीटर 79.15 प्रति लीटर की दर पर खरीदना पड़ता है जबकि डीलरों को यह रुपए 39.21 मात्र की दर से मिलता है।

पेट्रोल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी 17.98 फीसद और इस पर राज्य वैट 17.86 फीसद है। इसी कारण पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाने पर शोर है।

दक्षिण एशिया में सबसे ज्य़ादा

दरअसल पूरे दक्षिण एशिया में भारत में ईधन की कीमत भारत में सबसे ज्य़ादा है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान में पेट्रोल रुपए 54.51 मात्र की दर पर है। बांग्लादेश में यह प्रति लीटर रुपए 75 मात्र है।

ईधन पर 2014 के बाद राजनीति अच्छी खासी बढ़ गई है। इसके चलते तेल कंपनियां, केंद्र और राज्य सरकारें खासा लाभ कमाने में लगी हैं। जबकि तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय तौर पर कम हुई हैं। प्रतिदिन ईधन में हो रही थोड़ी थोड़ी बढ़ोतरी से उपभोक्ता खासा निराश हुआ है। इसका राजनीति पर भी खासा असर हुआ है। भाजपा के नेतृत्व की केंद्र सरकार विभिन्न राज्य सरकारों से रुपए 2.50 मात्र की कटौती का अनुरोध कर रही है। इस समय तकरीबन देश में उन्नीस राज्यों में भाजपा सरकारें हैं। माना जा रहा है कि ये सभी किसी न किसी तरह केंद्र सरकार का अनुरोध मान लेंगे। जबकि गैर भाजपा शासित राज्य सरकारों ने केंद्र सकार की यह सलाह मानने से इंकार कर दिया है। पहले जब दाम बढ़े थे तो केरल सरकार ने ईधन कीमतों में एक रुपए की कटौती और कर्नाटक सरकार ने दो रुपए  कम कर दिए थे। तब केंद्र सरकार ने एक पैसे की भी कटौती नहीं की। विपक्ष शासित राज्यों में दिल्ली, कर्नाटक, आंध्र, पश्चिम बंगाल और केरल हैं।

जब राज्य सरकारों की तेल कंपनियों ने पेट्रोल डीजल मूल्य दैनिक आधार पर ही रखने का फैसला लिया। इससे तो सोचा यह गया था कि कच्चे तेल के उतार-चढ़ाव का लाभ उपभोक्ता को मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय तौर पर रुपए की तुलना में अमेरिकी डालर के उतार-चढ़ाव से एक्सचेंज दरों में उछाल आया इससे बाजार में साधारण उपभोक्ता को रुपए के लगातार कमजोर होने और अमेरिकी डालर के मजबूत होने का असर ईधन की कीमतों के भारत में ज्य़ादा होने में दिखा।

ईधन की कीमतों में लगातार उछाल ने देश में राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। केंद्र की भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार ने पूरा ध्यान भारी टैक्स की वसूली पर ही रखा। इसी कारण जब केंद्र ने ईधन की कीमतों में कटौती की घोषणा की तो हिंदुस्तान पेटोलियम कारपोरेशन लिमिटेड के शेयर तत्काल बारह फीसद गिर गए। वित्त मंत्री की कीमतें के कमी कहने भर से यह नकारात्मक असर हुआ कि इस टैक्स कटौती से रुपए 10,500 मात्र का नुकसान हुआ। इसमें कोई संदेह नहीं कि तेल पर ऊँचे टैक्स की नीति से पिछले महीने से राजनीतिक विवाद छिड़ गया है क्योंकि वैश्विक तेल कीमतों में अब हो रही बढ़ोतरी से केंद्र सरकार के सामने कोई और चारा नहीं बचा। पूरी दुनिया में 2014 में जब तेल की कीमतें गिरीं तो केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर रुपए 11.77 मात्र प्रति लीटर और डीजल पर 13.47प्रति लीटर नवंबर में नियत किया । 2016 तक नौ बार इसमें बढ़ोतरी हुई। पिछले चार साल में रुपए 99.184 करोड़ मात्र 2014-15 से 2017-18 में बढ़ कर 2,29,019 करोड़ मात्र हो गई।

फिर राज्यों ने भी पेट्रो आधारित उत्पादों पर भी वैट जुड़ा। जो रुपए 1,37,157 करोड़ से बढ़ कर रुपए 184091 मात्र करोड़ पर पहुंचा।

केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलीभगत करके उपभोक्ताओं को अंतिम हद तक परेशान किया है। जबकि इन्हें मौका था कि ये एक्साइज ड्यूटी और कम कर ईधन की कीमत में काफी हद तक कटौती कर सकते थे। कीमतें इसलिए और भी बढ़ीं क्योंकि तेल कीमतों का अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कुछ समय पहले ही 80 डालर प्रति बैरेल हुआ था। आज यह कीमत तीन गुनी हो गई है जो 2016 में 29 डालर प्रति बैरेल थी।

यहीं नहीं, ईरान पर दुबारा लगी अमेरिकी पाबंदी से भी यह खेल खासा गहराया। यूरोपीय देश, रूस और चीन भी ईरान समझौते के हिस्सेदार हैं। यह बात साफ नहीं है कि किस हद तक यूरोपीय कंपनियां अमेरिकी दबाव को बर्दाश्त कर सकेंगी और ईरान के साथ इनका व्यापार होगा। तेल की कीमतें इसलिए भी बढ़ीं क्योंकि रूस और सऊदी अरब ने तेल सप्लाई पर अपनी पकड़ और मजबूत कर दी।

ईधन की बढ़ी कीमतों से कुछ तो राहत हाल फिलहाल होगी लेकिन इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। केंद्र ने एक राजनीतिक संदेश कुछ राज्यों को ज़रूर दिया है। आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल कीमतों को जीएसटी में लाने को आवाज और भी तेज होगी। क्योंकि पहले केंद्र और राज्य सरकारें ऐतिहासिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सस्ती कीमतों से देश में अच्छी खासी कमाई कर रही थीं। अब वह दौर भी खत्म हो चुका है।

अब देखा यह जाना है कि यूपीए सार्वजनिक क्षेत्र तेल कंपनियां ईधन कंपनियों को सब्सीडी दे रहा था। या केंद्र ने रुपए 18 हजार करोड़ मात्र टैक्स की ऊँची दरों के नाम पर बटोरे। जबकि कच्चे तेल की कीमतें नीचे जा रही थी। इस पर बातचीत की जानी चाहिए। इन सबसे उपभोक्ता ही खुश होंगे क्योंकि राहत का लाभ उन्हें मिलेगा। कहा भी जाता है कि ‘ये दिल मांगे मोर। अब समय आ गया है कि ईधन की कीमतों पर राजनीतिक न हो।

गांधी: बुजुर्ग की विरासत और हम

सुकरात का जन्म 469 ईसापूर्व माना जाता है और महात्मा गांधी का जन्म सन् 1869 में हुआ। दोनों के समय में 2200 वर्षों से ज्यादा का अंतर है, लेकिन उपरोक्त कथन पर दोनों का एक जैसा मत और विश्वास रहा है। सुकरात जहां एक हद तक सैद्धान्तिक प्रतिपादन पर अटक जाते हैं वहीं गांधी उपरोक्त कथन को न सिर्फ स्वयं पर चरितार्थ करते हंै बल्कि पूरे भारतीय समाज को इसके लिए तैयार भी करते हैं। वे अपने औपनिवेशिक शासन जिसने पिछले 150 वर्षों से भारत को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक तौर पर विखंडित कर देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी को हानि तो नहीं पहुंचाते हंै बल्कि उसके प्रति पे्रम भाव रखने की पैरवी भी करते है। वे भारत के विभाजन के बावजूद अंग्रेजों से घृणा नहीं करते। वे सुकरात को चरितार्थ तो करते हैं परन्तु वे यह भी कहते हैं कि मेरे पास अपना मौलिक कुछ भी नहीं है।

