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अमृतसर रेल हादसे में ६० की मौत

पंजाब के अमृतसर में एक बड़े रेल हादसे में कम से कम ६० लोगों की मौत हो गयी है। जोड़ा फाटक के पास रावण का पुतला जलाते हुए मची भगदड़ के बाद लोग भागने लगे लेकिन इस बीच दोनों ट्रैक पर दोनों और से रेलगाड़ियां आ गईं। इससे पहले कि लोग कुछ समझते या जान बचने के लिए भागते, तेज गति की ट्रेनें उन्हें कुचल कर निकल गईं। यह सब पल भर में हो गया। हादसे की जांच के लिए कमेटी बना दी गयी है।

दोनों ट्रेनों से कुचल कर मरने वालों के संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मरने वाले १३० से १७० के बीच हैं। कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। हादसे को देखते हुए  मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने अपना इस्राईल दौरा रद्द कर दिया है। पीएम नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हादसे पर गहरी संवेदना जताई है। राहुल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हादसा स्थल पर लोगों की मदद के लिए पहुँचाने को कहा है।

पंजाब सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए ५-५ लाख रूपये के मुआवजे का एलान किया है।  मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल के मुताबिक पंजाब के मुख्यमंत्री ने ट्रेन हादसे में अधिकारियों को दिए निर्देश दिए हैं की घायलों की हर संभव मदद की जाये। अधिकारियों को अमृतसर पहुँचे के निर्देश भीगृह दिए गए हैं। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी लोहानी भी अमृतसर जाएंगे।

टीवी रिपोर्ट्स में दिखाया गया है कि रेल की पटरी के पास रावण आदि के पुतले जलाये जा रहे थे तभी उनमें भरी आतिशबाजियां फटने लगीं। लोगों में भगदड़ मच गयी और वे आतिशबाजियों से बचने के लिए ट्रैक की तरफ भागे। इस बीच एक ट्रैक पर ट्रेन तेज जाती से वहां से गुजर गयी जिसमें लोगों की चीखें भी सुनाई दे रही हैं। इस बीच एक और ट्रेन दूसरे ट्रैक पर आ गयी और वह भी लोगों को कुचलते हुए निकल गयी।

इस रावण दहन के कार्यक्रम में पूर्व सीपीएस नवजोत कौर सिद्धू मुख्या अथिति थीं। हैरान की बात है की प्रशासन ने कैसे ट्रेन के ट्रैक के पास रावण के पुतले जलने की इजाजत दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक कई लोगों के शव बुरी तरह कट-फट गईं हैं। लोगों का आरोप है कि सिद्धू घटना के बीच ही कार में वहां से निकल गईं जिससे लोग गुस्से में दिखे।

मौके पर एम्बुलेंस  पहुँच गईं है और घायलों की जान बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है। पहली ट्रेन पठानकोट से अमृतसर आ रही थी। डाक्टरों की छुट्टी कैंसल कर उन्हें अस्पतालों में रहने के लिए कहा गया है।

जानकारी के मुताबिक सभी अस्पतालों को अलर्ट कर दिया गया है। हादसा अमृतसर में जोड़ा फाटक के नजदीक हुआ जहां रेलवे ट्रैक के किनारे रावण दहन का कार्यक्रम चल रहा था। इस दौरान वहां हजारों लोग वहा एकत्र हुए थे तभी पटाखों की आवाज आई तो लोग भागने लगे और उन्हें ट्रेन की आवाज नहीं सुनाई दी। इस दौरान आ रहीं ट्रेनों की चपेट में सैकड़ों लोग आ गए। लोग रेलवे ट्रैक पर रावण का पुतला दहन कर रहे थे। मरने वालों में बच्चे भी शामिल हैं।

फैजाबाद का नाम बदलकर ‘श्री अयोध्या’ रखने की मांग

अलाहाबाद का नाम प्रयागराज बदलने के बाद अब मांग हो रही है कि ने उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर ‘श्री अयोध्या’ रखा जाए।
विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) प्रवक्ता शरद शर्मा ने शुक्रवार को कहा कि ‘योगी सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करके संतों की मांग का सम्मान किया है। यह कदम स्वागत योग्य है, जैसे सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया है, उसी तरह फैजाबाद का नाम भी बदलकर ‘श्री अयोध्या’ कर देना चाहिए।”
भाषा की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि ‘आज देश में अनेक सड़कें, भवन, जनपद, गुलामी का बोध कराते आ रहे हैं। देश को अंग्रेज दासता से मुक्ति जरूर प्राप्त हुई है परन्तु उनके प्रतीक आज भी हर हिन्दुस्तानी के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाते हैं। वर्तमान सरकारें भावनाओं को समझें और भविष्य की पीढ़ी को इन गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति दिलायें।’
शर्मा ने कहा कि योगी सरकार दीपावली पर दीपोत्सव महोत्सव के दौरान साधु संतों के समक्ष नाम बदलने की घोषणा कर सकते हैं।
इस सप्ताह मंगलवार को उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने ऐतिहासिक शहर इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का प्रस्ताव किया था जिसको कैबिनेट से पास कर दिया था।

एलओसी पर तीन आतंकी ढेर

अपना अभियान जारी रखते हुए सुरक्षा बालों ने शुक्रवार को जम्मू कश्मीर में एक मुठभेड़ में तीन आतंकवादियों को ढेर कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह आतंकवादी नियंत्रण रेखा (एलओसी) के नजदीक ढेर किये गए। उनके पास से सेना के जवानों ने चार एके ४७ रायफल और चार खाने से भरे बैग बरामद किए हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक सेना को बारामूला के बोनियार इलाके में आतंकवादियों के घुसपैठ करने की जानकारी मिली। सुबह सेना के जवान वहां पहुंचे और मुठभेड़ शुरू हो गयी। फायरिंग में सेना ने तीन आतंकियों को मार गिराया है हलाँकि सेना ने अभी सर्च अभियान जारी रखा है ताकि अन्य आतंवकवादियों के होने की स्थिति में उनका भी सफाया किया जा सके।
गौरतलब है कि सेना की ५५ राष्ट्रीय राइफल्स के कुछ जवान गुरुवार रात पुलवामा के लसीपोरा इलाके में पट्रोलिंग कर रहे थे। इसी दौरान एक ब्रिज को क्रॉस कर रहे जवानों को देखकर आतंकियों ने पहले से लगाई एक आईईडी में ब्लास्ट किया, जिसकी चपेट में आने से कई सैन्यकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। सैनिकों पर ताबड़तोड़ फायरिंग भी की गई। इस घटना के बाद यहां मौजूद सेना के जवानों ने भी आतंकियों पर जवाबी कार्रवाई की।
रिपोर्ट्स के मुताबिक सेना के एक अधिकारी ने बताया है कि घाटी में अभी करीब ३०० आतंकी सक्रिय हैं और करीब २५० लॉन्चपैड पर सीमा पार से घुसपैठ की फिराक में हैं। लेफ्टिनेंट जनरल एके भट्ट ने मीडिया के लोगों को यह जानकारी दी। ”इस जानकारी के बाद सेना अलर्ट पर है और आतंकी मंसूबों को नष्ट करने के लिए पूरी तरह तैयार है”।

साईं के दरबार मोदी

लोक सभा चुनाव से पहले मंदिरों और मस्जिदों में जाने का देश के दो बड़े नेताओं पीएम नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का सिलसिला जारी है। मोदी शुक्रवार साईं बाबा की समाधि के १०० वर्ष के आयोजन में शिरडी पहुंचे और शीश नवाया। उन्होंने पीली चद्दर चढ़ाकर आशीर्वाद माँगा और मंदिर ट्रस्ट ने वही चद्दर प्रसाद स्वरुप उन्हें भेंट की।

