
तहलका डेस्क।
दृष्टि गुप्ता/नई दिल्ली : भारत में चिकित्सा विज्ञान ने रोबोटिक असिस्टेड जॉइंट रिप्लेसमेंट के रूप में एक बड़ी छलांग लगाई है, लेकिन इस आधुनिक तकनीक और आम मरीज के बीच ‘बीमा कवर की खाई’ एक गंभीर संकट बन गई है। बीते दिन नई दिल्ली में ‘द पार्टनरशिप टू फाइट क्रॉनिक डिजीज’ (PFCD) द्वारा आयोजित पैनल चर्चा में देश के दिग्गज ऑर्थोपेडिक सर्जन्स ने इस कड़वे सच को उजागर किया।
देश में हर साल करीब 3.5 लाख जॉइंट रिप्लेसमेंट होते हैं, मगर रोबोटिक तकनीक का हिस्सा मात्र 5-10% है। इसका मुख्य कारण सर्जिकल कुशलता की कमी नहीं, बल्कि इंश्योरेंस कंपनियों द्वारा इस सटीक तकनीक को ‘जरूरत’ के बजाय ‘लग्जरी’ मानकर कवर देने से इनकार करना या मनमाने सब-लिमिट लगाना है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि रोबोटिक सर्जरी में सीटी-बेस्ड प्लानिंग से मिलने वाली सटीकता मानवीय त्रुटि को शून्य करती है और स्वस्थ ऊतकों को सुरक्षित रखती है। मैक्स हेल्थकेयर के ऑर्थोपेडिक्स, जॉइंट रिप्लेसमेंट और चीफ रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के चेयरमैन डॉ. रामनीक महाजन,अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. हविंद टंडन और फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (FMRI) के डायरेक्टर और हेड डॉ. सुभाष झांगीड़ ने एक सुर में कहा कि बीमा कंपनियां केवल शुरुआती लागत देखती हैं, जबकि उन्हें दीर्घकालिक फायदों जैसे तेजी से रिकवरी, कम जटिलता और दोबारा सर्जरी (रिवीजन) की न्यूनतम संभावना पर ध्यान देना चाहिए।
विडंबना यह है कि 2019 में IRDAI द्वारा आधुनिक उपचारों को शामिल करने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद, कई पॉलिसियां रोबोटिक सर्जरी के लिए पारंपरिक सर्जरी से भी कम रिम्बर्समेंट दे रही हैं। यह स्थिति न केवल मरीजों को उनकी आर्थिक क्षमता के आधार पर समझौता करने को मजबूर कर रही है, बल्कि डॉक्टरों के सामने भी नैतिक संकट पैदा कर रही है। जब मरीज इलाज की गुणवत्ता के बजाय इंश्योरेंस की सीमाओं को देखकर फैसला लेता है, तो ‘पेशेंट-सेंट्रिक केयर’ का सिद्धांत दम तोड़ देता है।
PFCD ने पुरजोर मांग की है कि बीमा ढांचे को वैल्यू-ड्रिवन बनाया जाए, ताकि तकनीक का लाभ महानगरों के सीमित दायरे से निकलकर हर उस भारतीय तक पहुंचे जिसे इसकी जरूरत है। यह समय हेल्थ केयर सिस्टम के लिए आत्ममंथन का है कि क्या हम मरीजों को आधुनिक विज्ञान के लाभ से केवल इसलिए वंचित रखेंगे क्योंकि हमारा बीमा ढांचा पुराना पड़ चुका है?



