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नीदरलैंड्स की बादशाहत बरकरार भारत का सफर क्वार्टर फाइनल तक

भारत ने महिला हाकी विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करते हुए क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। 1978 के बाद यह पहला मौका था जब भारत ने क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन वहां वह आयरलैंड से पेनाल्टी शूट आऊट में 1-3 से हार कर सेमी फाइनल में प्रवेश का मौका गंवा बैठा।

दूसरी और अक्तूबर 2011 से विश्व रैंकिंग में नंबर एक के स्थान पर चल रही नीदरलैंड्स की टीम ने एक तरफा फाइनल में आयरलैंड को 6-0 के भारी अंतर से हरा कर विश्व कप पर कब्जा कर लिया। इस जीत के साथ नीदरलैंड्स ने आठवीं बार यह खिताब अपने नाम कर लिया। इसके अलावा अर्जेंटीना, जर्मनी और आस्ट्रेलिया भी दो-दो बार यह खिताब जीत चुके हैं। नीदरलैंड्स और आस्ट्रेलिया ही दो ऐसी टीमें हैं जो लगातार दो बार विश्व कप जीती हैं।

1974 में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ और 1978 में इसमें 10 टीमों ने भाग लिया। 1976 में 11 टीमें और 2002 में सबसे ज़्यादा 16 टीमें इसमें थी। इसके बाद खेले गए सात विश्व कप मुकाबलों में 12-12 टीमें ही हिस्सा लेती रही। 2018 के इस विश्व कप में फिर 16 टीमों को भाग लेने दिया गया है। एफआईएच इस बात पर भी विचार कर रही हे कि 2022 में 24 टीमों को इसमें भाग लेने की मंजूरी दे दे।

इस विश्व कप में नीदरलैंड्स के लिए कभी कोई चुनौती थी ही नहीं। पूल ए में खेल रही इस टीम ने अपने पूल मैचों में एक तरफा जीत दर्ज की। इसने चीन को 7-1 से, दक्षिण कोरिया को 7-0 से और इटली को 12-1 से पराजित किया। इस प्रकार उसने पहले तीन मैचों में ही 26 गोल कर डाले जबकि उस पर मात्र दो ही गोल हुए। क्वार्टर फाइनल में उसने नंबर दो टीम व मेजबान को 2-0 से और सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया को 1-1 की बराबरी पर रहने के बाद शूटआऊट में 3-1 से पराजित किया।

फाइनल मैच तो पूरी तरह से एक तरफा था। आयरलैंड की टीम जिसने पूल बी में अमेरिका को 3-1 से और भारत को 1-0 से हराया था तीसरा मैच इंग्लैंड से 0-1 से हार गई थी। क्वार्टर फाइनल में उसने भारत पर शूट आऊट में 3-1 से विजय हासिल की। सेमीफाइनल में उसका खेल निखरा और उसने स्पेन को पूरे समय तक 1-1 से रोक रखा और फिर बाद में शूट आऊट में 3-2 से जीत दर्ज कर ली। फाइनल में वह कहीं नजऱ नहीं आई और नीदरलैंड्स जैसी मज़बूत टीम ने उसके पैर उखाड़ दिए।

तीसरे स्थान के लिए खेले गए मैच में स्पेन ने दो बार की विश्व विजेता आस्ट्रेलिया को 3-1 से परास्त कर कांस्य पदक पर कब्जा कर लिया।

भारत का प्रदर्शन

भारत के लिए इस बार कम से कम सेमीफाइनल में पहुंचने का सुनहरा मौका था। पूल बी में भारत के साथ विश्व की दो नंबर की टीम इंग्लैंड, 16 नंबर की आयरलैंड और सातवें नंबर की अमेरिका का रखा गया था। पहले मैच में जब भारत ने इंग्लैंड के साथ 1-1 की बराबरी हासिल कर ली तो एक आस बंधी थी कि कुछ अच्छा हो सकता है। अगला मैच आयरलैंड के साथ था जिसने पहले मैच में अमेरिका को 3-1 से पराजित किया था। हालांकि विश्व लीग में भारत आयरलैंड से 1-2 से हार चुका था लेकिन उम्मीद थी कि युवा व अनुभव की मिश्रित भारतीय टीम आयरलैंड को हरा सकती है। भारत आक्रामक हाकी खेलने के लिए जाना जाता है। पर 2-4-4-1 की पद्धति ने भारतीय रक्षा पंक्ति को तो मज़बूती दे दी पर गोल करने की क्षमता को काफी कमज़ोर कर दिया। इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि तीन पूल मैंचों में वह मात्र दो गोल की कर पाई जब कि उस पर तीन गोल हो गए। इस तरह भारत की टीम पूल में दो ड्रा खेल दो अंकों के साथ तीसरे स्थान पर आ गई। अंक तो अमेरिका के भी दो थे, पर उनका गोलांतर -2 था जबकि भारत का -1। इस प्रकार गोलांतर के कारण भारत चार टीमों के पूल में तीसरा स्थान पा गया।

भारत की किस्मत अच्छी थी कि ‘क्रासओवरÓ मैचों में उसकी टक्कर सबसे कमज़ोर टीम इटली से हो गई। ध्यान रहे पूल मैच में नीदरलैंड्स ने इटली को 12-1 से हराया था। भारत ने यह मैच 3-0 से जीत कर क्वार्टर फाइनल में स्थान बना लिया। यहां उसका मुकाबला संयोग से फिर आयरलैंड से हो गया। भारत के पास अपनी हार का बदला लेने का सुनहरा मौका था। सभी को उम्मीद थी कि भारत पूरी तरह चढ़ कर खेलेगा और पूल मैच की हार का बदला लेने के इरादे से हमले बनाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारत ने एक बार भी यह नहीं दिखाया कि उसे जीतने की भूख है। उसके सारे हमले आधे दिल से किए हुए लग रहे थे। आयरलैंड की 23 मीटर की लाइन से आगे जैसे भारत को कोई लक्ष्मण रेखा दिखाई देती थी। पूरे मैच में एक बार भी वह आयरलैंड पर कोई सार्थक हमला नहीं बना पाया। भारतीय ‘थिंक टैंकÓ शायद यह भूल गए कि मैच जीतने के लिए गोल करने ज़रूरी होते हैं। अपने गोल की रक्षा से आप बचाव तो कर सकते हैं पर मैच जीत नहीं सकते। टीम के कोच सजोर्ड मेरिजन ने बाद में कहा भी कि हमने पूरा ज़ोर रक्षण पर दिया था, इसी कारण पूरे टूर्नामेंट में हम पर मात्र तीन ही गोल हो सके। उनकी यह बात सही है, पर विश्व कप में टीमें जीत के लिए जाती हैं। प्रयोग का समय ऐसे टूर्नामेंटों से पहले होता है।

यदि भारतीय टीम के आयरलैंड के साथ पूल मैच की बात करें तो आयरलैंड की एक ही खिलाडी आना ओ फलैनगन ही भारत से जीत छीन उसे पराजय का हार पहना गई। 170 मैचों का अनुभव लिए आना ने दोनों फ्लैंकस से ज़ोरदार हमले तो बनाए ही साथ उसने भारत के सात पेनल्टी कार्नरों को बेकार करने में भी अहम भूमिका निभाई। आयरलैंड को पता था कि भारत के हमले मध्य मैदान से बनते हैं जहां रानी रामपाल, वंदना कटारिया, लिलिया मिंज और नेहा गोयल मौजूद रहती हैं। इस कारण उन्होंने जितना हो सका गेंद को भारतीय खिलाडिय़ों से दूर रखा। भारत ने मिले सातों पेनल्टी कार्नरों पर कुछ नहीं किया। उनमें कोई विविधता या तेजी नहीं दिखाई। कोई ‘इन डायरेक्टÓ शाट नहीं लिया। आयरलैंड को एक ही पेनल्टी कार्नर मिल जिसे आना ने गोल में मोड़ कर टीम को जीत दिला दी।

यह सही है कि भारत की रक्षा पंक्ति अच्छा खेली और उस पर पांच मैचों में तीन ही गोल हुए लेकिन यदि उसे एशिया खेलों में कुछ करना है तो गोल करने भी सीखने होंगे। वैसे भी कोरिया, चीन और जापान से जीतना इतना सहज नहीं होगा।

विश्व रैंकिंग में भारत नौवें स्थान पर

भारतीय महिला हाकी टीम ने विश्व के क्र्वाटर फाइनल में प्रवेश कर अपनी रैंकिंग में एक कदम का सुधार किया है। 1138 अंकों के साथ वह अब नौवें स्थान पर है। उसके बाद दक्षिण कोरिया 10वें, चीन 11वें और अमेरिका 12वें स्थान पर हैं। विश्वकप में खराब प्रदर्शन के कारण इन टीमों की रैंकिंग में गिरावट आई है। कोरिया की टीम नौवें से 10वें स्थान पर चीन आठवें से 11वें स्थान पर और अमेरिका सातवें से 12वें स्थान पर खिसक गया है।

रैंकिंग में सबसे ऊंची छलांग विश्वकप के उपविजेता आयरलैंड ने लगाई है। वह 16वें स्थान से सीधा आठवें स्थान पर पहुंच गया है। इससे पहले उसका सबसे ऊंचा स्थान 14वां था। विश्वकप विजेता नीदरलैंड्स पहले स्थान पर बनी रही है। उन्होंने फाइनल में आयरलैंड को 6-0 से मात दी। ध्यान रहे कि नीदरलैंड्स अक्तूबर 2011 से पहले स्थान पर बना हुआ है। विश्वकप में छठा स्थान लेने वाला इंग्लैंड अभी भी दूसरे स्थान पर था अब तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। विश्वकप में उसे चौथा स्थान मिला। अब तक तीसरे स्थान पर चल रही पैन अमेरिकी चैंपियन अर्जेटीना की टीम चौथे स्थान पर सरक गई। चौथे स्थान की न्यूज़ीलैंड की टीम खराब प्रदर्शन के कारण छठे स्थान पर चली गई। जर्मनी को एक स्थान का लाभ मिला और वह छठे से पांचवें स्थान पर आ गई। विश्वकप में आस्ट्रेलिया पर 3-1 से अप्रत्याशित जीत दर्ज करने वाली स्पेन की टीम रैंकिंग में सातवें स्थान पर पहुंच गई है। इससे पूर्व स्पेन 11वें स्थान पर था।

