Home Blog Page 54

इंडिया गठबंधन की रणनीति पर अहम बैठक 19 जुलाई को, संसद सत्र से पहले विपक्ष की एकजुटता की अग्निपरीक्षा

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ ने साझा रणनीति तैयार करने के लिए कमर कस ली है। शुक्रवार, 19 जुलाई को दिल्ली स्थित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास 10, राजाजी मार्ग पर विपक्ष के दिग्गज नेताओं की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। बैठक में संसद सत्र के दौरान उठाए जाने वाले अहम मुद्दों और सरकार को घेरे जाने की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।
इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), वाम दलों सहित इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के शीर्ष नेता शामिल होंगे। हालांकि आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की भागीदारी को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भी शामिल होने की संभावना है। यह बैठक न केवल आगामी सत्र की तैयारी के लिहाज से अहम मानी जा रही है, बल्कि इंडिया गठबंधन की आंतरिक एकजुटता की परीक्षा के रूप में भी देखी जा रही है। जबकि आम आदमी पार्टी और टीएमसी के पिछले दौर की बैठकों से दूरी बनाने के चलते विपक्ष की एकता को लेकर भी सवाल उठे हैं।
सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी या पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी वर्चुअल रूप से बैठक में शामिल हो सकते हैं। टीएमसी की ओर से एक वार्षिक पार्टी कार्यक्रम का हवाला देते हुए बैठक में फिजिकल तौर पर शामिल न हो पाने की बात कही गई है।
बैठक में कई ज्वलंत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की संभावना है, जिनमें बिहार की विवादास्पद मतदाता सूची, पहलगाम आतंकी हमला, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की अचानक समाप्ति, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवादित बयान, भारत की विदेश और व्यापार नीति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, महिलाओं पर अत्याचार, बालासोर आत्मदाह कांड, एयर इंडिया दुर्घटना और गुजरात में पुल ढहने की घटनाएं प्रमुख हैं।
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल संसद में इन मुद्दों को संगठित और प्रभावी ढंग से उठाने के लिए साझा रणनीति तैयार करेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि क्षेत्रीय मुद्दों को भी राष्ट्रीय मंच पर उठाकर विपक्ष की आवाज को और धार दी जाए।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने संकेत दिया है कि विपक्ष केंद्र की विदेश और व्यापार नीति को लेकर सरकार से जवाब मांगेगा। वहीं, शिवसेना सांसद संजय राउत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में गड़बड़ियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में मतदाता सूची में गंभीर अनियमितताएं हैं, जिन्हें संसद में उठाया जाएगा।

संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चलेगा। सरकार ने  रविवार 20 जून को एक सर्वदलीय बैठक भी  बुलाई  है

किसानों को लूट रहे नक्काल और भ्रष्टाचारी

योगेश

राजस्थान में नक़ली खाद की फैक्ट्रियाँ पकड़े जाने के बाद उत्तर प्रदेश के हापुड़ में नक़ली खाद के हज़ारों बोरे पकड़े गये हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पड़ने वाले हापुड़ में 24 से 26 जून तक हुई छापेमारी में दो गोदाम पकड़े गये, जिनमें 10 बड़ी खाद कम्पनियों के नाम के 40,000 से ज़्यादा बोरे मिले। ये बोरे असली बोरों की तरह ही छपे हुए थे, जिन पर सब्सिडी समेत खाद का भाव और प्रधानमंत्री मोदी की फोटो भी छपी थी। इन बोरों पर प्रधानमंत्री भारतीय जन उर्वरक परियोजना लिखा हुआ मिला। हापुड़ पुलिस ने छापेमारी के बाद ख़ुलासा किया कि नक़ली बोरों का एक गोदाम 24 को पकड़ा गया, उसके बाद दूसरा गोदाम 26 जून को पकड़ा गया। इन गोदामों में 10 से ज़्यादा नामचीन कम्पनियों के नाम से छपे नक़ली खाद के 40,000 से ज़्यादा ख़ाली बोरे मिले। इन बोरों को उत्तर प्रदेश रोडवेज बसों में लादकर दूसरे ज़िलों में पहुँचाया जाता था।

ये नक़ली बोरे ऐसे थे कि इनकी पहचान करना मुश्किल है कि ये असली हैं या नक़ली। पुलिस ने बताया कि ये बोरे दिल्ली में छपते थे और हापुड़ से जगह-जगह नक़ली खाद बनाने वालों को बेचे जाते थे। पुलिस को जिन गोदामों से नक़ली बोरे बरामद हुए, उन क़दमों का मालिक पीयूष बंसल फ़रार है; लेकिन दोनों गोदानों के देखरेख करने वले हनी गुप्ता को पुलिस ने गिरफ़्तार करके पूछताछ की है।

हनी गुप्ता ने पुलिस को बताया कि बोरों का ऑर्डर मिलने पर वह रोडवेज बसों में उन्हें रख देता था, जो 30 रुपये प्रति बोरा के हिसाब से बिकते थे।

खाद के ये नक़ली बोरे हर दिन 500 से 1000 तक दूसरे ज़िलों में भेजे जा रहे थे। एक बंडल में 100 से 500 तक बोरे बाँधकर हनी गुप्ता भेजता था। उसे एक बंडल की ढुलाई के 50 रुपये मिलते थे, जिससे वो 300 रुपये तक रोज़ कमा लेता था और गोदामों की निगरानी में उसे अलग रुपये मिलते थे। हनी गुप्ता ने पुलिस को बताया कि ये बोरे मुज़फ़्फ़रनगर, मुरादाबाद, आगरा, बरेली, शाहजहाँपुर और दूसरे ज़िलों को जाने वाली बसों में रखकर भेजे जाते थे। इन नक़ली बोरों पर यूरिया खाद का असली सरकारी भाव 2177.35 रुपये लिखी थी, जिस पर केंद्र सरकार की सब्सिडी 477.35 रुपये लिखी हुई थी, जिसके बाद एक बोरी का बाज़ार भाव 1,700 रुपये लिखा हुआ था। इन बोरों को बनाने वाली कम्पनी का नाम चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड लिखा था। बहुत बोरों पर इफको भी लिखा था, जिस पर सब्सिडी के बाद 1350 रुपये भाव था।

इस मामले में हापुड़ पुलिस जाँच कर रही है, जिससे नक़ली खाद बनाने वाले पकड़ में आ सकें। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार को इस दिशा में कड़ाई से जाँच करने की ज़रूरत है, जिससे नक्काल पकड़े जा सकें और किसानों को ठगी से बचाया जा सके। हापुड़ पुलिस यह मान रही है कि नक़ली खाद बनाने वाला पूरा गैंग होगा। पुलिस अभी पीयूष बंसल को गिरफ़्तार नहीं कर सकी है। आगे भी कोई ऐसी कार्रवाई नहीं हो रही है, जिससे नक़ली खाद और नक़ली बोरे बनाने वाले पकड़े जा सकें। इससे यह तो तय है कि नक़ली खाद बनाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में सरकार और पुलिस रुचि नहीं ले रही है। नक़ली खाद के बिकने का एक सुराग़ मिलने के बाद यह कहना चाहिए कि नक़ली खाद की बिक्री किसानों को धोखा देकर ख़ूब की जा रही है। लेकिन इस बीच खाद की कमी दिखाकर कालाबाज़ारी भी ख़ूब हो रही है। धान की पौध रोपने का समय चल रहा है और किसानों को खाद नहीं मिल पा रही है। धन की फ़सल में उर्वरक खादों की माँग बढ़ जाती है और हर साल नक्काल अपनी नक़ली खाद महँगे भाव में खपाने में कामयाब होते हैं, तो खाद विक्रेता किसानों को खाद 30 प्रतिशत से 55 प्रतिशत तक महँगी बेचते हैं। इसके अलावा दुकानदार किसानों को खाद के बोरे के साथ कीटनाशक और दूसरी दवाएँ जबरन किसानों को बेच रहे हैं। दुकानदार किसानों को खाद का बोरा तभी दे रहे हैं, जब किसान उसके भाव ज़्यादा देने के अलावा दुकानदार की शर्त मानकर कीटनाशक या घास मारने वाली दवा ख़रीद रहे हैं। किसान मजबूर होकर खाद को एमआरपी से ज़्यादा पर ख़रीदने को मजबूर होते हैं।

पहले से ही महँगी हो रही उर्वरक खादों की कालाबाज़ारी और ज़्यादा भाव में बेचे जाने में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सबसे ऊपर हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में कालाबाज़ारी का यह खेल हर साल किया जाता है, जिससे मजबूर किसानों को लूटा जा सके। उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में खाद की भारी कमी है। मध्य प्रदेश के खरगोन के ज़िले में स्थित मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ पर खाद लेने के लिए किसान रात को ही लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं और भूखे-प्यासे रहकर शाम तक लगे रहते हैं, फिर भी बहुत किसानों को उर्वरक खाद नहीं मिल पाती। अगर सरकारी संस्थाओं का यह हाल है, तो दुकानदारों को कालाबाज़ारी करने से कौन रोकेगा?

उत्तर प्रदेश में खाद की कालाबाज़ारी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कालाबाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिये हैं। इससे यह तय होता है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कालाबाज़ारी की बात को मान लिया है। लेकिन उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही अब भी खाद की कमी को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा तब है, जब कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ख़ुद लखनऊ के ज़िला कृषि अधिकारी के साथ मिलकर बख़्शी का तालाब स्थित एक यूरिया खाद के गोदाम मैसर्स किसान खाद भंडार पर गये और खाद के भाव पूछे। दुकानदार ने उन्हें 266.50 रुपये वाले खाद के बोरे के भाव उन्हें भी ज़्यादा बताये। तब कृषि मंत्री ने दुकानदार के ख़िलाफ़ कार्रवाई के आदेश दिये, जिसके बाद उसका खाद का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया।

इतने पर भी कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में खाद की कोई कमी नहीं है। कृषि मंत्री ने कहा है कि राज्य में 15 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 3.14 लाख मीट्रिक टन एसएसपी, 2.91 लाख मीट्रिक टन एनपीके, 2.90 लाख मीट्रिक टन डीएपी, 0.77 लाख मीट्रिक टन एमओपी उपलब्ध है, जिसका स्टॉक अभी केंद्र से खाद मिलने पर बढ़ जाएगा। लेकिन उन्होंने कालाबाज़ारी करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की साफ़ चेतावनी दी है। कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने किसानों से कहा है कि महँगे भाव में यूरिया को बेचा जाना किसानों के साथ धोखा है। उन्होंने कहा कि यह उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 और आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कृषि अधिकारियों को आदेश दिये हैं कि वे राज्य में खाद की कालाबाज़ारी को रोकने के लिए इसकी जाँच करें और रिपोर्ट सरकार को भेजें। आदेश दिया गया है कि कृषि विभाग ने सभी ज़िला कृषि अधिकारियों से हर दिन खाद की बिक्री और मौज़ूदा स्टॉक का ब्योरा माँगा जा रहा है। फील्ड में उतारे गये अधिकारी गोपनीय तरीक़े से ज़िलों में जाँच कर रहे हैं। जाँच रिपोर्ट के आधार पर गड़बड़ी करने वाले खाद विक्रेताओं और ज़िले के लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई होगी।

कृषि अधिकारी कह रहे हैं कि राज्यों से सटे उत्तर प्रदेश के ज़िलों में विशेष चौकसी की जा रही है, जिससे नक़ली खाद राज्य में न आ सके। लेकिन राज्य के अंदर ही बनने वाली नक़ली उर्वरक खादों को लेकर कोई कुछ नहीं कह रहा है। कई ज़िलों में खाद की समस्या है और नक़ली खाद का किसानों को डर सता रहा है। रबी की फ़सलों के सीजन में सरकार के पास भी नक़ली खादों के बिकने और खाद की कालाबाज़ारी की शिकायतें मिली थीं।

दूसरे राज्यों से लगने वाली उत्तर प्रदेश की सीमाएँ सहारनपुर, पीलीभीत, आगरा, मथुरा, महोबा, गाजीपुर, ललितपुर, बांदा, सोनभद्र, श्राबस्ती, चित्रकूट, बलिया, कुशीनगर, देवरिया, महराजगंज, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, लखीमपुर खीरी ज़िलों से मिलती हैं। इन राज्यों में पुलिस निगरानी बढ़ायी गयी है; लेकिन हापुड़ में पकड़े गये नक़ली खाद के बोरों की जाँच को आगे बढ़ाते हुए नक़ली खाद बनाने वाले अभी नहीं पकड़े गये हैं। कई ज़िलों के किसान शिकायत कर रहे हैं कि उनके पास के सहकारी समितियों में खाद की बहुत कमी है। इसके चलते उन्हें ज़्यादा पैसे देकर दुकानों और दलालों से खाद ख़रीदनी पड़ रही है। सहकारी समितियों से सही और असली खाद मिलने का किसानों को भरोसा रहता है; लेकिन किसानों को हर फ़सल की बुवाई के समय खाद की कमी दिखाकर लूटा जाता है। कृषि मंत्रालय ने ज़िलों में निजी कम्पनियों की रैंक से 40 फ़ीसदी खाद सहकारी समितियों के गोदामों पर भेजने का निर्देश दिया है। लेकिन किसानों को कब तक खाद बिना परेशानी के उचित भाव में मिलेगी, इसके बारे में अभी कुछ पता नहीं है।

कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही की तरह ही कृषि निदेशक डॉ. जितेंद्र सिंह तोमर भी कह रहे हैं कि राज्य में उर्वरक खादों की कोई कमी नहीं है। वह कह रहे हैं कि राज्य में लगभग 27 लाख मीट्रिक टन खाद उपलब्ध है। कृषि निदेशक ने यह भी कहा है कि अगर कोई भी खाद विक्रेता उर्वरक के बोरे के साथ किसानों को जबरन दूसरे उत्पाद बेचता है, तो उसके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करायी जाएगी। उत्तर प्रदेश में रिपोर्ट लिखे जाने तक खाद वितरण में अनियमितता और कालाबाज़ारी करने वाले 26 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हो चुकी थी। लगभग 600 फुटकर खाद विक्रेताओं को नोटिस जारी हो चुके थे। बलरामपुर के ज़िला कृषि अधिकारी और एक दूसरे अधिकारी को निलंबित किया जा चुका था।

कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने उर्वरक खादों की आपूर्ति के लिए राज्य की 26 फर्टिलाइजर कम्पनियों के साथ समीक्षा बैठक की। इस बैठक में तय किया गया कि निजी कम्पनियों की 25 प्रतिशत यूरिया का वितरण उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव फेडरेशन करेगी। खाद की आपूर्ति सही हो और किसानों को नक़ली खाद बनाने वाले नक्कालों से बचाया जाए, तो यह किसानों के अलावा कृषि संरक्षण के हित में भी उठाया गया क़दम होगा।

वैज्ञानिक खँगालेंगे ब्रह्मांड के रहस्य

– काम करने लगा दुनिया का सबसे बड़ा टेलीस्कोप

– भारत का स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष के लगा रहा चक्कर

इधर भारत का ड्रैगन कैप्सूल ग्रेस इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से अपनी दिलचस्प अंतरिक्ष यात्रा करके लौट आया है और उधर चिली के एक पहाड़ पर स्थित दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप ने काम करना शुरू कर दिया है। इधर भारत ने ठाना है कि वह अपना स्पेस स्टेशन बनाएगा। इस पर काम भी हो रहा है। इसरो के मुताबिक, साल 2035 तक क़रीब 52 टन का भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन होगा, जो धरती से क़रीब 400 किलोमीटर दूरी पर चक्कर लगाएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक ऐसा राकेट बना रहा है, जो पृथ्वी की लोअर आर्बिट में 75,000 किलोग्राम तक के सैटेलाइट लॉन्च कर सकेगा। वहीं चिली में बने टेलीस्कोप का नाम ग्रैन टेलीस्कोपियो कैनेरियास रखा गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े ऑप्टिकल से बना है।

यह टेलीस्कोप ऑब्जर्वेटरी अमेरिकी नेशनल साइंस फाउंडेशन और यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के पैसे से बना है। कई साल की मेहनत के बाद बीते 23 जून, 2025 को इस सबसे बड़े टेलीस्कोप के दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल कैमरे ने ब्रह्मांड की पहली बार सबसे दूर की ख़ूबसूरत और रहस्यमयी तस्वीरें खींचीं, जिन्हें वैज्ञानिकों ने जारी किया है। इन तस्वीरों में रंग-बिरंगे नेबुला, ग्रह, उपग्रह, तारे और ब्रह्मांड में बसी ट्राइफेड और लैगून नेबुला के साथ-साथ वर्गों क्लस्टर की आकाशगंगाओं की तस्वीरें शामिल हैं। नये एस्टेरॉयड व अन्य खगोलीय पिंडों की खोज करना है। यह कैमरा वेरा सी. रुबिन ऑब्जर्वेटरी में लगाया गया है, जहाँ से ब्रह्मांड में दक्षिणी ध्रुव का अगले 10 साल तक वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे। पिछले क़रीब चार-पाँच वर्षों से क़रीब दुनिया के सबसे बड़े 16 देशों के वैज्ञानिक संगठन यूरोपीय सदन ऑब्जर्वेटरी के सैकड़ों वैज्ञानिक और इंजीनियर हज़ारों सहयोगियों के साथ इस टेलीस्कोप को बनाने में लगे हुए हैं और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वो चिली के पहाड़ों और रेगिस्तान में रह रहे हैं। इस टेलीस्कोप को अभी पूरी तरह से काम करने में तीन साल और लगेंगे।

वैज्ञानिकों ने इसे साल 2028 तक पूरी तरह और ज़्यादा बेहतर तरीक़े से काम करने लायक बनाने की योजना बनायी है। उनका मानना है कि इस टेलीस्कोप से ब्रह्मांड की खोज में बहुत आसानी होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टेलीस्कोप और इसमें लगे कैमरे से ज़मीन पर रहते हुए ब्रह्मांड में होने वाली अजीब-ओ-ग़रीब गतिविधियों का अध्ययन किया जा सकेगा। हैरानी की बात है कि वैज्ञानिकों ने यह टेलीस्कोप को किसी लैब में नहीं बनाया, बल्कि चिली के एक बड़े पहाड़ को काटकर उसी पर वहीं बनाया गया है। इस टेलीस्कोप का सिर्फ़ प्राइमरी लैंस ही 39.3 मीटर चौड़ा है, जो कि एक फुटबॉल ग्राउंड के बराबर होता है। यह लैंस किसी एक काँच से नहीं, बल्कि 798 हेक्सागोनल टुकड़ों से बनाया गया है। इस लैंस की पावर इतनी ज़्यादा है कि इसके ज़रिये हज़ारों बड़े-बड़े ग्रहों के समूह को आसानी से एक साथ ऐसे देखा जा सकता है, जैसे वो सब नजदीक ही हों। इस टेलीस्कोप की देखने की क्षमता इतनी ज़्यादा है कि यह इंसान की आँखों की तुलना में 100 मिलियन गुना प्रकाश एकत्र करके हब्बल टेलीस्कोप की तुलना में 16 गुना ज़्यादा स्पष्ट तस्वीर लेने में सक्षम है। इसके अलावा इस टेलीस्कोप की प्रकाश-एकत्रण क्षमता इस हब्बल टेलीस्कोप से 250 गुना ज़्यादा होगी। यह टेलीस्कोप 80 मीटर ऊँचा और 50 मीटर चौड़ा है यानी यह टेलीस्कोप एक गगनचुंबी इमारत जैसा है, जिसे कैमरे और लैंसों को ब्रह्मांड के किसी भी कोने की तरफ़ घुमाकर उसे साफ़-साफ़ देखा जा सकेगा।

अभी तक वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड के सौरमंडल वाले हिस्से में ही अपनी उपलब्धियाँ हासिल की हैं; लेकिन वैज्ञानिक सौरमंडल के अंदर-बाहर भी झाँकना चाहते हैं, जहाँ पर किसी भी हाल में इंसानों और वैज्ञानिकों द्वारा बनाये गये सेटेलाइट्स, यानों और अन्य मशीनों को पहुँचना मुमकिन नहीं हो सका है। हालाँकि ऐसी कोशिशें वैज्ञानिकों ने लगातार की हैं, जिनमें अभी तक कोई कामयाबी हासिल नहीं हो सकी है। इसलिए वैज्ञानिकों ने अब बड़े-बड़े टेलीस्कोप बनाने शुरू किये हैं, जिससे उनके ज़रिये ब्रह्मांड की गतिविधियों का पता लगाया जा सके और यह समझा जा सके कि इंसानों का ब्रह्मांड में पहुँचने का रास्ता कैसे निकल सकता है। वैज्ञानिकों की कोशिश है कि प्राचीन किताबों में लिखे गये रहस्यों से पर्दा उठाने के साथ-साथ वे उस रहस्यमयी दुनिया की खोज भी कर सकें, जहाँ इंसान धरती की तरह रह सकें। इस कड़ी में वैज्ञानिकों ने अब तक के दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप का निर्माण कर लिया है, जो ब्रह्मांड में वहाँ भी देख सकता है, जहाँ वैज्ञानिकों के बनाये हुए यान और सेटेलाइट भी नहीं पहुँच पाते। वैज्ञानिक इस ऑब्जर्वेटरी टेलीस्कोप कैमरे से कम-से-कम 20 अरब आकाशगंगाओं की तस्वीरें लेना चाहते हैं। अब तक दुनिया में अनगिनत टेलीस्कोप बन चुके हैं; लेकिन ब्रह्मांड में झाँकने के लिए बने टेलीस्कोप बहुत कम हैं। हालाँकि टेलीस्कोप का सही इतिहास किसी को नहीं मालूम; क्योंकि इंसान ने दूर की चीज़ें देखने के लिए तारों, ग्रहों और उपग्रहों की गणना के लिए टेलीस्कोप का उपयोग प्राचीन-काल में भी किया होगा, जिसका सुबूत भारत में ब्रह्मांड की सटीक गणना से मिलता है। दिल्ली का जंतर-मंतर आज भी ब्रह्मांड की गणना का जीता-जागता सुबूत है।

फिर भी अब तक बने टेलीस्कोपों में रेडियो टेलीस्कोप, ग्रैन टेलीस्कोपियो कलारियास, केक टेलीस्कोप, ऑप्टिकल टेलीस्कोप, बीटीए-6 टेलीस्कोप, हुकर टेलीस्कोप, लेविथान टेलीस्कोप, हेल टेलीस्कोप, ग्रेगोरियन रिफ्लेक्टर टेलीस्कोप, क्रिस्टियान ह्यूजेन्स टेलीस्कोप, जेम्स वेब टेलीस्कोप, बेरिलियम टेलीस्कोप, हबल टेलीस्कोप, हॉबी-एबर्ली टेलीस्कोप, हर्शेल टेलीस्कोप, ग्रेट डोरमेट रिफ्रैक्टर टेलीस्कोप, रॉसे टेलीस्कोप आदि प्रमुख रहे हैं। लेकिन अब जो टेलीस्कोप बना है, वो भविष्य की उन इंसानी पीढ़ियों के लिए एक खिड़की होगी, जो शायद कभी इस ज़मीन से अलग ब्रह्मांड की दूसरी दुनिया में जाकर बसने में मदद करेगी। यह टेलीस्कोप विज्ञान और कला के साथ-साथ इंसानों की तरक़्क़ी का एक ऐसा जीता-जागता उदाहरण है, जो हमें आसमान में सैर करने का हौसला देता है। इसके साथ ही वैज्ञानिकों की मिलीजुली मेहनत यह बताती है कि इंसान एकजुट होकर बड़े-से-बड़े लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। क़रीब 16 देशों के वैज्ञानिकों ने दुनिया के सबसे बड़े टेलीस्कोप को बनाकर यह साबित कर दिया है कि मिलजुलकर काम करने से ही दुनिया का भला हो सकता है। यह विशालकाय टेलीस्कोप वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला से ज़्यादा लोगों के उज्जवल भविष्य की खोज के लिए काम करेगा। इसे चिली के अटाकामा रेगिस्तान में इसलिए बनाया गया है, जिससे टेलीस्कोप को सबसे साफ़ और स्थिर जगह मिल सके और उससे सबसे सूखे और खुले आसमान के पार जाकर ब्रह्मांड में बनी आकाशगंगाओं को साफ़-साफ़ देखा जा सके। इसलिए इस टेलीस्कोप को अटाकामा की सबसे ऊँचे क़रीब 3,000 मीटर ऊँचे सेरो अमेज़न पहाड़ पर बनाया गया है। इस पहाड़ पर हवा पतली और प्रदूषण रहित है। इस पहाड़ को टेलीस्कोप बनाने लायक बनाने के लिए सबसे पहले समतल किया गया, जिसके लिए बम ब्लास्ट करके पहले पहाड़ के ऊपरी हिस्से को तोड़ा गया और फिर बड़ी-बड़ी मशीनें से उसे ऊपर से समतल किया गया। टेलीस्कोप का वजन क़रीब 5,000 टन है, जिसकी देखरेख और संचालन के लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक बड़ी टीम अब इसी टेलीस्कोप के पास ज़िन्दगी बिताएगी।

इस टेलीस्कोप को बनाने के लिए अटाकामा की इतनी ऊँची और उबड़ खाबड़ पहाड़ियों पर भारी-भारी मशीनें और टेलीस्कोप में लगने वाली सामग्री ले जाकर इतनी सटीक इंजीनियरिंग को ब्रह्मांड के अध्ययन करने लायक दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा टेलीस्कोप बनाना अपने आप में एक चुनौती थी; लेकिन वैज्ञानिकों ने इसके सफलतापूर्वक बनाकर यह साबित कर दिया कि विज्ञान विकास के नये आयाम गढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने यह चमत्कार पहली बार किया है कि किसी ऊँचे पहाड़ पर पहाड़ जैसी टेलीस्कोप मशीन खड़ी कर दी, जो अच्छी तरह काम भी कर रही है। इस टेलीस्कोप को बनाने में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और टेक्नीशियनों के अलावा हज़ारों कर्मचारियों और मज़दूरों का भी बड़ा योगदान रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस टेलीस्कोप का हर हिस्सा किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह टेलीस्कोप धरती से ही ब्रह्मांड में लाखों किलोमीटर दूर की गतिविधियों की एक अच्छे डिजिटल फ़िल्म कैमरे से 10 गुना ज़्यादा स्पष्ट बिलकुल नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप की तरह तस्वीर लेने में सक्षम है।

