दक्कन का दुख

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मुश्किल में हार केबाद मुख्यमंत्री सिि‍ारमैय्या पाटीर् में अपनेसिरोसियों के सनशाने पर हैं. फोटोः केपीएन

साल भर भी नहीं हुआ जब कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करते हुए भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया था. लेकिन भाजपा ने साल भर के भीतर ही लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त वापसी करते हुए राज्य की 28 में से 17 सीटें जीत ली हंै.

ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब भाजपा राज्य में भयंकर भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही थी. खनन  और जमीन घोटालों के अलावा पार्टी की गुटबाजी और कर्नाटक में उसके सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा उसके लिए किरकिरी की वजह बने हुए थे. इसके बावजूद यह चमत्कार कैसे हुआ? इस सवाल का जवाब भाजपा की बजाय कांग्रेस के खेमे में मिलता है.

जब से पार्टी लोकसभा का चुनाव हारी है कांग्रेस की कर्नाटक इकाई के भीतर घमासान है. कई जूनियर मंत्री और विधायक वरिष्ठ मंत्रियों और मुख्यमंत्री सिद्धारामैय्या के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं. जूनियर मंत्रियों का अपने वरिष्ठों से मोहभंग हो चला है क्योंकि इस हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ा जा रहा है. पार्टी को सिर्फ नौ लोकसभा सीटें हासिल हुई हैं. जूनियर मंत्रियों का आरोप है कि जब कांग्रेस विधायक दल की बैठक में उन्होंने पार्टी की चुनावी रणनीतियों की खामियों की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की थी तो मुख्यमंत्री का रवैया बेहद उदासीन था.

पार्टी के भीतर तमाम नेताओं का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले आत्महत्या करने वाले एक किसान को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारामैय्या द्वारा दिया गया गैर जिम्मेदाराना बयान पार्टी को भारी पड़ा है. इसके अलावा यह बात भी है कि सरकार ने गन्ना किसानों की समस्याओं को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया. इसके नतीजे में पार्टी का प्रदेश की गन्ना पट्टी (बेलगाम, बगलकोट, बीडर, दावांगेरे, मंड्या और मैसूर) से पूरी तरह सफाया हो गया.

सिद्धारामैय्या के विरोधियों का एक आरोप है कि आहिंदा (पिछड़े, दलित और मुसलमान समुदाय के लिए संयुक्त रूप से इस्तेमाल होने वाला कन्नड़ शब्द) की तरफ हद से ज्यादा ध्यान देकर उन्होंने राज्य की दो प्रभावशाली जातियों लिंगायत और वोक्कालिगा को नाराज कर दिया. एक आरोप यह भी है कि उन्होंने इस दौरान शहरी वोटरों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया, विशेषकर बंगलुरू को.

पार्टी में मची उठापटक अब साफ दिखने लगी है. लोकसभा का चुनाव हार गए तमाम उम्मीदवारों ने खुलेआम पार्टी के ही नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है. उदाहरण के तौर पर मैसूर से चुनाव हारे एएच विश्वनाथ और हावेरी से चुनाव हारे सलीम अहमद ने राज्य के वरिष्ठ नेताओं को अपनी हार का जिम्मेदार ठहराया है. अहमद का आरोप है कि राज्य के ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री एचके पाटिल उनकी हार के लिए जिम्मेदार हैं. अहमद का कहना था, ‘मंत्री हमारे क्षेत्र के विधायकों के साथ मिलकर सामंजस्य बिठाने और राजनीतिक रणनीति बना पाने में बिल्कुल असफल रहे. इसकी वजह से मेरी हार हुई. अगर उन्होंने थोड़ी सी मेहनत की होती और खुद को प्रचार अभियान में लगाया होता तो मेरी हार नहीं होती,’ उनके सैकड़ों समर्थकों ने बंगलुरू स्थित पार्टी कार्यालय पर भी विरोध प्रदर्शन किया.

प्रमुख चीनी व्यवसायी और राज्य के  बागवानी मंत्री एस शिवशंकरप्पा ने तहलका को बताया कि अगर पार्टी उनके बेटे मल्लिकार्जुन की हार का जिम्मेदार उन्हें ठहराएगी तो वे पार्टी छोड़कर दूसरा रास्ता अख्तियार करने के लिए तैयार हैं. उनकी ही तरह तमाम दूसरे वरिष्ठ मंत्री भी दूसरा रास्ता पकड़ने की फिराक में हैं.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि उनसे चूक हुई. वे कहते हैं, ‘पूरे चुनाव के दौरान हमने मुसलिम और ग्रामीण मतदाताओं पर ध्यान ही नहीं दिया. हमारे नेता चूक गए. उन्हें असलियत का अंदाजा ही

नहीं था.’

