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तीन साल में 1426 तकनीकी खराबियां, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली , 23 जून- देश की प्रमुख विमानन कंपनियों में बीते तीन वर्षों के दौरान तकनीकी गड़बड़ियों के 1426 मामले सामने आए, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने किसी भी कंपनी को न तो कोई नोटिस भेजा है और न कोई सख्त कार्रवाई की गई है । संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है।
नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले तीन वर्षों (2022 से 2024) के दौरान देश में आठ कंपनियों के विमानों में तकनीकी खराबी की 1426 घटनाएं सामने आई हैं। सबसे अधिक त्रुटियाँ इंडिगो (717), स्पाइसजेट (327) और एयर इंडिया लिमिटेड (220), एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड (93) विमानों में पाई गईं। हालाँकि, नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने पिछले एक साल में एक भी कंपनी को नोटिस जारी नहीं किया है और एक भी कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। एयर एशिया, अलायंस एयर, विस्तारा और अक्सा एयर के विमानों में भी मामूली स्तर की खामियां दर्ज की गईं।
12 जून को अहमदाबाद में एयर इंडिया के बोइंग-787 ड्रीमलाइनर विमान के हादसे में 241 यात्रियों और कर्मचारियों, साथ ही 29 मेडिकल छात्रों की मौत हुई थी। इस बड़े हादसे के बाद DGCA ने पहली बार कोई ठोस कदम उठाया और एयर इंडिया के तीन अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश दिए। इससे पहले किसी भी मामले में कोई जवाबदेही तय नहीं की गई थी।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय की वेबसाइट पर 2023-24 की सालाना रिपोर्ट तो मौजूद है, लेकिन 2021-22 और 2022-23 की रिपोर्टें नदारद हैं। वहीं, 2024-25 की रिपोर्ट वेबसाइट पर खुल ही नहीं रही। DGCA की वेबसाइट पर 1960 से 2011 तक की दुर्घटनाओं की जानकारी है, लेकिन उसे आखिरी बार 1 जुलाई 2015 में अपडेट किया गया था। अंतिम दुर्घटना जांच रिपोर्ट 2002 की है। बेल 206 बी-3, वीटी-डीएपी हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी, पायलट कैप्टन जी वी मेनन और बालयोगी के निजी सचिव के.एस. राजू की मौत हो गई थी। वेबसाइट पर कोई अनुवर्ती जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।
विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जुलाई 2012 से 2025 तक कुल 102 विमान दुर्घटनाएं हुई हैं। सबसे अधिक 12 दुर्घटनाएं 2022 में हुईं। इसी अवधि में 121 गंभीर घटनाएं भी दर्ज की गईं। सबसे अधिक 27 घटनाएं 2019 में हुईं।
2022 से मार्च 2025 तक विमानों को बम की धमकी से जुड़ी कुल 836 कॉल्स मिलीं। 2024 में ही 728 धमकी कॉल्स आए, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

2022 से 2024 तक कंपनी को मिली तकनीकी खामियां
इंडिगो 717
स्पाइसजेट 327
एयर इंडिया लिमिटेड 220
एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड 93
एयर एशिया 24
एलायंस एयर एविएशन लिमिटेड 20
एक्सटेंशन 17
अक्सा एयर 8

हाइवे और एक्सप्रेस-वे अब सिर्फ सड़कें नहीं, विकास के मानक बनेंगे

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली , 19 जून- देशभर में तेजी से बन रहे नेशनल हाईवे और एक्सप्रेस-वे अब सिर्फ यात्रा के साधन नहीं रहेंगे, बल्कि ये सामाजिक और आर्थिक विकास के मापदंडों पर भी परखे जाएंगे। केंद्र सरकार अब यह देखेगी कि इन सड़कों से जनता को क्या वास्तविक लाभ हो रहा है.जैसे यात्रा में समय की बचत, ईंधन खर्च में कमी, सड़क सुरक्षा में सुधार और स्थानीय लोगों की जिंदगी में बदलाव।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 5 जून को इसके लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मंत्रालय ने बताया कि सभी हाईवे और एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं के प्रभाव को पांच प्रमुख क्षेत्रों में मापा जाएगा। :
इसमें पहला आर्थिक प्रभाव आर्थिक प्रभाव: क्या इन सड़कों से जीडीपी में वृद्धि हो रही है? क्या स्थानीय बाजारों और आर्थिक केंद्रों तक पहुंच आसान हुई है? लॉजिस्टिक्स सुधार: यात्रा में लगने वाले समय और दूरी में कितनी कमी आई है? क्या लॉजिस्टिक्स की लागत घटी है? सामाजिक प्रभाव: क्या लोगों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान हुई है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों की घरेलू आय बढ़ी है? पर्यावरणीय लाभ: ईंधन की खपत घटने से कितना CO2 उत्सर्जन कम हुआ है? सुरक्षा और अनुभव: सड़कों की गुणवत्ता, दुर्घटनाओं की संख्या और उपयोगकर्ताओं की संतुष्टि को कैसे बेहतर किया गया है?
इन परियोजनाओं के प्रभाव का आकलन किसी सरकारी एजेंसी के बजाय स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट से कराया जाएगा। इसके अलावा, हितधारकों जैसे स्थानीय निवासियों, वाहन चालकों और कारोबारियों से बातचीत कर फीडबैक लिया जाएगा।
हाईवे बनने के बाद एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और बड़े बाजारों तक पहुंचने में कितनी तेजी आई? जिला स्तर की जीडीपी, घरेलू आय में वृद्धि में कितना इजाफा हुआ? आसपास वाहनों की बिक्री में कितनी बढ़ोतरी हुई? क्या इन सड़कों से लोगों की आमदनी बढ़ी?
जनता का पैसा केवल सड़क निर्माण में न लगे, बल्कि वह देश के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय विकास में भी योगदान दे।

