मेगा स्टोरी: हवा हवाई हाईवे  

एम. रियाज हाशमी
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे पर कुछ वाहन चालक यदि समय रहते ब्रेक नहीं लगाते तो गाड़ी सहित गढ़े में समा जाते। क्यों? महज 12 दिन पहले बनी यह सड़क धस गई। यह वही एक्सप्रेसवे है जिसे अमेरिकी सड़कों से बेहतर बताने का दावा सड़क और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने किया था। ‘तहलका’ ने करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली सात बड़ी सड़क परियोजनाओं से जुड़े मामलों की पड़ताल की। तकनीकी वजहें अलग-अलग हैं- कहीं कमजोर और अत्यधिक प्लास्टिक मिट्टी, कहीं अधूरी जल निकासी, कहीं निर्माण गुणवत्ता पर पहले से आपत्तियां, कहीं नई सड़क पर रटिंग और कहीं कठिन पहाड़ी इलाके में भूस्खलन।

लखनऊ–कानपुर एक्सप्रेसवे

उद्घाटन के 12 दिन बाद दरार, 13 दिन में बड़ा स्लिपेज

पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड इस 63 किलोमीटर, करीब “4,200 करोड़ की परियोजना की निर्माण कंपनी है। कंपनी पर जून 2024 में सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद सड़क
मंत्रालय ने कंपनी और उसकी दो एसपीवी को टेंडर से एक साल के लिए अयोग्य घोषित किया, जिसे फरवरी 2025 में घटाकर चार महीने कर दिया गया। पीएनसी से जुड़े राजनीतिक संदर्भ में नवीन जैन भी आते हैं- वह कंपनी के पूर्व होल-टाइम डायरेक्टर रहे, 2017 के आगरा मेयर और 2024 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बने। उनके भाई प्रदीप कुमार जैन कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।
13 जुलाई 2026 को राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और योगी आदित्यनाथ ने एक्सप्रेसवे राष्ट्र को समर्पित किया। ठीक 12 दिन बाद, 25 जुलाई को दरार और धंसाव की तस्वीरें सामने आईं। तकनीकी जांच के लिए आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञों को लगाया।
प्रारंभिक जांच में ऊपरी परत की मोटाई या सामग्री में ऐसी बड़ी कमी नहीं मिली जिसे सीधे ‘घटिया डामर’ कहा जा सके। इसके बजाय कमजोर और अत्यधिक प्लास्टिक मिट्टी तथा जल निकासी से जुड़े संकेत सामने आए। 5 अगस्त को एनएचएआई ने पीएनसी को नॉन-परफॉर्मर घोषित करने और भविष्य की परियोजनाओं में भागीदारी रोकने की प्रक्रिया शुरू की। प्रभावित हिस्से की मरम्मत कंपनी के खर्च पर कराने और संबंधित अधिकारियों व स्वतंत्र इंजीनियरिंग एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की बात भी सामने आई।
दिलचस्प यह है कि 16 जुलाई को, यानी बड़े स्लिपेज से 10 दिन पहले, पीएनसी ने यूपी की दो नई एचएएम परियोजनाओं के कंसेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों की कुल बिड प्रोजेक्ट कॉस्ट “3,483 करोड़ थी।

राम वनगमन पथ

शृंगवेरपुर वाला हिस्सा राम वन गमन पथ प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है, जिसकी एसपीवी संरचना एसएंडपी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और सनी इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी है। एसएंडपी को 2019 में एनएचआईडीसीएल ने दो साल के लिए डिबार किया था।
कंपनी ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी और 1 जुलाई 2019 को अदालत ने डिबारमेंट रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि संबंधित गलतियां ब्लैकलिस्टिंग का पर्याप्त आधार नहीं थीं। यह पुराना विवाद मौजूदा सड़क की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है, लेकिन कंपनी की पृष्ठभूमि का हिस्सा है।
अब शृंगवेरपुर पहुंचिए। करीब 210 किलोमीटर लंबे और लगभग “4,400 करोड़ की अनुमानित लागत वाले राम वनगमन पथ का यह हिस्सा अभी निर्माणाधीन है। सितंबर की बारिश के बाद प्रयागराज के शृंगवेरपुर धाम के पास नवनिर्मित सड़क में दरारें और धंसाव दिखा। शुरुआती रिपोर्टों में करीब 100 मीटर के दायरे में चार स्थानों पर नुकसान बताया गया; बाद की सरकारी प्रतिक्रिया में दो प्रभावित हिस्सों की लंबाई 300 मीटर और 150 मीटर तक बताई गई। अधिकारियों ने बारिश और मिट्टी के कटाव को तत्काल कारण बताया और ठेकेदार को नोटिस देकर मरम्मत शुरू कराई। यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि यदि बारिश से सड़क बैठी, तो पानी का रास्ता पहले से क्यों नहीं संभाला गया? और अगर मिट्टी कमजोर थी, तो निर्माणाधीन सड़क की गुणवत्ता जांच में यह जोखिम पहले क्यों नहीं पकड़ा गया?

