आगरा। परिंदों की कोई सरहद नहीं होती तभी तो कहते हैं कि पंक्षी नदियां पवन के झोंके कोई सरहद न इन्हें रोके…मगर इस गाने के विपरीत कुछ ऐसे लोगों ने ऐसा काम किया है कि परिंदों ने भी सरहदों को बांट लिया है। ये बातें शायद आपको झूठ लग रही होंगी लेकिन ये सौ आना सच है…
कभी सर्दियों में भरतपुर के साथ साथ आगरा के वेटलैंड्स को अपनी मौजूदगी से खास बनाने वाले साइबेरियन क्रेन आगरा—भरतपुर के आसमान से गायब हो चुका है। ये पक्षी आर्कटिक और साइबेरिया से करीब 5,000 किलोमीटर दूरी का लंबा का सफर तय करके सर्दियों में भरतपुर केवलादेवी उद्यान और आगरा—मथुरा की जोधपुर कीठम झील आते थे। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने में इन दुर्लभ मेहमानों की अहम भूमिका रही है।
कभी भरतपुर के केवलादेव और जोधपुर—झाल में सर्दियों का मेहमान बनकर आने वाला सफेद पंखों वाला साइबेरियन क्रेन अब भारत से रूठ गया है। विशेषज्ञ कहते हैं – रास्ते में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में शिकार, रूस-चीन में बदलता मौसम और आगरा-भरतपुर में सूखते जलाशयों ने उसका रास्ता ही रोक दिया। अब ये मेहमान अब चीन और ईरान के वेटलैंड तक ही सिमट कर रह गया है। कभी जो झुंड में आता था, भारत में उसका अस्तित्व ही खतरे में है।
साल 2002 के बाद कभी नहीं आया साइबेरियन क्रेन
सन 1974 में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर में यह पक्षी 75 की संख्या मे रिकार्ड किए गए थे। इस पक्षी की अंतिम उपस्थिति वर्ष 2001-02 की सर्दियों में भरतपुर में ही दर्ज दर्ज हुई थी। इसके बाद भारत में इस प्रजाति का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं मिला है।
आगरा-भरतपुर था प्रवास का महत्वपूर्ण क्षेत्र
भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान कभी साइबेरियन क्रेन का प्रमुख शीतकालीन आवास था। भारत में साइबेरियन क्रेन का वितरण केवल भरतपुर तक सीमित नहीं था। सीएमएस के दस्तावेज में उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा और मैनपुरी क्षेत्र को भी ऐतिहासिक शीतकालीन स्थल के रूप में दर्ज किया गया है।
मुगलकालीन दस्तावेजों में आगरा मे साइबेरियन क्रेन की उपस्थिति दर्ज
आगरा क्षेत्र में साइबेरियन क्रेन से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों का एक महत्वपूर्ण पक्ष मुगलकालीन प्राकृतिक इतिहास भी है। जहांगीर के दरबारी चित्रकार उस्ताद मंसूर ने 17वीं सदी की शुरुआत में आगरा व भरतपुर क्षेत्र में इस पक्षी को देखकर इसका एक जीवंत चित्र बनाया था। यह पेंटिंग आज भी बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और वैश्विक वन्यजीव इतिहासकारों द्वारा साइबेरियन क्रेन का भारत में पहला आधिकारिक रिकॉर्ड मानी जाती है। साइबेरियन क्रेन की यह ऐतिहासिक पेंटिंग वर्तमान में कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में सुरक्षित है। इसे संग्रहालय के कला खंड में कैटलॉग नंबर R32 के तहत सहेजकर रखा गया है।
साइबेरिया से भारत तक पांच हजार किलोमीटर का सफर
भारत आने वाली साइबेरियन क्रेन की ऐतिहासिक आबादी पश्चिमी साइबेरिया में प्रजनन करती थी। प्रवास के दौरान पक्षी मध्य एशिया से होते हुए अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर बढ़ते थे और अंततः राजस्थान के भरतपुर तक पहुंचते थे। अंतरराष्ट्रीय क्रेन फाउंडेशन के अनुसार यह मार्ग पश्चिमी साइबेरिया से कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत तक जुड़ा था।
सिंधु नदी घाटी प्रवास मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा थी
पाकिस्तान में सिंधु नदी घाटी इस प्रवास मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। सीएमएस के दस्तावेजों में तौंसा बैराज और थनेदार वाला गेम रिजर्व सहित कई आर्द्रभूमियों को साइबेरियन क्रेन के ऐतिहासिक प्रवास स्थलों के रूप में दर्ज किया गया है। सिंधु नदी तथा झोब, लूनी, कशू और कुर्रम जैसी नदियों के आसपास भी इनके देखे जाने के रिकॉर्ड मिलते हैं।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान में शिकार बना बड़ा संकट