सड़ांध की सच्चाई: मिलावट का लालच

सड़ांध की सच्चाई: मिलावट का लालच,धीरे-धीरे भारत की जनता को ज़हर देना

बृज खंडेलवाल द्वारा-

जो देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था, आज वहाँ हर रोज़ थाली में छुरी चलाई जा रही है। भारत, जो विश्वगुरु बनने का सपना देख रहा है, वहां मिलावट की अनियंत्रित प्रवृति एक बेरहम गद्दार की तरह चुपचाप लोगों की रगों में ज़हर घोल रही है। अब तो नेचर की फ्री गिफ्ट्स, हवा, पानी भी प्रदूषित हो चुकी हैं देश की पॉलिटिक्स की तरह!!

दूध से लेकर दवा तक, शराब से लेकर शिक्षा तक, हर चीज़ आस्थाओं पर कुठाराघात कर रही है। जितना दुग्ध उत्पादन नहीं, उस से ज्यादा पनीर बिक रही है।

यह केवल धोखा नहीं, बल्कि “जनता की नब्ज़ पर वार” है। सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद कर रहे हैं। यह सिर्फ़ कानून का उल्लंघन नहीं, इंसानियत के खिलाफ़ जुर्म है।”

मिलावट का खेल—ज़हर की पोटली हमारे घर में है। 2019 की FSSAI रिपोर्ट बताती है कि 28% खाद्य सामग्री में मिलावट है। दूध में पानी मिलाना तो अब पुरानी बात हो गई—अब यूरिया, डिटर्जेंट तक मिलाए जाते हैं। हल्दी, मिर्च जैसे मसालों में ऐसे रंग मिलाए जाते हैं जो सीधे कैंसर को न्योता देते हैं। यानी जिसका कोई ईलाज नहीं, वही रोज़ के खाने में घोला जा रहा है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “दुश्मनों की क्या जरूरत, जब शुभ चिंतक ही यमराज की फ्रेंचाइज खोले बैठे हों। नाक के नीचे ढोल बज रहा है और प्रशासन बहरे का नाटक कर रहा है। “मैंने प्लेट में चूहे का टुकड़ा पाया, मेरे दोस्त ने समोसे में दांत! खाद्य निरीक्षक तो जैसे ‘राजा भोज’ बन गए हैं—काम कम, आराम ज़्यादा।”

कानून हैं मगर दाँत नहीं हैं, कहती हैं होम मेकर पद्मिनी अय्यर। 2023 में मात्र 1.2 लाख फूड इंस्पेक्शन—ये तो ऊँट के मुँह में जीरा है। “जाँच हो रही है मगर सिर्फ़ फाइलों में। ज़मीनी हक़ीक़त? ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’।”

और जोशी साहब फरमाते हैं, “नकली शराब—‘जाम-ए-क़ातिल’। 2024 में 200 से ज़्यादा मौतें। मेथनॉल मिला ज़हर, जो आंखों की रौशनी छीन ले या सीधा ऊपर पहुँचा दे। “जो न पीता, वो भी मरा—हवा में घुल चुकी है मौत।”

एनवायरनमेंटलिस्ट डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “कानून ढीले, प्रशासन बेबस, माफिया मज़बूत—“कुर्सी की पेटी बाँध लो, यहाँ इंसाफ़ धीरे चलता है।” दवाओं में धोखा—असली ‘नीम हकीम ख़तरा-ए-जान’। WHO की रिपोर्ट: भारत में बिक रही 10% दवाएं नकली या घटिया। “दवा नहीं, धोखा बिक रहा है। डॉक्टर की जगह दलाल बैठा है।”

एडवोकेट राजवीर सिंह कहते हैं, “यहाँ तो ‘ज़हर भी असली नहीं’ मिलता!”

एजुकेशनिस्ट टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक शिक्षा भी नहीं रही पाक—’डिग्री का सौदा’, ₹10,000 में फर्जी डिग्री, खुलेआम सोशल मीडिया पर विज्ञापन। “लिखे-पढ़े बिना अफ़सर बन रहे हैं लोग—और देश गर्त में जा रहा है।”

लोक स्वर अध्यक्ष राजीव गुप्ता कहते हैं, “नाकाबिल हाथों में देश की सर्जरी करवाना, आत्महत्या से कम नहीं।” इस पूरे सिस्टम की हकीकत—‘ऊपर से शीशा, अंदर से सड़ांध’। कानून काग़ज़ी शेर बन चुका है। प्रशासन या तो सोता है या बिकता है।

एक्टिविस्ट चतुर्भुज तिवारी कहते हैं, “ये विभाग नहीं, मलाई खाने की मशीन है— ‘खाओ, खिलाओ, भूल जाओ’।”

अब क्या किया जाए?

