वर्ष 1993 में हुए मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मुख्य आरोपी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के फाइनेंस मैनेजर जाबिर मोती को गिरफ्तार कर लिया गयारविवार को मिली रिपोर्ट्स के मुताबिक, जबीर को ब्रिटेन की सुरक्षा एजेंसियों ने लंदन के हिलटन होटल से हिरासत में लिया है।सूत्रों के अनुसार भारत ने पाकिस्तानी नागरिक और वह डी-कंपनी के आर्थिक मामलों के इनचार्ज जबीर मोती को गिरफ्तार किये जाने की मांग की थी।जिसके बाद ये कार्रवाई हुई है।पाकिस्तानी नागरिक और 10 साल के वीजा पर ब्रिटेन में रह रहे जबीर मोती और दाऊदी की पत्नी महजबीन, बेटी महरीन और दामाद जुनैद (पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर जावेद मियांदाद) के बीच वित्तीय लेनदेन की जांच के बाद जबीर को हिरासत में लिया गया है। दाऊद की सबसे छोटी बेटी की अभी शादी नहीं हुई है।रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जबीर पाकिस्तान, मिडल ईस्ट, यूके और यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में दाऊद के काम को देखता है।एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार इन देशों में व्यवसायों से होने वाली कमाई और अन्य गैरनकानूनी गतिविधियों जैसे अवैध हथियार बेचना, नशीले पदार्थों का व्यापार, रियल एस्टेट व्यापार, उगाही से होने वाली कमाई का इस्तेमाल भारत विरोधी अभियानों को अंजाम देने के लिए आतंकवादियों के वित्तपोषण में किया जाता है।कहा जाता है कि जबीर दाऊद के परिवार को यूके शिफ्ट करवाने के विकल्प खोजने में जबीर की बड़ी भूमिका है। कराची में जिस रेजिडेंशल कंपाउंड में दाऊद का परिवार रहता है, वहां जबीर के पास भी एक घर है।हाल ही में जबीर खुद भी बारबेडोस और ऐंटीगा में दोहरी नागरिकता पाने की कोशिश कर रहा था। उसनें हंगरी में भी पर्मानेंट रेजिडेंट स्टेटस पाने की कोशिश की थी।
दाऊद का फाइनेंस मैनेजर लंदन में हुआ गिरफ्तार
कवि, राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी को देश का सलाम
अटल बिहारी वाजपेयी कवि, पत्रकार और राजनेता थे। वे दोस्त बनाना जानते थे। उनकी विशेषता थी कि वे विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं को साथ लेकर चलते थे। वे एक जमाने में वामपंथी थे बाद में उन्हें लगा कि स्वयंसेवक बन कर वे ज्य़ादा काम कर सकते हैं तो वे उसमें सक्रिय हुए। बाद में वे जनसंघ में सक्रिय हुए। जब विभिन्न विचारधाराओं की पार्टियों को एक मंच पर वे ले आए तो उन्हें लगा कि एक नया राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी बनाई जाए जिसमें हिंदू संस्कृति पर ज्य़ादा ज़ोर बिना दिए पूरे देश को आंदोलन किया जाए। राजनेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी और विचारक दीनदयाल उपाध्याय से उनका बहुत अच्छा संपर्क था। उन्होंने इनके साथ अपने विचारों को सान दी। आज़ादी की लड़ाई में भागीदारी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से उनका सीधा संपर्क उन्हें समाज में सतत सक्रिय रख सका। उनके भाषण देने की कला की पंडित नेहरू ने काफी तारीफ भी की। देश में जब आपातकाल लगा तो देश में विपक्षी एकता भी परवान चढ़ी जिसे बनाने मेें अटल बिहारी वाजपेयी की खासी भूमिका रही।
भारत रत्न से अलंकृत अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसा नेता थे जो विरोधी दलों के साथ भी सही तालमेल रखते थे। वे देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे। उनके समय में भारत ने दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया। ध्यान रहे पहला परमाणु परीक्षण भारत ने उस समय किया था जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।
ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को जन्में वाजपेयी सबसे पहले 1996 में प्रधानमंत्री बने पर उनकी सरकार केवल 13 दिन चली। इसके बाद वे 1998 से 1999 तक 11 महीने इस पद पर रहे। फिर वे 1999 से 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। इसके अलावा वे 40 साल से ज़्यादा समय तक लोकसभा के सदस्य रहे इसके अलावा वे दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
उनके प्रधानमंत्री काल में भारत ने 1998 में पोखरण में पांच परमाणु विस्फोट किए। उन्होंने ये परीक्षण अपने प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के एक महीने के भीतर ही कर डाले। इन विस्फोटों के 15 दिन बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु धमाके किए थे। उस समय रूस और फ्रांस ने भारत के इन धमाकों का समर्थन किया था पर अमेरिका, कनाडा, जापान, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन ने भारत पर पाबंदियां लगा दी थीं।
वाजपेयी ने 1998 के अंत में पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक रिश्तों की शुरूआत की थी। इसी प्रक्रिया में वे फरवरी 1999 में दिल्ली-लाहौर बस यात्रा पर भी गए। वाजपेयी की कोशिश थी कि पाकिस्तान के साथ कश्मीर समेत सभी मसले बातचीत के द्वारा हल कर लिए जाएं। इसी के तहत लाहौर घोषणा हुई इसमें आपसी बातचीत पर बल दिया गया। आपस में व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने की बात हुई और आपसी दोस्ती के सहारे दक्षिण एशिया को परमाणु शस्त्र विहीन बनाने की बात भी रखी गई। इससे 1998 में परमाणु धमाकों के बाद बना तनाव काफी कम हो गया। ऐसा न केवल इन दोनों देशों में हुआ बल्कि पूरे विश्व पर इसका असर पड़ा। 1999 के मध्य में उनकी सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके ने समर्थन वापिस ले लिया और 11 महीने में यह सरकार चली गई
वाजपेयी के समय में ही कारगिल युद्ध हुआ। आतंकवादियों और बिना वर्दी के पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीर घाटी में घुसपैठ करके उन पहाड़ी चोटियों और भारतीय सेना के बंकरों पर कब्जा कर लिया जो भारतीय सेना ने खाली छोड़ी हुई थीं। इस तरह वे लोग कारगिल, बटालिक और अखनूर सेक्टरों में कार्रवाइयां चलाने लग गए। सियाचिन पर भी तोपों से गोलाबारी होने लगी। जून 1999 में ऑपरेशन विजय शुरू हुआ। भारतीय सेना का मुकाबला हजारों आतंकवादियों के साथ होता रहा। तीन महीने तक चली इस लड़ाई में 500 से ज़्यादा भारतीय सैनिक शहीद हुए। दूसरी ओर दुश्मन के भी लगभग 4000 लोगों की जानें गई। इसके साथ ही भारतीय सेना ने दुश्मन को अपने सारे इलाके से खदेड़ दिया। इस तरह भारत ने 70 फीसद इलाका वापिस ले लिया।
इसके बाद 1999 में चुनाव में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उस समय एनडीए को लोकसभा में 543 में से 303 सीटें मिली। वाजपेयी ने 13 अक्तूबर को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। तीन महीने बाद ही एक बड़ी समस्या पैदा हो गई जब आतंकवादियों ने दिसंबर 1999 में काठमांडू से दिल्ली आ रहे इंडियन एअरलाइंस के विमान आईसी 814 का अपहरण कर लिया और उसे अफगानिस्तान ले जाया गया। आतंकवादियों की मांगों में मसूद अज़हर समेत कई आतंकवादियों को रिहा करने की मांग थी। सरकार इस दवाब के आगे झुक गई और तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह आतंकवादियों को अपने साथ ले जाकर वहां छोड़ आए और यात्रियों को वापिस ले आए।
वाजपेयी राष्ट्रवादी होने के साथ संवेदनशील मानववादी व्यक्ति थे। सही बात के लिए वे अपनी पार्टी के भी खिलाफ खड़े हो जाते थे। जब बाबरी मस्जिद 1992 में गिराई गई तो उन्होंने उसका विरोध किया था। उन्होंने गोधरा कांड और गुजरात दंगों, दोनों की ही निंदा की थी। तब के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने राजधर्म अपनाने को कहा था। वे गुजरात के दंगों के भी खिलाफ थे। उनका दिल बड़ा था। परमाणु परीक्षण को लेकर उन्होंने कहा था कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए अपनी सुरक्षा के इंतजाम पूरे होने चाहिए।