दिल्ली–देहरादून
आर्थिक गलियारा

उद्घाटन के 79 दिन बाद सड़क में पहला धंसाव

किमी 27.000 से 56.500 वाले करीब 29.5 किलोमीटर पैकेज का ठेका कृष्णा कंस्ट्रक्शंस के पास है और इसकी बिड करीब “503 करोड़ थी। कंपनी से जुड़े एक आयकर मामले में दिसंबर 2024 के आयकर अपीलीय अधिकरण
के फैसले में 2016 की तलाशी के दौरान सामने आई करीब “52 करोड़ की देनदारियों का उल्लेख है, जिन्हें बाद में अघोषित आय के रूप में स्वीकार किया गया था। इस मामले का सड़क निर्माण में किसी अनियमितता से सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन यह कंपनी की पृष्ठभूमि का हिस्सा है।
14 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब 213 किलोमीटर लंबे, “12,000 करोड़ से ज्यादा लागत वाले दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे का उद्घाटन किया। 2 जुलाई की रात बारिश हुई और 79 दिन बाद शामली के गोगवान जलालपुर में नई सड़क का एक हिस्सा धंस गया।
एनएचएआई का स्पष्टीकरण यहां कहानी को और दिलचस्प बनाता है। प्राधिकरण के मुताबिक पानी जमा हुआ और स्थायी क्रॉस-ड्रेनेज व्यवस्था पूरी तरह चालू नहीं हो सकी थी। स्थानीय विरोध के कारण कलवर्ट जोड़ने में बाधा थी, जबकि स्लोप प्रोटेक्शन और च्यूट ड्रेन का काम जमीन संबंधी विवाद के कारण लंबित था। परियोजना को मूल समयसीमा से करीब 13 महीने अधिक भी लगे थे। मरम्मत के बाद करीब 1.5 किलोमीटर की अंतरिम ड्रेन बनाई गई और किमी 56+500 तक ढलान फिर से डिजाइन किया गया। घटना के बाद परियोजना निदेशक, प्राधिकरण इंजीनियर और निर्माण एजेंसी को नोटिस दिए गए। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सहारनपुर के बिहारीगढ़ में पुल की साइड वॉल में दरारें, बागपत में सड़क के नीचे खाली जगह और सहारनपुर के अन्य हिस्सों में मिट्टी के कटाव की घटनाएं भी सामने आईं। फिर भी एनएचएआई ने 23 स्थानों पर कोर-कटिंग और सड़क की परतों की जांच कराई।


गंगा एक्सप्रेसवे

 
उद्घाटन के 111 दिन बाद उसी इलाके में बार–बार नुकसान

उन्नाव का प्रभावित हिस्सा ग्रुप-ककक में आता है, जो अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड को मिला था। इस ग्रुप की लंबाई 155.7 किलोमीटर है और पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के रिकॉर्ड के मुताबिक उसके ईपीसी काम की कीमत करीब
“4,732.57 करोड़ है। निर्माण श्रृंखला में अदाणी रोड एंड ट्रांसपोर्ट लिमिटेड की भी भूमिका है। पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर ने वित्त वर्ष 2024-25 में भाजपा को “1-1 करोड़ के दो योगदान, यानी कुल “2 करोड़ दिए। यह किसी ठेके में पक्षपात या क्विड प्रो क्वो का प्रमाण नहीं है। कंपनी से जुड़े पुराने ठेका विवाद भी मौजूदा सड़क की गुणवत्ता से सीधे नहीं जुड़े हैं, लेकिन सार्वजनिक परियोजना की पृष्ठभूमि में दर्ज हैं।
अब सड़क पर आते हैं। 594 किलोमीटर लंबे और करीब “36,230 करोड़ लागत वाले गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 अप्रैल 2026 को हरदोई में किया। 18 अगस्त को, यानी 111 दिन बाद, उन्नाव के किमी 421-422 में सराय कटियान नहर पुल के पास बारिश का पानी सड़क किनारे की मिट्टी बहा ले गया और सड़क का हिस्सा बैठ गया।
लेकिन इस केस में एक घटना नहीं, दोहराता नुकसान ज्यादा अहम है। जुलाई की शुरुआत में एप्रोच रोड प्रभावित हुई। अगस्त में मुख्य कैरिजवे का तटबंध प्रभावित हुआ। फिर मरम्मत वाले हिस्से में दरार और किमी 423.6 के आसपास सर्विस कनेक्शन पर धंसाव की रिपोर्ट आई।
तकनीकी रिकॉर्ड यहां सबसे महत्वपूर्ण है। मूल दस्तावेजों में स्वतंत्र इंजीनियर की ओर से एम्बैंकमेंट की कंपैक्शन और ग्राउंड-इम्प्रूवमेंट से जुड़े एनसीआर दर्ज होने का दावा है। यदि इन आपत्तियों में तटबंध या जमीन मजबूत करने के काम की गुणवत्ता पर सवाल था, तो सुधार के बाद स्वतंत्र सत्यापन कैसे हुआ? और जुलाई की पहली क्षति के बाद जांच कितनी गहराई तक गई? बारिश तत्काल कारण हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि सड़क खोलने से पहले दर्ज गुणवत्ता जोखिम वास्तव में खत्म किए गए थे या सिर्फ कागज पर बंद हुए?



दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे

नई सड़क पर सात किलोमीटर में रटिंग, ठेका खत्म

सवाई माधोपुर का पैकेज-10 धाया माजू इंफ्रास्ट्रक्चर (एशिया) एसडीएन. बीएचडी-क्रेसेंट ईपीसी प्रोजेक्ट्स एंड टेक्निकल सर्विसेज लिमिटेड जेवी को मिला था। करीब 26.5 किलोमीटर के इस पैकेज की अनुबंध
लागत “905.32 करोड़ थी। जुलाई 2026 में जेवी और एनएचएआई के बीच पैकेज को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा भी सामने आया। यानी विवाद तकनीकी से आगे संविदात्मक स्तर तक पहुंच चुका है। फरवरी 2026 में यह हिस्सा यातायात के लिए खुला। कुछ ही समय बाद करीब 4 किलोमीटर और 3 किलोमीटर के हिस्सों में पेवमेंट डिस्टेस और रटिंग सामने आई- कुल करीब 7 किलोमीटर। अप्रैल में एनएचएआई ने ठेका समाप्त कर दिया, 21 अप्रैल से शेष काम रोक दिया और पुराने ठेकेदार के जोखिम व लागत पर सुधार कराने का फैसला किया। एनएचएआई ने स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ समिति बनाई और प्रभावित सड़क से नमूने लिए हैं। अंतिम कारण अभी जांच का विषय है।

संबलपुर–कटक एनएच-55

सड़क धंसी, फ्लाईओवर में दरार और 270 जगह मरम्मत

रायराखोल का फ्लाईओवर अग्रवाल इंफ्राबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड (एआईपीएल) को दिए गए करीब दो किलोमीटर लंबे छह लेन फ्लाईओवर प्रोजेक्ट से जुड़ा है। लागत करीब “106.32 करोड़ दर्ज है। दरार सामने आने के बाद
एनएचएआई ने ठेकेदार और परियोजना इंजीनियर को नोटिस देकर स्ट्रक्चरल आॅडिट का आदेश दिया।
अब इस कॉरिडोर पर घटनाक्रम देखिए। संबलपुर के रायराखोल के पास एलिफेंट कॉरिडोर के ऊपर बने फ्लाईओवर में जून 2026 में दरार की तस्वीरें सामने आईं। संरचना करीब छह महीने पहले यातायात के लिए खोली गई थी। इससे पहले प्रधानपाली चौक के पास सड़क का हिस्सा धंस चुका था।
अगस्त में संबलपुर-अंगुल हिस्से पर करीब 270 ऐसे कामों की पहचान की गई जिन्हें सुधार की ज़रूरत थी। फ्लाई ऐश के इस्तेमाल और उसके कंपैक्शन पर सवाल उठे। लंबे समय तक बारिश के बाद फ्लाई ऐश बहने से सड़क के नीचे खाली जगह बनने की आशंका भी जताई गई।
राज्यसभा में सड़क परिवहन मंत्रालय के जवाब के मुताबिक कटक-अंगुल पैकेज-1 की लागत “1,108.62 करोड़, पैकेज-2 की “1,109.80 करोड़ और अंगुल-संबलपुर खंड की “2,514.07 करोड़ थी- कुल करीब “4,732.49 करोड़।

मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे
मिसिंग लिंक

उद्घाटन के 66 दिन बाद पहाड़ खिसका

मुख्य सुरंगों वाले पैकेज का काम नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड के पास था और बाद की रॉकफॉल सुरक्षा व्यवस्था में भी उसकी भूमिका है। उपलब्ध चुनावी बॉन्ड रिकॉर्ड के मुताबिक कंपनी ने कुल “55 करोड़ के बॉन्ड खरीदे, जिनमें उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार पूरी राशि
भाजपा को गई- 2019 में “45 करोड़ और 2022 में “10 करोड़। यह चंदा किसी अनुचित लाभ या क्विड प्रो क्वो का प्रमाण नहीं है, लेकिन सार्वजनिक परियोजनाओं में ठेके, गुणवत्ता प्रमाणन और स्वतंत्र निगरानी की पारदर्शिता के संदर्भ में प्रासंगिक है। नवयुग सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग हादसे के बाद भी चर्चित रही थी; इन घटनाओं का मिसिंग लिंक की तकनीकी समस्या से भले प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं है, लेकिन ये कंपनी का इतिहास ज़रूर हैं।
एमएसआरडीसी ने कहा कि सुरंग को संरचनात्मक नुकसान नहीं हुआ और घटना भारी बारिश से हुआ प्राकृतिक भूस्खलन थी। लेकिन इसके बाद आईआईटी-बॉम्बे की समीक्षा के आधार पर पहाड़ी के ऊपर पानी के रास्ते बदलने, ढीली चट्टानें हटाने, स्टील बोल्ट और हाई-टेंसाइल स्टील मेश लगाने तथा बड़े पत्थरों को रोकने के लिए स्टील बैरियर लगाने का काम शुरू हुआ। करीब 1.38 हेक्टेयर क्षेत्र में रॉकफॉल प्रोटेक्शन किया जा रहा है और लक्ष्य अक्टूबर 2026 के अंत तक काम पूरा करने का है।

