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अब नियमित छानबीन होगी आश्रय स्थलों की

परिवार से छूट गए बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए देश भर में आश्रय स्थलों की नियमित जांच पड़ताल ज़रूरी है। केेंद्र सरकार ने बिहार में मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश में देवरिमा के सारे अनाथालय, मूक बहरे और दृष्टि बाधित लोगों के लिए बने आश्रय स्थलों में यौनशोषण, खान-पान-परिधान में और ठीक-ठाक तरह से न रखे जाने की नियमित जांच के लिहाज से सामाजिक ऑडिट कराने के आदेश जारी कर दिए हैं। पूरे देश में लगभग नौ हज़ार से ऊपर आश्रय स्थल हैं। सांसदों को भी निर्देश हैं कि वे अपने इलाके के ऐसे स्थलों की छानबीन कर रिपोर्ट भेजें जिससे कार्रवाई हो।

केंद्र सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मंगलवार (7 अगस्त) को यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि नेशनल कमीशन फार प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) से कहा गया है कि अगले दो महीने में सभी बाल सुरक्षा संस्थानों की पूरी छानबीन करके रिपोर्ट भेजी जाए। यह रिपोर्ट अक्तूबर तक जमा की जानी है।

जांच के दौरान बच्चों की कुल सुरक्षा, बिस्तर, खाने-पीने परिधान की व्यवस्था पर जानकारी ली जाए और जो वहां काम करते हैं और जो संचालक प्रबंधक सेवादार हैं उनकी क्या पृष्ठभूमि रही है साथ ही बच्चों की क्या स्थिति है। उन्नीस पेज के इस पत्र को केंद्र ने सुप्रीमकोर्ट को अक्तूबर 2015 में दिया भी था जब तमिलनाडु के एक अनाथालय से बच्चों के साथ भावनात्मक, यौनिक और शारीरिक छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आई थीं।

व्यवस्था बनाने वाले ही उन्हें तोडऩे वालों में सबसे आगे होते हैं। वे आत्मिक, शारीरिक, सामाजिक राजनीतिक लाभ पाने के लिए पूरे सिस्टम को तोड़ते हैं और सिस्टम की गड़बडिय़ों की आड़ लेते हैं। मुजफ्फपुर में आश्रय स्थल में जो कुछ बरसों से चलता रहा उसे बिहार सरकार सिस्टम का दोष बता कर नहीं बच सकती। सरकार का काम प्रदेश के सताए हुए लोगों को सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाने का होता है। जिसे सरकारें अमूमन नहीं करतीं।

मुजफ्फरपुर के एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति में रह रहे लोगों के साथ जिस तरह का रख रखाव रहा और शारीरिक शोषण का सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी रहा वह किसी भी सांस्कृतिक विरासत वाले सभ्य समाज के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। इसे सिस्टम का दोष बताने वालों को भी संदेह केदायरे में रखा जाना चाहिए।

खबरों के अनुसार इसे और चार अन्य आश्रम स्थलों को चलाने वाला कथित पत्रकार है और उसे केंद्र और राज्य से सालाना एक करोड़ रु पए की राशि मिलती थी। आश्रय स्थल की रहवासियों को जिस तरह के फटे-पुराने कपड़े पहनाए जाते थे और वहां के कर्मियों का उनके प्रति जिस तरह का व्यवहार था वह संदेह ही बढ़ाता है। इस कथित पत्रकार के मुख्यमंत्री के साथ और अन्य विभूतियों के साथ फोटो हैं। स्पष्ट है कि जिले के तत्कालीन कलेक्टर के और विभिन्न विभागों के अधिकारी उसे लाभ लेंगे और लाभान्वित होंगे।

बिहार एक ऐसा उन्नतिशील राज्य माना जाता है जहां चुनावों में महिलाओं की तादाद पुरु षों की तुलना में ज्य़ादा होती है। प्रदेश मुख्यमंत्री ने बड़े परिश्रम से खुद को विकास पुरु ष का तमगा दिलाया लेकिन इस घटना से उस पर अब सवालिया निशान लग गए हैं। जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे यानी 2005 से 2010 के दौरान उन्होंने महिला मतदाताओं को आज़ादी का स्वाद चखाया था। पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में पचास फीसद सीटें महिलाओं के लिए नियत की गईं। उन्होंने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना का शुभारंभ किया। तमाम कमियों के बाद भी ये योजनाएं पूरे देश में चर्चा का विषय रहीं। इसी तरह उन्होंने राज्य सरकार की नौकरियों में पैंतीस फीसद रोजगार रिजर्व कराया, बालविवाह और दहेज के खिलाफ उनकी बातें सराही भी गईं।

लेकिन ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री के फैसलों को उन्हीं की नौकरशाही और सिस्टम के लोग नाकाम करने में जुटे रहते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि एक-दूसरे पर चेक-बैलेंस का अभाव। मुजफ्फरपुर में जो घटना हुई है वह अभावग्रस्त लोगों का ज्य़ादा संपन्न लोगों द्वारा शोषण है जिस पर यदि ठीक तरह से सरकारी एजेंसियां नज़र रखतीं तो शायद इतना घृणित काम मानवता के नाम पर न हो पाता।

यह वाकई अच्छा प्रयास है कि केंद्र सरकार ने पूरे देश के तमाम तरह के नौ हज़ार आश्रय स्थलों की जांच-पड़ताल कराने का आखिर फैसला लिया है। इसके लिए सुप्रीमकोर्ट को भी ज़रूरी सूचनाएं दी गई हैं। मई 2017 में सुप्रीमकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सामाजिक ऑडिट हर साल इसलिए कराया जाना चाहिए क्योंकि इससे ट्रास्पेरेंसी और जवाबदेही बनी रहती है साथ ही बाल अधिकार न्याय कानून के तहत नियमावली का पालन भी होता है या नहीं इसका पता चलता है।

देश में ज्य़ादातर आश्रय स्थलों का खर्च या तो केंद्र का महिला और बाल कल्याण विभाग उठाता है या फिर राज्य सरकारें और एनजीओ। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी का कहना है कि सभी आश्रय स्थलों को नियमों के अनुरूप केंद्र सरकार को ही चलाना चाहिए। उन्होंने बताया कि देश में नौ हज़ार से ज्य़ादा भी आश्रय स्थल हो सकते हैं जिसके बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है। इन सबको केंद्र के अधीन करना ज्य़ादा ज़रूरी है। हर राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए दस एकड़ की ज़मीन पर कांप्लेकस तैयार करना चाहिए तभी सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था संभव है। उन्होंने ने यह भी बताया कि वृंदावन में विधवाओं के लिए जिस तरह व्यवस्था की गई है उसी तरह की व्यवस्था हर राज्य में की जा सकती है। नियोजन फंड का भी इसमें इस्तेमाल हो सकता हैं।

उन्होंने कहा कि इस होम्स की नियमित चैकिंग बेहद ज़रूरी है क्योंकि बच्चों और महिलाओं को खास तरह की सुरक्षा की ज़रूरत पड़ती है। होम्स का साफ-सुथरा होना भी ज़रूरी है। सभी सांसदों को कहा गया है कि वे अपने इलाके के आश्रय स्थलों के बारे में जानकारी दें। जिससे निश्चित समय में कार्रवाई हो सके।

‘गौरव यात्रा’ में छीजता ”गौरव’’

साढ़े चार साल तक जनता से मुंह छिपाए रखिए, मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति से पीछे हटते रह कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सेवाओं का निजीकरण करते रहिए, औद्योगिक क्षेत्रों को मंदी की गिरफ्त से निकालने की जहमत मत फरमाइए, योजनाएं ठिठकती है तो बेपरवाह रहिए और मासूम बच्चियों से दरिन्दगी सरीखे कंपाने वाले अपराधों का ग्राफ बढ़ते रहने दीजिए यहां तक कि भ्रष्टाचार के बगूले भी धुंआधार तरीके से उठने दीजिए और जब जनता के मोहभंग की तपिश महसूस करने लगे और लुंज-पुंज सरकार चुनावी सियासत की दहलीज पर पहुंच जाए तो कुशासन पर सुशासन का ठप्पा लगाकर जनता से नजरें मिलाने के लिए भव्य यात्रा निकाल लीजिए। चुनावी चौसर पर खड़े मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारें ऐसा कर चुकी है और अब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इसी लीक पर चलते हुए ‘सुराज गौरव यात्रा’ निकाल रही है। वसुंधरा राजे को ‘सत्ता विरोधी रूझान’ को लेकर कोई ग्लानि नहीं है, क्योंकि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अमृत वचनों में आकंठ डूबी है कि, ‘सत्ता’ विरोधी रुझान बेपेंदे की बातें हैं और बातों का क्या? ऐसे सौ रुझानों को घोंटकर पी जाना चाहिए? अमित शाह ने राजनीति में एक नया मुहावरा गढ़ कर उस लीक को मिटा दिया कि,’सरकारें जनता से तब डरती है, जब जवाबदेही का मौका आता है?’’ अब जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह वसुंधरा राजे को इस शंका से ही मुक्त कर चुके हैं तो कैसा डर और कैसी हताशा? वसुंधरा को कोई डर अगर है तो यह कि,’जनता कहीं’ इस बात को समझ ना जाए जो उन्हें नहीं समझनी चाहिए, नतीजतन चालीस दिन की यह यात्रा मदारी के स्वांग सरीखी निकाली जा रही है ताकि नौटंकी देखने की उत्सुक गांव-ढाणियों की जनता उन्हें सुनने नहीं देखने को उमड़ती रहे और यह सब स्वफूर्त कहीं नहीं हो रहा बल्कि सरपंचों से लेकर जिला कलेक्टरों तक को यही काम सौंप दिया गया है कि सिर्फ भीड़ जुटाने के एक सूत्री काम में जुट जाएं। इस यात्रा के नाटकीय दृश्य हर कदम पर इसकी पोल खोलते नजर आते है…. वरिष्ठ पत्रकार श्री नंद झा की आंखन देखी को समझें तो, ‘वसुंधरा एक कठोर अनुशासनप्रिय प्रिंसिपल के स्वांग के साथ जब गौरव यात्रा के दौरान जनसमूह को संबोधित करते हुए सवालों की बौछार करती है तो उनके जवाब जिला कलेक्टर विधायक या अधिकारियों को ‘हां या ना’ में देना होता है लेकिन जवाब हां में ही हेाता। मसलन- क्या सिंचाई योजना की डीपी को अंतिम रूप दिया जा चुका है? क्या गांवों में सीमेंट की सड़कें बन चुकी हैं? इसके बाद राज्य सरकार की योजनाओं के चिन्हित लाभार्थियों को मंच पर बुलाया जाता है। आदिवासी क्षेत्र बांसवाड़ा जिले के घाटोल में मुख्यमंत्री ने कन्हैयालाल नामक व्यक्ति से ताबड़तोड़ सवाल पूछे, ‘क्या प्रधानमंत्री आवास योजना से आपको धनराशि मिली? क्या उज्जवला योजना से आपको गैस कनेक्शन मिला? क्या भामाशाह कार्ड मिला? जैसा कि पहले से तय होता है, वसुंधरा राजे को सारे जवाब हां में मिलते हैं।

इस यात्रा की प्रबंधन टीम पूरे मशीनी ढंग से काम कर रही है। पत्रकार श्री नंद झा कहते हैं, उस यात्रा के आलेख और विवरण बड़ी चतुराई से गढ़े गए हैं। लेकिन राजे के भाषणों में रचनात्मकता और मानवीय तत्वों का अभाव यात्रा की पोल खोल देते हैं। भले ही प्रदेश के ग्रामीण इलाके भाजपा के पोस्टर बैनर और झंडियों से अटे हुए हैं लेकिन लोग खेती-किसानी की विपदा, अभावों के दुख, गरीबी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नकारापन की शिकायतों को लेकर गहरी पीड़ा में डूबे हुए हैं। भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि,’ये लोग आखिर कैसे इस तमाशाबाजी को वोट देंगे?’’ यात्रा के दौरान नीरस भाषणों से ऊबे लोग अगर थोड़ा बहुत रीझे भी तो वो आध्यात्मिक मुद्दे थे, जब राजे ने भावजी महाराज,कालीबाई क्या गोविंदगुरू सरीखे स्थानीय शूरवीरों को याद किया। इस व्यक्ति केन्द्रित यात्रा में भाजपा के नए अध्यक्ष मदनलाल सैनी तो कहीं नजर ही नहीं आते? और यात्रा के संयोजक गुलाब चंद कटारिया भी उपेक्षित ही रहे? राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि, ‘इस सुराज गौरव यात्रा में सुराज की छाया तो कहीं भी नजर नहीं आती? क्या महाराणा प्रताप, पन्नाधाय और गोरा बादल सरीखे शूरवीरों के बलिदान को याद करने भर से जनता के दुख-दर्द का समाधान हो जाएगा?

