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केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में ठनी

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर उर्जित पटेल को कारण बताओ नोटिस भेजा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद आरबीआई द्वारा विलफुल डिफॉल्टरों की सूची का खुलासा न करने पर यह भेजा गया था। सीआईसी ने जबाव देने के लिए 17 नवंबर तक का वक्त दिया है।

इसके अलावा सीआईसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के भूतपूर्व गर्वनर रघुराम राजन के बुरे कजऱ् पर लिखे पत्र को सार्वजनिक करने के लिए कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने 50 करोड़ और उससे अधिक कजऱ् रिजर्व बैंक से लेने वाले विलफुल डिफाल्टरों के नामों का खुलासा करने का आदेश दिया था। इसका रिजर्व बैंक ने पालन नहीं किया। सीआईसी ने उर्जित पटेल से यह भी पूछा कि क्यों न उन पर अधिकतम जुर्माना लगाया जाए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सूचना आयुक्त शलैष गांधी के आदेश को बरकरार रखा था और आरबीआई ने इस आदेश का सम्मान नहीं किया था।

सीआईसी ने बताया कि 20 सितंबर को केंद्रीय सतर्कता आयोग में बोलते हुए पटेल ने कहा था कि सीवीसी द्वारा सतर्कता पर जारी दिशा निर्देश का उद्देश्य अधिक पारदर्शिता हासिल करना, ईमानदारी की संस्कृति को बढ़ावा देना और जीवन में सत्यता को बढ़ावा देना और संगठनों में अपने अधिकार के भीतर समग्र सतर्कता प्रशासन में सुधार करना था।

उन्होंने आगे कहा, ”हमें लगता है कि आरबीआई गर्वनर और डिप्टी गर्वनर जो कहते हंै उसमें और उनकी वेबसाइट आरटीआई पॉलिसी के बारे में जो कहती हैं उसमें कोई समानता नहीं है। सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युल ने कहा, ”जंयतीलाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सतर्कता आयुक्त के निर्देशों को कायम रखा था। इससे सतर्कता और जांच रिर्पोटों में काफी गोपनीयता रखी जाती है। अंत में उन्होंने कहा कि इस विवाद के लिए केंद्रीय सार्वजनिक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) को दंडित नहीं किया गया क्योंकि उन्होंने शीर्ष अधिकारियों के निर्देशों के तहत काम किया था।

यदि पिछले दिनों की कुछ घटनाओं पर नजऱ डालें तो पाएंगे कि केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑॅॅॅफ इंडिया के बीच एक टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तो यहां तक कह दिया कि 2010 और 2014 के बीच आरबीआई ने अंधाधुंध बैंक कर्जों के वितरण पर कोई नियंत्रण नही रखा। स्थिति उस समय और खराब हो गई जब वित्तमंत्री ने भारत-अमेरिका सामरिक सांझेदारी फोरम में सेंट्रल बैंक पर यह टिप्पणी कर दी कि वह सोया हुआ है। इससे इन दोनों के बीच फैली कड़वाहट का पता चलता है।

वित्तमंत्री ने कहा कि सेंट्रल बंैक ने इस बात पर अपनी आंखे मंूद रखी थी जब उसकी कजऱ् की सीमा 31 फीसद पार कर गई जबकि यह 14 फीसद से अधिक नहीं होनी चाहिए थी। मुझे नहीं पता सेंट्रल बंैक क्या कर रहा था। यह एक नियंत्रक था। उसने सच्चाई को छुपाने की कोशिश की।

आरबीआई के उप गर्वनर डाक्टर विरल वी आचार्य ने 26 अक्तूबर 2018 को मुंबई में एक व्याख्यान के दौरान अर्जेंटीना के विश्लेषक अल्बर्टो रामोस का हवाला देते हुए कहा सरकारी कर्जे़ उतारने के लिए बैंक की संचित राशि का इस्तेमाल कोई सकारात्मक बात नहीं है इसलिए इस मुद्दे पर खुले रूप से बहस हो सकती है। इससे बैंक की बैलेंसशीट कमज़ोर हुई है।

उन्होंने कहा कि एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए एक स्वतंत्र सेंट्रल बैंक का होना ज़रूरी है। यह बैंक सरकार की दखलांदजी से परे होना चाहिए। मैं यह भी बताना चाहता हूं कि सेंट्रल बैंक की स्वतंत्रता को कमज़ोर करना किस प्रकार विनाशपूर्ण हो सकता हे। इससे ‘कैपिटल मार्केटसÓ में निराशा फैल सकती है जो आत्मघाती साबित होगी।

संभव है क्या फिर न हो हाशिमपुरा कांड?

दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला उलट दिया। आज़ादी के बाद उत्तरप्रदेश की प्रोविंशियल आमर्ड कांस्टेबुरी (पीएसी) के लोगों को निचली अदालत ने हिरास्त में लिए गए लोगों की हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। यह घटना उसके लिए बेहद संतोष की बात थी जिसने तीन दशक पहले इस घटना को देखा था। एक व्यक्ति जिसने तीन दशक तक इस फैसले का इंतज़ार किया। तब आखिर क्यों, जब अपने मोबाइल पर आजमगढ़ के एक दूरदराज के गांव से मिले बधाई के संदेश पर मैं मजबूती से धन्यवाद नहीं कह पाया था।

तीन दशक में उस हैरान कर देने वाली मई 1987 की रात के खौफनाक दृश्यों के साथ जीता रहा। दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर माकनपुर गांव के पास खाइयों के बीच से एक नहर के इर्द-गिर्द खून से लिसड़ी कमीजों के अंदर खून में लथपथ शरीर में मैं जि़ंदगी की तलाश कर रहा था। मुझे लगा मानों हिरासत में बुरी मौत मारे गए लोगों का मैं चश्मदीद गवाह हूं। उस दुर्भाग्यपूर्ण रात में मैंने दो शपथ ली : सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस होने के नाते मैंने तय किया कि इस घृणित अपराध के अपराधियों और इसे उकसाने वालों को मैं कानूनी तौर पर सजा ज़रूर दिलवाऊंगा। मेरे अंदर का लेखक जगा और उसी दिन मैं अपने अनुभवों को लिखने बैठ गया।

एक पुरानी कहावत है कि विचार की कमज़ोर विकल्प होती है भाषा जब मैं किताब लिखने बैठा तो मैंने महसूस किया कि यह कितना भयावह काम है। जो शिकार हुए उनकी पीड़ा और उनके परिवारों में तनाव को बर्दाश्त करना मेरे लिए चुनौती थी। यह चरित्रों की उन कल्पनाओं के ठीक उलट था जिसे पहले कभी मैंने उपन्यास लिखते हुए महसूस भी नहीं किया था। मैं असल जि़ंदगी से ज़रूर कुछ चरित्र उठाता लेकिन वे मेरे अपने गढ़े हुए बन जाते जब भी मैं उन्हें अपने प्लॉट में शामिल करता। वे बदल जाते। वे बढ़ते और मनमानी करते मेरी सनक के अनुसार। कुछ मामलों में तो जितने लोगों से मैं मिला वे अपने चरित्र से खासे प्रभावित होते हैं और मेरी किताबों में से हीरो के विरोध में उभर कर आते हैं। लेकिन मैंने हाशिमपुरा में वह नहीं करा। दरअसल मानों एक बुरा सपना हो जिसमें वे मेरा पीछा कर रहे हों और मुझे इस बात की अनुमति नहीं दे रहे हों कि बतौर लेखक मैं अपनी आज़ादी का इस्तेमाल करूं। हत्याओं की क्रूरता ही इस कदर प्रभावी थी कि मैं इस हद तक शांत हो जाता कि सबसे छोटा अध्याय भी एक बार में पूरा न कर पाता।

