
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों और शिक्षकों की वास्तविक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी- नेशनल मेडिकल कमीशन) ने रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी को लेकर सख्ती बढ़ा दी है। आयोग ने मेडिकल कॉलेजों को डॉक्टरों और अन्य संबंधित मेडिकल स्टाफ के राष्ट्रीय या राज्य मेडिकल रजिस्टर का पंजीकरण नंबर आधार-सक्षम बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली (एईबीएएस) पर अपडेट करने के लिए तीन सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत दी है। जानकारी अपडेट नहीं होने या गलत पंजीकरण नंबर दर्ज होने पर सिस्टम दैनिक हाजिरी को स्वतः ब्लॉक कर सकता है और उसे अस्वीकार कर सकता है।
एनएमसी का यह आदेश ऐसे समय आया है, जब मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की उपलब्धता और हाजिरी के रिकॉर्ड को लेकर पहले भी गंभीर सवाल उठ चुके हैं। आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में एक ही समय में दो या अधिक जगह काम करते हुए दिखाई जाने वाली फर्जी फैकल्टी की समस्या का उल्लेख है। वहीं, पुराने निरीक्षणों और कोर्ट में लंबित मामलों में निर्धारित मानकों के मुकाबले फैकल्टी की कमी तथा बायोमेट्रिक हाजिरी के आंकड़ों में अंतर सामने आया था।
हालांकि, एनएमसी का ताजा आदेश अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जिन कॉलेजों में पंजीकरण नंबर खाली या गलत पाए गए, वहां फर्जी फैकल्टी थी। लेकिन यह जरूर बताता है कि डिजिटल रिकॉर्ड में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए आयोग ने अब हाजिरी से जुड़ी कार्रवाई की व्यवस्था पर जोर दिया है।
एक महीने में पूरा नहीं हुआ काम तो तीन हफ्ते की फिर मोहलत
एनएमसी ने 3 सितंबर 2026 को मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिया था कि वे अपने यहां मेडिकल फैकल्टी, जूनियर रेजिडेंट, सीनियर रेजिडेंट, ट्यूटर और डेमॉन्स्ट्रेटर के प्रोफाइल में राष्ट्रीय मेडिकल रजिस्टर (एनएमआर) या राज्य मेडिकल रजिस्टर (एसएमआर) का पंजीकरण नंबर दर्ज करें। आयोग ने कहा था कि विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में एईबीएएस पोर्टल पर शुरुआती पंजीकरण के दौरान कई मामलों में पंजीकरण नंबर वाला कॉलम खाली छोड़ दिया गया था। इसके बाद संस्थानों को एक महीने के भीतर जानकारी अपडेट करने का निर्देश दिया गया।
लेकिन 5 अक्टूबर के नए आदेश में एनएमसी ने बताया कि कुछ मेडिकल कॉलेजों में यह काम अब भी लंबित है। कुछ नोडल अधिकारियों ने पोर्टल पर गलत पंजीकरण विवरण भी दर्ज किए हैं। इसी आधार पर आयोग ने तीन सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत देने का फैसला किया है। डीन, प्रिंसिपल और निदेशकों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने संस्थानों में सभी संबंधित कर्मचारियों के प्रोफाइल में सही जानकारी अपडेट कराना सुनिश्चित करें।
आदेश के मुताबिक, पंजीकरण नंबर अपडेट नहीं करने या गलत नंबर दर्ज करने पर सिस्टम दैनिक हाजिरी को स्वतः ब्लॉक और अस्वीकार कर सकता है। इससे मेडिकल कॉलेज की एनएमसी के आकलन और निरीक्षण के दौरान अनुपालन स्थिति प्रभावित हो सकती है। गैर-मेडिकल फैकल्टी की निर्धारित श्रेणी के लिए अलग व्यवस्था है। एमएससी और पीएचडी जैसी योग्यताओं वाले संबंधित गैर-मेडिकल फैकल्टी सदस्यों, ट्यूटर और डेमॉन्स्ट्रेटर के पंजीकरण नंबर वाले कॉलम में ‘एनए’ दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।
एनएमसी की रिपोर्ट में फर्जी फैकल्टी की समस्या स्वीकार
मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की वास्तविक उपलब्धता का सवाल नया नहीं है। एनएमसी की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट में आधार-सक्षम बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली लागू करने का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसे फर्जी फैकल्टी को रोकना बताया गया है, जो एक ही समय में दो या अधिक जगह काम करते हुए दिखाए जाते हैं। इस व्यवस्था के जरिए आयोग का उद्देश्य फैकल्टी की उपस्थिति और उपलब्धता की निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाना है। डॉक्टर की पहचान और उसके मेडिकल रजिस्ट्रेशन नंबर को डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ने पर संबंधित जानकारी के सत्यापन में मदद मिल सकती है।
हालांकि, किसी डॉक्टर का नाम दो मेडिकल कॉलेजों की सूची में होना और एक ही समय पर दो अलग-अलग स्थानों पर बायोमेट्रिक हाजिरी दर्ज होना दो अलग स्थितियां हैं। पहली स्थिति की जांच नियुक्ति और रोजगार संबंधी रिकॉर्ड से होगी, जबकि दूसरी के लिए हाजिरी के मूल डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है।
246 मेडिकल कॉलेजों में उठ चुके फैकल्टी की उपलब्धता पर सवाल
मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी और हाजिरी के मानकों को लेकर अक्टूबर 2023 में एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया था। एनएमसी के स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड ने वर्ष 2022-23 में 246 मेडिकल कॉलेजों का आकलन किया था। किसी भी कॉलेज ने फैकल्टी और सीनियर रेजिडेंट की पर्याप्त उपलब्धता के साथ 50 प्रतिशत न्यूनतम हाजिरी का मानक पूरा नहीं किया था। यह आकलन आधार-सक्षम बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली के माध्यम से की गई निगरानी पर आधारित था। रिपोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों में वास्तविक फैकल्टी उपलब्धता और दर्ज उपस्थिति के बीच अंतर की पड़ताल का आधार दिया। हालांकि, इस निष्कर्ष का अर्थ यह नहीं है कि सभी 246 कॉलेजों में फर्जी फैकल्टी थी। फैकल्टी की संख्या में कमी, निर्धारित हाजिरी पूरी न होना और किसी व्यक्ति का एक ही समय में कई जगह दर्ज होना अलग-अलग प्रकार की समस्याएं हैं।
पुडुचेरी के मेडिकल कॉलेज में 40 प्रतिशत फैकल्टी की कमी
श्री वेंकटेश्वरा मेडिकल कॉलेज, अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर, पुडुचेरी से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने एनएमसी के निरीक्षण का आकलन आया था। मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, 250 एमबीबीएस सीटों के लिए निर्धारित 195 फैकल्टी सदस्यों के मुकाबले कॉलेज में 78 फैकल्टी उपलब्ध बताई गई थीं। इस आधार पर फैकल्टी की कमी 40 प्रतिशत आंकी गई। इसी आकलन में 168 की आवश्यकता के मुकाबले 45 रेजिडेंट उपलब्ध बताए गए थे।
कॉलेज ने निरीक्षण के निष्कर्षों पर आपत्ति जताई थी। सुनवाई के दौरान फैकल्टी की गणना में जूनियर रेजिडेंट को शामिल करने का सवाल भी उठा। फैकल्टी, रेजिडेंट और अस्पताल संबंधी अन्य कमियों के आधार पर सीटें बढ़ाने का आवेदन अस्वीकार कर दिया गया था। यह मामला बताता है कि मेडिकल कॉलेज की ओर से प्रस्तुत स्टाफ की जानकारी और नियामक के निरीक्षण में दर्ज उपलब्धता के बीच अंतर होने पर शैक्षणिक मंजूरी प्रभावित हो सकती है। लेकिन यह मामला भी अपने आप में फर्जी फैकल्टी या एक ही समय में दो कॉलेजों में हाजिरी का प्रमाण नहीं है। इसका महत्व फैकल्टी की वास्तविक उपलब्धता और नियामकीय मानकों के आकलन में है।
कानपुर के मेडिकल संस्थान में फैकल्टी की कमी का आकलन
डॉ. बी. एस. कुशवाह इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से जुड़े मामले में एनएमसी ने बायोमेट्रिक हाजिरी के आंकड़ों के आधार पर फैकल्टी की उपलब्धता पर सवाल उठाए थे। दिल्ली हाईकोर्ट में दर्ज मामले के मुताबिक, जून से अगस्त 2025 के दौरान एईबीएएस रिकॉर्ड में कम-से-कम 75 प्रतिशत हाजिरी वाले केवल 49 फैकल्टी सदस्य उपलब्ध दिखाई दिए। 250 एमबीबीएस सीटों के लिए लागू मानकों के आधार पर विभागवार फैकल्टी की कमी 70.83 प्रतिशत बताई गई थी। निरीक्षण के दिन बायोमेट्रिक प्रणाली में 80 फैकल्टी दिखाई दिए थे।
संस्थान ने एनएमसी के निष्कर्षों को चुनौती दी थी और अपने पक्ष में निरीक्षण संबंधी रिकॉर्ड पेश किए थे। इसलिए इन आंकड़ों को नियामक के आकलन के रूप में देखना जरूरी है, न कि संस्थान के खिलाफ अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में। यह मामला बताता है कि फैकल्टी की उपलब्धता का आकलन केवल कॉलेज की ओर से प्रस्तुत सूची के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित अवधि की हाजिरी और निरीक्षण के रिकॉर्ड से भी किया जा सकता है।
अब सवाल: गलत पंजीकरण नंबरों की संख्या कितनी?
एनएमसी के नए आदेश में यह स्पष्ट है कि कुछ मेडिकल कॉलेजों में पंजीकरण विवरण अपडेट नहीं हुए और कुछ मामलों में गलत जानकारी दर्ज की गई। लेकिन आयोग ने इन संस्थानों की कुल संख्या, प्रभावित डॉक्टरों की संख्या या अब तक ब्लॉक और अस्वीकार की गई हाजिरी के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं। यही इस मामले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पता लगाना जरूरी है कि पंजीकरण नंबरों में गड़बड़ी केवल डेटा एंट्री की समस्या है या कुछ संस्थानों में डॉक्टरों की नियुक्ति, पेशेवर पंजीकरण और वास्तविक उपस्थिति के सत्यापन में भी कमी है।
मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी स्वास्थ्य शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के प्रशिक्षण को प्रभावित कर सकती है। वहीं, यदि कोई संस्थान कागजों पर आवश्यक फैकल्टी दिखाता है, लेकिन वे निर्धारित समय पर वास्तव में उपलब्ध नहीं होते, तो यह नियामकीय जांच का गंभीर विषय बनता है। आयोग अब पंजीकरण संबंधी जानकारी और दैनिक बायोमेट्रिक हाजिरी को जोड़कर रिकॉर्ड की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना चाहता है। इससे कॉलेजों की जवाबदेही बढ़ सकती है।