मैंने जो कुछ भी लिया है, वह भारतीय संस्कृति में पहले से मौजूद था।

वे आज के गैर निवासी भारतीय (एन आर आई) नहीं थे, जो अधिक विदेशी होकर भारत लौटता है और नख से शिख तक किसी नए ढांचे में ढला मालूम पड़ता है, हास्यास्पद होने की हद तक। वे जब अंतिम रूप से भारत लौटते हैं तो एक परिपूर्ण भारतीय के रूप में प्रकट होते है। उन्हें विदेश छोडऩे का कोई पछतावा नहीं है और भारत लौटने का कोई अभिमान भी नहीं है। वे भारत पर कृपा करने नहीं लौटते हैं, जैसा कि वर्तमान अधिकांश एनआरआई करते हैं, बल्कि वे अपने देश को और भी बेहतर ढंग से जानने बूझने के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं। गौर करिए गांधी 9 जनवरी 1915 को भारत लौटे और 30 जनवरी 1948 को अपनी हत्या के दिन तक केवल एक बार 1931 में चार महीनों के लिए गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गए थे। भारत में बिताए अपने इन अंतिम 33 वर्षों में से करीब 6 वर्ष उन्होंने ब्रिटिश जेलों में बिताए। 7 वर्ष साबरमती आश्रम में और 6 वर्ष के करीब सेवाग्राम (वर्धा) में गुजारे। बाकी के 14 वर्ष उन्होंने घूमते हुए बिताए। अनेक आंदोलनों में भागीदारी और उनकी शुरुआत करते हुए, भारत के अपने इन 33 वर्षों के निवास में उन्होंने 2500 के करीब स्थानों का भ्रमण किया। इन सबके चलते (और इंग्लैंड व दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षों को भी जोड़ लें तो) उन्होंने 70000 से अधिक पृष्ठों का लेखन किया। इसमें से करीब 50000 पृष्ठों का प्रकाशन संपूर्ण गांधी वांग्मय के 100 अंकों में हो चुका है। इसके अलावा उन्होंने 30000 से ज्यादा पत्रों का जवाब भी दिया।

हम गांधी के जीवन को चार कालखंडो में बांट सकते है। पहला 1889 से 1914 दक्षिण अफ्रीका में। दूसरा सन् 1915 से 1919 तक भारत में। इस दौरान वह अधिकांशत: भ्रमण पर रहे, अपवाद स्वरूप चम्पारण को छोड़कर। तीसरा कालखंड है 1920 से 1942 तक का। यह उनका सर्वाधिक सक्रिय जीवनकाल है। और चौथा 1944 से 1948 तक।

यह उनकी दार्शनिक परिपक्वता के साथ ही साथ मोहभंग का काल भी रहा है। उन्हें लेकर एक और विचार भी उठता है, और महसूस होता है कि उनकी निर्मति अनायास नहीं है। वे स्वयं को सायास या सप्रयास विकसित करते हैं। इसलिए गांधी से महात्मा और अंतत: राष्ट्रपिता बनने तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प और सारगर्भित भी है। उन्हें महात्मा की पदवी अपने समय के महानतम विचारक रवींद्रनाथ टैगौर देते हैं और राष्ट्रपिता का नाम व सम्मान देते हैं, नेताजी सुभाषचंद्र बोस। दोनों के संबंधों को लेकर आज तमाम बातें हो रही हैं, और कमोवेश इन्हें एक दूसरे के दुश्मन की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इस सबसे समझ में आता है कि गांधी से चाहे जितनी भी मतभिन्नता रही हो वे परिवार यानी तत्कालीन हिन्दुस्तान के सबसे वृद्ध व्यक्ति न होते हुए भी सबके बुजुर्ग के रूप में स्थापित और मान्य हो गए थे। अपनी मृत्यु वाले दिन (30-01-1948) सुबह उन्होंने मनु बहन गांधी से कहा था, ”मैं देख रहा हूँ कि मेरा प्रभाव मेरे निकट रहने वालों पर से भी उठता जा रहा है। प्रार्थना तो आत्मा को साफ करने की झाडू है। मैं प्रार्थना में अटल श्रद्धा रखता हूँ। ऐसी प्रार्थना करना जिस किसी को पसन्द नहीं तो फिर उन्हें चाहिए कि मेरा त्याग कर दें। इसी में दोनों का भला है।

यह सब देखने के लिए भगवान अब मुझे अधिक न रखे, यही चाहता हूँ।’’ इसके बाद उन्होंने मनु बहन से सुबह जो भजन सुना उसके बोल थे, ”थाके न थाके छतांय हो / मानवी न लेजे विसामों।।’’ अर्थात तू चाहे थका हो या न थका हो / हे मनुष्य तू विश्राम मत करना ! इसी को ध्यान में रखते हुए वे अपना पूरा दिन पूरा जीवन बिताते भी रहे थे। वे कभी थके ही नहीं। इसी दिन दोपहर को वे कहते हैं, ”जहाँ मैं देखता हूँ, वहीं जैसे यादव आपस में कट मरे वही हमारी स्थिति है। हम लोग आपस में झगड़ा कर समाज की कितनी हानि कर रहे हैं, इसका ख्याल किसी को नहीं आता।’’ शाम होते न होते एक मुलाकात को लेकर वे कहते हैं, ”उनसे कहों यदि जिन्दा रहा, तो प्रार्थना के बाद टहलते समय बातें कर लेंगे।’’ और उसी दिन देर शाम पंडित नेहरु जो भारत के प्रधानमंत्री भी थे। बोल नहीं पा रहे थे। वे सारी हिम्मत बटोरकर बोले ”हमारे बापू…’’ फिर एक गहरी साँस छोड़कर सिसकते हुए उन्होंने कहा ”बापू अब हमारे पास नहीं रहे।’’ यह महज एक महान व्यक्ति का अवसान नहीं था, हमारे पिता हमारे बुजुर्ग की अंतिम विदाई भी थी। उनका जीवन का चक्र पूरा हुआ !