नई विश्व रैंकिंग:

  1. नीदरलैंड्स 2.           इंग्लैंड
  2. आस्ट्रेलिया 4.           अर्जेंेटीना
  3. जर्मनी 6.           न्यूज़ीलैंड
  4. स्पेन 8.           आयरलैंड
  5. भारत 10.         दक्षिण कोरिया
  6. चीन 12.         अमेरिका

जब दादा ने कहा गोल मत करो, इन्हें बस दौड़ाते रहो।

बात 1936 के बर्लिन ओलंपिक की है। भारतीय हाकी टीम की कप्तानी विश्व के सर्वश्रेष्ट खिलाड़ी ध्यानचंद को दी गई थी। यह ऐसा समय था जब दुनिया का कोई भी देश हाकी के खेल में भारत के सामने खड़ा भी नहीं हो सकता था। ध्यानचंद का यह तीसरा और आखिरी ओलंपिक था।

इस बार भारत थोड़ा उहापोह की स्थिति में था। इसका कारण था कि एक अभ्यास मैच में जर्मनी ने भारत को 4-1 से हरा दिया था। भारत के लिए यह चिंता का विषय था । इस विषय पर भारतीय हाकी के पदाधिकारियों की एक बैठक हुई। इस बैठक में फैसला हुआ कि टीम को मज़बूत करने के लिए अली इकतिदार शाह दारा को टीम में लिया जाए। यह वही दारा थे जिन्होंने भारत विभाजन के बाद 1948 में ओलंपिक में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व किया ।

बर्लिन में भारत की शुरूआत अच्छी रही। उसने सेमीफाइनल में फ्रांस को 10-0 से, और फाइनल में मेजबान जर्मनी को 8-1से हरा कर स्वर्ण पदक जीता। इस मैच में एक रोचक घटना हुई। जर्मन के गोलकीपर टीटो वार्नहोल्ज़ से टकरा कर ध्यानचंद एक एक दांत टूट गया। टीटो को वैसे भी बहुत आक्रामक गोलरक्षक माना जाता था।

ध्यानचंद ने मैदान के बाहर जा कर डाक्टरी सहायता ली और अंदर आते ही टीम के सदस्यों से कहा कि अब हम इन जर्मन खिलाडिय़ों को सबक सिखांएगे। हम इन पर गोल नहीं करेंगे। इसके बाद भारतीय खिलाडी जर्मन की ‘डी’ में गेंद ले जाते और फिर धुमाफिरा कर वापिस ले आते। बस गेंद जर्मन खिलाडिय़ों को छूने भी न देते। इसके बावजूद इस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 11 गोल किए। इतने ही गोल उनके भाई रूप सिंह ने भी किए थे।

इससे पूर्व 1932 के लास एंजलेस ओलंपिक में भारत ने दो मैचों में 35 गोल किए थे जबकि उनके खिलाफ दो ही गोल हो पाए। इन मुकाबलों में भारत ने जापान को 11-1 और मेजबान अमेरिका को 24-1 से परास्त किया था। इन 35 गोलों में से 12 गोल ध्यानचंद ने , 13 गोल उनके भाई रुप सिंह ने , 8 गोल गुरमीत सिंह खुल्लर ने व एक-एक गोल ब्रूम पीन्निगर और रिचर्ड कार ने किए। उसी ओलंपिक के एक मुकाबले में जापान ने अमेरिका को 9-2 से हरा कर रजत पदक जीता था।

दादा ध्यानचंद ने 31 वर्ष की आयु में रिटायरमेंट लेने से पहले तीन ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया और तीन स्वर्ण पदक जीते। उन्होंने सबसे पहले 1928 में एमेस्ट्रडम ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। यह पहला मौका था जब भारतीय हाकी टीम ओलंपिक में खेलने गई थी। 1928 में भारत ने लीग मे चार मैच खेले थे। उस समय भारत के पूल में बेल्जियम, डेनमार्क, स्विटजऱलैंड और आस्ट्रिया की टीमे थी। इन चार मैचों में भारत ने कुल 26 गोल किए जबकि भारत पर एक भी गोल नही हो पाया। इस दौरान भारतीय टीम ने आस्ट्रिया को 6-0 से , बेल्जियम को 9-0 से , डेनमार्क को 5-0 से और स्विटजऱलैंड को 6-0 से पराजित किया था।

दूसरे पूल में नीदरलैंड्स ने तीन मैच खेले और दो जीते। यही स्थिति जर्मनी की भी थी। उसने भी दो मैच जीते, फ्रांस ने एक और स्पेन ने कोई मुकाबला नहीं जीता। यहां पर जर्मनी ने बेल्जियम को 3-0 से हार कर कांस्य पदक जीता पर स्वर्णपदक भारत को मिला। जयपाल सिंह के नेतृत्व में गई इस टीम ने फाइनल में नीदरलैंड्स को 3-0 से परास्त किया। भारत के लिए तीनों गोल ध्यानचंद ने किए। इस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने कुल 14 गोल किए। फिरोज खान ने पांच और भारत के ही जार्ज मार्टिन ने भी पांच ही गोल किए। इस प्रकार तीन ओलंपिक खेलों में ध्यानचंद ने 12 मैच खेले और 33 गोल किए।

भारत पर गोल कैसे हुआ?

भारत ने जापान को 11-1 से हराया था। जब अमेरिका के साथ मुकाबला चल रहा था तो भारत ने धड़ाधड गोल करने शुरू कर दिए। अंत में भारत ने इस मैच को 24-1 से जीता। पर जो गोल भारत पर हुआ उसकी एक रोचक कहानी है। भारतीय खिलाड़ी गोल करते-करते इतने बोर हो गए कि उनकी रक्षा पंक्ति ने सोचा कि एक बार तो अमेरिकियों को अपनी ‘डी’ में आने देते हैं। यही सोच उन्होंने अमेरिकी फारवर्डों को खुला छोड़ दिया। पर जब उन्होंने पीछे देखा तो टीम के गोल रक्षक रिचर्ड ऐलन कहीं दिखाई नहीं दिए। पता चला कि रिचर्ड तो गोल पोस्ट के पीछे खड़े अपने प्रशंसकों को ‘आटोग्राफ’ दे रहे थे।

आज भी बरकरार है चिंटू की चमक

इस बदलाव का संचालन करते हैं अमिताभ के साथ ऋषि कपूर जो अपने करियर के सबसे दिलचस्प और आकर्षक मोड़ का भरपूर आनंद ले रहे हैं। लेकिन यह ऋषि कपूर का वर्तमान करियर है जो हिंदी सिनेमा में बदलाव की सबसे प्रगतिशील कहानी बताता है।

‘मुल्क’ फिल्म में ऋषि कपूर ने एक मुस्लिम पिता का किरदार निभाया है जिसके बेटे के इस्लामी आतंकवादियों के साथ संबंध हैं। जब उसके बेटे के बारे में छानबीन होती है, तो उसका पिता जो कानून का पालन करने वाला इंसान हैं उसे और उसके परिवार को सामाजिक विमुखता और अपमान का सामना करना पड़ता है। यह साबित करने के लिए कि वे लोग सामूहिक रूप से आतंक के कार्यों में शामिल नहीं हैं वह लंबी अदालती लड़ाई लड़ता है। फिल्म में ऋषि कपूर के साथ तापसी पन्नूू और प्रतीक बब्बर हैं। फिल्म की मुख्य भूमिका बीते दिनों के 60 वर्ष से ऊपर के सितारे से जुडी है। वर्षीय सितारे से संबंधित है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म पूरी तरह से उसके अभिनय की ताकत पर निर्भर है जो सामजिक पक्षपात के विवादास्पद और कठिन पक्ष को दिखता है।

कपूर उस समय में उभरते प्रतीत होते हैं जब अधिकांश कलाकार अभिनय से छुट्टी कर लेते हैं। पिछले कुछ दशकों में उनके समय और किरदारों से संबंधित भूमिकाएं आ रही हैं जो उन्हें कलाकार के रूप में चुनौती देती हैं। जिसने उन्हें फिल्मों की वर्तमान पीढ़ी के लिए दृश्यमान बना दिया है। इस साल की शुरूआत में अमिताभ और ऋषि ‘102 नॉट आऊट’ सुपर हिट फिल्म में साथ आए जो बुजुर्ग माता-पिता के साथ हो रहे खराब व्यवहार जैसे सामाजिक मुद्दे को दिखाती है। दोनों सितारों के अभिनय पर पूर्णतया आधारित इस फिल्म ने दर्शकों के दिल के तारों को छू लिया और इसने ढेर सी कमाई की और सिनेमाघरों में टिकी रही। 11 करोड़ से कम बजट की इस फिल्म ने 75 करोड़ रुपए कमाए। कपूर और बच्चन ने भावनाओं और अनुभवों को जीवित किया जिनकी युवा सितारे केवल कल्पना ही कर सकते हैं। यही उनका स्तर और प्रतिभा है।

मीडिया से बातचीत करते हुए कपूर ने याद किया कि हर बार जब वह अमिताभ के साथ काम करते हैं तो कुछ नया सीखते हैं। ‘अतीत में हमने कई सफल फिल्मों में भाई, दोस्त की भूमिका निभाई है। इस बार वह मेरे पिता की भूमिका में हैं’। हम दोनों अनुशासित पेशेवर हैं, और मैं हर समय, हर बार खुद को सिनेमा का छात्र मानता हूं, मैं बच्चन से कुछ नया सीखता हूं। इस बार मैंने सीखा कि कितनी आसानी से वह एक पात्र में समा जाते हैं।