जब तक शब्द उन्हें पकड़ पाते इस रात की काली छाया और भी ज्य़ादा गहरा जाती। और भी ज्य़ादा रात पसर जाती। जुबानिसा की ही तरह जिसने 22 मई 1987 को ही अपनी बेटी को जन्म दिया। लगभग इसी समय जब उसके पति को नहर के किनारे बुलेट से छलनी कर दिया गया।

किसी तरह मैं अपनी दूसरी शपथ पूरी कर सका। किताब तो पूरी हो गई। लेकिन उस पहली शपथ का क्या – जिसमें मारे गए लोगों के हत्यारों को ही सजा नहीं दिलवाना था बल्कि उन्हें भी जिन्होंने उन्हें ऐसा करने का हुक्म दिया था? पूरे 31 साल की थकाऊ और ऊबा देने वाली कानूनी लड़ाई। इस बात से कोई खुश नहीं होता कि पीएसी में छोटे स्तर पर काम कर रहे 16 लोगों को सजा मिली पुलिस सेवा में अपने 36 साल गुज़ार देने के बाद मुझे लगा कि एक सब इंस्पेक्टर तो यह फैसला नहीं ले सकता कि पर मुसलमानों को उठवा लिया जाए और उन्हें मरवा दिया जाए। हालांकि अगर वह अपनी मूर्खता में ऐसा करता भी तो जो उसके अधीन जो हैं वे उसके हुक्म की तामील न करने के लिए आज़ाद हैं। हर किसी को पता है कि इसके नतीजे क्या होंगे। एक आदमी हिम्मत करके ऐसा अनोखा काम तभी करेगा जब उसे इस बात का पूरा यकीन होगा कि उसे बचा ज़रूर लिया जाए।

डेढ़ दर्जन हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल, प्लाटून कमांडर सुरेंद्र पाल सिंह के आदेशों के तहत थे। उनके लिए वे कुछ भी करने, मरने-खपने के लिए हमेशा तैयार थे क्योंकि उन्हें भरोसा था कि उनका बाल भी बांका न होगा। उसने उन्हें यह भरोसा दे रखा था – वरिष्ठ, पुलिस अधिकारियों ने, राजनीतिकों ने या फिर प्रशासकों ने? उन्हें कुछ हुआ भी नहीं!

कुछ बहुत ही खुले रहस्य हैं। जिसकी जानकारी उन्हें है जो मेरठ में और आसपास के इलाकों में रहते हैं। क्या जांच का काम मेरे हाथ से लेकर 40 घंटे पूरे होने के पहले ही सीआईडी को सौंपा गया। उन्हें क्यों इसकी अनुमति दी गई कि वे पूरे मामले का घालमेल कर सेना का वह रहस्यमय मेजर कौन था जो हाशिमपुरा में संदिग्ध अवस्था में देखा गया था जबकि उसके वहां होने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी?

वह स्त्री कौन थी जिसका भतीजा कुछ घंटों पहले ही मारा गया था जिसके बाद पीएसी के एक ट्रक में उन लोगों का अपहरण किया गया जिन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। जब मैंने सीआईडी के दस्तावेज खंगाले तो मुझे कई ऐसे वाकया दिखे जो अत्याचारियों की ओर इशारा कर रहे थे? क्यों सीआईडी ने अचानक उन वाकयों पर काम करना बंद कर दिया? इन मुद्दों के कारण मैं इस क्षण से बहुत खुश नहीं हो पाता जिसके लिए मैं 30 साल तक इंतजार करता रहा।

हाशिमपुरा की साखा-प्रसाखाएं बहुत दूर तक असर डालेंगे। इस मामले पर जब सेशन कोर्ट का फैसला आया तो जो प्रतिक्रिया हुई उससे मुझे तकलीफ हुई। कई घटनाएं और बहस-मुबाहिसे 21 मार्च के फैसले पर हुईं। इनमें से कुछ में मैंने हिस्सा लिया। कोई भी यह पहचान सकता था कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों से बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवान हैं। वे जिस तरह के सवाल पूछ रहे थे उनसे उनकी पहचान सहज थी।

मैंने देखा कि उनमें से कई ने मुझसे तर्क-वितर्क किए और धर्मनिरपेक्षता के रेलेवेंस पर जोर दिया साथ ही हाशिमपुरा पर बातचीत की शुरूआत की। वे एक ऐसी उत्तेजक स्थिति में फंस गए हैं कि वैचारिक तौर पर वे इस्लामी राज चाहते हैं लेकिन अल्पसंख्यक होने के नाते वे यह भी जानते हैं कि भारत में ऐसा संभव नहीं है। एक सम सामाजिक इतिहासकार का मानना है कि ज्य़ादातर मुसलमानों का यह विरोधाभास है कि वे देश में धर्म-निरपेक्षता चाहते हैं लेकिन इसलिए नहीं कि उनका इसमें भरोसा है बल्कि इसलिए ताकि वे इसे हिंदूराष्ट्र के विरोध में खड़ा रख सकें। हाशिमपुरा जैसी घटनाएं न केवल उग्रपंथियों को मजबूत करती हैं बल्कि ये मुसलमानों में जो धर्मनिरपेक्ष लोग हैं उन्हें हताश भी करती हैं।

हाई कोर्ट से आया फैसला भले ही सांत्वना भर हो लेकिन इस मामले मेें हमें याद रखना चाहिए कि भारतीय राज्य के सभी भागीदार – राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही, पुलिस, मीडिया और न्याय – पूरी तौर पर नाकाम रहे हैं। यदि वाकई हम भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाए रखना चाहते हैं तो हम यह व्यवस्था भी करनी होगी कि फिर हाशिमपुरा न हो!