अलबत्ता इस यात्रा को खरोंचने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के चालीस सवालों की लड़ी सुराज का सांचा उधेड़ती नजर आती हैं। उदाहरण के लिए, ‘भाजपा सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन के कारण पिछले चार सालों में प्रदेश 2 लाख 29 हजार करोड़ के कजऱ्े में डूब गया? प्रदेश का राजकोषीय घाटा भी नियंत्रण से बाहर हो गया? नतीजतन सरकार का वित्तीय संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा चुका है। ऐसे में प्रदेश में निजी निवेश तो खटाई में पड़ ही गया? मुख्यमंत्री ने उद्योग धंधों को चौपट होने दिया और कोई भी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए? पायलट का इस सवाल का उनके पास क्या जवाब है कि,’महिला अपराधों में देश में चौथे स्थान पर रहने के बाद भी क्या प्रदेश की महिला मंत्री को गौरव महसूस होता है?

चुनाव पूर्व अपनी प्रदेशव्यापी यात्रा के दौरान वसुंधरा राजे ने जहां भी भाषण दिए, कुल मिलाकर एक ही बिन्दु पर केन्द्रित रहे कि, ‘अगर राज्य के मतदाता किस भी सरकार को उसका एक कार्यकाल समाप्त होने के बाद अस्वीकार कर देंगे तो नए राजस्थान के निर्माण का काम थम जाएगा।’ उनके इन भाषणों के पीछे अंदेशा साफ झलक रहा था कि,’चुनावी माहौल में सत्ता विरोधी रुझान का डर उन पर पूरी तरह हावी है।’’ विश्लेषकों का प्रति प्रश्न है कि,’अगर सरकारें अपने पूरे कार्यकाल में जनता की उम्मीदों की कसौटी पर खरी उतरे तो, ऐसी नौबत ही क्यों आए? विश्लेषकों का कहना है कि, ‘वसुंधरा के पास इस बात का क्या जवाब है कि, कार्यकाल के साढ़े चार साल बाद ही उनको जनता की सुध क्यों आई? इतना अर्सा बीत जाने के बाद योजनाओं की प्रगति जानने की याद क्यों आई? अब जिस तरह इस यात्रा में प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग हो रहा है-क्या जनता में उसका अच्छा संदेश जाएगा? विश्लेषक तो यहां तक कहते है। कि ‘गौरव यात्रा एक तरह की हाई प्रोफाइल इवेंट मैनेजमेंट है। इस यात्रा के लिए की जा रही भारी भरकम फंडिग क्या लोगों को नज़र नहीं आ रही? भाजपा की इस गौरव यात्रा के दौरान हो रहे सरकारी खर्चों के खिलाफ

राजस्थान हाई कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका ने तो वसुंधरा के लिए एक नई दुविधा खड़ी कर दी है।

अंधेरे वाले इलाकों को पहचाना था नायपॉल ने

हिंदुस्तान के प्रति पूरी दुनिया में उत्सुकता को बढ़ाने वाले लेखक उपन्यासकारों में बड़ा नाम है विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल का। उनके पिता भी एक पत्रकार थे जो त्रिनिदाद में थे। नोबल पुरस्कार से सम्मानित वीएस नायपाल एक महत्वपूर्ण लेखक हैं जिन्होंन 85 साल की उम्र में लंबी सांस ली। उन्हें आमतौर पर विवाद बढ़ाने वाला रचनाकार माना जाता है। लेकिन वे वास्तविक भूमि को ही अपना कथानक बना कर लेखन करते थे। उन्होंने दुनिया को पत्रकार और लेखक के तौर पर देखा। उनकी कृतियों को पढ़ते हुए लग सकता है कि उनका लेखन भागीदारी करते हुए लेखन नहीं है।

संभव है कभी उनके पूर्वज भारत से त्रिनिदाद ले जाए गए हों। नायपॉल ने खुद को त्रिनिदाद में नंगे पांव पहुंचा उपनिवेशवादी कहा है। लंदन में जाना माना लेखक मान लिया गया। उनके उपन्यास ‘ए बेन्ड इन द रीवर’ और ‘ए हाउस फार मिस्टर विश्वास’ खासे चर्चित रहे हैं। उनके लेखल में त्रिनिदाद से लंदन और वहां से विभिन्न गरीब देशों की यात्राओं में मिली जानकारी का अच्छा विवरण मिलता है। उन्हें 2001 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला।

नायपॉल की पुस्तकों में ‘ए बेंड इन द रीवर’ से लेकर ‘द एनिग्स ऑफ एराइवल टू फाइंडिग सेंटर- तक उपनिवेशवाद और उपनिवेशवाद खत्म होने का रोमांचकारी विवरण मिलता है। विकासशील देशों में इंसान का खुद ही निर्वासित होना और हर व्यक्ति का संघर्ष पाठक को जोड़े रखता है। राजनीति, धर्म और दुनिया की संस्कृति पर उनके अपने विचार काफी विचारोत्तेजक थे।

वे भारत को ‘गुलाम समाज’ कहते थे। वे कहते कि भारतीय महिलाएं अपने माथे पर एक रंगीन बिंदु बनाती है जो बताता है उनके पास अपना दिमाग नहीं है। उन्होंने 1989 में ईरान के अयातोल्लाह खोमैनी द्वारा सलमान रूश्दी को दिए गए फतवे को ‘साहित्यिक आलोचना’ का ‘उग्र रूप’ भी कहा था।

एक बातचीत में उन्होंने बताया था कि वे उन दरिद्र भारतीयों की संतान हैं जिन्हें भारत से जहाज द्वारा वेस्टइंडीज में त्रिनिदाद ले जाया गया था। उन्हीं में उनके पिता थे जो पढ़-लिख गए तो पत्रकार हुए। उन्हें 1950 में एक स्कॉलरशिप मिली और अपने परिवार को छोड़ कर इंग्लैंड आ गए। वहां ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सटी से उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य की पढाई की। स्नातक होने के बाद वे बीमारी , गरीबी और बेरोजग़ारी के शिकार हुए। उन्होंने एक पत्र में लिखा है कि यहां लोग उनकी चेतना को तोडऩे पर आमादा नजऱ आते हैं जिससे वे कुछ कर न संके। तभी उन्हें बीबीसी वल्र्ड में मौका मिला। वहां वेस्टइंडियन साहित्य पर वे बातचीत करते और लेखन के प्रति उनमें रूचि बढ़ी। उनकी पहली पुस्तक थी ‘द मिस्टिक मैस्योर’ व्यंग्य से भरपूर इस पुस्तक में उन लोगों की जिंदगी का ब्यौरा है जो त्रिनिदाद में झुग्गियों में रहते हैं। उनके पास कोई ताकत नहीं होती पर वे ताकत के सपने देखते हैं। उन्हें सोमरसेट मॉम पुरस्कार कहानियों के संग्रह ‘मिगुएल स्ट्रीट’ के लिए मिला उनकी चर्चित पुस्तक ‘ए हाउस फारमिस्टर विश्वास’ 1961 में छपी। एक आदमी की जि़ंदगी किस तरह एक औपनिवेशिक समाज में सिमट कर रह जाती है। यह किताब उनके पिता को उनकी श्रद्धा स्वरूप् मानी जाती है। पूरी दुनिया में इसे सराहा जाता है।

उन्होंने बतौर पत्रकार ढेरों यात्राएं की और यात्रा पुस्तकें और लेख लिखे। अपने पूर्वजों के गांव और वहां की संस्कृति पर भी उन्होंने लिखा।

 नायपॉल ने ‘इस्लामी उग्रवाद’ पर काफी पहले लिखा था । उनकी किताबों में है ‘एमंग द बिलीवर्स एंड बिंयांड बिलीफ’। उनके लेखन पर उन्हें नोवबल पुरस्कार परिचय में लिखा है ‘ एक साहित्यिक तो खुद में शायद ही कभी अपने घर में रहा हो।

पांच बार मुख्यमंत्री ही नहीं कवि और पत्रकार भी

द्रविड़ राजनीति का यह दिग्गज खिलाड़ी राज्य सरकारों, राज्यों की स्वायत्तता और संघीय सोच का हिमायती था। उन्होंने ही यह आदेश जारी कराया था कि आज़ादी के दिन मुख्यमंत्री राज्य में झंडा फहरा सकेंगे।

तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री बनने वाले द्रमुक अध्यक्ष राजनीति में पचास साल पूरे करने के बाद मंगलवार को शाम छह बजे चिरनिद्रा में लीन हो गए। मृत्यु के समय वे 94 साल के थे। इन्फेक्शन और वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से तकरीबन 11 दिन तक वे कावेरी अस्पताल में जूझते रहे। उनकी मौत पर राष्ट्रीय झंडा झुकाया गया। एम करूणानिधि को प्यार से कलाईनर (कला विशेषज्ञ और लेखक) के रूप में याद किया जाता था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों के नेताओं ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। तमिलनाडु सरकार ने सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की।

हज़ारों की संख्या में लोग अस्पताल पर जुटे थे। बाद में अस्पताल से उनका शव शाम को उनके आवास गोपालपुरम ले जाया गया। जिससे लोग अपने प्रिय दिग्गज नेता को देख सकें। बाद में उनका शव अन्य सिलाई में राजाजी हाल ले जाया गया। जिससे लोग अंतिम दर्शन कर सकें।

द्रविड़ आंदोलन के दिग्गज नेताओं में एक करूणानिधि की पत्नियां हैं दयालु अम्मपल और राजथी अम्माल। इनके पहले पुत्र है एमके मुथु (उनकी पहली पत्नी पद्मावती से जन्मे), एमके अलागिरी, एनके स्टालिन, एमके तमिलारासु और बेटी (मां दयाजु अम्माल) और एम कनिमोजी (मां राजथी अम्माल). द्विड़ आंदोलन के अपने सभी सम सामयिको को पीछे छोडऩे वाले एम करूणानिधि को 28 जुलाई को ब्लड प्रेशर कम हो जाने पर अस्पताल में भरती कराया गया। तब से ही वे अस्पताल में थे। सोमवार से उनकी तबियत खराब होने लगी। उनके महत्वपूर्ण अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। मंगलवार की शाम साढ़े चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

राज्य के वे अकेले मुख्यमंत्री थे जिनकी सरकार दो बार बर्खास्त हुई थी। एक बार आपातकाल में 1976 में और दूसरी बार 1991 में जब उन्होंने धारा 356 हटाई थी। 1957 से वे विधानसभा की तेरह सीटों पर विजयी होते रहे हैं। उन्होंने राज्य के लिए एक तमिल गीत भी चुना था जिसके कवि थे मैनम मानियम सुंदरनार। उनका गीत था ‘तमिल थाई वाज्झतुÓ संगीतज्ञों के परिवार में जन्मे एम करूणानिधि तंजवुर जि़ले के छोटे से गांव थिरूकुवलाई में पैदा हुए थे। उनके पिता मुथुवेलर नागस्वर के कलाकार थे। करूणानिधि से भी यह सीखने को कहा गया पर वे तैयार नहीं हुए। वे हिंदी भाषा लादे जाने के विरोधी थे। उन्होंने 1938 में इसके खिलाफ आंदोलन किया। शुरू के सालों में पूर्वी तंजवौर में उन्होंने कम्युनिस्टों की लोकप्रियता देखी। उनके मन में तमिल भाषा और सामाजिक न्याय के लिए ललक थी। वे जस्टिस पार्टी की विचारधारा की ओर आकृष्ट हुए। उस समय पेदीथार ईवी रामासामी और सी एन अन्नादोरई इसके जाने माने नेता थे और फिर डीएम में। दोनों ही जगह वे बढ़े। अन्नादुराई के जाने के बाद पार्टी को चलाने का जुमा उनमें था। पार्टी में उनका विकास और सरकार में उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन लोगों का अता-पता नहीं चला जो पार्टी सुप्रीमो अन्नादुराई को हमेशा घेरे रहते थे। धीरे-धीरे पूरी पार्टी उनके साथ हो गई।

खुद एक अच्छे लेखक, भाषण में माहिर और पत्रकार होने के कारण उन्होंने पार्टी का मुख्य पत्र मुरासौली का प्रकाशन शुरू किया। आपातकाल के दौरान उन्होंने सेंसरशिप का मुकाबला किया उन्हें अनुमति नहीं थी कि वे उन लोगों के नाम छापे जो मेन्टिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा)  के तहत गिरफ्तार किए गए। उन्होंने उन लोगों के नाम छापे जो द्रमुक के संस्थापक अन्नादुराई को श्रद्धांजलि नहीं दे पाए। यह ऐसा संदेश था जिस पार्टी के लोग अच्छी तरह समझते थे। संवाद लेखन और स्क्रीन प्ले राइटर बतौर उन्होंने 77 फिल्मों में काम किया। उनके लिखे संवादों के चलते तमिल सिनेमा के तीन अभिनेता बतौर हीरो ज़रूर उभरे। उनकी पहली फिल्म थी राजकुमारी जिसके संवाद उनके लिखे थे। इसी फिल्म से हीरो बने थे एमजी रामचंद्रण। पाराशक्ति दूसरी फिल्म थी जिसके संवादों से शिवाजी गणेशन के फिल्म दुनिया में आने की मुनादी हुई। तीसरे अभिनेता थे एसएस राजेंद्रन। उन्हें अभाईउप्पन के लिए जाना जाता है। उसके लिए कभी मौका नहीं मिला। इसके भी संवाद लेखक एम करूणानिधि थे।

