मुझे चार माह का गर्भ था, जब मेरे पति का देहांत हुआ, उनकी आखिरी इच्छा थी नेत्रदान | Tehelka Hindi

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मुझे चार माह का गर्भ था, जब मेरे पति का देहांत हुआ, उनकी आखिरी इच्छा थी नेत्रदान

दीपक गोस्वामी July 2, 2015, Issue 13 Volume 7

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‘उनकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई थी. वे हमेशा ही नेत्रदान करने के लिए कहा करते थे. उनका मानना था कि अगर माैत के बाद हम अपनी आंखों से किसी और की दुनिया रोशन कर सकें तो भला इससे अच्छा और क्या होगा? वे मां-बाबूजी का भी नेत्रदान का पर्चा भरवाने जाने ही वाले थे, लेकिन तब तक दुर्घटना के शिकार हो गए. बस आंखें दान करने को उनकी आखिरी इच्छा मानकर हमने आंखें दान कर दीं, लेकिन क्या पता था कि उस अस्पताल में आंखें कचरे में फेंक दी जाएंगी.’

ये बातें कहते हुए विनीता जैन की आंखें आंसुओं से भर जाती हैं. महज 30 वर्ष की उम्र में पति को खोना और उसके छह महीने बाद ही यह सुनना कि जिन आंखों को अपने पति की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने दान में दिया था, वह शायद कचरे में फेंक दी गई हैं, उनके ऊपर बिजली गिरने के समान था. सात वर्षीय रिद्धि और दुधमुंहे रिद्धिम की मां विनीता बताती हैं, ‘मेरा चार माह का गर्भ था, जब मेरे पति का देहांत हुआ. पिछले अक्टूबर की ही तो बात है. इतना आसान नहीं था सब कुछ भुलाना पर अब जब डॉक्टरों की ये घिनौनी करतूत सामने आई है तो जख्म फिर से हरे हो गए हैं.’ वह अस्पताल प्रबंधन पर सवाल उठाती हैं, ‘अगर आपके बस का नहीं है तो आखिर क्यों चला रहे हैं अस्पताल? क्यों लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं? अगर यह डॉक्टरों के खिलाफ षडयंत्र भी है तो हमें षडयंत्रकारियों के नाम क्यों नहीं बताते? इस षडयंत्र से हमारे दिलों को ठेस पहुंची है और हुआ तो यह सब उन डॉक्टरों के अंडर में ही, वही हेड थे न? जिम्मेदार वही हैं. बताइए आखिर ऐसा कैसे संभव है कि छह सालों में सिर्फ एक ही व्यक्ति की आंखें प्रत्यारोपण योग्य पाई गईं? शोध भी चल रहा है तो कहां हैं शोधार्थी और शोध के परिणाम? इस बीच विनीता के ससुर सुरेश जैन कमरे में दाखिल होते हुए कहते हैं, ‘ये कोई छोटी-मोटी गलती नहीं है जो हम उन्हें माफ कर देंगे. कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर वाकई डॉक्टर गुनहगार हैं तो अपना गुनाह कबूल करने पर जनता उन्हें माफ कर देगी. ऐसे कैसे कर देगी? हमारी भावनाओं का क्या कोई मोल नहीं? हम तो सोचते हैं कि इंसान गया लेकिन अगर उसकी आंखें किसी की अंधेरी दुनिया को रोशन कर दें तो लगेगा कि वह अभी भी यहीं है और दुनिया देख रहा है. हमारे लिए तो यह दोहरे सदमे सा है. जवान बेटा खोया और फिर ये सब. अब तो कोई आंखें दान करेगा भी तो यही कहेंगे मत करो, वो लोग इंसान नहीं हैं, फेंक देंगे कचरे में.’ सुरेश जैन की आंसुओं से भरी आंखें बार-बार यही सवाल कर रही थीं, क्या हमारे जख्म हरे करने वालों को सजा मिलेगी? विनीता पूछती भी हैं, ‘सर, वो लोग सजा तो पाएंगे न?’

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 13, Dated July 2, 2015)

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