Home Blog Page 55

राजनीतिक अपराधीकरण

अपराध सिर्फ़ अपराधी ही नहीं करते, ताक़तवर लोग भी करते और करवाते हैं। जो जितना ज़्यादा ताक़तवर है, उसके अपराध उतने ही संगीन हैं। लेकिन उन्हें अपराधी साबित करने के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। जो ऐसी हिम्मत दिखाते हैं, उनकी अकस्मात् संदिग्ध मौत हो जाती है। लेकिन मौत सिर्फ़ उन्हीं की नहीं होती, बल्कि उनकी भी होती है, जिन्हें जीते-जी मार दिया जाता है। दुर्भाग्य से दोनों के लिए ही आवाज़ उठाने वाले बहुत कम लोग हैं।

अब तो इस तरह की हत्या के कई उदाहरण हर दिन देखने को मिल रहे हैं। जैसे, उत्तर प्रदेश में हज़ारों स्कूल बंद किये जा चुके हैं और 27,000 स्कूल बंद करने की तैयारी है। लेकिन शराब के ठेकों के लिए इसी वर्ष सरकार ने आवेदन आमंत्रित किये। 07 फरवरी, 2025 से आवेदन आने शुरू हुए और 27 फरवरी, 2025 तक मात्र 20 दिन में 1,99,232 आवेदन आये, जिनमें बिना कोई देरी किये उत्तर प्रदेश सरकार 27,308 शराब ठेकों के लाइसेंस जारी कर चुकी है। इन आवेदनों के प्रक्रिया शुल्क और शराब की बिक्री से करोड़ों रुपये कमाने के चक्कर में सरकार ने शराब ठेकों के लाइसेंस देने को प्राथमिकता पर रखा। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, शराब के ठेकों के आवेदनों से ही उत्तर प्रदेश सरकार को 1,066.33 करोड़ रुपये मिले हैं। लेकिन दु:ख की बात यह है कि 5,000 स्कूल में पढ़ने वाले मासूम बच्चे जब स्कूलों का विलय न करने की याचिका लेकर उच्च न्यायालय पहुँचे, तो उन्हें मायूसी हाथ लगी। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।

यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों से विद्यार्थियों, किसानों, मज़दूरों, छोटे पेशेवरों और व्यवसायियों से लेकर आम जनता तक को किसी-न-किसी तरह से परेशान किया जा रहा है। ज़्यादा-से-ज़्यादा टैक्स की वसूली, अधिकारों का हनन, सुविधाओं की कमी, खुला भ्रष्टाचार, अपराधों को बढ़ावा, चुनावी बेईमानी, सुनियोजित दंगे, अन्याय, आतंकवाद, तस्करी, अराजकता; ये सब राजनीतिक अपराधियों की ही तो देन हैं।

कहीं अपराध खुलकर अपराध की तरह हो रहा है, तो कहीं क़ानूनी आड़ लेकर किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दूसरे कई राज्यों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे। डराने और सताने की हद यह हो गयी है कि लोगों को न्याय के लिए शान्तिपूर्वक आन्दोलन तक नहीं करने दिये जाते। उत्तर प्रदेश में पहले जो बुलडोज़र विरोधी अपराधियों के ख़िलाफ़ चला था, अब वह हर भाजपा शासित राज्य में ग़रीबों के घरौंदों तक जा पहुँचा है। दिल्ली में तो यह झोंपड़ियों को उजाड़ते हुए कच्ची कॉलोनियों तक भी पहुँचने की तैयारी में है। सत्ता में बैठे नेताओं को सिर्फ़ ज़मीन के वे टुकड़े दिखायी दे रहे हैं, जिनकी क़ीमत करोड़ों रुपये है। जब तक वहाँ लोग बसे रहेंगे, ज़मीन सरकार को नहीं मिल सकेगी। इसलिए बुलडोज़र ही इसका अंतिम उपाय है। किसानों की ज़मीन जबरन अधिग्रहण करके छीनी ही जा रही है। इसमें आम लोग जीते-जी और वास्तविक रूप से बुरी तरह मारे जा रहे हैं।