कपूर की यह टिप्पणी सुखद आश्चर्य है इसके अदंरूनी जानकारों और अनुभवी पत्रकारों के लिए जो यह जानते है कि ये दोनों फिल्मी सितारे कभी साथ मिलकर नहीं रहे। 70 के दशक में अमिताभ का ‘एंग्री यंगमैन’ का व्यक्तित्व इतना भारी था कि ऋषि कपूर हमेशा सहायक कलाकर की भूमिका में रह जाते थे। संवेदनाओं और भावनाओं को व्यक्त करने की पूरी प्रतिभा होने के बावजूद कपूर को हमेशा रोमांटिक नायक की भूमिका दी गई। बच्चन वह है जिसके लिए लेखकों ने भूमिकाएं लिखी कपूर सिर्फ कलाकारों के साथ जुडऩे आया था। यही कारण है कि अपनी जीवनी ‘खुल्लम-खुल्ला’ में कपूर ने उल्लेख किया है कि बच्चन ने अक्सर अपनी कामयाबी में लेखकों और निर्देशकों के योगदान को स्वीकार किया हैै। एक सुपर स्टार के तौर पर उन्होंने अपने सह कलाकारों के बारे में कभी बात नही की , जैसे कपूर जिसने स्वंय उनकी फिल्मों की सफलता में भूमिका निभाई है। इस कथन में कड़वाहट के स्वर को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

ऋषि कपूर महसूस करते हैं कि जब वे अपने करियर के शीर्ष पर थे तभी वे टॉप की दौड़ से बाहर हो गए थे। बॉबी में मुख्य भूमिका के रूप में अपनी शुरूआत करने के बावजूद (उन्होंने फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में सबसे पहले एक युवा लड़के की भूमिका निभाई थी) एक ऐसी प्रेम कहानी जिसने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे और एक किवंदती बन गई थी। इन सबके बावजूद कपूर को शायद ही कभी रोमांटिक नायक की भूमिका से आगे जाने का मौका मिला। जैसा कि वह अक्सर अपने साक्षात्कारों में बताते हैं ऋषिकेश मुखर्जी, और शक्ति सांमत जैसे फिल्म निर्माताओं ने भी कभी उन्हें संजीदा पात्र के बारे में नहीं सोचा। इसके बजाए वह कश्मीर, ऊटी, स्विटजरलैंड की सुंदर वादियों में नायिकाओं के साथ रोमांटिक भूमिका में ही दिखे। जब भी उन्हें अपनी अभिनय शक्ति को प्रदर्शित करने का मौका मिला, तो उन्होंने उस भूमिका को बड़ी संजीदगी से निभाया। कजऱ्, एक चादर मैली सी, बारूद, दूसरा आदमी, प्रेम रोग और दामिनी में इन्होंने सशक्त भूमिका निभाई और अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया। दुर्भाग्य से इनमें से कई फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।

यह फिल्म निर्माता ही हैं जिन्होंने 90वें के दशक में ऋषि कपूर की छिपी प्रतिभा को देखा और उसका उपयोग चरित्र भूमिकाओं के मूल्यांकन के लिए किया। वह अक्सर याद करते हैं जोया अख्तर ने ‘लक वाय चांस’ में रोमी रॉली की भूमिका लिखी।उसने अपने चरित्र को आप बना लिया। फिल्म फ्लाप हो गई लेकिन इस अनुभवी स्टार के लिए अवसर अचानक खुल गए। विभिन्न किरदारों की भूमिका निभाने की उनकी भूख ने भी कपूर को विभिन्न भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने ‘कपूर एंड सन्स’ में 80 साल के बूढे की भूमिका निभाई जो अपने परिवार को जोडऩे की कोशिश करता है। ‘अग्निपथ’ में नैतिकता के मज़बूत कोड के साथ मानव तस्कर की भूमिका निभाई। ‘प्यार आज और कल’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में खोए प्रेमियों के लिए अनुभवी सलाहकार की भूमिका निभाई। इन सभी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय से प्रामणिकता और विश्वसनीयता का स्पर्श लाया। उनके प्रदर्शन ने सीधे-सादे पात्रों को जीवित बना दिया जिसने इन फिल्मों को मज़बूत बना दिया। उनके पास भूलने योग्य भाग भी था, लेकिन वह जो पैसा आज कमा रहे हैं वह एक मज़बूत पे्ररणा साबित हुआ। जब उन्होंने ‘डी-डे’ और ‘औरगंजेब’ में नकारात्मक भूमिका निभाई तो उन्होंने उसे पूरी योग्यता से किया।

2002 में दिवालिया होने के बाद अमिताभ अपना घर बेचने के लिए मज़बूर हो गए थे इसके बाद अमिताभ एक प्रतिशोध के साथ काम करने के लिए लौट आए। सिनेमा में उनकी वापसी ने फिल्म निर्माताओं, लेखकों को उम्रदराज पात्रों की कल्पना, निर्माण करने की संभावना का दरवाजा खोला। जैसा कि ऋषि कपूर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हमेशा मार्ग का नेतृत्व किया है। कपूर अपनी विशिष्ट शैली के साथ इस क्रांति में गहराई ले आए। अब 61 वर्षीय अनिल कपूर ने ‘फन्ने खां’, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में अहम भूमिका निभाई है, जिसने सिनेमा के अनुभवी स्टार के लिए एक अलग जगह बनाई है। दर्शकों ने लगातार उनकी एक्शन भमिकाओं का आनंद लिया।

ऋषि कपूर एक ऐसे युग से संबंधित हैं जब एक विशेष लिपि और चरित्र भूमिकाएं न के बराबर थी। अब जब लेखकों ने एक संगठित दृष्टिकोण अपनाया है और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए वास्तविकता से संबंधित फिल्में बनाने लगे हैं तो ऋषि कपूर और उनके समकालीन लोगों के सामने आने वाले समय में कुछ महान फिल्मों की संभावना है। जो उन्हें अधिक ताकत देगी।

‘बचपन’ लूटने वालों पर कसा शिकंजा

दोपहर के समय पूर्व दिल्ली के शास्त्री नगर में जि़ला मजिस्ट्रेट कार्यालय में बचाव दल बचाव अभियान चलाने की अनुमति मिलने का इंतजार कर रहा था। यह एक सामान्य कार्रवाई थी। टीम में किसी को यह पता नहीं था कि वे कहां जा रहे हैं सिवाए इस विचार को छोड़कर कि वे सभी एक आम-मिशन के लिए इक_े हुए हैं- बच्चों को बचाने के लिए। जो कारखानों, दुकानों और अन्य स्थानों में अवैध रूप से मज़दूरी करते हैं।

जल्दी ही बाल श्रम बचाव अभियान शुरू हुआ। टीम चार समूहों में विभाजित हो गई वे शास्त्री नगर इलाके की भीड़ वाली तंग गालियों में फैल गए अधिकतर रिहायशी इलाके में जहां यह अवैध कारखाने, चल रहे थे। इन कारखानों में ज़्यादातर, कढ़ाई, ज़री और आभूषण बनाने का काम होता है। इन कारखानों में आठ साल की उम्र के बच्चों को भी कार्य में शामिल किया गया था।

कारखाने और दुकान वालों को इस अभियान का पता पहले से ही चल गया था और उन्होंने बच्चों को बचाव दल की आंखों से बच कर इधर-उधर भागने के लिए कहा। बचाव दल केवल 12 बच्चों को ही बचा पाया। यहां जब भी छापा मारा जाता हैं तो फैक्टरी वालों को इसका पता पहले ही चल जाता है। कारखाने के मालिकों को हमारी योजना का पहले ही पता चल जाता है। इस मिशन का नेतृत्व करने वाले अरशद ने ‘तहलका’ को बताया।

26 जून को कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन की टीम के साथ लगभग 12 कर्मचारियों ने पूर्व दिल्ली के शास्त्री नगर में बाल श्रम -बचाव अभियान किया। यह अभियान का दूसरा दिन था। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन की टीम में रेड एफएम इंडिया, जिला मेजिस्ट्रेट के महेश और ‘तहलका’ भी शामिल थे।

बच्चों ने बताया

11वर्षीय आकाश (बदला हुआ नाम) ने हिचकिचाहट के साथ अपने दाहिने हाथ में गहरे कट का निशान दिखाया, एक चोट जो उसे पूर्वी दिल्ली में एक जूस की दुकान में काम करते हुए लगी थी। शुरू में लड़के ने अपने कट (ज़ख्म) के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया। परन्तु जब उसे यह आश्वासन दिया गया कि भविष्य में ऐसा कुछ नहीं होगा, तो उसने बताया कि उसने दुकान में काम करना छोड़ दिया क्योंकि दुकान का मालिक अक्सर छोटी-छोटी गलतियों पर उसे मारता था।

”पहले वाला मालिक बहुत बुरा इंसान था। रोज़ मारता था, हर बात पर- जो भी हाथ में आता था उठा कर मार देता था’’। तभी वहां काम छोड़ दिया। आकाश ने कहा।

दूसरे पीडि़त विजय (बदला हुआ नाम) जो कि बिहार के दरभंगा जि़ले से था और तीन महीने पहले काम करने के लिए दिल्ली आया था। वह पूर्वी दिल्ली में स्थानीय चाइनीज फास्ट फूड की दुकान पर एक कुक के रूप में काम करता था। यह 15 वर्षीय 10 घंटे तक बिना आराम किए और बिना साप्ताहिक अवकाश के काम करता। जब उससे मुलाकात हुई तब तक उसे मालिक से कोई पैसा भी नहीं मिला था।

बिहार के पूर्णिया जि़ले के 13 वर्षीय सोनू (बदला हुआ नाम) ने कहा कि वह तंग जगह में कमरे को नौ-दस अन्य साथियों के साथ सांझा करता है। वे सभी सहायक या मज़दूरों के रूप में पूर्वी दिल्ली में कपड़ों की दुकान में काम करते हैं।

आकाश, विजय और सोनू 12 जून को कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन और रेड एफएम इंडिया के नेतृत्व में बालश्रम बचाव अभियान में बचाए गए 12 लड़कों में से तीन थे। ‘तहलका’ को जो इस मिशन में भागीदार था उसे लड़कों से बातचीत करने का अवसर मिला।

जांच से पता चला है कि 11 लड़के बिहार और उत्तरप्रदेश के थे। इन्हें दो-तीन महीने पहले दिल्ली लाया गया था।