कुछ का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या ने प्रदेश अध्यक्ष जी परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री न बनाकर दलितों के मन में भी नाराजगी पैदा कर दी थी. चुनावों में मात खाने के बाद अब एक बार फिर से परमेश्वर के समर्थक उन्हें उपमुख्यमंत्री के पद पर बिठाए जाने की मांग कर रहे हैं. इसके परिणामस्वरूप राज्य के मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख के बीच फिर टकराव पैदा हो गया है.

स्वाभाविक ही है कि पार्टी के भीतर उपजे विद्रोह के निशाने पर सिद्धरमैय्या हैं. ऊर्जामंत्री और राज्य के प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले नेता डॉ. शिव कुमार के नेतत्व में पार्टी के पुराने नेता गोलबंद होकर सिद्धारमैय्या को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक इस मांग को गंभीरता से नहीं लिया है, लेकिन विरोधियों को पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में वे अपनी बात मनवा लेंगे.

दिल्ली में एक कांग्रेस नेता अपना नाम न छापने की शर्त पर इस बात की पुष्टि करते हैं कि इतनी बड़ी हार के बाद तमाम राज्य इकाइयों में अंदरूनी कलह मच गई है. वे बताते हैं, ‘नौ सीटों पर पहले ही हमारी हार तय हो चुकी थी. हमने नंदन निलेकणी जैसे गौड़ सारस्वत ब्राह्मण को ऐसी सीट से टिकट क्यों दिया जहां ब्राह्मण मतदाता सिर्फ एक फीसदी है?’ वे बेलगाम, सिमोगा, मंगलोर समेत उन सीटों की पूरी सूची गिनाने लगते हैं जिन पर सिर्फ सावधानी से उम्मीदवार का चयन करके जीत हासिल की जा सकती थी. वे कहते हैं, ‘मंगलोर की सीट प्राइमरी सिस्टम की असफलता का उदाहरण है. सदस्यों ने स्वामिभक्ति का परिचय दिया और जनार्दन पुजारी प्राइमरी जीत गए, जबकि हमें वहां से किसी युवा नेता को चुनना चाहिए था. शिमोगा में हमने येदियुरप्पा के सामने एक बंट समुदाय के नेता को टिकट थमा दिया जबकि वह सीट इडीगा, वोक्कालिगा, लिंगायत और मुसलिम अधिकता वाली है. बंट बहुत कम हैं वहां पर. इसी तरह कोप्पल में पिछड़ा जाति के कुरुबा को उम्मीदवार बनाया जबकि वहां से किसी लिंगायत को टिकट देना चाहिए था.’

इधर, कांग्रेस अपने जख्मों को सहलाने में लगी हुई है और दूसरी तरफ भाजपा के नेताओं को अपने शीर्ष नेतृत्व की ओर से एक महत्वाकांक्षी संदेश भेजा गया है. संदेश की बाबत भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हमारा लक्ष्य स्पष्ट है- कांग्रेस मुक्त कर्नाटक. हमंे इसके लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी है. कांग्रेस खुद ही टूट रही है. समय आने पर हम निर्णायक प्रहार करेंगे.’

भाजपा नेता इसके अलावा तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पार्टी की पहुंच बढ़ाने की जरूरत भी बताते हैं. गौरतलब है कि इन राज्यों में भी भाजपा ने पहली बार ठीकठाक प्रदर्शन किया है. अगर भाजपा के इस नेता पर यकीन करें तो आने वाले समय में पार्टी इन राज्यों में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए बड़ी मात्रा में संसाधन झोंकने जा रही है. खुद के लिए या अपने नजदीकियों के लिए कोई मंत्रीपद न पाने के बावजूद येदियुरप्पा की नाराजगी फिलहाल दूर हो गई है क्योंकि मोदी ने खुद उन्हें पार्टी की बेहतरी का काम सौंपा है.

इस बीच 26 मई को बीजापुर में भाजपा समर्थकों की एक विजय रैली दंगे में परिवर्तित हो गई. कहा जा रहा है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के ऊपर गुलाल फेंकना शुरू कर दिया था. इस मामले में भाजपा नेता बी पाटिल यतनाल और उनके 26 समर्थकों पर गैर जमानती धाराओं में मामला दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया गया है. यतनाल पिछली एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री थे.

कांग्रेस की जो हालत है उसमें कर्नाटक का फिर से भगवा किले में तब्दील होना लगभग तय है.