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ज्यों नावक के तीर

दूर तक चुप्पी मदन कश्यप का नया कविता संग्रह है. इससे पहले उनके तीन कविता संग्रह- लेकिन उदास है पृथ्वी, नीम रोशनी में और कुरुज प्रकाशित हो चुके हैं. बिहारी के लिखे छोटे लेकिन प्रभावशाली दोहों के बारे में कहा जाता था- सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर, देखन  

मुद्दों की गहरी पड़ताल

डा. चैतन्य प्रकाश की पुस्तक ‘विषयांतर’ पिछले 10 वर्षों में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों का संकलन है जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, कला, साहित्य, आध्यात्म आदि पर लिखे लेख शामिल हैं. यह संग्रह साहित्यिक पत्रकारिता की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है. पुस्तक आध्यात्म की जमीन से उपजे विचारों की बात  

बदलते गांवों की कहानियां

सूर्यनाथ सिंह के नए कहानी संग्रह ‘धधक धुआं धुआं’ के केंद्र में गांव है. इस संग्रह में शामिल छह कहानियों को गांवों पर लिखी गई बेहद सशक्त कहानियां करार दिया जा सकता है. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि उदारीकरण के बाद के दौर में गांवों पर लिखने और बगैर अतीतजीवी हुए  

गागर में सागर भरने की कोशिश

साप्ताहिक समाचार पत्रिका शुक्रवार की साहित्य वार्षिकी प्रकाशित हो चुकी है. साहित्य केंद्रित इस अंक में संस्मरण और यात्रा वृत्तांत जैसी उन विधाओं को प्रमुखता दी गई है जिन पर इन दिनों अधिक जोर है. राजेंद्र माथुर, धर्मवीर भारती, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, नरेश सक्सेना, अरविंद कुमार, निदा  

एक और पूर्वज से संवाद

युवा कवि यतीन्द्र मिश्र के नए कविता संग्रह ‘विभास’ को नया कहने की कई वजहें हैं. एक तो यह अभी-अभी प्रकाशित हुआ है, लेकिन उससे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संग्रह में यतीन्द्र ने कबीर बानी और कबीरी पदों के प्रचलित संदर्भों से अलग मायने पेश किए हैं. गुलज़ार,  

वर्तमान का दस्तावेजीकरण

आलोचक भले ही कहते हों कि यह कविता का नहीं कहानियों का युग है लेकिन फिर भी कुछ कवियों ने हमें चौंकाना नहीं छोड़ा है यह शुभ संकेत है. कविताएं लिखी जा रही हैं और खूब लिखी जा रही हैं. फेसबुक आदि माध्यमों ने तुरंत कवियों की एक पूरी पीढ़ी  

इतिहास के दो आख्यान
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पुस्तक: इतिहास के दो आख्यान लेखक: प्रियंवद मूल्य: 600 रुपये पृष्ठ: 511 प्रकाशन: वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर मेरे प्रिय कथाकार प्रियंवद प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के विद्यार्थी भी रहे हैं.  इतिहास पर उनकी एक पुस्तक ‘भारत विभाजन की अंतःकथा’ (1707 से 1947 तक ) कुछ साल पहले प्रकाशित हुई थी. हाल ही में इतिहास  

अनबूझ अनुवाद

‘प्रकाशक प्रति शब्द 10 या 15 पैसे देता है. इसके बाद आप उम्मीद करें कि बढ़िया अनुवाद हो जाए. क्या यह संभव है? ‘विश्व क्लासिकल साहित्य शृंखला (राजकमल प्रकाशन) के संपादक सत्यम के ये शब्द उस बीमारी की एक वजह बताते हैं जिसकी जकड़ में हिंदी अनुवाद की दुनिया आजकल