उपन्यास अंश: और सिर्फ तितली

0
476

Titli

वह शायद तितली ही थी. तितली जैसी खूबसूरत. तितली की ही तरह उड़ती थी. कभी इधर फुदक कर बैठती तो कभी उधर. रंग-बिरंगी तितलियों जैसे ही उसके सपने रंग-बिरंगें थे. सपने थे कि उससे कई बार रूठे, लेकिन उसने तितली जैसी अपनी सोच नहीं बदली. तितली तो ऊंची उड़ान भर नहीं सकती थी. लेकिन उसके सपनों में ऊंची उड़ाने आती थीं. उड़ने के लिए वह कई बार तितली से चील बन जाती थी. घोसले से अपना निवाला खींच लाने वाली शिकारी निगाहों के साथ. असल में वह चील बनना नहीं चाहती थी. वह तितली ही रहना चाहती थी. दमकते और महकते रंग-बिरंगे फूलों के बगीचों को ही अपना रैन बसेरा बनाना चाहती थी. लेकिन उसे तितली नहीं रहने दिया गया और वह चील बन गई. दिलचस्प यह था कि उसने चील के गुणों को अपनाया दुर्गणों को नहीं. चील की तरह कभी उसने अपने भाई-बंधुओं को अपना निवाला नहीं बनाया. कई बार उसे इस बात पर असमंजस भी होता था कि आखिर वह चील है या कि तितली. इस द्वंद्व के बावजूद वह चील में तितली बनी रही. तितली. सिर्फ तितली.

उस दिन की सुबह कुछ अजीब सी थी. सोफिया स्कूल की हवा में उदासी भी थी और खुशी का आलम भी. जनवरी के दिन थे. सूरज तो पूरब से निकला था. लेकिन कोहरे के बीच में उसकी चमक धुंधला सी गई थी. किरणें तो उससे फूटी थीं लेकिन बादलों को चीरने का उनमें शायद माद्दा नहीं था. घंटी बज चुकी थी. एसेम्बली के लिए बच्चे मैदान में एकत्रित हो गए थे. अधिकांश बच्चों ने अपने वजन से अधिक ऊनी कपडे़ पहन रखे थे. कुछेक बच्चों के पास ठंड से लड़ने वाले पर्याप्त स्वेटर और जैकेट नहीं थे. ऐसे बच्चों के गालों पर गुलाबी चमक साफ दिख रही थी. शायद ठंड से उनके गाल जल गए थे. वे दांत किटकिटाकर ठंड से लड़ने की अधूरी लड़ाई लड़ रहे थे. कहने को तो सोफिया स्कूल इंटरनेशनल स्कूल था. लेकिन गरीब बच्चों को यहां दलितों की ही तरह देखा जाता था. स्कूल में ये बच्चे कोढ़ में खाज की तरह थे. स्कूल मैनेजमेंट को गरीब बच्चों को लेना अनिवार्य था, क्योंकि वे सरकारी जमीनों में बने थे और तमाम अनाप-सनाप सुविधाएं लेते थे. लेकिन मैनेजमेंट गरीब कोटे से आने वाले छात्रों के साथ वह हर बदसलूकी करता था, जिससे वह अपनानित हों और खीज कर घर बैठ जाएं. कई बच्चे तो घर बैठ भी जाते थे. लेकिन कुछ बच्चे पूरी ढिठाई के साथ जमे रहते थे. वे यह मान लेते थे कि अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए यदि वे पैसे नहीं दे सकते हैं तो उन्हें अपमान से उसकी कीमत चुकानी ही होगी. ऐसे ही बच्चों में एक था उदय प्रकाश.

