
तहलका डेस्क।
तिरुवनंतपुरम। Kerala की राजनीतिक आबोहवा में जब भी सांप्रदायिकता की बहस छिड़ती है, तो वहां की जड़ों में बसी साझी संस्कृति अक्सर जवाब बनकर उभरती है। हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर इसी सच्चाई पर मुहर लगा दी है, जिसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने ‘Real Kerala Story’ का नाम दिया है।
तिरुवनंतपुरम से सांसद Tharoor ने परिणामों का विश्लेषण करते हुए उन ताकतों को आड़े हाथों लिया जो राज्य की छवि को एक खास फिल्म के जरिए नकारात्मक रूप से पेश करने की कोशिश कर रही थीं। उनके अनुसार, ये नतीजे सिर्फ एक राजनीतिक हार-जीत नहीं हैं, बल्कि उस नफरती नैरेटिव की हार है जो केरल की समावेशी पहचान को चोट पहुँचाने के लिए गढ़ा गया था।
थरूर ने बड़े ही तार्किक ढंग से उन आंकड़ों को सामने रखा जो केरल की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की गवाही देते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे राज्य के मतदाताओं ने निर्वाचन क्षेत्रों की जनसांख्यिकी को धता बताते हुए केवल उम्मीदवार की योग्यता और सेवा को प्रधानता दी। उदाहरण के तौर पर, थावनूर (Thavanur) जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में जनता ने एक ईसाई उम्मीदवार वीएस जॉय (V.S. Joy) पर भरोसा जताया।
इसी तरह, हिंदू बहुल कलामासेरी में मुस्लिम उम्मीदवार वीई अब्दुल गफूर की जीत और ईसाई बहुल कोच्चि में मोहम्मद शिया का चुना जाना यह साबित करता है कि यहां का आम आदमी वोटिंग मशीन के सामने खड़ा होकर मंदिर, मस्जिद या चर्च के बारे में नहीं, बल्कि विकास और भाईचारे के बारे में सोचता है। शशि थरूर का यह बयान दरअसल उस ‘Identity Politics’ पर कड़ा प्रहार है जो देश के कई हिस्सों में हावी होती जा रही है।
उन्होंने स्वीकार किया कि हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण की कोशिशें बढ़ी हैं और उनका आंशिक असर भी दिखता है, लेकिन केरल का सामाजिक ताना-बाना आज भी इतना मजबूत है कि वह ऐसी लहरों को सोख लेता है। यहां के लोग पहले एक-दूसरे को ‘मनुष्य’ के रूप में देखते हैं, उसके बाद उनकी धार्मिक पहचान आती है। यह सामाजिक परिपक्वता ही केरल को देश के अन्य राज्यों के लिए एक मार्गदर्शक ‘मॉडल’ बनाती है।
बहरहाल, थरूर ने यह स्पष्ट कर दिया कि केरल की असली कहानी ‘Love Jihad’ या काल्पनिक धर्मांतरण की कहानियों में नहीं, बल्कि उन गलियों और मोहल्लों में है जहां अलग-अलग आस्थाओं के लोग मिलकर एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। चुनाव परिणाम इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि नफरत की बिसात पर सौहार्द की जीत संभव है, बशर्ते मतदाता जागरूक हो और अपनी साझी विरासत पर गर्व करता हो। केरल ने एक बार फिर पूरे देश को संदेश दिया है कि लोकतंत्र की मजबूती मतपेटियों में बंद पर्चियों से नहीं, बल्कि दिलों के जुड़ाव से तय होती है।



