गठबंधन फाइनल? मोदी के पंजाब दौरे पर हो सकता है औपचारिक ऐलान

2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन लगभग तय होने की खबर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी पंजाब दौरे के दौरान इसकी औपचारिक घोषणा किए जाने की संभावना है। इस मौके पर दोनों दलों के वरिष्ठ नेता मौजूद रह सकते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा, जिसने पहले संकेत दिया था कि वह पंजाब में गठबंधन के तहत अब ‘छोटे भाई’ की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी, अब राज्य की कुल 117 विधानसभा सीटों में से करीब 40 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सहमत हो गई है। वहीं, शिरोमणि अकाली दल को 65 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि शेष 12 सीटें शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) सहित अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जा सकती हैं।

यह सीटों का बंटवारा उस पुराने फॉर्मूले से काफी अलग होगा, जिसके तहत भाजपा केवल 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी और शेष 94 सीटें अकाली दल के हिस्से में आती थीं।

दिलचस्प बात यह है कि सूत्रों के अनुसार, दोनों दलों के बीच सहमति केवल सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं है। यदि पंजाब में एनडीए की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री शिरोमणि अकाली दल का होने की संभावना है। इससे प्रस्तावित गठबंधन में क्षेत्रीय दल के महत्व और उसकी राजनीतिक भूमिका का संकेत मिलता है।

हालांकि, अकाली दल के अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने गठबंधन की घोषणा के लिए कोई समयसीमा बताने से परहेज किया है। भाजपा के साथ संभावित गठबंधन के सवाल पर उन्होंने कथित तौर पर कहा, “मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं। आपको कुछ दिनों में पता चल जाएगा।”

NDA में वापसी से पहले अकाली एकता की कोशिश?

अकाली दल के विभिन्न धड़ों के बीच सुलह और नजदीकियों के संकेत भी मिलने लगे हैं। शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) के प्रमुख नेता प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने पंजाब के व्यापक हित में अकाली एकजुटता की सुखबीर बादल की अपील का समर्थन किया है।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अकाली दल के विभिन्न धड़ों को एक मंच पर लाने की कोशिशें तेज हो सकती हैं। इसके बाद SAD की NDA में संभावित वापसी का रास्ता साफ हो सकता है। ऐसा होने से अकाली नेतृत्व की राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ने और पारंपरिक सिख एवं ग्रामीण वोट बैंक को एकजुट करने में मदद मिल सकती है।

इस बीच, पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में जगह दिए जाने की अटकलें भी तेज हैं। रवनीत सिंह बिट्टू को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद अब हरसिमरत कौर बादल को भी कैबिनेट में जगह मिलने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रही हैं।

अमित शाह के पंजाब मिशन से गठबंधन की अटकलों को बल

भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाओं को वरिष्ठ भाजपा नेताओं के पंजाब में एनडीए सरकार बनाने संबंधी बयानों से भी बल मिला है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में चंडीगढ़ दौरे के दौरान भरोसा जताया था कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में एनडीए की सरकार बनेगी। पंजाब में एनडीए सरकार को लेकर उनके लगातार दिए जा रहे बयानों को भाजपा और उसके पूर्व सहयोगी अकाली दल के बीच रिश्तों में आई नरमी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि केंद्र के तीन कृषि कानूनों को लेकर विवाद के बाद सितंबर 2020 में अकाली दल ने NDA से नाता तोड़ लिया था। बाद में केंद्र सरकार ने इन कृषि कानूनों को वापस ले लिया था।

2022 के चुनाव नतीजे भी गठबंधन की जरूरत की ओर करते हैं इशारा

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में दोनों पूर्व सहयोगी दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणामों ने दोनों पार्टियों के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों को उजागर कर दिया था।

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022: पार्टियों का प्रदर्शन

पार्टीवोट प्रतिशतजीती गई सीटें
आम आदमी पार्टी42.01%92
कांग्रेस22.98%18
शिरोमणि अकाली दल18.38%3
भाजपा6.60%2
बहुजन समाज पार्टी1.77%1
निर्दलीय2.94%1
SAD (अमृतसर)2.48%0
अन्यलगभग 0.84%0

अलग-अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा दोनों दलों को भुगतना पड़ा। अकाली दल को जहां 18.38 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद केवल तीन सीटें मिलीं, वहीं भाजपा 6.60 प्रतिशत वोट हासिल कर सिर्फ दो सीटें जीत सकी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा और अकाली दल के एक साथ आने से एनडीए को चुनावी लाभ मिल सकता है। इससे अकालियों के पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक के साथ भाजपा के शहरी तथा हिंदू वोट बैंक को एक मंच पर लाने का अवसर मिलेगा।

