कूड़ेदान में आंखें

मध्यप्रदेश, राज्यवार A- A+

दान की आंखें कूड़ेदान में

मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में दान में मिली आंखों के कूड़ेदान में मिलने से प्रबंधन सवालों के घेरे में है

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‘कुछ लोगों के लिए मेरी आवाज ही मेरी पहचान है, क्योंकि वो मुझे देख नहीं सकते. हमारे देश में एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों के पास आंखें नहीं हैं. आप देख रहे हैं ना, मैं क्या कह रहा हूं आप भी वो क्यों नहीं करते जो हमने किया अपनी आंखें किसी के नाम कर दें जिससे उनकी आंखें भी देख सकें वो सब जिसे वे सिर्फ आवाज से पहचानते आए हैं. लिखिए अमिताभ बच्चन को या जया बच्चन को केयर ऑफ, द आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया  पर. आपकी आंखें किसी के जीवन में उजाला ला सकती हैं.’ 

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की आवाज में नब्बे के दशक में जब यह विज्ञापन दूरदर्शन पर दिखाया जाता तब लोग टीवी के सामने चिपक जाते हैं. नेत्रदान करने की अपील के साथ यह विज्ञापन ‘द आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की ओर से प्रसारित करवाया जाता था. हालांकि नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाले इस विज्ञापन का प्रसारण धीरे-धीरे सीमित और बाद में पूरी तरह से खत्म कर दिया गया. तमाम लोगों ने इस विज्ञापन को भी भुला दिया होगा, मगर बीते दिनों ग्वालियर में हुई एक घटना ने इस विज्ञापन की अचानक याद दिला दी. शहर के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में लोगों की ओर से दान की गईं आंखें कूड़ेदान में पाई गईं. जागरूकता फैलाने वाले विज्ञापनों और आंखें दान करने को लेकर सरकार व सरकारी अस्पताल कितने सजग हैं, इस घटना ने उसकी कलई खोलकर रख दी है.

मामला ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल का है. यहां दान में मिली आंखें कूड़ेदान में पाई गईं हैं. अमिता गंभीर की मौत के बाद उनकी आंखें 22 अप्रैल को उनके परिवार ने अस्पताल को दान की थीं. जून के दूसरे हफ्ते में इस परिवार को पता चला कि दान की गई आंखों को कूड़े में डाल दिया गया है. परिवार के लोगों ने अस्पताल जाकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की तो इस बड़ी घटना का खुलासा हुआ. जांच हुई तो अस्पताल के नेत्र विभाग की इमारत  के पिछले छज्जे पर लगे कूड़े के ढेर में कई आंखें मिलीं. आनन फानन में विभाग के डॉ. यूएस तिवारी, कॉर्निया यूनिट प्रभारी डॉ. डीके शाक्य सहित ओटी इंचार्ज लिसी पीटर को निलंबित कर घटना की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए गए हैं. वहीं गजराराजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) के डीन ने एक चार सदस्यीय समिति बनाकर मामले की तफ्तीश शुरू करा दी है. घटना की खबर फैलते ही नेत्रदान करने वाले दूसरे परिवारों के लोग भी अपने परिजन की आंखों का हिसाब-किताब मांगने अस्पताल पहुंच गए. फिलहाल अमृता गंभीर के बेटे किशन गंभीर ने दो आरोपियों डॉ. यूएस तिवारी व डॉ. डीके शाक्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 405, 406, 415 और 420 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया है. मामले की जांच जारी है. इस मामले में दिलचस्प मोड़ तब आया जब घटना के अगले दिन कूड़े में मिली आंखों को गायब कर दिया गया और इसके दूसरे दिन जब पुलिस जांच के लिए पहुंची तो नाटकीय तरीके से आंखें वहीं से बरामद की गईं. इस वाकये ने पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है.