लेखक- पूर्व आईपीएस

‘हाशिमपुरा, 22 मई,’

ए क्रोनिकल ऑफ 1987

कस्टोडियल किलिंग्स’,

के चर्चित लेखक।

साभार : इंडियन एक्सपे्रस

हाशिमपुरा कांड न्याय के प्रति आस्था के चलते हुई जीत

यह 1987 में रमजान का शुक्रवार था। एक स्थानीय मस्जिद से हाशिमपुरा के लोग प्रार्थना करके घरों को लौट रहे थे। माहौल में बहुत तनाव था। बाबरी मस्जिद के ताले खुलने के बाद मेरठ में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। वहां कफ्र्यू लगा था और तलाशी अभियान जोरों पर था। यह तलाशी अभियान सेना और पुलिस का संयुक्त अभियान था। सेना और पीएसी ने 22 मई से यह अभियान छेड़ा था। रिपोर्ट थी कि गैर सामाजिक तथ्यों ने कथित तौर पर कांस्टेबुलरी से दो राइफलें लूटी हैं। सेना के एक मेजर के भाई की हत्या हाशिमपुरा के पास की बस्ती में कर दी गई है। उन दिनों हत्या कांड की तरह-तरह की कहानियां फैल रही थीं।

एक कहानी थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता की मौत गोली लगने से हुई। ये गोलियां हाशिमपुरा से चली थीं। यह 21 मई की बात थी। यह कहा जा रहा था कि सतीश कौशिक की मेरठ में तब तैनाती थी उसने यह योजना बनाई थी कि निजी नुकसान पर बदले की यह कार्रवाई की जाए। बहरहाल यह सारा कुछ न तो रिकार्ड पर आया और न उसकी भूमिका की पड़ताल ही की गई।

मेरठ के एक वरिष्ठ पत्रकार शवाब रिजवी ने इस घटना की कवरेज की थी। उनका कहना था कि प्रभाव की हत्या और इस हत्याकांड का आपस में कोई लेना-देना नहीं था। पीएसी के लोगों में स्थानीय मुसलमानों को लेकर एक नाराज़गी शुरू से ही थी जब कथित तौर पर उन्होंने पत्थरों और एसिड की बोतलों से उन पर हमला बोला था। वे पकड़ कर उन्हें गाजियाबाद में नहर पर ले गए और उन्हें बिना किसी वजह के मार दिया। इसी कारण यहां एक पूरी बटालियन तैनात की गई थी और वे महसूस कर रहे थे कि यह काफी सुरक्षित हैं। रिजवी ने बताया सबसे ज्य़ादा प्रचलित कथानक है कि इस दिन सेना ने घर-घर तलाशी ली जिसमें छत से छत तक की भी छानबीन और गिरफ्तारी थी फिर उन्हें तंग गलियों से मुख्य गली तक कतार में लाया गया पीपल के एक पेड़ तक। सेना ने इन लोगों को पीएसी के हवाले कर दिया। उसने लड़कों और नौजवानों को छांटा। 42-45 साल के स्वस्थ लोगों को पीले रंग की सी-कंपनी के पीएसी की 41 बटैलियन में भरा गया। उन्हेंअपना सिर नीचे रखने को कहा गया। किसी को भी यह नहीं पता था कि वे कहां ले जाए रहे हैं। सब के मन में यही था कि वे चार किलोमीटर अबदुल्लापुर जेल ले जाए जा रहे होंगे या फिर सबसे करीब की पुलिस चौकी। लेकिन यह तो धोखा ही था। उन्होंने कहा कि कुछ बड़े अधिकारी उनसे बातचीत करना चाहते हैं। हम भी तैयार हो गए जाने के लिए। यह नाम का तलाशी अभियान था। बताया जुल्फिकार नासिर ने जो किसी तरह बच निकला था।

सारे दिन की घटनाओं को फोटोग्राफर प्रवीण जैन ने अपने कैमरे में उतारा था। मुस्लिम लोगों और लड़कों को अपना हाथ ऊपर करा कर हाशिमपुरा की गलियों में सेना के सिपाही परेड करा रहे थे। ये काली-सफेद तस्वीरें अपराधियों को सज़ा दिलवाने का सबूत बनीं। प्रवीण जैन ने बताया कि उन्हें इस बात का कतई अहसास नहीं था कि जो चित्र उन्होंने कैमरे में उतारे वे ऐतिहासिक’ होंगे। मुझे बिल्कुल ही अंदाज न था। उस बस्ती से कोई हथियार नहीं मिला और मुझे लगा कि इन्हें ही गिरफ्तार किया गया है। बाद में छोड़ दिया जाएगा।

जुल्फिकार नासिर तब मुश्किल से 17 साल का रहा होगा। हाशिमपुरा में अपने घर पर सोफा में बैठा हुआ बताता है पिछले तीन दशक की कानूनी लड़ाई के बारे में। जुल्फिकार उन अत्याचारों को झेलने और बच निकलने वाले एक नौजवान थे। उन्होंने आपबीती मीडिया को बताई। उस शाम जब ट्रक दिल्ली के बाहर गाजियाबाद में गंगा नहर के पास पहुंचा तो पीएसी के लोगों ने गाड़ी से लोगों को बाहर निकाला और अपनी .303 राइफिल से उन्हें ढेर कर दिया। जो पहला व्यक्ति मारा गया वह कासिम, फिर अशरफ और जुल्फिकार तीसरा था। वह भी उन तीन की तरह नहर में फेंका गया। उसने मरे होने का अभिनय किया और चमत्कार ही हुआ कि वह झाडिय़ों में खुद को छिपाता हुआ बच गया। बाद में वह दौड़ता हुआ भाग निकला। अंधेरा था और पीएसी के लोगों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए हेल्मेट पहन रखे थे। वह रात मेरी सहयोगी रही। सिपाही यह नहीं पता कर पाए कि मुझे गोली कहां लगी, जुल्फिकार ने कहा।

वह बेहद घबराया हुआ था। उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि पीएसी के जवान एक दूसरे से क्या बात कर रहे थे। उस पर गोली चलाते हुए, वे न तो कुछ बोले और न सांप्रदायिक गाली-गलौच की। वे आपस में एक-दूसरे को जल्दी करने और काम खत्म करने को कहते। ट्रक में भी वे आपस में बहुत कम बात करते। जब भी कुछ कहना होता तो फु सफुसाते।

हाशिमपुरा एक जमाने मे बुनकरों का केंद्र था। अलग-अलग प्रदेशों से व्यापारी आकर कपड़े खरीदते। आज ज्य़ादातर वहां दिहाड़ी मज़दूर हैं। छोटे कारीगर हैं या फिर छोटी-मोटी दुकान चला कर आजीविका चलाते हैं। जुल्फिकार उनसे बेहतर है और ट्यूबवेल के स्पेयर पार्टस बेचता है। उस रात कुछ लोगों की जान तो स्थानीय लोगों और बाकी को राज्य पुलिस ने बचाया। पुलिस वालों ने उस्मान को पकड़ लिया था। वे उसे जहर देकर मार देने के लिए धमकाते थे अगर उसने पीएसी का नाम भी लिया।। उस्मान ने घुटने टेक दिए। उसके परिवार को डेढ़ महीने तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला। क्योंकि इलाज के लिए उसे दिल्ली लाया गया था। उसके पांच भाई भी जेल में थे।

यह नृशंस हत्याकांड दो चरणों में हुआ। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि पुलिस के लोगों ने गंगा नहर पर गोलियां चलानी तब बंद की जब उन्होंने आती हुई गाडिय़ों की हेडलाइट देखी। ट्रक को हिंडन नहर की ओर मोड़ दिया और पीएसी का एक जवान पीलाधर तो तब घायल हो गया जब एक बुलेट उसे आ लगी। जब पहले तीन लोग मारे गए तो ट्रक में बैठे दूसरे चीखने चिल्लाने लगे। जब उन्होंने ने ट्रक से कूदने की कोशिश की तो जवानों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग की। पीएसी के लोग नीचे उतरे। उन्होंने ट्रक के पिछले हिस्से को खोला और काम पूरा किया। उन्होंने सारे शरीर हिडन नदी में बहा दिए।

