पंजाब की राजनीति में समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने की मांग को लेकर नया राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक साथ मोर्चा खोलते हुए चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप करने, आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू करने और 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव समय से पहले कराने की मांग की है।
एक साथ शुरू हुए इस राजनीतिक हमले में पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों, शिअद अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल तथा पंजाब भाजपा नेता सुनील जाखड़ ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया है कि राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था लगभग चरमरा चुकी है और कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
नेताओं की मांगों में यह समानता ऐसे समय में सामने आई है, जब शिअद और भाजपा के बीच आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर फिर से राजनीतिक समझ विकसित करने की चर्चाएं चल रही हैं। वर्ष 2020 में लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों के बीच संभावित राजनीतिक वापसी को लेकर अटकलें लगातार तेज हुई हैं।
चंडीगढ़ में शिअद के हलका प्रभारियों की बैठक की अध्यक्षता करते हुए सुखबीर बादल ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार का प्रशासन पर नियंत्रण समाप्त हो चुका है। उन्होंने चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
बादल ने कहा, “प्रशासन पूरी तरह दिशाहीन हो चुका है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ऐसा लगता है कि मैदान छोड़कर भाग गए हैं। यही वजह है कि पुलिस भी अपने हिसाब से काम करती दिखाई दे रही है। पंजाब में अब कोई कप्तान नहीं बचा है। मैं चुनाव आयोग से आग्रह करता हूं कि वह आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू करे और चुनाव करवाए। तभी पंजाब को बचाया जा सकता है।”
अकाली दल ने अपनी मांग के समर्थन में हाल की कई घटनाओं का हवाला दिया है। इनमें हिंसक झड़पें, चुनिंदा लोगों को निशाना बनाकर की गई गोलीबारी, मानसा में नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा की हत्या और शोकाकुल परिवारों के साथ पुलिस द्वारा कथित दुर्व्यवहार शामिल हैं। पार्टी का दावा है कि ये घटनाएं राज्य में शासन और कानून-व्यवस्था के गंभीर संकट की ओर इशारा करती हैं।
सुखबीर बादल की समय से पहले चुनाव कराने की मांग ऐसे वक्त आई है, जब अकाली दल और भाजपा के बीच केंद्रीय नेताओं के माध्यम से संभावित चुनावी समझौते को लेकर बातचीत की खबरें सामने आ रही हैं। हालांकि, दोनों दलों ने अभी तक किसी गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन मान सरकार के खिलाफ एक साथ हमलावर होने से पंजाब की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
राज्यपाल के दरवाजे पर दस्तक
अकाली दल के हमले के बीच पंजाब भाजपा नेता सुनील जाखड़ ने भी राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा। उन्होंने राज्यपाल से चुनाव आयोग के हस्तक्षेप और आदर्श चुनाव आचार संहिता जल्द लागू कराने की सिफारिश करने का आग्रह किया।
जाखड़ ने पंजाब की स्थिति को केवल सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती मानने से इनकार करते हुए चेतावनी दी कि सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिशें राज्य को उसके अशांत अतीत की ओर धकेल सकती हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक ताकतें समाज में विभाजन पैदा करने और सांप्रदायिक सद्भाव को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं।
जाखड़ ने कहा, “पंजाब में एक बार फिर आतंकवाद के काले दौर जैसी भावनाओं को उभारने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ राजनीतिक प्रतिष्ठान समाज को बांटने और सांप्रदायिक सौहार्द को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। पंजाब की संस्कृति इसकी इजाजत नहीं देती। किसी भी फैसले का आधार शांति और सद्भाव बनाए रखने की जरूरत होनी चाहिए।”
उन्होंने आम आदमी पार्टी सरकार पर नशे के कारोबार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि नशे का व्यापार सरकार के लिए राजस्व जुटाने का एक अन्य माध्यम बन गया है।
पुलिस महानिदेशक की उन टिप्पणियों का हवाला देते हुए, जिनमें सिंथेटिक और दवा आधारित नशीले पदार्थों की व्यापक समस्या का उल्लेख किया गया था, जाखड़ ने दावा किया कि गांवों में प्रेगाबालिन दवा स्थानीय नेटवर्क के माध्यम से बेची जा रही है और इसमें राजनीतिक पदाधिकारियों की कथित संलिप्तता है।
भाजपा नेता ने कहा कि पंजाब का युवा बढ़ती निराशा का शिकार है। उसने अपने गांवों के लोगों को विदेश जाकर सफल होते देखा है, जबकि अपने ही राज्य में उसे रोजगार और बेहतर भविष्य की संभावनाएं कम दिखाई देती हैं।
उनके अनुसार, नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
जाखड़ ने कहा कि एक सप्ताह या एक महीने तक चलने वाले अभियानों से नशे की समस्या समाप्त नहीं की जा सकती। इसके लिए नशे के आदी लोगों का पुनर्वास, रोजगार के अवसर पैदा करना और युवाओं में उम्मीद जगाना जरूरी है।
उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा नशे के खिलाफ लड़ाई के लिए बताई गई दो साल की समयसीमा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए व्यापक और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
अबोहर में मैराथन की अनुमति न मिलने को बनाया मुद्दा
जाखड़ ने मान सरकार के खिलाफ अपने आरोपों को मजबूत करने के लिए अबोहर में प्रस्तावित नशा विरोधी मैराथन को प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने का मुद्दा भी उठाया।
उनके अनुसार, प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार करते हुए स्पष्ट रूप से इसका कारण “मौजूदा खराब कानून-व्यवस्था की स्थिति” बताया था।
भाजपा नेता ने सवाल उठाया कि जब सरकार का अपना प्रशासन सार्वजनिक खेल आयोजन की सुरक्षा सुनिश्चित करने में असमर्थ है, तो वह राज्य में कानून-व्यवस्था नियंत्रण में होने का दावा कैसे कर सकती है?