अब हर दिन गुजरने के साथ डॉक्टरों पर आरोपों की संख्या बढ़ती जा रही है. दोनों डॉक्टरों के खिलाफ थाने में अब तक तकरीबन आधा दर्जन शिकायती आवेदन आ चुके हैं. इनमें से एक शिकायत पर केस दर्ज कर लिया गया है और बाकी आवेदनों पर डॉक्टरों से पूछताछ जारी है. एक आवेदन राहुल गुप्ता का है. राहुल बताते हंै, ‘अस्पताल के नेत्रकोष के नेत्र दानदाताओं की लिस्ट वाले रजिस्टर में मेरी मां का तो नाम ही नहीं है. पूरे मोहल्ले के सामने अस्पताल के डॉक्टर मां की आंखें ले गए थे लेकिन अब इंकार कर रहे हैं. अगर आंखें उनके पास नहीं हैं तो कौन ले गया? आखिर कहां गईं मेरी मां की आंखें?’

जीआरएमसी के डीन रिटायर होने वाले हैं. यह पद पाने के लिए एक डॉक्टर साजिश रच रहा है. स्थानीय स्तर पर इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं

किशन गंभीर कहते हैं, ‘आंखें दान कर के क्या हमें कोई आर्थिक लाभ होता है? बस यह सोचकर एक आत्मिक तसल्ली मिलती है कि हम किसी जरूरतमंद के काम आ सकेंगे. लेकिन अगर दान की आंखें कूड़ेदान में फेंक दी जाएं तो बताइए हम पर क्या बीतेगी? इस तरह तो नेत्रदान के लिए कोई आगे ही नहीं आएगा. यह घोर अमानवीय कृत्य है. इसके गुनाहगारों को सजा दिलाने के लिए मैं अंतिम सांस तक लड़ूंगा. मुझे धमकियां दी जा रही हैं कि केस वापस ले लूं लेकिन मैं पीछे हटने वाला नहीं. यह मेरी नहीं, समाज की लड़ाई है.’

इसके उलट दोनों आरोपी डॉक्टर किशन गंभीर पर ही आरोप लगा रहे हैं. डॉ. शाक्य कहते हैं, ‘जिस समय यह घटना हुई, उस समय मैं छुट्टी पर था. यह मेरी छवि खराब करने के लिए रची गई एक साजिश है, जिसका एक मोहरा किशन गंभीर है.’ दो जूनियर डॉक्टरों पर भी आरोप लगाते हुए वह कहते हैं, ‘हां, हमने 22 अप्रैल को अमृत गंभीर की आंखें निकाली थीं. 23 मार्च को उन्हें किसी और को लगाए जाने की पूरी तैयारी भी थी लेकिन आखिरी समय में ऑपरेशन रद्द करना पड़ा क्योंकि आंखें प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त पाई गईं. उसी समय हमने आंखें दो जूनियर डॉक्टरों के हवाले कर दी थी. तब से वह उन्हीं के पास थीं. इस साजिश में वे दोनों भी शामिल हैं.’

आखिर कौन कर रहा है उनके खिलाफ षडयंत्र? इसके जवाब में डॉ. शाक्य कहते हैं, ‘जीआरएमसी के डीन डॉ. जीएस पटेल जल्द ही रिटायर होने वाले हैं और वरिष्ठता सूची के हिसाब से नेत्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. तिवारी डीन बनने की होड़ में पहले पायदान पर हैं. उनसे चार पायदान नीचे यानी छठे नंबर पर मेरा नंबर हैं. बीच में जो भी चार नाम हैं, वह किन्हीं कारणों से इस पद के अयोग्य हैं. इसलिए इस पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले एक डॉक्टर, एक निजी अस्पताल के नेत्र विशेषज्ञ के साथ मिलकर साजिश रच रहे हैं. स्थानीय स्तर पर इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.’ अपने नेत्रकोष का पंजीकरण ‘तहलका’ को दिखाते हुए वे कहते हैं, ‘हमारा नेत्रकोष पंजीकृत है, फिर कैसे यह प्रचारित किया गया कि वह बिना पंजीकरण काम कर रहा है.’