समस्या का हल क़ाग़ज़ी बैठकों से नहीं, बल्कि लोहा लेने वाली नीयत से होगा। तालाब साफ करना है तो मेढ़कों को डिस्टर्ब करने से कैसा डरना।

जनता चाहती है बार-बार मिलावट करने वालों को फांसी या आजीवन कारावास मिले। ब्लॉकचेन जैसे तकनीक से हर चीज़ की ट्रेसबिलिटी हो सकती है।

स्वतंत्र एजेंसियों को दखल मुक्त अधिकार मिलने चाहिए, ‘जो करे गुनाह, उसकी कुर्सी छीनो, शान नहीं।’ “न्याय में देरी, न्याय से इनकार है।”

“मिलावट राष्ट्रद्रोह है—इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”

शशि थरूर ने तोड़ी चुप्पी, कांग्रेस से मतभेद स्वीकारे-पार्टी के भीतर करूंगा चर्चा

अंजलि भाटिया

नई दिल्ली- जून कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पहली बार  पार्टी के साथ  मतभेद होने की बात स्वीकार की. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इन मतभेदों को सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर उठाना पसंद करेंगे। थरूर ने कहा मैं 16 साल से कांग्रेस में हूं। कांग्रेस नेतृत्व में कुछ मुद्दों के साथ मेरे मतभेद हैं। उनमें से कुछ मुद्दे सार्वजनिक डोमेन में हैं। लेकिन मैं इन पर चर्चा पार्टी के मंच पर ही करूंगा। अभी बोलने का समय नहीं है, जब कोई नेता बात करेगा तो मैं भी बात करूंगा। थरूर ने संकेत दिया कि वह उपचुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद उन मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं।   जब उनसे पूछा गया कि वह प्रचार अभियान से अनुपस्थित क्यों थे, तो थरूर ने कहा मैं वहां नहीं जाता, जहां मुझे आमंत्रित नहीं किया जाता है।  उन्होंने कहा कि वायनाड सहित पिछले चुनावों के दौरान भी यही स्थिति थी।थरूर ने कहा हमारे कार्यकर्ताओं ने नीलांबुर में पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम किया है। हमारे पास एक सशक्त उम्मीदवार है और मुझे उम्मीद है कि पार्टी के प्रयासों का बेहतर परिणाम सामने आएगा। थरूर की यह चुप्पी ऐसे समय टूटी है जब केरल की नीलांबुर सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं और वे प्रचार से पूरी तरह दूर रहे। प्रियंका गांधी समेत कई बड़े नेता मैदान में डटे रहे, लेकिन थरूर की दूरी को लेकर अटकलें तेज हैं।थरूर ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका ध्यान भारत के राष्ट्रीय हित पर था। उन्होंने कहा केंद्र ने मेरी सेवाएं मांगी थीं। वास्तव में मेरी पार्टी ने नहीं मांगी। जब देशहित का मुद्दा होता है, तब हम सभी को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए।इसलिए मैंने एक भारतीय नागरिक के रूप में अपना कर्तव्य  निभाया।बॉक्स नीलांबुर सीट कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व विधायक पीवी अनवर के कारण खाली हुई थी। यहां से कांग्रेस ने आर्यादन शौकत को मैदान में उतारा है.

नेशनल हाईवे के लिए 3000 रुपये का सालाना फास्टैग पास, 200 बार टोल प्लाजा पार कर सकेंगे