लोगों के बिलखते परिवार, विधवाएं, माएं, बच्चे रोते सुबकते रह गए। लेकिन इन परिवारों ने दिमागी संतुलन नहीं खोया। इनमें न्याय के प्रति आस्था बनी रहीं।

साभार- उमर रशीद

द हिंदू’

साईकिल रिक्शा ज़रूरी क्यों

यह रफ़्तार का युग है। रफ़्तार रोमांच पैदा करती है; जितनी तेज़ रफ़्तार उतना अधिक रोमांच। इसके साथ जुड़े खतरे के बावजूद भी लोग अब सफऱ हो या जि़न्दगी उसमें तेज़ रफ़्तार ही पसंद करते हैं। यह इस रोमांच का ही लालच है कि देश में िफलहाल इसकी आवश्यकता और उपयोगिता कितनी है इस पर  विचार किए बगैर ही लाई जा रही अत्यधिक लागत वाली बुलेट ट्रेन, इसकी बेहद महँगी सवारी का लाभ देश के कुछ ही लोग उठा पाएंगे पर इसके आने का रोमांच पूरे देश में फैला है। पर सवाल यह है कि क्या भारत जैसे गरीब देश में जहाँ आज भी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा बेहद गरीब है, बुलेट ट्रेन से लेकर निजी मोटर गाडिय़ाँ निकट भविष्य में परिवहन का सर्व सुलभ, सुगम साधन बन पाएँगी जिनसे सफऱ करने में देश का हर नागरिक समर्थ होगा? जब तक ऐसा नहीं होता तब तक सर्व सामान्य लोगों के लिए परिवहन के हमने क्या विकल्प सोचे हैं? जब हमारी दिशा नकल पर तय होगी तो ऐसे सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे ।

परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ करने की देश की इस जद्दोजहद में वहीं दूसरी तरफ धीमी रफ़्तार से चलने वाला लेकिन अत्यधिक उपयोगी, सस्ता, स्थानीय परिवहन का सुरक्षित और भरोसेमंद साधन साईकिल रिक्शा है जिसकी वे भी उपेक्षा करते हैं जो इसकी सवारी का नियमित इस्तेमाल करते हैं। इसका लाभ लेते हुए भी हम इसकी उपयोगिता के प्रति अनजान और इसकी लगातार घटती संख्या के प्रति उदासीन बने हुए हैं। अब तो साइकिल रिक्शा धीरे-धीरे हमारी परिवहन व्यवस्था से हटाया ही जा रहा है। हमारे शहरों में बस जैसे बड़े सार्वजनिक वाहन की नगण्य उपस्थिति के बावजूद जिस तरह सड़कों पर छोटी मोटर गाडिय़ों की मिल्कियत स्थापित हो रही है, और साईकिल रिक्शा को सड़क पर जगह न देकर ज़बरन हटाया जा रहा है, उससे हमारी परिवहन व्यवस्था आम आदमी के लिए और ज्यादा कष्टपूर्ण ही होने वाली है। इस दौर में कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जानते-बुझते हुए भी यंत्रवत हम वह कर रहे हैं जो हमारे हित में नहीं। अप्रासंगिक लगने के बावजूद साईकिल रिक्शा के मामले को समझने के लिए इस दौर की दिशा को समझना होगा । मज़े की बात यह है कि दुनिया के अनेक विकसित देशों में साईकिल रिक्शे को नगरीय परिवहन व्यवस्था में वापस लाया जा रहा है । उदाहरण के तौर पर जर्मनी के बर्लिन शहर में ब्रेंडनबर्ग गेट जैसे मशहूर और भीड़भाड़ वाले पर्यटक स्थल, सिंगापुर के लिटिल इंडिया और यूएस के सैन डिएगो शहर के डाउन-टाउन जैसी प्रमुख जगहों पर लोग बड़े खुबसूरत सजे-सजाए साईकिल रिक्शा की सवारी करते देखे जा सकते हैं । वलर््ड बैंक से कर्ज लेकर आजकल हम जो चौड़ी सड़कें और फ़्लाइओवर बना रहे हैं उस पर साईकिल रिक्शा के लिए शायद ही कहीं जगह दी जा रही है क्योंकि यह हमारे यहाँ पिछड़ेपन की निशानी है और इस वजह से इसे गैर-ज़रूरी माना जाता है  दूसरी ओर वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन वाशिंगटन डीसी में साईकिल रिक्शा में बैठकर ऑफि़स आते हैं। आज भी छोटी दूरी के शहरी परिवहन के सार्वजनिक साधन के रूप में साईकिल रिक्शा जैसा पर्यावरण को रत्ती भर भी नुकसान न पहुँचाने वाला कोई विकल्प हमारे पास नहीं है । लोगों में ई-रिक्शा या बैट्री रिक्शा को साईकिल रिक्शा के बेहतर विकल्प के रूप में स्थापित किया जा रहा है, लेकिन जहाँ तक प्रदूषण का सवाल है तो ई-रिक्शा को बैट्री चार्ज करने के लिए बिजली का उपयोग करना होता है और यह बिजली कहीं न कहीं पर्यावरण को प्रदूषित करके ही उत्पादित होती है। मनुष्य की शारीरिक उर्जा से चलने के कारण साईकिल रिक्शा की रफ़्तार की तो सीमा है, पर यह सवारी भारत और इस जैसे गरीब देशों में अब भी इतनी उपयोगी है कि इसका सड़कों पर बना रहना ज़रूरी है। भारत की बड़ी जनसंख्या अब भी गरीब है और स्थानीय परिवहन के लिए जिनके पास निजी साधन नहीं, तो निर्धारित एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की ज़रूरत पडऩे पर साईकिल रिक्शा सर्वाधिक उपयोगी है। यही नहीं साईकिल रिक्शा बेरोज़गारों, खेतिहर मज़दूरों, विस्थापितों और गरीब प्रवासियों  को ज़रूरत पडऩे पर तत्काल अंशकालिक या  पूर्णकालिक रोज़गार उनकी सुविधानुसार उपलब्ध कराता है । गरीब बेरोज़गारों को रोज़गार मुहैया कराने और पर्यावरण की रक्षा करने के अलावा निर्धारित रूट पर चलने की बाध्यता न होने के कारण और लगभग हर जगह उपलब्ध होने के कारण साईकिल रिक्शा लोगों को (अक्सर काफ़ी सामान के साथ भी) एक जगह से उनकी मजऱ्ी के मुताबिक़ दूसरी जगह ले जाने की सुविधा देता है । सवारी और सामान एक साथ ढो आसानी से मिल जाने वाला विकल्प है। दिव्यांगों और वृद्धों, जिनके लिए कुछ दूर चलकर सवारी पकडऩा या सवारी से उतरकर अपने गंतव्य तक चलना काफ़ी कष्टसाध्य होता है, के लिए तो साईकिल रिक्शा बेहद उपयोगी है। याद करें तो पाएँगे कि हमने जब भी साईकिल रिक्शा की सवारी की तब हमारे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था । साईकिल रिक्शा छोटी दूरी तय करने वाली कई तरह की सवारियों का विकल्प है पर इसका कोई विकल्प नहीं है । वैसे भी साईकिल रिक्शा को बचाने की क़वायद न तो कोई भावनात्मक मुद्दा है और न ही किसी परम्परा को बचाने की कोशिश, बल्कि यह शुद्ध रूप से हमारी ज़रूरत है क्योंकि देश के करोड़ों गरीब और बेरोज़गार लोगों को रोज़गार देना और पर्यावरण की रक्षा हमारे सामने आज भी बहुत बड़ी चुनौती है । ऐसे में साईकिल रिक्शा को हटाना बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसला तो नहीं होगा ।

