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अहिंसा के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर किसानों को दिल्ली सीमा पर रोका

हरिद्वार से दिल्ली चली किसान क्रांति यात्रा को दिल्ली पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर पर रोक लिया। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल ने किसानों को दिल्ली आने से रोके जाने की कड़ी निंदा की। वे किसान चाहते थे कि उन्हें किसान घाट जाने दिया जाए। जहां वे पूर्व किसान नेता चौधरी चरण सिंह को श्रद्धांजलि देकर अपनी मांगों को रखेंगे। दिल्ली पुलिस कमिश्नर खुद पुलिसिया बदोबस्त देख कर लौटे। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त ने लाउडस्पीकर से तैनात जवानों से कहा, किसान बैरीकेड तोडऩे की कोशिश करेंगे। हर परिस्थिति से निपटने के लिए अलर्ट रहें।

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के बैनर तले शुरू यात्रा 23 अक्तूबर को हरिद्वार से चली। राह में जितने भी गांव पड़े उनसे भी किसान उठे और जुलूस में शरीक हो गए। दिल्ली बॉर्डर पर पहुंचे। किसानों की तादाद लाख के आसपास बताई गई। बादलों की तरह आगे बढ़ते, डंडे-झंडे लिए किसानों ने नाराज होकर बैरीकेड तोड़े। दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। लाठीचार्ज भी किया और हवाई फायर भी किया।

दिल्ली बार्डर पर रोके जाने पर भाकियू के अध्यक्ष और पूर्व किसान नेता महेेंंद्र सिंह टिकैत के पुत्र नरेश टिकैत ने पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। उन्होंने कहा कि किसान को दिल्ली यानी अपने ही देश की राजधानी मेें प्रवेश करने से क्यो रोक रही है यह सरकार। किसानों की रैली 23 सितंबर से लगातार दिल्ली सीमा तक पूरी तौर पर शांति से आई है। अब इसे रोक दिया गया है। समस्याओं और मांगों को यदि किसान अपनी सरकार से बात करके नहंी कहेंगे तो किससे कहेंगे? क्या हम बांग्लादेश या पाकिस्तान जाएं।

पूरा देश दो अक्तूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती हर साल मनाता है। इस साल तीसरी बार किसानों ने दो अक्तूबर को दिल्ली में लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर उन्हें उनकी समाधि किसान घाट पर श्रद्धांजलि देने और केंद्र सरकार को अपनी मांगें सौंपने आ रहा था। वे किसान घाट इसलिए जाना चाहते थे क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री ने ही पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई के दौरान जय जवान और जय किसान का नारा दिया था। जवानों ने पाकिस्तान पर जीत हासिल की और किसानों ने कृषि में खूब मेहनत की।

आज उन्हीं किसानों को देश की राजधानी में अपने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने से रोकने का हुक्मनामा जारी करने वाली सरकार का जम कर विरोध किया। किसान क्रांति मोर्चा की एक बुलेटिन में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की गई है। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री और किसान कल्याण विभाग देखने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से किसान नेताओं ने अपनी मांगों के संबंध में बात कर ली है। उनकी सात मांगें मान ली गई हैं।

किसान आंदोलन आयोजित करने वाले भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के अनुसार किसानों और मंत्री से बात तो हुई लेकिन उनकी किसी मांग को माना नहीं गया। सिर्फ आश्वासन मिला जिसे वे नहीं मानते। खास कर न्यूनतम बिक्री दर (एमएसपी) और एक बारगी तमाम कजऱ् ऋणों की माफी। कुल 11 मुद्दों पर बात हुई। सरकार ने सात पर विचार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि चूंकि वित्त का मामला मांग के साथ जुड़ा हुआ है इसलिए यह वित्तीय मामला है। उन्होंने बताया कि इन मुद्दों पर वे आपस मेें बात करके ही फिर बात करेंगे।

अहिंसा के अंतरराष्ट्रीय दिन, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती समारोह, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर किसानों पर पुलिस अत्याचार की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने निंदा की है। अब किसान भी अपनी पीड़ा नहीं जता सकते।  शांतिपूर्ण तरीके से ये निहत्थे किसान राजघाट और किसानघाट जाना चाह रहे थे। लेकिन दिल्ली उत्तरप्रदेश सीमा पर गाजीपुर में ही उन्हें रोक दिया गया। उन्हें तितर बितर करने के लिए उन पर लाठियां बरसाई गई। पानी की बौछारें छोड़ी गई, हवाई फायर किए गए। बूढ़े, और बच्चों पर भी रहम नहीं किया गया। जनता दल (एकी) के केसी त्यागी ने भी निंदा की।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा किसानों को दिल्ली मे जाने देना चाहिए। किसान भी इसी देश के नागरिक हैं। दिल्ली हर किसी की है। किसानों को दिल्ली में न घुसने देना गलत है। उनकी मांगें वैध हैं। उन्हें माना जाना चाहिए। हम किसानों के साथ हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी किसानों की रैली को समर्थन दिया।

इसी साल मार्च में 35 हजार से ज्य़ादा किसानों ने इसी साल कड़ी धूप मेें अपनी मांगों के पक्ष में नासिक से मुंबई तक की पद यात्रा की थी। उन्हें राज्य सरकार से भरोसा दिला कर वापस भेज दिया गया। लेकिन वह युद्ध अब भी जारी है।

जय जवान, जय किसान सारी सीमाएं सील, कब तक?

निहत्थे किसानों पर हवाई फायर, आंसू गैस, पानी की बौछार और लाठी चार्ज उस दिन किया गया जब किसान गांधी-शास्त्री जंयती पर श्रद्धांजलि देने किसान घाट पर जाना चाहते थे। पहले से तय इस आंदोलन में शामिल किसानों को दिल्ली सीमा पर ही रोक दिया गया।

नाराज किसानों ने बैरीकेड तोडे। कई घायल हुए। आंदोलन जारी रखने का फैसला लिया।

पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब से आए 70 हजार से ऊपर दिल्ली में विरोध जताने पहुंचे किसानों को पुलिस ने दिल्ली उत्तरप्रदेश सीमा पर आंसू गैस, वाटर कैनन से पानी की तेज बौछारें फंैक कर, लाठी चार्ज करके रोक दिया।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की जंयती के मौके पर वे किसान घाट जाकर अपना प्रदर्शन शुरू करना चाहते थे। क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री ने जय जवान,जय किसान का नारा दिया था। लेकिन भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार अपने ही वादे पूरे नहीं कर पा रही। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपिता और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर निहत्थे किसानों पर दिल्ली में न आने देने के लिए पुलिस कार्रवाई उत्तरप्रदेश और केंद्र सरकार की मिलीजुली साजिश मानते हुए निंदा की है। किसानों में गोंडा, बस्ती, गोरखपुर और पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार से भी किसान आए थे। पश्चिम उत्तरप्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान इस आंदोलन में थे।

महिलाओं के हाथ ज्य़ादा सुरक्षित है विश्व अर्थव्यवस्था: गेलार्ड

दुनिया 2008 की आर्थिक मंदी को भूली नहीं है। 15 सितंबर 2008 को अमेरिका के दिग्गज निवेश बैंक लीमैन बद्रर्स के दिवालिया होने के कारण वैश्विक मंदी का जो दौर शुरू हुआ, उसका असर दुनिया भर में देखा गया। इस वैश्विक आर्थिक मंदी के दस साल पूरे होने के मौके पर इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड ने विश्व को आगाह किया है कि बैंकिग क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व के कारण फिर से आर्थिक मंदी आ सकती है। उन्होंने कहा है कि 10 साल पहले लीमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने की बड़ी वजह यही थी। अपने ब्लॉग में उन्होंने लिखा कि अगर लीमैन ब्रदर्स की जगह लीमैन सिस्टर्स होतीं तो आज दुनिया कुछ और होती।