बिहार में दरभंगा और पूर्णिया जि़लों और उत्तरप्रदेश के दहरिया और बादान जि़ले के अधिकांश लड़के भारत की राजधानी में बाल मज़दूरी में लगे हुए हैं। इन लड़कों में से एक उसी दिन वहां पहुंचा था जिस दिन यह बचाव अभियान चला गया था। बचाव दल ने पाया कि लगभग हर दिन बिहार और उत्तरप्रदेश के पिछड़े इलाकों से एक या दो लड़के शास्त्री नगर के लघु उद्योग क्षेत्र में आते हैं।

हालांकि विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि पिछले दो दशकों में बाल श्रम (बाल मज़दूरी) में नाटकीय गिरावट आई है। अभी भी भारत में बाल श्रम को खत्म करना एक कठिन कार्य है। ऐसी कई नीतियों के बावजूद भी लगभग 80 फीसद बच्चे अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी आर्थिक- सामाजिक स्थितियों के अधिकार से वंचित हैं और गैर कानूनी गतिविधियों में उनके बचपन और भविष्य के खो जाने का जोखिम हैं।

बाल श्रम अधिनियम

जुलाई 2016 में संसद ने बाल श्रम संशोधन बिल पारित किया था। यह अधिनियम 83 खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोज़गार पर रोक लगाता है। यह अधिनियम 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के रूप में ”किशोरावस्था’’ को परिभाषित करता है और किसी भी खतरनाक व्यवसाय में बच्चों के रोज़गार पर रोक लगाता है।

अधिनियम स्पष्ट करता है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को कार्य पर रखने वाले को छह महीने से दो साल तक की जेल और 20 हजार से 50 हजार रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह अपराध दोहराने पर अपराधी को एक से तीन साल तक की जेल हो सकती है। 12 जून 2018 को बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस के अवसर पर कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन और रेड़ एफएम इंडिया दोनों बाल सुरक्षा के महान मिशन को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ आए।

नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने रेड एफएम से कहा,” जब मैंने बाल श्रम के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की तब रेडियो मेरी सक्रियता का एक साधन था। प्रसारण माध्यम के रूप में रेडियो का एक दूरगामी प्रभाव है जो दूर दराज के क्षेत्रों में पहुंचने की क्षमता रखता है। मुझे खुशी है कि सुरक्षित बचपन का संदेश जनता तक पहुंच सकता है’’।

रेड एफएम के आरजे रौनक ने कहा, ”मैं हाल में एक बचाव अभियान का हिस्सा बना था मेरा विश्वास कीजिए वहां से बचाए गए बच्चों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की सख्त ज़रूरत है। वे भूखे थे और कपड़ों से वंचित थे। मुझे पूरा विश्वास है कि कैलाश सत्यार्थी फाऊंडेशन उनके जीवन को एक नया अर्थ देगा और उनकी शिक्षा का ध्यान रखेगा’’।

फिलहाल इन लड़कों की कैलाश सत्यार्थी फाऊंडेशन के ‘बचपन बचाओं आंदोलन’ के पुनर्वास केंद्र ‘मुक्ति आश्रम’ में देखभाल की जा रही है।

चश्मा साफ कर लीजिए

हम और वह नहीं हम’, ‘चश्मा साफ कर लीजिए’ जैसे वाक्यों से फिल्म के आखिर में जज साहेब द्वारा पूरा संदेश दे दिया गया है।

समाज के हर वर्ग को बहुत धीरे से मगर बहुत गहराई से एक सीख दे दी गई। फिल्म देखने के बाद बहुत ताकत और तर्क मिलते हैं। मुसलमान को देशभक्ति का सबूत देने की कोई ज़रूरत नहीं।

हर कुतर्क का जवाब देने की ज़रूरत नहीं वरन संविधान को संभालने की व उसे मजबूत करने की बात की गई है। पूरी फिल्म का सार इसी में सिमट आता है। यह समझ में नहीं आता कि जिंदाबाद लेखक को कहूं, निदेशक को, किरदारों को जिन्होंने बहुत खूबसूरती से अपने किरदारों को निभाया।

फि़ल्म के अंत में आतंकवाद की परिभाषा को बहुत सादगी के साथ रख दिया गया। ‘राज्य या विरोधभाव को दबाने के लिए हिंसा या भयोत्पादक उपायों का अवलंबन’ इस परिभाषा में कहीं कोई धर्म की बात नहीं है। जिस की पुरजोर कोशिश बहुत वर्षों से दुनिया भर में पूंजीवादी ताकतें और सांप्रदायिक ताकते आतंकवाद को मुसलमानों के साथ जोड़कर लोगों के दिमागों में डालने को पुरजोर कोशिश कर रही हैं।

पूरी फिल्म देश में 2014 से जो गंदगी फैली है उसको बहुत बेहतरीन तरीके से साफ करने का सफल प्रयास किया है।

आरएसएस का कार्य तो उसके जन्म के साथ ही चल रहा है किंतु पिछले 4 सालों में सत्ता की शाबाशी के साथ हर जगह जिस भगवा आतंकवाद को फैलाया है उस जहर को शांत करने के लिए तो कोई गांधी जैसा व्यक्तित्व ही चाहिए।

‘अंतिम परिच्छेद’ के पहले खंड में गांधी जी के सचिव प्यारेलाल 114 वें पन्ने पर लिखते हैं कि जब गांधी जिन्ना को 1944 में मिलने गए तब भी उन के हमले चालू थे। आरएसएस के लोग जिनमे गोडसे भी था, गांधी जिन्ना वार्ता रोकने के लिए गांधी जी के वर्धा निवास के तीनों रास्तों को घेर कर बैठ गए थे। पुलिस ने कहा कि वह गंभीर शरारत करना चाहते हैं मगर बापू ने कहा ‘मैं उनके बीच अकेला जाऊंगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूंगा स्वयंसेवक अपना विचार बदलने और मुझे मोटर में जाने को कहें तो दूसरी बात है।’ पुलिस ने उन लोगों को गिरफ्तार किया तो उनके पास चाकू भी मिला।

1948 में 28 जनवरी को बिरला भवन पर प्रार्थना के समय बम विस्फोट किया गया किंतु गांधी ने गृह मंत्री और प्रधानमंत्री दोनों को इस बात के लिए मना किया कि उनकी सभा में आने वाली किसी भी व्यक्ति की तलाशी डाली जाए।

व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के विद्यार्थी इन तथ्यों को नहीं जानते कि 1946 में आजादी की बातें हो रही थी। आज के बांग्लादेश में स्थित नोआखली और टिपेरा जिलों में गांधीजी हिंदू समुदाय की रक्षा के लिए गांव-गांव पैदल घूम रहे थे। एक गांव से दूसरे गांव पैदल जाते थे। उनके साथ उनके भतीजे की बेटी मनुबेन गांधी रहती थी। दोनों दादा पोती बहुत कम सोते, दिन भर लोगों से मिलते। काम करते। हिंदुओं को कहते कि गीता पढ़ो और मुसलमानों को कुरान पढऩे की ताकीद करते थे। सामूहिक प्रार्थना करते थे जिसमें सभी धर्मों की प्रार्थना का अंश हैं। सकरे-घने सुपारी के पेड़ों के बीच से होकर एक से दूसरे गांव के पैदल रास्ते में शरारती लोग कांच के टुकड़े व मानव मल तक डाल देते थे। उस दौरान गांधी ने किसी भी सभा में स्वागत समारोह को स्वीकार नहीं किया। अपने इस काम को मानव मात्र की सेवा मानते थे। मंदिर में चप्पल पहन कर नही जाते इसलिए सारी यात्रा के दौरान वे नंगे पैर ही रहे। और इस तांडव को रोकने में सफलता प्राप्त की। वह हिंदू नहीं मुस्लिम घर में ठहरते थे। अपने सभी साथियों को उन्होंने अलग-अलग गांवों में बिठा दिया था। बीमार पडऩे पर राम ही मेरा रक्षक है ऐसा करके किसी डॉक्टर को भी नहीं बुलाते थे।

सामूहिक प्रार्थना में हर दिन हिंदू मुसलमानों से रघुपति राघव राजा राम ईश्वर अल्लाह तेरे नाम यह प्रार्थना करवाते थे और करते थे।

नोआखली यात्रा के दौरान एक दिन उनसे नेहरू जी मिलने आए और उन्होंने कहा बापू हमें आपकी दिल्ली में बहुत जरूरत है आप दिल्ली आइए। गांधीजी का उत्तर था मैं यहां एक गांव मेंं जो काम करूंगा वह पूूरे भारत के लिए नजीर है।

हिंदू मुसलमान का फर्क न मानकर एक मानव मात्र के रूप में मनुष्य को देखते थे। 1947 के अगस्त सितंबर में कोलकाता बिहार में जब मुसलमानों का कत्लेआम होने लगा तो वे कोलकाता गए और उन्होंने दो-तीन दिन में ही शांति स्थापना की।

मनु बहन की लिखी पतली सी किताब ‘बापू मेरी मां’ में कई बातों का उल्लेख है कि गांधी जी से मिलने तत्कालीन बंगाल के मुख्यमंत्री सोहरावर्दी साहब आए और कहा कि बापू आप बंगाल चलिए गांधी जी नेेे उत्तर दिया की आप और मैं एक साथ रहेंगे। गांधी बंगाल गये और दुनिया कलकत्ते के चमत्कार को देख पाई। एक बूढ़े कृशकाय 79 वर्ष के आदमी और 16-17 साल की लड़की के पास रात को एक मुसलमान अपनी जान बचाने आता है। गांधी आताताई भीड़ के सामने खड़े हो जाते हैं। भीड़ को मजबूरन लौटना पड़ता है। गांधी अगले दिन 21 दिन के उपवास की घोषणा करते हैं। भारत की अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के शब्दों में जो काम एक पूरी बटालियन नहीं कर सकती थी वह गांधी जी के उपवास ने कर दिखाया।