तमिल भाषा के हिमायती थे कलाईनर

प्राचीन भारतीय संस्कृति में तमिल भाषा काफी समृद्ध मानी जाती रही है। प्राचीन समाज साहित्य की जानकारी काफी हद तक संगम साहित्य में मिलती है। इसे छह हजार वर्ष पुराना माना जाता है। संगम साहित्य प्राचीन तमिल लिपि में ही है। कुछ सामग्री संस्कृत में भी मिलती है। इसके विद्वान लेखक- अनुवादकों की तादाद भी खासी कम हो चली है। जून 2010 में एम करूणानिधि ने विश्व क्लैसिक भाषाओं में से शास्त्रीय भाषा तमिल का आयोजन किया था। यह आयोजन पूरी तौर पर कामयाब हो इसके लिए वे प्राण-प्रण से जुटे । तमिलनाडु में राजनीति के हथियार के तौर पर भाषा का भी इस्तेमाल होता है। विधानसभा चुनाव 1967 में द्रमुक ने कांग्रेस को परास्त किया। वे फरवरी 1969 में मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने तमिल के विकास के लिए काफी काम किया।  वे पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2004 में तंिमल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। हालांकि तब वे मुख्यमंत्री नहीं थे। लेकिन भाषा के प्रति उनमें समर्पण भाव था। तब 2004 के लोकसभा चुनावों में युनाइटेड प्रोगेसिव एलायंस की सरकार सत्ता में आई। इसने सत्ता में आते ही पहले पुरानी मांग को तुंरत स्वीकार किया। इसलिए यूपीए को टिके रहना भी करूणानिधि के समर्थन के कारण था। चुनाव में द्रमुक नेतृत्व में बने गंठजोड़ ने 40 सीट जीती। तमिलनाडु के अलावा पुडुचेरी में भी इसकी जीत हुई। उस समय राष्ट्रपति थे एपीजे अब्दुल कलाम। वे खुद तमिल भाषी थे। उन्होंने भी तमिल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। मार्च 2006 में मैसूर में सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के परिसर में शास्त्रीय तमिल भी पहुंची। जून 2010 में यह चेन्नई आ गई। जून 2010 में द्रमुक राज में कोयंबटूर में विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मेलन आयोजित किया। इसमें भी करूणानिधि ने बहुत रूचि ली। कई मौकों पर उन्होंने थिरूवल्लुवर में नैतिकता पर लिखने वाले कवि थिरूक्कुराल के प्रति अपना प्रेम दिखाया। 1970 के मध्य में चेन्नई कोट्टम में स्मारक बना। कुछ सप्ताह बाद यह जनता के लिए खुला। लेकिन सरकार ही बर्खास्त हो गई। करूणानिधि जनवरी 1976 में सरकार से बाहर हो गए। फिर वे जनवरी 1989 में सत्ता में लौटे । उन्होंने विधानसभा चुनाव 1989 में जीत हासिल की। इसी मेमोरियल में उन्होंने शपथ ली। कन्याकुमारी में थिरूवल्लुवर की मूर्ति स्थापित करने का उनका सपना पूरा हुआ जब 133 फीट लंबी मूर्ति लगी । उन्होंने 1972 में ही अपनी सरकार के मुख्यमंत्री रहते हुए विद्वानों से पता लगा लिया था कि थिरूवल्लुवर पूर्व ईसा जनमें थे। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पुम्पुहार में शिल्प पड्डिकरम आर्ट गैलरी और तमिल भाषा के विकास का एक अलग विभाग खुलवाया। जब 2006 में वे मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने अध्यादेश जारी करके दसवीं कक्षा तक तमिल अनिवार्य भाषा की। उनके बाद जो दूसरी सरकार आई उसने भी कानून में बदलाव नहीं किया। करूणानिधि द्विभाषा कानून के पक्षधर थे लेकिन वे चाहते थे कि अंगे्रज़ी को शैक्षणिक संस्थानों में बतौर एक विषय पढ़ाया जाए।

द्रमुक के दिग्गज नेता की समाधि मैरीना बीच पर बनाने से सरकार का इंकार अदालत की अनुमति

तमिलनाडु सरकार ने ऐन मौके पर दिग्गज द्रमुक नेता एम करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर बनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। इससे परिवार और पार्टी के लोगों ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मद्रास हाईकोर्ट ने देर रात अनुमति दी कि मैरीना बीच पर बनी अन्ना समाधि के पास एम करूणानिधि की भी समाधि बनाई जाए।

करूणानिधि के निधन की घोषणा के पहले ही मंगलवार को द्रमुक नेता स्टालिन मुख्यमंत्री ईके पलानिस्वामी से मिले थे और मांग की थी कि उनके पिता की समाधि मैरीना बीच पर ही अन्ना समाधि के पास बनाने की इजाज़त दी जाए। मुख्यमंत्री ने अनुमति देने से इंकार कर दिया। स्टालिन के साथ उनके बड़े भाई एमके अलगिरी, सांसद बहन कनिमोजी और पार्टी के वरिष्ठ नेता गए थे। मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और गांधी मंडपम् पर दो एकड़ की भूमि देने का प्रस्ताव किया।

मैरीना बीच एक तरह तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास की परत दर पतर खोलता है। यहां पर दिग्गज द्रविड नेताओं की समाधियां है। द्रविडों के आदि दिग्गज नेता सीएन अन्नादुरई, अभिनेता मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रम और पूर्व अभिनेत्री मुख्यमंत्री जे जयललिता की भी यहीं समाधियां है।

सरकार का कहना था कि मैरीना बीच पर इसलिए एम करूणानिधि की समाधि बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी मौत मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नहीं हुई है। द्रमुक के एक वरिष्ठ नेता ने बताया करूणानिधि के परिवार के लोग राज्य की मुख्य सचिव गिरिजा वैद्यनाथ से मिले। लेकिन बात बनी नहीं। उनका कहना था कि मैरीना बीच की ज़मीन पर अदालत में ढेरों विवाद हंै।

इस विवाद को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने बेतुका बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को दुख की इस घड़ी में इस बात को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अभिनेता और अब राजनीतिक कमल हसन ने भी कहा कि करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर ही होनी चाहिए। कांगेे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि विपदा के समय राज्य सरकार को सहानुभूतिपूर्वक इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए था। करूणानिधि भी तमिल जनता की आवाज़ थे। उन्हें वही स्थान दिया जाना चाहिए था। द्रमुक नेता सावन्ना ने कहा कि भाजपा-आरएसएस ने जानबूझ कर इस घड़ी में यह विवाद पैदा किया है।

नामवर जुग-जुग जीएं पर ज़रूरी है कि पुनर्पाठ भी हो

इस समय नामवर सिंह के लिखे पुनर्पाठ की ज़रूरत है। उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ से ही अपनी माक्र्सवादी विचारधारा में विचलन शुरू कर दिया था। न केवल इतना ही आज वे यह स्वीकार भी करते हैं कि वह पुस्तक उन्होंने तत्कालीन साहित्य अकादमी सचिव भारतभूषण अग्रवाल के कहने पर महज तीन सप्ताह मेें लिखी थी। उद्देश्य था अकादमी पुरस्कार पाना।

इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही प्रगतिशील आलोचना के शिखर पुरुष और समीक्षक डा. रामविलास शर्मा ने इस पुस्तक की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि इस पुस्तक में लेखक का अपना कुछ नहीं है। सारा कुछ अमेरीकन ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ से आयातित है। दूसरे इस पुस्तक में बड़ी ही चतुराई से नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल को हाशिए पर ढकेल दिया गया। जो लेखक ऐसे तुच्छ समझौते, तुच्छताओं के लिए करता है, वह महान लेखक नहीं हो सकता। महानता सिर्फ लेखन से ही नहीं, लेखक के आचरण से भी परखी जाती है। राम विलास शर्मा ने ऐसा कोई समझौता कभी नहीं किया।

नामवर सिंह सत्ता और संस्थानों से जुड़कर साहित्य की छिछली राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने कभी लेखन के लिए कोई बड़ा जोखिम नहीं उठाया। अपनी राजनीति के लिए ही राजकमल प्रकाशन और उसकी साहित्यक पत्रिका ‘आलोचना’ भी हासिल की।

एक साधक लेखक यह सब नहीं करता। जब भी नियुक्तियों में भूमिका निभाने का मौका मिला उन्होंने अपने चाटुकारों को ही लिया। योग्य लोगों को किनारे किया। इसमें कोई संदेह नही कि वे बहुत परिश्रमी और बहुत पढ़ाकू व्यक्ति रहे हैं। यह कतई ज़रूरी नहीं कि एक पढ़ाकू व्यक्ति, नेक इंसान भी होगा। अंग्रेजी में कहावत है, ‘द वाइजेस्ट एंड द मीनेस्ट ऑफ मैनकाइंड’ यानी एक बहुत बड़ा विद्वान, लेकिन आचरण में ‘अधम’। अनेक उदाहरण हैं जिन्हें उनके संदर्भ में आमानवीय ही कहा जाएगा।

हिंदी में आलोचना के शिखर पुरुष आज भी रामविलास शर्मा ही है, चूंकि वे अंग्रेजी में थे इसलिए वे कभी हिंदी के चाटुकार शिष्यों की फौज तैयार नहीं कर पाए। फिर भी उनका अध्ययन और हिंदी में साहित्य लेखन हमेशा प्रमाणिक रहा। नामवर सिंह मुझे एक ‘प्रोफेशनल’ आलोचक ही लगते हैं। वे मौलिक साधक-सर्जक कम हैं। यह तथ्यपरक सवाल पहले भी उठता रहा है। अब ज्य़ादा उठने लगा है।

आखिर क्या कारण रहा कि नामवर सिंह पिछले दो दशकों में कोई मौलिक रचना नहीं दे पाए। हिंदी के व्यापक साहित्य पर नया और मौलिक सोचने-कहने की आज ज्य़ादा ज़रूरत है। इस पर सोचना चाहिये क्योंकि आलोचना में काफी कुछ नया और मौलिक कहने-करने की जगह है। आज वहां एक बड़ा खालीपन है।

डाक्टर नामवर सिंह काफी बड़ी भूमिका निभा सकते थे। मेरा विनम्र अनुरोध है कि हिंदी में मूर्ति पूजा नहीं बल्कि हिंदी के समकालीन साहित्य की वस्तु निष्ठ मूल्यांकन की ज्य़ादा ज़रूरत आज है। मैंने खुद अंग्रेजी भाषा में अध्ययन, अध्यापन और हिंदी में लेखन पूरी जि़ंदगी किया है। मुझे नामवार सिंह से कभी कोई लाभ लेने की नौबत नहीं आई। हिंदी आलोचकों में आज भी शिखर आलोचक और नेक इंसान डा. रामविलास ही लगते हैं। साहित्य सृजन और जीवन में हम उनसे ही ज्य़ादा प्रेरित होते हैं। नामवर सिंह से नहीं जिनका लेखन ठहर गया। रामविलास शर्मा अंतिम क्षण तक नया रचते रहे, नया तार्किक चिंतन करते रहे और नए विमर्श उठाते रहे।

मौत की बरसात

देश में बारिश-बाढ़ से तबाही का दौर जारी है। हिमाचल से लेकर केरल तक बारिश का कहर है। देश भर में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक बारिश-बाढ़ से करीब 898 लोगों की जान जा चुकी है। केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तराखंड, हिमाचल, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान में बाढ़ और बारिश का सबसे ज्यादा असर दिखा है।

केरल में भारी तबाही

केरल को 1924 के बाद की सबसे भंयकर बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। उस समय बाढ़ में 1000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बाढ़़ में अब तक 167 लोग मारे जा चुके हैं और दो लाख से ज़्यादा लोग 1200 राहत शिविरों में रह रहे हैं। बचाव कार्य के लिए नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) की 12 अतिरिक्त टुकडिय़ां तैनात की गई हैं जिनमें 540 लोग हैं। ये उन 18 टुकडिय़ों से अतिरिक्त हैं जो पहले से वहां तैनात है। इस तरह एनडीआरएफ की 30 टुकडिय़ां वहां तैनात हैं। इनके अलावा थल सेना, जल सेना और वायु सेना के सैनिक भी लगातार बचाव कार्य में लगे हैं। आने वाले समय में एनडीआरएफ की 23 और टुकडिय़ां भी वहां भेजी जाएंगी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया।

केरल में बारिश का कहर जारी है। बाढ़ से केरल में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक 79 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 85 हजार से ज्य़ादा लोग शरणार्थी शिविरों में पहुंचाए गए हैं। केरल के इतिहास में यह पहला अवसर है जब नदियों के उफान पर होने के कारण राज्य के मुल्लापेरियार समेत 35 बांधों के फाटक खोल दिए गए हैं। इससे पहले इडुक्की बांध के द्वार 1992 में खोले गए थे। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने कहा कि भीषण बाढ़ से अब तक राज्य में 8,430 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