दरअसल आईएमएफ की एमडी क्रिस्टीन लेगार्ड ने इस सवाल को फिर से उठाकर दुनिया की दिग्गज अर्थव्यवस्थाओं और नीति निर्माताओं का ध्यान इस ओर खींचा है कि अर्थव्यवस्था/बाजार में पुरुषों के वर्चस्व का खमियाजा क्यों आम आदमी को चुकाना पड़े। लिहाजा उनका जोर इस बात पर है कि मर्दाना छवि को तोडऩे व अर्थव्यवस्था में निरंतर सुधार के लिए फाइनैंस सेक्टर में महिला नेतृत्व को बढ़ाना होगा। कॉरपोरेट सेक्टर में भी महिलाओं का नेतृत्व उल्लेखनीय नहीं होने पर चिंता जताई है। वैश्विक आर्थिक मंदी के दस साल के बाद भी यह मुद्दा प्रासगिंक है, जिसने सितंबर 2008 के फौरन बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरी व शोध संस्थाओं ने इस पर अध्ययन कराने के लिए लाखों डॉलर जुटाए। स्विट्जरलैंड की राजधानी दावोस में 2009 में आयोजित विश्व आर्थिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की सालाना बैठक में ‘विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण में महिला शक्ति का इस्तेमालÓ नामक विषय पर एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें यह राय व्यक्त की गई कि यद्यपि मौजूदा (2008) वित्तीय संकट का कोई तात्कालीक हल नहीं हो सकता लेकिन निश्चित तौर पर एक दीर्घकालिक हल हो सकता है। इसके लिए महिलाओं को नेतृत्व के पद हासिल करने और बदलती अर्थव्यव्स्था के दौर में नए दृष्टिकोण को सुनने के लिए उचित माहौल मुहैया कराने की ज़रूरत है। विश्व आर्थिक फोरम के संस्थापक सदस्य व चेयरमैन क्लॉस श्वाब ने भी इस मौके पर कहा कि सरकारी संस्थाओं व वित्तीय संस्थाओं में महिलाओं को वरिष्ठ पदों पर कंमाड संभालने के मौके देना न सिर्फ मौजूदा आर्थिक उथल-पुथल के हल तलाशने के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि भविष्य में भी आर्थिक मंदी के आसार होने पर मददगाार साबित होंगे। महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों में प्रभावशाली पदों पर महिलाओं की तादाद को बढ़ाने के पीछे एक दलील यह भी दी जाती है कि महिलाएं कम जोखिम वाले फैसले लेती हैं, नुकसान के प्रति अधिक गंभीर होती हैं, पुरुषों की तरह अतिविश्वासी नहीं होती और उनका रुझान लंबी अवधि वाली योजनाओं के प्रति ज़्यादा होता है। वैसे भी यह देखा गया है कि अधिक विविधता सोच को गहरा करती है। ब्रिटेन के चार दिग्गज बैंकों के सीईओ पुरुष हैं। द फाइनेंसिइल टाइम्स स्टॉक एक्सचेंज में शामिल 100 बड़ी कंपनियों के बोर्ड में महिला निदेशकों का अनुपात गिरता जा रहा है। फॉर्चून 500 कंपनियों में 2018 में महिला सीईओ की संख्या 28 रह गई है जबकि 2017 में इनकी संख्या 32 थी। महिलाओं को शीर्ष पदों के लिए चुनने वाले संस्थानों का मैनेजमेंट अच्छा है लेकिन इस सब के बावजूद वित्तीय संस्थानों में प्रमुख पदों पर दो फीसद से भी कम महिलाएं हैं। बोर्ड में उनका प्रतिनधित्व 20 फीसद से भी कम है। वैश्विक मंदी के बाद बैकिंग में बड़े सुधार करने के लिए महिला नेतृत्व की भूमिका वाला मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खूब जोर-शोर से तो उठा मगर एक दशक के बाद भी पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में महिला नेतृत्व को लेकर कई ‘किंतु-परंतुÓ बरकरार हैं। इससे निपटने के लिए अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिए अधिक से अधिक लड़कियों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ बोर्ड रूम में अधिक से अधिक सक्रिय महिला निदेशकों पर केंद्रित करना होगा।

हाल में 21-22 सितंबर को कनाडा के मॉन्ट्रियल में महिला विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हुआ। इसमें ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, कीनिया, नमीबिया, नार्वे, पनामा, रवांडा, सेंट ल्यूसिया, रिपब्लिक ऑफ साउथ अफ्रीका, स्वीडन, कनाडा, अंडोरा, बुल्गारिया, कोस्टारिका, क्रोशिया, घाना आदि देशों की महिला विदेश मंत्रियों ने भाग लिया। दुनिया में यह अपनी तरह का पहला सम्मेलन था। इस सम्मेलन में वैश्विक शांति, समृद्धि और सुरक्षा सरीखे मुद्दों पर चर्चा हुई। इस सम्मेलन की विशेषता यह है कि महिला विदेश मंत्रियों ने दुनिया के पुरुष वर्चस्व वाले कूटनीति के क्षेत्र में यह संदेश पहुंचा दिया कि हम उन सभी चुनौतियों, जिनका समाज सामना कर रहा है, का हल तलाशने में एक अनिवार्य अहम कड़ी हैं। मुल्कों के कूटनीतिक, आर्थिक, सामाजिक रिश्तों का ब्लूप्रिंट बनाते वक्त उसके नारीवादी परिप्रेक्ष्य पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। दरअसल दुनिया की महिला विदेश मंत्रियों के सम्मेलन की घोषणा कनाडा के टोंरटो में इस साल आयोजित जी-7 के विदेश मंत्री सम्मेलन के दौरान की गई थी और इस पहल के पीछे कनाडा सरकार की शुरू की गई फस्ट फेमिनिस्ट इंटरनेशनल असिस्टेंस पॉलिसी है, जिसका मकसद विदेश व सुरक्षा नीति में नारी परिप्रेक्ष्य को लाना है। कनाडा की विदेश मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलैंड ने इस सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में कहा – हम सब जानते हैं कि समृद्धि,शांति और सुरक्षा होने की संभावना वहां ज़्यादा होती हैं,जहां महिलाएं व समाज के लोग राजनीतिक जिं़दगी में सक्रिय हिस्सा लेते हैं और जहां लोगों के बुनियादी हकों का सम्मान किया जाता है। जब हम सब फैसला लेने की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं तो हमारा समाज और मजबूत बनता है, हमारी अर्थव्यवस्था व मध्यम वर्ग अधिक समृद्ध होता है और हमारे देश पहले से अधिक सुरक्षित हो जाते हैं। फ्रीलैंड ने अपने मुल्क की मिसाल देते हुए कहा कि कनाडा की कैबिनेट में लैंगिक संतुलन है। शीर्ष पदों को सभांलने वाली महिलाएं मुल्क की महत्वपूर्ण नीति-निर्धारण फैसलों को प्रभावित करने व उन्हें आकार देने में अपने अनुभवों का इस्तेमाल करती हैं। महिलाएं नीतियों में ऐसे ज्ञान को भी जोड़ सकती हैं,जिससे नीतियों का लड़कियों व महिलाओं पर अलग तरह से प्रभाव पड़ सकता है।