बात छूट न जाए खुशी और उदासी की. असल में उस दिन बच्चों को अपने मन का ब्रेकफास्ट लाने की उनकी तान्या मैम ने छूट दी थी. वजह थी उनका क्लास में आखिरी दिन होना. स्कूल में घर से खाने-पीने का सामान लाने की मनाही थी. स्कूल में ही उन्हें कांटीनेंटल से लेकर देसी हर तरह का खाना-नाश्ता मिलता था. खाने के नाम पर मैनेजमेंट मोटी फीस वसूलता था. उस दिन सैंडविचेस, चिप्स, चाकलेट, केक्स, पास्ता वगैरह-वगैरह सब कुछ मेनू में था. सबकी अपनी-अपनी पसंद का. यहां बात जरूर बता देना चाहिए कि गरीब बच्चों के हिस्से स्कूल से मिलने वाले खाने का एक टुकड़ा भी नहीं आता था. वे अपनी रूखी-सूखी घर से लाते थे. बच्चों के लिए दुख की बात यह थी कि अब अगली क्लास में उनकी तान्या मैम उनके साथ नहीं रहेंगी. इसलिए बच्चों के चेहरों में एक अजब सी उदासी थी. पहली कक्षा के इतने छोटे बच्चे भी सामूहिक रूप से उदास हो सकते हैं किसी के लिए, यह यहां देखने की बात थी. उदासी और खुशी के बीच क्लास रूम में जबर्दस्त पार्टी हुई. सबने मिलकर खाया-पीया. नो लड़ाई-झगड़ा. पार्टी के बाद सभी बच्चे स्कूल बस में बैठ कर स्पोर्ट कामप्लेक्स गए. वहां फोटो सेशन होना था. बस में सभी बच्चे तान्या मैम के साथ सीट साझा करना चाहते थे. लेकिन तान्या मैम तो अकेली थी सबके साथ बैठ नहीं सकती थीं. बच्चे आपस में तान्या मैम के साथ बैठने के लिए बस में गुत्थम-गुत्था हो गए. तभी तान्या मैम जोर से चीखीं- ‘तुम सब इस तरह से करोगे तो मैं बस से उतर जाऊंगी और फोटो भी नहीं खिचवाऊंगी.’

इस चीख के साथ ही बच्चे एक-एक करके अपनी सीटों में चुपचाप जा बैठे. तान्या मैम ने तय किया कि वह सारन्या के साथ बैठेंगी. सारन्या तान्या मैम पर अपना अधिकार समझती थी. तान्या की असल चेप थी सारन्या. जहां-जहां तान्या मैम वहां-वहां सारन्या. अपनी छोटी से छोटी बात वह तान्या मैम को बता देती थी. सारन्या देखने में भी बिल्कुल गुड़िया सी थी. तान्या मैम भी किसी गुड़िया से कम नहीं लगती थीं. छोटे कद की गोल-मटोल. खिला-खिला रंग. गालों में डिंपल. और काटन के रंग-बिरंगे एथनिक कपड़ों की शौकीन. टिच-विच रहने वाली. दिल्ली में यह उनके करियर की पहली नौकरी थी. उनकी उम्र कोई ज्यादा नहीं थी. स्कूल में सभी टीचर उन्हें बच्चा टीचर समझते थे. वजह थी कि अधिकांश टीचरों की उम्र चालीस के आसपास थी या फिर उससे ज्यादा. उपदेश देना तो उनका बनता था. कुछ अधेड़ टीचरें भी थीं, जो शायद टीचिंग को नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं समझती थीं. कम उम्र की होने के चलते हर टीचर तान्या मैम को उपदेश दे कर चलते बनता था. वैसे थी वह बेहद होशियार. मौके की नजाकत के चलते ही वह टीचरों के मुंह नहीं लगती थी. वह तर्कों के साथ पलटवार कर सकती थी, लेकिन नौकरी कच्ची होने के चलते वह ऐसा नहीं करती थी. वैसे वह चाह ले तो किसी की भी ऐसी-तैसी करने में पूरी सक्षम थी. अतीत के कारनामे उनके बेहद हैरतंगेज और खतरनाक रहे हैं. उनके कारनामों पर आगे कहीं.

सारन्या को किसी ने कभी चुप बैठे नहीं देखा था. चुलबुली. शैतानों की नानी. उस दिन वह तान्या मैम के पास बस चलने के बाद काफी देर तक चुप बैठी रही. मौका देख कर उसने तान्या मैम के गालों में हाथ फेरते हुए हवा में एक किस उछाल दिया. फिर धीरे से बोली- ‘मैम आप गुस्सा न करो तो मैं एप्पल जूस पी लूं.’