विदेश में सड़कें टिकती हैं और भारत में सिस्टम, स्वतंत्र निगरानी ही बड़ा सवाल
इन सात मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारत के पास सड़क निर्माण के नियम नहीं हैं। भारतीय सड़क कांग्रेस, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और एनएचएआई ने डिजाइन, सामग्री, कंपैक्शन, ड्रेनेज, पेवमेंट, गुणवत्ता नियंत्रण, स्वतंत्र इंजीनियरिंग निगरानी और डिफेक्ट लाइबिलिटी के विस्तृत मानक तय कर रखे हैं।
मौजूदा व्यवस्था में निर्माण कंपनी का अपना क्वालिटी कंट्रोल, अथॉरिटी/ इंडिपेंडेंट इंजीनियर की निगरानी और एनएचएआई की स्वीकृति शामिल है। डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड में ठेकेदार को दोष दूर करने की जिम्मेदारी भी होती है। लेकिन अगर सड़क खुलने के कुछ ही समय बाद तटबंध, ड्रेनेज, पेवमेंट या पहाड़ी सुरक्षा में समस्या आती है तो निर्माण से प्रमाणन तक की पूरी श्रृंखला की स्वतंत्र जांच कितनी बार होती है?
अमेरिका का फेडरल हाईवे एडमिनिस्ट्रेशन क्वालिटी एश्योरेंस मॉडल ठेकेदार के क्वालिटी कंट्रोल और सरकार की स्वीकृति के अलावा इंडिपेंडेंट एश्योरेंस पर जोर देता है। यानी केवल यह जांचना पर्याप्त नहीं कि ठेकेदार ने टेस्ट किया; टेस्टिंग और उसके डेटा की विश्वसनीयता भी स्वतंत्र रूप से परखी जाए। वहां एसेट मैनेजमेंट का ढांचा सड़क, पुल, सुरक्षा, रखरखाव और निवेश को पूरे जीवन-चक्र से जोड़ता है।
ब्रिटेन में रणनीतिक सड़क नेटवर्क के लिए सुरक्षा, रखरखाव और दीर्घकालीन प्रदर्शन केंद्रीय लक्ष्य हैं तथा नेशनल हाईवेज के प्रदर्शन की निगरानी में आॅफ़िस आॅफ रेल एंड रोड जैसी अलग संस्था है। फ्रांस और यूरोप में ड्रेनेज, अर्थवर्क और सड़क के नीचे की जमीन की मजबूती को डिजाइन में साथ देखा जाता है। रोड सेफ्टी आॅडिट डिजाइन से सड़क खुलने तक जोखिम पहचानने का माध्यम है।
चीन में हाईवे गुणवत्ता निरीक्षण में निर्माण, सुपरविजन, टेस्टिंग और सरकारी निगरानी की अलग भूमिकाएं हैं। दुबई में सड़क की हालत का नियमित तकनीकी आकलन और प्रिवेंटिव/ प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस होता है। कतर में सैंपलिंग, प्रयोगशाला, कैलिब्रेशन और टेस्ट डेटा की ट्रेसबिलिटी पर जोर है। सऊदी अरब का हाईवे कोड भी प्लानिंग से रखरखाव तक पूरे जीवन-चक्र को देखता है।