दरअसल मॉन्ट्रियल में आयोजित महिला विदेश मंत्री सम्मेलन में मुख्यत: नीति निर्माण, विश्व शांति, महिला हिंसा की रोकथाम और वैश्विक समृद्धि में महिलाओं के योगदान पर चर्चा हुई। महिलाओं को, राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से सशक्त करना ज़रूरी है और इसके साथ ही उन्हें शीर्ष स्तर पर नेतृत्व के मौके देना भी। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य राष्ट्रों में से 30 की विदेश मंत्री महिलाएं हैं, भारत भी उनमें शमिल है। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया, मगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क की महिला विदेश मंत्री के वहां नहीं जाने से बिरादरी में अच्छा संदेश नहीं गया। बहरहाल मॉन्ट्रियल में यूरोपीय,लैटिन अमेरिकी व कैरिबन ,अफ्रीकी ,एशियाई मुल्कों की महिला विदेश मंत्रियों ने विश्व शांति,वैश्विक समृद्धि, सुरक्षा, आंतकवाद के खात्मे, महिला हिंसा की रोकथाम, महिला नेतृत्व और लोकतंत्र को मजूबती प्रदान करने में महिलाओं की भूमिका को केंद्र में रखने पर जो विशेष बल दिया है उसका असर वैश्विक नीतियों पर कितना पड़ता है, यह तो आना वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल महिला विदेश मंत्रियों की इस मीटिंग को महिला मंत्रियों के बीच आपसी सहयोग वाले संवाद की परंपरा की शुरूआत के रूप में देखा जा रहा है।

ऑनलाइन आर्डर कर मंगाया फ़ोन मगर मिली ईंट

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक व्यक्ति ने एक अग्रणी ऑनलाइन विक्रेता कंपनी पर आरोप लगाया गया है कि उसको मोबाइल फोन के आर्डर करने के कुछ दिन बाद मिली पैकेट में ईंट निकली।

हरसूल पुलिस थाने के निरीक्षक मनीष कल्याणकर ने अनुसार यहां हुडको क्षेत्र के निवासी गजानन खरात ने पुलिस को बताया कि उसने नौ अक्टूबर को शॉपिंग साइट के जरिये मोबाइल फोन खरीदा और इसके लिए उसने 9,134 रूपये का भुगतान किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इसके बाद ई कॉमर्स कंपनी से खरात को एक मैसेज मिला जिसमें कहा गया था कि उनका मोबाइल फोन एक हफ्ते के भीतर उन्हें मिल जायेगा।

कल्याणकर ने बताया कि व्यक्ति को पिछले रविवार को खुदरा विक्रेता से एक पैकेट प्राप्त हुआ। मगर उसने जब उसने पैकेट खोला तो कथित रूप से उसके भीतर से मोबाइल फोन के स्थान पर एक ईंट का कथित टुकड़ा निकला।

उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद व्यक्ति ने कूरियर की सौंपने वाले को भी बुलाया। उसने उससे कहा कि उसकी जिम्मेदारी केवल पार्सल की डिलिवरी करने की है और उसके भीतर क्या है उसने नहीं देखा।

भाषा की एक रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और मामले की जांच कर रही है।

शासन की कार्रवाई और संत सानंद का प्रतिवाद

उत्तराखंड में हरिद्वार के जि़ला मेजिस्ट्रेट की सहमति और उप जि़ला मेजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह के आदेश पर आमरण अनशन पर बैटे स्वामी सानंद को पुलिस उठा कर ले गई। स्वामी सानंद ने पुलिस के साथ जाने से पहले पत्र भी लिखा। पुलिस डा. जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद को जबरन एआईआईएमए ऋषिकेश  उठा ले गई। जहां कुछ ही देर बाद उनका निधन हो गया।

गंगा की स्वच्छता निर्मलता और बहाव की मांगों के साथ वे आमरण अनशन पर थे। 10 अक्तूबर (मंगलवार) को देर रात  प्रशासन उन्हें जबरन भोजन नहीं करा सका। भोर में तीन बजे उन्होंने जल ज़रूर पिया था। संभवत डाक्टरों की सलाह थी कि यदि स्वामी सानंद बेहोश होते हैं तो डाक्टर उन्हें जबरन खिलाया जाएगा।

हरिद्वार जिला प्रशासन के आदेश में कहा गया है कि मातृ सदन में डा. अग्रवाल के अनशन करने से कानून व्यवस्था को खतरा है। प्रशासन के इस झूठ का प्रतिवाद करते हुए स्वामी सानंद ने इस आदेश पर ही अपनी विरोध टिप्पणी भी लिखी।

उपजि़ला मेजिस्ट्रेट ने जो आदेश पत्र लिखा और उन तक पहुंचाया उसके अनुसार मुझे थानाध्यक्ष कनखल ने अपनी आख्या दिनांक 09.10.18 द्वारा अवगत कराया है कि मातृ सदन आश्रम में स्वामी श्री ज्ञान स्वरूप सानंद उर्फ प्रो. जीडी अग्रवाल- पर्यावरणविद (उम्र 87 वर्ष) द्वारा गंगा नदी में खनन बंद करवाए जाने तथा गंगा नदी एंव उसकी सहायक नदियों पर बन रहे बांधों को बंद कराने की मांग कीे लेकर विगत सौ दिनों से अनशन किया जा रहा है।

प्रो. जीडी अग्रवाल (ज्ञान स्वरूप सानंद) द्वारा 9.10.2018 की शाम से जल त्याग भी कर दिया गया है।अत उनकी वृद्धावस्था एवं विगत लगभग 100 दिनों से किए जा रहे अनशन और दिनांक 9.10.2018 से जल त्याग कर दिए जाने के फलस्वरूप उनका जीवन संकटमय   हो सकता है और ऐसे में उनके समर्थकों/अनुयायियों द्वारा दंगा बलवा उत्पन्न कर लोक शांति भंग करने की संभावना बनी हुई हैं इस संबंध में चिकित्सकों का परामर्श भी प्राप्त हुआ है कि स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद उर्फ प्रो. जीडी अग्रवाल द्वारा जल त्याग दिए जाने की दशा में उनकी जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया है।

थानाध्यक्ष कनखल की उपरोक्त आख्या एवं चिकित्सकों के परामर्श से मेरा समाधान हो गया है कि विधि एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए थाना कनखल क्षेत्र में स्थित मातृ सदन आश्रम जगजीतपुर से 100 मीटर क्षेत्र में तत्काल धारा-144 लगाया जाना आवश्यक है।

अत मैं मनीषकुमार  सिंह उप जि़ला मेजिस्ट्रेट हरिद्वार आपको आदेशित करता हंू कि आप इस आदेश के प्रकाशन और प्राप्ति के तुरंत पश्चात अपने स्वास्थ्य लाभ हेतु अपना अनशन समाप्त करके स्वयं अस्पताल में भर्ती हो जाएं अथवा भोजन आदि लेना प्रारंभ कर दें अन्यथा सूचना प्राप्ति के तत्काल बाद आपके जीवन रक्षार्थ उवं स्वास्थ्य लाभ हेतु कानूनी रूप से अस्पताल में भर्ती करा दिया जाएगा। अस्पताल में भर्ती कराए जाते समय आपके या आपके समर्थकों द्वारा उक्त कार्यवाई में किसी प्रकार की बाधा पहुंचाई जाती है तो आपके और उन व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाई अमल में लाई जाएगी।