टेलीस्कोप की एडाप्टिव ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी से वायुमंडल की हलचल को रियल टाइम में ठीक किया जा सकता है, जिससे ब्रह्मांड की बिलकुल साफ़ एचडी तस्वीर दिखेगी; लेकिन इस टेलीस्कोप का मक़सद सिर्फ़ ब्रह्मांड की अकल्पनीय तस्वीरें लेना ही नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे रहस्यों को सुलझाकर उन अनसुलझे सवालों के जवाब खोजना है, जो सदियों से लोगों को हैरान किये हुए हैं। जैसे कि ब्रह्मांड कितना बड़ा है? ब्रह्मांड में क्या होता है? ब्लैक होल्स कैसे बनते-बिगड़ते हैं? क्या ब्रह्मांड में और भी सौर मंडल हैं? क्या ब्रह्मांड में कहीं और भी ज़िन्दगी जीने के संसाधन हैं? क्या ब्रह्मांड में आग, हवा और पानी जैसे तत्त्व और कहीं भी मौज़ूद हैं? अगर किसी ग्रह पर ज़िन्दगी के लक्षण होंगे, तो शायद पहली झलक इस टेलीस्कोप के ज़रिये देखी जा सके। ब्रह्मांड एक ऐसा रहस्य है, जिसे कोई पूरा नहीं समझ पाया। लेकिन वैज्ञानिक इसे समझने की कोशिशों में लगातार लगे हैं। हालाँकि वैज्ञानिक अभी तक ज़मीन के ही सभी रहस्यों को नहीं समझ सके हैं। लेकिन लंबे समय से ब्रह्मांड के रहस्यों की खोज में भी उन्हें काफ़ी सफलता मिल चुकी है। वैज्ञानिक जैसे-जैसे नये-नये ज़्यादा उपयोगी उपकरण बनाते जा रहे हैं, वैसे-वैसे ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठता जा रहा है। वैज्ञानिकों की ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की कोशिशों के पीछे इंसानी ज़िन्दगी को बेहतर-से-बेहतर और सुविधाजनक बनाने का मक़सद है। आज एक तरफ़ जहाँ चंद बड़े लोग अपने फ़ायदे के लिए इंसानों की हत्या करने पर आमादा हैं, वहीं वैज्ञानिक ब्रह्मांड के रहस्यों को खोजकर मौत को भी रोकना चाहते हैं। हालाँकि इसकी कि

सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण एक महत्त्वपूर्ण क़दम

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फ़ैसला लेते हुए कर्मचारियों की भर्ती में पहले एससी यानी अनुसूचित जाति, एसटी यानी अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए आरक्षण लागू किया और जब ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण देने की माँग उठी, तो अब उसने ओबीसी वर्ग के लिए भी आरक्षण लागू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के साथ ही शारीरिक अक्षम पानी दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों और स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान अपने यहाँ कर्मचारियों की भर्तियों में रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्टाफ की भर्तियों में आरक्षण लागू करने के इस फ़ैसले को पहली बार अमल में लाया है, जिससे आरक्षण पाने वाले वर्गों में ख़ुशी की लहर है।

बहरहाल, यह आरक्षण सिर्फ़ कर्मचारियों की नयी भर्तियों में ही लागू नहीं होगा, बल्कि उनके प्रमोशन में भी लागू होगा। हालाँकि कुछ वर्ग सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले की दबी ज़ुबान से आलोचना कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में एससी, एसटी वर्गों के लिए आरक्षण लागू होने के बाद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की माँग सुप्रीम कोर्ट के वकील बलराज सिंह मलिक ने पीआईएल डालकर की थी, जो कि संयोजक, सुप्रीम कोर्ट वकील / अधिवक्ता मंच एवं पूर्व मानद चेयर प्रोफेसर (न्याय और सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए विधि चेयर) की ओर से डाली गयी थी। लेकिन इस ओपन पिटीशन / पीआईएल पर सुनवाई से पहले ही संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी वर्ग के लिए भी आरक्षण लागू कर दिया।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के वकील बलराज सिंह मलिक ने अपनी पीआईएल / पिटीशन में सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई एवं अन्य सभी जजों को लिखा कि माननीय मुख्य न्यायाधीश और सम्मानित न्यायाधीश महोदय, हम हस्ताक्षरकर्ता आपके समक्ष यह खुला पत्र प्रस्तुत करते हुए 23 जून, 2025 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए ग़ैर-न्यायिक कर्मचारी पदों पर सीधी भर्ती और पदोन्नति में औपचारिक आरक्षण नीति लागू करने के ऐतिहासिक निर्णय के लिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। माननीय मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई के नेतृत्व में लागू यह ऐतिहासिक नीति, सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बनाये रखने और भारत के संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण क़दम है। हम विनम्रतापूर्वक आपके समक्ष अनुरोध करते हैं कि संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी नीतियों के अनुरूप, सर्वोच्च न्यायालय में रोज़गार में पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए समान सकारात्मक कार्रवाई लागू की जाए।

उन्होंने पीआईएल में भारत का संविधान के अनुच्छेद-15(4) का हवाला देते हुए लिखा कि इस अनुच्छेद के तहत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, जिसमें एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय शामिल हैं, के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद-16(4) राज्य सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व न रखने वाले किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों के लिए सार्वजनिक रोज़गार में आरक्षण सक्षम बनाता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में एससी, एसटी कर्मचारियों के लिए आरक्षण नीति को अपनाना, जिसमें रजिस्ट्रार, वरिष्ठ निजी सहायक, सहायक लाइब्रेरियन, जूनियर कोर्ट सहायक और चैंबर अटेंडेंट जैसे पद शामिल हैं, समावेशिता सुनिश्चित करने के लिए एक प्रशंसनीय मिसाल कायम करता है।

माननीय मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि यदि सभी सरकारी संस्थान और कई उच्च न्यायालय पहले से ही एससी और एसटी के लिए आरक्षण लागू कर रहे हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय को अपवाद क्यों होना चाहिए? उन्होंने पीआईएल में निवेदन किया कि सर्वोच्च न्यायालय में रोज़गार में बीसी और ओबीसी समुदायों के लिए आरक्षण का विस्तार करने से इस संस्थान की वास्तविक समानता के प्रति प्रतिबद्धता और मजबूत होगी। उन्होंने इसके लिए इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के फ़ैसले का उदाहरण भी दिया, जिसके तहत सार्वजनिक रोज़गार में ओबीसी के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण की संवैधानिकता को बरक़रार रखा, जिसमें सामाजिक पिछड़ापन और अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को प्रमुख मानदंड बताया गया। इसके अलावा उन्होंने दूसरे कई उदाहरण दिये, जिसमें 01 अगस्त, 2024 को सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, जिसमें एससी, एसटी श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देने का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकारी नीतियों में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के परिपत्रों में उल्लिखित केंद्रीय सरकार की सेवाओं में ओबीसी के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण अनिवार्य करने का ज़िक्र किया। इसके अलावा उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण नीति के कार्यान्वयन की माँग की और मॉडल रोस्टर प्रणाली के हिसाब से भर्ती और पदोन्नति में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाली प्रक्रिया अपनाने की अपील की। साथ ही क्रीमी लेयर का बहिष्कार किया।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने एससी, एसटी आरक्षण को अपने 75 सालों के इतिहास में पहली बार लागू किया है। 23 जून 2025 से लागू हुई इस आरक्षण नीति के मुताबिक एससी, एसटी वर्गों लोगों की सीधी कर्मचारी भर्ती और प्रमोशन आदि में क्रमश: 15 फ़ीसदी और 7.5 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा, जो कि दूसरी सरकारी नौकरियों में भी लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों और कर्मचारियों की सीधी भर्ती में एससी, एसटी वर्गों के लोगों को 200 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली के तहत ये आरक्षण मिलेगा। इसी प्रकार से ओबीसी वर्ग के लोगों को भी कर्मचारी भर्ती और प्रमोशन में 27 फ़ीसदी आरक्षण भी मिलेगा, जो कि 04 जुलाई से लागू हो चुका है। सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने 02 जुलाई, 1997 को ही आदेश जारी कर दिया था; लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इसे 28 साल बाद लागू करने का ऐलान हुआ है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों, स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों भी आरक्षण देने का प्रावधान किया है।

एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों, स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों को अपने आंतरिक प्रशासन में संवैधानिक आधार पर सामान अवसर देकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण क़दम उठाया है, जो कि राज्यों को आरक्षण नीति लागू रखने के लिए एक मिसाल के तौर पर माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई ने संविधान के अनुच्छेद-146(2) में दी गयी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए भारत में लागू आरक्षण को संवैधानिक सर्वोच्च न्यायालय अधिकारी एवं सेवा नियम-1961 में संशोधन करके लागू किया है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने नियम-4(ए) को पूरी तरह से नये नियम से बदल दिया है। सुप्रीम कोर्ट में सीधी भर्ती में अलग-अलग पदों पर लागू इस आरक्षण से इन वर्गों के युवाओं को राहत मिलेगी। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने यहाँ ओबीसी के आरक्षण को लागू करने में 28 साल लगा दिये। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये इस आरक्षण को केंद्र सरकार की तरफ़ से समय-समय पर जारी किये गये नियमों, आदेशों और अधिसूचनाओं के हिसाब से ही लागू किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में कर्मचारियों के पदों पर भर्ती में वर्तमान वेतनमान के साथ केंद्र सरकार की आरक्षण नीति के मुताबिक ही भर्ती प्रक्रिया को अपनाया जाएगा।

हालाँकि इस आरक्षण नीति में सीजेआई संशोधन और बदलाव कर सकते हैं या अपवाद कर सकते हैं। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ऐसा नहीं करेगा और इसकी कोई संभावना भी नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ निजी सहायक, सहायक लाइब्रेरियन, जूनियर कोर्ट सहायक, जूनियर कोर्ट सहायक सह जूनियर प्रोग्रामर, जूनियर कोर्ट अटेंडेंट और चैंबर अटेंडेंट (आर) पदों पर आरक्षण मिलने वाले सभी वर्गों के लोगों की भर्तियाँ की जाएँगी।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस आरक्षण नीति को लागू करने के बावजूद देश के कई ऐसे राज्य हैं, जहाँ आरक्षण ठीक से लागू नहीं किया गया। मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ है, जहाँ ओबीसी वर्ग के लोगों को सरकारी भर्तियों में पूरा 27 फ़ीसदी आरक्षण न देकर महज़ 14 फ़ीसदी आरक्षण ही दिया गया है। इसी को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की न सिर्फ़ फटकार लगायी है, बल्कि ओबीसी वर्ग को 13 फ़ीसदी आरक्षण न देने पर भी जवाब माँगा है।

दरअसल, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट याचिका पर सुनवाई कर रहा था। जब 14 अगस्त 2019 को मध्य प्रदेश की कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में आरक्षण का क़ानून पारित करते हुए इस अध्यादेश की जगह एक्ट लागू कर दिया, तो इसके समर्थन में 35, जबकि विरोध में 63 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल हुई थीं। अक्टूबर, 2019 में कमलनाथ के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा था। बीच में ही भाजपा ने कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार से सत्ता छीनकर आरक्षण क़ानून की इस एक्ट को जारी रखा। 18 दिसंबर 2024 को इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में हुई; लेकिन यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर हो गया। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण के तहत ओबीसी वर्ग की भर्तियों में पूरा 27 फ़ीसदी आरक्षण लागू न करने को लेकर मोहन यादव के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार से जवाब तलब कर लिया।

बहरहाल, आरक्षण की माँग हर वर्ग करता है; लेकिन सभी वर्गों को आरक्षण आज तक नहीं मिल सका है। मसलन, कुछ ही साल पहले केंद्र की मोदी सरकार ने सवर्ण ग़रीबों को एससी, एसटी और ओबीसी से ज़्यादा संपत्ति होने पर भी 10 फ़ीसदी अतिरिक्त आरक्षण दे दिया, जिसे ईडब्ल्यूएस कहते हैं। लेकिन वहीं जाट समुदाय से लेकर सिखों, जैनों, बौद्धों, सिंधियों, मारवाड़ियों, मुसलमानों आदि के लिए आज भी कोई आरक्षण नीति नहीं बनायी गयी है।

इसी प्रकार से अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों के लिए पंचायत सीटों में आरक्षण नहीं मिलता है। लेकिन जाति या वर्ग के आधार पर आरक्षण से बचने के लिए कुछ राज्यों की सरकारों ने अपने ही राज्य के नागरिकों को ज़्यादा आरक्षण देना शुरू कर दिया है। मसलन, कर्नाटक सरकार ने अपने राज्य के लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की कोशिशें कीं। हरियाणा सरकार ने तो 75 फ़ीसदी आरक्षण का क़ानून बनाया था; लेकिन पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक क़रार देते हुए रद्द कर दिया था। हालाँकि झारखण्ड सरकार ने अपने राज्य के लोगों को आरक्षण देने के लिए आरक्षण संशोधन विधेयक पारित करके 77 फ़ीसदी आरक्षण लागू कर दिया। इसी प्रकार से आंध्र प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र और दूसरे कई राज्यों में वहाँ की सरकारों ने स्थानीय लोगों को रोज़गार में प्राथमिकता देने की कोशिशें की हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