इसी दौरान उन्होंने आर्थिक सुधारों को और आगे बढ़ाया। उस समय देश की जीडीपी तेजी से बढ़ी और छह से सात फीसद के बीच पहुंच गई। विदेशी निवेश बढ़ा। सरकारी और निजी ढांचों का आधुनिकीकरण भी वाजपेयी ने किया। सरकार ने कर व्यवस्था में भी बदलाव किए। भाजपा की पूरी ताकत शहरों के मध्यवर्ग और युवाओं को अपने साथ जोडऩे में लगती गई। हालांकि इसके लिए उन्हें अपने ही संघ परिवार से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ और भारतीय किसान संघ के विरोध का सामना करना पड़ा।
वाजपेयी 2003 में चीन की यात्रा पर गए और चीनी नेताओं से मिले। वहां उन्होंने तिब्बत को चीन का हिस्सा बताया। इसका चीनी नेताओं ने भरपूर स्वागत किया। इसके एक साल बाद उन्होंने सिक्किम को भारत का हिस्सा तस्लीम कर लिया। उसके बाद भारत-चीन संबंधों में काफी सुधार आया।
वाजपेयी ने कई विदेश यात्राएं भी की। 1965 में वह संसदीय सद्भाव यात्रा पर पूर्वी अफ्रीका गए। 1967 में सह राष्ट्रमंडल संसदीय एसोसिएशन की कनाडा में हुई बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। 1980 में वह जांबिया गए। 1974 में वह इंटर पार्लियामेंट यूनियन कांफ्रेस के लिए भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर जापान गए। इसके अलावा उन्होंने और भी कई देशों की यात्राएं की।
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनसंघ के शुरूआती सदस्यों में से एक थे। वह पहली बार 1957 में लोकसभा के लिए चुने गए। 1957 से 1977 तक वे संसद में भारतीय जनसंघ के नेता रहे। 1962में वे राज्यसभा के लिए चुने गए। 1967 में फिर लोकसभा के लिए चुनाव जीते। 1971 में वह तीसरी बार लोकसभा के सदस्य बने। 1977 में वह चैथी बार लोकसभा के सदस्य बने। 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे। 1980 में वह सातवीं लोकसभा के सदस्य चुने गए। 1980 से 1986 तक वे भाजपा के अध्यक्ष रहे। 1996-97 में लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे।
एक परिचय
अटल बिहारी वाजपेेयी के पिता एक कवि और स्कूल अध्यापक थे। अटल ने शुरूआती स्कूली शिक्षा ग्वालियर के सरस्वती शिशुमंदिर स्कूल में ली। इसके पश्चात वे विक्टोरिया कालेज में पढ़े। इस कालेज का नाम अब लक्ष्मीबाई रख दिया गया हैै। उन्होंने एमए राजनीतिक विज्ञान में कानपुर के एंग्लो-वैदिक कालेज से की। वे 1939 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गए। वे 1947 में उनके प्रचारक बन गए। उन्होंने मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्मÓ में भी काम किया। इसके अलावा वे हिंदी पांचजन्य, डेली स्वदेश, और वीर अर्जुन से भी जुड़े। उन्होंने सारी उम्र विवाह न करने की ठानी।
वाजपेयी ने अपना राजनैतिक जीवन एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में शुरू किया। बाद में वे जनसंघ में शामिल हो गए। उस समय डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी उनके प्रमुख थे। बाद में वाजपेयी उत्तरप्रदेश के लिए उत्तरी क्षेत्र के इंचार्ज बना दिए गए। 1968 में वे जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। नानाजी देशमुख, बलराज मधोक व लालकृष्ण आडवाणी के सहयोग से वे पार्टी को नई ऊंचाइयों पर ले गए।
अटल बिहारी वाजपेयी ने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। जब 1955 में देश में ‘इमरजेंसीÓ लगी तो भी वे उसके विरोध में उतरे। 1977 में जनसंघ जनता पार्टी का एक हिस्सा बन गई। यह पार्टी इंदिरा गांधी के खिलाफ कई दलों ने मिल कर बनाई थी।
कांग्रेस की 1977 में हार के बाद मोरारजी देसाई के नेतंृत्व में जनता पार्टी ने सत्ता संभाली तो वाजपेयी केंद्रीय मंत्री बनाए गए। उन्हें विदेश मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया। विदेश मंत्री के तौर पर वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में हिंदी में भाषण दिया। पर उनका यह मंत्रालय लंबा नहीं चला। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 1979 में इस्तीफा दे दिया। वाजपेयी ने तब तक खुद को एक राजनैतिक नेता के रूप में स्थापित कर चुके थे।
वाजपेयी ने 1980 में लालकृष्ण आडवाणी, भैरो सिंह शेखावत और दूसरों के साथ मिल कर भारतीय जनता पार्टी का गठन कर लिया। वाजपेयी ने आपरेशन ब्लू स्टार का समर्थन नहीं किया और 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का जो कत्लेआम हुआ उसका उन्होंने डट कर विरोध किया। भाजपा को 1984 के चुनाव में लोकसभा की मात्र दो सीटें ही मिली। इसके बाद भाजपा लगातार ऊपर ही जाती रही। यहां तक की 1996 में वे पहली बाद देश के प्रधानमंत्री बन गए। 2004 में चुनावों में हार के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति को भी अलविदा कह दिया।
लालकिले से मोदी ने बताया चुनावी एजेंडा
भारतीय जनता पार्टी पर अपना वर्चस्व कायम करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने शायद ही सोचा होगा कि उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी युग की ओर लौटना होगा। लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री का आखिरी भाषण तो कम से कम इसकी तस्दीक करता ही है। मोदी न केवल अटल बिहारी वाजपेयी के शाइनिंग इंडिया की ओर लौटे बल्कि उन्होंने कश्मीर के मामले में वाजपेयी का तरीका अपनाने की घोषणा भी कर डाली। यह निश्चित तौर पर राजनीति की उनकी शैली के विपरीत था। सवाल उठता है कि क्या मोदी उस शाइनिंग इंडिया के सहारे 2019 की चुनावी जंग जीत पांएंगे जो 2004 में भाजपा हार गई थी। शायद उन्हें अपने मीडिया प्रबंधन और कारपोरेट के पूर्ण समर्थन का भरोसा है।
वैसे मोदी ने अपने भाषण में शाइनिंग इंडिया का नारा नहीं दोहराया, लेकिन उन्होंने ऐसे भारत की तस्वीर खींची जो विकास के रास्ते पर तेजी से भाग रहा है। इसी तस्वीर को ही शाइनिंग इंडिया का नाम दिया गया था। उन्होंने कहा, ”आज देश एक आत्मविश्वास से भरा हुआ है। सपनों को संकल्प के साथ परिश्रम की पराकाष्ठा पार करके देश नई ऊंचाईयों को पार कर रहा है। आज का सूर्योदय एक नई चेतना, नई उमंग, नया उत्साह, नई ऊर्जा ले कर आया है।’’
प्रधानमंत्री ने कहा,” हम आज उस समय आजादी का पर्व मना रहे हैं, जब हमारे देश में उन खबरों से चेतना आई, जिनसे हर भारतीय जो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो, आज इस बात का गर्व कर रहा है,कि भारत ने विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था में अपना नाम दर्ज करा दिया है। ऐसे एक सकारात्मक माहौल में, सकारात्मक घटनाओं की श्रृंखला के बीच आज हम आजादी का पर्व मना रहे हैं।’’ ”लेकिन वही दुनिया, वही लोग, वही दुनिया को मार्ग दर्शन करने वाले लोग इन दिनों कह रहे हैं कि सोया हुआ हाथी अब जग चुका है, चल पड़ा है। सोए हुए हाथी ने अपनी दौड़ शुरू कर दी है। दुनिया के अर्थवेत्ता कह रहे हैं कि आने वाले तीन दशक तक, यानि 30 साल तक, विश्व की अर्थव्यवस्था की ताकत को भारत गति देने वाला है। भारत विश्व के विकास का एक नया स्रोत बनने वाला है। ऐसा विश्वास आज भारत के लिए पैदा हुआ है,’’ मोदी ने दावा किया।
उन्होंने उगते भारत की ऐसी तस्वीर खींची जिसमें धरती से लेकर अंतरिक्ष तक भारत अपने झंडे गाड़ रहा है। इस चमकते भारत को अपने पीछे ले जाने के आग्रह को कैसे मजबूत बनाया जाए, यह भी कोशिश प्रधानमंत्री के भाषण में दिखाई देती हैं।
उन्होंने चुनावी घोषणा-पत्र वाले मुद्दे गिना दिए और सपनों की नई सूची जनता के सामने रख दी। उन्होंने देश के हर नागरिक को घर, बिजली, स्वास्थ्य सुरक्षा, शौचालय और इंटरनेट कनेक्शन देने का वायदा किया। ”हर भारतीय के पास अपना घर हो, हर घर के पास बिजली कनेक्शन हो, हर भारतीय को धुंए से मुक्ति मिले रसोई में और इसलिए हर भारतीय को जरूरत के मुताबिक जल मिले और इसलिए हर भारतीय को शौचालय मिले और इसलिए हर भारतीय को कुशलता मिले और इसलिये हर भारतीय को अच्छी और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं मिले, इसलिये हर भारतीय को सुरक्षा मिले, सुरक्षा का बीमा सुरक्षा कवच मिले और इसलिए हर भारतीय को इंटरनेट की सेवा मिलें और इस मंत्र को लेकर हम देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं,’’ मोदी ने घोषणा की।