उनके निधन पर प्रख्यात हिन्दी कवि व लेखक मुक्तिबोध ने कहा था, ”पहली बार, भारत के इतिहास में करोड़ों भूखेजनों को महत्व देने वाला इनका सगा बनने वाला, एक व्यक्ति सम्मुख आया जिसने उसी गरीब दबी-कुचली जनता को नैतिक साहस प्रदान कर क्या से क्या बना दिया! उस नैतिकतापूर्ण जनशक्ति के आघात से, ब्रिटिश साम्राज्य चूर-चूर हो गया।

नये भारत के उस प्रणेता की मृत्यु भी उसी शहीदाना तरीके से हुई। बिस्तर पर मरते या चलते हुए हार्टफेल होने के बजाए, यह महान आत्मा, हमारा राष्ट्रपिता रामनाम का पाठ करते हुए एक तुच्छ हिन्दू सम्प्रदायवादी की गोली का शिकार हुआ।’’ गौरतलब है मुक्तिबोध मूलत: माक्र्सवादी चिंतन के प्रति झुकाव के लेखक माने जाते हैं। गांधी वस्तुत: विचारधाराओं के विवाद से ऊपर उठ चुके थे। वे अधिकांश मसलों पर अपनी बेहद स्पष्ट एवं बेबाक राय रखते थे।

यदि राष्ट्रीयता, जो कि आजकल सबसे गरम विषय है, पर उनके विचार देखें तो समझ में आता है कि वे संकीर्ण राष्ट्रवादिता के घोर विरोधी थे। आमतौर पर हम यह कहते हैं कि ”और किसी का चाहे जो बिगड़े या चाहे जितना नुकसान हो भारत का भला तो होना ही चाहिये। या मैं अपने देश के साथ हूँ, चाहे फिर वह सही करे या गलत। परंतु गांधी जी के भारत प्रेम में किसी दूसरे देश के प्रति नफरत की कोई गुंजाइश नहीं है। वे कहते थे, ”मेरा देश जिसे मैं ठीक रखूंगा या करूंगा’’ और ”सारी मानव जाति के भले के लिए, और उसी के एक हिस्से के तौर पर भारत का भला।’’ वे अपनी तरह के अनूठे राष्ट्रवादी थे और अपने राष्ट्र को लेकर अपने विचारों की स्थापना को लेकर उन्होंने कड़ी मेहनत की थी। वे भाषा, धर्म और सांस्कृतिक भिन्नताओं में मेल बैठाकर एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे, जो सारी दुनिया का आदर्श बन सके ऐसा ही धर्म को लेकर भी था।

वे इस बात में विश्वास करते थे कि, ”शब्द मारने वाले हैं, भाव जीवन देने वाला है।’’ वे बिना सोचे विचारे शास्त्रों पर भी विचार के हिमायती नहीं थे। उनका मानना था, ”हर धर्म के हर नियम को आज के बौद्धिक युग में तर्क की कसौटी पर खरा उतरना होगा।’’ इतना ही नहीं एक कदम और आगे बढ़कर वे कहते थे, ”और अगर उसे (धर्म) सार्वभौम स्वीकृति पानी है, तो सार्वभौम न्याय की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।’’ इसीलिए वे भाव व भावना के हिमायती थे। संकीर्णता से उनका जैसे बैर ही था।