क़ानूनी भाषा में इसे हत्या कहते हैं, जिसके लिए राजनीतिक अपराधी ही सबसे ज़्यादा दोषी हैं। लेकिन क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ता; क्योंकि राजनीतिक अपराधी अपने संरक्षण और आम लोगों को कुचलने के लिए साम, दाम, दंड और भेद के ज़रिये क़ानून का इस्तेमाल करना भी जानते हैं। अपने अनुकूल अपराधों पर सत्ताओं की राजनीतिक चुप्पी और अपने पक्ष के अपराधियों को संरक्षण देने के चलते पुलिस प्रशासन और न्यायिक पदों पर बैठे अधिकांश लोग इन राजनीतिक अपराधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में अक्षम रहते हैं। ज़्यादातर आम लोग क़ानून के बारे में कुछ भी नहीं जानते। इसीलिए वे डरे रहते हैं। लोगों के इसी डर और क़ानूनी कार्रवाई न होने के कारण आजकल भारत में राजनीतिक अपराधियों की बाढ़-सी आयी हुई है। ये राजनीतिक अपराधी अपने स्वार्थ और साम्राज्यवाद के लिए अपने संरक्षण में अपराधियों का पालन-पोषण करने और देश को लूटने का काम कर रहे हैं। किसानों की ज़मीन छीनना, ग़रीबों के घर तोड़कर ज़मीन हड़पना, लोगों की कमायी पर नज़र रखकर क़ानून बनाकर कर-वसूली करना, उनके काम-धंधे छीनना, समाज में फूट डाले रखने के लिए नफ़रत उगलना तो जैसे इन राजनीतिक अपराधियों का कर्म हो चुका है।

अब तो हद यह हो गयी है कि कई पुलिसकर्मी पीड़ितों को ही प्रताड़ित करने का काम करने लगे हैं। राजनीतिक अपराधियों ने हर तरह से लूट के रास्ते निकाल लिये हैं। हर काम सरकारी और क़ानूनी बताकर किया जा रहा है, जिससे विरोध न हो सके।

कुल मिलाकर चंद चालाक लोग सिर्फ़ अपनी ख़ुशहाली बढ़ाने के लिए यह सब कर रहे हैं। यह जानते हुए भी कि मरने के बाद सब कुछ यहीं रह जाना है। लेकिन दौलत, शोहरत और इज़्ज़त की भूख इतनी ज़्यादा है कि अपराध का रास्ता अपना लिया है। अगर आम आदमी बनकर अपराध करते, तो जेल होती और समाज सीधे तौर पर अपराधी कहता। इसलिए सत्ता में आकर बैठ गये। अब कोई सीधे-सीधे अपराधी नहीं कह सकेगा। कहेगा, तो वही अपराधी साबित कर दिया जाएगा।

शुभांशु शुक्ला 20 दिन बाद अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लौटे

नई दिल्ली: शुभांशु शुक्ला समेत चार अंतरिक्ष यात्री 20 दिन बाद स्पेस से पृथ्वी पर लौट आए हैं। 23 घंटे के सफर बाद ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट ने कैलिफोर्निया के समुद्र पर लैंड किया। चारों एस्ट्रोनॉट एक दिन पहले शाम आईएसएस से पृथ्वी के लिए रवाना हुए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन शुभांशु शुक्ला की सकुशल वापसी पर हर्ष जताया है। उन्होंने अंतरिक्ष से धरती पर लौटने की इस यात्रा को मील का पत्थर करार दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स प्लेटफॉर्म के जरिए कहा, “मैं पूरे देश के साथ ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला का स्वागत करता हूं, जो अपने ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशन से पृथ्वी पर लौट आए हैं। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का दौरा करने वाले भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री के रूप में, उन्होंने अपने समर्पण, साहस और अग्रणी भावना से करोड़ों सपनों को प्रेरित किया है। यह हमारे अपने मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन गगनयान की दिशा में एक और मील का पत्थर है।” वहीं, स्पेसएक्स ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, “ड्रैगन के सुरक्षित उतरने की पुष्टि हो गई है। एस्ट्रोपैगी, शक्स, एस्ट्रो_स्लावोज़ और टिबी, पृथ्वी पर आपका स्वागत है!”