साईं मंदिर में प्रधानमंत्री मोदी ने विशेष पूजा की। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राज्यपाल विद्यासागर राव भी उनके साथ मौजूद रहे। मोदी ने मंदिर की विजिटर बुक में टिप्पणी अंकित की। विशेष पूजा के बाद मोदी ने वहां नए भवन, १५९ करोड़ रुपये की लागत से विशाल शैक्षणिक भवन, ताराघर, मोम संग्रहालय, साईं उद्यान और थीम पार्क समेत प्रमुख परियोजनाओं का भूमिपूजन भी किया। श्रीसाईंबाबा संस्थान न्यास के अध्यक्ष सुरेश हवारे के मुताबिक मोदी ने साईंबाबा शताब्दी पर उनकी याद में चांदी का सिक्का भी जारी किया है।

गौरतलब है साईं की समाधि की शताब्दी पर न्यास द्वारा पूरे साल उत्सव मनाया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पहली अक्तूबर, २०१७ को शताब्दी महोत्सव का उद्घाटन किया था जबकि उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने दिसंबर, २०१७ में वैश्विक साईं मंदिर सम्मेलन का उद्घाटन किया था।

इतिहास के मुताबिक शिरडी के साईं की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है और यह पवित्र धार्मिक स्थल महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गांव में स्थित है। सभी समुदायों में पूजनीय साईंबाबा का देहावसान १९१८  में दशहरा के ही दिन अहमद नगर जिले के शिरडी गांव में हुआ था। शिरडी के साईं बाबा का वास्तविक नाम, जन्मस्थान और जन्म की तारीख किसी को पता नहीं है। हालांकि साईं का जीवनकाल १८३८ -१९१८  तक माना जाता है। दुनिया भर में साईं के करोड़ों भक्त हैं।

फिर आना सुंदरी…

दशहरा खत्म हो गया। पूरे देश में देवी भक्तों ने दशहरे पर नदी किनारे जयकारे के बीच उन्हेें विदा दी। उन्हें नमन करते हुए भक्तों ने भरे कंठों से कहा, फिर आना माँ। सर्वगुणसंपन्न देवी की प्रतिमा मारे गए महिषासुर के साथ नदी के जल के प्रवाह में डूब और उतरा रही थी। भक्त लौट रहे थे। अपने-अपने घर को।

पूरे देश में बड़ी ही धूमधाम से देवी पूजा संपन्न हुई। पटाखों के शोर में राम ने असुर रावण का वध किया। सीता, लक्ष्मण के साथ अयोध्या को लौटे। रजोगुण-तमोगुण और सर्वगुण संपन्न देवी माँ भी लौट गई अपने घर। लेकिन देश के विभिन्न शहरों में आज देवियां घर-घर में आंदोलित हैं। राजधानी दिल्ली के इलाके में महिलाओं ने जुलूस निकाला। प्रर्दशन कर रही इन महिलाओं के हाथों में पोस्टर थे। इनमें कुछ में लिखा था, ‘छेड़छाड़ बर्दाश्त नहींÓ, ‘अब भी देर नहीं, कामपियसुओं को करेंगे उजागर।Ó

भारत सरकार के विदेश राज्यमंत्री और पत्रकार एमजेअकबर, पर तकरीबन नौ आरोप काम की जगहों में, होटलों में उनके कमरोंं में छेड़छाड़ और यौनाचार के आरोप हैं। मुंबई में मिस इंडिया और अभिनेत्री तनुश्री ने अभिनेता नाना पाटेकर, और गणेष आचार्य आदि के खिलाफ आरोप ही नहीं बल्कि मामला मुकदमा भी  दायर किया।

विकास की राह पर अब बढ़ रहे देश के शासकों को यही किया कि जांच कमेटी गठित हो जाए। इस पर मामले रफा दफा हो जाएंगे। उनकी नज़र में जबरन छेड़छाड़ और यौन संपर्क के बाद अलगाव के दौरान लंबे अर्से तक अवसाद और ट्रॉमा की शिकायतों बेमतलब रहीं। सामाजिक न्याय और नैतिकता की बात करने वाले और मुंह में जलेबी जैसी बातचीत करने में माहिर नेताओं को यह बात भी महत्वहीन लगी कि नैतिकता के आधार पर ही आरोपों की जांच हो जाने और फैसला आने तक अरोपी पदमुक्ति को व्यवहार में लाने का आदेश जारी करें।

देश में ‘मी टूÓ आंदोलन से लड़कियों को जहां यह मानसिक मजबूती मिली है कि उनका शरीर उनका अपना है और उसकी वे खुद मालकिन हैं इसलिए उन्हें सतर्क होना और एतराज करने और मामला-मुकदमा निसंकोच दायर करने की हिम्मत भी बंधी है। यह आंदोलन अब कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से उत्तरपूर्व तक फैल गया है इससे इन लोगों की परेशानी बड़ी है जो अपनी प्रभुता, पद, संपन्नता और पैसों के बल पर छेड़छाड़ और यौन संपर्क बनाते रहे हैं।

छोटे-बड़े शहरों में विश्वविद्यालय परिसर निजी और सरकारी विद्यालय छोटी-बड़ी फैक्ट्टरियों, कंपनियों, अस्पताल, गांवों, धार्मिक स्थलों, सुरक्षा संगठनों, होटल, रिसोर्ट, प्रकाशन गृहों, थिएटर, टीवी फिल्म उद्योग, अखबारों, पत्रिकाओं,  रेडियो, टीवी-चैनेल, सोशल मीडिया, गैर सरकारी और सरकारी स्वैच्छिक संगठनों, राजनीति और अन्य तमाम जगहों पर महिला सहकर्मियों के साथ छेड़छाड़ और यौनसंपर्कों की घटनाएं होती रही हैं। ‘मी टूÓ आंदोलन से अब लड़कियों और महिलाओं में यदि शिकायत करने का हौसला बढ़ा है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इससे अगली पीढ़ी भी मजबूत होगी और मुकाबला कर सकेगी।

महिलाओं की अब यह चुप्पी टूटी है। यह बड़ी बात है। मुंबई के सिने जगत में तकरीबन दस साल पहले मिस इंडिया रही तनुश्री के साथ स्टूडियों में अभिनेता नाना पाटकर ने एक फिल्म ‘हार्न ओके पलीज़Ó की शूटिंग के दौरान उनके साथ अभद्रता की थी। उसे अब तनुश्री बता पा रही हैं। उन्होंने तब भी इसकी शिकायत की थी लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। अब उस घटना के बारे में उन्होंने अपनी उम्र के 34वें साल में हिम्मत कर फिर कहा। शुरू में नाना समर्थक राजनीतिक दलों के छुट भैया नेताओं ने उन्हें काफी  डराया-धमकाया। लेकिन वे डरी नहीं। अपने वकील के जरिए उन्होंने केस दायर कर दिया है। उधर नाना पाटकर का कहना है कि वे साथ काम करने वालियों का लिहाज करते हैं और उन्हें प्यार भी करते हैं। उन्होंने तनुश्री पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है।

लेकिन तनुश्री की आवाज दबी नहीं है। कंगना रानावत, अक्षय खन्ना, डिंपल कपाडिय़ा, शिल्पा शेट्टी, इरफान खान, आदि ने उनकी आवाज को समर्थन दिया है। इतना ही नहीं इस के बाद ढेरों फिल्म निर्माताओं, लेखकों, खिलाडिय़ों, कोच, पत्रकारों, टीवी, रंगमंच और मंत्रियों के खिलाफ ढेरों आरोप सामने आए हैं।