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली- नेशनल हाईवे पर बार-बार सफर करने वाले वाहन चालकों के लिए केंद्र सरकार ने बड़ी राहत की घोषणा की है। अब सिर्फ ₹3,000 में फास्टैग (FASTag )वार्षिक पास मिलेगा, जिससे 200 टोल यात्राएं की जा सकेंगी। यह योजना 15 अगस्त 2025 से देशभर में लागू होगी। केवल निजी कार, जीप व वैन मालिकों को ही इसका लाभ मिलेगा। सरकार का दावा इस योजना से क्षेत्र के दैनिक सड़क यात्रियों की सालाना कम से कम सात हजार रुपये की बचत होगी।
गडकरी ने कहा कि 3000 रुपये की फास्टैग पास योजना शुरू होने की तारीख से एक साल अथवा 200 यात्रा तक वैध होगी। यानी यदि एक साल से पहले 200 बार यात्रा की तो फास्टैग पुन: रिचार्ज कराना होगा। उन्होंने कहा कि यह योजना सिर्फ निजी वाहनों जैसे कार, जीप, वैन आदि के लिए है, व्यवसासियक वाहन इसके दायरे में नहीं आते हैं।
गडकरी ने कहा कि सालाना पास से देशभर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्बाध एवं लागत प्रभावी यात्रा संभव हो सकेगी। इसके लिए एक लिंक जल्द ही राजमार्ग यात्रा ऐप के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध होगा।
उन्होंने कहा कि यह नीति 60 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले स्थानीय निवासियों की समस्या को दूर करेगा। वर्तमान में उनको रियायती मासिक पास दिया जाता है। इससे प्रतीक्षा समय, भीड़भाड़ को कम करके तथा टोल प्लाजा पर विवादों को न्यूनतम करके इस वार्षिक पास का उद्देश्य लाखों निजी वाहन मालिकों को तीव्र एवं सुगम यात्रा का अनुभव प्रदान करना है।
गडकरी ने कहा कि टोल प्लाजा पर 50 रुपये लेकर सवा सौ रुपये टोल टैक्स की दरें हैं। इस प्रकार 50 रुपये दर से 200 बार टोल प्लाजा पार करने पर यात्री को 10,000 रुपये देने पड़ते हैं। लेकिन फास्टैग पास योजना 3000 रुपये की है। इसी औसत दर 15 रुपये प्रति यात्रा होगा। फास्टैग पास योजना वैकल्पिक होगा। जिनके पास पहले से ही फास्टैग है, उन्हें नया फास्टैग खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी।
इसके अलावा सालाना फास्टैग पास वाहन पर लगे मौजूदा फास्टैग पर सक्रिय किया जा सकता है। इसके लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं. वाहन पर लगा फास्टैग वैध और विंडशील्ड पर ठीक से चिपका हुआ होना चाहिए।फास्टैग वाहन के पंजीकरण नंबर (VRN) से जुड़ा होना चाहिए। चेसिस नंबर वाले फास्टैग मान्य नहीं होंगे और ब्लैकलिस्टेड न हो।
सालाना पास केवल राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) और राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे (एनई) टोल प्लाजा पर ही मान्य है। राज्य सरकारों या स्थानीय निकायों द्वारा प्रबंधित एक्सप्रेसवे, राज्य राजमार्गों (एसएच),पर यह योजना लागू नहीं होगी। इन स्थानों पर फास्टैग पहले की तरह काम करेगा और सामान्य शुल्क कटेगा।

ओपन टोलिंग (जहां दोनों तरफ टोल प्लाज़ा होते हैं) एक दिशा की यात्रा एक ट्रिप मानी जाएगी। क्लोज्ड टोलिंग (जहां एंट्री और एग्जिट के हिसाब से शुल्क लगता है)पूरी यात्रा को एक ट्रिप माना जाएगा।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अनुसार, फास्टैग प्रणाली को अपनाने से वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान टोल प्लाजा पर औसत प्रतीक्षा समय 734 सेकंड से घटकर 47 सेकंड हो गया है।

वन नेशन, वन टाइम” की ओर भारत का बड़ा कदम: अब देश में एक ही समय लागू होगा

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली -भारत सभी क्षेत्रों में एक एकीकृत समय-पालन मानक को कानूनी रूप से लागू करने की तैयारी कर रहा है. आज विज्ञान भवन में उपभोक्ता मामले विभाग ने “वन नेशन, वन टाइम” यानी “एक देश, एक समय” विषय पर एक अहम बैठक की। इस बैठक में देशभर में एक जैसे समय (भारतीय मानक समय – IST) को लागू करने की योजना पर चर्चा हुई।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि अब भारत में सभी कानूनी, सरकारी और व्यापारिक कामकाज IST के अनुसार ही होंगे। इसके लिए नया नियम कानूनी माप विज्ञान (IST) नियम, 2025 जल्द ही लागू किया जाएगा। इससे मोबाइल नेटवर्क, बिजली, बैंकिंग, रेलवे, शेयर बाजार जैसी सेवाओं में एकसमान समय रहेगा, डिजिटल लेन-देन की सुरक्षा, बिलिंग में पारदर्शिता और साइबर जोखिमों को घटाने की दिशा में बड़ा कदम बताया।और इस से कामकाज तेज़, सटीक और सुरक्षित होगा।
देश के पांच शहरों अहमदाबाद, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, फरीदाबाद और गुवाहाटी में आधुनिक प्रयोगशालाएं बनाई जा रही हैं, जो सटीक समय (मिलीसेकंड से माइक्रोसेकंड तक) बताएंगी। यह समय ISRO और CSIR-NPL की मदद से सेट होगा।
सचिव निधि खरे ने कहा कि आज कई सेवाएं विदेशी समय पर चलती हैं, जिससे साइबर खतरे बढ़ जाते हैं। नया नियम भारत को समय के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे जोखिम भी कम होंगे।
इस बैठक में रेलवे, बिजली विभाग, बैंक, शेयर बाजार, इंटरनेट कंपनियों, साइबर सुरक्षा संस्थाओं और उद्योग संगठनों के 100 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सभी ने इस योजना का समर्थन किया।
यह कदम भारत को डिजिटल रूप से मजबूत बनाने और समय में एकरूपता लाने की दिशा में बहुत अहम माना जा रहा है।

सीमा प्रबंधन के लिए भारत में एकीकृत प्राधिकरण की तैयारी, दक्षिण अफ्रीका मॉडल पर हो रहा विचार

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली- देश की सीमाओं पर हो रही घुसपैठ, मानव तस्करी और नशीली वस्तुओं की तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों से निपटने के लिए केंद्र सरकार अब एक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्राधिकरण (Integrated Border Management Authority) के गठन की दिशा में गंभीरता से विचार कर रही है। यह प्राधिकरण दक्षिण अफ्रीका की (साउथ अफ्रीकन बॉर्डर मैनेजमेंट अथॉरिटी) तर्ज पर गठित किया जाएगा, जहां पहले से ही सीमा प्रबंधन के लिए अलग संस्था कार्यरत है।
यह जानकारी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा सांसद डॉ. अजित गोपछडे को लिखे पत्र में दी है। डॉ. गोपछडे ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर एक समन्वित प्राधिकरण की मांग की थी।
भारत की सीमाएँ कुल 22,623 किमी लंबी हैं, जिनमें से 15,106.7 किमी भूमि सीमा और 7,516.7 किमी समुद्री सीमा शामिल है। भारत की सीमाएँ बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान जैसे सात देशों से लगती हैं। इनकी सुरक्षा विभिन्न अर्धसैनिक बलों और एजेंसियों द्वारा की जाती है, जिससे आपसी समन्वय की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
गृह मंत्रालय के सीमा प्रबंधन विभाग ने सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए बाड़बंदी, फ्लडलाइट्स, सड़क निर्माण, सीमा चौकियाँ और तकनीकी निगरानी जैसी कई पहल की हैं। बावजूद इसके, अवैध गतिविधियाँ जैसे कि अवैध घुसपैठ, ड्रग्स की तस्करी और मानव तस्करी अब भी जारी हैं।
डॉ. गोपछडे ने कहा है कि इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को पूरी तरह से रोकने के लिए सीमा सुरक्षा बलों के बीच प्रभावशाली समन्वय की सख्त जरूरत है। इसके लिए एक सशक्त और केंद्रीकृत प्राधिकरण की स्थापना आवश्यक है. डॉ. गोपछडे का मानना है कि जब तक सभी सुरक्षा बलों के बीच ठोस समन्वय नहीं होगा, तब तक इन घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल है।
सीमा सुरक्षा की मौजूदा स्थिति
वर्तमान में भारत की सीमाओं की सुरक्षा इस प्रकार विभाजित है:

देश की सीमासुरक्षा की जिम्मेदारी
बांग्लादेश और पाकिस्तानसीमा सुरक्षा बल (BSF)
चीनभारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP)
नेपाल और भूटानसशस्त्र सीमा बल (SSB)
म्यांमारअसम राइफल्स
भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा (LoC)भारतीय सेना
भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC)भारतीय सेना
समुद्री सीमाभारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और राज्य की समुद्री पुलिस

महाराष्ट्र में फिर हुआ गर्भाशय निकालने का महापाप!

के.रवि (दादा)

ग़रीबी आदमी से क्या नहीं करा लेती है? फिर चाहे वो शरीर की दुर्दशा कराने का काम हो या अपराध करने का काम हो। महाराष्ट्र के बीड ज़िले में क़रीब 843 गन्ना मज़दूर महिलाओं के गर्भाशय निकाल देने की दिल दहला देने वाली घटना फिर से सामने आयी है। ज़िले में कुछ साल पहले भी ऐसी ही घटना सामने आयी थी। बताया जा रहा है कि ऐसा घिनौना काम 30 से 35 साल के आसपास की उम्र की महिलाओं के साथ किया गया है। यह घिनौना षड्यंत्र इन गन्ना मज़दूर महिलाओं के मासिक पीरियड और गर्भ के समय छुट्टी देने से बचने के लिए किया गया है। ऐसी भी ख़बरें कथित रूप से उड़ रही हैं कि जो महिलाएँ गन्ने के खेतों में दिहाड़ी मज़दूरी करती हैं, उनके साथ शारीरिक शोषण भी उनके मालिक लोग और उनको पैसा देकर इन गंदे कामों को करने की सोच रखने वाले आये दिन करते रहते हैं। पर गन्ना खेत मालिकों और ठेकेदारों का कहना है कि महिलाओं ने अपनी दिहाड़ी के नुक़सान से बचने के लिए काम पर जाने से पहले सर्जरी करवाकर अपने गर्भाशय ख़ुद ही निकलवाये हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में भी ऐसा ही कहा गया है। बीड के मातृ एवं शिशु कल्याण अधिकारी डॉ. सचिन शेकड़े ने बताया है कि गन्ना कटाई से पहले और बाद में महिला मज़दूरों के स्वास्थ्य की बारीक़ी से जाँच की जाती है और उनके स्वास्थ्य कार्ड भी बनाकर दिये जाते हैं।

