
मोहिनी सेंगर। नई दिल्ली
एक ऐसी बातचीत, जिसे दुनिया उनकी मौत के बाद ही सुनने वाली थी
फेमिनिस्ट मूवमेंट की बड़ी आवाज़, पत्रकार और ‘Ms.’ मैगज़ीन की को-फाउंडर ग्लोरिया स्टाइनम अब इस दुनिया में नहीं हैं। 92 साल की उम्र में 2 सितंबर को न्यूयॉर्क स्थित अपने घर में उनका निधन हो गया। उनकी मौत के बाद Netflix ने उनका एक खास इंटरव्यू रिलीज किया है, जिसे उनकी जिंदगी की आखिरी बातचीत के तौर पर देखा जा रहा है।
कैमरा बंद था, लेकिन बातचीत खास थी
यह इंटरव्यू फरवरी 2025 में सीरीज़ के क्रिएटर और एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ब्रैड फालचुक ने रिकॉर्ड किया था। खास बात यह थी कि ‘Famous Last Words’ सीरीज़ के लिए इंटरव्यू देने वाले लोगों से पहले ही तय होता है कि उनकी बातचीत उनकी मौत के बाद ही रिलीज होगी।
इस बातचीत में ग्लोरिया स्टाइनम ने अपनी जिंदगी, अपने काम और फेमिनिस्ट मूवमेंट के साथ अपने लंबे सफर को याद किया। उन्होंने इंसानी रिश्तों और लोगों के बीच जुड़ाव को भी अपनी बातचीत का हिस्सा बनाया।
एक पत्रकार से फेमिनिस्ट आइकन तक का सफर
ग्लोरिया स्टाइनम ने अपने करियर की शुरुआत पत्रकार के तौर पर की थी। 1963 में उनका एक अंडरकवर आर्टिकल काफी चर्चित हुआ, जिसमें उन्होंने प्लेबॉय क्लब में काम करने वाली ‘बनी’ बनकर वहां की सच्चाई को करीब से देखा।
1971 में उन्होंने नेशनल विमेन्स पॉलिटिकल कॉकस की को-फाउंडिंग की। इसके एक साल बाद उन्होंने ‘Ms.’ मैगज़ीन की शुरुआत में अहम भूमिका निभाई। यह पहली मेनस्ट्रीम मैगज़ीनों में से थी, जिसने खुलकर फेमिनिस्ट नजरिया सामने रखा।
आखिरी बातचीत में भी वही सवाल, वही सोच
ब्रैड फालचुक के मुताबिक, स्टाइनम ने रेस, जेंडर और पीस जैसे मुद्दों पर अपनी जिंदगी के अनुभवों से बात की। उन्होंने कहा कि स्टाइनम अपनी आखिरी बातचीत में भी लोगों को आगे बढ़ने और बदलाव के लिए काम करते रहने की बात कह रही थीं।
‘Famous Last Words’ का आइडिया क्या है?
‘Famous Last Words’ एक लॉन्ग-फॉर्म इंटरव्यू सीरीज़ है, जिसमें मशहूर लोग अपनी जिंदगी और सोच पर खुलकर बात करते हैं। लेकिन इन इंटरव्यूज़ की सबसे खास बात यही है कि इन्हें संबंधित व्यक्ति की मौत के बाद रिलीज किया जाता है।
इस सीरीज़ में इससे पहले जेन गुडॉल और एरिक डेन जैसे नाम भी शामिल हो चुके हैं। यह शो डेनिश सीरीज़ ‘Det Sidste Ord’ पर आधारित है, जिसका मतलब है ‘द लास्ट वर्ड’।
ग्लोरिया स्टाइनम का यह इंटरव्यू अब सिर्फ एक बातचीत नहीं, बल्कि उनके दशकों लंबे सफर, विचारों को समझने का एक आखिरी मौका बन गया है।

