
1975 के आपातकाल के दौरान युवा प्रचारक के तौर पर भूमिगत गतिविधियों में जुटे थे नरेंद्र मोदी; दाढ़ी बढ़ाकर और पगड़ी पहनकर पुलिस की नजरों से बचते रहे
नई दिल्ली/अहमदाबाद । 16 सितंबर, 2026 – 1975 का आपातकाल वह दौर था जब विपक्षी नेता जेलों में बंद किए जा रहे थे, प्रेस पर सेंसरशिप लागू थी और असहमति की आवाज दबाने के लिए सरकारी तंत्र सक्रिय था। इसी दौर में नरेंद्र मोदी एक युवा प्रचारक के तौर पर भूमिगत गतिविधियों में जुटे हुए थे।
सरदार के भेष में बदल ली थी पहचान
गुजरात पुलिस की नजरों से बचने के लिए नरेंद्र मोदी ने अपनी पहचान पूरी तरह बदल ली थी। प्रतिबंधित साहित्य को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना और भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षित ठिकाने तलाशना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल था। इसके लिए उन्होंने दाढ़ी बढ़ाई, सिर पर पगड़ी बांधी और कई दिनों तक सरदारजी के भेष में रहे।
पुलिस अधिकारी के सामने से निकल गए
इस कहानी का सबसे रोमांचक प्रसंग तब सामने आया, जब एक पुलिस अधिकारी सीधे उस घर पहुंच गया जहां नरेंद्र मोदी शरण लिए हुए थे। पुलिस की तलाश भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए थी, लेकिन सामने खड़े ‘सरदारजी’ को पुलिसकर्मी पहचान नहीं सके। नरेंद्र मोदी बेझिझक उनके सामने से गुजर गए और गिरफ्तारी से बच निकले।
जोखिम भरे दौर में सूझबूझ का इस्तेमाल
यह किस्सा महज भेष बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि आपातकाल के दौरान भूमिगत संघर्ष, सूझबूझ और जोखिम भरे फैसलों की मिसाल के तौर पर बताया जाता है। उस दौर में एक छोटी-सी चूक गिरफ्तारी और लंबी जेल यात्रा में बदल सकती थी।