गंगा की स्वच्छता और प्रवाह के लिए एक और सपूत ने जान गंवाई

गंगा नदी आज एक राष्ट्रीय नदी है। लेकिन इसकी स्वच्छता अविरलता और प्रवाह को ठीक करने के वादे के साथ उत्तरांखंड राज्य और केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में आई सरकार ने कुछ भी खास नहीं किया। गंगा को प्रदूषण मुक्त, अविरल प्रवाह की मांग लिए 111 दिन से अनशन पर बैठे स्वामी सानंद उफ जीडी अग्रवाल को भी अपना बलिदान करना पड़ा। उनके पहले मातृसदन के स्वामी निगमानंद ने इसी मांग को करते हुए बलिदान करना पड़ा। उनकी मांग यह भी थी गंगा नदी व नहरों पर खनन बंद हो।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और केंद्र के प्रधानमंत्री तो अनशन पर बैठे मशहूर पर्यावरण विद और कानपुर आईआईटी और रूड़की की आईअी में प्रोफेसर रहे जीडी अग्रवाल से कभी मिलने तक का समय नहीं निकाल पाए। उनके पत्रों का जवाब देना तो दूर की बात है। हरिद्वार के कमरवल मातृ सदन में स्वामी ज्ञान स्वरू प सानंद से जिलाधीश ने भी कभी मिलने की ज़रूरत नहीं समझी। स्वामी सानंद 23 जून से अनशन पर थे। उन्होंने नौ अक्तूबर को पानी भी न पीने का संकल्प लिया। इस पर जिला प्रशासन ने मातृसदन के आसपास धारा 144 लगा दी और उन्हें ऋषिकेश के एम्स अस्पाताल में दाखिल करने का आदेश जारी कर दिया। कमरवल थानाध्यक्ष ने उन्हें आदेश पत्र दिया जिस पर स्वामी ने लिखित प्रतिवाद किया। इसके बाद भी स्वामी को जबरन एंबुलेंस से ऋषिकेश ले जाया गया जहां उनकी हृदयगति रु कने पर उनकी मृत्यु हो गई।

स्वामी सानंद एक लंबे अर्से से गंगा को प्रदूषणमुक्त, अविरल प्रवाह युक्त और स्वच्छ बनाने की मांग करते रहे। उन्हें यकीन था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंगा को स्वच्छ बनाने का अपना वादा ज़रूर पूरा करेंगे। डा. अग्रवाल ने 23 जून को आमरण अनशन पर बैठने का निश्चय जताया। उन्होंने इस पत्र में लिखा कि इसके पहले वे 24 फरवरी 2018 और 13 जून 2018 को भी पत्र लिख चुके हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस कारण मैं आमरण अनशन पर बैठ रहा हूं। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखा।

गंगा स्वच्छ, अखिल और प्रदूषण मुक्त रहे यह उनकी इच्छा युवावस्था से ही थी जब वे वाराणसी के बीएचयू से स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे। वे भारत सरकार में पर्यावरण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव भी थे। वे 2008, 2009, 2010, 2012 और 2013 में भी अनशन पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि गंगा पर तमाम

पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण पर तत्काल रोक लगाई जाए। उन्होंने यह भी मांग नदी के अंदर खनन तत्काल रोका जाए। उन्होंने मांग की थी कि गंगा नदी पर जो भी पन बिजली घर हैं और जो बनाए जा रहे हैं उन्हें भी बंद किया जाए। पूरी तौर पर वालू खनन पर रोक लगाई जाए।

एम्स ऋषिकेश के निदेशक प्रोफेसर रविकांत ने बताया कि डा. अग्रवाल हाई ब्लड प्रेशर और कोरोनरी आर्टरी डिजीज के मरीज थे। उनके हृदय का मुख्य वाल्व ठीक से काम नहीं करता था जिसके कारण उनकी हृदयगति थमी। डा. अग्रवाल ने अपनी मृत्य देह एम्स ऋषिकेश को दान में देने की बात कही थी। लेकिन एम्स ऋषिकेश में ही उनकी मौत हुई इसलिए मातृसदन के दूसरे साधु संतों ने फैसला लिया कि उनकी मृत देह को वाराणसी बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल को सौंप दी जाए।

न कभी प्रधानमंत्री सुन पाए, न मुख्यमंत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री होने के बाद ही कहा था गंगा ने मुझे बुलाया है। हमें गंगा से कुछ नहीं चाहिए। हमें अब सिर्फ देना है। लेकिन उन्होंने जिम्मेदारी सौंपी साध्वी उमा भारती को। कुछ समय से नीतिन गडकरी यह काम देख रहे हैं। अब तक दो साधुओं ने गंगा के प्रति श्रद्धा होने के कारण खुद को उत्सर्ग कर दिया। लेकिन चुनावों में बहुमत से चुनी गई सरकार चाहे वे प्रदेश में हो या देश में, गंगा की सफाई के अपने ही आश्वासन पर अमल नहीं कर पाई।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में 1999 में बनी। उन दिनों टिहरी बांध बन चुका था। पुराना टिहरी शहर पानी में डूब चुका था। यह जानने के लिए कि क्या इस बोध से गंगा के आध्यात्मिक महत्व पर तो कोई असर नहीं होगा। उन्होंने मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की। जिसे यह पता लगाना था कि बांधों के असर से कहीं गंगा की अपनी धार्मिक, आध्यात्मिक ताकत तो नहीं खत्म हो जाएगी। फिर क्या अंदेशा है कि कभी भूकंप के आने पर क्या नकुसान संभव है। विश्व हिंदू परिषद के चार लोगों को भी कमेटी में रखा गया था।

इस कमेटी ने सुझाया था कि दस सेंटीमीटर (चार इंच) का एक पाइप बांध के अंदर रखा जाए तो गंगा की अविरलता कायम रहेगी और उसकी धार्मिक, आध्यात्मिक शक्तियां भी रहेंगी। यह बात शायद भुला दी गई कि नदी का पानी निरंतर प्रवाहित होता रहे क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ तो पानी में उफान होने लगता है। बांध के पीछे बने रेजऱवायर में फिर गंगा की आध्यात्मिक ताकत कमज़ोर हो जाती है। गंगा में मछलियां ऊपर के इलाकों में जा नहीं सकती, इसलिए उनकी संख्या घटने लगती है। गंगा में कभी बहुलता से मिलने वाली महाशीर मछली टिहरी से ऊपर गंगा में नहीं मिलती। यह मछली कम होने का मतलब है कि पानी में गुणवत्ता नहीं रही इसने भूकंप के अंदेशे से भी इंकार नहीं किया।

सानंद स्वामी यानी डाक्टर जीडी अग्रवाल, प्रोफेसर आईआईटी कानपुर कहते हैं कि लोहारी नागपाल, भैरव घाटी और पाल मनेरी बांधों का निर्माण डाक्टर मुरली मनोहर जोशी की रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ। उनका मानना है कि जब विश्व हिंदू परिषद इस बात के लिए राजी हुई कि टिहरी बांध के निर्माण से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति तिरोहित नहीं होगी। उसके बाद गंगा पर दूसरे बांध बनने शुरू हुए।

हालांकि जोशी रपट कुल मिलाकर टिहरी बांध के बारे में ही थी लेकिन इस ने गंगा पर दूसरी परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा दी।

2009 में पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने नेशनल रीवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीबीआरए) का 2009 में गठन किया। जब 2014 में भाजपा की सरकार बनी तो उन्होंने (एनजीबीआरए) में फिर उलट फेर किया। नई व्यवस्था में इस अथॉरिटी में सिर्फ मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री हैं। जबकि पहले उसमें पर्यावरण विशेषज्ञ, पत्रकार और राजनेता थे। देश की सात आईआईटी संस्थानों के समूह को गंगा रीवर बेसिन में मैनेजमेंट प्लान बनाने का कहा गया था।