दूसरी ओर, यदि भाजपा और अकाली दल के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं होता तो विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।

सौहार्दपूर्ण मुलाकातों से राजनीतिक पुनर्मिलन तक

भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन की अटकलों को उस समय और बल मिला जब चंडीगढ़ में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और सुखबीर बादल के चचेरे भाई मनप्रीत सिंह बादल की बेटी के विवाह समारोह में भाजपा नेताओं को सुखबीर बादल के साथ देखा गया। समारोह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं और दोनों पुराने सहयोगियों के फिर से साथ आने की चर्चाएं तेज हो गईं।

इस साल अगस्त में संसद भवन परिसर में सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सौहार्दपूर्ण मुलाकात भी हुई थी। 2020 में अकाली दल के एनडीए छोड़ने के बाद यह दोनों नेताओं की पहली आधिकारिक मुलाकात थी।

इसके बाद से दोनों दलों के बीच राजनीतिक नजदीकियां बढ़ने के कई संकेत मिले हैं। पंजाब चुनावों के लिए भाजपा के प्रमुख संगठनात्मक चेहरे सीआर पाटिल भी सुखबीर बादल से मुलाकात कर चुके हैं। वहीं, अमित शाह के लगातार पंजाब में एनडीए सरकार बनाने संबंधी बयान ने भी गठबंधन की संभावनाओं को हवा दी है।

हालांकि, भाजपा के नेताओं के सार्वजनिक बयानों में अभी भी एकरूपता दिखाई नहीं देती। एक तरफ अमित शाह पंजाब में एनडीए सरकार बनने का भरोसा जता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने पार्टी के सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कही है।

इस विरोधाभास के कारण अकाली दल के खेमे में असमंजस की स्थिति बनी हुई बताई जा रही है।

सूत्रों का दावा है कि भाजपा के आंतरिक चुनावी सर्वेक्षणों में यह संकेत मिला है कि अकेले चुनाव लड़ने की तुलना में अकाली दल के साथ गठबंधन करने से पार्टी को अधिक चुनावी फायदा हो सकता है। अकाली दल को भले ही संगठनात्मक और नेतृत्व संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन पंजाब के पारंपरिक ग्रामीण मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ अब भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

क्या अकाली दल अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर पाएगा?

गठबंधन हो जाने के बावजूद दोनों दलों के लिए चुनावी राह आसान नहीं होगी।

अकाली दल का नेतृत्व अब भी मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक साख को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहा है। खासकर ग्रामीण जाट सिख किसानों के उस पारंपरिक वोट बैंक में पार्टी की लोकप्रियता को लेकर सवाल उठते रहे हैं, जो कभी उसका सबसे मजबूत आधार हुआ करता था।

केंद्र की भाजपा सरकार के कृषि कानूनों से जुड़े विवाद के दौरान अकाली दल की भूमिका का राजनीतिक असर भी पार्टी को झेलना पड़ा है।

पूर्व मुख्यमंत्री और अकाली दल के संरक्षक प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद पार्टी को एक बड़ा नेतृत्वगत झटका लगा है। सुखबीर बादल के सामने पार्टी की साख दोबारा स्थापित करने और पारंपरिक मतदाता वर्ग को फिर से अपने साथ जोड़ने की बड़ी चुनौती है।

भाजपा के लिए अकाली दल के साथ गठबंधन पंजाब में एक मजबूत जमीनी संगठन और उन क्षेत्रों में राजनीतिक पहुंच हासिल करने का अवसर हो सकता है, जहां पार्टी स्वतंत्र रूप से अपना जनाधार बनाने में अब तक संघर्ष करती रही है। वहीं, अकाली दल के लिए भाजपा के साथ दोबारा आना राजनीतिक ताकत, संगठनात्मक सहयोग और सत्ता में वापसी का रास्ता खोल सकता है।

इसलिए अब बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि भाजपा और अकाली दल दोबारा साथ आएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दोनों दलों की यह नई साझेदारी उस चुनावी केमिस्ट्री को फिर से पैदा कर पाएगी, जिसने कभी उन्हें पंजाब की सबसे ताकतवर राजनीतिक जोड़ियों में शामिल किया था। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ आने वाले कुछ सप्ताह पंजाब की राजनीति की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं।