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झारखंड हाईकोर्ट के 17वें चीफ जस्टिस बने तरलोक सिंह चौहान

रांची: झारखंड हाईकोर्ट के नवनियुक्त चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान ने बुधवार को पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। रांची के राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसके साथ ही वे झारखंड के 17वें चीफ जस्टिस बन गए।

मुख्य सचिव अलका तिवारी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा जारी चीफ जस्टिस की नियुक्ति संबंधी वारंट को हिंदी और अंग्रेजी में पढ़कर सुनाया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, झारखंड हाई कोर्ट के सभी न्यायाधीश, झारखंड सरकार के कई मंत्री, महाधिवक्ता राजीव रंजन, जस्टिस तरलोक सिंह चौहान के परिजन और राज्य सरकार के अधिकारी उपस्थित रहे।

9 जनवरी 1964 को हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू में जन्मे जस्टिस तरलोक सिंह चौहान ने शिमला के बिशप कॉटन से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली। उन्होंने 1989 में हिमाचल प्रदेश बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकन के बाद सभी विधायी शाखाओं में गहरा अनुभव अर्जित किया। वह 2014 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश और फिर स्थायी न्यायाधीश बने।

जस्टिस चौहान ने पर्यावरण कानून, बाल कल्याण और न्यायिक सुधारों में उल्लेखनीय कार्य किया। वे किशोर न्याय समिति, विधिक सेवा प्राधिकरण और हाईकोर्ट की कंप्यूटर एवं ई-कोर्ट समिति का नेतृत्व कर न्यायपालिका में डिजिटल परिवर्तन में अहम भूमिका निभा चुके हैं।

वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारतीय न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उनके नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश न्यायपालिका ने ई-फाइलिंग, ऑनलाइन सेवाओं और डिजिटल न्यायिक प्रक्रियाओं में नए कीर्तिमान स्थापित किए।

झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में जस्टिस चौहान की नियुक्ति की अधिसूचना भारत के राष्ट्रपति कार्यालय से 15 जुलाई को जारी की गई थी।

जस्टिस चौहान से पहले झारखंड के चीफ जस्टिस के रूप में कार्यरत रहे जस्टिस एम.एस. रामचंद्र राव का तबादला त्रिपुरा हाईकोर्ट कर दिया गया है।

जस्टिस रामचंद्र राव ने 25 सितंबर 2024 को झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ली थी, और उनके कार्यकाल में अदालत में कई अहम जनहित याचिकाओं और संवैधानिक मामलों की सुनवाई हुई।

संसद का दूसरा दिन भी हंगामे की भेंट चढ़ा, तीन बार स्थगित हुई लोकसभा की कार्यवाही विपक्ष ने उठाए SIR

ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमले जैसे मुद्दे, सरकार पर दोहरे रवैये का आरोप