शुभांशु शुक्ला, अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री पेगी व्हिटसन, पोलैंड के स्लावोज़ उज़्नान्स्की-विस्नीव्स्की और हंगरी के टिबोर कापू 26 जून को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की ओर रवाना हुए थे। वह राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले दूसरे भारतीय बने हैं। राकेश शर्मा ने यह यात्रा 1984 में की थी। जब अंतरिक्ष यान पृथ्वी के वातावरण में लौट रहा था, तो 18 मिनट का डी-ऑर्बिट बर्न हुआ, जो प्रशांत महासागर के ऊपर हुआ। इस दौरान यान ने पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू की।

अंतरिक्ष यान के वायुमंडल में प्रवेश करते समय, करीब सात मिनट तक यान से संपर्क टूट गया था। इसे ब्लैकआउट पीरियड कहा जाता है। यह आमतौर पर उस समय होता है, जब यान तेज गति और गर्मी के कारण सिग्नल नहीं पकड़ पाता। वापसी की प्रक्रिया में यान के ट्रंक (पिछला हिस्सा) को अलग किया गया और हीट शील्ड को सही दिशा में लगाया गया, ताकि यान को वायुमंडल में प्रवेश करते समय सुरक्षा मिल सके। उस समय यान को करीब 1,600 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी का सामना करना पड़ा। अंतरिक्ष यान की सफल लैंडिंग के दौरान पैराशूट दो चरणों में खोले गए। स्पेसएक्स ने बताया कि अप्रैल में एफआरसीएम-2 मिशन के जरिए ड्रैगन यान को पहली बार पश्चिमी तट (कैलिफोर्निया) पर उतारा गया था। यह दूसरा मौका था, जब ड्रैगन यान ने इंसानों को लेकर कैलिफोर्निया के तट पर लैंडिंग की। इससे पहले, स्पेसएक्स के ज्यादातर स्प्लैशडाउन (समुद्र में उतरने) अटलांटिक महासागर में होते थे। आईएसएस पर अपने दो सप्ताह से अधिक के प्रवास के दौरान, शुभांशु शुक्ला ने कुल 310 से ज़्यादा बार पृथ्वी की परिक्रमा की और लगभग 1.3 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय की। यह दूरी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी से 33 गुना अधिक है, जो अपने आप में एक शानदार उपलब्धि है। अंतरिक्ष मिशन के दौरान चालक दल ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) से 300 से ज्यादा सूर्योदय और सूर्यास्त देखे — जो पृथ्वी की तेज परिक्रमा की वजह से संभव हुआ। इसी बीच, इसरो ने सोमवार को बताया कि शुभांशु शुक्ला ने अपने मिशन के दौरान सभी सात सूक्ष्म-गुरुत्व प्रयोग और अन्य नियोजित वैज्ञानिक गतिविधियाँ सफलतापूर्वक पूरी कर ली हैं। इसरो ने इसे “मिशन की एक बड़ी उपलब्धि” बताया है।

यमन में भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की फांसी टली

नई दिल्ली:  यमन में हत्या के मामले में फांसी की सज़ा पा चुकीं केरल की नर्स निमिषा प्रिया की सज़ा पर अंतिम समय में रोक लगा दी गई है। निमिषा को 16 जुलाई को फांसी दी जानी थी, लेकिन भारत सरकार और कई धार्मिक व सामाजिक संगठनों के अथक प्रयासों के बाद यमनी अधिकारियों ने सज़ा पर फिलहाल रोक लगाने का फैसला किया है।

