
नकली वेबसाइट से लेकर अवैध कॉल सेंटर तक का खेलः एक साल में साइबर-क्रिप्टो करेंसी फ्रॉड के 256 मामले, 141 आरोपी गिरफ्तार; ठगी की रकम क्रिप्टो से सीमा पार और फिर रियल एस्टेट-लक्जरी संपत्तियों में पहुंची
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
एक विदेशी नागरिक को कनाडाई पुलिस का अधिकारी बनकर फोन किया गया। उसे बताया गया कि वह एक आपराधिक जांच में फंस गया है और अपनी रकम सुरक्षित रखने के लिए उसे क्रिप्टोकरेंसी में ट्रांसफर करना होगा। डर और भरोसे के इस खेल में पीड़ित ने करीब 93,400 कनाडाई डॉलर यानी लगभग ₹56.75 लाख की रकम गंवा दी। लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू हुई।
रकम एक जगह नहीं रही। उसे अलग-अलग क्रिप्टो वॉलेट में भेजा गया। फिर डिजिटल ट्रांजैक्शन की कई परतें बनाई गईं ताकि पैसे का मूल स्रोत छिप जाए। प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि भारत में एक अवैध कॉल सेंटर के जरिए विदेशी नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा था। जांच में 351.86 बिटकॉइन, जिसकी कीमत करीब ₹280 करोड़ बताई गई। इसके अलग-अलग डिजिटल वॉलेट में होने का पता चला। ईडी ने भारत और यूएई में मौजूद संपत्तियों की भी जांच की और करीब ₹11.55 करोड़ की संपत्ति तथा ₹28.9 करोड़ मूल्य के बिटकॉइन अटैच किए।
यह अकेला मामला नहीं है। ईडी की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज केस स्टडीज बताती हैं कि साइबर ठगी और क्रिप्टो अब एक-दूसरे से जुड़ी हुई अपराध की नई अर्थव्यवस्था बना रहे हैं। ठगी का पैसा बैंकिंग सिस्टम से निकलकर क्रिप्टो में पहुंचता है, कई वॉलेट में घूमता है, पी2पी प्लेटफॉर्म के जरिए दोबारा मुद्रा में बदला जाता है और फिर रियल एस्टेट, लग्जरी कारों और दूसरी संपत्तियों में लगाया जाता है।
कॉइनबेस की नकली वेबसाइट, दुनिया से ₹165 करोड़ की क्रिप्टो ठगी
एक अन्य मामले में अपराधियों ने एक ऐसी वेबसाइट तैयार की जो देखने में वास्तविक कॉइनबेस जैसी थी। इसका इस्तेमाल दुनिया भर के पीड़ितों से क्रिप्टोकरेंसी चुराने के लिए किया गया। ईडी के मुताबिक, इस फिशिंग स्कैम में ₹165 करोड़ से अधिक की क्रिप्टोकरेंसी चोरी की गई, जिसे कई वर्चुअल वॉलेट में भेजा गया और फिर पी2पी प्लेटफॉर्म तथा लोकल बिटकॉइन्स जैसे माध्यमों से बेचा गया। इसके बाद रकम भारतीय मुद्रा में बदली गई और आरोपियों, उनके परिवार तथा सहयोगियों के बैंक खातों में पहुंचाई गई। जांच में इस रकम का इस्तेमाल लग्जरी कारों और हाई-एंड रियल एस्टेट खरीदने में किए जाने की बात सामने आई। साइबर अपराधियों के लिए क्रिप्टो सिर्फ पैसा हासिल करने का माध्यम नहीं था। वह ठगी की रकम को छिपाने और फिर उसे सामान्य अर्थव्यवस्था में वापस लाने का रास्ता भी बन गया।
अटैचमेंट के बाद ₹2,170 करोड़ की क्रिप्टोकरेंसी जांच के घेरे में
एक अन्य क्रिप्टोकरेंसी फ्रॉड केस का पैमाना और भी बड़ा है। ईडी की जांच में ₹2,170 करोड़ मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी की पहचान और जब्ती की गई। ईडी ने डिजिटल परिसंपत्तियों को अपने नियंत्रण वाले कोल्ड वॉलेट में सुरक्षित किया, ताकि उन्हें आगे ट्रांसफर या नष्ट न किया जा सके। इस मामले में दो प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और विशेष पीएमएलए अदालत में प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट दाखिल की गई। यह केस एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाता है। कभी जांच एजेंसियों के लिए अपराध की रकम का मतलब बैंक बैलेंस, नकदी, जमीन या मकान होता था। अब क्रिप्टो वॉलेट में मौजूद डिजिटल एसेट खुद अपराध की संपत्ति बनकर जांच के केंद्र में आ रही है।
256 मामलों में ₹35,925 करोड़ की अपराध से अर्जित इनकम
इन केस स्टडीज को अलग-अलग घटनाएं मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ईडी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक साइबर-क्रिप्टो फ्रॉड से जुड़े 256 मामलों की जांच की गई। इन मामलों में 141 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और जांच के दौरान ₹35,925 करोड़ की प्रोसीड्स ऑफ क्राइम की पहचान हुई। इनमें से ₹12,570 करोड़ की संपत्ति अटैच की जा चुकी है। यहां ₹35,925 करोड़ को भारत में साइबर ठगी से हुआ कुल नुकसान समझना सही नहीं होगा। यह वह रकम है जिसे ईडी की जांच में अपराध से हासिल रकम के रूप में पहचाना गया है। ₹12,570 करोड़ की अटैचमेंट का मतलब है कि ईडी ने पहचान की गई इस अपराध की कमाई के लगभग 35 फीसदी हिस्से पर कार्रवाई कर उसे सुरक्षित करने की कोशिश की है।