राज्य सरकार ने कहा है कि बाढ़ के खतरे को देखते हुए कोच्चि एयरपोर्ट 18 अगस्त तक बंद रहेगा। केरल में 28,000 हेक्टेयर खेती की जमीन बाढ़ के पानी में डूबी है, जिससे 1,80,000 किसानों को 680 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसमें 310 करोड़ का नुकसान अलपुझा और कोट्टायम की रबड़ बेल्ट में 93 करोड़ रुपये का नुकसान शामिल है। अतिरप्पली, पोनमुढी और मन्नार समेत कई बड़े पर्यटन केंद्र बंद कर दिए गए हैं। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परिसर में पानी घुस जाने के कारण उसे शनिवार तक बंद करने की घोषणा की गई है। इंडिगो, एयर इंडिया और स्पाइस जेट ने कोच्चि हवाई अड्डा से अपना परिचालन बंद करने की घोषणा की है। राज्य में बाढ़ का खतरा बना हुआ है। सभी 14 जिलों में अलर्ट जारी कर दिया गया है। कासरगोड से लेकर दक्षिण में तिरूवनंतपुरम तक सभी नदियां उफान पर हैं। खतरे की आशंका के मद्देनजर केरल के सभी स्कूलों को बंद रखने का ऐलान किया गया है। बाढ़ से 2100 से ज्य़ादा घरों को नुकसान पहुंचा है। राज्य में लोगों के लिए 718 राहत शिविर बनाए गए हैं। एनडीआरएफ की चार टीमें पुणे से केरल में काम कर रही हैं।

केरल के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन के मुताबिक भारी वर्षा अभी कुछ और दिन जारी रहेगी। स्थिति के बिगडऩे की आशंका बनी है। पूरे राज्य में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रखे गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने केरल के मुख्यमंत्री से 16 अगस्त को भी राज्य में बाढ़ के हालात को लेकर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने सहायता का आश्वासन दिया है।

सूबे में ट्रेन सेवाएं बाधित हैं और सड़क परिवहन सेवाएं भी अस्तव्यस्त हैं। सड़कें पानी में डूब गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कसारगोड को छोड़कर बाकी सभी जिलों में शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टी की घोषणा कर दी गयी है। कॉलेजों और महाविद्यालयों की परीक्षाएं स्थगित की हैं।

सूबे के विभिन्न हिस्सों में विद्युत आपूर्ति, संचार प्रणाली, पेयजल आपूर्ति बाधित है। स्थिति के और गंभीर होने पर राज्य सरकार ने सेना, एनडीआरएफ और सैन्य इंजीनियरिंग की टीमों की मदद मांगी है।

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में बाढ़ का कहर जारी है। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक सूबे में 296 लोगों की जान जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में भारी बारिश से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है। यूपी में कई जगह बाढ़ के हालत हैं। प्रमुख नदियां गंगा, घाघरा, राप्ती नदियों का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर गयी हैं। कुशीनगर, बिजनौर, गोरखपुर, लखीमपुर खीरी, रायबरेली, मुरादाबाद और बस्ती जिलों में सबसे ज्य़ादा बारिश रेकार्ड की गयी है।

बाराबंकी में घाघरा नदी एल्गिन ब्रिज पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। घाघरा अयोध्या और फैजाबाद में भी खतरे के निशान से ऊपर है। बलिया के तुर्ती पार में भी नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर है। वहीं रायबरेली में सई नदी खतरे के निशान से ऊपर चली गई है। राप्ती नदी बलरामपुर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। बंसी सिद्धार्थनगर में भी राप्ती नदी चेतावनी बिंदु के ऊपर है। गंगा कानपुर देहात में चेतावनी बिंदु को पार कर गई है। फतेहगढ़, फर्रुखाबाद में भी गंगा नदी और बदायूं में भी कचला ब्रिज और कन्नौज में भी गंगा चेतावनी बिंदु से ऊपर बह रही है।

सरयू नदी में उफान है और करीब एक दर्जन गांव इसकी चपेट में हैं। गोंडा में घाघरा और सरयू नदियों का कहर भी जारी है। कर्नलगंज तहसील के कई गांव बाढ़ की चपेट में हैं जबकि तरबगंज तहसील में भी हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो पहली जुलाई से अगस्त मध्य तक प्रदेश में 296 लोगों की जान बारिश-बाढ़ से जा चुकी है। यूपी राज्य आपदा प्रबंध प्राधिकरण इमरजेंसी ऑपरेशन परियोजना निदेशक अदिति उमराव के मुताबिक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लोगों को जान से हाथ धोने पड़े हैं और सरकारी और निजी सम्पति का भी नुक्सान हुआ है। उन्होंने कहा कि राज्य में 379 लोग घायल हो गए है। घर ढहने के कारण ही 209 लोगों की मौत हुई है, वहीं बिजली गिरने से 46, सांप के काटने से सात और बोरवेल में गिरने से दो लोगों अपनी जान गंवा चुके है। बाकी लोगों की मौत नदी- नालों में बह जाने से हुई है। राज्य में भारी बारिश के कारण अब तक 3001 मकान/भवन क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

बारिश ने सरकार के दावों की पोल भी खोली है। यहाँ तक की ड्रीम प्रोजेक्ट कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश का आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे भी बारिश के कहर से बच नहीं पाया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में जब फाइटर प्लेन उतारे गए थे तब देश भर में खूब वाह-वाह हुई थी। लेकिन पहली ही बरसात में एक्सप्रेस-वे की सर्विस लेन 50 फीट धंस गई। ज़मीन धंसने से इसकी चपेट में एक कार आ गई। हादसा आगरा के डौकी क्षेत्र में वाजिदपुर पुलिया पर हुआ। इस हाइवे को 22 महीने के रेकार्ड समय में तैयार गया था और इस पर करीब 13,200 करोड़ रुपए की लागत आई है। हाइवे पर कई जगह दरारें भी आ गई हैं। कई जगह पर सड़क के नीचे की मिट्‌टी धंस रही है। पिछले दिनों जब इसमें कार धंसी तो मौके पर पहुंची क्रेन से गाड़ी में फंसे लोगों को तो बाहर निकाल लिया गया लेकिन जब कार को निकालने का प्रयास किया गया तो क्रेन का पटा ही टूट गया। हादसे ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में तटवर्ती इलाकों में लोग दहशत में हैं और वे पलायन को मजबूर हो गए हैं। फसलें जलमग्न हो गई हैं। पश्चिमी उप्र में भी काफी नुक्सान हुआ है। बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, बलरामपुर, श्रावस्ती, सीतापुर, लखीमपुर के गांव बाढ़ से घिरे हैं। मऊ, बलिया और आजमगढ़ में घाघरा उफान पर होने से कटान की भी स्थिति पैदा हो गई है जिससे तटवर्ती इलाकों में लोग अब पलायन करने लगे हैं। एनडीआरएफ की टीम राहत कार्य में जुटी है। सैकड़ों किसानों की खरीफ की फसलें नदी में समा चुकी हैं।

बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश के जिलों में भी नुक्सान हुआ है। उन्नाव में गंगा चेतावनी बिंदु के करीब बह रही है। हमीरपुर में यमुना और बेतवा का जलस्तर भी बारिश के साथ बढ़ता रहा है। प्रतापगढ़, कौशांबी और पूर्वांचल में नुक्सान हुआ है जबकि सोनभद्र, मीरजापुर और चंदौली में नदी नालों में उफान से लोग मुश्किल जीवन जी रहे हैं। अभी तक यही देखा गया है कि एनडीआरएफ की टीमें भी कई जगह मज़बूर हो कर हाथ खड़े कर चुकी हैं।

मूसलाधार बारिश की वजह से कर्नाटक के जलाशयों में जलजमाव का स्तर बढ़ता जा रहा है। इससे बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है। चेरुथोनी डैम के दो और गेट खोल दिए गए हैं ताकि इड्डुकी जलाशय में पानी का दबाव कम हो। खराब मौसम की वजह से राज्य के इड्डुकी, वायनाड़, पल्लकड़, एर्नाकुलम, कोझीकोड़, मालापुरम और कोलम आदि इलाकों में स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। राज्य के कई इलाकों में बचाव कार्य और क्षतिग्रस्त सड़कों के निर्माण के लिए सेना को तैनात किया गया है। राहत शिविरों में ठहरे हुए लोगों के लिए दवा और भोजन के इंतजाम किए जा रहे हैं।  तमिलनाडु में भी बाढ़ की आशंका से प्रशासन सचेत है। मेट्टूर का स्टैनली जलाशय 120 फुट की अपनी पूरी क्षमता तक भर चुका है, जिसके बाद राज्य के 12 जिलों में बाढ़ का अलर्ट जारी किया गया है।

तमिलनाडु के सालेम, इरोड, नमक्कल, करूर, त्रिची, तंजावुर, थिरुवरूर, नागपट्टनम, कुडडालोर, पुडुक्कोट्टाई, पेरम्बलूर और अरियालूर जिले में बाढ़ की चेतावनी जारी की गई है। मेट्टूर बांध का निर्माण 1934 में किया गया था और यह अब तक 40 बार अपनी पूरी क्षमता तक भर चुका है। गौरतलब है कि केरल में बारिश लोगों पर कहर बनकर टूट रही है। पिछले 40 साल में यहां सबसे भीषण बाढ़ देखी गई है। 8 जिले बाढ़ की चपेट में है।

सेना, नेवी से लेकर एनडीआरएफ राहत कार्य में लगे हुए हैं। कर्नाटक के काबिनी और कृष्णा सागर बांध के डूब इलाकों में भारी बारिश की वजह से तमिलनाडु के मेट्टूर बांध में भी बहुत ज्य़ादा पानी पहुंच रहा है। राज्य सरकार ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को वहां से खाली कर कहीं और जाने का सुझाव दिया है। लोगों को यह चेतावनी भी दी गई है कि वे मछली पकडऩे, तैराकी या अन्य किसी भी गतिविधि के लिए कावेरी नदी में न जाएं।

अन्य राज्य

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में खीरगाड़ नदी ने भारी तबाही मचाई है। उत्तराखंड में गंगोत्री नेशनल हाइवे भारी बारिश के चलते बार-बार बंद करना पड़ा है। भूस्खलन से कई जगह सरकारी और निजी सम्पति का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। प्रदेश में अब तक 72 लोगों की जान जा चुकी है।

मध्य प्रदेश में भारी बारिश जबलपुर, सतना, भोपाल, होशंगाबाद, उज्जैन, रतलाम जबकि राजस्थान के कोटा, बूंदी, और झालावाड़ में बहुत नुक्सान हुआ है। उधर सूबे के जैसलमर, बाड़मेर, बीकानेर सहित पश्चिम राजस्थान में भी बारिश हुई है। पिछले सालों में यहाँ ज्य़ादा बारिश नहीं देखी गयी है। वैसे मौसम विभाग के मुताबिक बिहार में अब तक वर्षा सामान्य से 15 और उत्तर प्रदेश में 7 प्रतिशत कम हुई है। दोनों राज्यों में मॉनसून अगस्त मध्य से हरकत में आएगा और पटना, लखनऊ, आगरा में अच्छी बारिश होगी।

हरियाणा में भी बारिश के काफी नुक्सान हुआ है। कई जगह खेती की ज़मीन बाढ़ में बह गयी है। घरों और अन्य सम्पति को भी नुक्सान हुआ है।

बारिश पहाड़ी सूबे हिमाचल में बड़ी तबाही लेकर आई है। 26 लोगों की जान चली गयी है और प्रदेश के 6 नेशनल हाईवे चंडीगढ़-शिमला, चंडीगढ़-मनाली और पठानकोट-पालमपुर यह रिपोर्ट लिखे जाने तक बंद थे। प्रदेश में अब तक 812 करोड़ रूपये के नुक्सान का आकलन किया गया है। स्कूल बंद रखने के आदेश सरकार ने दिए हैं। टोल फ्री नम्बर 1077 स्थापित किया गया है ताकि वर्षा के कारण हुए नुकसान पूर्वनुमान की सूचना उपलब्ध करवाई जा सके।

प्रदेश में भू-स्खलन के कारण 923 सड़कें अवरूद्ध हैं, जिनमें 6 राष्ट्रीय उच्च मार्ग भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने प्रदेश में भारी वर्षा के कारण उत्पन्न स्थिति की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक तलब की और हालात का जायजा लिया। मुख्यमंत्री ने राज्य उच्च मार्गों और राष्ट्रीय उच्च मार्गों पर भू-स्खलन से निपटने के लिए अधिकारियों को तत्काल श्रमशक्ति और मशीनरी तैनात करने के निर्देश दिए ताकि लोगों को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े। प्रदेश सरकार ने बचाव, बहाली और पुनर्वास कार्यों के लिए 96.50 करोड़ रुपये की राशि जारी की है। प्रदेश में भारी बारिश के कारण 812 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। प्रदेश सरकार ने पुन:स्थापन कार्य के लिए अभी तक 229 करोड़ रुपये जारी किए हैं।