डॉ. शाक्य के आरोप के संबंध में ग्वालियर जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन दोनों जूनियर डॉक्टर का बचाव करते हुए इसे निराधार बता रहा है. एसोसिएशन के अध्यक्ष गिरीश चतुर्वेदी कहते हैं, ‘जूनियर डॉक्टर को आखिर उनके खिलाफ षडयंत्र कर के क्या हासिल होगा? हम विभागाध्यक्ष तो बन नहीं जाएंगे. सच तो ये है कि विभाग में सब कुछ सही नहीं चल रहा. आप नेत्रकोष की हालत ही देख लीजिए. दान की गईं आंखों को रक्त कोष के फ्रीजर में रखा जाता है. अगर हमको दोषी ठहराया जाता है तो हम न्यायिक जांच की मांग करेंगे.’

जीआरएमसी के डीन डॉ. जीएस पटेल पूरे मामले को डॉक्टरी पेशे को बदनाम करने वाला करार देकर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन देते हुए कहते हैं, ‘विभागीय जांच पूरी कर ली गई है. डॉ. जेएस सिकरवार की अध्यक्षता में जांच समिति ने 200 पेजों की अपनी रिपोर्ट हमें सौंप दी है. अस्पताल की साख पर बट्टा लगाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.’

बहरहाल उनकी बातों में कितना दम है इसका पता इस बात से ही चल जाता है कि जांच समिति की अध्यक्षता जयारोग्य अस्पताल के डॉ. सिकरवार को दी गई थी, जो खुद ओहदे में डॉ. यूएस तिवारी और डॉ. डीके शाक्य के कनिष्ठ हैं. इसलिए अस्पताल के अंदरुनी हलकों में दबी जुबान में ये जुमला खूब उछल रहा है, ‘जब सैंया भए कोतवाल, तब डर काहे का?’ अस्पताल के ही एक डॉक्टर बताते हैं, ‘जयारोग्य अस्पताल में बनी जांच समितियां महज खानापूर्ति के लिए ही होती हैं. इसी समिति का ही हाल देख लो. डॉ. शाक्य अनुसूचित जाति से आते हैं लेकिन समिति का कोई भी सदस्य एससी कोटे का नहीं है. कल को अगर फैसला डॉ. शाक्य के खिलाफ भी हुआ तो वह इस समिति के गठन को ही चुनौती दे देंगे. फिर किया-धरा सब बेकार.’

वैसे दोनों आरोपी डॉक्टर यह भी दावा कर रहे हैं कि कूड़ेदान में मिलीं आंखें इंसान की नहीं जानवर की हैं. इस पर किशन गंभीर ने पुलिस अधीक्षक ग्वालियर हरिनारायणचारी मिश्रा से आंखों के डीएनए परीक्षण की गुहार लगाई है. किशन कहते हैं, ‘पुलिस जांच जिस कछुआ गति से चल रही है उससे तो कोई निष्कर्ष निकलेगा, ऐसी उम्मीद कम है. अब तो बस मजिस्ट्रेट की जांच ही एकमात्र सहारा है.’ इस बीच दोनों आरोपी डॉक्टरों ने भी एक आवेदन देकर पुलिस का ध्यान कुछ अहम बिंदुओं की ओर आकर्षित कराते हुए षडयंत्रकारियों का पता लगाने की गुजारिश की है. इस मामले में कौन सही या कौन गलत यह तो भविष्य में पता चलेगा, फिलहाल मजिस्ट्रेट की जांच के नतीजे भी कुछ दिनों में सामने आने वाले हैं, तभी मामले की स्थिति साफ हो पाएगी.

नेत्र विभाग में सब कुछ ठीक नहीं

मामला सामने आने के बाद जयारोग्य अस्पताल के नेत्र विभाग की कार्यप्रणाली भी शक के घेरे में आ गई है. विभाग की खामियां एक के बाद एक उजागर होने लगी हैं. इससे विभागाध्याक्ष डॉ. तिवारी और कॉर्निया यूनिट प्रभारी डॉ. शाक्य की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे. नेत्र विभाग के नेत्रकोष में पिछले छह वर्षों के दौरान 15 बार आंखें दान की गईं, लेकिन इस दौरान क्रेटोप्लास्टी (कॉर्निया प्रत्यारोपण) सिर्फ एक बार ही हुई. बाकी 14 जोड़ी आंखों के बारे में बताया गया कि ये शोध के काम में ले ली गईं. अब सवाल उठता है कि अगर शोध हुआ तो शोध पत्र कब प्रकाशित हुए? शोध के लिए अस्पताल की एथिकल कमेटी से अनुमति क्यों नहीं ली गई? ऐसा आज से नहीं पिछले पंद्रह वर्षों से चला आ रहा था. तो क्या वे सभी आंखें भी कचरे में फेंक दी गईं?