ऑक्टा एफएक्स: फर्जी ई-कॉमर्स कंपनियों के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग
साइबर फ्रॉड का दूसरा मॉडल ऑनलाइन निवेश और फॉरेक्स ट्रेडिंग के नाम पर सामने आया। ऑक्टा एफएक्स मामले में लोगों को ऑनलाइन विज्ञापनों और डिजिटल कम्युनिकेशन के जरिए फॉरेक्स ट्रेडिंग में ऊंचे रिटर्न का लालच दिया गया। जांचकर्ताओं ने रकम के डिजिटल ट्रेल को समझने के लिए अवैध ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर टेस्ट अकाउंट तक बनाए। सामने आया कि भारत में आए यूपीआई और बैंक ट्रांसफर को फर्जी ई-कॉमर्स संस्थाओं के जरिए घुमाया गया, ताकि रकम का वास्तविक स्रोत छिपाया जा सके। इस केस में क्रिप्टो मुख्य माध्यम नहीं था, लेकिन मनी लॉन्ड्रिंग का तरीका वही था- डिजिटल तरीके से पैसा हासिल करना, उसे कई परतों में घुमाना और वास्तविक लाभार्थी तक पहुंच छिपाना।
बिटकनेक्ट: जब स्क्रीन पर दिखा 3,700 फीसदी सालाना रिटर्न
क्रिप्टो से जुड़े निवेश फ्रॉड का सबसे चौंकाने वाला उदाहरण बिटकनेक्ट मामले में सामने आता है। ईडी के मुताबिक निवेशकों को एक कथित डिजिटल करेंसी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में पैसा लगाने के लिए आकर्षित किया गया। प्लेटफॉर्म ने दावा किया कि उसका कथित वोलैटिलिटी ट्रेडिंग बॉट हर महीने 40 फीसदी तक रिटर्न दे सकता है। निवेशकों को करीब 1 फीसदी प्रतिदिन का कथित रिटर्न दिखाया गया। यह गणना सालाना आधार पर करीब 3,700 फीसदी बैठती है। ऐसे असाधारण रिटर्न का प्रदर्शन निवेशकों में भरोसा पैदा करने का जरिया बना और डिजिटल करेंसी के नाम पर बड़ी रकम जुटाई गई।
क्रिप्टो क्यों बन रहा है साइबर अपराधियों का पसंदीदा रास्ता?
इन मामलों को जोड़कर देखें तो एक पैटर्न सामने आता है। साइबर अपराधी पहले डिजिटल दुनिया में भरोसा पैदा करते हैं। कभी पुलिस अधिकारी बनकर, कभी निवेश विशेषज्ञ बनकर, कभी किसी वैध क्रिप्टो प्लेटफॉर्म की नकल करके। पीड़ित से रकम हासिल होने के बाद उसे कई डिजिटल माध्यमों से घुमाया जाता है। क्रिप्टो इसमें खास भूमिका निभाती है, क्योंकि डिजिटल एसेट को अलग-अलग वॉलेट में ट्रांसफर करना संभव है और ट्रांजैक्शन सीमा-पार भी हो सकते हैं। इसके बाद पी2पी प्लेटफॉर्म या दूसरे माध्यमों के जरिए क्रिप्टो को दोबारा सामान्य मुद्रा में बदला जाता है।
और यहीं से साइबर अपराध की रकम रियल एस्टेट, कार और दूसरी संपत्तियों में प्रवेश कर जाती है।
ईडी के सामने अब बैंक फ्रॉड से ज्यादा जटिल डिजिटल चुनौतीः राहुल नवीन
ईडी निदेशक राहुल नवीन ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में आर्थिक अपराध के बदलते स्वरूप को खास तौर पर रेखांकित किया है। उनके मुताबिक ईडी का पारंपरिक फोकस बैंक फ्रॉड, बड़े कॉरपोरेट घोटालों और रियल एस्टेट फ्रॉड पर रहा है। लेकिन लगातार कार्रवाई और आईबीसी तथा रेरा जैसे सुधारों के बाद अब क्रिप्टोकरेंसी फ्रॉड और साइबर आधारित वित्तीय अपराधों में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई दे रही है। इसके साथ ही नारकोटिक्स तस्करी, टेरर फाइनेंसिंग और सीमा-पार वित्तीय अपराध भी एजेंसी की प्राथमिकताओं में बढ़े हैं। यानी ईडी के सामने अब अपराधी सिर्फ फर्जी कंपनी बनाकर बैंक से पैसा निकालने वाला व्यक्ति नहीं है। वह तकनीक, डिजिटल पहचान, क्रिप्टो वॉलेट, पी2पी नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन का इस्तेमाल करने वाला ऐसा नेटवर्क हो सकता है जिसकी मनी ट्रेल कई देशों में फैली हो।
ऐसे में जांच एजेंसियों की रणनीति भी बदल रही है
साइबर-क्रिप्टो अपराध की जांच के लिए ईडी को पारंपरिक वित्तीय जांच से आगे जाना पड़ रहा है। एजेंसी ने ऐसे मामलों में डिजिटल फॉरेंसिक, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन ट्रेसिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर बढ़ाया है। आरबीआई और एफआईयू-इंडिया सहित दूसरी एजेंसियों के साथ समन्वय भी इस बदलते अपराध मॉडल का जवाब है। क्रिप्टो परिसंपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड वॉलेट का इस्तेमाल भी इसी बदलाव का संकेत है। यानी जांच अब यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि पैसा किस बैंक खाते में गया; सवाल यह भी है कि किस वॉलेट में गया, वहां से किस वॉलेट में गया और आखिरकार किस व्यक्ति या संपत्ति तक पहुंचा।