इतनी प्यारी रिक्वेस्ट के आगे तान्या मैम न ना कर सकीं. उन्होंने हां में अपना सिर हिला दिया. तान्या ने अपने बैग से एप्पल जूस निकाला और चोरी-चोरी शिप करने लगी. बस के दूसरी ओर सीट पर बैठी सुप्रिया गुलाटी को यह नागुजार लगा. वह अंदर से सुलग उठी. वैसे तो वह तत्कालिक प्रतिक्रिया दे सकती थी. लेकिन बात को मन में लेकर बैठ गई. ऐसे मामलों में वह किसी की परवाह नहीं करती थी. एक बार तो उसने स्कूल की एकेडमिक हेड इशीता पास्ता को पेपर वेट खींच कर मार दिया था. उस इशीता पास्ता को जिससे पूरा स्कूल थरथराता है. उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपने ऑफिस में सुप्रिया के गाल प्यार से थपथपा दिए थे.

बस स्पोर्टस कामप्लेक्स पहुंच चुकी थी. मैडम  तान्या सबसे पहले बस से नीचे उतरी और एक-एक कर बच्चों को उतारने लगीं. तभी सारन्या अपने नन्हें हाथों में अपना और मैडम का बैग लिए उतरी. तिरछी नजरों से उसने पहले मैडम को देखा. कुछ-कुछ तुतलाते हुए लाड़ से बोली- ‘आप भी मैम कितनी भुलक्कड़ हो कि अपना बैग ही सीट पर छोड़ आईं. अगर मैं न होती तो बैग कोई चुरा लेता.’

इस पर तान्या मैम मुस्करा दीं और उसके नन्हे हाथों से उन्होंने बैग ले लिया. सारन्या की इस अदा पर तान्या मैम को दुलार आ गया और उन्होंने उसे गोद में उठा लिया. सारन्या को मैम की गोद में देख कर सुप्रिया अंदर से भभक पड़ी. वह कुछ हरकत करती की उससे पहले सारे बच्चे फोटो सेशन के लिए कामप्लेक्स में बने एक स्टेज पर की ओर बढ़ गए. तान्या मैम ने लंबाई के हिसाब से बच्चों का जमाना शुरू किया, ताकि किसी बच्चे का फोटो में चेहरा न छिप जाए. सुप्रिया की लंबाई कुछ बच्चों से ज्यादा थी. नतीजतन उसे दूसरी पंक्ति में दाहिने ओर जगह मिली. उसने देखा कि मैम की चहेती सारन्या पहली पंक्ति में बीचों बीच खड़ी है. अब सुप्रिया के गुस्से की कोई सीमा नहीं रही. वैसे भी कोई कैसे सोचता है, क्या करता है, क्या बोलता है, वह इन सबसे बेपरवाह थी. वह क्लास में भी अकेले रहने वाली लड़की थी. दूसरे बच्चे उससे दूरी बना कर ही चलते थे. वह आवाज, सुंगध, स्पर्श, प्यार, घूरने आदि किसी बात पर रिएक्ट कर सकती थी. उसे दुनिया के हर शख्स से संवाद में मुश्किल होती थी. अपने माता-पिता से भी. उसकी अपनी दुनिया थी या फिर यूं कहा जा सकता है कि वह उसमें बचपन से जकड़ी हुई थी. असल में सुप्रिया ऑटिज्म नामक बीमारी से ग्रस्त थी. ऑटिज्म एक प्रकार का न्यूरो बिहैविरल डिसआर्डर है. इसके लक्षण तीन-चार साल की उम्र से दिखने लगते है. आसपास के बच्चे जब खेलकूद में लगे रहते थे, तो सुप्रिया अपनी दुनिया में खोई रहती थी. उसे खिलौनों से भी नफरत थी. उसने कीमती से कीमती खिलौनों को कबाड़ बना दिया था.

सुप्रिया को असमाजिकता का दौरा पड़ा. वह अपने से बाहर हो गई. पंक्ति को तोड़ते हुए वह सीधे फोटोग्राफर के पास पहुंची और उसके कैमरे की बेल्ट से लटक गई. वैसे तान्या मैम और बच्चे उसकी ऐसी हरकतों से वाकिफ थे, तो तमाशा को सबने तमाशा न समझा. तान्या मैम सारन्या की ही तरह सुप्रिया का भी बहुत ख्याल रखती थी. उन्होंने सुप्रिया को काबू करने की कोशिश की, लेकिन वह काबू नहीं हुई. अंतत: वह फोटो शूट में शामिल नहीं हुई. उसके बिना ही फोटो शूट हुआ. तान्या मैम को इस बात से बहुत दुख हुआ. वह स्कूल लौटते हुए बस से लेकर क्लास तक उसके साथ रहीं. उसे दुलारा-पुचकारा. वह तब जा कर शांत हुई, जब तान्या मैम ने सायोना के कैमरे उसे उसके साथ फोटो खिंचवाई.