राज्य मुख्यालय पर प्राप्त सूचना के अनुसार अब तक विभिन्न जिलों से 26 व्यक्तियों की मृत्यु की खबर है । प्रभावित परिवारों को जिला प्रशासन के माध्यम से अंतरिम राहत प्रदान की गई है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को सड़कों के अवरूद्ध होने के कारण सेब की ढुलाई में किसी प्रकार की बाधा नहीं आना सुनिश्चित बनाने के भी निर्देश दिए हैं। उन्होंने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को सेब उत्पादक क्षेत्रों में अवरूद्ध सड़कों को तत्काल बहाल करने के भी निर्देश दिए। मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने उपायुक्तों को खराब मौसम के पूर्वानुमान के दृष्टिगत विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए शिक्षण संस्थानों को 14 अगस्त को बंद करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने उपायुक्तों को सैलानियों और स्थानीय लोगों को नदियों के किनारे नहीं जाने देने के लिए कदम उठाने और ट्रैकिंग गतिविधियों पर नजर रखने के भी निर्देश दिए हैं । उन्होंने कहा कि सड़कों, जल और विद्युत आपूर्ति की बहाली के लिए पर्याप्त श्रमशक्ति और मशीनरी तैनात की गई है और उपायुक्तों और सम्बन्धित विभागों को धनराशि जारी कर दी गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के किसी भी हिस्से में आवश्यक खाद्य सामग्री की कोई भी कमी नहीं है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व और लोक निर्माण मनीषा नंदा ने कहा कि प्रदेश में भू-स्खलन के कारण 923 सड़कें अवरूद्ध हैं, जिनमें 6 राष्ट्रीय उच्च मार्ग भी शामिल हैं। विभाग इन सड़कों को शीघ्रातिशीघ्र खोलने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि बचाव और राहत कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध है और अगर आवश्यक हो तो उपायुक्त सड़कों को बहाल करने और अन्य कार्यों के लिए स्थानीय स्तर पर भी मशीनरी किराये पर ले सकते हैं।

उपायुक्त कुल्लू ने बताया कि मनाली राष्ट्रीय उच्च मार्ग भू-स्खलन के कारण अवरूद्ध है और इस मार्ग को खोलने के लिए युद्धस्तर पर कार्य चल रहा है।  भारी बारिश से नदियों में जल स्तर बढऩे के साथ ही गाद भी बढ़ गयी है। इसका असर बिजली उत्पादन पर पड़ रहा है। सतुलज नदी जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा से सतलुज नदी में गाद का स्तर इतना बढ़ गया है कि नदी पर बनी 1500 मेगावाट की नाथपा झाकड़ी पनविद्युत परियोजना, 1000 मेगावाट की कड़छम वांगतू पनविद्युत परियोजना और 412 मेगावाट की रामपुर पनविद्युत परियोजना में बिजली उत्पादन ठप हो गया है। जानकारी के मुताबिक सतलुज नदी में गाद का स्तर 20 हजार पीपीएम से ऊपर पहुंच गया है। इसके चलते इन तीनों ही बड़ी परियोजनाओं में बिजली उत्पादन बंद कर दिया गया है ताकि टरबाईन को कोई नुकसान न हो। अब इन बिजली परियोजनाओं में फिर से उत्पादन शुरू होने के लिए गाद का स्तर 5 हजार पीपीएम से नीचे आना जरूरी है। इन 3 बड़ी पनविद्युत परियोजनाओं में बिजली उत्पादन ठप हो जाने से देश के 9 उत्तरी राज्यों हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और चंडीगढ़ में बिजली आपूर्ति प्रभावित होगी। बिजली उत्पादन ठप होने से हिमाचल को हर रोज रॉयल्टी के रूप में करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है।

दरकते पहाड़

हिमाचल बेहाल है। जहाँ-तहाँ पहाड़ दरक रहे हैं। पर्यावरण का बंटाधार करने के गंभीर नतीजे सामने आने लगे हैं। कहीं राष्ट्रीय राजमार्गों तो कहीं दूसरे विकास के नाम पर जंगल के जंगल तबाह कर दिए गए और अब प्रकृति का भीवत्स रूप सामने है। प्रदेश के चार बड़े राष्ट्रीय और राज्य मार्ग हर दूसरे दिन मलबा गिरने से बंद हो जाते हैं और मुसीबत झेलनी पड़ती है स्थानीय लोगों या पर्यटकों को। सरकार का आपदा प्रबंधन भी इस मुसीबत के सामने पंगु नजर आता है।  पर्यटकों के लिहाज से अहम् चंडीगढ़-मंडी-मनाली नेशनल हाईवे पिछले एक महीने में दर्जन बार बंद हो चुका है। बार-बार रास्ता बंद होने से वाहनों की लंबी कतार लग जाती है और यात्री-पर्यटक घंटों बीच में बेहाली की हालत में फंसे रहते हैं। इनमें छोटे बच्चो से लेकर बूढ़े-जवान सब शामिल हैं। कई बार तो खाने के लाले तक पड़ जाते हैं। पूरे बरसात मौसम में हर साल इस पहाड़ी सूबे में अरबों की सरकारी और निजी सम्पति तबाह हो जाती है। इसमें बड़ा हाथ सालों से बेदर्दी से कट रहे पेड़ हैं। दसियों की मौत पहाड़ों से पत्थर, मलबा गिरने से हो जाती है। लेकिन इस से बड़ी चुनौती भविष्य की है। जो हालत पहाड़ों की हो गयी है (देखें फोटो) उससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि आने वाले कुछ ही सालों में हमें पेड़ काटने और बिना भविष्य की चिंता किये अंधाधुंध विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। विस्फोटकों के इस्तेमाल और लगातार खुदाई से पहाड़ कमजोर हो गए हैं। खासकर सभी राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य मार्गो से।

परवाणू-शिमला नेशनल हाईवे के फोरलेन बनने के काम में अब तक हज़ारों पेड़ों की बलि दी जा चुकी है। अभी तो 35 प्रतिशत काम ही हुआ है। उसमें भी पहाडिय़ां लगातार खिसक रही हैं। निर्धारित कौण ज्यादा भीतर तक पहाडिय़ां दरक चुकी हैं। इस हाईवे पर पिछली तीन-चार बरसात से हर रोज मलबा नीचे गिर रहा है। कई बार घंटों हाईवे बंद रहता है या उस पर लंबा जाम लग जाता है। जब खुलता है तब भी खतरा बना रहता है कि पता नहीं कब ऊपर से मलबा मौत बनकर आ गिरे।

इस हाईवे से हर रोज हज़ारों वाहन गुजरते हैं जिनमें बड़ी संख्या में पर्यटक वाहन भी शामिल हैं। सोलन और परवाणू के बीच पिछले चार साल से हाईवे फोरलेन करने का काम चल रहा है जिसमें अभी भी बहुत काम बाकी है। सोलन-शिमला के बीच अभी बहुत छोटे हिस्से में ही काम शुरू हुआ है। इसमें उतनी दिक्कत अभी नहीं है जितनी सोलन-परवाणू के बीच है।  दूसरे सेब का सीजन शुरू होने से यहाँ ट्रैफिक में खासी बढ़ोतरी हो जाती है। इससे लम्बे जाम लगते हैं। कई बार तो बस का जो सफर परवाणू-शिमला के बीच 3 घंटे का होता है वह 6-7 घंटे का हो जाता है। इस इलाके में फॉर लेन के कारण बड़ी तादाद में पेड़ काटे गए हैं। सोलन में दुकान करने वाले सुभाष चंद ने बताया कि फोरलेन का काम शुरू होने से पहले आम तौर पर सड़क पर जाम या लहासा (मलवा) गिरने की घटनाएं नहीं होती थीं। अब तो आये दिन यहाँ जाम लगते हैं और पहाड़ से मलबा गिरने की घटनाएं होती हैं।  यही हाल मंडी-कुल्लू-मनाली नेशनल हाईवे (एनएच 71) का है। पंडोह से हणोगी और ओट मार्ग बहुत संवेदनशील है जहाँ कभी भी पहाड़ दरक जाता है। यहाँ पिछले सालों में बड़े हादसे हो चुके हैं। पूरा पहाड़ खोदने से कमजोर हो चुका है। इस मार्ग पर बड़ी संख्या में पेड़ कटे हैं। पूरा रास्ता संवेदनशील पहाड़ के नीचे है और पता नहीं चलता बरसात में कब पहाड़ी नीचे आ गिरे। इसके अलावा प्रदेश में केंद्र की योजनाओं के दर्जनों मार्ग हैं जहाँ पेड़ों की बलि बड़े पैमाने पर दी गयी है। राज्य मार्गों को चौड़ा करने का भी काम चल रहा है। पिछले सालों में प्रदेश के लिए दर्जनों मार्ग केंद्र से मंजूर हुए हैं। यह सही है कि लोगों की ज़रुरत सड़क पहुँचाने की रही है लेकिन यह भी सच है कि पेड़ों के काटने से जो नुक्सान हुआ है उसने लोगों की ही जि़ंदगी नरक बनाई है।  प्रदेश पर्यावरण और खेल संस्था के संयोजक और विधायक विक्रमादित्य सिंह कहते हैं कि पहाड़ी सूबे में जैसे सड़कें लोगों की जीवन रेखा हैं वैसे ही पेड़ भी हैं। पेड़ों का संरक्षण हर हालत में होना चाहिए। यदि ज़रुरत में पेड़ काटने ही पड़ें तो क्षेत्र में उससे दोगुने पेड़ लगाने का प्रावधान होना चाहिए और उनका संरक्षण भी करना चाहिए ताकि वो बर्बाद न हो जाएँ।

उपेक्षित कर दिया गया हिमाचल निर्माता

उन्हें हिमाचल निर्माता कहा जाता है। उनकी ईमानदारी की बानगी यह कि जब उनका निधन हुआ तो उनके बैंक खाते में महज 563.30 रूपये थे। अपना कोई मकान मुख्यमंत्री रहते नहीं बनाया और कई बार तो साधारण बस में ही सफर कर लिया करते थे। बात यशवंत सिंह परमार की है जिनका इसी महीने 4 तारीख को जन्मदिन था। जब तक जि़ंदा रहे कांग्रेस में रहे। इंदिरा गाँधी उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानती थीं और उनकी मुरीद थीं। लेकिन यही परमार पिछले कुछ दशक में अप्रासंगिक से हो गए क्योंकि सरकारों ने, यहाँ तक कि कांग्रेस की ही सरकारों ने, उनकी सुध नहीं ली।

हिमाचल परमार के दिल में बसता था। उनकी उपेक्षा का आलम यह कि उनके नाम से दिया जाने वाला भाषा संस्कृति विभाग का राज्य पुरस्कार पिछले 13 साल से नहीं दिया गया है। वैसे विभाग इस तरह के चार पुरस्कार देता है और इनमें से एक भी 13 साल से नहीं दिया गया। इसके अलावा ले-देकर सोलन जिले के नौणी में स्थित बागबानी विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर है।

कांग्रेस ने उनकी उपेक्षा की। इसकी पुष्टि उनके पोते के कुछ माह पहले भाजपा में शामिल हो जाने से हो जाती है। परमार के पोते और पूर्व कांग्रेस विधायक कुश परमार के बेटे चेतन परमार जब भाजपा में शामिल हुए तो उनका आरोप था कि आज कांग्रेस हिमाचल निर्माता वाईएस परमार के योगदान को भूल गई है। इस पार्टी को मेरे दादाजी और पिता ने अपने खून-पसीने से सींचा था लेकिन वीरभद्र सिंह के नेतृत्व ने यशवंत सिंह परमार के नाम को एक सोचे समझे षड्यंत्र के तहत खत्म करना शुरू कर दिया था।

दरअसल परमार की उपेक्षा कांग्रेस के ही भीतर की राजनीति का हिस्सा है। कांग्रेस परमार के प्रति कितनी सम्मान की भावना रखती रही यह इस बात से साबित हो जाता है कि जिसे वे हिमाचल निर्माता कहते रहे हैं उसकी जयंती बंद कमरे में मानते रहे। इस पर कोई प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम तक कभी आयोजित नहीं किया गया जबकि हर पांच साल बाद कांग्रेस की सरकार प्रदेश में रही है। राजनीति में इसे वीरभद्र सिंह बनाम परमार के रूप में देखा जाता रहा है। वीरभद्र सिंह विरोधी आरोप लगते हैं कि वे परमार के कद को छोटा करके रखना चाहते थे ताकि खुद उनका अपना कद उनसे छोटा न रह जाये। हालांकि वीरभद्र सिंह समर्थक और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री इसे गलत बताते हैं। अग्निहोत्री कहते है – ‘वीरभद्र सिंह के मन में परमार के प्रति बहुत सम्मान रहा है। 1985 में नौणी में परमार साहब के नाम से बागवानी एवं वानिकी विश्वविदयालय वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री रहते ही बना और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अप्रैल, 1988 में इसका उदघाटन किया।’