यह जानकारी ‘सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल’ के सदस्य सैमुअल जेरोम ने दी। हालांकि, यह एक अस्थायी राहत है क्योंकि पीड़ित यमनी नागरिक के परिवार ने अब तक निमिषा को माफ करने या ‘ब्लड मनी’ (खून के बदले मुआवजा) स्वीकार करने पर सहमति नहीं दी है।

क्या है पूरा मामला- केरल निवासी निमिषा प्रिया पर 2017 में अपने यमनी बिजनेस पार्टनर की हत्या करने का आरोप लगा था, जिसमें उन्हें दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई गई थी।

भारत सरकार के प्रयास जारी- इस मामले में भारत सरकार की सीधी दखल की सीमाएं हैं, क्योंकि यमन की राजधानी सना में भारतीय दूतावास कार्यरत नहीं है। इसके बावजूद भारत ने औपचारिक रूप से यमन से सज़ा पर रोक लगाने की मांग की थी। सरकार धार्मिक नेताओं के ज़रिए पीड़ित परिवार से बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास कर रही है। इस प्रयास में ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया, कंथापुरम एपी अबूबक्कर मुसलियार एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। शरिया कानून के तहत अगर पीड़ित परिवार आरोपी को क्षमा कर दे या ब्लड मनी स्वीकार कर ले, तो मौत की सज़ा को टाला जा सकता है।

Meta ने 1 करोड़ Facebook अकाउंट किए बंद

नई दिल्ली:  Meta ने एक बड़े एक्शन की जानकारी दी है और बताया है कि 1 करोड़ अकाउंट्स को ब्लॉक कर दिया है, जो चोरी-छिपे दूसरे डुप्लीकेट प्रोफाइल चला रहे थे। कंपनी ने इन अकाउंट्स को इस साल की पहली छमाही में डिलीट किया है, जिसको कंपनी ने Spammy Content का नाम दिया है।

दरअसल, कंपनी का मकसद फेसबुक फीड को और ज्यादा रिलेवेंट, क्लीन और ऑथेंटिक बनाना है। खासकर तब जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर AI जनरेटेड कंटेंट का विस्तार इतनी तेजी से हो रहा है जैसे की मानों यहां बाढ़ आ गई है। कंपनी ने बताया है कि ये फेक अकाउंट कथित तौर पर फेसबुक के एल्गोरिदम और ऑडियंस रीज का फायदा उठाना चाहते हैं, उसके लिए वे बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के अकाउंट की डुप्लीकेसी बनाने की कोशिश करते थे।

कंपनी ने बताया है कि 5 लाख अन्य अकाउंट को गलत एक्टिविटी के लिए उनके खिलाफ एक्शन लिया है। यहां बताता चलें कि ये अकाउंट कमेंट स्पैम, बॉट जैसी एंगेजमेंट और कंटेंट रिसाइक्लिंग में शामिल थे।

Meta ने अपने ब्लॉगपोस्ट में बताया है कि मेटा ने ओरिजनल कंटेंट क्रिएटर्स, स्पेशली यूनिक इमेज या वीडियो बनाने वाले क्रिएटर्स को रिवॉर्ड देने के लिए नई नीति की जानकारी दी है। साथ ही कंपनी अब डुप्लिकेट कंटेंट का पता लगाने और उसकी रीज को कम करने के लिए एक तकनीक का उपयोग करेगी। Meta का यह एक्शन ऐसे समय लिया गया है, जब कंपनी खुद AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े स्तर पर काम कर रही है।

जंतर-मंतर वाले अब जा टिके हैं चंडीगढ़ के बंगलों में

क्या आपको वे पुराने दिन याद हैं जब सत्येंद्र जैन और उनके गुरु अरविंद केजरीवाल ने केवल आदर्शवाद और ​​सीटी बजाकर दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी थी? अब वही सत्येंद्र जैन पंजाब में स्वास्थ्य विभाग चला रहे हैं, वो भी चंडीगढ़ के एक शानदार सरकारी बंगले से। जी हां, वही व्यक्ति जो कभी दिल्ली की नौकरशाही से लड़ते थे, अब पंजाब के स्वास्थ्य विभाग की डोरें खींच रहे हैं, बिना किसी चीरफाड़ के। उनके पूर्व ‘विशेष कार्य अधिकारी’ शालीन मित्रा भी उनके साथ पंजाब जा चुके हैं, जिससे स्पष्ट है कि यह सिर्फ एक सप्ताहांत की पोस्टिंग नहीं है।