इसी क्रम में उन्होंने आयुष्मान भारत के लोक-लुभावन कार्यक्रम भी घोषित कर दिया।
” देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को, सामान्य जन को, आरोग्य की सुविधा मिले, इसलिए गंभीर बीमारियों के लिए और बड़े अस्पतालों में सामान्य मानव को भी आरोग्य की सुविधा मिले, मुफ्त में मिले और इसलिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री जनआरोग्य अभियान प्रारंभ करने का तय किया है।
प्रधानमंत्री जनआरोग्य अभियान के तहत आयुष्मान भारत योजना के तहत, इस देश के 10 करोड़ परिवारों को लाभ मिलेगा। यह शुरूआत है, आने वाले दिनों में निम्न मध्यम वर्ग, मध्यम वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग को भी इसका लाभ मिलने वाला है। इसलिए 10 करोड़ परिवारों को, यानी करीब-करीब 50 करोड़ नागरिक, हर परिवार को पांच लाख रुपया सालाना देने की योजना है। यह हम इस देश को देने वाले हैं। किसी सामान्य व्यक्ति को यह अवसर पाने में दिक्कत न हो, रुकावट न हो यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए टूल बने हैं,’’ उन्होने कहा।
जाहिर है यह उनका चुनावी एजेंडा है और वह वाजपेयी की तरह नरम राजनीति नहीं करते हैं। उन्होंने कांग्रेस को इस हद तक निशाने पर लिया कि यही बता दिया कि 2013 में देश की तरक्की की जो रफ्तार थी उससे लोगों को शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा पाने में भी सदियां लग जाती। ” लेकिन हम आगे जा रहे हैं वह पता तब तक नहीं चलता है जब तक हम कहां से चले थे, उस पर अगर नजर न डाले, कहां से हमने यात्रा का आरंभ किया था, अगर उसकी ओर नहीं देखेंगे तो कहां गए हैं, कितना गए हैं, इसका शायद अंदाज नहीं लग पाएगा। इसलिए 2013 में हमारा देश जिस रफ्तार से चल रहा था, जीवन के हर क्षेत्र में 2013 की रफ्तार थी, उस 2013 की रफ्तार को अगर हम आधार मान कर सोचें और पिछले चार साल में जो काम हुए हैं, उन कामों का अगर लेखा-जोखा लें, तो आपको अचरज होगा कि देश की रफ्तार क्या है, गति क्या है, प्रगति कैसे आगे बढ़ रही है। शौचालय ही ले लें, अगर शौचालय बनाने में 2013 की जो रफ्तार थी, उसी रफ्तार से चलते तो शायद कितने दशक बीत जाते, शौचालय शत-प्रतिशत पूरा करने में,’’ मोदी ने कहा।
उनके भाषाण से यह भी साफ हो गया कि वह भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाएंगे। इसमें 2014 के मुकाबले यह फर्क होगा कि वह अब यह दावा भी करेंगे कि उन्होंने एक भ्रष्टाचार मुक्त शासन दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके शासन में दलालों और कमीशनखोरों का सफाया हो गया है।
लेकिन सवाल उठता है कि क्या उनकी इस तस्वीर को लोग स्वीकार करेंगे? क्या विपक्ष उनकी इस तस्वीर के सामने उस भारत की तस्वीर नहीं रखेंगे जिसमें किसान आत्महत्या कर रहे हैं और एक छोटी नौकरी के लिए भी बेरोजगार युवाओं की एक बड़ी फौज आ खड़ी होती है। किसानों की आय दुगना कर देने का जो दावा प्रधानमंत्री कर रहे हैं वह काफी विवादों में है। लालकिले के भाषण के बाद स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव ने उनके दावे को ”असत्य’’ करार दिया। यही नहीं, उन्होंने स्वच्छता अभियान से बच्चों की मौत में कमी होने को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के बयान के बारे में भी दावा किया कि प्रधानमंत्री उसे गलत ढंग से पेश कर रहे हैं।
कांगे्रेस ने तो मोदी के दावों को ”जुमला’’ ही करार नहीं दिया बल्कि राहुल गांधी की चुनौती भी दोहरा दी कि प्रधानमंत्री खुले मंच पर बहस करें। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मोदी को राफेल और व्यापम घोटाले की याद दिलाई। नीरव मोदी और मेहुल चौकसी को लेकर कांग्रेस पहले से आक्रामक है। सुरजेवाला ने डालर के मुकाबले रूपए की कीमत का सवाल भी उठाया।
सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी व्यापार घाटे की बात उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बहुत बुरी हालत में है। विपक्ष उन्हें लिंचिंग और औरतों पर अत्याचार पर भी घेर रहा है।
सवाल उठता है कि क्या मोदी सिर्फ उगते भारत पर टिके रहेंगे? ऐसा लगता नहीं हैं। लालकिले से भी उन्होंने इसके हल्के ही सही लेकिन संकेत तो दे ही दिए हैं। उनका भगवा साफा इसकी गवाही दे रहा था और उन्होंने तीन तलाक कानून को रोकने की विपक्ष की कोशिश का हवाला दिया। इसे सभी जानते हैं कि भाजपा का यह मुद्दा हिंदुत्व एजेंडे का ही हिस्सा है। उनका लिंचिंग को लेकर सीधा बयान नहीं देना भी इसी ओर इशारा करता है। मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा हिंदुत्व के साथ ही चलेगा, यह तय है।
क्या कहते हैं पगड़ी के रंग!
भारतीय संस्कृति में पगड़ी या टोपी का अपना महत्व है। यहां सिर ढकने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस परंपरा को पूरी तरह निभाया है। हर स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने अलग-अलग तरह के साफों या पगडिय़ों को पहना।
2014 में उन्होंने गहरे लाल और हरे रंग के जोधपुरी साफे को पहना था। 2015 के 15 अगस्त को वह राजस्थानी साफा बांध कर आए थे, जिसकी पृष्ठभूमि पीली थी और उस पर पीले रंग के अलग ‘शेड्स’ की आड़ी तिरछी रेखाएं थी। इनमें से कुछ लाल और गहरे नीले रंग की भी थीं।
2016 में नरेंद्र मोदी ने पगड़ी को गुलाबी और पीले रंग मे रंगवाया था। जबकि 2017 में प्रधानमंत्री तीखे लाल और पीले रंग की पगड़ी में नज़र आए थे जिसमें सुनेहरी रंग की आड़ी-तिरछी रेखाएं भी थीं। इस साल (2018) प्रधानमंत्री ने केसरी रंग का साफा बांधा था। हमारे यहां केसरी रंग समर और बलिदान का प्रतीक है। इस साल के भाषण के दौरान प्रधानमंत्री की शरीरिक भाषा यह दिखा रही थी कि वे किसी ‘जंग’ के लिए तैयार हैं। ध्यान रहे कि कुछ ही महीनों में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में आम चुनाव होने हैं और साथ ही 2019 में लोकसभा के लिए भी वोट डलने हैं। हो सकता है कि ‘केसरिया’ रंग इसी समर में उतरने का प्रतीक चिन्ह हो।
आश्रय स्थलों में मंडराते गिद्धों की नाज़ुक बच्चों पर नज़र
जब लखनऊ से मेरे सहयोगी मुदित माथुर ने फोन पर यह जानकारी दी कि मुजफ्फरपुर (बिहार) जैसी ही घटना उत्तरप्रदेश के देवरिया में भी हुई है तो मैं सन्न सा रह गया क्योंकि आज़ादी के 72वें वर्ष में भारत में ऐसा होना विचित्र है। दरअसल, मैं अभी हाल में टॉमस राइटर्स फाउंडेशन के सर्वे को देख रहा था जिसमें महिलाओं के लिहाज से खतरनाक देशों में भारत को अफगानिस्तान, सीरिया और सऊदी अरब से भी आगे का स्थान दिया गया था।
बिहार और देवरिया के आश्रय स्थलों (बालिका गृह) से बच्चियों के यौन शोषण के जो ब्यौरे अब तक मिले हैं उन्हेें पढ़ सुन कर पूरे शरीर में ठंडी सिहरन सी होती है। दोनों ही घटनाओं में यौन शोषण के भयावह रूप दिखते हैं। दोनों ही मामलों में यह साफ है कि बेसहारा लड़कियों के यौन शोषण का सिलसिला गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के संचालकों और रसूख वाले राजनीतिक लोगों के आपसी तालमेल से चल रहा था। बतौर उदाहरण: एक व्यक्ति जो एक स्थानीय अखबार का मालिक था, वह मुजफ्फरपुर का बाल सुधार आश्रय स्थल (बालिका गृह) भी चला रहा था। जब ये खबरें सुर्खियां बन रही थीं तभी हरियाणा के अपना घर, आश्रय स्थल से भी यौन उत्पीड़त की खबरें उभरीं।
इस घटना के पहले उन्नीस साल की एक लड़की के साथ दुष्कर्म की खबर आई। यह लड़की दिमागी तौर पर अस्थिर थी। उसने चंडीगढ़ के आश्रय स्थल (बालिका गृह) में शरण ली जहां उसने एक बच्ची को जन्म दिया। बाद में पता चला कि उसके साथ गाडर््स और चौकीदारों ने भी दुष्कर्म किया था।
देश में जो आश्रय स्थल (बालिका गृह) हैं वहां से ऐसी घटनाओं की खबरें आ रही हैं। जबकि इन आश्रय-स्थलों (बालिका गृह) के निर्माण के पीछे इरादा था बेसहारा बच्चों और महिलाओं को आश्रय देना, उनकी देखभाल करना। लेकिन वहां महिलाओं से, बच्चियों से दुष्कर्म होते हैं!