इसके बावजूद यह माना जाता है की परमार को कांग्रेस वो स्थान नहीं दे पाई जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे। बहुत दिलचस्प है कि परमार तो जीवन भर कांग्रेस में रहे, अब भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री ने परमार को सही सम्मान देने के लिए उनकी जयंती हर साल बड़े पैमाने पर मनाने का ऐलान किया है। सीएम जय राम ने कहा – ‘एक बंद कमरे में अब तक हिमाचल निर्माता परमार का जन्मदिन मनाया जाता रहा यह बड़े अफ़सोस की बात है। अगले साल से उनका जन्मदिन बड़े स्तर पर सरकार मनाएगी।’

परमार का जीवन

4 अगस्त, 1906 में परमार ने सिरमौर के एक छोटे गांव चनालग में जन्म लिया। लखनऊ से एलएलबी और समाजशास्त्र में पीएचडी की। सिरमौर में जन्मे परमार सिरमौर की रियासत में 11 साल तक सब जज और मजिस्ट्रेट रहे और बाद में न्यायाधीश के रुप में 1937 से 1941 तक सेवाएं दीं।

नौकरी की परवाह न करते हुए परमार सुकेत सत्याग्रह प्रजामंडल से जुड़े। उनके ही प्रयासों से यह सत्याग्रह सफल हुआ। परमार के प्रयासों से ही 15 अप्रैल, 1948 को 30 रियासतों का विलय हो सका जिसके बाद कहीं जाकर हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया। उसके बाद 25 जनवरी,1971 को इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। साल 1963 से 24 जनवरी, 1977 तक हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे और प्रदेश के विकास को नई दिशा दी। उन्हें 1957 में सांसद बनने का भी मौका मिला। परमार ने हिमाचल को केंद्र में रख कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘पालियेन्डरी इन द हिमालयाज’, ‘हिमाचल पालियेन्डरी। इट्स शेप एण्ड स्टेटस’, ‘हिमाचल प्रदेश केस फॉर स्टेटहुड’ और ‘हिमाचल प्रदेश एरिया एण्ड लेंगुएजिज’ काफी प्रसिद्ध हैं।

पर्यावरण के प्रति परमार के मन में विशेष चिंतन था। उन्होने एक बार कहा था – ‘वन हमारे बड़ा सरमाया है। इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल मे करनी है। नंगे पहाड़ों को हमें हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा।’

‘पंचायत टाइम्स’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक परमार को राजनैतिक सूझबूझ, वाकपटुता, कर्मठता और दूरदृष्टि के कारण मार्च 1947 में ‘हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल काउन्सिल’ का प्रधान चुना गया। परमार जब हिमाचल के राजनैतिक क्षितिज पर उभरे, तब यहाँ के लोग 31 छोटी-छोटी रियासतों में बँटे हुए थे। तब इन सभी रियासतों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और भौतिक विकास अत्यंत दयनीय दशा में था।

पत्रिका के मुताबिक 15 अगस्त, 1947 को देश तो आजाद हुआ परन्तु पंजाब हिल स्टेट के तहत पडऩे वाली पाँच बड़ी रियासतों-चंम्बा, मंडी, बिलासपुर, सिरमौर और सुकेत के अलावा शिमला हिल स्टेट के नाम से जानी जाने वाली 27 छोटी रियासतों में गुलामी का अंधकार छाया रहा। परमार और इनके सहयोगियों के लगातार अथक प्रयास से 15 अप्रैल, 1948 को 30 रियासतों को मिलाकर हिमाचल राज्य का गठन हुआ। तब इसे मंडी, महासू, चंबा और सिरमौर चार जिलों में बांट कर प्रशासनिक कार्यभार एक मुख्य आयुक्त को सौंपा गया। बाद में इसे ‘ग’ वर्ग का राज्य बनाया गया। वर्ष 1952 के आम चुनाव में 36 सदस्यीय विधानसभा में 28 कांग्रेस के और 8 निर्दलीय विधायकों के निर्वाचित होने के बाद 24 मार्च को मुख्यमंत्री परमार को बनाया गया। राजा आनन्द चंद के अधीन बिलासपुर अभी भी एक स्वतंत्र रियासत थी। जबकि प्रजा इसे हिमाचल में शामिल करने को आंदोलित थी। अंतत: पहली जुलाई, 1954 को इसका विलय हिमाचल में कर दिया गया। 1956 में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा हिमाचल को पंजाब राज्य में मिलाने की सिफारिश करने के उपरांत इसका दर्जा ‘ग’ से घटाकर इसे केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया और यहाँ 1 नवंबर, 1956 को उप-राज्यपाल की नियुक्ति के साथ ही ‘हिमाचल टैरिटोरियल काउन्सिल’ गठित कर दी गई। इसके विरोध में प्रदेश के मंत्रिमंडल सहित मुख्यमंत्री डॉ. परमार ने त्यागपत्र दे दिया और यहाँ लोकतंत्र की बहाली का अभियान जनसभाओं, प्रदर्शनों, ज्ञापनों आदि के माध्यम से जारी रखा। लंबे संघर्ष के बाद 1963 में तत्कालीन गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने लोकसभा में एक वक्तव्य में कहा-”निरुत्साहित मन से कोई कार्यवाही करने से बेहतर है कि जनप्रतिनिधियों को अपनी सरकार चलाने के लिए जो भी शक्तियां हम प्रदान करना चाहते हैं, वे दे दें।’’ फलस्वरूप हिमाचल टैरिटोरियल काउन्सिल को विधानसभा में परिवर्तित कर दिया गया और पहली जुलाई, 1963 को परमार के मुख्यमंत्रित्व में हिमाचल सरकार का गठन हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद परमार ने हिमाचल के चहुँमुखी विकास के लिए रात-दिन एक कर दिया। उठते-बैठते, सोते-जागते उन्हें इस पर्वतीय क्षेत्र को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने के साथ ही इसे एक सुदृढ़ रूप-आकार देने की धुन सवार रहती थी। हिमाचल के लिये अथक काम के बाद 2 मई, 1981 को परमार दिवंगत हो गए।

परमार के नाम पर विश्वविद्यालय

यशवन्त सिंह परमार के नाम पर जिस बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (सोलन) का नाम रखा गया वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) 2018 में देश के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में शामिल है। नौणी विवि देशभर के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में 71वें स्थान पर है। विश्वविद्यालयों की शीर्ष 100 की श्रेणी में हिमाचल प्रदेश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। एशिया में यह अपने तरह का पहला विश्वविद्यालय है जिसमें बागवानी और वानिकी की शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार (एक्सटेंशन) होता है। दरअसल बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय की शुरुआत एक कृषि कालेज के रूप में 1962 में हुई थी। तब यह पंजाब विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। 1970 में जब हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) की स्थापना हुई तो इस कालेज में एचपीयू का परिसर खोल दिया गया। इसके बाद 1978 में पालमपुर कृषि विश्विद्यालय, पालमपुर (कांगड़ा) की स्थापना हुई तो उसका हार्टिकल्चर काम्प्लेक्स यहाँ खोला गया। इस तरह लम्बे सफर के बाद पहली दिसंबर, 1985 को यहाँ उस समय के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कोशिशों से सम्पूर्ण यशवन्त सिंह परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय शुरू हो गया। 30 अप्रैल, 1988 को तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने इसका उदघाटन किया। परमार के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय में करीब 54 पाठ्यक्रम हैं जिनमें से 17 पीएचडी से जुड़े हैं। विश्वविद्यालय परिसर करीब पौने छह किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और आधुनिक सुविधाओं वाले भवन वहां हैं।

‘अब करेंगे कार्यक्रम’

परमार की जयंती अब महज रस्म अदायगी नहीं रहेगी। करीब साढ़े तीन दशक से चली आ रही परिपाटी को बदलते हुए जय राम सरकार ने निर्णय किया है कि हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार की जयंती पर बड़ा समारोह आयोजित किया जाये। खुद मुख्यमंत्री जय राम ने परमार की जयंती के अवसर पर इसका ऐलान किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि परमार की जयंती पर अब तक विधानसभा के एक छोटे से हॉल में कार्यक्रम होते आए हैं, परंतु रस्म अदायगी के रूप में एक छोटा सा कार्यक्रम कर देना नाकाफी है। इस पुरानी

व्यवस्था को बदला जाएगा और भविष्य में पीटरहॉफ में एक बड़ा समारोह सरकार द्वारा आयोजित किया जाएगा। जय राम ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को परमार के योगदान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसलिए जरूरी है कि बड़े समारोह में उनकी जीवनी दिखाई जाए और युवाओं को बताया जाए कि परमार हिमाचल के लिए क्या सोच रखते थे और उन्होंने प्रदेश के लिए क्या किया है। विधानसभा में कार्यक्रम हिमाचल प्रदेश संसदीय समूह ने आयोजित किया था जहाँ सीएम ने यह घोषणा की। जय राम ने कहा कि परमार का प्रदेश के किसानों के कल्याण और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति हमेशा संवेदनशील दृष्टिकोण रहा। उन्होंने हमेशा ही इनके समग्र विकास को प्राथमिकता दी। उन्हीं के नेतृत्व में प्रदेश को अलग पहचान बनाने में सफलता मिली और हिमाचल प्रदेश भारतीय गणराज्य के 18वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। जय राम ने कहा कि परमार ने प्रदेश में सड़कों के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, क्योंकि वे मानते थे कि सड़कें ही पहाड़ी राज्य के विकास की भाग्य रेखाएं हैं। हमें परमार के जीवन और कार्य से प्रेरणा लेनी चाहिए। वैसे इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, परमार के पुत्र पूर्व विधायक कुश परमार और उनके परिवार के सदस्य भी अन्य के साथ उपस्थित थे।

जीतने की आदत होना भी ज़रूरी है

सिंधू की विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में हार पर सवाल उठने और उस पर चर्चा होना स्वाभाविक है। यह भी कहा जाता है कि हार और जीत तो खेल का हिस्सा है। इसे खेल भावना के हिसाब से लेना चाहिए। यह बात बहुत हद तक सही है। यह भी सही है कि पुसारला वेंकेट सिंधू पिछले कई सालों से देश के लिए पदक जीतती आ रही है। अब तक वह विश्व चैंपियनशिप में दो रजत, दो कांस्य जीत चुकी है। इसके अलावा उसके नाम एक ओलंपिक रजत पदक भी है। बैडमिंटन के कुछ जानकारों का कहना है कि सिंधू की यह उपलब्धि कम नहीं है। वह पिछले पांच साल से लगातार सभी प्रतियोगिताओं के सेमीफाइनल या फाइनल में खेल रही है। इन लोगों को इस बात पर ऐतराज है कि सिंधू के ‘फैन’ और आम आदमी सिंधू की आलोचना करने में लग गए हैं। यह आलोचना नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार सिंधू अगर लगातार अपनी फार्म को बरकरार रख कर ऐसा ही प्रदर्शन करती रहती है तो एक समय वह खिताब भी जीतने लगेगी।

यह बात बहुत हद तक सही हो सकती है पर पूर्णतया सही नहीं है। यदि समय के अनुसार देखा जाए तो यह देखा गया है कि समय के साथ चलते हुए भी खिलाडी एक समय अपनी सर्वश्रेष्ठ फार्म में होता है। बैडमिंटन जैसे खेल में यह फार्म ज़्यादा समय तक बरकरार नहीं रहती। सायना नेहवाल इसकी मिसाल है। राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक और ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद वह कोई बहुत बड़ा परिणाम नहीं दे पाई।

बात फाइनल की

इस बात पर प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या सिंधू जैसी खिलाडी के प्रशिक्षण में कहीं कोई कमी है? क्या वह मानसिक तौर पर उस स्तर पर नहीं है जिसकी ज़रूरत विश्व स्तर का टूर्नामेंट जीतने के लिए होती है? प्रतिभा और खेल के स्तर के हिसाब से देखें तो सिंधू को नेहवाल से बेहतर खिलाड़ी माना जाता है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है। जब सिंधू और नेहवाल का मुकाबला पहले, दूसरे या तीसरे दौर के मैचों में होता है तो जीत सिंधू की होती है लेकिन जब टक्कर फाइनल में होती तो जीत नेहवाल की होती है। राष्ट्रमंडल खेलों के फाइनल में यही हुआ और देश की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी ऐसा ही परिणाम सामने आया। गोल्डकोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों के सेमीफाइनल में सिंधू ने कनाडा की मिशेल को 21-18, 21-8 से परास्त किया जबकि नेहवाल को स्कॉटलैंड की क्रिस्टी गिलमोर को 21-14, 18-21, 21-17 से हराने में एडी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा। पर फाइनल में सायना नेहवाल ने सिंधू को सीधी गेम में 21-18, 23-21 से परास्त कर दिया। जहां तक राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता की बात है तो उसमें भी सायना ने सीधी गेमों में 21-17, 27-25 से पराजित किया।

इससे यह बात साबित होती है कि सिंधू फाइनल का दवाब नहीं ले पाती। फिर वह फाइनल चाहे सायना के खिलाफ हो या कैलोरिना मारिन के खिलाफ या फिर जापान की यामागुच्ची सामने हो। यही खिलाडी यदि उसे फाइनल के अलावा किसी और दौर में मिलें तो पूरी संभावना है कि सिंधू जीते।