और जैन अकेले नहीं हैं। दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, जो कभी मुफ्त पाठ्यपुस्तकों के पक्षधर थे, अब पंजाब के शिक्षा विभाग में सलाहकार की भूमिका में हैं। और रीना गुप्ता, जो कभी केजरीवाल के आलोचकों से तकरार करती थीं, अब पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बॉस बन बैठी हैं। यह एक उल्टा राजनीतिक एक्सचेंज कार्यक्रम सा लगता है – दिल्ली के दिमाग अब पंजाब के लस्सी पसंद करने वाले लोगों में दुकान जमा रहे हैं। कभी दिल्ली डायलॉग कमीशन की उपाध्यक्ष रहीं जैस्मिन शाह अब पंजाब के आईटी विभाग में ‘लीड गवर्नेंस फेलो’ हैं। वहीं, कमल बंसल ने दिल्ली के तीर्थ यात्रा बोर्ड से पंजाब की तीर्थ यात्रा समिति का अध्यक्ष बन जाना पसंद किया है। सूत्रों के मुताबिक, चंडीगढ़ में कम से कम दस सरकारी फ्लैट अब दिल्ली से आए इन लोगों के पास हैं, जो ‘सिद्धांतवादी’ नौकरशाही की अपनी शैली भी साथ ढो कर लाए हैं। आलोचक कहते हैं – जो कभी व्यवस्था से लड़ते थे, वे अब खुद व्यवस्था बन गए हैं।

संसद समिति के जम्मू-कश्मीर दौरे से पहलगाम को बाहर रखने पर बढ़ा विवाद

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: संसद की गृह मामलों की स्थायी समिति के प्रस्तावित जम्मू-कश्मीर दौरे से पहलगाम को बाहर रखने को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। समिति की दो दिवसीय बैठक गुरुवार से शुरू हुई, जिसमें साइबर अपराध की रोकथाम, समाधान और उससे निपटने के उपायों पर चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता बीजेपी सांसद डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल ने की।बैठक में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा, इंडियन बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक के अधिकारियों ने हिस्सा लिया और साइबर अपराध से निपटने के लिए उठाए गए कदमों पर विस्तार से जानकारी दी। शुक्रवार को हुई बैठक में SEBI, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, नेशनल क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर और नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर के अधिकारी उपस्थित रहे।समिति जल्द ही जम्मू-कश्मीर दौरे पर जाने वाली है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और विकास कार्यों का जायजा लेना है। यह समिति संसद की 24 विभागीय स्थायी समितियों में से एक है, जो विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की कार्यप्रणाली की निगरानी करती है और उनकी कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए सुझाव देती है।दौरे के दौरान समिति के सदस्य स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा बलों और आम नागरिकों से संवाद करेंगे, जिससे उन्हें क्षेत्र की वास्तविक स्थिति की प्रत्यक्ष जानकारी मिल सके। यह जानकारियाँ संसद में प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट और सिफारिशों का आधार बनेंगी।सूत्रों के अनुसार, 31 अगस्त से 7 सितंबर के बीच समिति श्रीनगर, जम्मू, लेह और कश्मीर के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा करेगी। हालांकि, हाल ही में आतंकी हमले से प्रभावित पहलगाम को इस सूची से बाहर रखा गया है, जिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।गौरतलब है कि इसी इलाके में हाल ही में हुए आतंकी हमले में कई निर्दोष पर्यटक मारे गए थे। इसके बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नामक सैन्य अभियान को लेकर देशभर में चर्चा तेज हुई थी, जिसमें सेना की कार्रवाई और महिला नेतृत्व की भूमिका की व्यापक सराहना हुई थी।ऐसे में पहलगाम जैसे संवेदनशील और हालिया घटनाओं के केंद्र रहे क्षेत्र को दौरे से बाहर रखना कई लोगों को असमंजस में डाल रहा है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसे सुरक्षा कारणों से बाहर किया गया है या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति है?विपक्षी दलों ने इस निर्णय को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में हाल ही में आतंकी हमला हुआ, वहां की जमीनी हकीकत जानने से समिति का पीछे हटना समझ से परे है।बता दें कि अक्टूबर 2021 में संसद की साबऑर्डिनेट लेजिस्लेशन समिति ने भी लेह और श्रीनगर का दौरा किया था। लेकिन इस बार पहलगाम को बाहर रखने का फैसला सरकार के लिए एक नए राजनीतिक दबाव का कारण बनता दिख रहा है।