मनमोहन सिंह ने पाला मनेरी, भैरवघाटी और जोहारी नागपाल पन बिजली परियोजनाओं को रद्द कर दिया था जो भागीरथी नदी पर बन रही थीं। (भागीरथी नदी गंगा की ही एक मुख्य सहायक नदी है।)

केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि उनकी सरकार बंद परियोजनाओं की फिर शुरूआत करेगी। कोई नए प्रोजेक्ट गंगा पर शुरू नहीं होंगे। लेकिन जो काम शुरू हो चुके हैं। वे चलते रहेंगे।

जबकि आईआईटी संस्थानों के समूह ने गंगा प्रबंधन की योजना 2015 में केंद्र सरकार को सौंप दी। इस में कहा गया था कि देशांतरीय संपर्क (लॉगिट यूनियन कनक्टिविटी) या गंगा का प्रवास बिना रोक टोक जारी रहे यह बेहद ज़रूरी है। इसमें यह भी व्यवस्था की कि तमाम पन बिजली और सिंचाई परियोजनाओं  को पानी का कुछ प्रतिशत ही दिया जाए जिससे पर्यावरण न बिगड़े।

आईआईटी संस्थानों की रपट में कहा गया है कि यदि किसी भी परियोजना पर काम करते हुए गंगा नदी पर लॉगिट यूनियन कनक्टिविटी पर बाधा पड़ती है भले ही नदी पर बांध हो या बैरेज, उसकी अनुमति न दी जाए। मोदी सरकार ने उस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

उधर सीएजी ने इस संबंध में कहा है कि स्वच्छ गंगा की मुहिम को दीर्घकालिक एक्शन प्लैन से अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता। भले ही आईआईटी समूह से हुए दस्तखत को साढ़े छह साल से ज्य़ादा बीत चुके हो। नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी नोटीफिकेशन को जारी हुए आठ साल से ज्य़ादा हो चुके हों। मनमोहन सिंह सरकार ने बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गंगा पर बन रही तमाम पन बिजली और सिंचाई परियोजनाओं  की समीक्षा के लिए एक कमेटी बना दी। इस कमेटी ने रपट दी कि गंगा पर जो भी हपन बिजली और सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं उन्हें 20-30 फीसद पानी छोडऩा पड़ेगा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में केरल सरकार ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन (एनओएफसीसी) की यह सलाह है कि न्यूनतम 20 से फीसद तो साधारण प्रवाह के दौरान 20 से 30 फीसद असाधारण में होनी चाहिए। इससे यह जाहिर होता है कि एमओईएफसीसी ने चतुर्वेदी कमेटी की सिफारिशें नई परियोजनाओं के लिए मान ली हैं। लेकिन अफसोस मोदी सरकार ने टेहरी, विष्णु प्रयाग, मनेर भाली और श्रीनगर के चल रही परियोजनाओं में भी नहीं मानी है।

गंगा पर माल ढुलाई की योजना बहुत पुरानी है। लेकिन इसे अमल में लाने के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालते ही सितंबर 2014 में इस पर अमल शुरू कराया। नेशनल वाटर वे-1 जारी किया गया। विश्व बैंक से कजऱ् लिया गया और इस पर अमल तेज़ी से हो रहा है। मोदी सरकार ने यह स्थिति बना दी है कि परियोजनाओं को मंत्रालय से कोई अनुमति आवश्यक नहीं है।

जहां तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की बात है मोदी सरकार के दौर मेें स्थिति कुछ बेहतर है। सरकार इसमें पैसा लगा भी रही है लेकिन हरिद्वार, आगरा और वाराणसी जैसे शहरों का सीवेज गंगा में ही जा रहा है।

आईआईटी समूह ने सलाह दी थी कि गंगा को साफ रखा जाए। उसके जल का इस्तेमाल सिंचाई में हो लेकिन पढऩे वाली आंखे और सुनने वाले कान कहां हैं?

छक्के छूटन बडऩ बडऩ के

रणक्षेत्र में खास कर नम सीमा में मुकाबले के लिए भारतीय वायुसेना अब और ताकतवर हो रही है। अभी हाल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस रक्षा समझौते पर दस्तख्त किए हैं उससे भारत के पड़ोसी देश खासे परेशान हैं।

रूस के साथ 400 मिसाइल पर सहमति बनी है। इस रु पए 40 हजार करोड़ मात्र (5.43 बिलियन डालर) कीमत की इस विशाल रक्षात्मक कवच की विशेषता है कि दुश्मन के घातक वमवर्षकों, विमानों, खुफिया प्लेन, मिसाइल और ड्रोन आदि  को 380 किलोमीटर की दूरी में नष्ट कर सकता है। अमेरिकी पाबंदियों के खतरे को दरकिनार करके भारत सरकार ने वायुसेना को देश की सीमाओं की रक्षा के लिए यह सौदा किया है।

दरअसल चीन ने छह एस 400 मिसाइल बैटरीज सिस्टम जनवरी 2014 में रूस से खरीदे थे। भारत ने जो एस 400 ट्रिफ लिए हैं वे एडवांस बताए जाते हैं। इनमें पांच सरफेस टू एअर मिसाइल स्क्वैड्रन के अलावा और भी बहुत कुछ है। भारत को एक एस 400 पाने में दो साल लग जाएंगे।

एस 400 की क्षमता यह है कि यह 380 किलोमीटर के दायरे में मौजूद दुश्मन के विमान भेदिए, विमानों, बमवर्षकों, मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट करने सक्षम है। इसके राडार इतने जबर्दस्त हैं कि छह सौ किलोमीटर के दायरे में एक साथ कई लक्ष्यों का पता कर उन्हें सूचित कर नष्ट करने में समर्थ हैं। इसमें चार तरह की मिसाइलें हैं जो अलग-अलग रेंज से हैं। यह ,,,, मिसाइल को भी इंटरनेट मिसाइल सिस्टम की खासीयत भी है कि यह अमेरिकी एफ-35 जेट की तरह राडार लॉक एंड शूट डाउन प्रणाली को यह ,, स्टीत्थ लडमू निशान काफी हद तक प्रयोग कर लेते है।

भारतीय वायुसेना की योजना है कि वह अपने सेंसर्स और हथियारों के बेडे में इसे शामिल कर अपनी ताकत में कई गुना इजाफा करेगा। इसके जो रक्षा कवच है जिससे अंदर कवच मुद्रिका की शक्ल में है। इसका बाहरी हिस्सा दो टियर में वैज्ञास्टिक मिसाइल रक्षा कवच है जो डेढ हजार किलोमीटर रेंज की मिसाइलों को नष्ट करने में सक्षम है। दुनिया के दूसरे देश भी एस 400 चाहते हैं। सऊदी अरब और कतर बातचीत कर रहे हैं जबकि तुर्की को 2019 में एस 400 का एक नमूना 2.5 बिलियन डालर की लागत का मिल जाएगा।

क्यों गुजरात छोड़ रहे हैं यूपी-बिहार के लोग?