असल में महिला मज़दूरों और उनके घर वालों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं होती है कि वे ऊपर तक पहुँच रख सकें या इन लोगों के ख़िलाफ़ कहीं रिपोर्ट दर्ज कराकर मुक़दमा लड़ सकें। कुछ लोगों ने गुप्त रूप से बताया कि जिन महिलाओं के गर्भाशय निकाले जाते हैं, उनसे और उनके परिवार वालों से मज़दूरी देने का लालच देकर और दबाव बनाकर पहले ही ऐसे दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करवा लिये जाते हैं या अँगूठे लगवा लिये जाते हैं, जिससे गर्भाशय निकलवाने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न हो सके। वर्ष 2019 में भी बीड ज़िले में गन्ना मज़दूरी करने वाली 25 से 30 साल की 4,605 महिलाओं के गर्भाशय गन्ने की कटाई में बाधा पड़ने से बचने के लिए निकाल दिये गये थे। तब भी इसी तरह के बयान देकर गन्ना मज़दूर महिलाओं से काम कराने वालों को ऐसी ही बयानबाज़ी करके बचा लिया गया था। हालाँकि उस समय इस घटना पर विधानसभा में काफ़ी हंगामा हुआ था और इसकी जाँच भी की गयी थी, जिसमें पाया गया कि दो महिलाएँ गन्ना मज़दूर नहीं थीं, पर उनके गर्भाशय भी निकाल दिये गये थे। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले को ज़ोर-शोर से उठाया, पर इस घिनौने अपराध के लिए सज़ा किसी को नहीं मिली।

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि उसकी टीमें 1132 गाँवों में काम कर रही हैं, जिन्होंने गन्ना कटाई करने के लिए 46,231 महिलाओं की जाँच करके उनके स्वास्थ्य कार्ड बनाये हैं। स्वास्थ्य विभाग का ऐसा दावा है कि 15,624 सरकारी डॉक्टरों की सहमति और अनुमति के बाद 279 महिलाओं के गर्भाशय निजी तौर पर निकाले गये हैं। गन्ना मालिकों और ठेकेदारों ने ऐसा कहा है कि जिन महिलाओं के गर्भाशय निकाले गये हैं, उनसे कोई ज़ोर-जबरदस्ती नहीं की गयी है और उनमें ज़्यादातर महिलाओं के बच्चे हैं। इसमें कितनी सच्चाई है? इसकी जाँच स्वास्थ्य विभाग को करनी चाहिए थी; पर स्वास्थ्य अधिकारी तो ख़ुद ही सारा आरोप महिला मज़दूरों पर ही मढ़ रहे हैं, जिन्हें बाहरी दुनियादारी का कुछ पता नहीं है। महाराष्ट्र के कई ज़िलों से भी गन्ने की कटाई करने के लिए बहुत से ग़रीब परिवार बीड ज़िले में हर साल दीपावली के दौरान आते हैं और छ: महीने तक गन्ने की कटाई करने बाद वे दिसंबर से जनवरी तक अपने-अपने घर लौट जाते हैं। बीड ज़िले के ग़रीब मज़दूर परिवार और दूसरे ज़िलों के ग़रीब मज़दूर परिवार गन्ने की कटाई के बाद दूसरी मज़दूरी की तलाश में निकल जाते हैं। इन मज़दूर परिवारों की वार्षिक आय इतनी कम है कि उससे साल भर के गुज़ारे के लिए दो वक़्त की रोटी भी ठीक से नहीं मिल सकती।

बीड ज़िले में गन्ना काटने वाले क़रीब दो लाख मज़दूर बताये जाते हैं, जिनमें 80,000 के क़रीब महिला मज़दूर हैं। ये महिलाएँ अपने घर वालों के साथ हर साल गन्ना कटाई करके गुज़ारा करती हैं। इन मज़दूरों की माली हालत इतनी अच्छी नहीं होती कि पढ़-लिख सकें और अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा सकें। इनकी अशिक्षा का फ़ायदा उठाकर ही इन महिला मज़दूरों के गर्भाशय निकलवा दिये जाते हैं और आरोप भी उन्हीं पर लगा दिया जाता है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट कहती है कि इस साल 1,523 महिला मज़दूर गर्भवती हैं और गन्ने की कटाई कर रही हैं।

विमान हादसा : दु:खद अनहोनी

अहमदाबाद हवाई अड्डे के रनवे-23 से 12 जून को 1:39 बजे उड़ान भरने के कुछ ही सेकेंड बाद जिस तरह एयर इंडिया का विमान एआई-171 अहमदाबाद में ही सिविल अस्पताल के छ: मंज़िला छात्रावास से बुरी तरह टकराया, उससे सब हैरान हैं। सब परेशान हैं कि आख़िर यह कैसे हो गया? ऐसा हादसा भारतीय इतिहास में ही नहीं, दुनिया के इतिहास में नहीं हुआ। विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि उसका ज़्यादातर हिस्सा जल गया। दुर्घटना के कारणों की जाँच के लिए भी एक ब्लैक बॉक्स के अलावा कुछ ख़ास नहीं बचा। इस विमान में क्रू मेंबर समेत 242 लोग सवार थे, जिनमें गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणि समेत 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश नागरिक, सात पुर्तगाली नागरिक, एक कनाडा का नागरिक, दो पायलट, कुछ क्रू मेंबर और कुछ एयर होस्टेस शामिल थीं। लेकिन एक घायल हुए यात्री के अलावा सब मारे गये।