मोदी का नया उपदेश; नौकर शाही में खलबली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्देश दिया है कि सभी केंद्रीय सरकारी कर्मचारी, जिनमें अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी भी शामिल हैं, को कर्मयोगी पोर्टल के माध्यम से प्रतिवर्ष ऑनलाइन डिजिटल कोर्स को पूरा करना होगा। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने अनिवार्य कर दिया है कि सभी कर्मचारी इन कोर्सों को पास करें, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी एनुअल परफॉर्मेंस अप्रैजल रिपोर्ट यानी एपीएआर को प्रभावित करेगा।

डीओपीटी का यह आधिकारिक ज्ञापन मिशन कर्मयोगी के तहत एक मील का पत्थर है। पहले ये कोर्स अनिवार्य नहीं थे, लेकिन अब जुलाई 2025 से इन्हें अनिवार्य कर दिया गया है। इसका अर्थ है कि सभी कर्मचारियों को, चाहे उनका पद कोई भी हो, पदोन्नति और सेवा रिकॉर्ड के लिए इन कोर्सों को पूरा करना होगा। इस कदम का उद्देश्य भूमिका आधारित प्रशिक्षण को मजबूत करना और सरकारी कर्मियों में दक्षता बढ़ाना है।

पूरा कार्यक्रम सख्त समयसीमा में बांधा गया है : 31 जुलाई तक ओरिएंटेशन कार्यशालाएं पूर्ण होनी चाहिए, 31 अगस्त तक कोर्स प्लान अपलोड होने चाहिए और 15 नवंबर तक असेसमेंट लाइव कर दिए जाएंगे। सभी कर्मचारियों को 31 मार्च 2026 तक अपने लक्ष्य और मूल्यांकन पूर्ण करने होंगे। अधिसूचना के अनुसार, प्रत्येक मंत्रालय, विभाग या संगठन को विभिन्न सेवा अवधि वाले कर्मचारियों (9, 16, 25 वर्ष व उससे अधिक) के लिए प्रति वर्ष कम से कम छह उपयुक्त कोर्स निर्धारित करने होंगे। कर्मचारियों को इनमें से कम से कम 50% कोर्स पूरे करने होंगे। पाठ्यक्रमों की पूर्ति का डेटा एपीएआर प्रणाली में स्वतः परिलक्षित होगा। साथ ही प्रत्येक अधिकारी को अपने सौंपे गए कोर्सों के आधार पर वार्षिक असेसमेंट पास करना होगा, यह मूल्यांकन भी उनके औपचारिक कार्य निष्पादन रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगा।