ज़मानत क़ानूनों में सुधार की आवश्यकता

भारत में न्याय में अक्सर ज़्यादा समय लगना और सुनवाई में देरी होना आम बात होने के चलते ज़मानत क़ानूनों में सुधार की माँग ज़ोर पकड़ रही है। देश की जेलों में बंद दो-तिहाई से ज़्यादा क़ैदी विचाराधीन हैं, जिनमें से कई को तो सलाख़ों के पीछे रखा भी नहीं जाना चाहिए। उनकी निरंतर हिरासत का कारण आमतौर पर उनके कथित अपराधों की गंभीरता नहीं, बल्कि पुरानी क़ानूनी प्रणाली और सामाजिक असमानताएँ हैं। इस समस्या में एक प्रमुख रास्ता ज़मानत प्रणाली है। लेकिन इस व्यवस्था का कुछ मामलों में बेईमान तत्त्वों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए एक व्यापक ज़मानत अधिनियम पारित करने की तत्काल आवश्यकता है। ऐसा अधिनियम, जो स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित करे, असंगतता को दूर करे और जेल नहीं, ज़मानत के संवैधानिक वादे को बेहतर ढंग से क़ायम रख सके।

‘तहलका’ के विशेष जाँच दल ने इस बार अपनी पड़ताल के दौरान ज़मानत को लेकर चौंकाने वाले तथ्य उजागर किये, जिससे पता चला कि देश में ज़मानत एक व्यवसाय बन गया है। हमारी आवरण कथा- ‘फ़र्ज़ी ज़मानत बॉन्ड माफ़िया’ में हम प्रणाली की भ्रष्ट कार्यप्रणाली पर प्रकाश डाल रहे हैं, जहाँ फ़र्ज़ी गारंटर, बिचौलिये और संदिग्ध क़ानूनी पेशेवर लाभ के लिए ज़मानत प्रक्रिया में हेरफेर करते हैं। प्रभारित दरें स्थान और मामले के प्रकार जैसे कारकों पर निर्भर करती हैं। इससे वास्तविक और धोखाधड़ी वाली प्रथाओं के बीच का अंतर धुँधला हो जाता है, जिसमें बिचौलिये अपने लाभ के लिए दोनों पक्षों का शोषण करते हैं। न केवल वित्तीय लाभ के लिए फ़र्ज़ी ज़मानतें करायी जा रही हैं, बल्कि मानक ज़मानत प्रणाली का भी व्यवसायीकरण कर दिया गया है। रेलवे में बड़े पैमाने पर हुए ज़मानत बांड घोटाले की सीबीआई द्वारा हाल ही में की गयी जाँच से इस अवैध बाज़ार की जड़ें जमा लेने की प्रकृति और अधिक स्पष्ट हो गयी है।

मूलत: ज़मानत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अभियुक्त व्यक्ति मुक़दमे के लिए वापस आये, न कि उसका अपराध सिद्ध होने से पहले उसे दंडित किया जाना। ज़मानत देने से इनकार करना एक दुर्लभ अपवाद होना चाहिए, जो केवल उन मामलों के लिए आरक्षित होना चाहिए, जहाँ अभियुक्त के भागने का ख़तरा हो या साक्ष्यों के साथ हस्तक्षेप कर सकता हो या गवाहों के लिए ख़तरा पैदा कर सकता हो। जब कोई मामला मुख्यत: दस्तावेज़ी साक्ष्य पर आधारित हो, तो प्रक्रियागत देरी के कारण अभियुक्त को हिरासत में नहीं रखा जाना चाहिए। हालाँकि ज़मानत सम्बन्धी निर्णयों में विसंगतियाँ एक सतत् समस्या बनी हुई है। किसी को ज़मानत दी जाए या नहीं, और कब दी जाए; यह अक्सर मामले के गुण-दोष पर कम, जबकि न्यायिक विवेक या अभियोजन पक्ष के विरोध पर अधिक निर्भर करता है। मजिस्ट्रेटों द्वारा रिमांड को मंज़ूरी देने की प्रवृत्ति के कारण स्थिति और भी ख़राब हो जाती है; विशेषकर तब, जब पुलिस द्वारा स्वत: ही अनुरोध किया जाता है।

यह जानना उत्साहवर्धक है कि पिछले सप्ताह ही भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर स्मारक विधि व्याख्यान के दौरान इस बात पर प्रकाश डाला था कि ‘ज़मानत नियम है और जेल अपवाद है।’ लेकिन इसके मूलभूत सिद्धांत को हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर नज़रअंदाज़ किया गया है। यदि इसका पालन किया जाता, तो भारत की जेलों में 3.75 लाख विचाराधीन क़ैदी नहीं होते, जो कुल क़ैदियों का 74.2 प्रतिशत हैं। न्यायाधीश गवई ने अधिक सहानुभूति की आवश्यकता पर बल दिया; क्योंकि विचाराधीन क़ैदियों में से अधिकांश हाशिये के समुदायों से आते हैं। इस बीच 12 जून की दुर्घटना के बारे में भारत के विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो (एएआईबी) की रिपोर्ट ने महत्त्वपूर्ण इंजन ईंधन कट-ऑफ स्विच की स्थिति पर नये सवाल उठाये हैं। कुछ अच्छी ख़बरें भी हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर क़दम रखने वाले पहले भारतीय बनकर इतिहास रचने वाले अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला वापस लौट आये हैं। ग्रुप कैप्टन शुक्ला अंतरिक्ष में जाने वाले केवल दूसरे भारतीय हैं। एक्सिओम-4 की यात्रा अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा द्वारा सन् 1984 में रूसी सोयुज टी-11 से उड़ान भरने के 41 वर्ष बाद हुई है।

फ़र्ज़ी ज़मानत बॉन्ड माफ़िया

– फ़र्ज़ी गवाहों और फ़र्ज़ी बॉन्ड के दम पर ज़मानत ले रहे लोग

इंट्रो भारतीय न्यायिक व्यवस्था क़ानूनी रूप से सुचारू होती है; लेकिन क़ानून साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आगे बढ़ता है। लेकिन फ़र्ज़ी साक्ष्यों और फ़र्ज़ी गवाहों के चलते कई फ़ैसले ग़लत हो जाते हैं। भारत में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जहाँ अपराधी बेगुनाह साबित हो जाते हैं और बेगुनाहों को सज़ा हो जाती है। ऐसा इसलिए हो पाता है, क्योंकि पैसे के दम पर फ़र्ज़ी दस्तावेज़ और फ़र्ज़ी गवाह आसानी से मिल जाते हैं। ‘तहलका’ एसआईटी की पड़ताल से पता चला है कि किस तरह फ़र्ज़ी गारंटर और बिचौलिये क़ानूनी ख़ामियों और न्यायिक प्रक्रियाओं का फ़ायदा उठाकर ज़मानत प्रक्रिया को काले बाज़ार में बदल रहे हैं। पढ़िए, तहलका एसआईटी की यह विशेष रिपोर्ट :-

‘मुझे दो दिन का समय दो। दो दिन में मैं आपके आरोपियों की फ़र्ज़ी ज़मानत के लिए फ़र्ज़ी काग़ज़ात का इंतज़ाम कर दूँगा। एक बार जब वह बाहर आ जाता है, तो वह अदालत की तारीख़ों को छोड़ सकता है और जहाँ चाहे ग़ायब हो सकता है।’ -फ़र्ज़ी ज़मानत के लिए फ़र्ज़ी गारंटर का इंतज़ाम करने वाले दलाल मुनाज़िर ने ‘तहलका’ के अंडरकवर रिपोर्टर से कहा, जो उससे ग्राहक बनकर मिले थे।

‘एक बार जब हमने आपसे फ़र्ज़ी ज़मानत के लिए पैसे ले लिए, तो आपको और चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। आपका काम हो जाएगा। और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आरोपी ज़मानत मिलने के बाद भाग जाता है।’ -मुनाज़िर ने संवाददाता को आश्वस्त करते हुए कहा।

‘हम चार फ़र्ज़ी गारंटरों के लिए 30,000 रुपये लेंगे। इसमें से आपको आज 4,000 रुपये देने होंगे। यह गारंटर को टोकन मनी के रूप में दिया जाएगा। शेष 26,000 रुपये आप ज़मानत के दिन दे सकते हैं।’ -मुनाज़िर ने स्पष्ट किया।

‘अपने वकील से कहें कि वह न्यायालय में यह बात न फैलने दें कि ज़मानत देने वाले गारंटर फ़र्ज़ी हैं। हालाँकि मैं आपके मामले की ज़िम्मेदारी ख़ुद नहीं ले सकता। मेरा एक दोस्त है- मुनाज़िर, जो यह काम पूरा कर देगा। उसके पास इसके लिए सही लोग हैं।’ -मुनाज़िर के सहयोगी सूरज चंद ने बताया, जो ‘तहलका’ के अंडरकवर रिपोर्टर के साथ बैठक में उनके साथ था।

‘ज़मानती गारंटर बनना एक तेज़ी से बढ़ता व्यवसाय बन गया है। मैं कई मामलों में पैसे के बदले गारंटर के रूप में खड़ा हुआ हूँ। यह राशि हर मामले में अलग-अलग होती है। एक बार मैंने 30,000 रुपये लिये थे। कभी-कभी 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक लेता हूँ। राजस्थान में दरें बहुत अधिक हैं। वहाँ लोग प्रति ज़मानत 15,000 से 20,000 रुपये तक लेते हैं। झारखण्ड में लगभग 10,000 रुपये लेते हैं।’ -इरशाद अहमद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।

ज़मानत से तात्पर्य किसी अपराध के लिए गिरफ़्तार किये गये व्यक्ति को या तो स्वयं की पहचान पर या बाद में अदालत में उपस्थित होने पर गारंटी के आधार पर, जो आमतौर पर मुचलका- रुपये देकर ली गयी प्रतिभूति न्यायालय में जमा करके या संपत्ति की गारंटी देने के बाद मिलती है। ज़मानत हिरासत से अस्थायी रिहाई है। यह दोषी या निर्दोष होने का निर्धारण नहीं है। यह एक वादा है, जो अक्सर धन के साथ दिया जाता है कि अभियुक्त न्यायालय की सभी निर्धारित सुनवाइयों में उपस्थित रहेगा। कई मामलों में अभियुक्त को एक ज़मानतदार पेश करना आवश्यक होता है; एक ऐसा व्यक्ति, जो यह सुनिश्चित करने के लिए गारंटर के रूप में कार्य करता है कि अभियुक्त ज़मानत की शर्तों का पालन करे। इसे ज़मानत बॉन्ड के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन कुछ मामलों में ये गारंटर फ़र्ज़ी निकल रहे हैं। आरोपी के अनुरोध पर ये दलाल न्यायालयों में फ़र्ज़ी दस्तावेज़ पेश करते हैं। रिहा होने के बाद आरोपी अक्सर फ़रार हो जाता है और भविष्य में अदालत की तारीख़ों पर कभी पेश नहीं होता। इसके बाद पुलिस को गारंटरों का पता लगाने में भी कठिनाई होती है; क्योंकि उनके दस्तावेज़ भी फ़र्ज़ी होते हैं।

हेरफेर करके रिहाई के इस तरीक़े को फ़र्ज़ी ज़मानत के रूप में जाना जाता है और यह भारत में एक बड़े घोटाले का रूप ले चुका है। फ़र्ज़ी ज़मानतें आमतौर पर 20,000 रुपये या उससे कम की ज़मानत राशि वाले मामलों में होती हैं, जहाँ गारंटर का पुलिस सत्यापन अनिवार्य नहीं होता है। इसके विपरीत, 20,000 रुपये से अधिक की ज़मानत के लिए गारंटर की साख का पुलिस सत्यापन आवश्यक होता है, जिससे ऐसे मामलों में फ़र्ज़ी ज़मानत प्राप्त करना कठिन हो जाता है। भारत में फ़र्ज़ी ज़मानत माफ़िया की व्यापक उपस्थिति को देखते हुए ‘तहलका’ ने एक लम्बे समय से लंबित पड़ताल करने का निर्णय लिया, जो पहले कभी नहीं की गयी है। ‘तहलका’ के अंडरकवर रिपोर्टर ने एक फ़र्ज़ी ग्राहक बनकर एक बिचौलिये के माध्यम से उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में कुछ ऐसी ज़मानत कराने वाले दलालों से संपर्क किया। एक ऑपरेटर के अनुसार, वह अमरोहा स्थित एक वकील के माध्यम से दो गारंटरों की व्यवस्था कर सका, जो नियमित रूप से न्यायालय से ज़मानत चाहने वालों को गारंटी देने के लिए इस कार्य करने वालों को न्यायालय में भेजता है।

यह बिचौलिया मुनाज़िर (जो अपने पहले नाम से जाना जाता है) और सूरज चंद को अमरोहा से उत्तर प्रदेश के ग़ज़रौला में एक रेस्तरां में ‘तहलका’ रिपोर्टर से मिलाने के लिए लाया। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने मुनाज़िर और सूरज को एक झूठा विवरण दिया कि मुरादाबाद ज़िले के एक गाँव से हमारे ड्राइवर को चोरी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है, और उन्हें (रिपोर्टर को) उसकी रिहाई के लिए एक फ़र्ज़ी ज़मानतदार की ज़रूरत है। मुनाज़िर ने हमें विश्वास दिलाया कि वह फ़र्ज़ी दस्तावेज़ और फ़र्ज़ी गारंटर का इंतज़ाम कर सकता है; लेकिन इसके लिए उसे दो दिन का समय चाहिए। उसने यह भी गारंटी दी कि ज़मानत मिलने के बाद हमारा ड्राइवर ग़ायब हो सकता है और उसे भविष्य में अदालती सुनवाई में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने जो फ़र्ज़ी मामला प्रस्तुत किया था, उसमें 20,000 रुपये की काल्पनिक ज़मानत शामिल थी; जो ज़मानत क़ानूनी तौर पर गारंटर के पुलिस सत्यापन की आवश्यकता को दरकिनार करने के लिए पर्याप्त थी।

रिपोर्टर : हमें करवानी है फ़र्ज़ी ज़मानत।

मुनाज़िर : तो हमें दो दिन का टाइम दे दो।

रिपोर्टर : दो दिन में क्या करोगे?