रंगमंच से टीवी और फिल्मी दुनिया में गए आलोक नाथ पर लेखक और टीवी प्रोड्सयर विनिता नंदा ने बलात्कार का आरोप लगाया। फिल्म निर्माता विकास बहल पर आरोप लगे। फैंटम फिल्मस के बैनर में उनके साथ अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोरवाने और मधु मन्टेना आदि सहयोगी थे। वह अब बंद हो गया है। कई फिल्मी अभिनेतियों ने साजिद खान पर छेड़छाड़ के आरोप लगाए। उनकी फिल्म ‘हाउसफुलÓ  का चौथा संस्करण अब रुक गया है। आमीर खान और पत्नी किरण राय ने खुद को जॉली एलएलबी बना रहे सुभाष कपूर के ‘मोगलÓ में काम करने से मना कर दिया है।

तनुश्री दत्ता ने निदेशक विवेक अग्निहोत्री पर भी 2005 में फिल्म ‘चॉकलेट: डीप डार्क सीक्रेटÓ के सेट पर उनके साथ अनुचित व्यवहार करने का आरोप लगाया है।

बालीवुड में अभिनेतत्रियों अपने सेक्रेटरी और मैनेजर जो वाउंसर भी होते हैं साथ ही माता-पिता आदि को शूटिंग के दौरान साथ रखती हैं। लेकिन कोई गारंटी नहीं होती कि देर रात में दरवाजा खटकेगा नहीं।

नई सहसृष्टि की शुरूआत में टीवी उद्योग खासी प्रगति पर था। टीवी चैनेल के मालिक और उनके प्रबंधक फि ल्मों से सितारों, लेखकों को न्यौता देने लगे थे। काम पर आने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ गई। छेड़छाड़ के आरोप भी बढऩे लगे। लेकिन उनकी नज़रों में महिलाएं सहायक से ज्य़ादा कुछ नहीं थीं। उनके साथ छेड़छाड़ की घटनाएं आम थीं। पर महिलाएं काम मिले होने के कारण ज्य़ादा प्रतिवाद नहीं करती थीं। उन्हें मोबाइल पर अश्लील संदेश भेजे जाते। पार्टियों में बुलाया जाता।

बालीवुड में सभी प्रोडकशन हाउसेज में छेड़छाड़, यौन क्रिया-कलायों की शिकायतों को सुनने के कथन हैं। कुछ में सेक्सुअल हेरैसमेंट ऑफ वीमेन एट वर्कप्लेस, प्रिवेंशन प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल कानून 2013 की तरह छानबीन भी होती है। शिकायतों पर गोपनीयता भी बनाए रखी जाती हैं। लेकिन न्याय तभी हो पाता है जब यह साफ होता है कि आरोपी बहुत नामी, धनी, जुुगाडू तो नहीं है। ज्य़ादातर निर्माता न्यायमूर्तिै बने होते हैं तो वे मामले रफा-दफा कर देते हैं। फाइल बंद हो जाती है।

ज्य़ादातर मामलों में लड़कियां काम दिलाने वालों के खिलाफ नहीं जातीं क्योंकि उन्हें लगता है कि फिर उन्हें वापस घर लौटना होगा। वे सब कुछ बर्दाश्त करती हैं। कई दशक बाद वे मुंह खोल पाती हैं। तनुश्री दत्ता ने 2008 में ही एफआईआर और शिकायत सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन में की थी। लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई।

लेकिन अब बालीवुड अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य कर रही लड़कियों और महिलाओं में नई चेतना का संचार हुआ है चाहे वे संगीत, गायन, तकनीशियन और अभिनय के क्षेत्रों में हों। ‘वहां यौनाचार तो हर क्षेत्र में सबसे पहले चाहा जाता था।Ó बताया विनिता नंदा ने। वहां के तमाम यूनियन संघ चाहे वे प्रोडूसयर गिल्ड ऑफ इंडिया हों, फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलाईज़ हों या फिर सीआईएनटीएए हो कभी कागज़ी कार्रवाई से आगे नहीं बढ़ सके।

सेवानिवृत्ति के बाद, न्यायाधीशों को नौकरी: सही या गलत

सेवानिवृत्ति के पहले हुए फैसलों में एक यह इच्छा होती है कि सेवानिवृत्ति के बाद नौकरी हो… मेरी सलाह है कि सेवानिवृत्ति के दो साल बाद (नियुक्ति के पूर्व तक) दो साल का अंतर होना चाहिए क्योंकि सरकार सीधे या अपरोक्ष तौर पर अदालतों को प्रभावित कर सकती है और एक निष्पक्ष न्याय व्यवस्था का देश में सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। अरूण जेटली 2012 में जब विपक्ष के नेता थे तो उन्होंने यह बात कही।

हालांकि उनकी अपनी सरकार के दौरान दो साल तक के अंतर रखने की बात उनकी ही सरकार के लोगों ने नहीं मानी। इस संबंध में पूरी छानबीन कर रहे हैं। चरणजीत आहुजा और वाई के कालिया-

इन दिनों बहस छिड़ी हुई है बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति पर सितंबर, 29, 2018 को बार कौंसिल ऑफ इंडिया, स्टेट बार कौंसिल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और बार एसोसिएशन की समन्वय समितियों की बैठक हुई थी। इस बैठक के बाद जारी प्रेस रिलीज पर अब अच्छा खासा हंगामा मचा है।

यह सब अकस्मात भी हो सकता है और सोच-समझ कर हुआ थी। कुछ दिन बाद ही भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र अपने पद से सेवामुक्त होते हैं और नए न्यायाधीश रंजन गोगोई पदभार संभाल लेते हैं।  लेकिन प्रस्ताव चंूकि देश की तमाम बार कौंसिल से आया है तो उसे नज़रअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

यह विवाद अब खासा वजनदार है कि न्यायाधीशों ने संवेदनशील मामलों का निपटारा उन दिनों किया जब वे उम्र के दवाइलाइट दौर में थे। यह कहने या सलाह के नोट के पीछे रत्ती भर भी इरादा यह बताने का नहंी है कि उनके लिए फैसले गलत है या पक्षपातपूर्ण हैं। इसके पीछे सिर्फ यह तथ्य रखना है कि सेनानिवृत्ति के फौरन बाद हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति से उन फैसलों की तटस्थत पर अंदेशा ज़रूर उठता है। भले ही वे कितने ही तटस्थ क्यों न रहे हों। कहा भी जाता है कि न्याय हुआ नहीं, बल्कि होता हुआ नज़र आना चाहिए।

बार कौंसिल ऑफ इंडिया के प्रस्ताव में है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को अपनी सेनानिवृत्ति के अगले दो साल तक कोई पद नहीं लेना चाहिए।

यह कहा जाता है कि हमारे लोकतंत्र मेें तटस्थ न्याय व्यवस्था की बात है। कोई भी किसी स्वस्थ और वाईबै्रंट लोकतंत्र की उम्मीद नहीं कर सकते यदि निष्पक्ष न्याय व्यवस्था न हो।

एक मज़बूत और तटस्थ न्याय व्यवस्था के बल पर ही एक निडर और मज़बूत बार भी टिक पाता है हालांकि जनता भी यह सोचने लगी है कि जज अपनी सेनानिवृत्ति के आखिरी दौर में सरकार से सेनानिवृत्ति के बाद के दौर मेेंं  एसाइनमेंट जज अपनी सेनानिवृत्ति के बाद कोई ऐसा दायित्व है तो उस पर फिर उंगलियां उठने लगती हैं।