प्रवासी पक्षियों पर अध्ययन करने वाले ईकोलॉजिस्ट डाॅक्टर केपी सिंह बताते हैं कि साइबेरिया से उड़ान भरने के बाद ये पक्षी कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अफगानिस्तान और फिर पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र और नदियों से होते हुए राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भरतपुर पहुंचते थे। इस लंबे सफर में सबसे गंभीर समस्याओं में से एक शिकार था। अंतरराष्ट्रीय क्रेन फाउंडेशन के अनुसार अफगानिस्तान और पाकिस्तान में ऐतिहासिक सेंट्रल फ्लाईवे के दौरान क्रेन के शिकार और पकड़ने की परंपरा ने इस आबादी पर गंभीर संकट डाला। अफगानिस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों जैसे झोब नदी के आसपास में इन बड़े सफेद सारसों का बड़े पैमाने पर शिकार किया जाता था। स्थानीय शिकारी पारंपरिक रूप से क्रेन पकड़ने या उनका शिकार करने के लिए कैंप लगाते थे।
सेंट्रल फ्लाईवे से विलुप्त हो गया साइबेरियन क्रेन
भारत आने वाली साइबेरियन क्रेन की ऐतिहासिक आबादी को अब लगभग विलुप्त माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय क्रेन फाउंडेशन के अनुसार 2002 के बाद भारत में इनका रिकॉर्ड नहीं मिला और इस आबादी के बहुत कम पक्षी ही शेष हैं। वर्तमान में इनकी मुख्य जीवित आबादी पूर्वी एशियाई फ्लाईवे से जुड़ी है। यह आबादी उत्तर-पूर्वी साइबेरिया में प्रजनन करती है और मुख्य रूप से चीन की पोयांग झील तथा यांग्त्से नदी बेसिन के आसपास शीतकाल बिताती है। अंतरराष्ट्रीय क्रेन फाउंडेशन वर्तमान वैश्विक आबादी को 5,500 से अधिक बताता है।
वतन वापसी नहीं कर पाए मुसाफिर परिंदे
गर्मी में भी आगरा क्षेत्र में डेरा डाले रहे ये परिंदे
पेट भरने और ब्रीडिंग के लिए हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करके मुसाफिर परिंदे आगरा की सरजमी पर कदम रखते हैं। ये आगरा में सर्दी के मौसम तक रुकते हैं, जैसे ही यहां तापमान बढ़ता और उनके वतन में टेंपरेचर में सामान्य होता है तो ये परिंदे फिर से उड़ान भरकर अपने वतन चले जाते हैं, मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि ये आसमान के मुसाफिर सितंबर तक आगरा के सूर सरोवर कीठम झील, आगरा-मथुरा की सीमा पर स्थित जोधपुर झाल वेटलैंड में डेरा डाले हुए हैं। ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में बायोडायबर्टसिटी एक्सपर्ट अलग-अगल वजह मानकर चल रहे हैं।
साइबेरिया, मध्य एशिया व यूरोप में जम जाती हैं झील तो करते हैं भारत का रुख
साइबेरिया, मध्य एशिया व यूरोप में कड़ाके की ठंड व बर्फबारी के कारण पक्षियों के भोजन स्थल वाले जलाशय जम जाते हैं, जिससे भोजन मिलना कठिन हो जाता है। इन देशों का पारा माइनस 20-30 डिग्री तक गिर जाता है और वहां की झीलें जलाशय बर्फ की मोटी चादर ये ढक जाते हैं तो वहां के पक्षियों के सामने खाद्यान का संकट खड़ा हो जाता है। कहा जाए तो उनके सामने जिंदगी और मौत का सवाल खड़ा हो जाता है। ऐसे में भारत के जलाशय और झील ही उनके लिए आखिरी उम्मीद बनते हैं। नतीजतन ये लाखों पक्षी हजारों किलोमीटर लंबी दूरी तय करके भारत सहित भारतीय उपमहाद्वीप का रुख करते हैं।
भारत की विविधतापूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों वाले वेटलैंड्स जैसे केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, चिल्का झील, आगरा-मथुरा सीमा की जोधपुर झाल, कीठम झील, एटा में जलेसर स्थित पटना पक्षी बिहार, मैनपुरी समान पक्षी बिहार सहित अन्य वेटलैंड पर इन्हें पर्याप्त भोजन उपलब्ध रहता है। पक्षियों को खाने के लिए छोटी मछली, कीट मिल जाते हैं, जिनसे वे अपना पेट भर लेते हैं। सर्दियों का मौसम समाप्त होते ही यानी मार्च में साइबेरिया, मध्य एशिया व यूरोप में बर्फ पिघलते ही अपने मूल निवास स्थानों पर वापस लौट जाते हैं। एक्सपर्ट कहते हैं इनका माइग्रेशन प्रजनन के लिए नहीं सिर्फ सर्वाइल के लिए होता है।
भारत में भोजन और विश्राम स्थल बनती हैं आने का कारण