 अंजलि भाटिया,
नई दिल्ली : मॉनसून सत्र के दूसरे दिन विपक्ष के हंगामे के कारण दोनों सदन नहीं चल पाए और आखिर में दिन भर के लिए स्थगित कर दिए गए।राज्यसभा में विपक्षी दलों के सांसदों ने ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा की मांग की और नियम 267 के तहत 12 नोटिस उप सभापति को दिए गए थे। इनमें से एक नोटिस केरल से माकपा सांसद पी संतोष ने उपराष्ट्रपति के अचानक इस्तीफे पर चर्चा कराए जाने पर दिया था। उपसभापति हरिवंश नारायण ने सभी नोटिस अस्वीकार कर दिए। शून्यकाल में हरिवंश नारायण ने समुद्री मार्ग से माल परिवहन विधेयक 2025 पर विचार के लिए प्रस्ताव पेश करने के लिए जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को बुलाया लेकिन कांग्रेसी सांसदों ने मांग की कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने का मौका दिया जाए बाकी विपक्षी दलों के सांसदों ने भी बहुत हंगामा किया जिसके चलते 10 मिनट के भीतर ही सदन की कार्यवाही 12 बजे तक स्थगित कर दी गयी। बाद में जैसे ही 12 बजे प्रश्नकाल शुरू हुआ घनश्याम तिवारी ने कर घोषणा की कि उपराष्ट्रपति का इस्तीफा तुरंत प्रभाव से राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया है। विपक्षी सांसदों के जोरदार हंगामे के चलते  पांच मिनट के भीतर सदन 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया। दो बजे भी मुश्किल से तीन मिनट भी सदन नहीं चल पाया और बुधवार 11 बजे तक के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गयी। जबकि सोमवार को राज्यसभा में केवल 15 मिनट का व्यवधान हुआ था और शाम साढ़े चार बजे तक सदन सुचारू रूप से चला था ।
लोकसभा
संसद के मानसून सत्र का दूसरा दिन लोकसभा में  भारी हंगामे के बीच गया। विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के चलते लोकसभा की कार्यवाही तीन बार स्थगित करनी पड़ी।
विपक्ष के हंगामे और विरोध-प्रदर्शन के कारण हर बार कुछ मिनटों में ही कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। सत्र के दौरान जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सांसद तख्तियां लेकर वेल में पहुंच गए और नारेबाजी शुरू कर दी। स्थिति को देखते हुए कार्यवाही पहले दोपहर 12 बजे तक, फिर 2 बजे तक, और अंततः पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। अब लोकसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 11 बजे से शुरू होगी।
दूसरे दिन विपक्षी सांसदों ने बिहार में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के खिलाफ संसद के अंदर और बाहर जोरदार विरोध दर्ज कराया। इसके साथ ही उन्होंने पहलगाम आतंकी हमला, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री से जवाब और संसद में विस्तृत चर्चा की मांग की।
सदन स्थगित होने से पहले केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, बीएसी (बिजनेस एडवाइजरी कमेटी) में तय हुआ था कि सबसे पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा होगी। चर्चा के लिए सरकार तैयार है, लेकिन विपक्ष हंगामे पर आमादा है। रिजिजू ने कहा कि चर्चा किस नियम के तहत होगी, यह तय होना बाकी है। सभी मुद्दों को एकसाथ उठाना संभव नहीं। बीएसी में यह भी सहमति बनी थी कि कोई सांसद प्लेकार्ड लेकर नहीं आएगा, फिर भी नियमों का उल्लंघन किया गया। उन्होंने आगे कहा कि संसद की कार्यवाही बाधित कर विपक्ष करोड़ों रुपये के टैक्सपेयर्स के पैसे की बर्बादी कर रहा है और इसे जनता को जवाब देना होगा। हम चर्चा के लिए तैयार हैं. फिर  भी ये सदन चलने नहीं देते हैं. यह दोहरा चरित्र ठीक नहीं है।

बॉक्स
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार पर सीढ़ियों पर खड़े होकर विरोध प्रदर्शन किया। सांसदों ने तख्तियां लेकर SIR वापस लेने की मांग की और सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने का आरोप लगाया।