मुनाज़िर : दो दिन में फ़र्ज़ी काग़ज़ दे दूँगा और हमारे यहाँ पर ज़मानत करवाके ड्राइवर कहीं भी भागे, कहीं भी जाए, …आओ, मत आओ।

रिपोर्टर :  ड्राइवर कहीं भी ज़मानत करवाकर भाग जाए?

मुनाज़िर : कहीं भी रहो, आओ, न आओ; …ज़मानत हो जाएगी।

जब मुनाज़िर से ‘तहलका’ रिपोर्टर ने पूछा कि उसे ज़मानत के लिए दो दिन क्यों चाहिए? जबकि ज़मानत उसी दिन के लिए निर्धारित है; तो मुनाज़िर ने कहा कि उसे गारंटर की व्यवस्था करने के लिए समय चाहिए। उसने कहा कि ज़मानत के तौर पर वह फ़र्ज़ी गारंटरों की ज़मीन के फ़र्ज़ी दस्तावेज़ पेश करेंगे। उसने कहा कि जिस वकील के माध्यम से वे लोग हमसे (रिपोर्टर से) मिलने आये हैं। यदि उन्होंने (वकील) उन्हें पहले ही बता दिया होता कि यह एक फ़र्ज़ी ज़मानत का मामला है; तो वे उसी दिन फ़र्ज़ी गारंटर का इंतज़ाम कर देते। मुनाज़िर ने दावा किया कि सम्बन्धित वकील ने उन्हें पहले कभी सूचित नहीं किया, जिसके कारण देरी हुई।

रिपोर्टर : दो दिन क्यूँ माँग रहे हो, …ज़मानत तो आज है?

मुनाज़िर : अरे, ऐसे न होगा; …टाइम तो लगेगा।

रिपोर्टर : फ़र्ज़ी काग़ज़ में क्या लगाओगे आप?

मुनाज़िर : यही, …ज़मीन की मेरी।

रिपोर्टर : है आपके पास?

मुनाज़िर : मेरे पास नहीं है औरों के पास है। मुझे अगर बता देते आज सवेरे, मैं आज ही करवा देता।

रिपोर्टर : वकील साहब ने तो इसलिए भेजा है, इरशाद से तो 10 दिन से बात हो रही है मेरी।

मुनाज़िर : वकील साहब ने ये बात न बतायी मेरे से।

अब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने आगे बढ़ने से पहले अंतिम आश्वासन के लिए मुनाज़िर से पूछा कि क्या काम आसानी से और बिना किसी परेशानी के हो जाएगा? मुनाज़िर ने विश्वास के साथ वादा किया कि सब कुछ बिना किसी बाधा के पूरा हो जाएगा।

मुनाज़िर : काम पूरा होगा।

रिपोर्टर : पक्का, ज़िम्मेदारी ले लूँ?

मुनाज़िर : हाँ।

रिपोर्टर : मुझे एक चीज़ बता दो, …आपको मैं अच्छा लगा और मुझे आप; …एक बात बताओ, ईमानदारी से- काम हो जाएगा? कहीं अटकेगा तो नहीं?

मुनाज़िर : कहीं नहीं अटकेगा।

‘तहलका’ रिपोर्टर की आशंकाओं को दूर करने के लिए मुनाज़िर ने उन्हें बताया कि वह पहले भी फ़र्ज़ी ज़मानत के मामलों में शामिल रहा है। उसने रिपोर्टर को आश्वासन दिया कि उनका (रिपोर्टर का) काम बिना किसी समस्या के हो जाएगा।

रिपोर्टर : ये बताओ, जो आप फ़र्ज़ी ज़मानत करवाओगे हमारे बंदे की, उसमें ऐसा तो नहीं आगे कोई परेशानी हो?

मुनाज़िर : है जाएगो (हो जाएगा)।

रिपोर्टर : आप करा चुके हो पहले?

मुनाज़िर : हाँ।

जब रिपोर्टर ने कहा कि उन्हें नक़ली गारंटरों की ज़रूरत है, तो मुनाज़िर ने उन्हें (रिपोर्टर को) सलाह दी कि बातचीत के दौरान वह (रिपोर्टर) बार-बार फ़र्ज़ी शब्द का इस्तेमाल न करें। मुनाज़िर ने कहा कि आपका (रिपोर्टर का) ध्यान अपने मुवक्किल की ज़मानत सुनिश्चित करने पर होना चाहिए और अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें बार-बार फ़र्ज़ी शब्द का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

रिपोर्टर : ये तो एक बोल रहे हैं, मुझे दो चाहिए थे फ़र्ज़ी।

मुनाज़िर : तुम फ़र्ज़ी का नाम ही मत लो, चार दिला देंगे ज़मानती। फ़र्ज़ी का नाम मत लो, तुमने बात खोल दी बस।

रिपोर्टर : अरे, मैं आपसे तो बात कर सकता हूँ?

मुनाज़िर : हमने कह दिया ना! ओरिजनल देंगे, फ़र्ज़ी हो फ़र्ज़ी।

रिपोर्टर : होगा वो फ़र्ज़ी?

मुनाज़िर : तुम फ़र्ज़ी का नाम ही मत लो, …आपको अपनी ज़मानत से मतलब।

रिपोर्टर : आपसे तो मैं बात कर सकता हूँ?

बातचीत आगे बढ़ी, तो मुनाज़िर ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा कि चूँकि वह फ़र्ज़ी ज़मानत के लिए पैसे ले रहा है, इसलिए वह यह सुनिश्चित करेगा कि काम हो जाए। उसने रिपोर्टर को आश्वासन दिया कि यदि आरोपी ज़मानत मिलने के बाद फ़रार भी हो जाए, तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।

मुनाज़िर : जब पैसे हम भरपूर ले रहे हैं, तो तुम्हें उससे क्या टेंशन? …तुम पर कोई टेंशन न आने देंगे।

रिपोर्टर : कैसी टेंशन?

मुनाज़िर : कैसी भी, …तुम्हें तो हम ज़मानत कराके देंगे। चाहे मुल्ज़िम भाग जाए।

अब मुनाज़िर ने फ़र्ज़ी ज़मानत की व्यवस्था करने के लिए वसूले जाने वाले पैसे के बारे में बात की। वह चार गारंटर की व्यवस्था करने के लिए 30,000 रुपये की माँग करता है। इसमें से उसने 4,000 रुपये पहले और बाक़ी 26,000 रुपये ज़मानत के समय देने की माँग की। मुनाज़िर के अनुसार, अग्रिम भुगतान के रूप में गारंटरों को 4,000 रुपये दिये जाएँगे।

मुनाज़िर : एक तो 30,000 मान के चलो।

रिपोर्टर : 30 के (हज़ार)? …काम हो जाना चाहिए?

मुनाज़िर : कोई करे, हो जाएगा।

रिपोर्टर : हो जाएगा, पक्का? …आपकी हमारी बात पक्की है? …अच्छा, पैसे एडवांस लोगे, कैसे लोगे? ये बता देना।

मुनाज़िर : पैसे जब ज़मानत पर जाएँगे, पूरे 30 हज़ार। …आज 4,000 दे दो।

रिपोर्टर : अच्छा! और बाक़ी 26,000?

मुनाज़िर : उस दिन ज़मानत के बाद।

रिपोर्टर : बस देख लेना, ऐसा न हो हम पर कोई बात आए?

मुनाज़िर : न आएगी।

रिपोर्टर : अगर ड्राइवर भाग गया हमारा, तो हम पर बात न आए। …वो आप देख लेना।

मुनाज़िर : हाँ।

रिपोर्टर : आप क्या कह रहे हो, कोर्ट में जब आप आओगे?

मुनाज़िर : अब हम ज़मानतियों से बात करेंगे, तुमने ख़र्चा दे दिया। …हम उन्हें जाकर थमाएँगे।

रिपोर्टर : ये उनको दे दोगे 500 रुपये?

मुनाज़िर : ना! ये तो मेरे हैं, आने-जाने के। …उन्हें जाकर देंगे पैसे कि ये रखो।

रिपोर्टर : अच्छा, 4,000 रुपये उनको दोगे?

अब मुनाज़िर ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से बातचीत में क़ुबूल किया कि वह नियमित रूप से ज़मानत के मामलों में गारंटर के रूप में पेश होता है। यही वजह है कि अमरोहा के एक वकील ने उसे एक बिचौलिये के माध्यम से हमसे (तहलका रिपोर्टर से) मिलने के लिए भेजा था। उसने बताया कि वह गारंटर के रूप में प्रत्येक ज़मानत के लिए 1,000 से 4,000 रुपये तक कमाता है।

रिपोर्टर : अच्छा; आप ज़मानत कराते रहते हो, इसलिए वकील साहब ने आपको बुलाया है। …कितने मिल जाते हैं एक ज़मानत पर आपको?

मुनाज़िर : अरे, इसका तो कुछ आँकड़ा ही न है।

रिपोर्टर : फिर भी?

मुनाज़िर : तीन भी, चार भी, दो भी…।

रिपोर्टर : लाख?

मुनाज़िर : लाख मिल जाए, तो क्या बात है।

मुनाज़िर के एक सहयोगी सूरज चंद, जो उसके साथ ‘तहलका’ रिपोर्टर से मिलने आया था; ने ख़ुद हमारा (रिपोर्टर का बताया हुआ फ़र्ज़ी ज़मानत का काल्पनिक) काम करने से इनकार कर दिया। लेकिन उसने मुनाज़िर को इस काम के लिए उपयुक्त व्यक्ति बताया। सूरज के अनुसार, मुनाज़िर बिना किसी कठिनाई के फ़र्ज़ी ज़मानत करवा लेता है; क्योंकि वह इस काम में शामिल लोगों को जानता है। सूरज ने रिपोर्टर को यह भी सलाह दी कि वह (रिपोर्टर) अपने वकील से कहें कि वह सतर्क रहें और अदालत में गारंटरों के फ़र्ज़ी होने का संदेह न जताएँ।

सूरज : वकील से कह देना, बोले न कि हम नक़ली ज़मानत कर रहे हैं; कोर्ट में किसी से। बस ये करा दें, चार आदमी भेज देंगे।

रिपोर्टर : करा देंगे नक़ली ज़मानत?

सूरज : नक़ली हो या असली हो, …करा देंगे। मैं गारंटी नहीं लूँगा, मगर मुझे पता है ये करा देंगे (मुनाज़िर की तरफ़ इशारा करते हुए)।

रिपोर्टर : क्या नाम है इनका?

सूरज : मुनाज़िर, इनके (मुनाज़िर के) हैं कई चेले। …मुझे पता है, ये करा देंगे।

रिपोर्टर : नक़ली ज़मानत वाले?

सूरज : नक़ली वाले नहीं हैं, वो हैं तो असली वाले। लेकिन वो इनसे नहीं बताएँगे। ये काम करेंगे असली; …अब वो नक़ली हो जाए, ये बात अलग।

यह सिर्फ़ फ़र्ज़ी ज़मानत ही नहीं है, जिसका इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए किया जा रहा है। यहाँ तक कि सामान्य ज़मानत भी आय का स्रोत बन गयी है। कुल मिलाकर ज़मानत एक बड़ा व्यवसाय बन गया है। इन लोगों ने बताया कि हमारे दिल्ली निवासी बिचौलिये इरशाद अहमद (बदला हुआ नाम) इससे अच्छी कमायी कर रहे हैं। इरशाद, जो पहले भी गारंटर के रूप में काम कर चुका है; ज़मानत के व्यवसाय को वास्तविक बताता है। उसने गंभीर ग़ैर-ज़मानती अपराधों में आरोपियों का समर्थन करने की बात स्वीकार की। जब उससे जोखिम के बारे में पूछा गया, तो उसने इसे यह कहते हुए टाल दिया कि एक बार ज़मानत मिल गयी, तो बाक़ी सब न्यायालय की चिन्ता है; भले ही आरोपी ग़ायब हो जाए।

रिपोर्टर : तो ये तो अच्छा बिजनेस है, ज़मानत वाला?

इरशाद : जेनुइन (असली) भी है। जेनुइन आदमी ने जेनुइन तरीक़े से कर दिया।

रिपोर्टर : जेनुइन कर तो दिया, मगर रिस्क भी तो है भाई! …भाई! आपने कितनी ज़मानत दे दी होगी आज तक जेनुइन वाली।

इरशाद : दो दी हैं।

रिपोर्टर : कौन-कौन से केस थे?