मीडिया जब भी ऐसी घटनाओं को उभारता है तो समाज का दबाव पडऩा शुरू होता है। इसी के चलते बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजूृ वर्मा को अपना इस्तीफा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सौंपना ही पड़ा। उनके पति का भी नाम बच्चियों के यौनशोषण करने वालों में था।
बिहार के हाईकोर्ट की निगरानी में इस मामले की सीबीआई जांच चल रही है। जांच से संबंधित आदेश भी जारी हो चुके हैं। वहीं उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के सभी आश्रय स्थलों (बालिका गृह) की जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।
ऐसा ही मामला रोहतक के ‘अपना घर’ मामले में भी हुआ। आश्रय स्थल (बालिका गृह) की संचालक जसवंती देवी को गिरफ्तार किया गया। ऐसी घटनाओं के होते रहने से यह साफ जाहिर है कि दाल में काला ज़रूर है। इस बात की कतई इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए कि इन आश्रय स्थलों (बालिका गृह) मेें असहाय और अनाथ बेसहारा बच्चियों का शोषण हो। उनकी समुचित देखरेख हो। यह व्यवस्था होनी चाहिए कि समाज के लोग उन्हें सहज उपलब्ध वस्तु मान कर शारीरिक शोषण न करें।
अब तो केंद्र सरकार ने भी पूरे देश के सभी तरह के आश्रय स्थलों (बालिका गृह) की जांच-पड़ताल करने और रपट देने का आदेश जारी कर दिया है। यह रपट अक्तूबर तक देने के आदेश भी दिए गए हैं। यानी नौ हज़ार से भी ज्य़ादा आश्रय स्थलों (बालिका गृह) का सामाजिक ऑडिट अब अनिवार्य है। आज वक्त है कि हम सभी एकजुट होकर ऐसी घटनाओं का विरोध करें और अधिकारियों पर दबाव डालें जिससे ऐसी घटनाएं फिर न हों।
राहुल ने दिखाई धमक
शनिवार 11अगस्त को जयपुर की सड़कों पर यह अद्भुत दृश्य था। एयरपोर्ट से लेकर एलबर्ट हाल के निकट रामलीला मैदान तक पहुंचने वाला तेरह किलोमीटर लंबा सड़क मार्ग फूलों की बारिश से अट गया था। राजस्थानी सांस्कृतिक परिवेश में नाचती गाती लोकनर्तकों की टोलियां और छतों से लेकर सड़क के दोनों छोर पर नारों के साथ स्वागत करते हुए स्त्री-पुरुषों का विशाल हुजूम था। चुनावी रणभेरी बना यह दिलकश नजारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का ‘रोड शो’ था। इस सफर में राहुल गांधी कम से कम एक दर्जन से ज्यादा स्थानों पर बस से नीचे उतरे और हुलसतेे स्वागतकर्ताओं से संवाद किया। राजनीतिक रणनीतिकारों ने इस ‘रोड शो’ को पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के जयपुर दौरे के जवाबी कार्यक्रम के रूप में देखते हुए इस बात की तस्दीक की कि, ‘इस कार्यक्रम ने कांग्र्रेसजनों में जोश पैदा कर दिया है। राहुल गांधी की अगवानी में उमड़ती जबरदस्त भीड़ के रेले से भोंचक भाजपा नेता अपना विस्मय भाव हलक से उतार भी नहीं पाए थे कि केन्द्र की मोदी और राज्य की वसुंधरा सरकार पर किए गए पांच बड़े हमलों से तिलमिला कर रह गए। सरकारों को लाजवाब करने वाले हमलों में सबसे बड़ा वार राफेल सौदे को लेकर था कि ‘देश के चैकीदार ने 45 हजार करोड़ रुपए के कर्ज में डूबे अपने मित्र उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए राफेल का ठेका दे दिया। उन्होंने यह कहते हुए आश्चर्य जताया कि, ‘क्यों इस मामले में पूर्व रक्षा मंत्री पर्रीकर से बात तक नहीं की गई? हर साल दो करोड़ को रोजगार दिलवाने और प्रत्येक के खाते में 15 लाख रुपए डलवाने की वादा खिलाफी का क्या हुआ? कांग्रेस के इस प्रतिनिधि सम्मेलन में जुटी भीड़ भाजपा पर राहुल गांधी के हमलावर तेवरों पर इस कदर तालियां पीट रही थी मानों उन्होंने कोई नए राहुल गांधी देख लिया जो भाषाई गेंदबाजी से प्रधानमंत्री मोदी की वादाखिलाफी को टुकड़े-टुकड़े करते हुए तराश रहे थे ताकि सरकार के लिए उन्हें पचाना मुश्किल हो जाए?
राहुल गांधी ने रोजगार पर मोदी की अप्रत्याशित चुप्पी को कचोटते हुए बड़ी बेबाकी से कहा, मध्यमवर्ग ने ही मोदी की राजनीति को सबसे बडा आयाम दिया और मोदी उन्हीं के सामने बेबस खड़े रह गए? महिला शिक्षा पर वसुंधरा सरकार को घेरते हुए उन्होंने कहा, ‘यह जुमलों, महलों और घोटालों की सरकार है जिसके दिन अब लदने वाले हैं। मोदी के नारे ‘बेटी पढ़ाओं, बेटी बचाओ’ की बखिया उधेड़ते हुए राहुल ने नई बहस छेड़ दी कि, ‘बेटी को किससे बचाओ, मैं कहता हूं भाजपा वालों से बचाओ …..’’ राहुल इस मुद्दे पर बुरी तरह हमलावर हेाते हुए बोले कि, ‘भाजपा विधायक ने दुष्कर्म किया, लेकिन मोदी एक शब्द नहीं बोले? दरिन्दगी पर हमलावर होते हुए राहुल ने यहां तक कहा, ‘मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में कितने बलात्कार हो रहे है , आपको पता है या नहीं? राहुल गांधी ने भाजपा सरकार का भविष्य बांचने और सबसे बड़े राजनैतिक हमले में कहा कि, ‘विधानसभा चुनावों में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है। अद्भुत इत्तफाक रहा कि, ‘राहुल के बयान के ठीक तीन दिन बाद खबरिया चैनल एबीपी द्वारा मतदाताओं का रुख भांपने के साथ किए गए एक सर्वेक्षण में इस पर मुहर भी लगा दी। इतना ही नहीं राजस्थान में भाजपा की करारी हार की संभावना व्यक्त करते हुए सर्वेक्षण ने मुख्यमंत्री के रूप में अशोक गहलोत को सर्वाधिक लोकप्रिय चेहरा बताया। गहलोत 43 फीसदी लोगों की पसंद थे, जबकि वसुंधरा राजे की स्वीकार्यता 24 प्रतिशत पर ही ठिठक गई थी।
भाजपा ने राहुल गांधी के ‘रोड शो’ को फ्लॉप करार देते हुए कहा, ‘हिम्मत है तो अमरूदों के बाग में करते सभा? राहुल के हमलों को संसदीय मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने बचकानी हरकत बताया। जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने पलटवार करते हुए कहा कि, ‘एक तरफ वसुंधरा सरकार ‘गौरव यात्रा’ निकाल रही है, दूसरी तरफ तीन दिन पहले ही हुई नागौर में किसान की आत्महत्या इस यात्रा का मुंह चिढ़ा रही है। विश्लेषकों का कहना हे कि, ‘वसुंधरा सरकार की सबसे बड़ी गफलत यही है कि, वो किसानों, गांवों और मध्यमवर्ग से कट गई? पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वसुंधरा राजे पर हमलावर होते हुए उनके सियासी सिक्के के दूसरे पहलू को भी उलट दिया कि, ‘आज वो कांग्रेस में एकजुटता पर सवाल उठा रही है, तो आखिर उनका अपना रुख और अतीत क्या रहा है जब पिछले चुनावों में गुलाब चंद कटारिया को यात्रा निकालने और खुद को पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष बनाने का दबाव डालते हुए तीसरा मोर्चा बनाने की धमकी दी थी?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि, ‘पहले संसद, फिर राजस्थान में चुनावी शंखनाद के लिए किए गए रोड शो ने यह मिथक पूरी तरह तोड़ दिया है कि, ‘वे बच्चे हैं, राजनीति में कच्चे हैं और बोलना भी नहीं जानते।’’ वरिष्ठ पत्रकार माला जय का कहना है कि, ‘संसद के भीतर और बाहर अपने सार्वजनिक भाषणों में उन्होंने दिखा दिया कि उनमें जब चाहे तीखे-चुभने वाले प्रहार करने की क्षमता है। उनके नेतृत्व की एक और खासियत है कि उनकी युवाकोचित उर्जा और गतिशीलता जबरदस्त रूप से लोगों को
प्रभावित कर रही है और यही उर्जा कांग्रेस का वानप्रस्थ खतम करेगी और ठप्पे से सत्ता में वापसी करेगी।
नीतीश को भारी पड़ सकता है मुजफ्फरपुर कांड
मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। उसकी यह जांच पटना हाईकोर्ट की निगरानी में हो रही है। विधिवत रूप से जांच का काम 11 अगस्त से शुरू हो गया है लेकिन इसकी तैयारी उसी दिन से कर ली गई थी जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान किया था। राज्य पुलिस की ओर से कांड के उन सभी अभियुक्तों को पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया है जिनका एफआईआर में नाम था । राज्य पुलिस अब सीबीआई की मदद करेगी लेकिन कार्रवाई सीबीआई की ओर से होगी। जांच कार्य कब तक चलेगा यह निश्चित नहीं है।