संसद का दूसरा दिन भी हंगामे की भेंट चढ़ा,सरकार पर दोहरे रवैये का आरोप

अंजलि भाटिया,
नई दिल्ली: मॉनसून सत्र के दूसरे दिन विपक्ष के हंगामे के कारण दोनों सदन नहीं चल पाए और आखिर में दिन भर के लिए स्थगित कर दिए गए।राज्यसभा में विपक्षी दलों के सांसदों ने ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा की मांग की और नियम 267 के तहत 12 नोटिस उप सभापति को दिए गए थे। इनमें से एक नोटिस केरल से माकपा सांसद पी संतोष ने उपराष्ट्रपति के अचानक इस्तीफे पर चर्चा कराए जाने पर दिया था। उपसभापति हरिवंश नारायण ने सभी नोटिस अस्वीकार कर दिए। शून्यकाल में हरिवंश नारायण ने समुद्री मार्ग से माल परिवहन विधेयक 2025 पर विचार के लिए प्रस्ताव पेश करने के लिए जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को बुलाया लेकिन कांग्रेसी सांसदों ने मांग की कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने का मौका दिया जाए बाकी विपक्षी दलों के सांसदों ने भी बहुत हंगामा किया जिसके चलते 10 मिनट के भीतर ही सदन की कार्यवाही 12 बजे तक स्थगित कर दी गयी। बाद में जैसे ही 12 बजे प्रश्नकाल शुरू हुआ घनश्याम तिवारी ने कर घोषणा की कि उपराष्ट्रपति का इस्तीफा तुरंत प्रभाव से राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया है। विपक्षी सांसदों के जोरदार हंगामे के चलते  पांच मिनट के भीतर सदन 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया। दो बजे भी मुश्किल से तीन मिनट भी सदन नहीं चल पाया और बुधवार 11 बजे तक के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गयी। जबकि सोमवार को राज्यसभा में केवल 15 मिनट का व्यवधान हुआ था और शाम साढ़े चार बजे तक सदन सुचारू रूप से चला था ।
लोकसभा
संसद के मानसून सत्र का दूसरा दिन लोकसभा में  भारी हंगामे के बीच गया। विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के चलते लोकसभा की कार्यवाही तीन बार स्थगित करनी पड़ी।
विपक्ष के हंगामे और विरोध-प्रदर्शन के कारण हर बार कुछ मिनटों में ही कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। सत्र के दौरान जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सांसद तख्तियां लेकर वेल में पहुंच गए और नारेबाजी शुरू कर दी। स्थिति को देखते हुए कार्यवाही पहले दोपहर 12 बजे तक, फिर 2 बजे तक, और अंततः पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। अब लोकसभा की कार्यवाही बुधवार सुबह 11 बजे से शुरू होगी।
दूसरे दिन विपक्षी सांसदों ने बिहार में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के खिलाफ संसद के अंदर और बाहर जोरदार विरोध दर्ज कराया। इसके साथ ही उन्होंने पहलगाम आतंकी हमला, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री से जवाब और संसद में विस्तृत चर्चा की मांग की।
सदन स्थगित होने से पहले केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, बीएसी (बिजनेस एडवाइजरी कमेटी) में तय हुआ था कि सबसे पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा होगी। चर्चा के लिए सरकार तैयार है, लेकिन विपक्ष हंगामे पर आमादा है। रिजिजू ने कहा कि चर्चा किस नियम के तहत होगी, यह तय होना बाकी है। सभी मुद्दों को एकसाथ उठाना संभव नहीं। बीएसी में यह भी सहमति बनी थी कि कोई सांसद प्लेकार्ड लेकर नहीं आएगा, फिर भी नियमों का उल्लंघन किया गया। उन्होंने आगे कहा कि संसद की कार्यवाही बाधित कर विपक्ष करोड़ों रुपये के टैक्सपेयर्स के पैसे की बर्बादी कर रहा है और इसे जनता को जवाब देना होगा। हम चर्चा के लिए तैयार हैं. फिर  भी ये सदन चलने नहीं देते हैं. यह दोहरा चरित्र ठीक नहीं है।

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लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार पर सीढ़ियों पर खड़े होकर विरोध प्रदर्शन किया। सांसदों ने तख्तियां लेकर SIR वापस लेने की मांग की और सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने का आरोप लगाया।

नागरिक पहचान का चुनावी द्वंद्व

शिवेंद्र राणा

दिल्ली हिंदुस्तान का दिल है। यह थोड़ा रूमानी मिसरा है। वास्तव में बिहार भारत का दिल है; क्योंकि राष्ट्रीय परिदृश्य जैसा भी हो, बिहार की चर्चा के बिना अधूरा ही रहता है। चाहे महाराष्ट्र में मनसे कार्यकर्ताओं के निशाने पर बिहारी अवाम हो या बिहार का आसन्न विधानसभा चुनाव। इसी अनुरूप बिहार की चुनावी सरगर्मी में मतदाता पहचान-पत्र और मतदाता सूची को लेकर पैदा विवाद विद्रूप हो चुका है।

हुआ यूँ कि गत 24 जून को चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची का संशोधन और सत्यापन करने हेतु निर्देश जारी किया, जिसके लिए लगातार हो रहे पलायन, युवाओं की मतदान पात्रता और अवैध प्रवासियों का नाम निर्वाचन सूची में शामिल होने जैसे कारण गिनाये। ये प्रथम दृष्टया वाजिब से लगते हैं; लेकिन इसके बाद इस प्रक्रिया में कई अगर-मगर लगे, जिनमें आयोग ने ये शर्तें लगायीं कि 2003 की मतदाता सूची को सत्यापन का आधार माना जाएगा तथा इसमें शामिल लोग और उनके बच्चे ही मतगणना फार्म भरने के योग्य होंगे। यानी बिहार के कुल सूचिबद्ध 7.9 करोड़ मतदाताओं में से पाँच करोड़ मतदाता, जो 01 जनवरी, 2003 तक संशोधित और सत्यापित मतदाता सूची में शामिल थे, उनको वोटर लिस्ट का हवाला देना है। बचे हुए लोगों से चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित 11 डॉक्यूमेंट में से कम-से-कम एक प्रस्तुत करना होगा, तभी वे मतदान के योग्य माने जाएँगे। इनमें सक्षम अधिकारी द्वारा निर्गत जाति प्रमाण-पत्र, सरकारी कर्मचारियों के पहचान-पत्र या पेंशन भुगतान आदेश, वन अधिकार प्रमाण-पत्र, स्थायी आवासीय प्रमाण-पत्र, सक्षम अधिकारी द्वारा जारी जन्म प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण-पत्र, भूमि / मकान आवंटन का सरकारी प्रमाण-पत्र इत्यादि शामिल हैं। उधर चुनाव आयोग ने आधार, मनरेगा और राशन कार्ड को इस वैध दस्तावेज़ों की सूची से बाहर रखा है।

इलेक्शन कमीशन के इस आदेश और सत्यापन प्रक्रिया के प्रकाश में आने के साथ ही राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकार और विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक टकराव शुरू हो गया। और सियासत तथा नागरिक पहचान से जुड़ा यह विवाद राजनीतिक गलियारों से होते हुए न्यायपालिका की देहरी तक पहुँच गया। साथ ही विपक्षी विरोध प्रदर्शन राज्यव्यापी बंद के आह्वान में तब्दील हो गया। चूँकि 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सुनवाई होने वाली थी, इसलिए एक दिन पहले यानी 09 जुलाई को इंडिया गठबंधन की ओर बिहार बंद आयोजित किया गया, जिसे सत्ता पक्ष यानी एनडीए ने विपक्षी दलों द्वारा न्यायपालिका पर दबाव बनाने के रणनीतिक प्रयत्न के रूप में आरोपित दुराग्रह कहा। इस प्रदर्शन में शामिल कांग्रेस, राजद और वाम दलों द्वारा सरकार और आयोग पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि जैसे महाराष्ट्र में चुनाव चोरी हुआ था, वैसी ही कोशिश बिहार में भी हो रही है। उसके लिए महाराष्ट्र मॉडल से अलग यहाँ बिहार में नया मॉडल लाया जा रहा है। साथ ही साढ़े चार करोड़ लोगों का नाम काटने की कोशिश हो रही है। उनका आरोप है कि सरकार पोषित इस कार्यवाही में चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक मर्यादा से इतर अनुचित सहयोग कर रहा है। सवाल है कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी देश नागरिक पहचान के दस्तावेज़ों की प्राथमिकता, उनका सुनिश्चित आधार और एकरूपता निर्धारित नहीं कर पाया, यह कैसी आपत्तिजनक स्थिति है?

‘औरत, बेटा, घोड़ा और ग़ुलाम को पीटते रहना चाहिए, भले ही ग़लती हो या नहीं।’ -आचार्य कृपलानी ने अपनी आत्मकथा में इस फ़ारसी कहावत का उल्लेख किया है। असल में देश की ताक़तवर राजनीतिक जमात की नज़र में आम जनता की स्थिति भी ऐसी है। यानी जब मन करे, इन्हें लतियाया और धकियाया जा सकता है। चाहे वह विकास के नाम पर हो, क़ानून के नाम पर हो या नागरिक पहचान के नाम पर। वर्षों से सरकार से लेकर न्यायपालिकाएँ तक यह तय ही नहीं कर पा रही हैं कि देश में कॉमन नागरिक पहचान का दस्तावेज़ क्या हो? महाशक्ति बनने की आकांक्षा पाले जनतंत्र के लिए इससे भद्दा मज़ाक़ कोई दूसरा नहीं हो सकता। यह समझना कठिन नहीं है कि आख़िर दो वक़्त की रोटी की लड़ाई लड़ने वाला तबक़ा रोज़ नये प्रकार के पहचान-पत्र की लड़ाई कैसे लड़ेगा?

ख़ैर, यहाँ असल दिक़्क़त राजनीतिक विवाद के केंद्र में सत्ता के दाँव-पेंच या रस्साकशी का नहीं है। यहाँ वास्तविक समस्या सरकार एवं प्रशासनिक तंत्र की नीयत की है। आख़िर इतने वर्षों में नागरिक पहचान-पत्र का स्थायी अधिकार सुनिश्चित नहीं हो पाना किसकी विफलता है? जबकि यह तय किया जाना प्राथमिकता होनी चाहिए थी। दूसरी बात, सरकार एवं आयोग ने मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए अवैध प्रवासियों को भी कारण माना है। बिहार के उपमुख्यमंत्री इसे एक बड़ी चुनौती बता रहे हैं। वैसे इस सम्बन्ध में प्राप्त आँकड़े भी ज़रा डरावने हैं। जैसे 2025 में केवल किशनगंज ज़िले से जुलाई महीने के पहले हफ़्ते में दो लाख से अधिक लोगों ने स्थायी निवास प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन किया। वहीं मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में क़रीब एक लाख आवेदन आये। यूँ भी बिहार का सीमांचल इलाक़ा नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते आने वाले अवैध प्रवासियों से प्रताड़ित रहा है। वर्ष 2019 में ही गृह मंत्रालय का अनुमान था कि बिहार में लगभग 10 लाख घुसपैठियों हैं, जिनमें अधिकांश सीमांचल के इलाक़े में हो सकते हैं। इनके अवैध तरीक़े से आधार कार्ड और वोटर कार्ड प्राप्त करने की सूचना एवं आँकड़े न केवल सरकार और प्रशासनिक स्तर पर परेशानी भरे हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत भयावह हैं। यदि सरकार और प्रशासनिक तंत्र के आरोपों में रत्ती भर भी सत्यता है कि इतनी बड़ी संख्या में अवैध रूप से रोहिंग्या और बांग्लादेशी प्रवासियों ने वोटर आईडी और आधार समेत अन्य नागरिक पहचान-पत्र की सुविधा में सेंधमारी की है, तो यह अत्यंत विकट अवस्था का सूचक है।