अगले भाजपा अध्यक्ष के लिए आर एस एस ने सजा दियामंच

27 राज्य इकाइयों में अध्यक्षों की नियुक्ति के साथ भाजपा ने अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए प्रमुख आवश्यकता पूरी कर ली है। लेकिन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है यह संकेत – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अब पुनः संगठनात्मक निर्णयों में प्रमुख भूमिका में लौट आया है। अधिकांश नए राज्य अध्यक्ष या तो लंबे समय से संघ प्रचारक रहे हैं या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संघ संगठनों से राजनीति में आए हैं। महाराष्ट्र में रविंद्र चव्हाण, मध्य प्रदेश में हेमंत खंडेलवाल और बंगाल में सामिक भट्टाचार्य निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं, जो सभी कम चर्चित और संघ के प्रति निष्ठावान हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पीवीएन माधव और एन. रामचंदर राव जैसे पूर्व विधान परिषद सदस्य भी चुने गए, जहां जातीय समीकरणों की परवाह किए बिना वैचारिक दृढ़ता को प्राथमिकता दी गई।

यह रुझान स्पष्ट है। हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए भाजपा ने संघ का सहारा लिया है। संघ की पसंद ने फिलहाल आंतरिक खेमों को शांत कर दिया है क्योंकि आरएसएस की मुहर वाली नियुक्तियों पर कोई सवाल नहीं उठाता। राज्यों में संघ की यह सक्रियता अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति की भूमिका के रूप में देखी जा रही है। पार्टी सूत्रों का मानना है कि अंतिम निर्णय में प्रधानमंत्री मोदी की सहमति निर्णायक होगी, लेकिन नया अध्यक्ष लगभग निश्चित रूप से संघ की पृष्ठभूमि से होगा।

जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और पार्टी ऐसा अध्यक्ष नियुक्त करना चाहती है जिसमें वैचारिक प्रतिबद्धता एवं संगठनात्मक अनुशासन दोनों हों। राज्यों में आरएसएस द्वारा की गई नियुक्तियों से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय नेतृत्व भी इसी सोच का अनुसरण करने वाला होगा – अनुशासित, निष्ठावान और संघ-संस्कारित। औपचारिक घोषणा शीघ्र होने की संभावना है, लेकिन दिशा तय हो चुकी है, भाजपा का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष संघ का आदमी होगा।

पश्चिम बंगाल बीजेपी में बदलाव की बयार, दिलीप घोष की फिर होगी सशक्त वापसी?

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल बीजेपी के नए अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य के कार्यभार संभालने के बाद से पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष के साथ पार्टी के रिश्ते अब पहले की तुलना में काफी सहज और सामान्य हो गए हैं.सूत्रों की मानें तो इस सकारात्मक बदलाव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इतना ही नहीं, संघ के सक्रिय हस्तक्षेप से दिलीप घोष को पार्टी में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी भी शुरू हो गई है।
दिल्ली के एक वरिष्ठ भाजपा सांसद ने इस बारे में कहा की
“संघ इस पूरे विषय को गंभीरता से देख रहा है और बातचीत जारी है
शुभेंदु अधिकारी और सुकांत मजूमदार के दौर में जब दिलीप घोष संगठन में हाशिए पर चले गए थे, तब पार्टी में अंदरूनी असंतोष साफ झलकने लगा था। लेकिन अब शमिक भट्टाचार्य के अध्यक्ष बनने के बाद दिलीप घोष के साथ पार्टी की दूरी कम हुई है। सूत्र बताते हैं कि संघ के दबाव में घोष को फिर से दोबारा पार्टी में प्रभावशाली भूमिका मिलने जा रही है।
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने इस पूरे घटनाक्रम पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा,जिस बंगाल बीजेपी को मैंने अपनी मेहनत से खड़ा किया, उसे कुछ बाहरी लोगों के कहने पर क्यों छोड़ूं?
सूत्रों के मुताबिक, दिलीप घोष ने बंगाल बीजेपी प्रभारी शिव प्रकाश से मुलाकात कर अपनी नाराज़गी भी जाहिर की है। और कुछ नेताओं पर उन्हें जानबूझकर हाशिए पर धकेलने का भी सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया है।
वहीं, नए प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने इस विषय पर संकेत देते हुए कहा,
“जो लोग पहले दूर चले गए थे, वे फिर से लौटकर आएंगे। मेरा और दलीप दा का संबध बहुत पुराना है।
दायित्व संभालने के बाद शमिक भट्टाचार्य ने दिल्ली में संसदीय समिति की बैठक में भाग लिया, और गुरुवार रात उन्होंने संगठन के अहम नेता सुनील बंसल और विनोद तावड़े से मुलाकात की।
शमिक भट्टाचार्य ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह पार्टी की परंपरा के अनुसार एक नई राज्य कमेटी बनाएंगे, जिसमें 50% नए चेहरे और 50% पुराने नेताओं को जगह दी जाएगी।
राज्य बीजेपी ने 2026 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। शमिक भट्टाचार्य ने कहा, पिछले छह महीने से केंद्र के निर्देशानुसार बंगाल में योजनाबद्ध तरीके से काम हो रहा है और हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”
उन्होंने यह भी दावा किया, बिना अल्पसंख्यक वोट के भी बीजेपी बंगाल में सत्ता में आ सकती है। हमारा मकसद किसी धर्म के बीच विभाजन करना नहीं है। कई मुस्लिम समुदाय के प्रगतिशील और खुले विचारों वाले मुस्लिम समुदाय के लोग भी हमारे साथ हैं।