प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय अजीत भट्टाचार्य जी ने लिखा हैं कि कोलकाता में गांधीजी के उपवास का यह असर था कि लोग ट्रकों में डंडों की जगह घर-घर राखियां लेकर पहुंचे और एक दूसरे से राखी बंधवा रहे थे। उस प्यार उस जज्बे की देश को ज़रूरत है। उस इंसाफ पसंद इंसान की देश को जरूरत है जिसका अपना कुछ नहीं हो। बहुत कठिन है सामने वाले की सारी नफरत को समेटते हुए उसके लिए प्यार रखना। माफ करने की ताकत और गले लगाने का जज्बा होना चाहिए।

अपने को तथाकथित हिंदू रक्षक कहलाने वाले नोआखली और टिपेरा जिलों में उस दौरान कुछ भी काम करते नजर नहीं आए। अकेले गांधी ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ भारत के इतिहास में इंसानियत के वह स्वर्णिम पन्ने जोड़ दिए जो तालिबानी कौमों के कुकर्मों के बाद भी चमचमाते रहेंगे।

गांधी के संघर्ष की विरासत को लेकर चलने वाले बहुत कम नजर आ रहे हैं। और जो हैं वह समाज के सामने जिस तरह परिलक्षित होने चाहिए वह नहीं हो पा रहे क्योंकि आज हमला बापू के समय से बड़ा है। ज़हर फैलाने के लिए मात्र सुबह की शाखा ही नहीं वरन फेसबुक, व्हाटसअप की आभासी दुनिया भी है। जो आज के हिटलरी झुंड को झूठ को सच मे प्रदर्शित करने की ताकत दे रहा है। हिटलर के साथी ग्लोबल्स ने कहा था कि एक झूठ को सौ बार कहने से वह सच लगने लगता है। धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पास आरएसएस जैसा संगठन नहीं जो उन्माद की बुनियाद पर खड़ा है और हिंदुत्व को भगवा आतंकवाद में बदल रहा है। इसका सामना करने के लिए सच्चाई और प्रेम की राह पर चलने वाला गांधी ही हो सकता है।

विनोबा भावे से जब पूछा गया की गांधी जी की हत्या के बाद पहले क्षण आपको कैसा लगा? उन्होंने कहा गांधी मरे नहीं मैं आंख बंद करते ही उनको सामने पा जाता हूं। शायद इसी भावना की जरूरत है वह आधा नंगा फकीर जिसने देश की हर समस्या को अपने से जोड़कर उसका हल तलाशा। उसी को देश में ढूंढे। उसका विचार अगर हमारे अंदर उतरे, तो वहीं आज की हवा में फैलते इस जहर को रोक सकता है। झूठ को रोक सकता है। गांधी ने अहिंसा का प्रतिकार किया था। नोआखाली, कोलकाता, बिहार से लेकर दिल्ली तक अकेले ही उन्होंने मौत के तांडव को परास्त किया था।

उस जादुई चमत्कार के लिए आहुति देने वाले लोगों की ही आज जरूरत है और वही एक तरीका बचता है। जब सरकारें हिंसक हो, सत्ता मधान्त हो, संविधान को जलाने वाले नजरअंदाज कर दिए जाएं और अंधेरे का घनत्व बढ़ता जाए। जब आताताई शक्तियां संगठित रूप से आंख कान बंद करके हमले कर रही हो और रक्षक आंख-कान बंद करके उन्हें हवा दे रहे हो।

तब हमें देश के अंदर और अपने अंदर गांधी को तलाश करना होगा। उस रास्ते पर आगे बढऩा होगा। अफसोस कि गांधी विचार वाले कहलाने वाले साथी लोग सड़कों पर या इस तांडव के सामने जिस तरह खड़े होकर की दिखने चाहिए वह नहीं दिख रहे है। ज़रूर वे अपनी तरफ से कुछ करते होंगे।

गांधी जी ने कहा था की ‘निराशा ने जब भी घेरा तो बार-बार इतिहास साक्षी हुआ की प्यार और सत्य की सदा विजय हुई। इस धरती पर बहुत से हत्यारे और सितमगर हुए और कभी कभार ऐसा लगा कि विजय उन्हें ही मिलेगी पर आखिर यही हुआ कि वह मिट गए।’

मुल्क की तस्वीर तभी साफ हो पाएगी जब हम अपना चश्मा साफ कर ले।

लोगों से सुना तो है कि बहुत कुछ बदल गया

चित्र श्रेय: अदिति चहार

अब 71 साल हो गए। हम लगातार बोझा ढो रहे हैं। हमारी ज़रूरत तभी तक होती है जब तक निर्माण के लिए रेत-बजरी चाहिए हो। मकान बना और हमारी छुट्टी। उसमें हम रह नहीं सकते। हम तो बाहर खुले में या झोपडिय़ों में जीवन काटते हैं। लोगों से सुनते हैं बहुत कुछ बदल गया है। सत्ता बदल गई है, सत्ता चलाने का तरीका बदल गया है, आईना बदल गया है, आम आदमी को जीने के लिए मौलिक अधिकार मिल गए हैं। आज चाहे जो खाओ-पिओ, पहनों, कोई धर्म अपनाओं, कोई भाषा बोलो, देश के किसी भी हिस्से में रहो और अपनी बात को जिस तरह चाहो जनता तक पहुंचाओ। अब तो खाद्य सुरक्षा का नया कानून भी आ गया है। भूख से लडऩे के लिए। यह सुना है कि देश में ज़रूरत से ज़्यादा अन्न पैदा हो रहा है। चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली है हमने ऐसा सुना है।

दो जून की रोटी के लिए जब मुझे अपनी ताकत से ज़्यादा भार ढोना पड़ता है, पूरी मज़दूरी नहीं मिलती रात को आधा पेट खा कर सोता हूं तो सोचता हूं कि क्या बदला है? 71 साल पहले भी ऐसा ही था। 20-20 घंटे काम लिया जाता था और साहूकारों के कजऱ् पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते थे। दो मु_ी अनाज के लिए तरले करते थे। तब भी वही करना पड़ता था जो राजे रजवाडे या बड़े जगीरदार कहते थे। अब भी हालत वही है। हम तो क्या खाएं, क्या न खाएं यह ऊपर से तय होने लगा है, कौन सा धर्म अपनाएं और किस से नफरत करें और किससे प्यार यह बात भी ऊपर से आ रही है। मैं बोझा किस प्रांत में उठाऊं यह भी दूसरे तय करने लगे हैं। किसी एक आदमी की हत्या पर पूरा देश जलता है और हज़ारों लोगों की हत्या होती है। यह मैंने देखा है। सुरक्षा का अधिकार भी कुछ ही लोगों को मिलता है। यह मैंने देखा है। आस्था के मंदिर ढहते देखे हैं। महिलाओं की इज्ज़त लुटते देखी है। क्या-क्या नहीं देखा इन आंखों ने। झूठे वादों से ले कर जुमलों तक मैंने सुने हैं। मैंने झूठ को फैलाए जाने के नए-नए तरीकें इज़ाद होते देखे हैं। देश का विकास हो रहा है। बड़ी-बड़ी इमारतें और मॉल खड़े हो रहे हैं। मैंने भी इन महलों के बनने में हाथ बटाया है। मैंने कारखानों में उत्पादन बढ़ाने में भरपूर सहयोग दिया है। पर हमेशा न्यूनतम वेतन के लिए लडऩा पड़ा है। लोगों का मुनाफा 1600 गुणा तक बढ़ गया एक साल में और हमारी मज़दूरी को मुद्रास्फीती से जोड़ा जाता है।

देश में विकास की बयार बह निकली है। अदालतों में मामलों की लंबी फहरिस्त को देखते हुए लोग सड़कों पर फैसले करने लगे हैं और खुद ही सज़ा सुना कर उसे लागू भी कर देते है। ऐसे मामलों में आमतौर पर सज़ा होती है मौत की। इसने पुलिस और अदालतों का काम आसान कर दिया है। लोग सड़कों को जब मर्जी जाम कर दें। जब मर्जी धार्मिक जलूस ले चलें और यदि सड़क पर कोई गाड़ी उनसे छू भी जाए तो सैकड़ों वहानों को आग के हवाले कर दें। यही है सही न्याय। वर्दीधारी पुलिस का काम होता है मूक दर्शक बने रहने का। उन पर बापू के तीन बंदरों की बात लागू होती है- बुरा मत देखो, जो कर रहा उसे करने दो, बुरा मत सुनो, लुटते-पिटते लोग कोई शिकायत करें तो उस पर कान मत धरो, बुरा मत कहो- हुड़दंगियों को कुछ मत कहो।

मैं तो पीठ पर रेत सीमेंट लाद ऐसी इमारत में गया था जो कभी राष्ट्र की संपत्ति थी, अब तो उसका मालिक कोई धन्ना सेठ हो गया है। ऐसा मुझे बताया गया है। सुना है वह इस संपत्ति का किराया देता है जैसे ही मैंने आठवां चक्कर लगाया, तब तक अंधेरा घिर आया था और वहां चल रहा निर्माण कार्य उस दिन के लिए थम गया। फिर मैं देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया और वहां मौजूद सुरक्षा सैनिकों ने मुझे डंडे मार-मार कर भगा दिया। मैं दूर एक पेड़ के नीचे सुस्ताने को लेटा तो नींद आ गई। आंख खुली तो सवेर थी। उस इमारत पर हज़ारों लोग इक_ा थे। मुझे अभी कल के काम की मज़दूरी लेनी थी। तभी लोगों की तालियों के बीच उस इमारत से आवाज़ आई- ”भाईयो और बहिनो…’’। आगे सुनने की मेरी ताकत नहीं थी। पिछले 71 सालों से हम सब यही तो सुनते आए हैं। बात वादों से जुमलों तक पहुंच गई पर मेरा मसला रोटी का आज भी बरकरार है।

सिंधू का सपना फिर टूटा

पीवी सिंधू ने विश्व बैडमिटन चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया है। फाइनल में वह स्पेन की कैरोलिना मारिन से 19-21,10-21 से 46 मिनट में हार गई। दोनों खिलाडियों के बीच यह 12वीं भिडंत थी जिसमें से पांच बार सिंधू और सात बार मारिन जीती है। इस साल खेली गई प्रतियोगिताओं के फाइनल में सिंधू की यह चौथी हार है।

