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दिल्ली का कश्मीर की जनता से कोई संवाद ही नहीं हो रहा

कश्मीर में 2010 में जैसे हालात बने थे, अब परिस्थिति उससे ज्यादा कठिन और ज्यादा विकट हो गई है. ऐसा इसलिए हुआ है कि 2008-09 और 10 में जो घटनाएं हुई थीं, उससे न मनमोहन सरकार ने, न ही मोदी सरकार ने कोई सबक सीखा. सितंबर, 2010 में हमारी वार्ताकार  

क्या डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड में सीबीआई किसी नतीजे पर पहुंच पाएगी?

बीते 11 जून की शाम के तकरीबन पांच बज रहे थे. पुणे के शिवाजीनगर कोर्ट में न्यायाधीश एनएन शेख का कोर्टरूम खचाखच भरा हुआ था. कोर्ट में पुलिस का अच्छा-खासा बंदोबस्त था. तकरीबन 67 पुलिसकर्मी परिसर और उसके गेट पर पहरा दे रहे  थे. कोर्टरूम के भीतर मौजूद पत्रकार टकटकी  

‘वॉट्सऐप या मेल पर तलाक कैसे दे सकते हैं? क्या अल्लाह बैठकर वॉट्सऐप चेक कर रहे हैं कि किसने किसे क्या भेजा है?’

तकरीबन सारी दुनिया में, जिसमें मुस्लिम देश भी शामिल हैं, तीन तलाक का मौजूदा स्वरूप समाप्त हो चुका है. मेरा तो मानना है कि मुल्क में महिलाओं के लिए बराबर का अधिकार होना चाहिए. उनके लिए सक्रिय कानून होने चाहिए, जो एक स्तर पर हैं भी कि अगर आप चाहें  

‘मुताह एक तरह की कानूनी वेश्यावृत्ति है, जिस पर मुस्लिम समुदाय को बात करने में भी शर्म आती है…’

तीन तलाक के खिलाफ अभियान से मुस्लिम समुदाय के लोगों या मौलवियों को आहत नहीं होना चाहिए क्योंकि जिस तरह से आज के दौर में तीन तलाक हो रहा है, वह पूरी तरह इस्लाम के खिलाफ है. इससे इस्लाम के जो पांच सिद्धांत हैं, जो हिदायत है, उसमें कोई तब्दीली  

बीमारी की तरह फैल रहा है सोशल मीडिया का दुरुपयोग : ओम थानवी

जब नई तकनीकें आती हैं, तो वे अपने साथ वरदान भी लेकर आती हैं और अभिशाप भी. आपको उसके फायदे नजर आते हैं और नुकसान भी. यहां तक कि लोकतंत्र के भी अपने फायदे और नुकसान हैं और तानाशाही के भी अपने फायदे-नुकसान हैं. ये होता है कि तानाशाही में  

उपभोक्ता फोरम : ग्राहकों का मरहम

एस्कार्ट हार्ट इंस्टिट्यूट ऐंड रिसर्च सेंटर (हॉस्पिटल) देश के नामचीन अस्पतालों में शुमार है. यहां एक महिला के पैर में खून का प्रवाह रुकने पर उसके दिल का ऑपरेशन किया गया. बावजूद इसके महिला के पैर का दर्द कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. तबीयत बिगड़ने पर उनके इलाज  

फांसी का समाजशास्त्र

आम कहावत है कि कानून सिर्फ गरीबों के लिए होता है. दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की हालिया रिपोर्ट इस मामूली कहावत की तस्दीक करती है जिसमें कहा गया है कि मौत की सजा पाने वाले तीन चौथाई लोग वंचित, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते  

लोग पत्रकारों को गाली दे रहे हैं, अगर समाज इसे मान्यता देता है तो मैं उसे माला पहनाना चाहता हूं: रवीश

मेरा तो मानना है कि ये संगठित तरीका है और ये हर स्तर पर हो रहा है. देश में पार्टी के कार्यकर्ता कहीं भी हो सकते हैं, वहां से ये शुरू हो जाते हैं. तरह-तरह के वाट्स ऐप ग्रुप बने हुए हैं. वहां से इन बातों को फैलाया जाता है.  

यह दुनिया 100 प्रतिशत अंक पाने  वालों से नहीं चल रही है…

मध्य प्रदेश के सागर जिले के गेहुंरास गांव के 15 साल के प्रवीण रजक ने मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल के तहत 10वीं की परीक्षा दी थी. 16 मई को परीक्षा के परिणाम आए. प्रवीण गणित में पास नहीं हो पाया जबकि उसके सभी दोस्त पास हो गए थे. वह  

खेती में लिंगभेद के बीज

स्कूूल के दिनों में हम सबने ‘अपना देश भारत’ या ‘हमारा देश भारत’ विषय पर निबंध जरूर लिखा होगा. यह निबंध एक किस्म के आध्यात्मिक अनुष्ठान की तरह होता था, लिखा ही होगा. जहां तक मुझे याद है इसका एक शुरुआती वक्तव्य होता था- भारत एक कृषि प्रधान देश है.