आगरा-मथुरा की सीमा पर स्थित जोधपुर झाल वेटलैंड पर वर्ष 2026 में मई-जून के दौरान कुछ ऐसी प्रजातियां दर्ज की गईं, जिन्हें सामान्यतः शीतकालीन प्रवासी के रूप में देखा जाता है। जोधपुर झाल वेटलैंड इस क्षेत्र की प्रमुख आर्द्रभूमियों में शामिल है। इसके अलावा सूर सरोवर, यमुना नदी क्षेत्र, आसपास के तालाब, जलाशय और मानसून के बाद अस्तित्व में आने वाली छोटी एवं मध्यम आर्द्रभूमियां भी प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण भोजन और विश्राम स्थल हैं। आगरा की भौगोलिक स्थिति मथुरा और भरतपुर की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों से जुड़ी होने के कारण यह पूरा क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक परिदृश्य बनाता है।
आगरा में सर्दियों के प्रवास पर आती हैं कई प्रजातियां
हर वर्ष सर्दियों के मौसम में उत्तर और मध्य एशिया के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी भारतीय आर्द्रभूमियों की ओर आते हैं। आगरा व आसपास के वेटलैंड्स में देखे जाने वाले प्रमुख प्रवासी पक्षियों में ग्रेट-व्हाइट पेलिकन, डालमेशन पेलिकन, ग्रेटर फ्लेमिंगो, रूडी शेल्डक, कामन शेल्डक, बार-हेडेड गूज, ग्रे-लैग गूज, काॅमन पोचार्ड, फेरुगिनस डक, पाइड एवोसेट, नॉर्दर्न पिनटेल, नॉर्दर्न शोवलर, गैडवाल, गार्गेनी, कॉमन टील, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड, ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, रफ, ग्रीन सैंडपाइपर, कॉमन रेडशैंक और स्पॉटेड रेडशैंक जलीय पक्षी शामिल हैं।
अल नीनो ने बदला आगरा सहित उत्तर भारत का मौसम
इस वर्ष प्रशांत महासागर में सक्रिय हुए ‘सुपर अल नीनो’ का मार्च से सितंबर के दौरान उत्तर भारत के पर्यावरण, तापमान और जल संसाधनों पर अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (IRI) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च से जून के बीच उत्तर भारत विशेषकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में औसत तापमान सामान्य से 1.4°C अधिक दर्ज किया गया साथ ही कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और क्लाउड कवर मे कमी के कारण मैदानी इलाकों में लंबे समय तक लू का प्रकोप रहा। इस साल जून के शुरुआती पखवाड़े में जहां 38% कम बारिश हुई थी, वहीं 19 सितंबर 2026 तक भारत में कुल मानसूनी बारिश में करीब 15% की कमी दर्ज की गई है। उत्तर-पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में यह कमी इससे भी अधिक थी
अक्तूबर में भी दिखाई दिए सर्दियों के प्रवासी
बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसाइटी के क्षेत्रीय अवलोकनों में वर्ष 2026 के दौरान आगरा, मथुरा और भरतपुर क्षेत्र की कुछ आर्द्रभूमियों में अक्तूबर तक कई प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई। जबकि ये पक्षी मार्च के अंत तक आगरा क्षेत्र को छोड़कर अपने वतन वापस हो जाते हैं। इन पक्षियों में नॉर्दर्न पिनटेल, नॉर्दर्न शोवलर, गैडवाल, गार्गेनी, ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, रेड-क्रेस्टेड पोचार्ड, रफ, स्पॉटेड रेडशैंक, कॉमन रेडशैंक और ग्रीन सैंडपाइपर जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
सामान्यतः ये प्रजातियां सर्दियों में भारतीय आर्द्रभूमियों का उपयोग करती हैं और मौसम गर्म होने के साथ यानी मार्च के अंत तक अपने उत्तरी प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौट जाती हैं। ऐसे में मई और जून जैसे गर्म महीनों में इनकी उपस्थिति सामान्य मौसमी व्यवहार की तुलना में उल्लेखनीय है। अभी भी ये पक्षी डेरा जमाए हैं और नए प्रवासी पक्षियों की आमद शुरू हो गई है। कुल मिलाकर कहा जाए तो पुरानों में से बहुत से गए नहीं और नए आए मेहमान आना शुरू हो गए हैं। हालांकि बीआरडीएस संस्था के ईकोलॉजिस्ट डा के. पी. सिंह के अनुसार किसी एक वर्ष में किसी प्रवासी पक्षी के सामान्य समय से अधिक रुकने को सीधे जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके पीछे स्थानीय जलस्तर, भोजन की उपलब्धता, प्रवास मार्ग में मौसम की स्थिति और पक्षी की शारीरिक अवस्था जैसे कई कारण हो सकते हैं।