कई प्रगतिशील विचारों और गरीबों के पक्षधर लोग भी साईकिल रिक्शा का इसलिए विरोध करते हैं कि एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को ढोना उन्हें अमानवीय लगता है। यह एक हद तक सही बात लगती है पर जब तक देश में रोज़गार के इससे बेहतर और पर्याप्त विकल्प उपलब्ध नहीं हो जाएँगे तब तक एक भूखे इंसान को अपने श्रम से पेट भरने के किसी भी अवसर से वंचित करना क्या उचित होगा? इस दुविधा से मुक्त होने के लिए और साईकिल रिक्शा की गति बढ़ाने की ज़रूरत को समझते हुए इसमें मोटर लगाने की बात भी अक्सर चर्चा में आती है । पर इसका दूसरा पहलू यह है कि मोटर लगते ही इसकी प्रदूषण रहित वाहन होने की विशेषता समाप्त हो जाएगी, साईकिल रिक्शा जैसे वाहनों की इस बढ़ते प्रदूषण के दौर में बेहद ज़रूरत है। सबसे बेहतर रास्ता तो यह होगा कि साईकिल रिक्शा में ऐसे तकनीकी बदलाव किए जाएँ कि बगैर मोटर और कम श्रम से ही इसकी गति बढ़ जाए । साईकिल रिक्शा के भविष्य में सड़कों पर टिके रहने के लिए कानूनी संरक्षण के साथ-साथ यह बदलाव अहम है ।

साईकिल रिक्शा की मुश्किल यह है कि जब किसी नगर प्रशासन को अपने शहर की आधुनिक और चमचमाती छवि बनाने की सूझती है तो शहर में नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने का मुश्किल काम करने की बजाय और इस बात की परवाह किए बगैर कि लोगों को कितनी असुविधा होगी या कितने रिक्शा चालकों के लिए रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा, साईकिल रिक्शा को सड़कों से हटाने जैसे क़दम सबसे पहले उठाए जाते हैं । दरअसल अब भी हमारे यहाँ शारीरिक श्रम, उससे जुड़े कामों और श्रमिकों के लिए पर्याप्त और उचित सम्मान देने का वैसा नज़रिया विकसित नहीं हो पाया है, जैसा कि दुनिया के ज़्यादातर देशों में है, इसका ख़ामियाज़ा साईकिल रिक्शा और इस तरह के अन्य श्रमसाध्य रोज़गार और इनमें लगे लोगों को उठाना पड़ता है । भारतीय समाज में साईकिल रिक्शा चालक की उपेक्षापूर्ण स्थिति और उसके आमतौर पर असंगठित होने की वजह से वह न तो अपने वजूद की लड़ाई लड़ पा रहा है और न ही उसकी बात कोई सुनता है । साईकिल रिक्शा को बचाने का एक ही उपाय दिखता है कि इसको और इससे जुड़े लोगों को कानूनी संरक्षण दिया जाए ।

अभी साईकिल रिक्शा के लिए कोई ऐसा समग्र कानून नहीं जो इसके हर पहलू को ध्यान में रखकर बनाया गया हो और वर्तमान दौर के अनुरूप हो । शहरी स्तर पर कहीं-कहीं कोई कानून है भी तो वे बेहद पुराने और अप्रासंगिक हो चुके हैं । सरकारों का आमतौर पर इसके प्रति अभी जो नज़रिया है उसमें उनसे ख़ुद पहल कर इसके लिए कोई कानून बनने की अपेक्षा नहीं की जा सकती । ऐसे में एक ही रास्ता बच जाता है कि जन-भागीदारी से साईकिल रिक्शे के कानून का मसौदा तैयार किया जाए और उसे विधायिका से पारित कराने का प्रयास हो। कानून निर्माण की यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, लंबा समय लेती है, धैर्यपूर्वक चलानी होती है, पर यह हमारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रावधानों के सर्वथा अनुरूप है और इससे उन्हें मज़बूती ही मिलेगी। ज़्यादातर कानूनों के ड्राफ़्ट बंद कमरों में ही बनाए जाते हैं और अक्सर अपर्याप्त या बगैर चर्चा के ही सदन में पारित हो जाते हैं, जिसकी वजह से वे त्रुटिपूर्ण होते हैं और आमजन में स्वीकार्य नहीं होते। उसके बजाए जन-भागीदारी द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया सरकारी प्रक्रिया से ज्यादा व्यापक होने के कारण जनपक्षीय और न्यूनतम त्रुटि वाली नीति और कानून बनाने के विकल्प को सशक्त करेगी । वैसे ‘सूचना का अधिकार कानून-2005 भी एक जन-पहल का ही परिणाम है जो चंद लोगों की बहुत ही मामूली सी पहल के तौर पर 1987 में राजस्थान में शुरू होकर एक व्यापक आंदोलन की शक्ल में बदल गया और आखिर में 18 साल के बाद उसे इस कानून को बनाने में सफलता मिली ।

दिल्ली में सांस लेना दूभर

देश की राजधानी दिल्ली जहां प्रदूषण बहुत ज्य़ादा है दीपावली पर बजे पटाखों से प्रदूषण की मात्रा में दस गुणा बढ़ोतरी और हुई। प्रदूषण रोकने में सुप्रीम कोर्ट के आदेश विभिन्न मौसम और पर्यावरण वैज्ञानिकों व डाक्टरों के सुझाव पूरी तरह नाकाम रहे।

राजधानी दिल्ली और आसपास के प्रदेशों की राजधानियों और बड़े शहरों में पटाखों को रोकने में पुलिस-प्रशासन और सरकारों ने कहीं कोई सक्रियता नहीं दिखाई। बड़ी तादाद में दिल्ली, गाजियाबाद, गुडग़ांव, चंडीगढ़, जयपुर, कानपुर, लखनऊ में अधेड़ों और बच्चों सांस लेने में हो रही परेशानी के कारण नर्सिग होम और अस्पतालों में शरण ली। इस प्रदूषण का असर दिल्ली में अगले तीन चार दिन और ज्य़ादा व्यापक रहा।