‘जूनियर डॉक्टर को उनके खिलाफ षडयंत्र कर क्या हासिल होगा? हम विभागाध्यक्ष तो बन नहीं जाएंगे. सच तो ये है कि विभाग में सब ठीक नहीं चल रहा’

मामले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के स्टेट प्रेसिडेंट डॉ. एएस भल्ला कहते हैं, ‘भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीसीबी), 2009 के तहत देश में नेत्र संग्रह के कुछ मानक तय किए गए हैं जिनके अनुसार अगर कॉर्निया क्रेटोप्लास्टी के योग्य नहीं पाया जाता है तो उसे शोध या शैक्षणिक प्रशिक्षण में प्रयोग किया जा सकता है, जिसके लिए किसी एथिकल कमेटी से अनुमति नहीं लेनी होती और जहां तक शोध पत्र का सवाल है तो शोध तो उन्होंने किया ही नहीं. उन्होंने मेडिकल छात्रों के प्रशिक्षण के लिए आंखों का इस्तेमाल किया है.’ अगर डॉ. भल्ला की ये बात मान ली जाए तो अस्पताल के नेत्रकोष का रजिस्टर कुछ और ही कहानी बयां करता है. इसमें आंखों को शोध में प्रयुक्त बताया जा रहा है. इस पर सफाई देते हुए डॉ. यूएस तिवारी इसे तकनीकी खामी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘दान की आंखों का हमने क्या प्रयोग किया, रजिस्टर में यह एंट्री जूनियर डॉक्टर करते हैं. 20 वर्षों से हम यह रजिस्टर मेंटेन कर रहे हैं. शुरुआती सत्रों के जूनियर डॉक्टरों ने रजिस्टर में आंखों के आगे ‘शोध के उद्देश्य के लिए’ लिख दिया था, तब से ही यह परिपाटी चल पड़ी.’ लेकिन अगर ऐसा ही था तो इतने वर्षों में उन्होंने इसे सुधारने की कोई कोशिश क्यों नहीं की? इस सवाल का वह कोई जवाब नहीं दे पाते.

एनपीसीबी के जिन दिशा-निर्देशों को ढाल बनाकर दोनों डॉक्टर बचने का प्रयास कर रहे हैं, वही दिशा-निर्देश उन्हें एक दूसरे मामले में सवालों के कठघरे में खड़ा करते हंै. एनपीसीबी गाइडलाइंस में स्पष्ट बताया गया है कि एक नेत्रकोष के लिए रेफ्रीजरेटर और बिजली का निर्बाध संचालन जरूरी है. नेत्रकोष की खस्ता हालत को अनजाने में डॉ. शाक्य खुद स्वीकारते हैं. उनके अनुसार दान में आईं आंखों को ‘रक्त कोष’ के फ्रीजर में रखा जाता है क्योंकि नेत्रकोष में कोई पावर बैकअप सिस्टम ही नहीं है. यह भी सवाल उठता है कि 15 में से 14 जोड़ी आंखें किस आधार पर प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त पाई गईं? इसका जवाब कुछ जूनियर डॉक्टर दबी जुबान में इस प्रकार देते हैं, ‘विभाग के पास आंखें जमा करने के लिए जरूरी यंत्र ही नहीं हैं. होना तो यह चाहिए कि दान की आंखों को आठ से दस घंटे के अंदर प्रत्यारोपित कर दिया जाए पर हमारे वरिष्ठ लापरवाही कर देते हैं और कॉर्निया अपनी उपयोगिता खोकर प्रत्यारोपण योग्य ही नहीं रह जाता. इसी लापरवाही के चलते पिछले कुछ समय से क्रेटोप्लास्टी ही नहीं हो पा रही है, जबकि जरूरतमंदों की वेटिंग लिस्ट कहीं अधिक लंबी है.’

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