जीतने की आदत

इन हालात में पंडितों का यह कहना कि सिंधू वक्त के साथ जीतने लगेगी, कोई मायने नहीं रखता। खेल मनोचिकित्सकों की राय में जीतने की भी एक आदत होती है। मारिन चाहे छोटे टूर्नामेंटस में हराती रहे लेकिन वह विश्व चैपिंयनशिप या ओलंपिक में मानसिक तौर पर इतनी मज़बूत हो कर आती है कि उसे फाइनल में हरा पाना किसी भी कमज़ोर दिमाग के खिलाडी के लिए संभव नहीं। रियो में वह पहला गेम 19-21 से हारने के बाद भी दूसरी गेम 21-12, 21-15 से जीत कर स्वर्ण पदक ले गई। दूसरी और सिंधू को लें तो वह विश्व चैंपियनशिप में पहली गेम में 14-9 की और बाद में 15-11 की बढ़त लेने के बाद भी कभी चैंपियन की तरह नहीं खेली। इससे ऐसा लगने लगा था कि शायद वह जीतने के लिए मानसिक रूप से तैयार ही नहीं है। यह दूसरी गेम में सही साबित हो गई। देखा जाए तो सिंधू ने दूसरी गेम तो शुरू होते ही 0-5 से पिछड कर खो दी थी। उसके बाद तो औपचारिकता ही नजऱ आई। बात चाहे कुछ लोगों को पसंद आए या नहीं लेकिन यह सही है कि यदि सिंधू को मानसिक रूप से जीतने के लिए तैयार करने में हमारे प्रशिक्षक और मनोविज्ञानी सफल नहीं होते तो देश के लिए स्वर्ण पदक आना संभव नहीं। बात सिर्फ बैडमिंटन की नहीं, बाकी खेलों की भी यदि स्वर्ण पदक पाना है तो जीतने की आदत डालना ज़रूरी है।

देश में ज्य़ादातर मुद्दों की वजह रहा अयोध्या का संग्राम

अयोध्या में राम मंदिर बने या न बन पाए लेकिन देश में इसका खासा असर तो रहा। आज़ादी के बाद ही देश की अपनी प्राचीन संस्कृति और गौरव को बचाने की चाहत बढ़ी। यह चाहत धीरे-धीरे देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी पकड़ मज़बूत करती गई। यह पकड़ धीरे-धीरे चुनौती देने की स्थिति में आ गई।  जाने कितनों ने बड़ी खामोशी से अयोध्या में युद्ध के की प्रक्रिया जारी रखी और एक दिन वह ढांचा टूट गया जो भारत में विदेशी आक्रामण की याद दिलाता था।

आज़ाद भारत में ढांचे का टूटना भी सदियों से अयोध्या में लगातार चलते रहे युद्धों का समाज में प्रथम महासंग्राम था। यह महासंग्राम निश्चय था समाज में परिवर्तन का। यह एक कोशिश थी बदलाव की। बदलाव हुआ भी।

आधुनिक हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘आयोध्या का चश्मदीद’ पुस्तकों की कड़ी को राम और जन्मभूमि पर प्रामाणिक पुस्तक माना है। उन्होंने तो यह तक लिखा ‘भगवान राम अयोध्या में रहे लेकिन उन्हें आम लोगों तक काशी  (बनारस या वाराणसी का प्राचीन नाम) ने पहुंचाया। तुलसीदास ने काशी में रामचरित मानस रची और अब पांच सौ साल से भी ज्य़ादा समय के बाद बनारस के ही लेखक हेमंत शर्मा की ये पुस्तकें आई हैं।’

आधुनिक पत्रकारिता को इतिहास जैसा महत्व देने के लिए मशहूर पत्रकार हेमंत शर्मा ने शहर अयोध्या को उसके प्राचीन गौरव के साथ जहां तलाशा है, वहीं आधुनिक अयोध्या की एक पहचान रही तीन गुबंदों के खिलाफ चले महासंग्राम को महाभारत के संजय की तरह वह युद्धभूमि में मौजूद रह कर पूरे महासंग्राम का चश्मदीद बन कर अपनी तब की रिपोर्टिंग से वह पेशेवर तेज दिखाया है जो तब की ‘जनसत्ता’ में छपा था।

तब ‘जनसत्ता’ के संपादक थे दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी। यहां यह बताना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तब अयोध्या में हुए महासंग्राम की रिपोर्टिंग तटस्थता, गुणवत्ता और सच्चाई के साथ दूसरे कई अखबारों ने तब नहीं की। जिस पर प्रेस आयोग ने आपत्ति जताई।

लेकिन ऐसा कोई आक्षेप तब की ‘जनसत्ता’ पर नहीं लगा।

‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ दोनों ही किताबें पहली नज़र में आपको देखने और पढऩे के लिए बेबस कर देती हैं। आप भी इन्हें देखें और पढ़ डालें। खूबसूरत छपाई, ढेरों चित्र और पूरी प्रस्तुति बेहद बढिय़ा है।

अनंत काल की उड़ान के लिए यायावर मन

मनुष्य यात्राएँ क्यों करता है! क्या स्वभाव से यायावरी उसके भीतर है? अथवा कुछ नया जानने की जिज्ञासा उसे सुदूर देशों की यात्रा के लिए प्रेरित करती रहती है? चरैवति-चरैवति का सिद्धांत पहली बार पैर का अहसास होते ही क्षण भर भी न बैठने के लिए उत्सुक बालक के भीतर देखा जा सकता है जो अपनी यात्रा का गंतव्य नहीं जानता पर चलना चाहता है-निरंतर! ऐसा ही भाव कुछ उन कलमकारों के भीतर जरूर पैदा हुआ होगा जिन्होंने अनंत यात्राएँ की-आँख खोलकर, मन की आँख जो सब देख सकती है, शिव की तरह! सोचिए कि वास्को डी गामा यात्रानुमा खोज पर न निकला होता तो हमारी पहचान क्योंकर हमसे हो पाती! या ऐसी ही यात्राएँ मैगास्थानीज ने चन्द्रगुप्त के राज्य में न की होती या ह्वेनसांग भारत न आता या कुमारजीव चीन न जाते तो कितना ही ज्ञान-संवेदना का सागर सूखा ही रह जाता! ‘जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठ’ कहना बिना अनुभव के तो संभव नहीं हुआ होगा। अलेक्जेंडर पोप ने कहा था ‘जिसने केवल घर देखा है उसने संसार की किताब का केवल पहला पन्ना पढ़ा है, बाकी पूरी पुस्तक अभी पलटनी बाकी है’

मेघदूत लिखने वाला कवि कितना बड़ा घुमक्कड़ होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। मेघ के बहाने रामगिरी पर्वत से लेकर अल्कापुरी तक की यात्रा क्या मेघ और यक्ष ही कर रहे थे? कवि कालिदास साथ नहीं दिखे? पाठक रम्य होकर अल्कापुरी तक पहुँच जाता है और सारी यात्रा एक सुखद रोमांच में तब्दील हो जाती है।

साहित्य की परिधि में यात्रा कभी वृत्तांत बनकर आई, तो कभी घुमक्कड़ी का शास्त्र बनकर! कभी यात्रा संस्मरण लिखे गए तो कभी यात्रा ललित निबन्ध का रूप लेकर आई। रूखे- सूखे वृतांतों में यात्रा एक विवरण रिपोर्ट नुमा आलेख भर होकर ही रह गई वहीं काव्य और रहस्य के बादलों के भीतर उतरे पाठक के लिए गहन जीवनानुभव भी बनी।

आधुनिक काल में भारतेंदु युग में गद्य की शुरुआत होती है। गद्य के आरम्भ के साथ ही यात्राओं का रोचक विवरण इसी काल से मिलने लगता है। बनारसी दास जैन की आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ को किसी अर्थ में यात्रावृत्त भी समझना चाहिए। व्यापार के सिलसिले में देश भर की यात्राएँ करने वाले जैन साहब ने चोरों के साथ यात्रा के अपने अनुभवों को बड़ी रोचकता से पिरोया है। भारतेंदु युग में तीर्थाटन से जुड़े अनुभव ही यात्रा साहित्य के रूप में रचे गए। भारतेंदु के 5 यात्रा वृत्तांत कवि वचन सुधा में 1871 के आसपास प्रकाशित हुए। ये सभी हरिद्वार, लखनऊ, सरयूपार, वैद्यनाथ की यात्रा पर आधारित थे। इस काल में तीर्थ स्थान से लेकर विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभवों को यात्रा वृत्त के रूप में लिखा गया। 1883 में प्रकाशित ‘मेरी लंदन यात्रा’ को पहला यात्रा वृत्तांत माना गया। द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव यात्रा तथा ठाकुर गदाधर सिंह ने चीन यात्रा (चीन में तेरह मास) पर यात्रा विवरण प्रस्तुत किए। सत्यदेव परिव्राजक इस युग के प्रमुख यात्रा साहित्यकार हैं।

यात्रा साहित्य का वास्तविक स्वरूप राहुल जी के आने से निर्मित होता है। राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़ी पर पूरा शास्त्र लिखा जिसे पढ़कर वास्तव में महाभिनिष्क्रमण के लिए तरुण एवं तरुणियाँ निकल पड़े। सचमुच पूरा शास्त्र है- किस उम्र में घर छोडऩा चाहिए, किस श्रेणी के घुमक्कड़ के लिए क्या जानना आवश्यक है, माता की भूमिका, पिता की भूमिका, पति पत्नी की भूमिका, स्वयं घुमक्कड़ का संतुलन और जिज्ञासा का मेल सभी पर अत्यंत विस्तार से राहुल जी बात करते हैं ‘कौन समय है जबकि तरुण को महाभिनिष्क्रमण करना चाहिए? मैं समझता हूँ इसके लिए कम-से-कम आयु 16-18 की होनी चाहिए और कम-से-कम पढऩे की योग्यता मैट्रिक या उसके आसपास वाली दूसरी तरह की पढ़ाई। मैट्रिक से मेरा मतलब खास परीक्षा से नहीं है, बल्कि उतना पढऩे में जितना साधारण साहित्य, इतिहास, भूगोल गणित का ज्ञान होता है, घुमकक्ड़ी के लिए वह अल्पतम आवश्यक ज्ञान है। मैं चाहता हूँ कि एक बार चल देने पर फिर आदमी को बीच में मामूली ज्ञान के अर्जन की फिक्र में रुकना नहीं पड़े।’ (घुमक्कड़ शास्त्र)

उनके घुमक्कड़ धर्म की खासियत है- कि वह किसी जाति-धर्म-वर्ण भेद को नहीं मानता, समदर्शिता और आत्मीयता का व्यवहार सिखाता है, काव्य रस के समान आह्लादकारी है, आत्मसम्मान सिखाता है, शारीरिक श्रम पर बल देता है, प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान रखने पर बल देता है तथा बेहतर आदमी होना सिखाता है। राहुल जी की लद्दाख यात्रा, तिब्बत यात्रा, यूरोप यात्रा, एशिया के दुर्गम भूखंडों में एवं ऐसी ही अनेक यात्राओं के उनके अनुभव यात्रा संसार से ही परिचय नहीं कराते बल्कि स्वधर्म की पहचान के लिए भी प्रेरित करते हैं। उनकी यात्राएँ केवल पुरुषों के लिए ई नहीं बल्कि समान रूप से स्त्रियों के लिए भी हैं ‘स्त्रियों को घुमक्कडी के लिए प्रोत्सांहित करने पर कितने ही भाई मुझसे नाराज होंगे, और इस पथ की पथिका तरुणियों से तो और भी। लेकिन जो तरुणी मनस्विनी और कार्यार्थिनी है, वह इसकी परवाह नहीं करेगी, यह मुझे विश्वास है। उसे इन पीले पत्तों की बकवाद पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जिन नारियों ने आँगन की कैद छोड़कर घर से बाहर पैर रखा है, अब उन्होंने बाहर विश्वन में निकलना है। स्त्रियों ने पहले-पहल जब घूँघट छोड़ा तो क्या कम हल्ला मचा था, और उन पर क्या कम लांछन लगाये गये थे? लेकिन हमारी आधुनिक-पंचकन्याओं ने दिखला दिया कि साहस करने वाला सफल होता है, और सफल होने वाले के सामने सभी सिर झुकाते हैं। मैं तो चाहता हूँ, तरुणों की भाँति तरुणियाँ भी हजारों की संख्या में विशाल पृथ्वी पर निकल पड़े और दर्जनों की तादाद में प्रथम श्रेणी की घुमक्कड़ा बनें।’

राहुल जी के बाद स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, भगवत शरण उपाध्याय, रामवृक्ष बेनीपुरी जी का नाम भी उल्लेखनीय है। यूरोपीय देशों पर बेनीपुरी जी ने दो यात्रा वृत्तांत लिखे- पैरों में पंख बाँधकर तथा उड़ते चलो-उड़ते चलो। डायरी शैली में खोजपूर्ण और नाटकीय तरीके से उन्होंने इन यात्राओं का वर्णन किया। ‘फ्रांस की कामिनियाँ-कैसी रंगीन कल्पना है उनके बारे में! किन्तु सामने के पेड़ पर जो दो पंडुक बैठे दीख रहे हैं, यह कहते हैं-कामिनियों को पेरिस में देखना, अभी हमें देखो!’

