लोकसभा का ‘रूल 72’ बना गेमचेंजर! महिला आरक्षण बिल पर हंगामे के बीच कैसे चली स्पीकर की चाल

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल को लेकर जब जोरदार हंगामा हुआ, तो एक ऐसा नियम सामने आया जिसने पूरी बाज़ी पलट दी। लोकसभा का रूल 72—जिसे आमतौर पर लोग ज्यादा नोटिस नहीं करते—इस बार चर्चा के केंद्र में है। आखिर क्या है ये नियम और कैसे इसने विपक्ष की रणनीति को एक झटके में कमजोर कर दिया, आइए आसान भाषा में समझते हैं।

महिला आरक्षण बिल पर हंगामे के बीच ‘रूल 72’ बना गेमचेंजर! (File Photo: ITG)
महिला आरक्षण बिल पर हंगामे के बीच ‘रूल 72’ बना गेमचेंजर! (File Photo: ITG)

नई दिल्ली: 16 अप्रैल को संसद का विशेष सत्र शुरू होते ही महिला आरक्षण से जुड़े अहम संशोधन बिल लोकसभा में पेश किए गए। जैसे ही कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बिल रखने की कोशिश की, विपक्ष की तरफ से कड़ा विरोध शुरू हो गया। कांग्रेस समेत कई दलों ने इस पर आपत्ति जताई और सदन में हंगामा होने लगा।

ऐसे माहौल में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने रूल 72 का इस्तेमाल किया और यहीं से पूरी स्थिति बदल गई। इस नियम के जरिए उन्होंने कार्यवाही को बिना रुके आगे बढ़ाने का रास्ता निकाल लिया।

अब सवाल ये है कि आखिर रूल 72 है क्या?

सरल भाषा में समझें तो जब किसी बिल को पेश करने के वक्त ही विरोध होने लगता है, तब स्पीकर इस नियम का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके तहत दोनों पक्षों को बस छोटा-सा बयान देने का मौका मिलता है, और फिर बिना लंबी बहस के सीधा फैसला लिया जा सकता है, चाहे वो वोटिंग के जरिए ही क्यों न हो।  

इसका मतलब साफ है—अगर विपक्ष शुरुआत में ही बिल को रोकने की कोशिश करे, तो स्पीकर रूल 72 लगाकर उस रुकावट को खत्म कर सकते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।

विपक्ष की कोशिश थी कि बिल की शुरुआत ही न हो, ताकि आगे की प्रक्रिया धीमी पड़ जाए। लेकिन रूल 72 लगते ही उनकी रणनीति ज्यादा काम नहीं आई, क्योंकि उन्हें लंबी बहस का मौका नहीं मिला।

दूसरी तरफ सरकार ने इस नियम का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने स्पीकर से रूल 72 लागू करने की मांग की, जिससे विपक्ष की आपत्ति सीमित हो गई और बिल को पेश करने का रास्ता साफ हो गया।

हालांकि, इस पर बहस भी शुरू हो गई है। कुछ लोग मानते हैं कि इससे विपक्ष की आवाज सीमित होती है, जबकि दूसरे कहते हैं कि संसद को सुचारू तरीके से चलाने के लिए ऐसे नियम जरूरी हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने ये दिखा दिया कि संसद में सिर्फ राजनीतिक ताकत ही नहीं, बल्कि नियमों की समझ भी बहुत मायने रखती है। सही समय पर सही नियम का इस्तेमाल कैसे खेल पलट सकता है, इसका ताजा उदाहरण रूल 72 बन गया है।