दुर्गा पूजा में बंगाल के लोग क्यों खाते हैं मांस-मछली? जब प्याज-लहसुन से भी होता है परहेज, तो क्या है सदियों पुरानी परंपरा का रहस्य?

नई दिल्ली | तहलका न्यूज | स्नेहलता
नवरात्र में देश के कई घरों में प्याज-लहसुन तक नहीं खाया जाता। कहीं नौ दिन का व्रत रखा जाता है, तो कहीं फलाहार और सात्विक भोजन से मां दुर्गा की आराधना होती है। लेकिन पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा की तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। यहां पूजा के दिनों में कई परिवारों में मछली और मांस के खास व्यंजन भी बनते हैं। आखिर ऐसा क्यों? क्या मां दुर्गा की पूजा में मांसाहार की भी कोई धार्मिक मान्यता है, या इसके पीछे बंगाल की सदियों पुरानी संस्कृति का राज छिपा है?

बंगाल में पूजा के नियम बाकी राज्यों से अलग क्यों?

दरअसल, भारत में पूजा-पाठ और खानपान की परंपराएं हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं हैं। कई धार्मिक परंपराओं में सात्विक भोजन को प्राथमिकता दी जाती है, जिसमें प्याज-लहसुन से भी परहेज किया जाता है। वहीं, पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा की उपासना की शाक्त परंपरा का विशेष महत्व है। इस परंपरा में देवी को शक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है और कुछ विशिष्ट अनुष्ठानों में मांसाहार का भी स्थान रहा है।

हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बंगाल में हर दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली खाई जाती है। कई परिवार और पूजा समितियां शाकाहारी भोजन ही अपनाती हैं।

मां को मछली चढ़ाने की भी है परंपरा!

बंगाल की कुछ पारंपरिक पारिवारिक दुर्गा पूजाओं में मछली देवी के भोग या विशेष अनुष्ठानों से जुड़ी रही है। कुछ शाक्त परंपराओं में पशुबलि और उसके बाद मांस ग्रहण करने की प्रथा भी देखने को मिलती है। लेकिन ऐसी परंपराएं सभी पूजा पंडालों में नहीं निभाई जातीं।

यहां एक दिलचस्प बात समझने वाली है—देवी को चढ़ाया जाने वाला भोग और परिवार के लोगों का भोजन अलग-अलग हो सकता है। किसी घर में मां को शाकाहारी भोग चढ़ाया जाता है, लेकिन पूजा के अवसर पर परिवार के सदस्य मछली का विशेष पकवान खाते हैं।

बंगाली संस्कृति में मछली का इतना महत्व क्यों?

पश्चिम बंगाल में मछली केवल भोजन नहीं, बल्कि खानपान और सांस्कृतिक पहचान का भी अहम हिस्सा है। नदियों और जलस्रोतों से जुड़े इस क्षेत्र में मछली सदियों से लोगों के भोजन में शामिल रही है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, कई खास अवसरों पर मछली के व्यंजन बनाए जाते हैं।

दुर्गा पूजा भी बंगाली परिवारों के लिए मिलन, खुशियों और दावत का बड़ा अवसर है। यही वजह है कि कई घरों में इन दिनों खास मछली और मांसाहारी व्यंजन तैयार किए जाते हैं।

क्या मां दुर्गा के स्वागत में मांसाहार जरूरी है?

बंगाल में दुर्गा पूजा को मां दुर्गा के मायके आने के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। इस दौरान घरों में खुशियां मनाई जाती हैं, रिश्तेदार मिलते हैं और विशेष पकवान बनते हैं। लेकिन मांसाहार को मां के स्वागत के लिए अनिवार्य धार्मिक नियम मानना सही नहीं होगा। यह परिवार, क्षेत्र और धार्मिक परंपरा के अनुसार बदलता है।

यानी बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली खाने के पीछे सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि धार्मिक विविधता, स्थानीय संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं का मेल है। जहां कुछ लोग सात्विक भोजन से मां की आराधना करते हैं, वहीं कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार मांसाहारी पकवान बनाते हैं।

आखिरकार, मां दुर्गा की भक्ति किसी एक खानपान पद्धति तक सीमित नहीं है। भारत की यही विविधता दुर्गा पूजा को अलग-अलग रंगों और परंपराओं से खास बनाती है।