हितों का टकराव

ऐसे जज जो एयक्यूटिव के तहत चाकरी पाते हैं तब हितों का टकराव ज्य़ादा होता है।  इससे हितों में टकराव की वजहें बढ़ती हैं। जनता का भरोसा भी फिर निष्पक्ष न्याय व्यवस्था से उठ जाता है। अभी हाल में जो मास्टर ऑफ दा पोस्टर केस का मामला उठा उसमें सुप्रीमकोर्ट ने यही दुहराया था कि न्याय की सबसे बड़ी पंूजी जनता की इससे आस्था हैं। यदि अदालत की साख ही जनता के दिमाग में खत्म हो जाएगी तो न्याय भी आजा़दी के लिए वह खासा खतरनाक होगा।

जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर जो सुप्रीमकोर्ट के पूर्व जज थे, उन्होंने सेनानिवृत्ति से पहले ही एक बयान जारी किया था कि सेनानिवृत्ति के बाद वे कोई सरकारी  प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेंगे। उनके बाद जस्टिस जे कूरियन जोसेफ ने भी वैसा ही एक बयान जारी किया।

बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने कहा है कि देश का आज जो राजनीतिक परिदृश्य है उसमें जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर और जस्टि कूरियन जोसेफ का रवैया काफी स्वास्थ्यपूर्ण और स्वागत लायक है। देश मेें अच्छे लोकतंत्र के लिए यह ज़रूरी है।

बार कौंसिल में प्रस्ताव मेें कहा गया है कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्र लंबे अर्से से लोकतंत्रिक मूल्यों और न्यायिक आजा़दी के लिए संघर्षरत रहे हैं। हमें उम्मीद है कि वे न्याय में निष्पक्ष के लिए न्यायिक तरीकों और अपने तौर तरीकों से आगे भी लड़ते रहें। हमेें उम्मीद है कि दीपक मिश्र भी उसी तरह उस पहल में जान फंूकेंगे जिसकी पहल जस्टिस चेलमेश्वर ने ली थी। वे लोकतंत्र और न्यायव्यवस्था का भला ऐसा करके ही कर सकेंगे।

बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार जस्टिस पी सत्यसिवम, पूर्व मुख्य न्यायाधीश पद से ही केरल के राज्यपाल बना दिए गए। इस पर काफी हंगामा भी रहा। सेनानिवृत्ति के बाद हुई ऐसी तमाम नियुक्तियों से न्यायाधीश पिछले फैसलों की निष्पक्षता पर सवालिया निशान उठते हैं। यह बहुत गंभीर मामला है। बार उम्मीद करती है कि सेवानिवृत्ति जज भी अपनी सेनानिवृत्ति के दो साल बाद ही किसी नए पद को स्वीकार करें।

प्रोप्रइटी फैक्टर

अभी हाल मेें तीन नियुक्तियां हुई जिनसे जज की प्रोपराइटी पर बहस छिडी। जुलाई में छह तारीख को जस्टिस एके  गोयल को तो जज पद से सेवानिवृत्ति के दिन ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जस्टिस आरके अग्रवाल ने नेशनल कन्ज्यूम रिड्रेसल कमीशन (एनसीडीआरसी) का अध्यक्ष मई महीने के आखिरी सप्ताह में बनाया गया। उन्हें सेनानिवृत्ति के कुछ ही दिनों बाद यह मौका मिला। सेवानिवृत्ति कुछ ही दिनों बाद जस्टिस ऐटनी डोमिनिक को केरल सरकार के मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष पद पर बिठा दिया गया। सेनानिवृत्ति के कुछ ही दिनों के अंतराल पर तीनों जजों को नियुक्ति दे दी गई। इन घटनाओं पर कुछ लोगों ने ज़रूर आपत्ति जताई। लेकिन इससे जाहिर है कि नियुक्ति के संबंध में काफी पहले ही फैसले ले लिए गए होंगे।

जस्टिस बी कमाल पाशा केरल हाईकोर्ट से इस साल के शुरू में सेवानिवृत्ति हुए थे। अपने विदाई भाषण में उन्होंने जो टिप्पणियां की उन्हें भुलना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा जब एक जज रिटायर होते ही सरकार में नियुक्ति चाहता है तो वह इस स्थिति में नहीं होता कि सरकार से कोई नाराज़गी मोल ले। कोई नाराज़गी मोल ले। वह भी सेवानिवृत्ति के साल में। एक शिकायत जो सभी करते ही हैं कि ऐसे जज सरकार की निराश नहीं लेना चाहते। जस्टिस एसएच कपाडिया और जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा था कि किसी भी जज को सेनानिवृत्ति के तीन साल बाद तक किसी सरकार से नियुक्ति का प्रस्ताव नहीं लेना चाहिए।

‘कूलिंग ऑफÓ पीरियड किसी भी सेवानिवृत्ति जज के लिए ज़रूरी होना चाहिए। सेवानिवृत्ति जज लोधा ने यह तक कह दिया था कि वे खुद किसी सरकार से सेवा मुक्ति के दो साल की अवधि होने तक कोई लाभ सरकार से नहीं लेंगे। आज़ाद भारत में पहले लॉक कमीशन की अध्यक्षता एमसी सीतलबाड़ ने की थी। उनकी सिफारिशें थी कि ऊँची अदालत के किसी भी जज को सेवानिवृत्ति के बाद कोई सरकारी नौकरी नहीं लेनी चाहिए। इन जज को यह याद रखना चाहिए कि सेवानिवृत्ति  के बाद भी उनका व्यवहार न्यायालय में भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसके लिए संविधान में धारा 148 या 319 की ही तरह एक संशोधन करना चाहिए। एक विशेष कानून संसद में पास किए जाना चाहिए कि कोई सेवानिवृत्ति जज सेवानिवृत्ति  के दो साल बाद तक नियुक्ति नहीं ले सकता।

दंग कर देने वाली संख्याएं

कानूनी संस्थान विधि सेंटर फार लीगल पालिसी के कराए एक अध्ययन के अनुसार सुप्रीमकोर्ट के सेवानिवृत्ति 100 जज में से 70 की नौकरी विभिन्न संगठनों मसलन नेशनल हय्मन राइटस कमीशन, नेशनल कंज्य़ूमर डिस्प्यूट रिड्रेसल कमीशन, आम्र्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल, लॉ कमीशन ऑफ इंडिया आदि हैं। यह रपट बताती है कि सभी नियुक्तियों में 56 फीसद नियुक्तियों का अध्ययन इसलिए ज़रूरी था क्योंकि ढांचागत समस्या थी।

देश के 44 मुख्य नयायाधीशों ने 1950 के बाद से सेनानिवृत्ति के बाद नौकरीयां हासिल कर ली। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं कि सेनानिवृत्ति के चार महीने पहले ही नियुक्तियों दे दी गई।

भारत की मी टू मुहीम: अब बोलने लगी हैं और भी महिलाएं

बॉलीवुड ने समय को एक रोशनी दिखाई है। तो अब समय आ गया है कि बाकी लोग इसका अनुसरण करके एक नई परंपरा शुरू करें। ऐसा लगता है कि फिल्म उद्योग में यौन शोषण के खिलाफ कोई नीति नहीं है और बहुत बार तो यह स्थिति बनती है कि यह तय नहीं कर पाते कि असल में यौन शोषण क्या होता है।