मिली जानकारी के मुताबिक सीबीआई के डीआईजी अभय सिंह की अगुवाई में उनकी टीम 11 अगस्त को सुबह ही बालिका गृह पहुंच गई और उसने वहां पूरी तरह से छानबीन की। उसने गृह की तमाम फाइलें और कागजात अपने कब्जे में कर लिए। राज्य पुलिस ने गृह और उसके कमरों को सील कर रखा था और पहरेदारी का पुख्ता इंतजाम किया था। सीबीआई ने सील को तुडवाया और पूरी छानबीन की। मौके पर दिल्ली से सेंट्रल फारेंसिक साइंस लेबोरटरी के अधिकारी भी पहुंचे थे। उसकी अलग से जांच-पड़ताल शुरू हुई। बालिका गृह से ही सटा कांड के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर का भव्य मकान है और उसी में उनके अखबार का कार्यालय और छापाखाना भी है। सीबीआई ने उनके पुत्र राहुल आनंद से भी पूछताछ की। सीबीआई ने अखबार, उसके कार्यालय व छापाखाना का मुआयना किया। मेजिस्ट्रेट शीला रानी गुप्त की मौजूदगी में सीबीआई ने अपनी कार्रवाई शुरू की। मिली जानकारी के अनुसार बृजेश ठाकुर को बिना किसी खास बीमारी के अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और किन्हीं अस्पष्ट कारणों के उसे ‘हाई स्क्योरिटी वार्डÓ में भेज दिया गया।
मिल जानकारी के मुताबिक सीबीआई गिरफ्तार अभियुक्तों से पूछताछ पूरी होने के बाद बालिकाओं के यौन शोषण के मामले से जुड़े और लोगों की गिरफ्तारी की जाएगी। गृह की पदाधिकारी फरार थी लेकिन उनकी गिरफ्तारी हो चुकी है। उनसे पूछताछ से अहम जानकारी मिल सकती है। कांड के प्रकाश में आने के बाद राज्य पुलिस और समाज कल्याण विभाग की ओर से की गई कार्रवाई के तहत मुजफ्फरपुर बालिका गृह की बालिकाओं को पटना समेत दो जगहों के बालिका गृहों में स्थानांतरण कर दिया गया है। सीबीआई उनसे तमाम जानकारी लेगी। मुजफ्फरपुर आने से पहले सीबीआई के अधिकारी पटना में समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों से मुलाकात कर चुके हैं।
पटना हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई की जांच से कांड को लेकर आंदोलन कर रहे विभिन्न संगठनों, खासकर मुजफ्फरपुर के महिला संगठनों को यह उम्मीद जगी है कि इन बालिकाओं के साथ अन्याय करने वाले वाले सभी धरे जा सकेंगे और उन्हें सज़ा मिल कर रहेगी। जब तक हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई की जांच का फैसला नहीं हुआ था, तब तक महिला संगठनों को सीबीआई पर ज़्यादा भरोसा नहीं था लेकिन अब भरोसा जगा है। उनके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की वजह से सांसत में हैं। उनकी साख पर बट्टा लगा ही है, आधी आबादी यानी महिलाओं में उनकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गया है। उनके कामकाज की पारदर्शिता पर उंगली उठने लगी है। उनके खिलाफ आंदोलन का सिलसिला भी मंद पड़ता नहीं दिखता। उनके इस्तीफे की मांग भी होने लगी है। वे अपने अनुकूल स्थिति बनाने की हर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसका कोई असर नजर नहीं आ रहा है। हाल यह है कि उनके उठाए गए कदमों का श्रेय भी दूसरों को चला गया। कुछ पत्रकार भी कम परेशान नहीं है। उन पर भी उंगली उठने लगी है।
मुजफ्फरपुर बालिका कांड के मद्देनजर नीतीश कुमार के खिलाफ महिलाओं का विरोध, जुलूस और सभा से यह छिपा नहीं रह गया कि वे उनसे घोर नाराज हुई हैं। नीतीश कुमार के लिए उनकी नाराजगी को दूर करना आसान भी नहीं है। दूरदर्शी माने जाने वाले नीतीश कुमार ने सूुबे में सत्ता में आने के बाद से ही आधी आबादी को अपने पक्ष में करने की रणनीति अख्तियार की। वे यह मान कर चले कि आधी आवादी के उनके पक्ष में होने से उनकी स्थिति मजबूत रहेगी और चुनाव जैसे मौके पर उनका पलड़ा भी भारी रहेगा। महिलाओं के सशक्तिकरण के दौर मेें उन्हें जो श्रेय मिलेगा, वह अलग राजनीतिक फायदा होगा। आधी आबादी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्होंने सबसे पहले पंचायतों और निकाओं के चुनाव में पचास फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया। एकल पदों पर भी आरक्षण का प्रावधान किया। केवल बिहार में ही नहीं, देश में ऐसा कदम पहली बार उठाया गया था। नीतीश कुमार को आधी आबादी के बीच लोकप्रिय होने में बड़ी कामयाबी मिली। चुनावों में इसका असर भी दिखा। नीतीश कुमार ने आधी आबादी का समर्थन पाने व उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए सूबे में पूर्ण शराबबंदी करने का कदम उठाया। इससे भी उन्हें महिलाओं का मन जीतने में कामयाबी मिली। शिक्षा के क्षेत्र में छात्राओं को साइकिल, मुफ्त पढाई, आर्थिक मदद जैसे कई योजनाओं से ही नहीं, रोजगार मुहैया कराने की विभिन्न योजनाओं से भी आधी आबादी उनकी पक्षधर हुई। नीतीश कुमार आधी आबादी का समर्थन प्राप्त करने के मामले में निश्चित थे। लेकिन अब बदली स्थिति से वे निश्चिंत नहीं रह सकते। आधी आबादी सुरक्षित है, नीतीश कुमार उसे कैसे भरोसा दिला सकेंगे, इस बारे में अनिश्चयता ही है।
नीतीश कुमार की सरकार को कांड का पता काफी पहले चल गया था लेकिन कार्रवाई करने में देर की गई। जब कांड का खुलासा हुआ तो भी उसको गंभीरता से नहीं लिया गया। नीतीश कुमार ने कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान तो किया लेकिन इसका श्रेय भी उनको नहीं है। संसद में विरोधी पक्ष की ओर से मामला उठाने व सीबीआई से जांच कराने की मांग उठाने पर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ऐसा बयान दिया जिससे विरोधी संतुष्ट हो गए और नीतीश कुमार पर दबाव बना। भाजपा के दबाव की वजह से नीतीश सरकार को कांड की जांच सीबीआई से कराने का फैसला करना पड़ा। आखिर नीतीश कुमार के सामने विषम परिस्थिति क्यों पैदा हुई। दबाव की राजनीति में भाजपा कैसे आगे हो गई। नीतीश कुमार क्यों नहीं खुद ब खुद शुरू में ही कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान नहीं कर पाए। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा की इस्तीफे की मांग भाजपा के नेताओं ने की। वर्मा जद (एकी) के नेता है। जद (एकी) उन्हें खुद ही हटाती तो उसके कदम को सराहा जाता। इस मामले में भी भाजपा का दबाव था।
मुजफ्फरपुर बालिका गृह से जुड़े जिम्मेदार 13 अधिकारियों का तबादला हुआ। राज्य सरकार ने अपने स्तर पर कई कदम उठाए। नीतीश कुमार का यह भी फैसला है कि राज्य के सभी बालिका, बाल और महिला गृहों को अब खुद राज्य सरकार चलाएगी। गृहों को सरकारी भवन में लाया जाएगा। कुल मिला कर यह कि सरकार यह जताना चाहती है कि वह ऐसा इंतजाम कर रही है जिससे मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड जैसा कांड नहीं हो पाए। नीतीश कुमार इधर जहां जा रहे हैं यह जरूर जता रहे हैं कि अपराधी किसी भी सूरत में बच नहीं पाएंगे। उन्होंने माना भी है कि इस कांड से शर्मीदंगी हो रही है।
नीतीश कुमार के निर्देश पर सूचना एवं जन संपर्क विभाग अधिकारियों की बैठक हुई और उसमें फैसला यह लिया गया कि जिन पत्रकारों को सरकारी मान्यता कार्ड मुहैया कराया गया है, उनकी फिर से जांच होगी। तकरीबन 200 पत्रकारों के कार्ड को रद्द किया जाएगा। कार्ड किन पत्रकारों को दिया जाए, किन्हें नहीं, इस बारे में नए नियम-कायदे बनेंगे। कुल मिला कर यह कि सरकार पाक साफ पत्रकारों को ही कार्ड मुहैया कराएंगी। ऐसी सख्ती बरतेगी जिससे ब्रजेश पांडे जैसा पत्रकार फायदा नहीं उठा पाए। सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार पक्षपात की वजह से सारे वह काम हो जाते हैं, जो गैरकानूनी और अनैतिक होते हैं। सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण के लिए क्या कदम हो, इस पर अभी नजर ही नहीं है।
चुनाव हों एक साथ ही: अमित शाह