अनेक मामलों में उनका रवैया या व्यवहार परिवार के बुर्जुग जैसा ही था। हमारा दुर्भाग्य रहा कि हमने उन्हें समझने का गंभीर प्रयास ही नहीं किया और आज भी वही दोहरा रहे हैं। घर का बूढ़ा कई बार स्वयं को अकेला व बहिष्कृत सा समझने लगता है। जबकि वास्तविकता यह है कि वह तो नींव होता है और उस पर हम एक भवन की तरह खुद को विकसित करते हैं। गांधी भी ऐसे बुढ़ऊ हैं, जिन्हें बिसराया नहीं जा सकता। परंतु समस्या यह है कि हम उन्हें अपनाने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे हैं। वे कहते थे, ”सहिष्णुता हमारा लक्ष्य होना चाहिए। अगर सभी एकमत हो जाएं तो सहिष्णुता के इस उदारगुण की गुंजाइश ही कहां रह जाए। फिर भी सब को एकमत बना सकने का प्रयास आकाश – पुष्प को पा सकने के ही समान व्यर्थ है।’’ वे मनुष्य व उसकी मनुष्यता में निहित विविधता को ही सत्य मानते थे।

बापू तुम तो लड़ लेते थे..

प्रिय बापू,

आज बहुत दिनों बाद तुम्हें पत्र लिख रही हूँ। ऐसा नहीं कि पहले मन नहीं हुआ पर आज बहुत शिद्दत से तुम्हारी जरूरत महसूस हो रही है। तुम्हारे रास्तों की ताकत नजर आ रही है पर शायद मैं ही इस लायक न थी कि तुम्हें और तुम्हारी नीतियों को समझ पाती। स्कूल में पढ़ते हुए तो तुम्हारी लिखी किताब समझ ही नहीं आती थी। असल में स्कूल में तो अंकों के लिए पढ़ती थी या फिर क्लास में पास होने के लिएद्य तो किताबें भाती ही कहाँ थी! बस एक बात समझ में आती थी कि तुम भी बहुत होशियार विद्यार्थी नहीं थे। साधारण मेरे ही जैसे… याद है मुझे तुम्हारी किताब से ही मैंने ताकत जुटाई थी घर जाकर यह कहने की कि मैं भी साधारण सी विद्यार्थी हूँ.. जीवन में जब उन्होंने कुछ कर लिया तो शायद मैं भी कर ही लूँगी..

माफ़ करना बापू..इतनी बड़ी-बड़ी बात बना लेती थी क्योंकि कहने के लिए तो कोई ख़ास ताकत लगती नहीं थी उन दिनों! बचपन बड़ा ताकतवर होता है न बापू! कुछ भी कर जाएँ पर धीरे-धीरे सारा साहस खो क्यों जाता है बापू! तुम तो बहुत लड़ाके थे बापू… पर मेरे पास वैसे हथियार है कहाँ!

बापू बड़ी हलचल है मन में! तुम्हें पत्र लिखने की भी कई वजहें हैं। इन दिनों लोग अजीब से हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरे जैसा दब्बू आदमी तो शायद जी ही न सके। कई घटनाएँ घट गईं तो तुम्हारे पास लौट आई बापू। जानती हूँ तुम दिखोगे नहीं! मिलोगे नहीं मुन्नाभाई की फिल्म की तरह! पर फिर भी तुमसे सम्वाद से कोई तो रास्ता निकलेगा ही! पहले भी तो तुमने ही रास्ते दिखाए औए बनाए हैं न!

बचपन में तो मां ने ही ये रास्ता बताया था, तुम तक पहुँचने वाला। पता है एक बार मैंने स्कूल के रास्ते से घर जाते हुए इमली वाले से ढेर सारी खट्टी इमली खरीदी। तीन रूपये की इमली थी और बापू मेरे पास सिर्फ डेढ़ ही रुपया था। लालच तो आँखों में उतर आया था। इमली वापस करने का तो सवाल ही नहीं था। मां के पास भी इतने पैसे कहाँ कि वो इमली ..इतनी सारी इमली खाने के लिए मिल जाती! मैं भीड़ में मिल गई और दोस्तों के पीछे छिपकर पैसे आगे बड़ा दिए। भीड़ तो थी ही.. इमली वाला पता नहीं लगा पाया! मैं खुश थी, मैं जीत गई थी। डेढ़ रूपये में तीन की इमली! घर पहुंचते पहुंचते हंसी छू-मंतर हो गई। माँ ने जैसे मेरे चेहरे पर पढ़ लिया था … वो कुछ नहीं बोली। उसने उस दिन मुझे तुम्हारी किताब ‘सत्य के प्रयोगÓ दी थी। बस एक पंक्ति ‘बापू से पूछना बेटा कि जो किया था, सही थाÓ मैं तुमसे जवाब नहीं माँगूंगी।

तुमने मुझे उस दिन से ही परेशां करना शुरू कर दिया था बापू! मैं बहुत नाराज थी तुमसे। कैसे तुम उस किताब से निकलकर मेरे कान में कुछ कहने लगे! और मैं सुनती चली गई तुम्हारे वो किस्से जिनसे निकलकर तुम बने थे बापू..

तुम्हारा वो वाकया मुझे याद है जिसने मेरा जीवन बदल दिया ‘दूसरी चोरी के समय 15 साल का रहा हूँगा।यह चोरी मेरे माँसाहारी भाई ने सोने के कड़े के टुकड़े की थी। उन्होंने छोटा सा 25 रुपये का कर्ज कर लिया था। भाई के हाथ में सोने का कड़ा ठोस था। उसमें से तोला भर सोना काट लेना कठिन न था।Ó अंतत: मैंने पत्र लिखकर अपना दोष स्वीकार कर लेने और मांफी मांगने का निश्चय किया। मैंने पत्र लिखकर अपने हाथ से उन्हें दे दिया। पत्र में सब दोष स्वीकार किया और अपने किए का दंड माँगा।यह विनती कि मेरी गलती के लिए वह अपने आप को कष्ट में न डालें और प्रतिज्ञा की कि कि भविष्य में फिर ऐसा अपराध नहीं करूँगाÓ इतनी हिम्मत मैं नहीं जुटा पाई बापू। तुम तो  किसी से लडऩे से पहले खुद से लड़ लेते थे और किसी सीमा तक जीत भी जाते ही थे। मैं कहाँ इतनी साहसी थी बापू!

आजकल तुम नहीं आते बापू… नाराज हो या मैं तुम्हें खो चुकी हूँ! अभी उस दिन जब बेटे के साथ पिछली सीट पर बैठे गाडी में चली जा रही थी और दुनिया जहान की मासूमियत में लिपटी कहानियाँ सुनाता हुआ बेटा जैसे मुझे किसी और ही दुनिया में ले जा रहा था। कितने दिन होते हैं ऐसे जब ऐसे सुन सकूँ उसकी मासूम हंसी को.. आवाज को! बस तभी.. अगर मैं सही-सही उंगली रख सकूँ तो बस तभी पीछे से कार को टक्कर लगी। टकराने से लेकर आगे गिरने तक की पूरी स्थिति में मैं भले ही कुछ सोच न सकीं पर हाथ ने आगे बढ़कर बेटे को संभाल लिया। सोच ही रही थी कि उतर कर देखूँ तब तक जैसे गाडी का दरवाजा भड़भड़ाकर खुल गया। लाल आँखों और बहती पान की पीक वाले आदमी ने हाथ बढाकर मुझे जैसे नीचे ही उतार लिया। एक क्षण को तो लगा था कि शायद माफी मांगेगा पर यहाँ तो नजारा ही अलग था। हाथ को हवा में लहराते हुए वो जोर से चीखा ‘ऐसे गाडी चलवाती है तू.. बैलगाड़ी से चलाकरÓ मैं बोल नहीं पाई, जैसे किसी चीज ने भीतर ही भीतर बाँध लिया हो। ड्राइवर के आने से कुछ हिम्मत आई पर बोल कुछ न सकी। ड्राइवर जैसे लडऩे और भिडऩे के लिए आगे बढ़ गया ‘गलती तेरी है और मैडम पर चिल्लाता है!Ó जैसे रुलाई बस फूट पडऩे को ही थी। न जाने कहाँ से सारी ताकत जुटाकर मैंने ड्राइवर से कहा ‘जाने दो उसे, छोडो, चलोÓ ड्राइवर ने गुस्से और हैरानी से मुझे देखा ..गुस्से से उसने सड़क पर थूक दिया। बेटा भी नाराज था मुझसे। वो आदमी लाल-लाल आँखों से आगे बढ़ गया..मैंने ध्यान से देखा अब, उसकी बेल्ट के साथ एक बन्दूक साफ़-साफ़ नजर आ रही थी। जाते हुए उसने बंदूक पर हाथ फेरा कर मुझे मुड़कर देखा भीद्य गाडी में बैठकर जब बेटे को सम्भाला तो उसने बात करने से मना कर दिया जैसे…जैसे… एक ताकतवर छवि को मैंने धूमिल कर दिया हो!

मैं लड़ नहीं पाई बापू! तुम बहुत याद आए… बहुत ज्यादा। मैं हार गई थी क्या बापू? मैं जानती हूँ तुम होते तो लड़ लेते जरुर! पर तुम्हारी लड़ाई तो अंदर की शान्ति से शुरू होती थी न! जब मैं शांत नहीं थी तो लड़ती कैसे?सब नाराज थे पर अब मैं शांत थी अंदर से बहुत ज्यादा शांत। मैंने सड़क पर एक वहशीपन का नंगा नाच नहीं होने दिया था पर तुम्हारी जरूरत बहुत महसूस हुई थी बापू… क्या मैंने गलत किया था?

हथियारों की जबान कितनी ताकतवर हो गई है बापू! हर आदमी हथियारों की जबान ही जानता और दिखाना चाहता है।तुम सचमुच ताकतवर थे बापू.. तुम्हारे हथियार भी तो बड़े ताकतवर थे…

बापू.. उस दिन भी कमजोर ही पड़ गई मैं! दो दिन से किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी बिलकुल पड़ोस वाले घर से। रोज रात को शायद मीरा ही थी, जो रो रही थी। उसकी आवाज में मेरा दिल दहला दिया। सोचा जाकर दस्तक दूँ पर जैसे किसी ने हाथ पकड़ लिया हो। एक दृएक कदम भारी हो गया। पर साहस तो तुमने सिखाया ही था तो हिम्मत करते हुए जाकर दरवाजा खड़का ही दिया। राकेश दरवाजे पर मुझे देख चैंक गया ‘आइए…Ó मैं झेंप गई ‘नहीं बस वो दो दिन से मीरा की आवाज रोज रात को सुनाई देती है,जोर से रोने की तो मैं…Ó राकेश गंभीर हो गया ‘आइए, खुद पूछ लीजिए मीरा से! मैं उसे मारता-पीटता नहीं हूँ..Ó कहकर राकेश गुस्से में घर से बाहर चला गया। मीरा भी सामने ही थी। उसने नाराज आँखों से मुझे देखा…जैसे मेरे आने भर से उन दोनों के बीच कोई दीवार खडी हो गई हो। हिम्मत करके पूछा ‘सब ठीक है मीरा?Ó मीरा ने रुखाई से जवाब दिया ..क्यों आपको लगता है कि आपको मेरे घर में दखल देने का अधिकार है? मेरे पिता की तबियत खराब है, बहुत ज्यादा। मैं जा नहीं पा रही हूँ इसीलिए रो रही थी। आप अब राकेश से मांफी मांगेंगी, अपने इस व्यवहार के लिए?Ó

मैं समझ नहीं पाई,कि क्या करूँ!पता नहीं, यह सच था या मीरा बहाना कर रही थी! पर मैं अवांछित थी, इतना तो समझ ही गई थी। दो दिनों तक मैं बाहर निकलती तो राकेश और मीरा मुझे देखकर मुंह फेर लेते। मैं बहुत परेशान थी, पर कोई रास्ता नहीं सूझता था। लौटकर फिर तुम्हारे पास आई… तुमने सत्य के प्रयोग में अपनी गलती स्वीकारने के कई माध्यम बताएँ हैं, उनमें से एक मैं भी अपनाना  चाहती थी…

आपने ब्राइटन में उस महिला को पत्र लिखा था न! जो आपकी मदद कर रही थी, पर आप उससे अपने विवाह की बात नही कह पाए थे! ‘यह तय करके मैंने उसे पत्र लिखाÓ यह पत्र मिलने के बाद आप मुझे अपने यहाँ आने के अयोग्य समझें तो मुझे तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। आपके स्नेह का ऋण मुझपर सदा बना रहेगाद्य यह तो मुझे कहना चाहिए कि आपमेरा त्याग न करें तो मुझे खुशी होगी। अब भी मुझे अपने यहाँ आने देने लायक समझेंगी तो मेरे लिए यह आपके प्रेम की एक नई निशानी होगी, और उस प्रेम का पात्र बनने के लिए सदा प्रयत्न करता रहूँगा।Ó

मैंने भी निश्चय किया कि शायद यही मेरी राह भी होगी। ऐसा ही एक पत्र मैंने भी लिखा, बहुत साहस करके। आपने भीे तो कई बार पत्र लिखा और फाड़ दिया, भेजने के निश्चय से पहले! मैं भी कई ड्राफ्ट लिखकर फाड़ती रही पर अंतत: लिख ही दिया। साहसी तो हूँ नहीं बापू तो चेहरा बचाकर पत्र दरवाजे से सरका भर दिया। दो दिन के इंतजार के बाद मीरा को देखा, मुझे देख वो हल्के से मुस्कराई और घर के भीतर चली गई। मैं फूल सी हल्की हो गई। बस जीत गई मैं.. सबकुछ बदला नहीं है अभी! लोग मानते हैं आपकी माफी को भी, बस साहस होना चाहिए अपनी गलती स्वीकारने का!