हाईवे के ठेकों में बार–बार वही कंपनियां, सवाल सिर्फ गुणवत्ता का नहीं
‘तहलका’ की पड़ताल में देश की 221 बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और उपलब्ध टेंडर-अवार्ड विवरण को साथ रखने पर एक दूसरा पहलू सामने आता है- बड़े हाईवे और एक्सप्रेसवे निर्माण का बाजार चुनिंदा कंपनियों के हाथों में सिमटता दिखाई देता है।
महाराष्ट्र की पुणे रिंग रोड, जालना-नांदेड एक्सप्रेसवे और विरार-अलिबाग मल्टी-मॉडल कॉरिडोर में 2023-24 के आवेदन रिकॉर्ड में मेघा इंजीनियरिंग, नवयुगा, पीएनसी इंफ्राटेक, जीआर इंफ्राप्रोजेक्ट्स, अफकॉन्स, पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर, एलएंडटी, जे कुमार, एनसीसी, एपीसीओ, मोंटेकार्लो, एचजी इंफ्रा और वेल्सपन जैसे नाम बार-बार दिखाई दिए। तीन परियोजनाओं में कुल 28 कंपनियों ने आवेदन किया और 18 तकनीकी रूप से योग्य पाई गईं।
पुणे रिंग रोड की शुरुआती नौ पैकेजों में करीब “16,618 करोड़ के अनुमान के मुकाबले एल-1 बोलियां करीब “22,800 करोड़ रहीं, यानी लगभग 37 फीसदी ऊपर। मेघा इंजीनियरिंग और नवयुगा ने तीन-तीन पैकेजों में एल-1 हासिल किया; बाद में दो पैकेज अफकॉन्स को मिले, जिनकी संयुक्त एल-1 बोली करीब “4,787 करोड़ थी।
जालना-नांदेड के छह पैकेजों में एपीसीओ ने दो, मोंटेकार्लो ने दो और पीएनसी तथा रोडवे सॉल्यूशंस ने एक-एक पैकेज में एल-1 हासिल किया। करीब “11,442 करोड़ के अनुमान के मुकाबले इनकी एल-1 बोलियां करीब “15,465 करोड़ थीं। नागपुर-गोंदिया में अफकॉन्स, पटेल और एनसीसी तथा नागपुर-चंद्रपुर में जीआर इंफ्रा, गावर, एचजी इंफ्रा और बीएससीपीएल जैसे नाम फिर सामने आए। भंडारा-गढ़चिरौली के एक बड़े पैकेज में पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर एल-1 रहा।
इन पांच महाराष्ट्र परियोजनाओं के उपलब्ध पैकेज करीब “47,000 करोड़ के अनुमान से बढ़कर “63,500 करोड़ से अधिक की एल-1 बोलियों तक पहुंचे। स्वतंत्र वित्तीय शोध में भी करीब “63,600 करोड़ के पुरस्कार का आंकड़ा सामने आया। विरार-अलिबाग के बाद में रद्द किए गए पैकेज इसमें शामिल नहीं हैं।
विरार-अलिबाग में करीब “26,300 करोड़ के 11 शुरुआती निर्माण अनुबंध सात कंपनियों को दिए गए थे, लेकिन ऊंची बोलियों और वित्तीय व्यवहार्यता से जुड़े सवालों के बाद उन्हें रद्द करने और परियोजना को अलग मॉडल पर आगे बढ़ाने पर विचार हुआ। इससे डीपीआर की अनुमानित लागत, बाजार की बोली और अंतिम सरकारी वित्तीय प्रतिबद्धता के बीच अंतर का सवाल उठता है।
एक ही कंपनी का कई परियोजनाओं में सफल होना अपने आप में गलत या मिलीभगत का प्रमाण नहीं है। बड़ी सड़क परियोजनाओं के लिए तकनीकी क्षमता, वित्तीय हैसियत, मशीनरी और अनुभव रखने वाली कंपनियां सीमित हैं। असली सवाल यह है कि प्रतिस्पर्धा कितनी व्यापक है और लगातार बड़े पैकेज पाने वाली कंपनी के पिछले प्रदर्शन का अगली बोली में कितना वजन है?
राजनीतिक चंदों का रिकॉर्ड भी संदर्भ देता है। मेघा इंजीनियरिंग से जुड़े चुनावी बॉन्ड का आंकड़ा करीब “966 करोड़ है, जिसमें करीब “584 करोड़ भाजपा को गए। नवयुगा से जुड़े बॉन्ड करीब “55 करोड़ के थे और उपलब्ध रिकॉर्ड में पूरी राशि भाजपा को गई। जीआर इंफ्राप्रोजेक्ट्स से जुड़ा करीब “5 करोड़ का भाजपा चंदा भी दर्ज है। इन चंदों को किसी ठेके के बदले भुगतान या राजनीतिक संरक्षण का प्रमाण कहना तथ्य से आगे जाना होगा। महत्व इस बात का है कि जब वही कॉरपोरेट समूह लगातार हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक प्रोजेक्टों में दिखाई देते हैं तो ठेकों और राजनीतिक चंदों की टाइमलाइन सार्वजनिक जांच का विषय क्यों न बने?
मेघा इंजीनियरिंग के मामले में कंपनी से जुड़े चुनावी बॉन्ड और कुछ बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्टों के बीच कम समय का अंतर ध्यान खींचता है। कंपनी के खिलाफ 2024 में सीबीआई की एफआईआर भी दर्ज हुई थी। इसी तरह पीएनसी की सीबीआई कार्रवाई और अस्थायी डीबारमेंट उसके रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।
221 परियोजनाओं से बड़ा सवाल यह है कि क्या हाईवे निर्माण तंत्र कुछ स्थापित कंपनियों की विशेषज्ञता पर इतना निर्भर हो गया है कि ठेका मिलने के बाद उनकी परियोजना-दर-परियोजना जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है? अगर एक कंपनी कई हजार करोड़ की परियोजनाएं संभाल रही है तो उसकी पिछली गुणवत्ता, डिफेक्ट्स, पेनल्टी, स्वतंत्र इंजीनियर की आपत्तियां और मेंटेनेंस प्रदर्शन अगली बोली में कितना वजन रखते हैं?