अमित शाह ने भाजपा के अंदर ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बहस छिड़वा दी है। इसके साथ ही उन्होंने विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान को इस बाबत पत्र भी भेजा है। भारतीय चुनाव आयोग अब इस प्रस्ताव से बढऩे वाले खर्च के हिसाब-किताब में जुट गया है। ईवीएम मशीनों, वीवीपीएटी मशीनों के साथ ही सुरक्षा और लोगों की ज़रूरत जताई जा रही है। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कहना टालना आसान नहीं लगता।
विधि आयोग को अमित शाह ने आठ पेज का पत्र भेजा है। ऐसा ही पत्र केंद्रीय चुनाव आयोग को भी भेजा गया है। हालांकि कांगे्रस और कई दूसरी पार्टियां देश में ‘एक देश, एक चुनाव’ के तहत एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। इस पर अमित शाह का कहना है कि इस मुद्दे का विरोध आधारहीन है। ‘एक देश,एक चुनाव’ होने से देश के संघीय ढांचे को खासी मज़बूती मिलती है। विपक्ष जो विरोध कर रहा है वह आधारहीन है। उसे राजीतिक तौर पर उकसाया गया है जो अनुचित है।
अमित शाह ने विपक्ष के इस अंदेशे को भी बेबुनियाद बताया कि इस तरह चुनाव कराने से राष्ट्रीय पार्टियों को ही ज़्यादा लाभ मिलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब 1980 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे उसके साथ ही संसदीय चुनाव भी हुए। कांगे्रस की तब जीत हुई। इसी तरह 2016 में जब महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 307 दिन के लिए उन इलाकों के लिए आदर्श संहिता जारी की थी जहां संसद, विधानसभा या स्थानीय निकायों के लिए चुनाव होने थे। अमित शाह का पत्र तब पहुंचा था जब केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के नेतृत्व में पार्टी के नेता विनय सहस्त्र बुद्धेे, भूपेंद्र यादव और अनिल बलूनी एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर विधि आयोग के अध्यक्ष से मिले। इस बात की पूरी संभावना लग रही है कि अगले वर्ष यानी 2019 की शुरूआत में ही बारह राज्यों में चुनाव एक साथ हो जाएंगे।
एक साथ चुनाव पर ज़रूरी विचार मंथन: मोदी
उधर भाजपा के अंदर भी लोकसभा चुनावों के साथ बारह राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव 2019 में ही करा लेने पर खासा विचार मंथन होता रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचारमंथन की इस प्रक्रिया की तारीफ की। उन्होंने लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए भी यह कहा कि यदि देश को बार-बार आम चुनावी खर्च से बचाना है तो ऐसा करना ही होगा।
पार्टी के एक सूत्र के अनुसार पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं ने तमाम तरह की संभावनाओं पर राय-मश्विरा किया। एक संभावना तो यह भी थी कि मध्यप्रदेश, राजस्थान छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनावों को टाला जाए और जब इन राज्यों की विधानसभाओं की मियाद पूरी होती है यानी नवंबर-दिसंबर में तभी राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। फिर 2019 की शुरूआत में ही आम चुनावों के साथ यहां भी चुनाव हो जाएं।
आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिसा में लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव संभव हैं। लेकिन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और झारखंड जिनमें एनडीए की सरकारें है वहां भी चुनाव पहले कराए जा सकते हैं जिसमे लोकसभा चुनावों के साथ ही वहां भी चुनाव हो जाएं।
पार्टी के नेताओं का मानना है कि तकरीबन एक दर्जन राज्यों में बिना किसी कानून के बदलाव किए बगैर चुनाव हो सकते हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री संविधान मानते हुए अवधि पूरी हुए बगैर अपने इस्तीफे भी दे देंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनावों के नतीजों में पार्टी वापस सत्ता मे आ पाएगी।
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव सबसे पहले चुनाव आयोग ने ही 1983 में रखा था। विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी ने मई 1999 में आयोग की 170वीं रपट में कहा था ‘हमें उस स्थिति में जाना चाहिए जब लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर हो सकें।’
अभी हाल में विधि आयोग के साथ हुई बैठक में कांगे्रस पार्टी ने कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना असंवैधानिक और अमल में लाने के अनुरूप नहीं जान पड़ता। इस पार्टी ने इसे संवैधानिक तौर पर प्रतिकूल और निरर्थक भी बताया। कांग्रेस ने कहा यदि यह अमल में आया तो इससे लोकतंत्र की चूलें चरमरा जाएंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही इस मुद्दे पर अपना इरादा जता दिया था। वे अमूमन एक देश और एक चुनाव के मुद्दे पर बोलते भी रहे हैं। हालांकि शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल, एआईडीएमके समाजवादी, टीआरएस और वाईएसआरपीओ पार्टियां इसके पक्ष में हैं लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस डीएमके, टीडीपी, सीपीएम, सीपीआई, जद (एस) और फारवर्ड ब्लाक इसके विरोध में हैं।
चुनाव आयोग इस विचार का समर्थक तो है लेकिन उसकी सलाह है कि उसे इस प्रस्ताव पर काम करने के लिए और समय चाहिए।
तो नए साल में राज्यों के भी चुनाव, होंगे लोकसभा के साथ?
चुनाव आयोग की हिचकिचाहट के बावजूद विधि आयोग में विभिन्न पार्टियों के तर्को को सुना जाना है। संकेत इस प्रकार के हैं कि आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में अपना फैसला देगा। इसके लिए ज़रूरी वैधानिक संशोधन भी किए जाएंगे। फिर दो चरणों में राज्य विधानसभाओं और आम चुनाव करा लिए जाएंगे।
विधि आयोग जर्मनी में अमल में आ रहे नमूने को भारत के संदर्भ में उपयोगी मान रहा है। जहां अविश्वास प्रस्ताव का एक सकारात्मक वोट भी है जिसके आधार पर जब एक सरकार जाती है तो दूसरी सरकार को शपथ दिला दी जाती है। अब इसे ध्यान मेें रखते हुए दलबदल कानून में और संशोधन ज़रूरी होंगे। साथ ही (पार्लियामेंटरी प्रोसीज़र एंड रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल्स एक्ट) कुछ दूसरे कानूनों में भी संशोधन ज़रूरी होगा जिससे सुचारू रूप में इस योजना पर अमल हो सके।
उम्मीद है कि विधि आयोग आंतरिक तौर पर जल्दी ही मसौदा भेजेगा और साथी सदस्यों को उस पर दस दिन में अपनी प्रतिक्रिया देने का अनुरोध करेगा फिर आखिरी मसौदा तैयार हो जाएगा।
‘एक देश, एक चुनाव’ कराने में खर्च का मुद्दा बहुत अहम नहीं होगा। अलबत्ता चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली मशीनों की तादाद ज़रूर बढग़ी इसी तरह दूसरे खर्च भी बढ़ेेंगे। लेकिन इन सबके उपयोग एक साथ जब होगा तो निश्चय ही खर्च का बहाना अनुचित होगा। एनडीए के शासन के पिछले दो पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमएन वेंकटचलैया संविधान समीक्षा आयोग के अध्यक्ष भी थे।
देश में एक साथ चुनाव कराने का सिलसिला 1967 तक था। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के भंग किए जाने और दिसंबर 1970 में लोकसभा के भंग होने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने का सिलसिला शुरू हुआ।
अभी हाल में विधि आयोग ने इसी साल, अप्रैल में एक वर्किंग पेपर जारी किया था। इसमें कहा गया था कि पांच संवैधानिक सिफारिशें आवश्यक होंगी जिससे ‘एक देश, एक चुनाव’ को अमल में लाया जाए। नीति आयोग ने भी केंद्र के कहने पर इसी मुद्दे पर जनवरी 2017 में एक वकिंग पेपर जारी किया था। इस प्रस्तावों में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव लोकसभा और विधानसभाओं के साथ ही कराने की बात नहीं है।सीमा चिश्ती
साभार: इंडियन
चुनाव आयोग ने कहा इतनी जल्दी नहीं!