इसके बावजूद भी यह सवाल बनता है कि यदि अवैध प्रवासी या अनाधिकृत शरणर्थियों की इतनी बड़ी संख्या बिहार में मौज़ूद होने की जानकारी सरकार एवं प्रशासन को थी, तब क्या वह इसके निस्तारण के लिए चुनावी मुहूर्त का इंतज़ार कर रही थी या उससे भी कहीं बड़ा सवाल इस मुद्दे से जुड़ा बहुसंख्यक समाज के भावनात्मक उद्वेलन का था? ताकि उसके मतों का ध्रुवीकरण इस उपजे भय के द्वारा संभव हो सके। राज्य में इसी वर्ष अक्टूबर अथवा नवंबर के पहले हफ़्ते में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। अत: विपक्ष की एक मुख्य आपत्ति चुनाव के निकट आने पर आयोग की इस संशोधन की क़वायद पर भी है। विपक्ष इसे अपने चुनावी अभियान के विरुद्ध सत्ता समर्थित निर्वाचन आयोग की अनैतिक कार्यवाही बता रहा है। यानी विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था राजनीतिक विवादों में सत्ता पक्ष आधारित कार्य में संलग्न है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के परिणाम पर सवाल उठाते हुए मतदान केंद्र के वेबकास्टिंग और सीसीटीवी फुटेज की माँग की थीं, जिसे आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश और मतदाता की निजता उल्लंघन का हवाला देते हुए देने से इनकार कर दिया। हालाँकि जिस तरह के कटु आरोप इलेक्शन कमीशन पर विगत वर्षों में विपक्ष द्वारा निरंतर लगाये जा रहे हैं, उसमें आयोग को अपनी निष्पक्षता सिद्ध करने के लिए यदि आगे बढ़कर आना पड़े, तो आना चाहिए। यही राष्ट्र के संवैधानिक-लोकतांत्रिक भविष्य का सुखद प्रयास होगा। इसके अतिरिक्त विपक्ष ने ग़रीबों, भूमिहीनों के ज़मीन, मकान के दस्तावेज़ न होने या उनके शैक्षणिक प्रमाण-पत्र न होने अथवा दूसरे राज्यों में रह रहे प्रवासियों की परेशानी का वाजिब मुद्दा उठाया है, जिनका व्यवस्थित उत्तर सरकार या आयोग को देना है।

अब यहाँ प्रश्न प्रशासनिक नियम का नहीं, सत्ता की नीयत का है और नीयत का यही सवाल न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी अन्य संवैधानिक संस्थाओं से भी है। क्योंकि व्यवस्था की स्थिति तो पहले से ही संदिग्ध रही है; और बहुत हद तक अकर्मण्य भी रही है। संभवत: ब्रिटिश सत्ता से आज़ादी और जनतांत्रिक यात्रा की शुरुआत के साथ ही। वैसे याद हो कि सीएए, एनआरसी के विवाद के दौरान देश के पूर्वी राज्यों में भारतीय सेना या प्रशासन के लिए अपनी सेवाएँ दे चुके लोगों का नागरिकता सूची से बाहर हो जाने की अत्यंत दु:खद सूचनाएँ भी चर्चा में थीं। यह प्रशासनिक तंत्र और संवैधानिक-सांविधिक संस्थाओं की विफलता ही थी, जो सुपात्र और कुपात्र में भेद करने में अक्षम साबित होती रही है।

ख़ैर, यह तो हुई आपत्तियों और आरोपों की बात, किन्तु इस विवाद के दूसरे पक्ष को भी समझना होगा। और यह सवाल विपक्ष से हैं कि क्या सत्ता प्राप्ति की अनधिकृत त्वरा में वह अवैध अप्रवासियों और घुसपैठियों यानी बांग्लादेशी रोहिंग्याओं के संकट का सत्य जानकार भी आँखें मूँदे तो नहीं रहा है? और क्या वह संवैधानिक संस्थाओं की अधिकारिता और कार्यविधि को लेकर अनावश्यक संशय तथा विवाद पैदा करने का प्रयास तो नहीं कर रहा है? जैसा कि गुरुवार यानी 10 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को राहत देते हुए उसकी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को रोकने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने आपत्ति के रूप में उठाये गये प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि आयोग को मतदाता सूची को संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। हालाँकि न्यायालय ने एक अहम टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि ग़ैर-नागरिकों को मतदाता सूची से हटाने का अधिकार गृह मंत्रालय को है न कि चुनाव आयोग को। उसने कहा कि आप नागरिकता के मामले की ओर क्यों जा रहे हैं? जबकि यह गृह मंत्रालय का विषय है। इस पर आयोग का तर्क था कि भारत का मतदाता बनने के लिए अनुच्छेद-326 के तहत नागरिकता की जाँच आवश्यक है।