उन्होंने राजनीतिक रैलियों पर हमलों और सीमावर्ती जिलों में जबरन वसूली की बढ़ती घटनाओं पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि मौजूदा माहौल में राजनीतिक दलों के लिए बिना किसी भय या दबाव के चुनाव प्रचार करना मुश्किल हो सकता है।
जाखड़ ने चेतावनी दी कि मौजूदा परिस्थितियों में नागरिक और पुलिस प्रशासन को पूरी तरह राज्य सरकार के नियंत्रण में छोड़ना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रचार की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।
राज्यपाल और चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की उनकी मांग का उद्देश्य चुनावों से पहले राज्य की प्रशासनिक मशीनरी, विशेषकर पुलिस व्यवस्था, को अधिक कड़ी निगरानी के दायरे में लाना है।
समय से पहले चुनाव की मांग के राजनीतिक मायने
पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में प्रस्तावित है। हालांकि, विपक्ष की ओर से चुनाव समय से पहले कराने की मांग ने एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक सवाल को जन्म दे दिया है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 15 के तहत सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से छह महीने पहले चुनाव की अधिसूचना जारी की जा सकती है। हालांकि, यदि विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले उसे भंग कर दिया जाता है, तो चुनाव पहले भी कराए जा सकते हैं।
विपक्ष की ओर से आदर्श चुनाव आचार संहिता जल्द लागू करने की मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामान्य तौर पर चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित किए जाने के साथ ही यह संहिता प्रभावी हो जाती है।
इसके लागू होने के बाद सरकार नई नीतियों की घोषणा, नई योजनाओं के शुभारंभ, अधिकारियों के तबादलों और सरकारी मशीनरी के चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल को लेकर कई तरह की पाबंदियों के दायरे में आ जाती है।
इस लिहाज से विपक्ष की मांग केवल समय से पहले चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक उद्देश्य मान सरकार को चुनावी प्रतिबंधों के दायरे में लाना और राज्य के प्रशासन तथा पुलिस की कार्यप्रणाली को अधिक निगरानी के अधीन लाना भी है।
हालांकि, केवल राजनीतिक दलों की मांग पर आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू नहीं की जा सकती। इसके लिए चुनाव आयोग को संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना होगा। इसी तरह विधानसभा चुनाव समय से पहले कराने के लिए भी उचित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
आप ने विपक्ष की घबराहट करार दिया
दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी इस संयुक्त हमले को अपने परंपरागत राजनीतिक विरोधियों की बढ़ती बेचैनी के रूप में पेश करने की तैयारी में है।
सत्तारूढ़ पार्टी ने शिअद और भाजपा पर राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाने का आरोप लगाया है और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले उनकी राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
आप नेताओं का कहना है कि चुनाव समय से पहले कराने की मांग इस बात का संकेत है कि विपक्षी दलों को अपनी राजनीतिक जमीन, उम्मीदवारों और जनसमर्थन को लेकर चिंता सता रही है।
पार्टी ने राज्यपाल के कार्यालय को इस विवाद में शामिल किए जाने पर भी सवाल उठाते हुए इसे संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से राजनीतिक विवाद खड़ा करने की कोशिश बताया है।
आप ने 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की
संभवतः समय से पहले चुनाव की आशंका को देखते हुए, या फिर चुनावी तैयारी में बढ़त हासिल करने की रणनीति के तहत, आम आदमी पार्टी ने आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए 40 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची पहले ही जारी कर दी है।
मुख्यमंत्री भगवंत मान को धूरी विधानसभा क्षेत्र से दोबारा उम्मीदवार बनाया गया है। इससे स्पष्ट है कि वह आगामी चुनाव में इसी सीट से फिर अपनी किस्मत आजमाएंगे।
पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक के बाद जारी सूची में राज्य के मंत्रियों कुलदीप सिंह धालीवाल, ब्रह्म शंकर शर्मा जिम्पा और बलकार सिंह के नाम भी शामिल हैं। इसके अलावा कई मौजूदा विधायकों को दोबारा उम्मीदवार बनाया गया है।
पहली सूची जारी कर आप ने अपने उम्मीदवारों को निर्वाचन क्षेत्रों में पहले से ही जनसंपर्क और चुनावी तैयारी का पर्याप्त समय देने की रणनीति अपनाई है। इसके साथ ही पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि विपक्ष के आक्रामक रुख के बावजूद उसका संगठन चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है।
पंजाब में समय से पहले चुनावी मुकाबले के आसार
समय से पहले चुनाव कराने की मांग पर शिअद और भाजपा की एकजुटता ने दोनों दलों के बीच व्यापक राजनीतिक तालमेल की संभावनाओं को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मान सरकार के खिलाफ साझा अभियान और संभावित गठबंधन को लेकर चल रही बातचीत पंजाब के राजनीतिक समीकरणों को नया रूप दे सकती है।
फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से चुनाव कार्यक्रम में बदलाव की कोई घोषणा नहीं की गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष की ओर से समय से पहले हस्तक्षेप की मांग किसी संवैधानिक या चुनावी कार्रवाई में तब्दील होगी, या फिर यह केवल सरकार पर दबाव बनाने की राजनीतिक रणनीति बनकर रह जाएगी।
एक तरफ आप ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर चुनावी बिगुल बजा दिया है, तो दूसरी तरफ शिअद और भाजपा ने मान सरकार के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं। ऐसे में पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक सरगर्मी निर्धारित समय से काफी पहले शुरू होती दिखाई दे रही है।