चुनावों के 2019 में होने तक पूरे देश में व्यापक ध्रुवीकरण की तैयारी हो चुकी है। कांग्रेस में अभी हाल शामिल हुए अल्पेश ठाकुर को भाजपा जिम्मेदार बता रही है। हालांकि विधानसभा चुनावों के पहले तक उनका अपना एक क्षेत्रीय संगठन था। लेकिन यूपी-बिहार के लोगों का गुजरात छोडऩा भाजपा को भी थोड़ा झटका दे सकता है। बता रहे हैं जिनी केपी सहजन।

उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि गुजरात में बस गए हिंदी भाषी लोगों पर बार-बार हिंसा और तोड़ फोड़ आगजनी की कार्रवाई अब भी जारी है। एक सप्ताह तो यह सब इतना व्यापक रहा कि इसकी चपेट मेें आठ जिले आ गए थे। इनमें कई महत्वपूर्ण शहर मसलन आमदाबाद, सूरत, राजकोट और मोरवी हैं। इस मारपीट हिंसा, तोडफ़ोड़ से 2019 के आम चुनाव के पहले तक आतंक, ध्रुवीकरण, अलगाववाद की कोशिश हो रही है। इस हिंसा और घृणा  के शिकार हैं अल्पसंख्यक दलित और दूसरे प्रदेशों से यहां आकर मेहनत मजूरी  करने वाले लोग।

गुजरात देश की आज़ादी के बाद से ही औद्योगिक राज्य के तौर पर हमेशा विकसित किया गया। तब यहां उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश, बिहार और दूसरे प्रदेशों से प्रवासी मजदूरों को ठेके पर आमंत्रित किया गया। औद्योगिक इकाइयां चाहे वे वस्त्र उत्पादन करती हो, रासायनिक उद्योग की हों या फिर छोटे पुर्जों को बनाने वाली फैक्टरियां हों उत्तर गुजरात में।

इंडियन इंस्टीच्यूट आफ मैनेजमेंट ऑफ अमदाबाद के चिन्मय टुंबे का कहना है कि सूरत के श्रमिकों में 70 फीसद प्रवासी मजदूर हैं और अमदाबाद में वे 50 फीसद हैं। देश के इन दोनों बड़े औद्योगिक शहरों के श्रमिकों की स्थिति यही है। गुजरात के दूसरे शहरों में प्रवासी मजदूर कम हैं लेकिन वे बहुत कम नहीं हैं। टुंबे ने इसी विषय पर प्रवासी मजदूरों पर एक किताब ‘इंडिया मूविंग: द हिस्ट्री ऑफ माइगे्रशनÓ इसी साल लिखी जो छपी हुई है।

उनका कहना है कि ऐतिहासिक तौर पर यदि देखें तो गुजरात में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ दंगे, और पंजाब में भी हिंसा का दौर दौरा रहा क्योंकि पंजाब और गुजरात के ही लोग पूरे देश के विभिन्न राज्यों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बड़ी तादाद में जाते हैें।

सवाल आज यह है कि गुजरात में प्रवासीर मजदूरों को खदेडऩे की आग किसने लगाई। घटना की शुरूआत तो बताई जाती है कि उत्तर गुजरात के साबरकंठा जिले के हिम्मतनगर के पास किसी गांव में चौहद महीने के शिशु के साथ बलात्कार 28 सिंतबर को किया गया। इस मामले में बिहार के एक प्रवासी मजदूर को गिरफ्तार किया गया। लेकिन इसके बाद राजनीति शुरू हो गई। पहले ठाकोर समुदाय की ओर से क्योंकि लड़की उसी समुदाय की थी। इसी समुदाय के हैं विधायक अल्पेश ठाकुर। राज्य में सत्ता तो भाजपा के हाथ में है तो भाजपा  कैसे पीछे रहती। उसने विपक्ष पर आरोप लगाया कि यह स्थानीय लोगों को उकसा रही है।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के दूसरे दिन अल्पेश ठाकुर फेसबुक पर लाइव दिखे। उन्होंने कहा कि इस दुखद अमानवीय घटना के लिए एक प्रवासी मजदूर जिम्मेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी को ठाकोर सेना ने पकड़ लिया है। न्याय अब वहीं किया जाएगा। भाजपा का कहना है कि उत्तर गुजरात के जिलों साबरकंठा, पाटन, वनसिकंठा, मेहसाणा में हिंसा भड़क गई है जिसकी लपटें अमदाबाद, वडोडरा, सूरत, मोरवी और राजकोट तक पहुंच रही है।

ठाकोर समुदाय से करीब पांच सौ लोगों को गिरफ्तार करने का दावा किया गया। इन पर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ दंगा करने का आरोप लगा। पूरे राज्य में पचास से ज्य़ादा मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से 150 लोग अब भी जेल में हैं। इन पर अफवाह फैलाने और प्रवासी मजदूरों पर हमले के आरोप है।

राजनीति शुरू कैसे हुई

अल्पेश के बयान के बाद कोई बड़ी हिंसा या प्रवासी मजदूर पर हमले की खबर नहीं है। लेकिन दो अक्तूबर के बाद मामला भड़का और उत्तर गुजरात के कई शहरों और दूसरे शहरों में फैल गया। आतंक के चलते इन मजदूरों ने अपना माल असबास उठा लिया और वे दूसरे राज्यों में अपने घरों को जाने लगे। उनके  मन में मारे जाने का आतंक था।

गुजरात की भाजपा सरकार अल्पेश पर सोशल मीडिया द्वारा लोगों को भड़काने और अफवाह फैलाने का आरोप लगाती हैं। जबकि विपक्षी कांगे्रस मांग कर रही है कि मुख्यमंत्री विजय रूपाणी इस्तीफा दें क्योंकि वे प्रवासी मजदूरों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके कहा कि गरीबी से ज्य़ादा कुछ भी डरावना नहीं होता। गुजरात में आज फैक्टरियों बंद पड़ी हैं और बेरोज़गारी बढ़ी है। पूरा सिस्टम फेल है और आर्थिक तनाव बढ़ा है। ऐसे में मजूरी कमाने आए  प्रवासी मजदूर को जिम्मेदार बताना गलत है। मैं इसके बिलकुल खिलाफ हूं।

गुजरात के मुख्यमंत्री रूपाणी ने अपने ढेरों ट्वीट में एक में कांग्रेस को हिंसा के लिए जिम्मेदार बताया है। उनका कहना है कांग्रेस पहले भड़काती है प्रवासी मज़दूरों के खिलाफ। कांग्रेस अध्यक्ष ने ट्रवीट करके हिंसा का विरोध किया। कांग्रेस अध्यक्ष को क्या शर्म नहीं आती? यदि कांग्रेस अध्यक्ष गुजरात में हिंसा के खिलाफ हैं तो वे अपने ही सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते जिन्होंने गुजरात में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा और आत्मविश्वास पैदा कर पा रहे हैं। हम कहना चाहते हैं सभी नागरिकों  से कि वे सुरक्षित हैं गुजरात में।

हिंसा के लिए भड़काने का जो आरोप अल्पेश पर लगाया जा रहा था वह तब  फीका पड़ गया जब उन्होंने हिंसा की निंदा की और भाजपा पर आधारहीन आरोप लगाने की भत्र्सना की। अल्पेश की निंदा उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों ने की। वे उन्हें अकेला छोड़ गए कि अब वह अपने पुराने बयान को उचित बताए और खुद को बचाएं। अल्पेश का टोकन अनशन 11 अक्तूबर को हुआ। इसमेें भीड़ कम थी लेकिन इसमें मांग की गई कि 50 फीसद स्थानीय लोगों को रोज़गार दिया जाए।