यदि कुछ राज्यों की विधानसभाओं की अवधि कम करनी हो या बढ़ानी हो तो उसके लिए संविधान में संशोधन ज़रूरी है। यह कहना है मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का। एक कानूनी ज़रूरत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने इस संभावना से इंकार किया कि इतनी जल्दी एक साथ चुनाव कराना संभव है। इसके लिए लाजिस्टिक ज़रूरतें भी पूरी होनी चाहिए, मसलन वीवीपीएटी (पेपर पर यह जताने वाली मशीनें कि अपने वोट किसे दिया)
उन्होंने बताया कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर आयोग 2015 में ही अपनी तैयारी और अपनी राय- बात मसलन अतिरिक्त तौर पर पुलिस बल आदि ज़रूरतों पर अपनी ओर से जवाब दे चुका था। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनाव पैनेल चुनाव कराने की अपनी जिम्मेदारी अवश्य निभाएगा। जब भी राज्य विधानसभाओं की अवधि खत्म होगी। चुनाव आयोग ईवीएम और वीवीपीएटी को लोकसभा चुनाव के पहले ही मंगाने के प्रयास में जुटा है। तमाम आवश्यक ईवीएम यानी 13.95 लाख बैलेट इकाइयां और 9.3 लाख कंट्रोल यूनिट 30 सितंबर तक आ जाएंगे। इसी तरह 16.25 लाख वीवीपीएटी भी नवंबर के अंत तक आ जाएंगे। कुछ अतिरिक्त वीवीपीएटी भी ली जिससे कहीं मशीन खराब हो जाए तो उन्हें बदला जाए। तकरीबन 10,300 वीवीपीएटी मशीनों के दस राज्यों में गड़बड़ हो जाने की बात सामने आई थी। उन्हें 28 मई तक उप चुनावों में दुरूस्त कराना पड़ा।
अब यदि 2019 में एक साथ चुनाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक साथ होने हैं तो चुनाव आयोग को तकरीबन 24 लाख ईवीएम की ज़रूरत पड़ेगी ।
कानून आयोग के साथ 16 मई को एक साथ चुनाव कराने पर हुई बातचीत के दौरान भी चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें बारह लाख अतिरिक्त ईवीएम और उनके बराबर तादाद के वीवीपीएटी मशाीनों को खरीदने के लिए रुपए 4,500 करोड़ मात्र की ज़रूरत होगी। यह बजटीय अनुमान तब मशीन खरीदने पर आ रही मशीनों के खर्च पर आधारित था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कानून आयोग को अगस्त में लिखा था कि यह कहीं बेहतर होगा यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करा दिए जाएं। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि इस विचार का विरोध होता है तो वह ‘राजनीति से प्रेरित ही’ होगा। अभी हाल ही में कानून आयोग ने एक पेपर में यह सिफारिश की थी कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को 2019 की शुरूआत में ही दो चरणो मे करा दिया जाए।
एक साथ चुनाव कराने पर एनडीए में शामिल पार्टियों में शिरोमणि अकाली दल, अन्ना एकआईडीएमके और समाजवादी पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने उत्साह तो जताया है लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, द्रमुक (डीएमके), तेलुगु देशम, जनता दल (यू) और जनता दल (एस) ने असहमति जताई है।
कई राजनीतिक टिप्पणीकार और विशेषज्ञ भी मानते हैं कि एक साथ चुनाव कराने का भारत के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और राज्य की स्वायत्तता भी घटेगी।साभार: वायर
इमरान की कामयाबी की दुआ मांगिए
क्रिकेट के मैदान से अपना हुनर साबित करने वाले इमरान खान अब पाकिस्तान में अमन-चैन कायम रख पाएंगे इस पर खासी बहस चल रही है, लेकिन इस बात का अंदेशा ज़रूर है कि इमरान के लिए राजकाज चला पाना आसान नहीं होगा। हालांकि जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा पिच अच्छी, टॉस भी जीत लिया है। सेना के साए में वे 18 अगस्त को शपथ ज़रूर लेंगे। लेकिन देश में भूख, बेरोजगारी और मंहगाई पर कितना पुरजोर काबू बना पाएंगे इस पर विवाद है।
तकरीबन दो दशक से पाकिस्तान में इमरान की पार्टी पीटीआई भी पार्टियों की जमात में एक अदद पार्टी थी जिसका काम सिफारिश करना और काम करा देने का मकसद पूरा करना था। लेकिन इस बार इसे जो वोट मिले वह पीएमएलएन के वोट से 40 लाख ज़्यादा हंै। इमरान की पार्टी कराची में खासी उभरी। यह शहर मशीनों में जुगाड़ के काम, ठगी और राजनीति के लिए मशहूर रहा है। अभी इमरान की पार्टी को पंजाब में अपना आधार और मजबूत करना है। वहां खासी बड़ी जनसंख्या है। यहां पीएमएलएन के जाने-माने नेता शरीफ भाई हंै। यानी शाहबाज और नवाज शरीफ। इनमें नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। शाहबाज पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।
राष्ट्रीय असेंबली में इमरान खान को 115 सीटें अपनी पार्टी की बदौलत हासिल हुई हैं। यानी देश में सबसे बड़ी पार्टी अब इसे छोटी पार्टियों और निर्दलीयों को साथ लेकर सरकार बनानी है। पार्टी के खासमखास जहांगीर तरीन निर्दलीयों को साधने में लगे हंै। जिससे राज चले। इमरान कतई नहीं चाहते कि सरकार चलाने के लिए उन्हें क्रांतिकारी इस्लामी संगठनों का साथ लेना पड़े।
देश की आर्थिक हालत खासी नासाज है। देश में करंसी घटती जा रही है और घाटा बढ़ता जा रहा है। विदेशी मुद्रा का सुरक्षित कोष इस समय नौ बिलियन रह गया है ऐसी हालत में आईएमएफ से मदद की गुहार लगानी पड़ेगी। पाकिस्तान का चीन के साथ खासा सहयोग रहा है।
चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर पर फिलहाल काम चल रहा है। इसमे मूलभूत संसाधनों पर चीन ने 62 बिलियन डालर खर्च करने का करार किया है। उधर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंमेई ने कहा है यदि यह अहसास हुआ कि चीन को आईएमएफ कजऱ् से पाकिस्तान अदायगी कर रहा है तो अमेरिका उस कजऱ् को रुकवाने की पूरी कोशिश करेगा। अब पाकिस्तान के नज़रिए को अमेरिका को जताने और चीन को समझाने की जिम्मेदारी असद उमर को शायद मिले। ऐसी संभावना है कि वे ही पाकिस्तान में वित्तमंत्री बनेंगे। उमर साहब सुधारवादी माने जाते हैं साथ ही देश के सबसे बड़े निजी औद्योगिक समूह ‘एग्रो’ के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हंै।
देश में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती बिजली क्षेत्र है। पिछली पीएमएलएन सरकार ने चीन की मदद से देश में बिजली का एक लक्ष्य तय किया था। लेकिन राज्य, ऊर्जा सप्लाई करने वाले और बैंको ने ग्रिड से ही बिजली चुरानी शुरू कर दी । इस पर तो शायद हुक्मरान सब्सीडी कम करके, ऊर्जा पर टैक्स बढ़ा कर और राज्य को दुरूस्त करके काफी हद तक काबू पा लेंगे। एक बार बिजली पर मचे गोरखधंधे पर लगाम कस जाए तो समस्या का निदान काफी हद तक संभव होगा।
पाकिस्तान में अभी हाल जब चुनाव हुए तो हिंसा भी खासी हुई। उस हिंसा से जुड़ा धर्म का लबादा निस्संदेह खासा खतरनाक है। इससे इमरान साहब कैसे निपटते हैं यह वाकई बड़ा सवाल है। देश को बचाए रखने और वहां विकास का परचम लहराने के लिए शांति बेहद ज़रूरी है। पाकिस्तान की सीमा पर एक और तो उत्तरपश्चिम में युद्ध से त्रस्त अफगानिस्तान है दूसरी और भारत जहां अर्से से तनाव बरकरार रहा है। इमरान साहब के लिए यह ज़मीनी हकीकत काफी परेशानी पैदा करती रहेगी यदि उन्होंने योजना बनाकर सख्ती से अमल नहीं किया।
पिछले दिनों यह ज़रूर सुनाई दिया कि इमरान साहब अमेरिका के खिलाफ हैं जो ड्रोन के जरिए जिहादियों को मारता है। फिर वे उस सेना के साथी बन कर आज सत्ता की कुर्सी पर आए हैं इसलिए ऐसा जान पड़ता है कि भारत के साथ पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं हो सकते क्योंकि सेना नहीं चाहती कि दोनों देशों में संबंध सहज हों। पिछली सरकार में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार और सेना के बीच मतभेद की यही पुख्ता वजह थी। सेना कतई नहीं चाहती थी कि भारत के प्रति शरीफ की दोस्ती की बेचैनी बढ़े।
लेकिन देर सवेर इमरान खान की नागरिक सरकार और सेना में असहमतियां बढ़ेंगी। वे चाहते हैं कि अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान की सीमा खुले। जबकि सेना चाहती है कि 2300 किलोमीटर की सीमा पर कंटीले बाड़ लगाए जाए। वे चाहते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज़्यादा खर्च हो लेकिन यह तभी संभव है जब सेना के खर्च में कटौती हो। एक दौर था जब इमरान साहब कहा करते थे कि संसद के सत्र निहायत ‘बोर’ होते हैं। वे खुद बहुत कम बार ही सदन में दिखे भी। उनका कहना था कि पृथ्वी पर सबसे बोर जगह यही है। लेकिन अब उन्हें समर्पण, ब्यौरों और समझौते की तैयारी के साथ सदन में मौजूद रहना होगा। उन्हें अब उन राजनीतिकों के संपर्क में रहना होगा जिन्हें कभी वे अमूमन खारिज कर देते थे। उन्होंने देशवासियों से वादा किया था कि 90 दिनों में वे देश से भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे। देखना है किस हद तक वे कामयाब हो पाते हैं।
बेसब्र, बेसबब, बेख़बर प्रधानमंत्री के देश में
प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी को, अब किराए पर जा चुके हमारे लालकिले ने, इस स्वतंत्रता दिवस पर, तकनीकी तौर पर अंतिम बार, अपने कंधे पर खड़ा किया। हम सब ने पूरे 82 मिनट तक उनकी गिनाई उपलब्धियों पर सीना फुलाया, उनके दिखाए सपनो की चमक अपनी आंखों में बसाई, अम्बर से भी ऊपर जाने की उनकी कवितामयी ख्वाहिश से अपने को सराबोर किया और उनके साथ पूरा दम लगा कर भारत माता की जय बोली। बावजूद इसके कि मैं देश के उन 69 प्रतिशत मतदाताओं में से एक हूं, जिन्होंने 2014 की गर्मियों में नरेंद्र भाई के पक्ष में मतदान नहीं किया था, वे मेरे भी प्रधानमंत्री हैं। इसलिए मुझे लग रहा था कि कम-से-कम इस बार तो वे अपने भाजपाई-खोल से बाहर आएंगे और हमें बताएंगे कि देश सचमुच कहां-से-कहां पहुंच गया है।
लेकिन प्रधानमंत्री हैं कि सब का प्रधानमंत्री बनने को तैयार ही नहीं हैं। सो, वे अपनी सियासी जन्मघुट्टी के मुताबिक़ संघ-प्रचारक की मुद्रा में ही बोले। उनके बोले हुए में कितना सच था, वे जानते हुए भी नहीं जानते होंगे, लेकिन देश तो जानता ही है। इसलिए उनके बिगुल से सवा चार साल की सरकारी उपलब्धियों की धुन सुन कर मेरे तो पैर नहीं थिरके। नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उन्हें यह कहने से कौन रोक सकता है कि पहले के किसी गैऱ-भाजपाई प्रधानमंत्री ने इस देश के लिए कुछ किया ही नहीं, लेकिन मैं चूंकि एक अदना पत्रकार हूं इसलिए यह नहीं कहता कि हमारे प्रधानमंत्री ने सिंहासन संभालने के बाद कुछ किया ही नहीं है। उन्होंने बहुत कुछ एक साथ करने की कोशिश की है। अपनी इस हड़बड़ी में वे ऐसा गच्चा खा गए हैं कि कुछ ख़ास न हो पाने का मलाल, लगता है कि, उन्हें भी अब भीतर-ही-भीतर कचोटने लगा है। इसीलिए लालकिले की प्राचीर से सफाई देने लगे कि वे क्यों इतने बेसब्र हैं, क्यों इतने बेचैन हैं, क्यों इतने व्याकुल हैं, क्यों इतने व्यग्र हैं, क्यों इतने अधीर हैं और क्यों इतने आतुर हैं?