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में दीवाली में हुए प्रदूषण का स्तर वायु गुणवत्ता इंडेक्स आपात स्थिति 642 पर पहुंच गया। इस प्रदूषण में दबाते हुए पटाखें का रासायनिक मिश्रण पंजाब और दूसरे राज्य के खेतों मेें जलती हुई पराली और धुंए का खासा मिश्रण था। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि दीवाली की रात दो घंटे ही यानी दस से बारह बजे तक ही पटाखे जलाए जाएं। लेकिन उसकी अनसुनी हुई। भोर तक पटाखे बजाए जाते रहे। देश के अन्य नगरों में दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता में भी दीवाली काफी शोर भरी रही।

दीवाली की परंपरा दीप जलाने और प्यार बांटने की रही है। लेकिन इस परंपरा में बाद में जुड़ी आतिशबाजी के चलते विविध प्रकार के पटाखों को बनाने और उनमें रंगीन प्रकाश और धमाकों को भी जोड़ दिया गया। अब तो विविध राकेट के जरिए आकाश में विविध रंगों के प्रकाश और धमाकों का अंबार लगाने की कला दीवाली पर दिखती है। लेकिन ये सारी अद्भुत कलाएं वायुमंडल में घातक प्रदूषण भी फैलाती हैं जो महीनों वायुमंडल में रहता है। इसका प्रभाव मानव शरीर पर दमा, खांसी-जुकाम, सांस लेने में परेशानी में दिखता है और फेफड़ों तक बर्बाद कर देता है। लेकिन मानव शरीर पर इस प्रतिकूल असर के बारे में राज्य सरकारें न तो चिंतित हैं और न जन प्रतिनिधि। बल्कि वे प्रदूषण रोकने की बजाए जनता में इसे परंपरा और आस्था से जोड़ कर जनमानस को भरमाते हैं। इसी कारण न तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश माने गए और न जनता ने वायु प्रदूषण को गंभीरता से ही लिया।

शोर भरी एक रात पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिल्ली की औसत वायु गुणवत्ता (एवरेज एअर क्वालिटी इंडेक्स) जारी की है। यह 329 था जो काफी घातक स्तर का है। इसी तरह सिस्टम आफ एअर क्वालिटी एंड वेदर फार कास्टिग एंड रिसर्च यानी ‘सफर’  के अनुसार दिल्ली-एनसीआर के हालात तो निर्धारित मापदंडों से कहीं ज्य़ादा खराब हैं।

स्थानीय हो विकास की भाषा

उत्तराखंड की यमुना घाटी में सुपिन नदी पर प्रस्तावित जखोल-साकरी जलविद्युत परियोजना (44 मेगावाट) की जनसुनवाई 12 जून, 2018 को घोषित होने के बाद लोगो को जानकारी न होने के कारण से रद्द करनी पड़ी थी। इसकी पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंधन योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट 650 पन्नों की हैं।

उत्तराखंड के कुमाउं क्षेत्र में प्रस्तावित पंचेश्वर बहुउद्देश्यी परियोजना के लिये 9 अगस्त 2017 को चम्पवात, 11 अगस्त 2017 को पिथौरागढ़ और 17 अगस्त 2017 को अल्मोड़ा जिले में साल के सर्वाधिक 277.7 मिलीमीटर बारिश वाले अगस्त महीने 2017 में जनसुनवाइयों का आयोजन किया गया। जबकि संबधित जिलों में बारिश के कारण विद्यालयों को बंद करने का जिलाधीश का कठोर आदेश था। किन्तु फिर भी वहंा भारी सुरक्षा बलों, सत्ताधारी दल के नेताओं व प्रशासनिक अमले के दवाब में तनावपूर्ण व असुरक्षित माहौल में, बंद सभागारों में प्रभावित गांवों से 30 से 45  किलोमीटर से दूर जनसुनवाइयां करवा ली गई। इसे प्रशासन ने जीत के रूप में दर्ज किया था।

ऐसी परिस्थिति सभी बांध परियोजनाओं की जनसुनवाइयों में रही है। तीन सितंबर 2005 में पाला मनेरी बांध भागीरथी नदी पर प्रस्तावित था जनसुनवाई आयोजित की गई थी। लोगों ने जनसुनवाई में जाकर अपना विरोध जताया कि उनको सभी कागजात हिंदी में मिलने चाहिए। तब से लगातार माटू जनसंगठन व अन्य स्थानीय संगठन व लोग उत्तराखंड में विभिन्न जनसुनवाइयों में इस मुद्दे को उठाते रहे हैं।

हिमाचल में भी सतलुज नदी, पार्वती नदी सैंज नदी पर बने बांधों की जनसुनवाइयों के उदाहरण भी सामने हैं। जनसुनवाइयों में लोगो ने यह मांग रखी कि उनको सब कागजात उनकी भाषा में देकर समझाये जायें।

बड़े बांध सहित सभी परियोजनाओं के लिये पर्यावरण स्वीकृति और वन स्वीकृति लेनी आवश्यक होती है। वन स्वीकृति के लिये लोगों से नही पूछा जाता है। पर्यावरण स्वीकृति के लिये ही जनसुनवाई का आयोजन होता है। सुनवाई एकमात्र वो खुला मंच होता है जहंा बांध प्रभावित अपनी बात कह सकते हैं। परियोजना का कोई भी स्थायी कार्य पर्यावरण स्वीकृति से पहले नही हो सकता हैं इसलिए सरकार व परियोजना प्रयोक्ता की किसी भी तरह से जनसुनवाई कि कागजी कार्यवाही पूरी करने की कोशिश होती है। प्रभावितों को कोरे लाभों के सपने दिखाकर किसी तरह पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त कर लें और काम चालू कर लें फिर बाकी सब देखा जायेगा।

किसी भी परियोजना के बारे में प्रभावितों को संपूर्ण जानकारी मिलना बहुत आवश्यक है। ऐसा न होने से परियोजना के निर्माण में भी समस्या आती है और परियोजना निर्माण के बाद भी समस्याएं आती हैं। संभवत इसी कारण से 1994 में पर्यावरण प्रभाव आकलन की प्रक्रिया चालू की गई। उसमें खास करके जनसुनवाई की प्रक्रिया को जोड़ा गया। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) 15 सितम्बर, नोटिफिकेशन 2006 में निकला जिसमें  पर्यावरण प्रभाव आकलन व उसके प्रबंधन की योजना बनाने की प्रक्रिया की विस्तृत विवेचना की गई। इसमें भी कई बदलाव किए गये। इस प्रक्रिया को बनाने के कारण महत्वपूर्ण थे। आज टिहरी बांध की समस्याएं अभी तक नहीं सुलझी हैं क्योंकि लोगों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि बांध बनेगा तो क्या होगा देशभर में ऐसे हजारों बांध और अन्य विकास परियोजनाएं बनी है। जिनके बारे में स्थानीय लोगों को जानकारी पहले नहीं दी गई और नतीजे हुए पर्यावरण की बर्बादी और इससे प्रभावित लोगों को अनसुलझी समस्याएं सामने है। ऐसा सभी बांधों में है इसीलिये अनेको आंदोलनों के बाद पर्यावरण प्रभाव आकलन की प्रक्रिया चालू की गई थी।