बाद में रूपानी ने प्रवासी मजदूरों को सुरक्षा का वादा किया कहा कि जिन लोगों ने हमले में भाग लिया है उन पर कार्रवाई की जाएगी। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मुद्दे पर उनसे बातचीत की। रूपानी ने कहा कि गुजरात ने हमेशा दूसरे प्रदेशों के लोगों को अपनों की बजाए प्राथमिकता दी है। यह सदियों पुरानी प्रथा है। मैं गुजरात के लोगों से अपील करता हूं कि वे राज्य में शांति और अमन चैन की स्थिति पैदा करें। जिन लोगों पर हिंसा और हमलों के आरोप हैं उन्हेें गिरफ्तार करके कड़ी कार्रवाई की जाए।

उद्योगों पर असर

राज्य सरकार का गलत फैसला उजागर हो चुका था। उसने अपनी पूरी मशीनरी को हालात पर काबू पाने में लगा दिया था। एसपी और जिले के दूसरे अधिकारियों को कहा गया कि वे प्लेट फार्म पर ट्रेनों का इंतजार कर रहे प्रवासी  मजदूरों से बातचीत करें। गली-मुहल्ले में भैया जी की दुकानों पर पानी पूरी खाएं। इस कार्रवाई का कुछ तो लाभ हुआ लेकिन मजदूरों के अभाव में उद्योग ज़रूर ठप हो गए।

अनुमान है कि हिंदी भाषी प्रदेशों से 12 हजार प्रवासी मज़दूर गुजरात में आकर यहां के उद्योगों का पहिया चलाते हैं। ज्य़ादातर मज़दूर जो उत्पादन के क्षेत्र में काम कर रहे थे उनमें ज्य़ादातर तो अपने-अपने प्रदेशों को लौट गए हैं। मोरवी, जामनगर, सूरत, कच्छ अब खाली हो गए हैं। गुजरात में एक करोड़ औद्योगिक मजदूर हैं। इनमें 70 फीसद गैर गुजराती हैं। अब हिंदी भाषी मज़दूरों की अनुपरिस्थिति से असर पूरी औद्यौगिक परिदृश्य पर पड़ा है और उत्पाद ठप है।

सानंद इंडस्ट्रिज़ एसोसिएशन के आजित शाह ने कहा कि प्रवासी मज़दूरों के  लौट जाने का असर उनकी के कंपनियों पर पड़ा है। सानंद से जुड़े लोगों का कहना है कि तीन चार दिनों में करीब चार हजार लोग अपने घरों को लौट गए हैं। इससे उत्पादन पर 50 फीसद का असर पड़ा है। ऐसी ही स्थिति मेहसाणा, काडी, कलोल, और हिम्मतनगर में हुई। इन तमाम शहरों मेें सेरामिक्स, प्लास्टिक्स, टेक्स्टाइल और औद्यौगिक इकाइयां अब लगभग बंद सी है। करीब तीन हजार कर्मचारी मेहसाणा औद्यौगिक एस्टेट में होते थे। इनमें चार सौ तो हिंदी प्रदेशों के थे। इनमें डेढ सौ लोग चले गए हैं क्योंकि उन्हें हिंसा में मारे जाने का अंदेशा था। मेहसाणा इंडस्ट्रिज़ एसोसिएशन के सचिव चिराग  पटेल ने बताया कि उत्पादन में 15 से 20 फीसद कमी हुई है। दीवाली के मौके पर यह तो भारी घाटा होगा।

पिछले सप्ताह गुजरात राज्य या नवधिकार आयोग ने राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक से हिंदी भाषी प्रवासी मजदूरों पर हिंसा और उनके लौट जाने का पूरा ब्यौरा मांगा। ये रिपोर्ट अभी जस्टिस (सेवानिवृत्त) अभिलाषा कुमारी को दी जानी है।

गुजरात हाईकोर्ट ने भी राज्य में हुई हिंसा पर चिंता जताई है और राज्य सरकार से रपट मांगी है।

मायावती अब पहले सी ताकत नहीं

प्रधान मायावती गठबंधन करके न तो किसी राजनीतिक पार्टी की जीत की संभावना को पुख्ता कर सकती हैं और न किसी जीत रही पार्टी को हरा ही सकती हैं। यह बात साबित हुई है बहुजन समाज पार्टी अपने चुनावी नतीजों से। 2003 और 2017 के दौरान तो वे उत्तरप्रदेश राजय की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों को तब चकित कर दिया जब उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के साथ विधानसभा चुनावों के लिए गठजोड़ किया। साथ ही राजस्थान और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में अकेले उतरने का संकल्प किया।

हो सकता है विपक्ष के उस शिविर में मायावती के इस फैसले से दुख हुआ हो जो गठबंधन की खबरों से खुश होते हों। उनकी सोच में यह बात रही होगी कि मायावती के साथ मिलने से न केवल विधानसभा बल्कि आम चुनाव में भी विजय मिलेगी। उधर भाजपा नेतृत्व वाले खेमे खुशी की लहर दौड़ गई होगी कि बहुजन ने स्वतंत्र राह थामी यानी हमारा साथ दिया उनके वोट करवा दिए।

यह सारी बातचीत मायावती के उस कथित करिश्मे पर आधरित है कि जाटवों में भी दलितों के वोट उनकी अपनी झोली में ही आते हैं। जो लोग बसपा के साथ हैं उन्हें भरोसा हैं कि वे दलित वोट को उस उम्मीदवार को दिला सकती हैं जिनके पक्ष में वे हैं।

यह बात तब कुछ सही रही होगी जब मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री चौथी बार 2007 में बनी वह भी बहुमत से। मायावती ने 403 सीटों की विधानसभा में 206 सीटें जीती थीं। उन्हें चुनाव में 34.43 फीसद वोटे मिले थे। अपने राजनीतिक जीवन वे शीर्ष पर थीं। उनके मन में अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने का सपना था। 2009 की लोग सभा चुनावों में बसपा को बीस सीटें मिलीं और 27.42 फीसद लोकप्रिय वोट।

इसके बाद तो यानी 2009 के बाद मतदाताओं पर बसपा की कोई पकड़ नहीं रही। वे 2012 विधानसभा चुनाव हारीं और 2014 के आम चुनाव में तो उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। बसपा को 19.60 फीसद मत मिले जो 2009 में 7.82 फीसद कम है। विधानसभा चुनाव 2017 में हुए। इसमें बीएसपी को 19  सीटें मिली और उसने 22.2 फीसद मत पाए। मायावती का यह सबसे बुरी चुनावी पर फार्मेस था। बसपा के संस्थापक अध्यक्ष काशीराम की मौत 2006 में हुई थी। उसके बाद आम सहमति से वे पार्टी की अध्यक्ष बनीं।

बसपा, दरअसल हिंदी राज्य उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीशगढ़ में ही कुछ सक्रिय है। उत्तराखंड में बसपा को सात सीट (10.93 फीसद मत) , 2003 में इसे आठ सीटें (11.76 फीसद वोट), 2007 के चुनावों में बसपा सिर्फ तीन सीटें जीत सकी जबकि इसका वोट प्रतिशत बढ़ कर 12.19 फीसद हो गया। फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट तो नहीं पा सकी। इसका वोट घट कर सात फीसद रह गया।

उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पिछले चुनावों में बसपा के अपने आधार क्षेत्र खासे कमजोर हुए हैं। मध्यप्रदेश में पार्टी को 2003 में 10.61 फीसद वोट मिले। जबकि यह 2008 में 9.08 फीसद से 2013 में 6.42 फीसद रह गया। छत्तीसगढ़ में यह गिरावट 2003 में 6.94 से 6.12, 2008 में 4.29 रहा। राजस्थान में 6.40 से 7.60, 2008 में 3.48 से 2013 में।