दुर्घटनाएँ होती हैं। लेकिन इस तरह की दुर्घटनाएँ नहीं होतीं। यह दुर्लभ दुर्घटना है, जिसमें असमंजस है। असंभवता है। अनहोनी है। अफ़सोस है। विस्मय है। विह्वलता है। विलाप है। इसके अलावा दुर्घटना को लेकर अनेक अनुमान हैं; लेकिन संदेह भी हैं और सवाल भी हैं। विमान जिस तरह दुर्घटनाग्रस्त हुआ, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसे उड़ाने वाले कैप्टन सुमित सभरवाल एक ऐसे पायलट थे, जिनका विमान उड़ाने का अनुभव लगभग 8,200 घंटे का था और उनके सह-पायलट फ‌र्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर का विमान उड़ाने का अनुभव भी 1,100 घंटे का था। यह कोई छोटा अनुभव नहीं है। कैप्टन सुमित सभरवाल तो इतने अनुभवी थे कि उनसे पायलटों को ट्रेनिंग देने तक की सेवाएँ ली जाती थीं। विमान भी 11 साल पुराना ही था। इतने पुराने विमानों को उड़ान की दुनिया में लगभग नया ही माना जाता है। विमान में उच्च गुणवत्ता वाला 78,000 लीटर एयर टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पैराफिन भरा था, जिससे विमान दुर्घटना के समय भयंकर आग लगी। विमान के दोनों इंजन भी ठीक थे। लेकिन फिर भी दोनों ही इंजन एक साथ फेल कैसे हो गये? विमान उड़ते ही सिविल अस्पताल के छात्रावास से कैसे टकरा गया? विमान को बचाने का समय क्यों नहीं मिला? क्या केवल विमान में ही सवार लोग मारे गये? सिविल अस्पताल के छ: मंज़िला छात्रावास में और आसपास भी तो थोड़े-बहुत लोग मरे होंगे? उनका ब्यौरा कौन देगा? पायलट सुमित ने मदद माँगी थी। मदद क्यों नहीं हो सकी? इन सवालों के जवाब हर नि:स्वार्थी समझदार व्यक्ति जानना चाहता है।

एयर इंडिया सरकारी विमानन कम्पनी थी। मौज़ूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकारी संपत्तियों को बेचने की आदत ने लगभग तीन साल पहले नागरिक उड्डयन मंत्रालय के पास मौज़ूद एयर इंडिया की भी 74.9 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा सन्स को 18,000 करोड़ रुपये में बेच दी। एयर इंडिया की शेष 25.1 प्रतिशत हिस्सेदारी सिंगापुर एयरलाइंस के पास है। 12 जून को इस विमान ने अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ान भरी थी। आकाश वत्स नाम के एक शख़्स ने दावा किया है कि वह इसी विमान से दिल्ली से अहमदाबाद गया था, तब विमान में कोई कमी नहीं थी। उसका कहना है कि अगर उसे भी आगे का सफ़र करना होता, तो वह भी जीवित नहीं होता। विमान में खिड़की की तरफ़ बैठे विश्वास कुमार रमेश को गंभीर चोटें तो आयीं; लेकिन उनकी जान बच गयी। उन्होंने कहा है कि विमान के उड़ान भरने के 30 सेकेंड बाद ही तेज़ आवाज़ हुई। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह सब बहुत जल्दी हुआ कि जब मैं चोटिल अवस्था में उठा, तो मेरे चारों तरफ़ आग और लाशें थीं। मैं डर गया और वहाँ से लँगड़ाते हुए किसी तरह भागा। मेरे चारों तरफ़ विमान के टुकड़े बिखरे पड़े थे। अचानक लोगों ने मुझे पकड़ लिया और एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल ले गये। मैं विंडो सीट पर था। दुर्घटना में विंडो के साथ ही उछलकर गिरा, नहीं तो मैं भी नहीं बच पाता।

कभी-कभी किसी एक शख़्स का बुरा वक़्त हो, तो पूरी नाव डूब जाती है। किसी एक के घर में आग लगती है, तो पूरी बस्ती जल जाती है। यहाँ भी शायद किसी की मौत के लिए सबकी मौत हुई हो! या यह भी हो सकता है कि सबके ही नसीब में इस तरह की दर्दनाक मौत हो। लेकिन ऐसा कहकर इस दर्दनाक दुर्घटना को भुलाया या नज़रअंदाज़ नहीं जा सकता। इस दुर्घटना की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और सच सामने आना चाहिए।

इस बात भी सामने आनी चाहिए कि जहाँ विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, वहाँ उस छात्रावास में और उसके आसपास कुल कितने लोगों की मौत हुई? कितना नुक़सान हुआ? इस विमान हादसे के बाद एक केदारनाथ से लौट रहा एक और विमान रुद्रप्रयाग में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सात लोग मारे गये। हालाँकि इसमें हम सिवाय शोक व्यक्त करने और मृतकों को श्रद्धांजलि देने के कुछ नहीं कर सकते।

‘तहलका’ परिवार सभी मृतकों को विनम्र श्रद्धांजलि देता है और ईश्वर से कामना करता है कि वे मृतकों के परिजनों को दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करें। ओ३म् शान्ति!

भविष्य में पानी को लेकर मचेगा हाहाकार!

