जंतर मंतर पर से हटा दिया गया मंच; NDMC ने चलाया सफाई अभियान

राघवेंद्र द्विवेदी

नई दिल्ली : 36 दिनों के जंतर मंतर सामान्य दिखा। प्रदर्शनकारियों के हटने के बाद सामान्य स्थिति बहाल हुई है। आने जाने में न कोई बेरिकेड आड़े आ रहा है और न किसी सुरक्षा कर्मी की रोक टोक। आंदोलन ख़त्म होते ही NDMC के सफाई कर्मी सफाई अभियान में जुट गए और पूरे इलाके में सफाई अभियान शुरू हो गया। टेंट, मंच, बैनर, पोस्टर और सुरक्षा बैरिकेड हटा दिए गए। दिल्ली मेट्रो के सभी स्टेशन पहले की तरह खोल दिए गए हैं। यात्रियों की आवाजाही सामान्य है। एंट्री और एग्जिट में कहीं कोई रोक नहीं है।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और बाकी दो मांगों पर सरकार की सहमति के बाद आंदोलन भले ही खत्म हो गया हो लेकिन आंदोलन से उपजे कुछ सवाल अब भी अनसुलझे हैं। आंदोलनकारियों के हाथ में ऐसे पोस्टर और तख्ती देखी गईं जिन पर बहुत हल्के और आपत्तिजनक स्लोगन लिखे हुए थे। कुछ ने कैमरे पर बेहद हल्की और अश्लील बयानबाजी की। अपशब्दों का प्रयोग हुआ। ऐसे में सवाल ये कि क्या GenZ की अपनी बोलचाल की भाषा ही आंदोलन की भाषा बनी ? या स्वभाव से बोल्ड और बिंदास बोलने वाली नई पढ़ी सार्वजनिक मंचों पर बोलने में कोई संकोच नहीं करती ? ये जानते हुए कि सैकड़ों कैमरों की नज़र उन पर है, इसके बावजूद कोई झिझक नहीं ? क्या “इंस्टेंट फेम” हासिल पर ही आंधी दौड़ का नतीजा था ? या इसके सोशल मीडिया पर वायरल होने और व्यूज/लाइक्स बटोरने वाली रील कल्चर वजह है ?

इस बारे में मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉ ऋतु शर्मा का कहना है “आजकल की ज़्यादातर युवा पीढ़ी अपनी बात रखना जानती है। आजकल के माता पिता अपने बच्चों का समझना चाहते हैं। जेनरेशन गैप को ख़त्म करना चाहते हैं। इस आंदोलन में भी हम ने ज़्यादातर युवाओं को देखा जो संयम और ज़िम्मेदारी से अपनी बात रखना जानते हैं। युवाओं ने उपद्रियों को आंदोलन में शामिल होने से भी रोका जो कि अपने आप में समझदारी और मातृभूमि प्रेम का प्रतीक है। जो लोग अपनी बात संयमित ढंग से रखने में असमर्थ थे और पॉलिटिकल एजेंडा सेट करना चाहते थे उनको युवाओं ने कामयाब नहीं होने दिया।”

“हर आंदोलन में अलग अलग मानसिकता के लोग शामिल होते हैं। हमें उस पीढ़ी की सोच को बढ़ावा देना चाहिए जिसे भारतीय होने पर गर्व है। जो अपनी संस्कृति और संस्कारों को भी मान देना जानते हैं। हमें सकारात्मक सोच वाले युवाओं को ही बढ़ावा देना चाहिए”

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि दरअसल GenZ अपने मां बाप और बड़ों के साथ फ्रेंडली कनेक्ट है। लिहाजा फ्रेंडली विहेवियर उनके लिए कोई हैरान करने वाली बात नहीं। जेनरेशन गैप के तहत कई बार लोगों को उनका व्यवहार अजीब और चौंकाने वाला लगता है लेकिन शायद GenZ बोलते वक़्त इतना नहीं सोचती। फिर चाहे उनकी व्हॉट्सऐप चैट पर इस्तेमाल होने वाली भाषा और सिंबल्स का प्रयोग हो या आपस में बोलचाल का तौर तरीका।

आंदोलन में मंटो फिल्म का गाना “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” खूब सुनाई दिया। एक तरह से आंदोलन का तराना बन गया। गाने के बोल मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मक़बूल नज़्म “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़ुबाँ अब तक तेरी है” से लिए गए। किसी भी मंच पर अपनी बात को बिना लाग लपेट के कहने के लिए इस नज़्म इस इस्तेमाल अक्सर लोग करते हैं। ये जताने के लिए कि बोलने की आज़ादी है तो बोलना चाहिए। सवाल पूछना चाहिए। अपनी बात खुल कर कहने और अपने हक़ की लड़ाई लड़ने में कोताही नहीं करनी चाहिए लेकिन बोलते समय या बोलने की लिबर्टी लेते हुए लाइन का ध्यान ज़रूर रखना चाहिए कि सुनने वाला आहत न हो। किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।

मशहूर शायर वसीम बरेलवी का एक चर्चित शेर है –

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है

अपनी बात बोलने के लिए सलीक़ा बहुत ज़रूरी है। जब मंच सार्वजनिक हो तब ये सावधानी कुछ ज़्यादा ही बरती जानी चाहिए।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, एक पहलू भले कितना ही चमकदार और अच्छा हो लेकिन दूसरे की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।