लंच ब्रेक की घंटी बज चुकी थी. पार्टी तो पहले ही हो चुकी थी, तो सबके पेट फुल थे. बच्चे अपने-अपने कैमरे से मैम के साथ फोटो खिंचवाने लगे. तभी उदय प्रकाश ने अपने टिफिन से केक का एक टुकड़ा निकाला. बीते कल उसका जन्मदिन था. वैसे तो हर बच्चे के जन्मदिन पर क्लास में हैप्पी बर्थडे मनाया जाता था. जिस बच्चे का जन्मदिन होता था, वह बच्चा अपने घर से सबके लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लाता था. और केक भी कटता था. लेकिन उदय प्रकाश के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह क्लास की इस रस्म को पूरा कर सकते. वे एक सामान्य से चौकीदार की नौकरी करते थे और कल्लन साहब की कोठी के आउट हाउस मे रहते थे. कल्लन साहब नेक दिल इंसान थे. उन्हीं की बदौलत उदय प्रकाश को सोफिया इंटरनेशनल में एडमीशन मिल गया था. पिता तो पिता ठहरे. वे उदय प्रकाश का मन नहीं दुखाना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने उदय प्रकाश का मन रखने के लिए अपने घर में ही एक छोटा सा केक कटवा दिया था, ताकि उसे दुख न हो. उसी केक का एक टुकड़ा वह अपनी गुरू मैम के लिए लाया था. शायद गुरू दक्षिणा के तौर पर. सहमे हुए उसने केक का टुकड़ा मैम की तरफ यह कहते हुए बढ़ाया- ‘मैम इनकार मत करियेगा. बडे़ दिल से लाया हूं. कल मेरा जन्मदिन था. खाने से इंकार करेंगी तो मैं तो नाराज नहीं होऊंगा ये केक नाराज हो जायेगा.’

तान्या मैम इमोशनल हो गईं उसकी इस बात पर. उन्होंने कहा- ‘ये तो मैं खा ही लूंगी पर तुमने कल क्यों नहीं बताया कि तुम्हारा जन्मदिन था. हम सब मिलकर मनाते. चलो कोई बात नहीं आज हम सेलीब्रेट करेंगे तुम्हारा जन्मदिन. बिलेटेड़ हैप्पी बर्थ डे.’

प्यार भरी फटकार उदय प्रकाश को सुनाने के बाद तान्या मैम ने कैंटीन से सैंडविच और चाकलेट मंगवाए. और धूमधाम से उदय प्रकाश का जन्मदिन मनाया. जो बच्चे उदय प्रकाश को अपने से अलग मानते थे, उन्होंने भी उसे विश किया. असल में इस तरह के स्कूलों में नव कुबेर के बच्चे पढ़ते हैं. उनकी दुनिया अमीरी और गरीबी में बंटी होती है. उनके विकास की पहली अंतिम शर्त भेदभाव होती है. ऐसा उनके परिवार के लोग सिखाते हैं. ऐसी बात उन्हें सिखाई जाती है, जो उनके निश्छल मन में होती ही नहीं है. ये गंदा है वो गंदा है, यहां से चीजें शुरू होती है. तान्या मैम ने उनके मनों में उदय प्रकाश के प्रति हमदर्दी पैदा करके इस खाई को पाटने की कोशिश की. लेकिन वे जिस समाज में रहते हैं, क्या वे इस सबक को याद रख पायेंगे. याद रखने की कोशिश भी करें ये तो भी शायद ये ज्ञान की ऊंची इंटरनेशनल दुकानें उन्हें ऐसा न करने दें. आखिर गंदा है पर धंधा जो ठहरा.

अब विदाई का समय आ गया था. बच्चों को पता था कि उनका आज इस क्लास में आखिरी दिन है. तान्या मैम अब अगले क्लास में उन्हें नहीं मिलने वाली हैं. बच्चों की आंखें भर आईं थीं. नंदनी ने तान्या मैम को अपने हाथों से बनाया एक चित्र भेंट किया. उस चित्र में रंग बिरंगें फूल थे. उसमें एक तितली भी थी. उसमें लिखा था- ‘आई लव यू तान्या मैम…’

(वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here