इसकी शुरूआत तनुश्री दत्ता ने की जो आज मी टू अभियान की प्रतीक बन चुकी है और वह आजकल अखबारों, सोशल मीडिया और कई खबरों में जाना पहचाना नाम है। जब से उसने नाना पाटेकर पर अपने शारीरिक और मानसिक शोषण का आरोप लगाया है कि 2008 में फिल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज़’ की शूटिंग के दौरान किस प्रकार नाना पाटेकर ने उसे परेशान किया, तभी से वह चर्चा का विषय बनी हुई है। जब से उसने अपने बयानों में उसने नाना पाटेकर और फिल्म निदेशक व निर्माता विवेक अग्निहोत्री पर आरोप लगाए हैं, तभी से उसे कानूनी नोटिस मिल रहे हैं और साथ उसे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गुंडों से शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां मिल रही हैं। तनुश्री के अनुसार शूटिंग के दौरान हुई उस घटना के बाद वह सहम गई और अमेरिका चली गई थी। अब वह इस घटना के करीब 10 साल बाद भारत लौटी हैं और उसने इस मुद्दे की रिपोर्ट करने का फैसला किया है।

एक बंगाली परिवार में जन्मी व पली मॉडल व कलाकार तनुश्री एक बड़ी कलाकार बनना चाहती थी। उसने अपनी शुरूआत ‘मॉडलिंग’ से की और अंत में उसने फैमिना मिस इंडिया का खिताब 2004 में जीता। इससे वह ‘मिस यूनिवर्स’ मुकाबलों में भाग लेने के लिए योग्यत स्तर पा गई। इक्वाडोर के क्योरो शहर में हुए ‘मिस यूनिवर्स’ मुकाबलों में वह अंतिम 10 प्रतियोगियों में थी। इससे फिल्मी दुनिया के दरवाजे उसके लिए खुल गए और उसे फिल्मों में काम करने व मॉडलिंग के बड़े-बड़े ‘ऑफर’ मिलने लगे। उसकी पहली फिल्म ‘आशिक बनाया आपने’ 2005 में प्रदर्शित हुई। इन फिल्मों ने उसे एक ‘ग्लैमर्स स्टार’ के रूप में मशहूर कर दिया। इसे बाद उसे कई फिल्मों के बुलावे आए।

तनुश्री के आरोपों ने एक बड़ा तूफन खड़ा कर दिया। पिछले दिनों नाना पाटेकर से मुंबई हवाई अड्डे पर बात हुई तो उन्होंने तनुश्री को झूठी बताते हुए सारे आरोपों को पूरी तरह नकार दिया।

तनुश्री के लिए लोगों का समर्थन आने लगा। निर्माता व कलाकार पूजा भट्ट ने अपना पूरा समर्थन तनुश्री को दिया। अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर, रेणुका शहाणे और वरूण धवन भी उसके समर्थन में आए जबकि अमिताभ बच्चन, सलमान खान और आमिर खान ने चुप रहकर खुद को इस विवाद से दूर ही रखा।

अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने तनुश्री के खिलाफ बाल ठाकरे को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए पुलिस में मानहानि की शिकायत दर्ज कराई है।

हालांकि फिल्मी दुनिया के कुछ लोगों ने तनुश्री का साथ दिया है पर अधिकतर ने इस मुद्दे पर चुप रहना ही बेहतर समझा है, ताकि उनकी छवि और उनके हित सुरक्षित रहें। इसका परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताएगा पर इस घटना ने मीडिया को एक बार सोचने के लिए मज़बूर कर दिया है कि वह इन फिल्म सितारों की छवि को किस आधार पर उभारे। नाना पाटेकर का बयान कितना सही है यह भी समय ही बताएगा। उन्होंने अपने साक्षात्कार में आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि ‘सच वही है जो 10 साल पहले था’। उनके वकीलों ने भी उन्हें बदनाम करने के लिए तनुश्री के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। यदि तनुश्री गलत है तो इतनी महिला कलाकार क्यों उसके समर्थन में खड़ी हैं और यदि नाना पाटेकर सच्चा है तो तनुश्री ने उस पर क्यों यह आरोप लगाया है। क्या यह सिर्फ लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए है? ये सवाल सभी के जहन में है। अभी यह देखना है कि यह मुद्दा किस तरह आगे बढ़ता है। यदि आरोपियों के खिलाफ मामला साबित हो जाता है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी? यह मामल एक परंपरा की शुरूआत करेगा कि आने वाले समय में फिल्म या किसी दूसरे उद्योग में यदि ऐसी घटना होती है तो उसमें क्या किया जाएगा।

इस बीच नाना ने तनुश्री दत्ता को एक कानूनी नोटिस भेजा और बाद में पुलिस शिकायत भी दर्ज भी करवाई। नाना ने इस मामले में महाराष्ट्र महिला आयोग से भी मदद मांगी है।

बहस का दायरा बढ़ रहा है

मी टू अब केवल तनुश्री दत्ता तक ही सीमित नहीं। फिल्मी दुनिया इस प्रकार के आरोपों के लिए शुरू से ही बदनाम रहा है। युवा महिलाएं जो टॉप की नायिकाएं बनने आती हैं पर अंत तक संघर्ष में ही खत्म हो जाती हैं। कुछ हालात से समझौता कर लेती हैं तो कुछ फिल्मी दुनियां को छोड़ कर चली जाती हैं। तनुश्री की बेबाकी ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

समर्थन मिल रहा है

फिल्मी दुनिया की जानी मानी कई हस्तिओं ने तनुश्री का समर्थन किया है। इनमें प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर, तापसी पन्नू, स्वरा भास्कर, सोनम कपूर, अनुष्का शर्मा और वरूण धवन शामिल हैं। अभी हाल ही में कंगना रणावत ने यह माना था कि फिल्म ‘क्वीन’ की शूटिंग के दौरान फिल्म निदेशक विकास बहल ने उसने शारीरिक तौर पर उसे परेशान किया था। ‘उसने मुझे इतनी ज़ोर से बाहों में जकड़ लिया कि मुझे खुद को बचाने के लिए उसे धक्का मारना पड़ा था।’ यह बात कंगना ने एक साक्षात्कार में कही थी। उसने बताया कि वह मेरे सिर पर अपना मुंह रख देता और फिर बालों की खुशबू की तारीफ करता।

प्रीति जि़ंटा जिसके अच्छे संबंध नस वाडिया से रहे हैं ने बाद में उस पर उसने छोडख़ानी करने और मानसिक तौर पर परेशान करने का आरोप लगाया था। तनुश्री का समर्थन करते हुए प्रीति ने कहा कि कोई भी महिला अपने यौन शोषण के बारे में कभी झूठ नहीं बोलेगी। उसने बाकी महिलाओं को भी साहस दिया है कि वे भी अपने यौन शोषण के बारे में खुलकर बोलें।

जैसे-जैसे तनुश्री दत्ता का मामला गर्मा रहा है वैसे-वैसे और भी महिलाएं शिकायतें लेकर सामने आ रही हैं। इस मी टू अभियान में ताजा मामला आया है तन्मया भट्ट का। वह एआईबी की सह संस्थापक और सीईओ हैं।

संस्कारी आलोकनाथ भी घेरे में

कई टीवी कार्यक्रमों की लेखिका विनिता नंदा ने वरिष्ठ कलाकार आलोक नाथ पर आरोप लगया है कि उसने 20 साल पहले उसके साथ बलात्कार किया था। ‘तारा’ नामक टीवी सीरियल से मशहूर हुई विनिता ने फिल्मी और टीवी की दुनिया के सबसे संस्कारी पुरूष माने जाने वाले आलोक नाथ पर यह आरोप लगाया है। विनिता ने अपने फेसबुक अकांउट में लिखा है कि आरोपी ‘तारा’ सीरियल के मुख्य किरदार में था। उस समय वह टीवी की दुनिया का एक सितारा था। उसे शराबी, बेशर्म और घृणित बताते हुए विनिता ने कहा कि उसने ‘तारा’ की नायिका का भी यौन शोषण करने की कोशिश की जिसकी वजह से उसने वह सीरियल छोड़ दिया।