पर बापू…उस रात मीरा फिर रो रही थी….अगले दिन अख़बार उठाने गई तो मीरा भी अख़बार उठाने आई थी… ‘हाथ मजबूत कर दिए आपने उसके! शुक्रिया!Ó मुझे काटो तो खून नहीं! मैं फिर हार गई बापू… तुम्हारे लिए लडऩा आसान था बापू! तुम पहचानते थे अपने विरोधियों को! विरोधियों में भी साहस था, अपना कू्रर चेहरा सामने लाने का! आज कैसे लडूँ बापू..हथियार बदल गए और चेहरे पहचाने नहीं जाते!

आखिऱी बार मैं उस दिन बिलकुल ही हार गई बापू..बेटे ने बताया कि उसकी कक्षा में पढने वाली बच्ची ने आत्महत्या कर ली।  जानते हो बापू..आत्महत्या के वजह क्या थी? वाहे वीडियो गेम, जो उसकी कक्षा का हर विद्यार्थी खेल रहा था, इस बच्ची के माता-पिता ने मन कर दिया था। और इस बात पर क्लास के विद्यार्थियों ने उसे अपने समूह से बाहर कर दिया था! बच्ची यह बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने यह कदम उठा लिया!

कमजोर क्यों पड़ जाते हैं बच्चे? कौन सा वो क्षण है जब जीवन की जंग से हार जाने का निर्णय ज्यादा ताकतवर हो जाता है। बापू तुम तो कई बार कमजोर पड़े …सुनते हैं तुम्हें तो ट्रेन के कम्पार्टमेंट से निकाल दिया गया था। तुम ट्रेन के डिब्बे से उतार दिए गए। पर तुम जिन्दगी के डिब्बे से उतरने को तैयार नहीं हुए। तुमने उन किसानों के साथ जीवन बिताना तय किया और उनके साथ पूरे के पूरे बदल गए। बापू क्या वो तुम्हारी हार थी! नहीं न! फिर ये बच्चे क्यों हार जाते हैं जिन्दगी की छोटी छोटी लड़ाइयों से! बापू तुम अपने बचपन में भे कई बार हारे.. गलतियाँ भी कीं। ऐसा नहीं कि तुम जन्म से महान थे, तुम्हें तुम्हारी गलतियों ने बड़ा बनाया। तुममें तब भी साहस आया जब तुम्हें विदेश जाना था और पञ्च तुम्हें बिरादरी से बाहर कर रहे थे। ‘यह लड़का आज से बिरादरी से बाहर माना जाएगा।जो कोई इसे मदद देगा या विदा करने जाएगा,बिरादरी उससे जवाब तलब करेगी और उसपर सवा रूपये का जुर्माना होगा।Ó ‘मुझ पर इस फैसले का कोई असर नहीं हुआ। मैंने मुखिया महाशय से विदा ली।Ó

ये बच्ची क्यों नहीं लड़ पाई बापू.. एक माता-पिता के रूप में मैं उस दिन हार गई थी बापू। हम सिखा नहीं पाए अपने बच्चों को उन ताकतवर अहिंसक हथियारों से लडऩा जिनसे तुम लड़ते थे।

तुम लड़ लेते थे बापू… मैं थोड़ी कायर ही रह गई। या बहुत दिन हुए जिसे सत्य माना,उसे प्रयोग किए हुएद्य देखो इतनी बातों के बीच तुमने ही रास्ता दिखा दिया..मैं इस भ्रम में क्यों हूँ कि मैं कुछ कर भी सकती हूँ! समझ जाती हूँ, सबको अपना सत्य खुद ढूँढना होगा! रास्ता तुम दिखा सकते हो, पर चयन की लिए कदम तो खुद उठाना होगा न!

जाती हूँ, जाकर बस जाकर बेटे के सिरहाने पर तुम्हारी किताब रख कर आती हूँ… शायद अपने सत्य के प्रयोग के रास्ते वो ढूँढ ले…तुम्हारे ही सहारे…