अहमदाबाद-मुंबई हाई स्पीड कॉरिडोर पर चलेगी स्वदेशी वंदे भारत, रफ्तार होगी 250 किमी प्रति घंटा

देश की पहली अति-आवश्यक और महत्वाकांक्षी परियोजना अहमदाबाद-मुंबई हाई स्पीड रेल कॉरिडोर पर अब जापानी बुलेट ट्रेन की जगह स्वदेशी तकनीक से विकसित सेमी हाई स्पीड वंदे भारत ट्रेन दौड़ेगी। यह भारतीय रेलवे की पहली ऐसी वंदे भारत ट्रेन होगी, जिसकी अधिकतम रफ्तार 250 किलोमीटर प्रति घंटा होगी।
रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सूरत से बलसाड़ (बलिमोरा) तक के 50 किलोमीटर सेक्शन का कार्य लगभग पूर्णता के चरण में है, और इस पर साल के अंत तक ट्रायल रन शुरू कर दिया जाएगा। उम्मीद है कि 2027 तक इस रूट पर आम जनता वंदे भारत (सिटिंग) ट्रेन से यात्रा कर सकेगी।
इस सेक्शन पर आठ-आठ कोच की दो वंदे भारत ट्रेनें संचालित की जाएंगी, जिनकी अधिकतम तकनीकी रफ्तार 280 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, लेकिन व्यावसायिक गति 250 किमी/घंटा तय की गई है।
इन उन्नत ट्रेनों के निर्माण का कार्य भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीईएमएल (भारत अर्थ मूवर लिमिटेड) को सौंपा गया है। डिजाइन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। दो ट्रेनें (कुल 16 कोच) तैयार करने में कुल लागत लगभग 768 करोड़ रुपये (प्रति कोच 48 करोड़ रुपये) आएगी। इन ट्रेनों में कैब सिग्नलिंग सिस्टम होगा, जिससे ये जापानी तकनीक वाले हाई स्पीड ट्रैक पर भी दौड़ने में सक्षम होंगी।
भारत सरकार द्वारा स्वदेशी विकल्प को प्राथमिकता देने के रुख को देखते हुए, जापान सरकार ने भारतीय रेलवे को दो पुरानी बुलेट ट्रेनें निःशुल्क देने का प्रस्ताव रखा है। इस पर फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है।
सूत्रों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर यह सहमति बन चुकी है कि 250 किमी/घंटा की रफ्तार हाई स्पीड ट्रेनों के लिए उपयुक्त और व्यावहारिक है। इसी आधार पर स्वदेशी बुलेट ट्रेन का डिजाइन वंदे भारत के प्लेटफॉर्म पर तैयार किया जा रहा है। इस गति के अनुकूल रेलवे द्वारा नई टक्कर-रोधी तकनीक ‘कवच 5.0’ भी विकसित की जा रही है।