 2016 के रियो ओलंपिक के साथ बड़े मुकाबलों के फाइनल में सिंधू की यह आठवीं हार है। रियो के बाद वह लगातार दो बार 2017-2018 में हांगकांग ओपन सुपर सीरिज़ हारी। फिर इस साल इंडियन ओपन और थाईलैंड ओपन के फाइनल में भी सिंधू को हार का मुंह देखना पड़ा।

यह बात सही है कि सिंधू को छोड़ कर कोई भारतीय विश्व चैंपियनशिप में पदक नहीं जीत पाया। सिंधू ने विश्व चैंपियनशिप में दो रजत और दो कांस्य पदक जीते हैं। सिंधू ने ये दो कांस्य पदक 2013 में गुंझाओ और 2014 में कोपनहेगन में जीते थे। दूसरी और मारिन का विश्व चैंपियनशिप का यह तीसरा खिताब रहा। उनके अलावा कोई भी और महिला खिलाडी तीन बार यह खिताब नहीं जीत पाई। इससे पूर्व वह 2014 और 2015 में भी यह खिताब जीत चुकी है।

पहली गेम में मारिन ने शुरू में 3-1 की बढ़त हासिल कर ली लेकिन सिंधू ‘डीप टास’ और ‘नेट ड्राप्स’ के सहारे 2-3 से आगे निकल गई। फिर वह 6-4 से बढ़त पर थी। इस बीच मारिन ने ‘डाऊन द लाइन’ शाट मारने के चक्कर में कई गलतियां की और सिंधू 11-8 से आगे हो गई। इस प्रयास में स्पेन की खिलाड़ी ने लगातार तीन बार शटल को लाइनों से बाहर मारा था। इस बीच सिंधू की बढ़त 14-9 और फिर 15-11 रही। पर इसके बाद मारिना ने जो गति पकड़ी उसे स्ंाभालना भारतीय खिलाड़ी के बस का नहीं था। एक बार 15-15 की बराबरी हासिल करने के बाद इस स्पेनी खिलाड़ी को रोकना कठिन था। फिर भी एक बार सिंधू 18-17 से आगे हो गई। पर उसके एक कमज़ोर रिटर्न पर अंक लेकर मारिन ने 18-18 की बराबरी हासिल की। इसके बाद मारिन की एक शानदार स्मैश और सिंधू का एक रिटर्न बाहर जाने से वह गेम अंक पर पहुंच गई (20-18) और अंत में 21-19 से पहला गेम अपने नाम कर लिया।

दूसरी गेम में तो सिंधू जैसे दिखाई ही नहीं दी। मारिन ने तेज़ गति से खेलते हुए शुरू में ही गेम और मैच सिंधू से छीन लिया और आसानी से 5-0 की बढ़त ले ली। एक समय वह 11-2 से आगे हो गई। इस समय सिंधू न तो मारिन की गति का मुकाबला कर पा रही थी और न ही गेम को धीमा कर पर रही थी। दूसरी गलती सिंधू ने उसे नेट पर छोटी सर्विस करके की। पहली गेम में सिंधू की ‘डीप’ ‘सर्व’ और ‘टासेस’ में मारिन फंसती थी, पर दूसरी गेम मे सिंधू को जैसे कुछ नहीं सूझ रहा था। कभी वह ‘बेस’ लाइन से बाहर मार देती तो कभी साधारण से स्ट्रोक भी ‘नेट’ में जा रहे थे। जब सिंधू ने कोई आक्रामक स्ट्रोक लगाया तो उसे उसका लाभ ज़रूर मिला। उसने मारिन के शरीर पर दो शानदार ‘पुश’ किए और दो अंक बटोरे। पर वह ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई और मारिना ने खिताब अपने नाम कर लिया।

मैच के बाद सिंधू ने कहा,’ कुल मिला कर मरिना बेहतर खेली। यदि मैं पहला गेम जीत लेती तो स्थिति अलग होती। दूसरी गेम में मैंने बहुत गलतियां की। मेरे स्मैश बाहर जा रहे थे। मैं बस यही कह सकती हूं कि यह मेरा दिन नहीं था। मैं पहली गेम में 14-9 से आगे थी। मैंने आसान अंक दिए। जब मैंने गति पकडऩे की कोशिश की तो मुझ से कई गलतियंा हुई। 19-19 के स्कोर पर मुझे ज़्यादा संयम रखना चाहिए था।

 सिंधू ने कहा,’ दुबारा हारना बहुत दुखदायी है। पिछली बार भी फाइनल में ऐसा ही हुआ था। यह निराशाजनक है। मुझे फिर से मजबूत हो कर वापसी करनी होगी और आने वाले मुकाबलों के लिए अच्छी तरह तैयारी करनी होगी। कोई दिन आपका नहीं होता। उतार-चढाव तो हमेशा वहां है पर आप को खुद मज़बूत होना पड़ता है। यह दुखदायी है। इस बार मुझे अच्छे परिणाम की उम्म्मीद थी’।

इससे पूर्व सिंधू ने सेमीफाइनल में विश्व के पूर्व नंबर खिलाड़ी यामागुची को जोरदार मुकाबले में 21-16, 24-22 से परास्त किया था। इस मैच की दूसरी गेम में सिंधू एक बार 12-19 से पीछे थी। यहां उसका आत्म विश्वास काम आया और उसने लगातार आठ अंक लेकर 20-19 की बढ़त हासिल कर ली। इसके बाद यामागुची ने एक अंक लिया और 20-20 की बराबरी पा ली। उस समय सिंधू के चेहरे पर एक विश्वास था। लगता था जैसे वह जीत के लिए मज़बूत इरादे से उतरी हो। उसका यही विश्वास उसे जीत दिला गया। क्वार्टर फाइनल में भी सिंधू ने जापान की ही ओकुहारा को हराया था।

दूसरी ओर करोलिना मारिन ने क्वार्टर फाइनल में भारत की सायना नेहवाल को एक तरफा मुकाबले में 21-6, 21-11 से हराया था। उसने यह मुकाबला मात्र 31 मिनट में जीता था।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी नहीं रहे

भारतीय संसद को जनता के करीब लाने का काम सोमनाथ चटर्जी का है। उन्होंने संसद परिसर में पुस्तकालय और संसद की गतिविधियों को घर-घर पहुंचवाने का इंतजाम किया। खुद माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ज़मीनी नेता होने और दस बार सांसद रहे होने के कारण उनकी राजनीति बहुत साफ थी। जबकि पार्टी के पोलित ब्यूरो में बैठ किताबी नेताओं ने जहां यूपीए गठबंधन को छोडऩे का फैसला लिया वहीं उनसे लोकसभा का अध्यक्ष पद भी छोडऩे को कहा जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। बाद में 2008 में वे पार्टी से मुक्त किए गए।

सोमनाथ चटर्जी अब नहीं है। संसद में रहते हुए उन्होंने अपने हर फैसले में जनहित का ध्यान ज़रूर रखा। सभी पार्टियों के वे सांसद जो उनकी अध्यक्षता के दौरान लोकसभा में थे वे उनके जाने से काफी अंदर तक बेचैन दिखे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी आदि को कुछ घंटे यह तय करने में लगे कि उन्हें पार्टी किस रूप में सम्मान दे। पार्टी के वरिष्ठ सदस्य मोहम्मद सलीम और बिमाम बसु उनके घर भी पहुंचे। लेकिन उनके बेटे ने उन्हें श्रद्धांजलि देने की बजाए लौटने को कहा। पार्टी के लोग चले जाएं क्योंकि उनका संबंध पार्टी से नहीं रहा। पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ज़रूर रूके लेकिन सोमनाथ चटर्जी के पुत्र प्रकाश ने कहा कि पार्टी के दूसरे नेता ज़रूर चले जाएं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम विदाई के आदेश दिए। अगस्त की 13 तारीख को सुबह साढ़े आठ बजे उन्होंने कोलकाता के बेलव्यू अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे 89 साल के थे। उनके शरीर के विभिन्न अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। ममता बनर्जी उन्हें अस्पताल में देखने पहुंची थी। उन्होंने उनके जाने को अपूर्णनीय क्षति बताया और उन्हें बंगाल का महान राजनेता बताया।

पार्थिव शरीर को राज्य विधानसभा ले जाया गया जहां राजकीय सम्मान के साथ सैनिक टुकड़ी ने उन्हें विदा दी। फिर उसे घर लाया गया। जहां से शाम को शव एसएसकेएम कॉलेज -अस्पताल के सुपुर्द किया गया। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में पढाई शोध के लिहाज से अपनी देह दान कर दी थी।

सोमनाथ चटर्जी की बेटी अनुशीला बसु ने बताया कि माकपा नेता उनकी देह पार्टी मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट ले जाना चाहते थे। वे चाहते थे कि पार्टी के झंडे को उनकी देह पर रखा जाए। हमने इससे इंकार कर दिया। क्योंकि पार्टी से तो उनकी मुक्ति हो चुकी थी, काफी पहले। वे आज़ाद पंछी थे।

माकपा की सेंट्रल कमेटी के सदस्य सुजन चक्रवर्ती सारे समय चटर्जी की मृत देह के साथ रहे। उनका सोमनाथ चटर्जी के परिवार से भी अच्छा संबंध रहा। पार्टी महासचिव येचुरी ने कहा कि हमने सोमनाथ दादा को पार्टी की ओर से श्रद्धांजलि दी है। उनका निधन लोकतंत्र के लिए बड़ा आधात है। आज हमें उनसे मार्ग दर्शन की अपेक्षा थी। मेरे उनके और उनकी पत्नी से बेहद अच्छे संबध थे।

 जब दादा सोमनाथ चटर्जी का पार्थिव शरीर उनके घर से निकला तो माकपा कार्यकर्ता भी बड़ी तादाद में इक_े हो गए। शव वाहन के साथ दो पंक्तियों में वे चलते रहे और गाते रहे