अपनी ‘फेसबुक’ पोस्ट के अंतिम हिस्से में विनिता ने दहला देने वाला खुलासा किया कि जब वह काफी नशे में थी तो आलोक नाथ ने उसका बड़ी कू्ररता के साथ बलात्कार किया। यह घटना आलोक नाथ के घर पर रखी गई एक पार्टी की है जहां विनिता के पेय मिश्रित कर दिए गए थे। अपनी इस जोरदार पोस्ट में विनिता ने उनका भी जिक्र किया है जिन्हें कभी न कभी यौन शोषण का शिकार होना पड़ा। उसने आगे लिखा है ‘मैंने 19 साल तक इस मौके का इंतजार किया। मैं उन सभी से चिल्ला चिल्ला कर कहती हूं कि जिन्होंने भी किसी परभक्षी के हाथों दुख उठाए हैं वे खुलकर सामने आएं। आप खुद को छुपा कर न रखें।’

इसके साथ ही मी टू अभियान देश भर में बहुत तेजी से फैल रहा है और ज्यादा-ज्यादा महिलाएं मुंह खोलने लगी हैं। प्रीति जि़ंटा ने महिलाओं को पुलिस में शिकायत करने के लिए प्रेरित किया है।

खेलों की दुनिया पर ‘मी टू’ की छाया

ग्लैमर की दुनिया में महिलाओं के शारीरिक शोषण की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। यह माना जाता रहा है कि फिल्मों में काम करने वाली महिलाएं सुरक्षित नहीं रह पाती। फिर बहुत सी अभिनेत्रियों ने लोगों में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए इस प्रकार के बयान भी दिए कि लोगों का ध्यान उनकी ओर जाए। चाहे प्रवीण बॉबी हो या जीनत आमान 1966 में शर्मिला टैगोर का फिल्मफेयर पत्रिका के कवर पर बिकिनी का फोटो हो या सोनिया साहनी का ‘जौहर -महमूद इन गोवा’ का चुबन का दृश्य। मलिका शेरावत का नाम भी ऐसी ही सूची में जोड़ा जा सकता है। आम लोग फिल्मी दुनिया में घट रही ऐसी घटनाओं पर ज़्यादा हैरान नहीं होते।

फिल्मी दुनिया ही ऐसी दुनिया नहीं है जहां शोषण की घटनाएं होती हैं। खेलों की दुनिया भी इन सबसे अछूती नहीं है। यहां भी लड़कियों के शारीरिक और मानसिक शोषण की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। यह बात सिर्फ भारत तक महदूद नहीं बल्कि विदेशों में भी यह होता है। खेलों की दुनियां की ये घटनाएं अक्सर दबा दी जाती हैं। जि़ला स्तर व राज्य स्तर तक होने वाली इन घटनाओं का तो कई बार जि़क्र तक नहीं होता। परन्तु जब बात राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर की आती है तो मीडिया में भी चर्चा हो जाती है।

विश्व के प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी क्रिस्टियानों रोनाल्डो पर कैथरीन मारगियो ने यौन शोषण का आरोप लगाया। यह कोई छोटी घटना नहीं थी। रोनाल्डो जैसे खिलाड़ी पर लगे आरोप ने सभी को चैंका दिया था। टेनिस में विलियम्स बहनों ने भी खेल अधिकारियों पर मानसिक प्रताडऩा के आरोप लगाए। उनकी पोशाक को लेकर भद्दी टिप्पणियां की गई। उन्होंने इसका कड़ा विरोध भी किया। भारत में 1980 के दशक में एक महिला हाकी खिलाड़ी ने भारतीय महिला हाकी फेडरेशन के एक पदाधिकारी पर टीम में शामिल करने के लिए ‘सेक्सुआल फेवर’ की मांग करने का आरोप लगाया था। उस समय इस बात को दबा दिया गया। पर जब राष्ट्रीय महिला हाकी के कोच महाराज कृष्ण कौशिक पर एक नवोदित खिलाड़ी ने ऐसा आरोप लगाया तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी। असल में देश की चोटी की 30-32 खिलाडिय़ों में से कौन सी 16 या 18 खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करेंगी इसमें मौजूदा प्रशिक्षक का बहुत बड़ा हाथ रहता है। इसी बात का लाभ कई बार प्रशिक्षक उठाते हैं। महिला हाकी में कुछ और भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो खेल पत्रकारों तक ही रह गई पर उन्होंने उन्हें छापा नहीं क्योंकि तब खिलाडिय़ों ने कोई लिखित शिकायत नहीं की थी और बिना पुख्ता सबूत अखबारों में किसी पर आरोप नहीं लगाया जा सकता।

सबसे बड़ा तूफान उस समय उठा जब ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी ने अपने कोच पर इस प्रकार के आरोप लगाए। सोचने की बात है कि यदि एक ओलंपिक पदक विजेता का शोषण करने की कोशिश हो सकती है तो फिर सुरक्षित कौन है? कोच पर इसी प्रकार के आरोप महिला पहलवान सोनिका कालिरमन ने भी लगाया।

भारतीय हाकी के दिग्गज खिलाड़ी और 300 से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके सरदार सिंह पर भी एक महिला खिलाड़ी ने यौन शोषण का आरोप लगाया। सरदार सिंह ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया, पर मामला अभी भी जांच के दायरे में है।

सबसे दुखदायी घटना केरल की है जहां ‘वाटर स्पोटर्स’ की 15 वर्षीय लड़की अपर्णा ने अपने प्रशिक्षकों और सीनियर्स द्वारा की जा रही रैगिंग से तंग आकर ज़हर खा लिया था। ध्यान रहे कि आज के समय में ‘रैगिंग’ एक अपराध है। आप किसी को भी शारीरिक या मानसिक रूपसे प्रताडि़त नहीं कर सकते। इस कानून के बावजूद यह घटना हो गई।

मनसिक प्रताडऩा के आरोप बैडमिटंन जैसे खेल में भी लगते हैं। देश में युगल की सबसे बढिय़ा खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने इस प्रकार के आरोप लगाए। उनकी यह लड़ाई लंबे समय तक चली। सबसे बड़ी घटना हरियाणा के पंचकूला की है जहां एक नाबालिग टेनिस खिलाड़ी का यौन शोषण करने की कोशिश की गई। रूचिका नाम इस खिलाड़ी ने टेनिस एसोसिएशन के पदाधिकारी व पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर पर यह आरोप लगाया। यह मामला अखबारों की सुर्खियां बना। राठौर ने अपनी पोजिशन का भरपूर लाभ उठाते हुए रूचिका को अपनी शिकायत वापस लेने के लिए कई हत्थकंडे इस्तेमाल किए। उसके भाई को झूठे आपराधिक मामले में फंसाया गया व पूरे परिवार पर पुलिस का कहर टूटता रहा। पर रूचिका ने हार नहीं मानी और अपनी बात पर अडिग रही। राठौर की इन हरकतों से आम जनता उसके खिलाफ खुल कर सामने आ गई। अंत में अदालत ने राठौर को यौन शोषण की कोशिश के मामले में दोषी ठहराते हुए सज़ा सुना दी।