वास्तव में यात्रा साहित्य के मील के पत्थर हैं- मोहन राकेश, अज्ञेय और निर्मल वर्मा जिनके यात्रा संस्मरण, यात्रा काव्य पाठक को यात्रा का सुखबोध ही नहीं कराते बल्कि उस कालानुभव को साकार भी कर देते हैं। अज्ञेय जैसे संगीत की तान लेते हुए लय और रागिनियों के साज-ओ-सामान के साथ ‘एक बूँद सहसा उछली’ में इटली का चित्र संजोते हैं। सचमुच पाठक उन भव्य इमारतों की गलियों के भीतर कदम रख देता है, फौन्तेना त्रेविया तक पहुँच जाता है पर अज्ञेय उसे सिर्फ सैर नहीं कराते बल्कि पूर्व और पश्चिम के बीच की लकीर को भी साफ़-साफ़ दिखा देते हैं-

‘अंगूर की कटी-छटी बेलें-इतनी नीची कटी हुई कि पौधे मालूम हों। लिलाक की झाडिय़ाँ जिनके बकायन-जैसे फूलों के गुच्छों का रंग रात में नहीं पहचाना जाता। पर मधुर गन्ध वायुमण्डल को भर रही है। तरह-तरह के खंडहर जिनमें कुछ चित्रों द्वारा परिचित हैं कुछ अपरिचित। स्वच्छ सुन्दर सड़कें, जहाँ-तहाँ प्रतिमा-मण्डित फव्वारे-ये फव्वारे न केवल इटली की मूर्तिशिल्प और वास्तु-प्रतिभा के उत्कृष्ट नमूने हैं वरन पौराणिक आख्यानों से इतने गुँथे हुए हैं कि पूरी क्लासिकल परम्परा उनकी फुहार के साथ मानो झरती रहती है। नगर के मध्य में फोन्तांना दि त्रेवी मानो कल्पस्रोत्र हैं-वहाँ पर यात्री जल में सिक्का फेंककर मन्नत करते हैं कि उनका फिर रोम आना हो। सुना है कि त्रेवी की शक्ति दिल्ली के ‘हडिय़ा पीर’ से कुछ कम नहीं है; किन्तु इटली फिर आना चाहकर भी मैंने उसका सहयोग नहीं माँगा! यों उत्सुक अथवा चिन्तित प्रेमी-युगलों की भीड़ त्रेवी पर लगी ही रहती है और विदेशी यात्रियों को स्थायी स्मृति-सुख देने के लिए गिद्धों की-सी तीव्र द्वष्टिवाले फोटोग्राफरों की पंक्तियाँ भी दिन-रात कैमरे और रोशनी का सामान लिये फव्वारे के आस-पास मंडराती रहती हैं।’ (एक बूँद सहसा उछली)

अज्ञेय अपने यात्रा काव्य में पूर्व और पश्चिम को समझने की युक्तियाँ देते हैं, काव्यास्वादन कराते हैं, विचार और संवेदना को साथ जगाते हैं, साथ ही पाठक के लिए सोचने की अनेक सरणियाँ निर्मित कर देते हैं। अज्ञेय के समान काव्यात्मक प्रतिमाएं बहुत कम ही यात्रा पथिक बना सके हैं। अज्ञेय कला के पारखी तो हैं ही!

मोहन राकेश के यात्रा वृत्त ‘आखिऱी चट्टान तक’ को पढ़ते हुए कुछ वैसी ही भटकन का अहसास रहता है जैसा किसी अनजान पथ पर चलें वाले यात्री को होता होगा! भटकन भी है और उतना ही और जान्ने, भीतर धंसने का उत्साह भी! एक क्षण के लिए भी उससे अलग नहीं हो सकते, जब तक आखिरी चट्टान तक पहुँच न जाएँ। पढ़ते हुए भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सतपुड़ा के जंगल याद आ जाती है। धंस सको तो धँसो इनमें….

बम्बई से कन्याकुमारी की यात्रा के इस वृत्तांत में बूढ़े आशिकमिजाज मल्लाह के किस्से भी हैं, सिंधी परिवार के साथ बिताई शाम है, अविनाश के साथ भोपाल का टाल है और बीना तक के टिकट पर बम्बई जाते लडके के किस्से भी। ‘हर आबाद शहर में कोई एकाध सडक़ ज़रूर ऐसी होती है जो न जाने किस मनहूस वजह से अपने में अलग और सुनसान पड़ी रहती है। इधर-उधर की सडक़ों पर ख़ूब चहल-पहल होगी, पर बीच की वह सडक़, अभिशप्त उदास और वीरान ऐसे नजऱ आती है जैसे बाक़ी सडक़ों ने कोई षडयन्त्र करके उसका बहिष्कार कर रखा हो। मडगांव में एक ऐसी ही सडक़ के बीच में रुककर मैं कुछ देर चार-पाँच अधनंगे बच्चों को सिगरेट की ख़ाली डिबियों से अपना ही एक खेल खेलते देखता रहा।’ (आखिऱी चट्टान तक)

निर्मल वर्मा एक कदम आगे चलकर चीड़ों पर चांदनी में यूरोप के पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के अंतर को दिन और रात के वर्णन से जीवित कर देते हैं। विश्व युद्ध के बाद बर्लिन की दीवार का गिरना यूरोप के लिए जिस परिवर्तन का सूचक बना, उसकी मौजूदगी निर्मल वर्मा के इस वृत्तांत में हर जगह है। ब्रेख्त के बर्लिन एन्सेम्बल की ओर जाते हुए या प्राग के ‘होस्पेदाओं’ से होकर आइसलैंड जाते हुए! निर्मल जैसे जीवन को, साँस लेने को चमत्कार मानते हैं, वैसे ही यात्राओं को भी। यात्राएँ उनको चमत्तकृत करती हैं, और हर बार लौट कर आने के लिए निमंत्रित करती हैं। चीड़ों पर चांदनी की भूमिका में ही वे लिखते हैं ‘अरसे बाद अपने इन स्मृति-खंडों को दोबारा पढ़ते समय मुझे एक अजीब-सा सूनापन अनुभव होता रहा है। कुछ वैसा ही रीता अनुभव जब हम किसी जिन्दा फडफ़ड़ाते पक्षी को क्षण-भर पकड़कर छोड़ देते हैं। उसकी देह हमसे अलग हो जाती है लेकिन देर तक हथेलियों पर उसकी धड़कन महसूस होती रहती है। एक दूरी का अभाव जो सफ़ारी-सूटकेस पर विभिन्न देशों के लेबलों पर लटका रहता है। उन्हें न रख पाने का मोह रह जाता है न फेंक पाने की निर्ममता ही जुड़ पाती है।

इन फटे-पुराने लेबलों के पीछे कितने चेहरे हाथ से हाथ मिलाने के गरम स्पर्श, होटलों के खाली कमरे छिपे हैं, क्या इनका लेखा-जोखा कभी संभव हो सकेगा’।

यह अहसास लगभग हर यात्री के भीतर मौजूद होता है। यात्राएँ छूट जाती हैं, पर हथेलियों पर उसकी धडकन हमेशा के लिए अंकित हो जाती है। निर्मल सिर्फ यात्रा ही नहीं करते बल्कि उस यात्रा के विचार सूत्रों को साहित्य और जीवन की परिधि पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं। ब्रेख्त का जिक्र करते हुए वे पूर्वी और पश्चिमी देशों के बनावटीपन को भी सामने ले आते हैं ‘पश्चिम के साहित्यकार ब्रेख्त के महान कृतित्व को स्वीकार करते हैं उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व को नहीं। पूर्वी देशों के आलोचक उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व की सराहना करते हैं, किन्तु उनके कृतित्व के संबंध में, शायद पूरी तरह से आश्वस्त नहीं।’ (चीड़ों पर चांदनी)।

यात्राएं अद्भुत संसार बनाती हैं। इस संसार के भीतर अनेकों यात्रा संस्मरण यूरोप और विदेश यात्राओं के संसर्ग से बने (नए चीन में दस दिन: गोविन्द मिश्र) (चलते तो अच्छा था: असगर वजाहत- ईरान और आइजारविजान की यात्रा) तो वहीं किसी पर्वतीय प्रदेश के अद्भुत सौन्दर्य से अभिभूत होकर (कृष्णा सोबती: बुद्ध का कमंडल लद्दाख) पर अभी हाल में ही प्रकाशित यह भी कोई देस है महराज (अनिल यादव) पढ़कर एक नई यात्रा का अहसास होता है- जो पूर्वोत्तर राज्य के भीतर के अंतर्विरोधों, समस्याओं, मान्यताओं के साथ-साथ उनकी शोचनीय स्थिति को भी दिखती है। उग्रवाद का अध्ययन करता लेखक पहले ही झटके में सुनता है कि उग्रवादी तो वहाँ ऐसे घुमते हैं जैसे पानी में मछली। बेरोजगारी, पलायन, भाषा के संकट से जूझते पूर्वोत्तर के लिए सरकारें कितनी सजग हैं, यह सवाल हवा में लगातार तैरता रहता है। आदिवासी अस्मिताओं, रीति रिवाजों से लेकर शोषित होने वाले और शोषण करने वालों की दुनिया को लेखक खोलकर रख देता है। पुराने और नए लामाओं के बीच सोच का अंतर राजनैतिक प्रक्रिया में भागीदारी के प्रश्न को देखने का नजरिया बदल देता है। टीवी के आने से लामाओं की दुनिया बदली है और बाहरी दुनिया राजनीति में भाग लेकर कार्य करने की इच्छा भी बढ़ी है।

‘दूसरा बड़ा परिवर्तन मठों में केबिल कनेक्शन वाले टीवी का पहुंचना है. जिन पुरातन इमारतों का सन्नाटा सदियों तक आदमी की जांघ की हड्डी से बने वाद्ययंत्रों से टूटता था उनमें रहने वाले लामा अब सीरियलों और फिल्मों पर खूब बात करते हैं। उन दिनों बाइक के एक विज्ञापन का जिंगल हुड़ीबाबा बाकी किशोरों की तरह लामाओं में भी हिट था। टीवी अपने साथ वर्षों तक चलने वाला लंबा शास्त्रार्थ लेकर आया था। पुराने भिक्षुओं का कहना था, औरत की अर्धनग्न देह और फिल्मों की हिंसा ब्रह्मचारियों को भ्रष्ट करेगी। युवाओं का कहना था जबरदस्ती होगी तो चोरी छिपे कहीं और देखेंगे जिससे झूठ अपराधबोध जैसी विकृतियां आएंगी. अंतत: टीवी जीता और साधना के नीरस जीवन में रंगीन दुनिया दाखिल हो गईं।’

इस रंगीन दुनिया ने तंत्र में मदिरा के जगह पेप्सी को पहुँचा दिया तो ‘टीजी रिनपोछे लुमला विधानसभा से चुनाव भी लड़े’ इस बात की भी सूचना मिलती है। इस यात्रा संस्मरण ने मात्र यात्रा का ही विवरण नहीं दिया, बल्कि यात्राओं के भीतर के जरूरी अहसास को मूर्त कर दिया। मुक्तिबोध जिसे ज्ञान और संवेदन की साझेदारी मानते हैं वह यात्रा और उसके अहसास के सीझने में ही सम्पन्न होती है।

युग बदला, लोग पैदल पथ से बैलगाड़ी से होकर मोटर कार और हवाई जहाज की दुनिया में आ गए। अनुभवों की दुनिया में गाँव से बढ़कर देश, विदेश सब कुछ शामिल हुआ। शिक्षा ने इस समझ के दायरे विस्तृत किए। अब यात्राएं केवल लेखा जोखा भर नहीं है, बल्कि मनुष्य की निर्मिति में उनकी सहायक भूमिका है। ये यात्रा संस्मरण उसी निर्मिति के एक रूप को दिखाने का कार्य करते हैं। अज्ञेय के शब्दों में ‘घुम्मकड़ी एक प्रवृत्ति ही नहीं, एक कला भी है। देशाटन करते हुए नये देशों में क्या देखा, क्या पाया, यह जितना देश पर निर्भर करता है उतना ही देखने वाले पर भी। एक नजर होती है जिसके सामने देश भूगोल की किताब के नक्शे जैसे या रेल-जहाज के टाइम-टेबल जैसे बिछे रहते है; एक दूसरी होती है जिसके स्पर्श से देश एक प्राणवान प्रतिमा-सा आपके सामने आ खड़ा होता है-आप उसकी बोली ही नहीं, हृदय की धड़कन तक सुन सकते हैं। ‘

सुन सको तो सुनो घुमक्कड़ों की आवाज और सफरी झोले के साथ निकल पड़ो अपनी यात्रा पर …