कंपनियों और एनएचएआई से पूछे सवाल, जवाब का इंतजार
‘तहलका’ ने इस पड़ताल में जिन निजी कंपनियों, ठेकेदारों, कंसेशनायरों और निर्माण एजेंसियों की भूमिका सामने आई, उनका पक्ष जानने के लिए विस्तृत सवाल ईमेल से भेजे। सवाल निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी जांच, स्वतंत्र इंजीनियर, दर्ज आपत्तियों, मरम्मत और अनुबंधीय जिम्मेदारी से जुड़े थे।
पीएनसी इंफ्राटेक से लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की दरार, करीब 300 मीटर स्लिपेज, कमजोर मिट्टी और ड्रेनेज के प्रारंभिक निष्कर्षों तथा सड़क खोलने से पहले हुए गुणवत्ता परीक्षणों पर जवाब माँगा गया। एसएंडपी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स से श्रृंगवेरपुर में धंसाव, बारिश, मिट्टी के कटाव, निर्माण और ड्रेनेज की गुणवत्ता तथा मरम्मत पर सवाल किए गए।
कृष्णा कंस्ट्रक्शंस से दिल्ली-देहरादून गलियारे में अधूरी स्थायी ड्रेनेज, कलवर्ट, स्लोप प्रोटेक्शन और बाद के सुधार कार्यों पर जवाब माँगा गया। अदाणी रोड एंड ट्रांसपोर्ट लिमिटेड, अदाणी एंटरप्राइजेज और पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर से गंगा एक्सप्रेसवे के उन्नाव हिस्से में बार-बार हुई क्षति तथा एम्बैंकमेंट और ग्राउंड-इम्प्रूवमेंट से जुड़ी आपत्तियों के निपटारे पर सवाल पूछे गए।
धाया माजू-क्रेसेंट ईपीसी जेवी से दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे की करीब सात किलोमीटर रटिंग, गुणवत्ता परीक्षण, ठेका समाप्त किए जाने और विशेषज्ञ समिति की जांच पर प्रतिक्रिया माँगी गई।
अग्रवाल इंफ्राबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड से रायराखोल फ्लाईओवर की दरार, निर्माण और गुणवत्ता परीक्षण तथा एनएचएआई के नोटिस पर जवाब माँगा गया। परियोजना इंजीनियर एल.एन. मालवीय से निगरानी भूमिका पर प्रतिक्रिया माँगी गई।
नवयुग इंजीनियरिंग से मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे मिसिंग लिंक के टनल-2 के पास भूस्खलन, मूल भू-तकनीकी और रॉकफॉल सुरक्षा आकलन तथा आईआईटी-बॉम्बे की समीक्षा के बाद किए जा रहे अतिरिक्त सुरक्षा कार्यों पर सवाल पूछे गए।
एनएचएआई से भी सातों परियोजनाओं में सामने आई तकनीकी खामियों, गुणवत्ता परीक्षणों, स्वतंत्र निगरानी, ठेकेदारों की जवाबदेही और की गई कार्रवाई पर संक्षिप्त एवं स्पष्ट सवाल भेजकर उसका पक्ष माँगा गया।
स्टोरी लिखे जाने तक एनएचएआई सहित किसी भी संबंधित कंपनी या एजेंसी की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई थी। जवाब मिलने पर ‘तहलका’ उसे पूरे संदर्भ और संबंधित सवालों के साथ प्रकाशित करेगा। उद्देश्य किसी कंपनी या एजेंसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सार्वजनिक परियोजनाओं में निर्माण, गुणवत्ता परीक्षण, स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही की पूरी श्रृंखला को सामने रखना है।

इंफ्रास्ट्रक्चर में दिखावे से ज्यादा टिकाऊपन और गुणवत्ता ज़रूरी

राघव चंद्रा
पूर्व चेयरमैन, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई)

देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार हुआ है, लेकिन परियोजनाओं को जल्द पूरा करने की कोशिश में गुणवत्ता और टिकाऊपन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लखनऊ-कानपुर, गंगा, दिल्ली-देहरादून और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे समेत कई परियोजनाओं
में सड़क धंसने, दरार, सतह खिसकने और अन्य समस्याओं की घटनाएं सामने आई हैं। इनसे होने वाला आर्थिक नुकसान महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे जनता और सरकार के बीच भरोसे को होने वाली क्षति कहीं बड़ी है।
ऐसी घटनाओं के पीछे भू-तकनीकी जांच की कमी, ग्राउंड-इम्प्रूवमेंट उपायों की अनदेखी, अपर्याप्त ड्रेनेज और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त तकनीक जैसे कारण हो सकते हैं। डिजाइनरों, निर्माण कंपनियों, स्वतंत्र इंजीनियरों और एनएचएआई के फील्ड अधिकारियों के बीच कमजोर सुपरवाइजरी व्यवस्था भी एक बड़ा कारण है। कुछ गलत होने पर जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।
विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और ग्राउंड असेसमेंट को हर परियोजना की रीढ़ बनाया जाना चाहिए। लेकिन कई बार पुरानी परियोजनाओं की रिपोर्ट को आधार बनाकर मामूली बदलाव के साथ नई डीपीआर तैयार कर दी जाती है। स्वतंत्र इंजीनियरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें परियोजना रोकने, गंभीर जोखिम सामने रखने और डिजाइन में ज़रूरी बदलाव कराने के पर्याप्त अधिकार और क्षमता मिलनी चाहिए।
सरकारी टेंडर में सबसे कम बोली लगाने वाले को काम देने की व्यवस्था भी गुणवत्ता पर असर डाल सकती है। बहुत कम बोली लगाने वाला ठेकेदार लागत निकालने के दबाव में सामग्री, जमीन की जांच या निर्माण गुणवत्ता में कटौती कर सकता है। इसलिए डिजाइन, निर्माण और निगरानी की जिम्मेदारियां स्पष्ट और अलग होनी चाहिए।