अब चुनावी नतीजों को फिर देखें तो यह पता चलता है कि हिंदी राज्यों में मतदाता जनरल वर्ग के ही है और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्क्रीन पर चैक करना पड़ेगा लोग नहीं है। मिसाल के तौर पर देखें मध्यप्रदेश में 227 सीटों पर 2008 में 194 सीटों पर बसपा के उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हुई। राज्य की कुल 228 सीटों में से 227 पर इसने चुनाव 2013 में लड़ा और 194 सीटों पर इसे हार मिली।

राजस्थान में 2003 में बसपा ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ा। उसे दो सीटों पर जीत मिली। इसे 110 सीट पर अपनी जमानत राशि गवानी पड़ी। लेकिन 2008 में इसका प्रदर्शन ठीक रहा। तब मायावती पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में सत्ता में थीं। बसपा ने 199 सीटों पर चुनाव लड़ा। इसे कुल छह सीटें मिलीं। चुनावी फीसद 7.60 रहा जबकि 172  सीटों पर इसे हार मिली। जब उत्तरप्रदेश में 2012 में वह हारी तो बसपा ने 195 सीटों पर चुनाव लड़ा इसमें भी तीन सीटें ही मिलीं। वोट फीसद भी लुढ़क कर 3.7 फीसद पर आ गया। बसपा को

182 सीटों पर अपनी जमानत राशि गंवानी पड़ी।

छत्तीसगढ़ में 2003 में बसपा ने 54 सीटों पर चुनाव लड़ा। दो पर जीत हुई। 4.45 फीसद जनरल वोट भी रहे। लेकिन 46 सीट पर पराजय। पार्टी की तस्वीर कुछ सुधरी वह भी 2008 में। इसने सारी 90 सीट पर चुनाव तो लड़ा लेकिन इसके मत सिर्फ 6.11 फीसद ही बढ़े। फिर 2013 में इसका अधारा और सिकुड़ा। 90 सीटों पर लड़कर भी यह सिर्फ एक सीट पर जीत सकी और मिले वोटों का फीसद 4.27 पर अटका। यह 84 सीटों पर अपनी जमानतें गंवा बैठी।

ये तमाम आंकड़े यह बताते हैं कि मायावती की देश की दलित जनता पर जो पकड़ है और उसे कोई हिला भी नहीं सकता। यह सिर्फ खुद को संतुष्ट रखने की बात है। कुछ दिनों पहले सेंटर फार द स्टडी ऑफ डेनलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने 2013 के विधानसभा चुनावों के बाद मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ मेें मायावती की लोकप्रियता जानने की कोशिश की। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 33.1 फीसद और भाजपा को 35.8 फीसद से साफ होता है कि इन पार्टियों को अनुसूचित जाति के मतदाताओं का समर्थन ज्य़ादा है। जबकि बसपा को सिर्फ 22.4 फीसद मत हैं।

छत्तीसगढ़ में 11.5 फीसद दलितों ने कहा कि उन्होंने बसपा को वोट दिया। जबकि 48.7 फीसद ने कांग्रेस को दिया। राजस्थान ने सिर्फ 19.5 फीसद जाटन ही मायावती की खास कांस्टियुएंसी के जान पड़े उन्होंने खुलकर कहा कि वे मायावती के ही साथ हैं। दलितों की दूसरी उपजातियों के लोगों ने कतई यह नहीं कहा कि उन्होंने बसपा को वोट दिया है। जबकि इसके ठीक उलट कांग्रेस को ज्य़ादा बेहतर यानी 46 फीसद समर्थन मिला। इनमें जाट व और दूसरे 44 फीसद लोग दूसरे अनुसूचित जातियों के थे।

इन आंकड़ों से जाहिर है कि क्यों कांग्रेस का राज्य नेतृत्व बसपा के साथ गठबंधन के लिए सहज नहीं हो पाता। खासतौर पर जब बसपा नेता मायावती ज्य़ादा सीटें मांगती तो हैं लेकिन जमीनी सच्चाई से उनकी मांग मेल नहीं खाती।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में फिर चुनावों में मायावती की भागीदारी उन्हें राजनीतिक सच्चाईयों के प्रति रूबरू कर पाएंगी। जिससे वे आम चुनाव के लिहाज से गंठजोड़ कर सकें।

आंदोलन के पक्ष में खाकी वर्दी

उत्तरप्रदेश पुलिस हमेशा कीर्तिमान बनाती है। कीर्तिमान बनाने के चक्कर में कुछ अपवाद भी संभव हैं। प्रदेश की भाजपा की नई सरकार और पुलिस अफसरों में तालमेेल जबर्दस्त है। जिसके कारण पुलिस की साख जनता में खासी है। इसी बहाने पुलिस के जूनियर सिपाहियों से लखनऊ मेें एक निजी कंपनी के अधिकारी की हत्या के आरोपी सिपाही के पक्ष में काला दिन मनाया। शासन के पांच कांस्टेबल और तीन एसएचओ के खिलाफ कार्रवाई के आदेश जारी किए हैं।

उत्तरप्रदेश में ही छठे-सातवें दशक में पुलिस विद्रोह भी हुआ था। वह विद्रोह दबा तो दिया गया लेकिन लगता है कि पुलिस में आज भी उस दौर के बीज हैं जो अपने हुनर, नाम पद और प्रतिष्ठा के लिए बेताब हो जाते हैं। इसमें सहायक होते हैं अधिकारी और नेता। लखनऊ में एपल के एक वरिष्ठ अधिकारी देर रात अपनी एक सहकर्मी के साथ घर लौट रहे थे। तब प्रदेश के दो सिपाहियों ने प्वाईंट ब्लैंक रेंज से अधिकारी को गोली मार दी।

प्राय: पकड़े गए अपराधियों के साथ थाने में पुलिस टीम की फोटो मीडिया और प्रिंट में ऐसे आती है जैसे बाघ मारने के बाद पूरी टीम। उसी अंदाज में हमलावर सिपाही ने बाकायदा थाने में बड़े जोर शोर से प्रेस में अपने तरीके से उस घटना को बयान किया। स्थानिक मीडिया ने हमेशा की तरह वही सब लिखा। बाद में पता चला कि पूरी घटना पर कैसे एफआईआर बनी। जानकारी तब हुई जब पूरी घटना के एक मात्र चश्मदीद गवाह ने पूरी कहानी बताई। फिर दुबारा एफआईआर बनाई गई। प्रशासन और मंत्री ही नहीं मुख्यमंत्री भी सक्रिय हुए। पूरी घटना को पुलिस ने एक टीम की रीकंस्ट्रक्र किया। कथित तौर पर अपराधी सिपाही को हवालात भेजा गया।

मीडिया, प्रशासन के इस बदले रुख के खिलाफ जूनियर पुलिस कर्मियों में अपना विरोध जताने की बेसब्री बढ़ी। आगरा, मेरठ, बरेली में यह आक्रोश महसूस किया गया। खाकी वर्दी पहने पुलिसकर्मियों ने पांच अक्तूबर का काला दिवस मनाया। ये संकेत न तो पुलिस के लिए अच्छे हैं और न उत्तरप्रदेश प्रशासन के लिए।

पुलिस प्रमुख ने भले ही सस्पेंशन और तबादले किए हों लेकिन पूरा मामला बहुत ही खतरनाक रूप लेता दिख रहा है। पुलिस के सिपाहियों की मांग है कि पुलिस रेगुलेशन एक्ट को बदला जाए। वरिष्ठ अधिकारियों को मातहतों की शिकायतों पर ध्यान देना चाहिए। जो हमेशा दबाव में रहते है।