मुझे उनसे इसलिए सहानुभूति नहीं है कि वे क्यों इतने बेसब्र वगैरह-वगैरह हैं। मुझे तो इसलिए उन पर दया-सी आती है कि वे क्यों इतने बेख़बर हैं कि उन्हें इसका अहसास तक नहीं है कि सवा चार साल में उनके प्यारे देशवाािसयों के एक बहुत बड़ें हिस्से को अपने सब्र का, अपने चैन का, अपने शांत-चित्त होने का, अपनी एकाग्रता का, अपने धीरज का और अपने गांभीर्य का कैसा-कैसा इम्तहान देना पड़ा है? आचरण, व्यवहार और क्रिया-कलापों के सदियों पुराने संस्कारों से बंधे भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री की इतनी आकुलता-व्याकुलता का कोई सबब भी तो हो! नाहक ही ‘बे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंगÓ की दर्द भरी इबारत से हर दीवार रंगी पड़ी है। रहीम ने लिखा है कि बेर की झाड़ी और केले के पेड़ का साथ भला कैसे निभे? बेर का झाड़ तो अपनी मौज में डोल रहा है, मगर उसके बेतरह हिलने-डुलने से बगल में खड़े केले के पेड़ का तो अंग-अंग फटा जा रहा है।
जैसा कि नरेंद्र भाई मानते हैं, हो सकता है कि जिन साठ वर्षों में देश को भाजपा-सरकारों का सौभाग्य नहीं मिला, उस दौरान सचमुच कुछ नहीं हुआ हो। अगर ऐसा होता तो हमारे आज के प्रधानमंत्री को इस तरह आगा-पीछा देखे बिना दिन-रात काम करना काम क्यों करना पड़ता? लालकिले से उन्होंने 2013 और 2018 की रफ़्तार का फ़कऱ् हमें बताया। लेकिन यह नहीं बताया कि ऐसी कौन-सी मालिश-विधि उनके पास है, जिसने भारत के सूखे-पांखरे बदन को रातों-रात गामा-पहलवान बना दिया? नरेंद्र भाई हमारे देश को अम्बर से ऊपर ले चलें तो हम से ज़्यादा ख़ुश कौन होगा? हमें कौन-सा पाताल में पड़े रहने का शौक़ है? मगर बिना ख़ास सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के, महज़ अपनी झौंक पूरी करने के लिए, जिस अंतरिक्ष-गुब्बारे पर उन्होंने भारत को लाद दिया है, उसने मुल्क़ की हड्डी-पसली एक कर दी है।
जिन्हें यह यात्रा सुखद लग रही है, वे अपनी जानें; मैं तो इतना जानता हूं कि हमारे प्रधानमंत्री के प्यारे देशवासियों में से तीन-चौथाई से ज़्यादा तो दर्द से बिलबिला रहे हैं। लेकिन अगर नरेंद्र भाई को जऱा भी इल्म होता तो क्या वे लालकिले से इसका जि़क्र तक न करते? ईमानदारी के उत्सव में कंधे-से-कंधा मिला कर साथ देने वाले अपने देशवासियों के दर्द को ले कर क्या वे इतने उदासीन रहते? यह तो अच्छा है कि वे बेसब्र हैं। लेकिन यह घातक हैं कि वे बेख़बर हैं। इसलिए यह सोच-सोच कर मुझे रात भर नींद नहीं आती है कि एक बेख़बर चौकीदार के साए तले हम कब तक महफूज़़ रह पाएंगे?
प्रधानमंत्री आश्वस्त हैं कि उन्होंने सत्ता के गलियारों से दलाली ख़त्म कर दी। उन्हें गर्व है कि वे भाई-भतीजावाद हिंद महासागर में तिरोहित कर आए हैं। उनका सिर ऊंचा है कि लाखों छद्म-कंपनियों पर ताला लगा कर चाबी उन्होंने अपनी जेब में रख ली है। मगर मैं प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा आश्वस्त हूं कि प्रधानमंत्री को ख़ुद की पार्टी की राज्य सरकारों के गलियारों की कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि देसी-परदेसी अफ़सरशाही के बरामदों में किस के भाई-भतीजे क्या कर रहे हैं? वे इस तथ्य से आंखें फेरे हुए हैं कि आज भी मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और सूरत जैसे टापुओं का दुबई, सिंगापुर, हांगकांग और मॉरीशस जैसे द्वीपों से कितना ख़ुशनुमा बिरादराना क़ायम है?
इसलिए लालकिले पर खड़े हो कर बोले गए शब्दों से ज़्यादा बड़ी तो प्रधानमंत्री की वह ख़ामोशी है, जो पता नहीं क्या-क्या जवाब मांग रही है। ऐसा क्यों है कि आजकल नरेंद्र भाई नोट-बंदी की बात करने से लजा रहे हैं? वे हमें यह क्यों नहीं बताते कि रिज़र्व बैंक के हाथों पर ऐसी भी कौन-सी मेहंदी लगी है कि वह पुराने नोट अब तक नहीं गिन पाया है? क्यों वे पड़ौसी देशों से संबंधों के मसले पर बगले झांक रहे हैं? वे भारत के महाशक्ति बनते वक़्त इस बात का जि़क्र करने से क्यों बचते हैं कि दुनिया की बाकी महाशक्तियों से हमारे संबंधों का समीकरण किस दिशा में जा रहा है? नरेंद्र भाई के संकल्पों के लिए अब भी लोग अपनी बची-खुची काया खपाने को तैयार बैठे हैं, मगर पता तो चले कि आखिऱ उन्होंने तय क्या कर रखा है?
मुझे अपने प्रधानमंत्री के कुछ गुण बहुत पसंद है। कहां क्या बोलना है, वे जानते हैं। नफ़े को तौलना वे जानते हैं। अदा से डोलना वे जानते हैं। अपनी मंजि़ल उन्हें हमेशा से मालूम थी और उसे हासिल करने के सफऱ में लोकतांत्रिक यातायात के नियमों का पालन करने में उनकी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के बाद लालकिले से जब वे पहली बार बोले और दस साल के लिए फिऱकापरस्ती-स्थगन का आह्वान किया तो मेरा रोम-रोम खिल उठा था। मगर इन सवा चार साल में वे सारी कोंपले कुम्हला गईं, जिनके भरोसे हम अच्छे दिनों की आस लगाए बैठे थे। उनके ताज़ा संबोधन के बाद तो हरियाली की रही-सही उम्मीद भी झुलस गई। अगर अगले साल भी हम लालकिले की छाती पर नरेंद्र भाई को ही चढ़ा पाएंगे तो भारत प्रजातांत्रिक दरिद्रता के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका होगा।
लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।