इरशाद : मैंने दी है, …23 था, 352 था।

रिपोर्टर : ये क्या होता है?

इरशाद : 23 मारपीट करना और 352 घर में घुसकर मारना। …147, 148, …188 सरकारी कर्मचारी पर हाथ उठाना।

रिपोर्टर : ये सब बेलेबल (ज़मानती) हैं?

इरशाद : ना; …नॉन बेलेबल (ग़ैर-ज़मानती) हैं।

रिपोर्टर : इनकी ज़मानत दी है तुमने? …क्या ये रिस्क नहीं है?

इरशाद : जब कोर्ट ने ज़मानत दे दी, तो केस चलता रहेगा।

रिपोर्टर : जैसे घर वाले ज़मानत नहीं देते हैं; …कल को भाग गया, तो क्या होगा?

इरशाद : मैं तो कोर्ट के पास 25,000 जमा। …वारंट आएगी, पुलिस आएगी वारंट लेकर। …क्या होगा? बोल देंगे, मिल नहीं रहा मुल्ज़िम? ख़तम कहानी।

जब इरशाद से पूछा गया कि बाहर से गारंटर की इतनी अधिक माँग क्यों है? और आरोपी के परिवार के सदस्य गारंटर के रूप में आगे क्यों नहीं आ रहे हैं? तो उसने बताया कि परिवारों के पास अक्सर ज़मानत के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक दस्तावेज़ या संपत्ति का अभाव होता है। यही कारण है कि बाहरी लोग गारंटर के रूप में आगे आते हैं और इसके लिए पैसे लेते हैं। उसने विस्तार से बताया कि किस प्रकार मामले के आधार पर सावधि जमा, या यहाँ तक कि बाइक को भी ज़मानत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

रिपोर्टर : मुझे ये बताओ, एक चीज़; …जो मुल्ज़िम होता है, उसके घर वाले नहीं होते, जो ज़मानत देंगे?

इरशाद : होते हैं।

रिपोर्टर : तो वो ज़मानत क्यूँ नहीं देते। बाहर ज़रूरत क्यूँ होती है?

इरशाद : उनके डाक्यूमेंट्स नहीं हैं। प्रॉपर्टी नहीं है। कोर्ट जो है, रजिस्टर्ड प्रॉपर्टी माँगता है।

रिपोर्टर : हर ज़मानत पर? …चाहे छोटा केस (मुक़दमा) हो या बड़ा?

इरशाद : अब जैसे छोटा केस है, हमने अमाउंट फिक्स कर दिया (रक़म तय कर दी) कोर्ट को 20,000 का, तो मोटरसाइकिल तक चल जाती है। …और मॉडल अगर ऊपर है, तो 50,000 तक की भी चल जाती है।

रिपोर्टर : मर्डर और रेप केस में कितना होता है?

इरशाद : 50के (हज़ार) भी है, लाख भी है।

रिपोर्टर : मतलब, लाख रुपीज की कोई चीज़ होनी चाहिए, वो गिरवी रखनी पड़ेगी कोर्ट में?

इरशाद : वो कोर्ट में रख लेंगे, …एफडी जो है, मुहर लगाकर अपने पास रख लेंगे।

रिपोर्टर : वो एफडी आप तुड़वा नहीं सकते? …जब तक केस चलेगा?

इरशाद : न, …जो पैसा बढ़ेगा, वो आप पर ही बढ़ेगा।

रिपोर्टर : जैसे मेरी 10 लाख की एफडी है और ज़मानत है एक लाख की, उसको मैने रखवा दिया; …उसमें एक लाख ही तो ख़तम होगा, पूरा 10 लाख थोड़ी ख़तम हो जाएगा?

इरशाद : हाँ।

रिपोर्टर : नौ तो निकल सकता हूँ मैं? …ऐसी बात थोड़ी है कि घर वालों के पास कुछ होगा ही नहीं?

इरशाद : बहुतों पर नहीं है।

रिपोर्टर : भाई है, बीवी है, ससुर, साला, किसी के नाम तो कुछ होगा?

इरशाद : दिल्ली में किसके नाम रजिस्ट्री है?

रिपोर्टर : जो ठीक-ठाक रह रहे हैं, उन सबके पास है।

इरशाद : उनके पास एक ही तो है, अब अगर दो आदमी फँस जाते हैं। …अब मेरा केस हुआ था, जब पाँच ज़मानती चाहिए थे…।

रिपोर्टर : आपका केस था?

इरशाद : एक बार झगड़ा हुआ था, मार-पीट हुई थी। कोई रिश्तेदार भी तैयार नहीं था।

रिपोर्टर : क्यूँ?

इरशाद : डरते हैं लोग। हमारा ये हो जाएगा, वो हो जाएगा।

रिपोर्टर : जबकि प्रॉपर्टी थी सबके नाम?

इरशाद : हाँ; इसलिए मैंने मजबूरी में एफडी करायी 25,000 की, …ज़मानत से पहले।

Handcuffed Man Being Released

भारत में फ़र्ज़ी और सामान्य ज़मानत एक बड़ा कारोबार बन गया है। हम अक्सर भारतीय मीडिया में फ़र्ज़ी ज़मानत कारोबार में लिप्त गिरोहों के पकड़े जाने की ख़बरें पढ़ते हैं। रेलवे में कई वर्षों से चल रहे करोड़ों रुपये के ज़मानत बॉन्ड घोटाले की ख़बरें हैं, जिसमें सीबीआई ने कई गिरफ़्तारियाँ की हैं। ‘तहलका’ की पड़ताल में शामिल तीनों किरदारों- मुनाज़िर, सूरज और इरशाद ने स्वीकार किया कि वे ज़मानत का प्रबंध करके पैसा कमाते हैं। इरशाद के अनुसार, उसने प्रत्येक ज़मानत के लिए 10,000 रुपये से लेकर 15,000, …30,000 रुपये तक की रक़म वसूली है। मुनाज़िर ने भी इस काम के लिए अपनी दर बतायी है। इरशाद ने दावा किया है कि ज़मानत राशि के मामले में राजस्थान अधिक महँगा है; क्योंकि वहाँ वकीलों को गारंटर खोजने में संघर्ष करना पड़ता है। उसने बताया है कि राजस्थान में एक गारंटर प्रति ज़मानत 15,000 से 20,000 रुपये तक लेता है, जबकि झारखण्ड में यह दर सस्ती है; लगभग 10,000 रुपये।

जब मुनाज़िर और सूरज बिचौलिये इरशाद के माध्यम से ‘तहलका’ रिपोर्टर से मिलने आये, तो उन्होंने यह आभास दिया कि जिस ज़मानत की बात हो रही है, वह असली है। उन्होंने कहा कि अभियुक्तों को अदालत की तारीख़ों पर नियमित रूप से उपस्थित होना चाहिए, अन्यथा उन्हें गारंटर के रूप में परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन जब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने उन्हें बताया कि उनका मामला फ़र्ज़ी ज़मानत का है और आरोपी का अदालत में पेश होने का कोई इरादा नहीं है, तो मुनाज़िर चार फ़र्ज़ी गारंटरों की व्यवस्था करके मदद करने के लिए तैयार हो गया।

सूरज ने स्वयं इसमें सीधे तौर पर शामिल होने से इनकार कर दिया; लेकिन रिपोर्टर को आश्वासन दिया कि उसका (सूरज का) सहयोगी मुनाज़िर इस मामले को सँभाल लेगा। मुनाज़िर ने चार फ़र्ज़ी गारंटरों की व्यवस्था करने के लिए 30,000 रुपये की माँग की। उसने बताया कि जिस वकील के माध्यम से वे (मुनाज़िर और सूरज) हमसे (रिपोर्टर से) मिलने आये हैं, अगर उन्होंने (वकील ने) पहले ही उन्हें बता दिया होता कि ज़मानत फ़र्ज़ी है, तो वे ज़मानतदारों को साथ लेकर आते। मुनाज़िर ने कहा कि उसे ज़मानतियों का इंतज़ाम करने में दो दिन लगेंगे। इरशाद के अनुसार, अक्सर वकीलों को ज़मानत हासिल करने के लिए गारंटर की ज़रूरत होती है; चाहे वह नकली हो या असली। वास्तव में अमरोहा के एक फ़ौजदारी वकील के माध्यम से इरशाद ने मुनाज़िर और सूरज, दोनों को हमारी फ़र्ज़ी ज़मानत याचिका के लिए तैयार किया था; लेकिन इससे पता चलता है कि यह ज़मानत कराने का काम उनके समूह का एक नियमित अभ्यास बन गया है।

पड़ताल के दौरान ‘तहलका’ के अंडरकवर रिपोर्टर और दलालों के बीच थोड़ी बहस हुई। ‘तहलका’ रिपोर्टर से मिलने आये दो लोगों में से मुनाज़िर को विशेष रूप से रिपोर्टर के इरादों पर संदेह हुआ। उन्हें (दलालों) संदेह था कि उनकी रिकॉर्डिंग की जा रही है। बातचीत के दौरान एक समय मुनाज़िर ने रिपोर्टर का मोबाइल फोन उठाया, जो टेबल पर रखा हुआ था और उसे हटाने के लिए कहा; यह कहते हुए कि फोन ऑडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं। यहाँ तक कि वीडियो में क़ैद होने से बचने के लिए उन्होंने कुछ मिनटों तक अपने चेहरे को गर्दन के चारों ओर से कपड़े के टुकड़े से ढक रखा था। बाद में जब रिपोर्टर ने उन्हें आश्वस्त किया कि कोई रिकॉर्डिंग नहीं हो रही है, तो दोनों ने निश्चिंत होकर बातचीत पुन: शुरू की। इसके बाद उन्होंने (दलालों ने) रिपोर्टर को आश्वासन दिया कि फ़र्ज़ी ज़मानत का प्रबंध उनके माध्यम से किया जाएगा। हालाँकि अगले दिन जब रिपोर्टर दिल्ली लौटे, तो बिचौलिया इरशाद को दोनों की ओर से धमकी भरा फोन आया। उन्होंने इरशाद पर आरोप लगाया कि वह उनकी रिकॉर्डिंग के लिए एक मीडियाकर्मी को लेकर आये थे; लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि वे (दोनों दलाल) डरे हुए नहीं हैं और वे (दोनों दलाल) जो चाहें, कर सकते हैं।

कांवड़ यात्रा को कलंकित न करें

सावन का महीना शुरू होते ही पूरा भारत शिवमय हो जाता है। भगवान शिव के भक्त अपने-अपने तरीक़े से उनकी आराधना करते हैं। इसी आराधना का हिस्सा कांवड़ लाना भी है। कांवड़ यात्रा आसान नहीं होती है। कांवड़ लाने के कठोर नियम इसे विशेष बनाते हैं।

देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से ऐसे लोग कांवड़ यात्रा में शामिल होने लगे हैं, जो धर्मार्थ नहीं, बल्कि आनंदार्थ कांवड़ यात्रा लाने जाते हैं। इनमें छोटे बच्चों से लेकर अधेड़ उम्र तक के लोग तो शामिल होते ही हैं, महिलाएँ भी अब शामिल होने लगी हैं। कांवड़ यात्रा को निर्विघ्न और सुविधाजनक बनाने के लिए सरकारें आम सड़कों से लेकर हाईवे तक विशेष व्यवस्था तय करती हैं। तक़रीबन 40 प्रतिशत प्रशासनिक अमला और 60 प्रतिशत से ज़्यादा पुलिस प्रशासन कांवड़ियों की यात्रा सुगम बनाने के लिए लगाया जाता है। इसके अलावा ज़्यादातर राजनीतिक पार्टियाँ, नेता और संगठन कांवड़ियों की सेवा-सुश्रूषा में लग जाते हैं। ठहरने, खाने-पीने और पैर दबाने तक की सेवा के लिए पूरे उत्तर भारत में लाखों कैंप लगा दिये जाते हैं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि कांवड़ लाने वालों में अधिकांश कांवड़िये कथित होते हैं, जो नशेड़ी, जुआरी, सनकी, व्यभचारी और उपद्रवी होते हैं। बड़े-बड़े डीजे, उनमें भजनों के नाम पर बजते हुए ऊटपटांग भौंडे गीत इनकी भक्ति के आदर्श बन चुके हैं।

नशे में उपद्रव करना, तोड़फोड़ करना और मारपीट करना इन कथित कांवड़ियों का शौक़ बन चुका है। इनकी कांवड़ को कोई छू ले या न भी छूए, तो इनकी धार्मिक भावनाएँ इतनी आहत हो जाती हैं कि किसी को भी आरोपी बनाकर पीटना शुरू कर देते हैं। हत्या तक पर आमादा हो जाते हैं। वाहन तोड़ देते हैं। सड़क पर बवाल करने लगते हैं। ऊपर से दु:खद यह कि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस के जवान इनके उपद्रव के आगे विवश दिखायी देते हैं। सरकारों की आज्ञा होती है कि कांवड़ियों को समस्या नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो हर साल आदेश दे देते हैं कि कांवड़ियों के लिए विशेष व्यवस्था की जाए और उन्हें कोई समस्या न हो। उनके निर्देश पर कांवड़ शिविर लगते हैं। सड़कों की मरम्मत होती है। प्रकाश की पूरी व्यवस्था होती है। वॉच टॉवर और सीसीटीवी कैमरे लगते हैं। फूल बरसाये जाते हैं। शौचालय, स्वच्छ पेयजल और चिकित्सा व्यवस्था की जाती है। खंभों पर प्लास्टिक शीट लगायी जाती हैं। इसके अलावा मांस, मदिरा की दुकानें बंद कर दी जाती हैं। डिवाइडर कट पर बैरिकेडिंग होती है। भोजनालयों पर रेट लिस्ट लगती हैं। उनका मालिक किस धर्म का है; लिखना पड़ता है।