ग्राउंड रिपोर्ट

गड्ढों से पटी पठानकोट–मंडी हाईवे

चरनजीत आहूजा/ मनिंदर सिंह
पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग-154 पर सफर करने वाले यात्रियों के लिए कई हिस्सों से गुजरना अब धैर्य और सावधानी की परीक्षा बन गया है। बारिश के पानी से भरे गड्ढों, टूटे डामर, कीचड़ और सड़क के क्षतिग्रस्त किनारों ने हाईवे के कई हिस्सों को दुर्घटना संभावित क्षेत्र में बदल
दिया है। मानसून के दौरान और खासकर सूर्यास्त के बाद स्थिति और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
जोगिंदरनगर कस्बे में लक्ष्मी बाजार, पठानकोट चौक और साई बाजार के आसपास हाईवे की हालत विशेष रूप से खराब है। कई जगहों पर सड़क की ऊपरी परत उखड़ चुकी है और वहां गहरे गड्ढे बन गए हैं। वाहन चालकों, खासकर दोपहिया वाहन सवारों को इन गड्ढों से बेहद सावधानी के साथ निकलना पड़ता है।
डाकघर के पास स्थानीय कारोबारियों के मुताबिक करीब एक फुट गहरा गड्ढा गंभीर खतरा बन चुका है। कारोबारी ज्ञान चंद, रमेश, अजय और विनोद कुमार के मुताबिक कई दोपहिया वाहन चालक इस गड्ढे में वाहन जाने के बाद नियंत्रण खो चुके हैं, जिसके चलते दुर्घटनाएं हुई हैं।