पर्यावरण प्रभाव आकलन नोटिफिकेशन बनाने के पीछे शाब्दिक और आत्मिक उद्देश्य रहा है कि परियोजना के बाद आने वाली समस्याओं को पहले ही सुलझा लिया जाए। परियोजना के निर्माण में और परियोजना बनने के बाद पर्यावरण व प्रभावितों को समस्याओं का सामना न करना पड़े। ईआईए नोटिफिकेशन में जनसुनवाई का प्रावधान इसीलिए रखा गया था ताकि प्रभावित परियोजना को पूरी तरह समझ पाए।

मगर पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंधन योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट सब कुछ अंग्रेजी में ही होता है। भारत सरकार बनाम विमल भाई व अन्य के केस में 7 फरवरी 2007 में राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के आदेश के बाद ग्राम स्तर पर पर्यावरण पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंधन योजना आदि का जो संक्षिप्त रूप, स्थानीय भाषा में लोगों को दिया जाता है। किन्तु वह भी बहुत कमजोर होता है कि उसमें मात्र बांध के लाभ ही बताए जाते हैं, पूरी प्रक्रिया में बांधों के पूरे प्रभावों को छुपाया जाता है, बांध बनाने की आवश्यकता, देश को ज़रूरत, राज्य को मुफ्त बिजली, लोगों को बहुत सा रोज़गार, क्षेत्र में खुशहाली जैसी तथ्यहीन बातों को प्रचारित किया जाता है।

स्थानीय प्रभावितों को पूरी तरह विश्वास में तभी लिया जा सकता है जब उनको उनकी भाषा में इन कागजातों की पूरी जानकारी दी जाये और समझाई जाये। तभी वे अपनी सही राय जनसुनवाइयों में रख सकेंगे।

प्राय: बांध सहित बड़ी परियोजनाएं दूरस्थ इलाको में बनती है जहां आने जाने के लिए साधन नहीं होते, अखबारों के पहुंचने की तो बात ही नहीं होती। जनसुनवाई की सूचना मात्र औपचारिक रूप से किसी अखबार में एक छोटे से विज्ञापन के द्वारा दी जाती हैं। जो उस इलाके में पहुंचता भी नहीं है। सभी कागजात अंग्रेजी में होते हैं कागजातों का संक्षिप्त रूप ग्राम प्रधानों को दिया जाता है वह इस भाषा में होता है कि लोग उसको भी नहीं समझ पाते। पर्यावरणीय जन सुनवाई होती क्या है ? उसके असर क्या है? उसमें लोगों के अधिकार क्या हैं? यह बात प्रभावितों तक कभी नहीं बताई जाती है। मात्र नोटिफिकेशन 2006 के शब्दों का पालन कागजी रूप में किया जाता है। जिस कारण से लोग न तो परियोजना के बारे में जान पाते हैं न उसके अवसरों को समझ पाते हैं जिसका परिणाम वह आने वाले समय में लगातार झेलते हैं।

लोगों को उनकी भाषा में जानकारी उपलब्ध कराने से हुये लाभों का एक सकारात्मक उदाहरण हिमाचल के कुल्लू जिले में 2003 में अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पैसे से बनी एलाइन दुहंगन परियोजना है। जहां लोगो ने विरोध किया तो सभी कागजात लोगो को हिन्दी दिये गये तथा प्रभावितों को स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा समझाये भी गये। इसके कारण प्रभावितों के अधिकार भी मजबूत हुये और पर्यावरण संरक्षण पर भी कई काम हो सके।

इस कारण आवश्यकता है पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006 में इन बातों को शामिल किया जाये-

  1. पर्यावरण प्रभाव आकलन, समाजिक प्रभाव आकलन व प्रबंध योजना रिपोर्ट सरल स्थानीय भाषा में प्रभावितों को समझायी जाए जिसके लिए पर्यावरण सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली निष्पक्ष संस्था को जिम्मेदारी दी जाए।
  2. पर्यावरण प्रभाव आकलन, समाजिक प्रभाव आकलन व प्रबंध योजना रिपोर्टे का संक्षिप्त रूप भी सरल स्थानीय भाषा में होना चाहिये।
  3. जन सुनवाइयों का समय स्थानीय मानसून को देखते हुये ही रखा जाये।

विकास की भाषा यदि भारत में आज भी अगर ऐसी रखी गई हो जिसे लोग समझ ही न पायें। तो ये हमारे लोकतंत्र को चलाने वालों पर बड़ा प्रश्न है। जब वोट हर भाषा में मंागे जाते है। तो फिर देश के विकास की भाषा भी लोगों की समझ वाली भाषा ही हो। जिससे वो

विकास की तस्वीर गढ़ सके, अपनी सही भागीदारी कर सकें।

आतंकियों का ‘प्रवेश द्वार’ बना लोकतंत्र का ‘गेटवे’

कश्मीर में आतंक यानी ”बुलेट” हमेशा से ”बैलेट” की दुश्मन रही है। लेकिन इसके वाबजूद लोग लोकतंत्र के लिए जान की परवाह भी नहीं करते और गोली के सामने लोकतंत्र का ध्वजवाहक होकर खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सली बहुल इलाके में विधानसभा के पहले चरण के मतदान में भी लोगों ने ऐसी ही हिम्मत दिखाई थी।

यह कोइ पुरूस्कार लेने के लिए नहीं है इसलिए इन लोगों की हिम्मत को सैल्यूट। अब बात कश्मीर की है। कुपवाड़ा दशकों से आतंकवाद का गढ़ रहा है। स्थानीय निकाय के चुनाव में इस आतंकवाद ग्रस्त इलाके ने बहादुरी दिखाई थी। आतंकवादियों की वोट डालने पर खबरदार वाली धमकी लोगों के सामने थी। अलगाववादियों ने भी चुनाव बायकाट का ऐलान कर रखा था। जाहिर है कौन और क्यों वोट डालने जाता। लेकिन कुपवाड़ा ने बुलेट की धमकी के सामने बैलट का झंडा उठाया था – पूरी हिम्मत के साथ।

करीब एक महीना पहले हुए स्थानीय निकाय के उस मतदान में पूरे कश्मीर में सबसे ज्यादा वोट कुपवाड़ा में ही पड़े थे। कोइ २५- ४० परसेंट नहीं पूरे ६५ परसेंट। जिस कश्मीर में कहीं ५ तो कहीं ७ परसेंट ही वोट पड़ें, वहां मतदान का यह बड़ा प्रतिशत बहुत सुकून देता है और उस कश्मीर की याद आती है जब वहां सुकून था। गोलियां नहीं बरसतीं थीं और केसर और सेब की खुशबू नथनों में महकती है। महकती अब भी है लेकिन वो बात कहाँ।