देखने वाली बात यह है कि ऐसे मामलों में सज़ा हो जाने के बावजूद उस खिलाड़ी का खेल जीवन तो खत्म हो ही जाता है, क्योंकि खेल अधिकारियों और खेल फेडरेशनों के पदाधिकारियों की एक जुंडली होती है जो शिकायतकर्ता को इतना परेशान कर देती है कि उसे खेल छोडऩा ही पड़ता है, क्योंकि हर बार वह अदालत में नहीं जा सकती, खासतौर पर गऱीब घर की लड़कियों के लिए यह समस्या सबसे अधिक है।

इस प्रकार की घटनाएं ‘मास्टर्स’ खेलों में भी सामने आई है। मास्टर्स एथलेटिक्स फेडरेशन के एक ग्रुप के एक पदाधिकारी ने एक महिला एथलीट के कपड़ों के भीतर हाथ डाल दिया था। इसी पदाधिकारी ने एक और एथलीट से भी छेड़छाड़ की थी। इसी फेडरेशन के एक पदाधिकारी को जो कि अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए विदेश जा रहे भारतीय दल का नेता भी था को दो साल के लिए बाहर कर दिया गया था। वह विमान में अपनी सहयात्री एक विदेशी महिला के साथ छेड़छाड़ कर रहा था। यह देख भारतीय दल की महिला खिलाडिय़ों ने उस महिला यात्री से माफी मांगी और उस पदाधिकारी की सीट बदली। नही ंतो उस पदाधिकारी के कारण पूरे राष्ट्र का अपमान हो जाता। महिला खिलाडिय़ों ने मामला दबा दिया और उस महिला यात्री को शिकायत नहीं करने दी।

हल्के से नहीं लेना चाहिए मौसम में आ रहे बदलाव को।

देश आज जहां गवाह बन गया है ‘मी टू’ आंदोलन का। ज़्यादातर मीडिया भी उसी और झुक गया है। इस हंगामें के बीच एक खबर जो कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है मौसम परिवर्तन पर। इंटर गवर्नमेंटल पैनेल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की इसी महीने अक्तूबर 2018 में जारी इस रपट की मीडिया में कोई खास चर्चा नहीं हुई।

तहलका का संपादकीय आईपीसीसी की चेतावनी पर केंद्रित (फोकस) है क्योंकि इसमें चेतावनी दी गई है कि सारी दुनिया में तापमान बढ़कर औद्योगिक स्तर के निचले पर तीन डिग्री सेंटीग्रेड तक जा सकते हैं। यानी उस स्तर तक तापमान बढऩे का नतीजा यह होगा कि कई कीेड़े-मकौडे और पौधे गायब हो जाएंगे। साथ ही मालद्वीप, मियामी, शंघाई का बचे रहना कठिन हो सकता है। क्योंकि समुद्री किनारा सिकुड रहा है। जिसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति है कई शहर समुद्र के स्तर से नीचे पहुंच गए हैं।

वैश्विक तापमान अगस्त 2018 में पांचवां सबसे ऊँचा अगस्त तापमान कहलाता है। इसके बाद 1980 से वैश्विक रिकार्ड रखने की शुरूआत हुई। जबकि दस सबसे गर्म वैश्विक भूमि और समुद्र की सतह के तापमान की जानकारी 2009 से हो रही है। पिछले पांच साल यानी 2014 से 2018 तो इस बात के गवाह हैं कि अगस्त में सबसे गर्म पांच अगस्त है जो रिकार्ड है।

1.5 सेंटीग्रेड का तापमान पेरिस में हुआ। क्योंकि वैज्ञानिकों को लगा कि यदि दुनिया इससे भी ज़्यादा गर्म हुई तो रहने का स्थान घटेगा, आहार असुरक्षा बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर प्रवास होगा। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड की निदेशक क्रिस्टीन लगार्दे ने इस पर कहा,’गलतियों से बचो, जब तक मिलजुल कर कार्रवाई नहीं होगी, इस ग्रह का भविष्य खतरे में ही है’।

आईपीसीसी संयुक्त राष्ट्रसंघ की इंटर गवर्नमेंटल इकाई है। यह पूरी दुनिया के मौसम परिवर्तन का वैज्ञानिक नजरिया उपलब्ध कराता है। इसकी चेतावनी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। क्योंकि दुनिया के मौसम वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमें मानव- लायक वैश्विक गर्माहट 11.5 सेंटीग्रेड तक लानी चाहिए।

चूंकि तीसरी दुनिया के देशों में प्रवाह (एमिसन) का जो स्तर है उससे उनका विकास ठहर जाएगा। विकासशाील देशों को विकसित देशो से धनराशि (फंड) की ज़रूरत होती है जिससे वे कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए ज़रूरी उपाय कर सकें। यानी संदेश बहुत साफ है कि जो संपन्न हैं उन्हें सहयोग करना चाहिए क्योंकि वैश्विक गरमाहट से तकलीफ आती है। यह विकसित और अविकसित अर्थव्यवस्था वाले देशो पर समान असर डालती है।

भारत पेरिस प्रतिबद्धता का भागीदार है यह पहले ही 175 गिगावाटस की ऊर्जा रि न्यूएबल ऊर्जा की 2022 तक व्यवस्था करने वाला देश है। ये और ऐसे ही दूसरे प्रतिबद्ध कदमों को अमल में लाने के लिए ज़रूरत है अकूत धनराशि (फंड) की। हमारा ग्रह कंजूसी पर ध्यान टिकाए हुए है। यह समय कि अमीर देश उदारता से तीसरी दुनिया के देशो को सहयोग दें। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2015 में मौसम परिवर्तन पर हो रहे पेरिस समझौते से बाहर आने की घोषणाा यह कहते हुए की थी कि पेरिस समझौते से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की अनदेखी होगी और इसका स्थायी नुकसान होगा। जबकि इससे निकल जाने पर अमेरिकी व्यापारियों और श्रमिकों को लाभ होगा। जो हो, पेरिस समझौते से बाहर निकल जाने का भी कोई लाभ नहीं हुआ। आज ज़रूरत है कि अमीर देश अपने बटुए को खोलें जिससे जो अनहोनी है उससे बचा जा सकें।

काफी कुछ खो बैठते हैं जब सब बताने में होती है देर

हम काफी कुछ खो बैठते हैं जब हम खुद पर हुए सेक्सुअल एसाल्ट (यौनिक हमलों) की बातें बताने में लंबा समय बिता देते हैं।

मैं तब 16 साल की थी। मैंने लॉस एंजेल्स के एक उपकरण के पुएंटे हिल्स मॉल में एक नौजवान से मिलना-जुलना शुरू किया था। मैं स्कूल में पढ़ाई के बाद राबिन्सन एक्सेसरीज की एक दूकान में काम करती थी। वह पुरुषों की एक दूकान में काम करता था। वह भूरे सिल्क का सूट पहने होता और मेरे साथ गप्पें मारता। वह कालेज में पढ़ता था। मुझे वह अच्छा और आकर्षक लगता था। वह 23 साल का था।

हम जब कहीं बाहर जाते तो वह एक किनारे कार खड़ी कर देता और घर में हमारे कोच के एक किनारे बैठ कर मेरी मां से गप्पें मारता। स्कूल मेें जब रात के आयोजन होते तो वह मुझे कभी घर देर में न लाता। हम खासे करीब थे। उसे पता था कि मैं तब कुंआरी थी। उसे इस बात पर यकीन नहीं था कि मैं सेक्स के लिए तैयार होऊंगी या नहीं।

नए साल की शाम थी। हमने मेल-जोल बढ़ाया ही था कि उसने एक दिन मेरे साथ बलात्कार किया।