पठानकोट चौक पर भी ऐसी ही स्थिति है, जहां गहरे गड्ढे वाहनों के लिए खतरा बने हुए हैं। पुलिस स्टेशन के पास सड़क का एक हिस्सा तारकोल वाली सतह से अलग हो गया है, जिससे न केवल वाहन चालकों बल्कि पैदल चलने वालों को भी आवाज़ाही में परेशानी हो रही है।
नूरपुर में हाईवे के चोगान-खुशीनगर हिस्से पर भी ऐसी ही स्थिति है। लगातार हो रही मानसूनी बारिश ने सड़क की हालत और खराब कर दी है और कई क्षतिग्रस्त हिस्से कीचड़ और पानी से भरे इलाकों में बदल गए हैं। हाईवे के किनारे रहने वाले यात्रियों और दुकानदारों का कहना है कि दोपहिया वाहन सवार सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। कुछ लोगों के मुताबिक अंधेरे में पानी से भरे गड्ढों का अंदाजा न लगा पाने के कारण दोपहिया वाहन चालक दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं।
सड़क की खराब होती स्थिति को लेकर हाल ही में स्थानीय गैर-सरकारी संगठन नूरपुर सुधार सभा की अगुवाई में दुकानदारों ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के लिए काम कर रही निर्माण कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया। यह कंपनी कंडवाल से भेरखुड़ के बीच पठानकोट-मंडी फोर-लेन परियोजना के पहले चरण का निर्माण कर रही है।
तत्काल राहत नहीं मिलने के कारण कुछ दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठानों के बाहर बने गड्ढों को खुद भरना शुरू कर दिया है।
दुकानदारों का दावा है कि मुंबई स्थित आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स, जो हाईवे परियोजना का निर्माण कर रही है, ने काम के एक हिस्से को दूसरी सड़क निर्माण एजेंसी को सबलेट कर दिया है। उनका आरोप है कि बाईपास निर्माण के दौरान स्थानीय लोगों और यात्रियों को हो रही समस्याओं का समाधान करने में एजेंसी नाकाम रही है।
चोगान बाजार में एक और समस्या ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। दुकानदारों का कहना है कि नियाजपुर की तरफ से बाजार के प्रवेश द्वार पर मौजूद पुराना पानी का नाला, या नाला, बाईपास के लिए पहाड़ी कटाई के दौरान निकले मलबे और गाद से जाम हो गया है। इसके चलते बारिश का पानी और कीचड़ हाईवे पर बहकर आ रहा है, जिससे गड्ढे बन रहे हैं और उनका आकार बढ़ रहा है।
नूरपुर कस्बे को फोर-लेन की नई लाइन से बाहर रखने के लिए एनएचएआई बोध से खुशीनगर तक बाईपास का निर्माण कर रहा है। हालांकि बोध और खुशीनगर के बीच उपनगरीय इलाकों से गुजरने वाला मौजूदा हाईवे अभी भी खराब स्थिति में है और तत्काल मरम्मत तथा रखरखाव की ज़रूरत है।
पुराने हाईवे की खराब हालत सिर्फ नूरपुर और जोगिंदरनगर तक सीमित नहीं है। एनएचएआई ने 208 किलोमीटर लंबे पठानकोट-मंडी हाईवे के करीब आधे हिस्से की एलाइनमेंट बदल दी है। इसके बावजूद हर दिन हजारों वाहन मौजूदा सड़क का इस्तेमाल करते हैं।
एनएचएआई ने करीब 60 किलोमीटर लंबे परोर-पधर हिस्से के लिए नई एलाइनमेंट की योजना बनाई थी। इसी तरह राजोल और नगरोटा बगवां के बीच करीब 30 किलोमीटर की एलाइनमेंट भी बदली गई है। इसके परिणामस्वरूप मौजूदा हाईवे के करीब 100 किलोमीटर हिस्से का प्रस्तावित फोर-लेन एलाइनमेंट का हिस्सा न बनने की संभावना है।
हालांकि पुरानी सड़क पर अब भी भारी यातायात है। यात्रियों का कहना है कि मानसून के दौरान इसकी खराब हालत विशेष रूप से चिंता का विषय बन जाती है। इस दौरान गड्ढे पानी में डूब जाते हैं और सड़क के क्षतिग्रस्त किनारे और ज्यादा टूटने लगते हैं।
पुलों की स्थिति भी एक और चिंता का विषय है। पुराने हाईवे पर 20 से अधिक छोटे और बड़े पुलों को ध्यान देने की ज़रूरत है। इनमें से कई पुल ब्रिटिश काल के हैं। उनके स्थान पर नए पुल बनाने या बड़े स्तर पर मरम्मत का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है।
लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार ने अधिसूचना के जरिए हाईवे को एनएचएआई को हस्तांतरित कर दिया था और मौजूदा तथा नए दोनों हाईवे के रखरखाव की जिम्मेदारी एनएचएआई की है।
सड़क चौड़ीकरण और भूस्खलन का खतरा
मानसून के दौरान पहाड़ी सड़कों पर भूस्खलन के व्यापक खतरे को देखते हुए हाईवे की स्थिति को भी समझने की ज़रूरत है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग की ओर से किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के दौरान अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ काटने से मिट्टी ढीली हो सकती है और ढलानों के ऊपरी हिस्से अस्थिर हो सकते हैं। मानसून के दौरान पानी के भीतर तक पहुंचने से ऐसी ढलानें और कमजोर हो सकती हैं, जिससे भूस्खलन और चट्टानों के गिरने की संभावना बढ़ जाती है।
जोगिंदरनगर, सरकाघाट और धर्मपुर के निवासियों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग सरकाघाट-जोगिंदरनगर सड़क भी भूस्खलन और बारिश के प्रभाव से प्रभावित हुई है। अध्ययन में कहा गया है कि चौड़ीकरण के काम ने धर्मपुर-जोगिंदरनगर हिस्से की स्थिति को और खराब किया है और सड़क का 12 किलोमीटर हिस्सा भूस्खलन की चपेट में आने के लिहाज से संवेदनशील हो गया है।
बसाही, छक्का, चिरह, चिमनू और नेरी समेत कई गांवों को सड़क के किनारे संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया गया। इन स्थानों पर पहाड़ी कटाई के बाद बड़े पत्थरों और चट्टानों के टुकड़ों के ढलान से नीचे खिसकने की सूचना मिली है।
छक्का गाँव के पास सड़क चौड़ीकरण के दौरान ढलान कमजोर होने के बाद घास का मैदान धंस गया था। मानसून के दौरान प्रभावित क्षेत्र में पानी भी घुस गया।
इसी तरह चिरह, बसाही और चिमनू गांवों के पास ढलान के नीचे से कटाई किए जाने के बाद बड़ी मात्रा में मिट्टी नीचे आ गई। इससे सड़क और वनस्पति को नुकसान पहुंचा।
अध्ययन में शिमला-करसोग हाईवे से भालोग गाँव के पास जुड़ने वाली लिंक सड़क और गोहर ब्लॉक में बरजोहड़ू के पास शाला लिंक सड़क पर भी भूस्खलन दर्ज किया गया। बाद वाले मामले में रिटेनिंग वॉल की अनुपस्थिति को एक कारण के रूप में चिन्हित किया गया। मानसून के दौरान भूस्खलन से करीब 50 मीटर सड़क को नुकसान पहुंचा।
भारी बारिश के दौरान या उसके तुरंत बाद ढलान से नीचे खिसकने वाले असंगठित मलबे को चुनतरा ब्लॉक के बही और कुफरू-मोचक्का गांवों, धर्मपुर ब्लॉक के कोटला गाँव और द्रंग ब्लॉक के हराबाग गाँव के पास भी देखा गया।

एनएचएआई ने मरम्मत का भरोसा दिया
एनएचएआई अधिकारियों का कहना है कि जोगिंदरनगर में मरम्मत को मंजूरी दे दी गई है और मौसम में सुधार होते ही काम शुरू किया जाएगा। एनएचएआई के साइट इंजीनियर अंकित ने कहा, ‘जोगिंदरनगर कस्बे में हाईवे के क्षतिग्रस्त हिस्से की जल्द मरम्मत की जाएगी। खराब मौसम के कारण काम शुरू नहीं हो सका। जैसे ही मौसम अनुकूल होगा, तारकोल बिछाने का काम तुरंत शुरू कर दिया जाएगा।’