आज का शनिवार फिर लोकतंत्र का ध्वजवाहक बना है – कश्मीर में। कश्मीर के कुपवाड़ा में। कुपवाड़ा, जिसे आतंकियों का प्रवेश द्वार कहा जाता है। सूबे में पंचायत चुनाव का पहला चरण है आज। जम्मू  कश्मीर में चुनाव दुनिया भर के मीडिया के लिए बड़ी खबर रही है। और आज की बड़ी खबर यही है कि आतंक के इस प्रवेश द्वार में आज लोकतंत्र जश्न मन रहा है। बुलेट नतमस्तक है। लोग सीना ताने खड़े हैं।

अपने पास ११ बजे तक के आंकड़े हैं। कुपवाड़ा में ८५ पोलिंग लोकेशंस हैं। कुल तीन ब्लाक हैं जिसमें ३३१४२ वोटर हैं। सुबह ९ बजे तक इन ८५ मतदान केंद्रों पर १२५९ वोट पड़ गए थे। १० बजे यह आंकड़ा १२,१०४ वोट हो गया। और ११ बजे २७,०४१ वोट मतपेटी में पड़े लोकतंत्र का गीत गा रहे थे। शायद अगला आंकड़ा जब ”तहलका” तक पहुंचे तो लोक तंत्र के संगीत ध्वनि और ऊंची और मधुर हो चुकी हो।

यह भी बता दें इन ११ बजे तक श्रीनगर में २१३, गंदरवाल में ९१, बड़गाम में १५४६, बारामुला में ६९७०, हंदवाड़ा में ४८९१, बांडीपोरा में १३४१, सोपोर में ८५० वोट पड़े थे। लेह, जहाँ सौभाग्य से आतंक का साया नहीं वहां १२५८ और कारगिल में १६८० वोट पड़े थे।

कुपवाड़ा के लोकतंत्र प्रेमी और बहादुर लोगों को सलाम। वैसे इन पूरे इलाकों में ११ बजे तक कुल मतदाताओं १,६१,६८० में से २९,९७९ मतदाताओं ने वोट डाला था और इसमें से अकेले कुपवाड़ा ने २७,०४१ वोट डाले थे।

जम्मू कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार एसपी शर्मा से तहलका ने इसे लेकर बात की। उन्होंने कहा – ”हाँ यह दिलचस्प है और चुनाव का वहिष्कार करने वालों के लिए बड़ा झटका भी। बन्दूक के खौफ के आगे वोट को तरजीह देना हिम्मत की बात तो है ही।”

शोपियां में तीन लड़कों का अपहरण

कश्मीर में तीन युवा लड़कों का अपहरण कर लिया गया है। ”तहलका” की जानकारी के मुताबिक यह कश्मीर के शोपियां इलाके की घटना है और इन लड़कों का अपहरण शनिवार को किया गया है।

जानकारी के मुताबिक अभी इस सम्वन्ध में और कोइ जानकारी नहीं मिली है की इस घटना के पीछे किसका हाथ है। माना जा रहा है कि इसके पीछे आतंकियों का हाथ हो सकता है।

ख़बरों के मुताबिक इसी इलाके में दो दिन पहले भी एक लड़के का अपहरण कर किया गया था जिसकी बाद में गोलियों से छलनी शव मिला था। माना जा रहा है कि इस लड़के का भी आतंकियों ने ही अपहरण कर उसकी हत्या कर दी थी।

अब तीन लड़कों के अपहरण के बाद सुरक्षा बल इलाके में उनकी खोज कर रहे हैं। आशंका जताई जा रही हैं कि आतंकियों ने इन तीन लड़कों का अपहरण उनके पुलिस का क्जब्री होने के शक में किया है। आतंकी इलाके में लोगों को धमकियाँ देते रहे हैं कि वे पुलिस या सुरक्षा बालों को उनकी गतिविधि के बारे में कोइ भी  सूचना देने से बचें।

कांग्रेस के ‘वचन पत्र’ के जवाब में भाजपा का ‘दृष्टि पत्र’

मध्य प्रदेश भाजपा ने शनिवार को विधानसभा चुनाव के लिए अपना ”दोहरा” घोषणा पत्र (महिलाओं के लिए अलग) जारी कर दिया। इसे दृष्टि पत्र का नाम दिया गया है। इसमें लोक लुभावन के लिए कई वाडे किये गए हैं और मुख्यमनत्री शिव राज चौहान ने कहा है कि ”रोटी, कपड़ा और मकान” आम आदमी को देना हमारा सपना है। कांग्रेस ने प्रदेश में अपने घोषणा पत्र को ”वचन पत्र” का नाम दिया है।

दृष्टि पत्र जारी करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भाजपा ने विकास का रोडमैप और समृद्ध मध्य प्रदेश की तस्वीर पेश की है। मुख्या वादों में किसानों को बोनस का लाभ देना, कृषि संबंधी गतिविधियों के लिए शक्ति स्वरूपा कार्य बल योजना बनाना, क्षणों को सीधा पैसा कहते में डालना, छोटे किसानों के कहते में सीधा बोनस, मेधावी छात्रों को प्रत्साहन आदि शामिल हैं।

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। ‘दृष्टि पत्र’ के नाम से बीजेपी का घोषणा पत्र जारी किया गया है। महिलाओं के लिए अलग घोषणा-पत्र को ”नारी शक्ति संकल्प पत्र” नाम दिया गया है।

घोषणा पत्र जारी करने के मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह,  केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। यह पहला मौका है जब भाजपा ने किसी चुनाव के लिए दो घोषणा-पत्र जारी किये हैं। मध्य प्रदेश में १५ साल से सत्ता पर काबिज भाजपा अपना सिंहासन बचाने में लगी हुई है।

पंचकूला : एक ही परिवार के चार की हत्या

हरियाणा के पंचकूला के एक गाँव में शुक्रवार रात एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या की खबर है।  तहलका की जानकारी के मुताबिक जिन चार लोगों की हत्या की गयी है उनमें एक बुजुर्ग और तीन बच्चे शामिल हैं।

जानकारी के मुताबिक यह शुकर्वार्त रात को हुई घटना है। पुलिस ने पंचकूला के खटोली गाँव में एक घर से चार लोगों के शव बरमाद किये हैं। यह सभी एक ही परिवार के हैं और इनमें बुजुर्ग महिला राजबाला (६५) के अलावा उसके तीन पोते-पोतियां शामिल हैं।

इन बच्चों में में एक की उम्र करीब १८ साल, दूसरे की १४ और तीसरे की १२ साल के करीब है। यह हत्याएं किसने और क्यों कीं इसकी जांच में पुलिस जुटी हुई है।

जानकारी के मुताबिक पुलिस फॉरेंसिक विभाग के विशेषज्ञों को साथ लेकर गयी है। अभी तहकीकात चल रही है और कोइ गिरफ्तारी नहीं हुई है। गाँव में इतनी हत्याओं की  दिल दहला देने वाली घटना के बाद दहशत और दुःख का माहौल है।

यह घटना पंचकूला से करीब १४ किलोमीटर दूर के खटोली गावँ की है। पुलिस को पता चला कि एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या कर दी गयी है तो वह मौके पर पहुँची। पुलिस ने बताया कि जांच की जा रहे है और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा रहा है।