इसके बाद भी कांवड़ियों को नशा करने के लिए शराब से लेकर गांजा, भांग और दूसरे नशीले पदार्थ कहाँ से उपलब्ध हो जाते हैं? यह ईश्वर जानता है या शायद सरकार। हद तो यह है कि कथित कांवड़िये इस बार हिंदुओं के भोजनालयों में तरह-तरह के आरोप लगाकर तोड़फोड़ कर रहे हैं। लेकिन उपद्रवियों पर कोई कार्रवाई नहीं! कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ इन कथित कांवड़ियों ने भोजन करने के बाद उसमें प्याज के झूठे आरोप लगाकर भोजनालयों पर तोड़फोड़ और मारपीट की। इन कथित कांवड़ियों ने एक जगह भोजन करने के बाद यह कहकर तोड़फोड़ की कि भोजन जूठी थालियों में परोसकर दिया गया। कई जगह मामूली कहासुनी पर ही तोड़फोड़ की। कई भोजनालयों पर भोजन में प्याज होने के आरोप लगाकर इन तोड़फोड़ की है। लूटपाट की है। हैरानी इस बात की है कि पुलिस पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही कार्रवाई कर रही है।

कुछ जगह पर पुलिस द्वारा उपद्रवी कांवड़ियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के भी मामले सामने आये हैं। कथित कांवड़ियों के उपद्रव के बीच पुलिस का यह साहस सराहनीय माना जाना चाहिए। क्योंकि ऐसे लोग कांवड़ के बहाने वही काम करते नज़र आते हैं, जो अपराधी करते हैं। कांवड़ की आड़ में इन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है, जो राजनीतिक पार्टियाँ और नेता अपने फ़ायदे के लिए देते हैं। ऐसे में समझदार पुलिस जवानों का इस तरह के उपद्रवी कांवड़ियों से निपटना, क़ानून-पालन के मूल कर्तव्य की मिसाल है। सभी राज्यों की पुलिस और ज़िला प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसा ही करना चाहिए। उपद्रियों को ख़िलाफ़ कार्रवाई करना कोई कांवड़ियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं है और न ही धार्मिक भावना को आहत करना है। यह कार्रवाई इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि कांवड़ की आड़ में उपद्रवी और आपराधिक तत्त्व अराजकता फैला रहे हैं। लूटपाट, मारपीट और तोड़फोड़ कर रहे हैं। नशे में धुत ऐसे लोग धर्म के लिए नहीं, बल्कि ऐश-मौज़ के लिए कांवड़ उठाकर चल देते हैं। पिछले वर्ष कई जगह कांवड़ियों ने उपद्रव मचाया था। कई हत्याएँ तक कर दी थीं। इस बार भी ऐसा न हो, इसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस के जवानों को पूरी सतर्कता के साथ मुस्तैद रहना चाहिए और कांवड़ियों के वेश में छिपे अपराधियों को सबक़ सिखाना चाहिए; भले ही सरकारें कुछ भी कहें। क्योंकि ऐसे कथित कांवड़िये, वास्तविक कांवड़ियों के लिए भी सिर दर्द बने हुए हैं। कई बार कांवड़ियों में ही झड़पें होती देखी गयी है। इसकी वजह भी वे उपद्रवी ही होते हैं, जो कांवड़ के बहाने आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने के लिए मौक़े की तलाश में रहते हैं। उपद्रव करने के लिए आमादा रहने वाले ये कथित कांवड़िये प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस के जवानों की नाक में भी दम करके रखते हैं और भक्ति के माहौल को भी ख़राब कर देते हैं।

विशुद्ध भक्ति-भजन बजाने तक से परहेज़ करने वाले ये कथित कांवड़िये वास्तविक भक्ति से भी कोसों दूर होते हैं। गाली-गलोज करना, नशा करना, हुड़दंग करना, वीडियो बनाना, चलती सड़कों पर अजीब से गानों पर नाचने के नाम पर उछलकूद करना और क़ानून की धज्जियाँ उड़ाना इन कथित कांवड़ियों का चलन बन चुका है। ऐसे कथित कांवड़ियों की बदमाशियों के चलते वास्तविक कांवड़ियों को भी बदनामी का बोझ उठाना पड़ता है। वे कांवड़िये, जो धर्म, जाति और क्षेत्र आदि की सीमाओं से परे शिव-भक्ति में मगन होकर कांवड़ को कंधों पर उठाये किसी से बिना सेवा कराये आते-जाते हैं। उन्हें यह भी पता नहीं होता कि रास्ते में उन्हें पानी की बोतल देने वाला किस धर्म से था, किस जाति से था। उनके मुख पर भक्ति की चमक और जिह्वा पर भगवान शिव का सुमिरन होता है। लेकिन हर चुनाव में मनचाही जीत हासिल करने के लिए जबसे धर्म की आड़ में राजनीति होने लगी है, राजनीतिक लोगों ने धार्मिक पाखंडियों को अपना सबसे मज़बूत हथियार बनाया हुआ है। यही लोग उपद्रवी हैं।

ज़ाहिर है कि धर्म के नाम पर सीधे जीत नहीं मिल सकती। इसलिए लोगों को डराना ज़रूरी है और लोगों को डराने के लिए प्रशासनिक ताक़त अपने हाथ में लेने के साथ-साथ अपराधियों की ज़रूरत पड़ती है। अपराधियों को भी खुल्लमखुला अपराध करने के लिए राजनीतिक अपराधियों की ज़रूरत पड़ती है। इस तरह ये दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं। जब भी कोई धार्मिक त्योहार या अनुष्ठान आता है; राजनीतिक अपराधी ऐसे अपराधियों को सक्रिय कर देते हैं, जो धर्म की आड़ लेकर उपद्रव कर सकें। आजकल ऐसा लगभग हर त्योहार पर होने लगा है। चाहे वह त्योहार किसी भी धर्म का हो। जिस धर्म का त्योहार है, अगर उस धर्म के लोग उपद्रव नहीं करना चाहते, तो दूसरे धर्म के लोगों को उपद्रव के लिए उकसाया जाता है। कांवड़ यात्रा में उवद्रवी चाहे जिस धर्म के हों; लेकिन आख़िर हैं वे उपद्रवी ही। उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की सख़्त ज़रूरत है।

हालाँकि इतनी बड़ी संख्या में कांवड़ियों के हरिद्वार पहुँचने से लेकर हरिद्वार से सुरक्षित वापसी तक के लिए उत्तराखंड के प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस प्रशासन की प्रसंशा करनी चाहिए। लेकिन अच्छा हो, जब एक भी शर्मनाक घटना न हो। ऐसा हो भी सकता है कि हर जगह कांवड़िये ही ग़लत न हों। हो सकता है कि कुछ लोग भी कांवड़ियों के साथ भी दुर्व्यवहार कर देते हों। लेकिन कांवड़िये तो भगवान शिव की भक्ति करने निकले हैं। उन्हें क्षमा करना आना चाहिए। उन्हें अपने व्यवहार से ऐसी मिसाल पेश करनी चाहिए, जिससे स्व-धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्म के लोग भी प्रभावित हों और उनकी सेवा-सुश्रूषा के लिए मन से आगे आएँ। अन्यथा जिन घटनाओं को कथित कांवड़िये अंजाम दे रहे हैं, उससे सभी कांवड़ियों के साथ-साथ सनातन धर्म और कांवड़ यात्रा बदनाम हो रही है। और यह गौरव की बात नहीं है। इसलिए कांवड़ियों से अनुरोध है कि वे कांवड़ यात्रा को कलंकित न करें।

भारत की उड़ान और अंधविश्वास

28 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्सिओम मिशन-4 पर गये भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला से जब वीडियो कॉल पर बातचीत की, तो ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने कहा कि अंतरिक्ष से भारत बहुत भव्य दिखता है।’ अंतरिक्ष से भारत बहुत भव्य दिखता होगा। लेकिन ज़मीन पर क्या सूरत-ए-हाल है? क्या सत्ता चलाने वालों, प्रशासनिक अधिकारियों के पास इस पर भी ग़ौर करने का वक़्त है या उनकी नीयत है?

बिहार के पूर्णिया ज़िले के रानीपतरा टेटगामा गाँव में झाड़-फूँक के तीन दिन बाद एक बच्चे की मौत होने पर ग्रामीणों ने डायन के शक में एक ही परिवार के पाँच लोगों से मारपीट की, फिर पेट्रोल छिड़ककर ज़िन्दा जला दिया। इसके बाद सभी शवों को घर से दो किमी दूर तालाब में फेंक दिया। दिल दहला देने वाली यह घटना 06 जुलाई की रात हुई। पाँच में तीन महिलाएँ थीं। इसके बाद पूर्णिया में ही एक और महिला पर डायन कहकर कुछ ग्रामीणों ने पत्थरबाज़ी की।

विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के लिए यह सिर्फ़ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शर्म की बात है। जब देश में चारों और हिंदूवाद का ऐसा माहौल बनाया जा रहा हो, जो मन में एक दहशत पैदा करता हो। अभिव्यक्ति की आज़ादी को सिकोड़ा जा रहा है, तो डायन के नाम पर अशिक्षित, कमज़ोर तबक़े के लोगों की हत्या क्या इस भव्य दिखने वाले भारत के लिए गंभीर चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए? ऐसी घटनाओं को दूर-दराज़ भारत में घटने वाली अपवाद घटना के रूप में आँकना देश के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक पहलू के लिए सही नहीं है। मोदी का विजन 2047 तक विकसित भारत है। क्या 2047 तक डायन प्रथा का उन्मूलन संभव है? बहुत पुरानी यह कुप्रथा आज़ादी के 78 साल बाद भी मौज़ूद है। एक तरफ़ शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में प्रवेश करने वाले पहला भारतीय बनकर इतिहास रच दिया और इसी भारत की ज़मीन पर जादू-टोना, डायन सीरखे अंधविश्वास लोगों को ख़ासकर महिलाओं को निशाना बना रहे हैं। एक अहम सवाल यहाँ पर यह भी उठता है कि बीते 11 वर्षों से प्रधानमंत्री महिलाओं के उत्थान, सशक्तिकरण के जो दावे करते हैं, उसकी पड़ताल कितनी ज़रूरी है। पूर्णिया की यह दर्दनाक घटना एक आईना है।

दरअसल ऐसी घटनाएँ देश के 12 राज्यों में अधिक हैं- झारखण्ड, बिहार, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र और असम। ऐसी घटनाएँ अधिकतर यहाँ के आदिवासी इलाक़ों में होती हैं। कई राज्यों- बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, असम ने तो इस कुप्रथा पर लगाम लगाने के लिए इसके ख़िलाफ़ क़ानून भी बनाये हैं। लेकिन क़ानून कितने कारगर हैं? यह अहम सवाल है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2012 से 2022 तक डायन शिकार से सम्बन्धित हिंसा में 1,184 लोगों की जान चली गयीं डायन प्रथा के ख़िलाफ़ असम में जो क़ानून बना है, वह बहुत कड़ा है। यहाँ दोषी पाये जाने पर अपराधी को आजीवन जेल तक की भी सज़ा का प्रावधान है।

ग़ौरतलब है कि यह क़ानून सबसे पहले बिहार राज्य ने ही बनाकर एक मिसाल क़ायम की थी और दूसरे राज्यों को एक राह दिखायी थी; लेकिन वहाँ इसका अमल प्रभावी नहीं दिखता। निरंतर संस्था द्वारा 2023-2024 में बिहार में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार, यह प्रथा 25 साल बाद भी जारी रहेगी। कम-से-कम 75,000 महिलाएँ संभवत: बिहार के प्रत्येक गाँव में दो या अधिक महिलाएँ डायन होने के आरोप के कारण लगातार ख़तरे में रहती हैं।

इस सर्वेक्षण में यह पाया गया कि जादू-टोने की शिकार लगभग 75 प्रतिशत महिलाएँ 46 से 66 वर्ष की आयुवर्ग की थीं, जिनमें से 97 प्रतिशत दलित, पिछड़ी, अति पिछड़ी जातियों से थीं। अधिकांश महिलाएँ अनपढ़, ग़रीब थीं। केवल 31 प्रतिशत ऐसी महिलाओं ने अपने मामले पुलिस या पंचायतों को बताये और जिन लोगों ने बताये उनमें से भी 62 प्रतिशत को कोई हल नहीं मिला। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस सर्वेक्षण में शामिल 85 प्रतिशत ग्राम प्रधान 1999 के अधिनियम से वाक़िफ़ नहीं थे। दिसंबर, 2024 में सर्वोच्च अदालत ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि जादू-टोने के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करना संवैधानिक भावना पर धब्बा है। बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव बाबत राजनीतिक पारा चरम पर है। लेकिन अफ़सोस कि संवैधानिक भावना पर यह धब्बा किसी भी राजनीतिक दल के लिए कोई मतलब नहीं रखता। यह धब्बा चुनावी परिदृश्य में अदृश्य है।

मराठी न बोलने पर मारपीट किस लिए?