कम्युंिनस्ट इंटरनेशनल गीत ‘हम होगें कामयाब, एक दिन’।

उत्तराखंड के सामने चुनौतियां

उत्तराखंड राज्य को बने 18 साल हो चुके हैं, लेकिन जिस मकसद से इसके निर्माण के लिए उत्तराखंड की जनता ने आहुतियां दीं क्या वे फलीभूत हुईं? इस पर बहुत सारे प्रश्न चिन्ह हैं। इस प्रदेश में सरकारें आईं और अपना कार्यकाल पूरा कर चली गईं। सब हाथ झाड़ते हुए चले गये, पर समस्या जस की तस है। क्या कोई यह सोच सकता था कि पलायन इतना भंयकर होगा कि गांव के गांव उजड़ जायेंगे। फसल के नाम पर बंजर खेत और वह भी झाड़ झंकार से भरे हुए। साथ ही पूरे उत्तराखंड के गांवों में जंगली सुअरों का आतंक। गावों में कहीं कुछ बचे खुचे परिवार भी होंगे, वे अपने खेतों से एक महीने का राशन तक नहीं उपजा सकते, हां तराई को छोड़ कर।

ऐसी परिस्थितियों में हमने वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह के विचार कई मंचों और राष्ट्रीय अखबारों में देखे और सुने। एक दृष्टि में यह लगा कि यह प्रायोजित कार्यक्रम है। फिर भी जैसा भी हो, उनके विचारों को आपके साथ बांटना चाहूंगा। जैसा कि उनका मानना है कि सत्ता में आये उन्हें अभी एक वर्ष ही हुआ है, पर दृष्टि उनकी प्रदेश के विकास को गति देने की है। इसी संदर्भ में पहले उनके विचारों को सिलसिलेवार प्रस्तुत कर रहा हूं-

चारधाम यात्रा के लिए सड़क निर्माण में 3,500 पेड़ काटने पड़ेंगे, लेकिन एनजीटी ने परियोजना को मंजूरी नहीं दी है, मंजूरी तब ही मिलेगी जब कटने वाले पेड़ों से दस गुणा पेड़ों का रोपण हो, इस संदर्भ में मुख्यमंत्री कहते हैं कि देहरादून में उन्होंने ढाई लाख पौधे एक दिन में रोपे, इसी तरह कोसी नदी के किनारे एक घंटे में एक लाख 57 हजार 755 पौधों का रोपण किया।

सभी जिलाधीशों को सुझाव दिया कि वे अपने अपने जि़ले की एक एक नदी को गोद लें और उसके इको सिस्टम को संरक्षित करने का प्रयास करें तो इसके अच्छे परिणाम 50-60 वर्षों के बाद ही दिखेंगे। उत्तराखंड में विकास पर्यावरण मित्र के रूप में किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि पलायन मैदानों में नहीं हो रहा है, यह सिर्फ पहाड़ों से हो रहा है। 57 फीसदी लोगों ने गांव छोड़ दिये और देहरादून, हरिद्वार और तराई के क्षेत्र उधम सिंह नगर में बस गये। यह लोग रोज़गार और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए चले गये क्योंकि खेती का धंधा फायदे वाला नहीं है। पहाड़ों में बहुत कम लोगों के पास भूमि है, इस कारण उत्पादन सीमित है।

मुख्यमंत्री बताते हैं कि हमने ग्राम लाइट प्रोजेक्ट शुरू किया- इस कार्यक्रम में हमने 10 महिलाओं को एलईडी लैंप बनाने के लिए प्रशिक्षित किया, जिसमें ट्यूब लाइट और उसी तरह के 45 वस्तुएं हैं।

इससे रोजगार पैदा करने का बल मिला। इन उत्पादों की कीमत उन उत्पादों से आधा है जो बाजरों में हैं। और वारंटी का समय भी दूना किया। हमने बहुत सारा काम उद्योग केंद्रों में किया, महिलाओं को सिलाई सिखाई और उन्हें बाजार में कैसे बेचते हैं, उसके लिए प्रशिक्षित किया।

प्रदेश में 55 फीसदी डाक्टर हैं पर मैं उम्मीद करता हूं कि दो वर्ष में सभी रिक्त पद भर लिए जाएंगे। हम ऐसी तकनीकी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें सुदूर क्षेत्रों के लोगों को कोई समस्या न हो, हमने किसानों को सलाह दी कि गांवों में मटर की खेती करें, पहले वे आलू का उत्पादन करते थे, लेकिन उसकी पैदावार अच्छी नहीं हो रही थी। जिसके कारण उसे बाजार तक भी नहीं ले जा पा रहे थे। अब वे 50 रुपये किलो मटर बेच रहे हैं। पहले ही वर्ष 50 लाख रुपये के मटर बेचे गए। इस वर्ष हम दो करोड़ रुपये के मटर बेचने की उम्मीद कर रहे हैं। पहले फोन और इंटरनेट कनक्टिविटी कस्बों और गांव में नहीं थी, लेकिन अब हमने दिल्ली के अपोलो अस्पताल से उन्हें जोड़ दिया है। सेटेलाइट फोन हर जिले में तीन-चार स्थानों पर हैं। गांव के लोग डाक्टरों से सलाह ले सकते हैं।

हमने देवभोग कार्यक्रम भी शुरू किया हुआ है। इसमें हमने स्थानीय लोगों और महिलाओं को शिक्षित किया कि प्रसाद कैसे बनाते हैं। इस कार्यक्रम के लिए 25 लोगों का चुनाव किया और प्रत्येक व्यक्ति को 25 लाख रुपये की राशि दी जिससे वे देव भोग को बना सकें। केदार नाथ में भोग की बिक्री डेढ़ करोड़ रुपये की हुई। राज्य में 625 मंदिर हैं। जिनमें बद्रीनाथ, यमनोत्री, गंगोत्री, जगन्नाथ, राजेश्वर धाम, बागेश्वर धाम के साथ हमने देव भोग बांटना शुरू किया। हम आने वाले पांच-छह वर्षों में देव भोग के वितरण से 200 करोड़ रुपये प्राप्त कर सकेंगे। इस धन को ग्रामीण और महिलाएं उपयोग में ला सकती हैं।

जीएसटी की वजह से दवा कंपनियों के निर्माता चिंतित हुए, हमने उनके साथ मीटिंग की तो पता चला कि देश में दवा उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश का हिस्सा 20 फीसदी का है। कंपनियों ने अपनी परेशानी हमारे साथ बांटी, तब हमने हल निकालने की कोशिश की। मुख्य सचिव और अन्य सचिव भी मीटिंग में मेरे साथ थे, वहीं पर निर्णय लिया गया कि आपको उत्तराखंड में रहने के और भी फायदे है, जैसे राज्य में सारे देश से सबसे सस्ती बिजली दी जा रही है, कानून

व्यवस्था में कोई परेशानी नहीं है। कंपनियों ने कहा कि बिजली के वितरण में परेशानी है क्योंकि बहुत सारे ट्रांसफार्मरों की कमी है। हमने तुरंत संबंधित एजेंसियों को आदेश दिया कि शीघ्र समस्या का समाधान करें।

मैं स्वीकार करता हूं कि जीएसटी से कंपनियों को नुकसान हुआ है। मैं नहीं समझता कि दवा कंपनियां किसी और जगह शिफ्ट होंगी।

हम पांच हजार घरों को बना रहे हैं। करीब एक लाख लोगों को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया गया हैं। ं

हम पर्यटन के विकास पर अपने को केंद्रित कर रहे हैं। इस वर्ष 46 दिनों में उतने पर्यटक आये जितने छह महीने में आते हैं।

पर्यटन के क्षेत्र में अधिक रोजगार पैदा किये जा सकते हैं। नैनीताल 1881 में बसा और पूरी तरह से भर गया है, आगे विकास की गुंजाइश समाप्त है। वहां निर्माण के लिए नया कुछ भी नहीं है। मसूरी भी लगभग 200 वर्ष पहले बसी वह भी संतृप्त है। इस लिए अब हम 13 नये स्थानों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम आने वाले वर्षों में राजस्व बढाने की कोशिश कर रहे हैं। 2020 तक प्रदेश के संसाधनों में दूनी वृद्धि करना चाहते हैं।

हमने गैरसैण में विकास कार्य शुरू कर दिया है। वह बहुत छोटी जगह है। वहां हम झील बना रहे हैं, क्योंकि उस क्षेत्र में पानी की कमी है। वहां अभी 1200 के करीब लोग निवास करते हैं। मैं पूरी तरह से उनकी परेशानी से परिचित हूं। देहरादून उत्तराखंड का सबसे बड़़ा शहर है, यहां राजधानी बनने का दबाव महसूस किया जा रहा है। इसलिए हम चाहते हैं कि गैरसैण को राजधानी बनाया जाए। हम उचित समय पर इसका निर्णय लेंगे। आवश्यक आवश्यकतायें बिजली, सड़क और पानी उपलब्ध होना ज़रूरी है। देहरादून कब तक राजधानी रहेगी इसका उत्तर अभी नहीं है।

हमारे पास गैरसैण है, हमारे पास टिहरी झील के आसपास विकास करने लायक क्षेत्र है। प्रत्येक जिले में हमारे पास चयनित स्थान हैं, जिन्हें हम विकसित करना चाहते हैं। हम निवेशकों को आमंत्रित कर रहे हैं। हम चार और पांच अक्टूबर को निवेशकों का सम्मेलन कर रहे हैं, इसमें प्रधानमंत्री होंगे। थाईलैंड भी उत्तराखंड में निवेश करना चाहता है। हमने कुछ लोगों को लाइसेंस दिये हैं। ऋषिकेश में हमारे पास 900 एकड़ जमीन है, वहां हमारी अंतर्राष्टीय सम्मेलन केंद्र बनाने की योजना है।

पर्यटन उत्तराखंड का भविष्य है। हमारे पास संपूर्ण भारत के अलावा दुनिया से लोग आते हैं। राज्य धार्मिक पर्यटन के लिए लोकप्रिय है। लेकिन अब बहुत सारे लोग राफ्टिंग, पैरा ग्लाइडिंग और पर्वतारोहण के लिए आते हैं। बहुत सारे पर्यटकों की संख्या बढी है। कुछ लोग योग के लिए आते हैं, लोग सफारी के लिए जिम कौर्वेट पार्क आते हैं जो कि देश में बाघों की सबसे अधिक आबादी के लिए ख्यात है।