उस घटना को मैं लगभग भूल चुकी थी। इस साल सितंबर के आखिरी सप्ताह में मेरे दिमाग में यह कौंधने लगा जहां दो महिलाओं ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के लिए मनोनीत ब्रेट कावनाव के खिलाफ ब्यौरे बार आरोप लगाए। क्रिस्टीन ब्लैसे फोर्ड ने बताया कि वह कैसे उस पर चढ़ गया और उसने उसके मुंह पर हाथ रख दिया और बलात्कार करने लगा। यह घटना तब हुई जब वे दोनों हाई स्कूल में थे।

वह शुक्रवार था जब राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया कि यदि डा. ब्लैसी ने जो कुछ कहा, वह सही है तो उन्हें सालों पहले पुलिस में रिपोर्ट करनी थी। लेकिन मैं समझ सकती हूं क्योंकि उन दोनों महिलाओं ने इतने साल तक सारी जानकारी खुद तक रखी। पुलिस को कुछ भी नहीं बताया। सालों तक मैंने भी वही किया। शुक्रवार को मैंने ट्वीट किया जो मुझे इतने बरसों पहले हुआ।

शायद आप यह जानना चाहें कि क्या मैंने उस रात शराब पी थी जब मेरे साथ बलात्कार हुआ। यह कोई मायने नहंी रखता लेकिन मैंने पी नहीं थी। आप शायद यह जानना चाहें कि मैंने क्या पहन रखा था या कि मैं कितनी उलझी हुई थी। अपनी इच्छाओं को लेकर। लेकिन यह भी बेमतलब ही है। मैंने जो पहन रखा था वह लांग स्लीव ब्लैक बेट्सी जॉनसन मैक्सी ड्रेस थी। इसमें सिर्फ मेरे कंधे ही दिखते थे।

हम दोनों कई पार्टियों में गए थे। इसके बाद हम उसके अपार्टमेंट में गए। हम आपस में बातचीत ही कर रहे थे। मैं बहुत थक गई थी। मैं बिस्तर पर लेट गई और सो गई।

दूसरी बात जो मुझे याद आती है वह यह कि मेरी टांगों के बीच एक छुरे के घुसने जैसी पीड़ा हो रही थी। वह मेरे ऊपर था। मैंने पूछा, ‘तुम क्या कर रहे हो।Ó उसने कहा, ‘यह दर्द कुछ ही देर होगाÓ। मैं चीखी, ‘ऐसा मत करो।Ó

दर्द बढ़ रहा था। लेकिन वह जारी था। डर से मेरे आंसू निकल रहे थे। उसके बाद उसने कहा, मुझे लगा कि तुम जब सो रही है तो दर्द कम होगा। वह मुझे घर लाकर छोड़ गया।

मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। न तो अपनी मां से, न अपने दोस्तों से और पुलिस तो बहुत तो दूरी थी। मैं बहुत सदमे में थी। उस शाम मैंने घर आकर बताया फिर मैं सोने चली गई। मैं वह रात भूलना चाह रही थी।

फिर मुझे लगने लगा कि यह मेरी ही गलती है। 1980 के दशक में हम नहीं जानते थे कि बलात्कार क्या होता है। मैं सोचती, ‘बड़े लोगे कहेंगे कि तुम उसके अपार्टमेंट में करने ही क्या गई थी? तुम उसके साथ क्यों घूम रही थी जो तुमसे कितना बड़ा है।Ó

मुझे नहीं लगता कि मैं इस घटना को बलात्कार कह सकती हूं – मैं उसे सेक्स भी नहीं कह पाती। यह सब मेरे दिमाग में घूम रहा था। मैं हमेशा सोचती जब मैं अपनी कौमार्य तोड़ंूगी तो वह एक बड़ी बात होगी – समझ बूझ कर लिया गया फैसला। खुद पर काबू रख पाना मुझे परेशान कर रहा था। मेरे दिमाग में आता जब मैंने इंटरकोर्स किया तो क्या यह प्यार की अदायगी थी थोड़ी खुशी बांटनी थी या बेबी की तैयारी थी। जाहिर है इनमें कुछ भी नहीं था हमारे बीच।

बाद में जब दूसरे लड़कों से मेरा मेलमिलाप हुआ जब मैं हाई स्कूल के अगले साल में पहुंची। यानी कालेज के पहले साल। मैंने उनसे झूठ कहा – मैं अब भी कुंआरी हूं। लेकिन भावनात्मक तौर पर तो थी ही।

अब मैं इसके बारे में सोचती हूं। मुझे याद आता है कि इस बलात्कार के पहले जब मैं सात साल की थी मेरे सौतेले बाप के एक संबंधी ने मेरी टांगों के बीच मुझे छुआ और मेरा हाथ अपने खड़े लिंग पर रखा। मैंने अपनी मां को बताया। उन्होंने मुझे साल भर के लिए मेरे दादा-दादी के पास भेज दिया।

इन अनुभवों से मुझे काफी असर पड़ा और भरोसा करने की अपनी योग्यता पर असर पड़ा। मुझे दशकों लग गए इसके बारे में अपने किसी अंतरंग से कुछ कहने मेेंं। यहां तक कि किसी चिकित्सक से भी।

कुछ लोग कहते हैं कि किसी आदमी को उस काम की कीमत नहीं अदा नहीं करनी चाहिए उसने जो किशोर अवस्था में की हो। लेकिन औरत तो ताजिंदगी कीमत अदा करती रहती है। इसमें वे भी सहयोगी होते हैं जो उसे प्यार करते हैं।

मुझे लगता है कि समय के साथ मेरे साथ जो कुछ हुआ वह बलात्कार है-दूसरे कहते है – मैंने शायद ज्य़ादा नहीं झेला। मैं जब पीछे देखती हूं। सोचती हूं कि अपने बलात्कारी को मैंने बचा लिया और 16 साल के अपने आस्तित्व को मारा दिया।

आज मेरी एक बेटी है। वह आठ साल की है। सालों से मैं उसे सहज साधारण शब्द सुनाती रहती हूं जिन्हेें जानने-समझने में ही मेरी जि़ंदगी का एक बड़ा हिस्सा निकल गया। अगर कोई तुम्हें छूता है। तुम्हारे निजी अंगों को छूता है। तुम्हें असहज सा लगता है। तुम जोर से चीखो। तुम वहां से बाहर निकलो और किसी से कहो। कुछ। किसी को भी इजाजत नहीं कि वह तुम पर अपने हाथ रखे। तुम्हारा शरीर तुम्हारा है।

अब अपने बलात्कार के 32 साल बाद मैं खुल कर यह कह पा रही हूं कि मेरे साथ क्या हुआ? मुझे यह सब कहने से न तो कुछ हासिल भी नहीं होगा।

आज चार लड़कियों में एक और छह लड़कों में एक सेक्सुअली एब्यूज्ड है जिसकी उम्र 18 साल से कम है। आज मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि मैं चाहती हूं कि हम सब तैयार हों। हमारी बेटियां कभी शर्म या डर के कारण खामोश न रहें। हमारे बच्चे अच्छी तरह जान लें कि लड़कियों का शरीर उनकी मौज-मस्ती के लिए नहीं है। न मानने पर बुरे दुष्परिणाम हो सकते है।

ये संदेश बहुत ही साफ होने चाहिए क्योंकि हमने जिन्हें फैसला लेने की जिम्मेदारी है वे हमारे देश में सबसे बड़ी अदालत में बैठते हैं।

पद्मा लक्षमी

लव, लास एंड व्हाट वी एट की लेखक

साभार : द हिंदू, न्यूयार्क टाइम्स