के. रवि (दादा)

मराठी मानुस होना अपने आप में गौरव की बात मानी जाती है। राजतंत्र से लेकर पिछले कुछ दशक पहले तक मराठों ने बाहर से आये हुए लोगों की मदद ही की है। पर अब कुछ संगठन ग़ैर-मराठी लोगों से मार-पीट कर रहे हैं। पिछले 15-20 वर्षों में बिहार और यूपी वालों पर तो कई बार मुंबई में हमले हो चुके हैं। अब मायानगरी मुंबई में मराठी न बोल पाने पर कई महीने से बाहर के लोगों की पिटाई की जा रही है। पर ग़ैर-मराठी भाषी मानुसों पर हमला करना मराठा मानुसों की शान में कभी रहा ही नहीं है। मराठी से प्यार बुरी बात नहीं है, पर ग़ैर-मराठी मानुसों को प्यार से मराठी सिखायी जाए, तो अच्छा है।

मारपीट के आरोप महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं पर लग रहे हैं, जिसे संक्षेप में मनसे कहते हैं। मनसे के कार्यकर्ता उन लोगों के पास जाकर मराठी बोलने को कह रहे हैं, जो मुंबई कमाने-खाने को दूसरे राज्यों से आये हैं या सरकार द्वारा नियुक्त किये गये हैं। मराठी बोलने से मना करने एवं मराठी न बोल पाने पर उनकी पिटाई की जा रही है। अभी तक देखा गया है कि ऐसे लोगों को थप्पड़ मारे जा रहे हैं। इसके पीछे भी राज ठाकरे का एक बयान माना जा रहा है, जो गुड़ी पड़वा के रोज़ 30 मार्च को मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने दादर वाले शिवाजी पार्क में दिया था। राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा था कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा का सम्मान होना ही चाहिए। अगर कोई मराठी भाषा का अपमान करता है, तो उसे करारा जवाब दो। सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों में मराठी का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए। जो लोग जानबूझकर मराठी नहीं बोलते, उन्हें थप्पड़ मारा जाएगा।

शिवाजी पार्क उस रोज़ मनसे कार्यकर्ताओं से खचाखच भरा था। यहीं से ग़ैर-मराठी मानुसों को मराठी बोलने पर मजबूर किया जाने लगा और जिसने मराठी नहीं बोली, उस पर थप्पड़ों की बरसात होने लगी। हालाँकि अब काफ़ी सियासत गर्माने के बाद राज ठाकरे ने कहा है कि अब इस आन्दोलन को रोकना ठीक रहेगा। हमने इस मुद्दे पर काफ़ी जागरूकता फैलायी है। हमने यह भी दिखा दिया है कि अगर मराठी भाषा का सम्मान नहीं किया गया, तो क्या हो सकता है। अब मराठी लोगों को ख़ुद आगे आकर आग्रह करना चाहिए। अगर हमारे अपने लोग ही पीछे हट जाएँगे, तो फिर आन्दोलन करने का क्या फ़ायदा? पर मनसे कार्यकर्ताओं ने इन दो-ढाई महीने में ग़ैर-मराठियों को थप्पड़ मारे और बहुत-सी जगह तोड़फोड़ भी की। इस बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बयान जारी किया था कि क़ानून हाथ में लेने का किसी को अधिकार नहीं है। इसके जवाब में राज ठाकरे ने कहा कि सबसे महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सरकार की है। रिजर्व बैंक के नियम उन्हें पता हैं और उन नियमों का पालन करवाना सरकार का काम है।

मनसे की इस कर्मकांड से महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश का राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। पर ऐसा कहा जा रहा है कि यह सब देश के सबसे अमीर नगर निगम अर्थात् बृहन्मुंबई महानगरपालिका, जिसे संक्षेप में बीएमसी कहते हैं; के चुनाव के चलते किया गया है।  

मनसे की स्थापना 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर मनसे की थी। मनसे का प्रमुख एजेंडा मराठों के हितों की रक्षा करना और हिंदुत्व की विचारधारा को बढ़ावा देना रहा है। मनसे ने 2009 के विधानसभा चुनावों में 13 सीटें जीती थीं; पर 2014 और 2019 के चुनावों में उसका प्रदर्शन बहुत कमज़ोर रहा और 2024 में तो यह हाल हुआ कि विधानसभा में उसे एक भी सीट नहीं मिल सकी। 119 सीटों पर तो मनसे के उम्मीदवारों की ज़मानत तक ज़ब्त हो गयी। ऐसे में मनसे के लिए एक मौक़ा बीएमसी चुनाव में अपनी साख बचाने का आ रहा है। मुंबई मनसे का गढ़ है और बीएमसी जैसे महत्त्वपूर्ण निकाय में अगर उसकी अच्छी मौज़ूदगी रहती है, तो उसकी राजनीतिक ताक़त बढ़ेगी।

बीएमसी का बजट हज़ारों करोड़ रुपये का होता है और जो पार्टी बीएमसी में शासन करती है, उसको भ्रष्टाचार का ख़ूब मौक़ा मिलता है। बीएमसी पर शासन करने वाली पार्टी महाराष्ट्र सरकार के बाद सबसे ज़्यादा आर्थिक और राजनीतिक ताक़त मिलती है। लंबे वक़्त तक बीएमसी पर शिवसेना का शासन रहा है। पर 2022 में हुई शिवसेना की फूट में उद्धव ठाकरे कमज़ोर पड़े हैं। इसलिए राज ठाकरे ख़ुद को मज़बूत दिखाकर बीएमसी में न रहते हुए अपनी राजनीतिक ताक़त दिखाना चाहते हैं। यह कहना मुश्किल है कि बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे भाजपा की मदद करना चाहते हैं या उद्धव ठाकरे की, पर भाजपा बीएमसी पर हर हाल में शासन चाहती है। इसलिए ऐसे आसार नहीं लगते कि अभी यह राजनीति ख़त्म हुई है। बीएमसी के चुनाव से पहले न तो मराठी और ग़ैर-मराठी मानुसों के बीच तनाव कम होने के आसार नज़र आ रहे हैं और न ही राजनीति की आग को ठंडा होने के आसार नज़र आ रहे हैं। यह सब तो ठीक है; पर मराठी न बोलने पर मारपीट किसलिए? किसी पर भाषा न बोल पाने के नाम पर मारना-पीटना उचित ही नहीं है। भारतीय संविधान इसकी इजाज़त किसी को नहीं देता।

राजनीतिक अपराधीकरण

अपराध सिर्फ़ अपराधी ही नहीं करते, ताक़तवर लोग भी करते और करवाते हैं। जो जितना ज़्यादा ताक़तवर है, उसके अपराध उतने ही संगीन हैं। लेकिन उन्हें अपराधी साबित करने के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। जो ऐसी हिम्मत दिखाते हैं, उनकी अकस्मात् संदिग्ध मौत हो जाती है। लेकिन मौत सिर्फ़ उन्हीं की नहीं होती, बल्कि उनकी भी होती है, जिन्हें जीते-जी मार दिया जाता है। दुर्भाग्य से दोनों के लिए ही आवाज़ उठाने वाले बहुत कम लोग हैं।

अब तो इस तरह की हत्या के कई उदाहरण हर दिन देखने को मिल रहे हैं। जैसे, उत्तर प्रदेश में हज़ारों स्कूल बंद किये जा चुके हैं और 27,000 स्कूल बंद करने की तैयारी है। लेकिन शराब के ठेकों के लिए इसी वर्ष सरकार ने आवेदन आमंत्रित किये। 07 फरवरी, 2025 से आवेदन आने शुरू हुए और 27 फरवरी, 2025 तक मात्र 20 दिन में 1,99,232 आवेदन आये, जिनमें बिना कोई देरी किये उत्तर प्रदेश सरकार 27,308 शराब ठेकों के लाइसेंस जारी कर चुकी है। इन आवेदनों के प्रक्रिया शुल्क और शराब की बिक्री से करोड़ों रुपये कमाने के चक्कर में सरकार ने शराब ठेकों के लाइसेंस देने को प्राथमिकता पर रखा। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, शराब के ठेकों के आवेदनों से ही उत्तर प्रदेश सरकार को 1,066.33 करोड़ रुपये मिले हैं। लेकिन दु:ख की बात यह है कि 5,000 स्कूल में पढ़ने वाले मासूम बच्चे जब स्कूलों का विलय न करने की याचिका लेकर उच्च न्यायालय पहुँचे, तो उन्हें मायूसी हाथ लगी। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों से विद्यार्थियों, किसानों, मज़दूरों, छोटे पेशेवरों और व्यवसायियों से लेकर आम जनता तक को किसी-न-किसी तरह से परेशान किया जा रहा है। ज़्यादा-से-ज़्यादा टैक्स की वसूली, अधिकारों का हनन, सुविधाओं की कमी, खुला भ्रष्टाचार, अपराधों को बढ़ावा, चुनावी बेईमानी, सुनियोजित दंगे, अन्याय, आतंकवाद, तस्करी, अराजकता; ये सब राजनीतिक अपराधियों की ही तो देन हैं।

कहीं अपराध खुलकर अपराध की तरह हो रहा है, तो कहीं क़ानूनी आड़ लेकर किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दूसरे कई राज्यों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे। डराने और सताने की हद यह हो गयी है कि लोगों को न्याय के लिए शान्तिपूर्वक आन्दोलन तक नहीं करने दिये जाते। उत्तर प्रदेश में पहले जो बुलडोज़र विरोधी अपराधियों के ख़िलाफ़ चला था, अब वह हर भाजपा शासित राज्य में ग़रीबों के घरौंदों तक जा पहुँचा है। दिल्ली में तो यह झोंपड़ियों को उजाड़ते हुए कच्ची कॉलोनियों तक भी पहुँचने की तैयारी में है। सत्ता में बैठे नेताओं को सिर्फ़ ज़मीन के वे टुकड़े दिखायी दे रहे हैं, जिनकी क़ीमत करोड़ों रुपये है। जब तक वहाँ लोग बसे रहेंगे, ज़मीन सरकार को नहीं मिल सकेगी। इसलिए बुलडोज़र ही इसका अंतिम उपाय है। किसानों की ज़मीन जबरन अधिग्रहण करके छीनी ही जा रही है। इसमें आम लोग जीते-जी और वास्तविक रूप से बुरी तरह मारे जा रहे हैं।

क़ानूनी भाषा में इसे हत्या कहते हैं, जिसके लिए राजनीतिक अपराधी ही सबसे ज़्यादा दोषी हैं। लेकिन क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ता; क्योंकि राजनीतिक अपराधी अपने संरक्षण और आम लोगों को कुचलने के लिए साम, दाम, दंड और भेद के ज़रिये क़ानून का इस्तेमाल करना भी जानते हैं। अपने अनुकूल अपराधों पर सत्ताओं की राजनीतिक चुप्पी और अपने पक्ष के अपराधियों को संरक्षण देने के चलते पुलिस प्रशासन और न्यायिक पदों पर बैठे अधिकांश लोग इन राजनीतिक अपराधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में अक्षम रहते हैं। ज़्यादातर आम लोग क़ानून के बारे में कुछ भी नहीं जानते। इसीलिए वे डरे रहते हैं। लोगों के इसी डर और क़ानूनी कार्रवाई न होने के कारण आजकल भारत में राजनीतिक अपराधियों की बाढ़-सी आयी हुई है। ये राजनीतिक अपराधी अपने स्वार्थ और साम्राज्यवाद के लिए अपने संरक्षण में अपराधियों का पालन-पोषण करने और देश को लूटने का काम कर रहे हैं। किसानों की ज़मीन छीनना, ग़रीबों के घर तोड़कर ज़मीन हड़पना, लोगों की कमायी पर नज़र रखकर क़ानून बनाकर कर-वसूली करना, उनके काम-धंधे छीनना, समाज में फूट डाले रखने के लिए नफ़रत उगलना तो जैसे इन राजनीतिक अपराधियों का कर्म हो चुका है।

अब तो हद यह हो गयी है कि कई पुलिसकर्मी पीड़ितों को ही प्रताड़ित करने का काम करने लगे हैं। राजनीतिक अपराधियों ने हर तरह से लूट के रास्ते निकाल लिये हैं। हर काम सरकारी और क़ानूनी बताकर किया जा रहा है, जिससे विरोध न हो सके।

कुल मिलाकर चंद चालाक लोग सिर्फ़ अपनी ख़ुशहाली बढ़ाने के लिए यह सब कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि मरने के बाद सब कुछ यहीं रह जाना है। लेकिन दौलत, शोहरत और इज़्ज़त की भूख इतनी ज़्यादा है कि अपराध का रास्ता अपना लिया है। अगर आम आदमी बनकर अपराध करते, तो जेल होती और समाज सीधे तौर पर अपराधी कहता। इसलिए सत्ता में आकर बैठ गये। अब कोई सीधे-सीधे अपराधी नहीं कह सकेगा। कहेगा, तो वही अपराधी साबित कर दिया जाएगा।