गर्मी के दिनों में देश में पानी की क़िल्लत अक्सर अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बनती हैं और इस गंभीर मुद्दे पर सत्तारूढ़ सरकारों व विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी सुनने को मिलते हैं। जल-संकट एक गंभीर मुद्दा है। भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहाँ सबसे अधिक आबादी रहती है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन लगभग चार प्रतिशत लोगों के लिए पर्याप्त जल-संसाधन हैं। भारत दुनिया में भूजल का सबसे अधिक दोहन करता है। यह मात्रा दुनिया के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े भूजल दोहनकर्ता (चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका) के संयुक्त दोहन से भी अधिक है।

भारत में भूजल का 80 प्रतिशत भाग सिंचाई में उपयोग किया जाता है। 12 प्रतिशत भाग उद्योगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है और शेष आठ प्रतिशत ही पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक देश में जल की माँग उपलब्ध आपूर्ति की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र की एक नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि भारत जल-संकट से सबसे अधिक प्रभावित होगा। भारत के 30 शहर 2050 तक गंभीर जल-संकट श्रेणी में आ जाएँगे और विश्व के 2.4 अरब लोग प्रभावित होंगे। पानी, स्वच्छता की कमी से हर साल चार लाख लोगों की जान जाती है। जल-संकट की इस तस्वीर को बड़ा करने पर पता चलता है कि विश्व जल-संकट का सामना कर रहा है। अनुमान है कि 2030 तक जल की वैश्विक माँग सतत आपूर्ति से 40 प्रतिशत अधिक हो जाएगी। यानी माँग और आपूर्ति के बीच 40 प्रतिषत का फ़ासला एक बहुत बड़ी चुनौती है।

विश्व आर्थिक मंच की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2040 तक हर चौथा बच्चा जल-संकट वाले क्षेत्रों में रहेगा। इससे न केवल स्वास्थ्य प्रभावित होगा, बल्कि पोषण और शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों से भी बच्चे वंचित रह सकते हैं। यही नहीं, 2050 तक 2.4 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं, समुद्र का जल-स्तर बढ़ने जैसे कारणों से दुनिया में 1.2 अरब लोग 2050 तक पलायन को विवश हो सकते हैं। ग़ौरतलब है कि पलायन करने वाली आबादी को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जैसे-भाषा, बोली, रोज़गार, संस्कृति, बच्चों का स्कूल में दाख़िला आदि। ग्लोबल वार्मिंग व प्रदूषण से वर्ष 1900 से अब तक दुनिया भर के 20 प्रतिशत जल-स्रोत सूख गये हैं। दरअसल, जल हमारे जीवन की महत्त्वपूर्ण ज़रूरत है। भोजन हो या कपड़े अथवा हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऊर्जा हो, उनमें पानी का उपयोग होता है। प्रकृति ने पानी के कई स्रोत मानव को दिये; लेकिन जलवायु परिवर्तन और धरती पर बढ़ती आबादी, जल भंडारण के प्रति उदासीनता, मानव द्वारा अत्यधिक दोहन आदि के चलते दुनिया जल-संकट का सामना कर रही है।’

ग्लोबल कमीशन ऑन द इकोनॉमिक्स ऑफ वाटर’ के कार्यकारी निदेशक और संस्थापक हेंक ओविक कहते हैं- ‘यह उन सभी चीज़ों को कमज़ोर कर रहा है, जिन्हें हम हासिल करना चाहते हैं। अगर हम इसे सही तरीक़े से नहीं कर पाये, तो सभी के लिए खाद्य-सुरक्षा और जीडीपी पर इसका बहुत बड़ा असर होगा।’

दरअसल, स्वास्थ्य और आजीविका को बनाये रखने, अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ाने और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने के लिए सही समय पर सही गुणवत्ता वाला पर्याप्त पानी चाहिए। जल आपूर्ति की कमी को शीर्ष पाँच जोखिमों के रूप में पहचानने वाले देशों की संख्या 2024 में सात से बढ़कर 2025 में 27 हो गयी है। ग़ौरतलब है कि वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र ने सुरक्षित स्वच्छ पेयजल एवं स्वच्छता के अधिकार को मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी। सतत् विकास लक्ष्य-6 का लक्ष्य 2030 तक सभी के लिए स्वच्छ पानी और स्वच्छता सुनिश्चित करना है।

अहम सवाल यह है कि क्या हम यह लक्ष्य हासिल कर पाएँगे? सतत् विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल पाँच साल शेष हैं; पर दुनिया के देश इन्हें हासिल करने में बहुत पीछे हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश (आईएमएफ) ने चेतावनी दी है कि विश्व के लिए 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करना असंभव होता जा रहा है; क्योंकि वित्त-पोषण की ज़रूरतें कई देशों की वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक हैं, जिससे व्यापक आर्थिक असंतुलन का ख़तरा बढ़ रहा है। आईएमएफ ने हाल ही में 06 जून को एक बयान में कहा था- ‘2020 से लगातार झटकों ने दीर्घकालिक संरचनात्मक चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। इससे कम आय वाले और कमज़ोर देशों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है। अब देखना है कि भारत समेत दुनिया भर के देश सतत् विकास लक्ष्य-6 को क्या हासिल कर पाएँगे?