भारत में 16 मौसम के क्षेत्र यानी क्लाइमेट जोन हैं उनमें से अकेले उत्तराखंड में 15 जोन हैं।

ग्ंागा और यमुना नदियों के तटबंध मिट्टी और रेत से बने हैं जो उत्तराखंड के पर्वतों से बहकर आया है। आज गंगा देश के 45 फीसदी लोगों को खाद्यान्न देती है। रेत का आना और जाना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। पर्वतों की मिट्टी नदियों के माध्यम से बह रही है। बांधों का निर्माण पूर्ण सर्वेक्षण के बाद हुआ है। बहुत सारे कारकों का विश्लेषण करने के बाद प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जाती है। कुछ दिन पहले दिल्ली के एक युवा ने एक वीडियो तैयार की, जिसमें उसने दर्शाया कि सीवरेज का पानी किन किन स्थानों पर गंगा को प्रदूषित कर रहा है। हमने उस पर कार्य किया, और उसे स्वच्छ बनाने के लिए आगे आये। इसे हमने पांच दिन के भीतर साफ किया। सारी सीवरेज की लाइने 2020 तक साफ हो जाएंगी।

पंचेश्वर बांध भारत का सबसे बड़ा बांध है। नेपाल का उसमें हिस्सा है। लगभग नेपाल के कैचमेंट के 30 गांव उससे प्रभावित हो रहे हैं। यह हमारे देश का भविष्य है। टिहरी बांध एक उदाहरण है, जिसने भारी जनसंख्या को विस्थापित किया। बांध हमारी मदद पीने के पानी से लेकर सिंचाई में कर रहा है।

मुख्यमंत्री जिस उत्साह से इन कार्यों पर चर्चा कर गये, वे समस्यायें तो हैं ही, पर उससे बड़ी समस्या उत्तराखंड की भूमि को किस तरह से चकबंदी में समेटा जाए, है। एक ड्राईव पिछले मुख्यमंत्री ने चलाया था, उस पर अमल नहीं हुआ। दूसरा सबसे बड़ा काम है कि पहाड़ों की भूमि को सिंचिंत कैसे करें, क्या सरकार के पास योजनाकारों की कमी है जो वाटर लिफ्ंिटग विधि का प्रयोग नहीं दे पा रहे हैं। इजारायल जब अपनी भूमि को उपजाऊ बनाने में सक्षम है, तब हमारे यहां उस बहते हुए पानी को पहाड़ों की चोटी तक पहुंचाने में सक्षम क्यों नहीं है? पहाड़ों की जवानी और पहाड़ों के पानी को रोके बिना संपन्नता का रास्ता नहीं खुलता। और सबसे बड़ा मुद्दा चक बंदी या कलक्टिब फार्मिंग का रास्ता निकालने का कोई उपाय हो। मुख्यमंत्री पर्यटन की बात कर रहे हैं, वह पर्यटन व्यावसायिक रूप तभी लेगा जब वहां स्थानीय आदमी दिखें। नहीं तो ये बातें ऐसी ही होंगी जैसे अन्य धुरंदर मुख्यमंत्री अपने अपने कार्यकाल निपटाकर चले गये।

बहुत सारे ठोस मुद्दे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ने नहीं उठाये। प्रदेश में पर्यटन आज से नहीं सदियों से विकसित है, इसमें किसी ने प्रचार नहीं किया, उन संतों को इसका श्रेय जाता है जो सुदूर दुर्गम मार्गों को पैदल पार करते हुए उत्तराखंड पहुंचे और इसे एक धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हुए कुछ मान दंड स्थापित कर आस्था जगाई। वही आज पर्यटन का मुख्य केंद्रबिंदु है।

धार्मिक पर्यटक तो आयेंगे ही, पर आपने क्या ऐसा किया जो प्रदेश समृद्धि की तरफ बढे?

अलविदा वाडेकर

भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान व बांए हाथ के महान बल्लेबाज अजित लक्ष्मण वाडेकर नहीं रहे। एक अप्रैल 1941 को मुंबई में जन्में वाडेकर ने आज़ादी के दिन 15 अगस्त 2018 को अंतिम सांस ली। उनका देहांत मुंबई के जसलोक अस्पताल में हुआ। वे 77 वर्ष के थे। वे काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

भारत ने 1971 में अजित वाडेकर के नेतृत्व में ही इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ के खिलाफ टेस्ट श्रंखलाएं जीत कर इतिहास रचा था। ‘स्लिप’ के अद्वतीय क्षेत्ररक्षक वाडेकर ने अपने जीवन काल में कुल 37 टेस्ट मैच खेले, 46 कैच पकड़े और 31.7 की औसत से 2,113 रन बनाए। इनमें उनका एक शतक भी शमिल है। एक दिवसीय मैचों में भी वे भारत के पहले कप्तान थे। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ दो एक दिवसीय मैच खेले और दोनों ही हारे। इसके बाद 1974 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले लिया।

इसके बाद 90 के दशक में उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम का मैनेजर नियुक्त किया गया। उस समय मोहम्मद अजहरूद्दीन टीम के कप्तान थे। उस दौरान भारत 1996 के विश्व कप के सेमीफाइनल में पहुंचा था। इसके बाद वे क्रिकेट चयन समिति के अध्यक्ष भी रहे। लाला अमरनाथ और चंदू बोडऱ्े के अलावा वाडेकर ही एक ऐसे क्रिकेटर हैं जो टीम के कप्तान, मैनेजर और चयनकर्ता रहे।

जब 1971 में उन्हें मंसूर अली खान पटौदी के जगह कप्तान बनाया गया उस समय टीम में सुनील गावस्कर, गुंडप्पा विश्वनाथ और बिशन सिंह बेदी जैसे सितारे थे।

उनकी प्रथम श्रेणी क्रिकेट में शुरूआत 1958 में हो गई थी, पर टेस्ट टीम में आने में उन्हें आठ साल इंतजार करना पड़ा। वे नंबर तीन के आक्रामक बल्लेबाज थे। उनके आंकड़े उनके खेल के स्तर को सही बयान नहीं करते। टेस्ट मैचों में उनका एक ही शतक (143) है जो उन्होंने वेलिग्ंटन में 1968 में न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान बनाया था। इसके साथ उन्होंने 14 अर्धशतक भी बनाए। इनमें से चार ऐसे हैं जिनमें वे 90 और 100 के बीच रहे। 1967 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार और 1972 में उन्हें पद्मश्री दिया गया।

शायद यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि जब 1971 में भारत ओवल टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाफ विजयी रन बना रहा था उस समय कप्तान वाडेकर नींद की गोद में थे। वाडेकर ने एक साक्षातकार में बताया था कि हमें ओवल में जीत के लिए 97 रन चाहिए थेे, पर मैं आखिरी दिन की पहली ही गेंद पर रन आउट हो गया। जब मैं वापिस लौट रहा था तो अगले बल्लेबाज के रूप में विश्वनाथ मैदान पर आ रहे थे। जब हम एक दूजे के पास से निकले तो विश्वनाथ ने कहा- चिंता मत करो कप्तान आराम से जा कर सो जााओ। हम ये रन बना लेंगे। उस समय विश्वनाथ के साथ फारूख इंजीनियर मैदान पर थे।

मैं थोड़ी देर पेवलियन से देखता रहा पर रन नहीं बन रहे थे। मुझे वहम सा हुआ और मैं अंदर कमरे में आ गया। इतने में शोर पड़ा ‘ इट्स फोर’। मंैने सोचा मैं अंदर ही ठीक हूं, और मंै कमरे में ही रहता हूं। मैं वहां लेटा और सो गया। मुझे तब पता चला जब इंग्लैंड के मैनेजर केन बैरिंगटन ने मुझे जगाया, ‘हे! अजित उठो, तुम्हें पता है, तुम जीत गए हो।’

वाडेकर ने एक बार अपने एक और साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें अपने कप्तान बनाए जाने पर विश्वास नहीं था उन्हें लगता था कि वह जिम्मेदारी ‘टाइगर पटौदी’ पर डाली जाएगी। वाडेकर ने बताया,’ पटौदी मेरे साथ बहुत अच्छे थे, हम लोग एक दूसरे के नज़दीक रहे। मैंने एक बार टाइगर से कहा कि मैं ज़्यादा रन नहीं बना पा रहा हूं। आप कोशिश करना कि मैं टीम में रहंू।’ इस पर पटौदी ने कहा था,’ ठीक है अजित, पर ध्यान रखना कि जब तुम कप्तान बन जाओ तो मैं टीम में रहूं।’ वाडेकर ने कहा,’ इसका कोई चांस नहीं है पर यदि ऐसा मौका आया तो तुम टीम में होगे।’

आज यह महान खिलाड़ी हमारे बीच नहीं है। आज भारत की टीम पूरी तरह संतुलित है। इसमें स्पिन और तेज़ गेंदबाजी दोनों है। पर वाडेकर की टीम में कोई तेज़ गेंदबाज नहीं था। सही बल्लेबाज भी नहीं थे। उनके पास थे तो बिशन सिंह बेदी, इरापल्ली प्रसन्ना, भगवत चंद्रशेखर और वेंकेटराघवन जैसे विश्व स्तरीय स्पिन गेंदबाज और एकनाथ सोलकर, अविदअली, वेंकेटराघवन और वाडेकर खुद नज़दीकी क्षेत्र रक्षक जिनमें बल्ले के मुंह से गेंद लपकने की महारत थी। एकनाथ सोलकर, ‘फारवर्ड शार्ट लैग’ पर, अविद अली और वेंकेटराधवन ‘गली’ व ‘क्लोस’ कवर पर और वाडेकर ‘स्लिप’ में गेंद लपकने में माहिर थे। आने वाले समय तक क्रिकेट की दुनिया में वाडेकर का नाम रहेगा।