आपबीती Archives | Page 2 of 5 | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
मेरा सुधार मां के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी…

‘एैसेई मरता-मारता फिरता रै कर पूरा दिन. तुझै सरम तो बिल्कुल रई नाय. जब देखो तब कोई न कोई तेरी शिकायत ई लिए खड़ी रैवै है. मैं तो छक गई तुझसै. इससै तो अच्छा था पैदा होते ई तेरा टैंटवा दबा देती’ मां मुझे देखते ही ऐसे ही अक्सर चिल्लाया  

‘मुझे बस यही समझ में आया कि मेरे जैसों की मुक्ति किताबों के माध्यम से ही संभव है’

बोकारो में पापा की पोस्ट ऑफिस में नौकरी से घर का गुजारा किसी तरह चल जाता था. उन दिनों काॅलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने का जिक्र करने पर माली हालत की वजह से पापा ने साफ मना कर दिया था. मैंने सुना था कि दिल्ली में लोग ट्यूशन  

‘हत्या के उस सजायाफ्ता कैदी से जिंदगी हिम्मत से जीने की सीख मिलती है’

2013 में जेलर की हैसियत से बाराबंकी जेल में मेरी तैनाती हुई थी. रोजाना रात में मैं जेल की गश्त पर निकलता था. दिसंबर की उस रात की हाड़ कंपाती ठंड से बचने के लिए जेल का हर कैदी गुड़ी-मुड़ी होकर काले मोटे कंबलों की आगोश में था. जेल की  

‘मन में बसी महादेव की मूर्ति पूरी तरह से ढह चुकी थी और मैं वापस घर लौट आया’

बात साल 2007 की है. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए प्रथम वर्ष का छात्र था. सावन के महीने में एक दिन अचानक दोस्त के साथ झारखंड के देवघर में शिवजी को जल चढ़ाने के लिए निकल पड़ा. सफर ऐसा था कि सुल्तानगंज पहुंचते-पहुंचते बदन का हर हिस्सा हिल चुका था.  

..तो शायद मैं ये कहानी बताने के लिए जिंदा न बचती

वो ग्रेजुएशन के दूसरे साल के इम्तिहान के दिन थे. हर विषय की परीक्षा के बीच कुछ दिन की छुट्टी होने के कारण जिस दिन परीक्षा होती थी उसके बाद का समय मौज-मस्ती के नाम होता था. यह शादियों का सीजन था. संयोग से उस रोज गांव में कई शादियां  

‘जब पोखरण परीक्षण की जगह गांव में बम गिराए जाने की अफवाह उड़ गई’

यह घटना वर्ष 1974 की है. उस समय देश की सरकार ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण किया था. उस वक्त टोंक जिले के ‘माता का भुरटिया’ नाम के हमारे गांव में अफवाह फैली कि आज हमारे देश में बम गिरने वाला है. अब गांव के उन  

अजनबी शहर के अनजान लोगों  का कर्ज

उस रोज का वाकया जेहन में आज भी ताजा है. मौत एकदम करीब नजर आ रही थी. पहली दफा खुद के खर्च हो जाने का डर लग रहा था. इसका जिक्र बस इसलिए कि दुनिया में अब भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है. जिन्होंने अनजान शहर में मुझ पर  

‘लड़कियों के साथ बदतमीजी करने वाला आज बिहार का प्रतिष्ठित नेता है’

बात तब की है जब पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट पास कर ताजा-ताजा निकला था और पास ही स्थित बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (आज का एनआईटी) पटना में एडमिशन लिया था. दोनों संस्थानों के बीच फासला महज चंद कदमों का ही था मगर वातावरण में जमीन-आसमान का फर्क था. ‘भावुक  

झाड़ू लगाकर कमाए गए दो रुपये आज भी याद हैं

बात शायद 1996-97 की है. हम अविभाजित उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले में सराईखेत नाम के गांव में रहते थे. पिताजी फौज में थे और मां स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारी के बतौर वहीं तैनात थीं. ये वो दौर था जब कुमाऊं-गढ़वाल के उस सुदूर इलाके में मेरे माता-पिता का सरकारी  

‘फैसले की तारीख करीब थी और सब एक-दूसरे के प्रति आशंकित होने लगे थे’

बात उन दिनों की है जब मै रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर था, दोस्तों के साथ विभाग के बाहर सामने बरगद पेड़ के पास बने चबूतरे पर रोज ‘छात्र संसद’ लगती थी. यहां हम मित्रों के बीच अंतरंग बातों के अलावा देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हालात