अब 28 जुलाई को न्यायालय द्वारा अगली सुनवाई पर जो भी निर्णय हो। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि बिहार में उपजा मतदाता सूची संशोधन और सत्यापन का विवाद पूरे देश में चुनावी प्रक्रिया जनित गहरा विवाद उत्पन्न करने वाला है। असल में सत्ता के आकांक्षी स्वार्थी, शातिर वर्ग के राजनीतिक द्वंद्व के रूप में जब राष्ट्रीय समस्याओं को अवसर के रूप में भुनाने पर उतारू हो जाएँ, तब देश को ऐसे अप्रिय विवादों का सामना करना पड़ता है। उपरोक्त सवालों के जवाब, उनके विश्लेषण भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता एवं उसकी संवैधानिक गरिमा की सुनिश्चितता के लिए अत्यावश्यक हैं। इससे संवैधानिक संस्थाओं की शुचिता और पक्ष-विपक्ष, सभी राजनीतिक दलों की नैतिक गरिमा की सीमा भी तय होगी।

सच का मुखौटा, झूठ का साम्राज्य: पश्चिमी मुल्कों की ढोंग वादी राजनीति

ब्रिटिश साम्राज्य की कलम से खींची गई मनमानी सीमाओं ने आज भी दुनिया को खून-खराबे में झोंक रखा है। 2003 के इराक युद्ध से लेकर यूक्रेन संकट तक—पश्चिम का हर “महान” उद्देश्य असल में झूठ का जाल साबित हुआ है। वे कहते हैं “मानवाधिकार”, मगर करते हैं “तेल की लूट”। वे गाते हैं “लोकतंत्र”, मगर खेलते हैं “तख्तापलट का खेल”। यह कोई भूल नहीं, बल्कि सौ साल पुरानी नीति है—जिसमें सच को दफन करके झूठ को सत्ता का हथियार बनाया गया। आज भी, जब यूरोप रूसी गैस का मोह नहीं छोड़ पा रहा, अमेरिका अफ्रीका को “सहयोग” के नाम पर निचोड़ रहा है, और ब्रिटेन अपने औपनिवेशिक पापों की मिट्टी ढकने में लगा है—क्या दुनिया इस ढोंग का अंत देख पाएगी? 

बृज खंडेलवाल द्वारा

पश्चिमी देशों का अंतरराष्ट्रीय मामलों में ढोंग कोई नई बात नहीं है। ये एक ऐसी चाल है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों से शुरू हुई और आज तक चल रही है। पश्चिमी देश जो कहते हैं, वो करते नहीं—ये उनकी पुरानी आदत है। ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया को बांटने और झगड़े पैदा करने में महारत हासिल की थी, और आज की कई समस्याएं उसी की देन हैं।

ब्रिटिश साम्राज्य ने दुनिया को टुकड़ों में बांटा। 1916 का साइक्स-पिकोट समझौता इसका बड़ा सबूत है, जिसने मध्य पूर्व को मनमाने ढंग से बांट दिया, बिना वहां के लोगों की परवाह किए। इससे इराक, सीरिया और इजरायल-फलस्तीन जैसे झगड़े पैदा हुए। 1919 का वर्साय संधि जर्मनी को सजा देकर द्वितीय विश्व युद्ध की ज़मीन तैयार की। 1947 में भारतीय सब कॉन्टिनेंट में सीमाएं अधूरी छोड़ीं, जिससे आज तक तनाव है। मैकमोहन-हुसैन पत्राचार में अरबों से आज़ादी का वादा किया, मगर बाद में धोखा दे दिया। ये सब गलतियां नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई चालबाज़ियां थीं ताकि भविष्य में तनाव बना रहे और पश्चिमी देश फायदा उठा सकें। अफ्रीका और एशिया के तमाम मुल्क बेवजह विभाजित किए गए, जहां आज भी आग सुलग रही है।

एक्सपर्ट्स बताते हैं, 2003 में इराक पर हमला इसका बड़ा नमूना है। अमेरिका और ब्रिटेन ने दावा किया कि सद्दाम हुसैन के पास खतरनाक हथियार हैं, जो बाद में झूठ साबित हुआ। डाउनिंग स्ट्रीट मेमो से पता चला कि उन्हें सच पता था, फिर भी झूठ बोला गया। इस हमले ने इराक को बर्बाद कर दिया, आईएसआईएस जैसा आतंकी समूह पैदा हुआ, और लाखों लोग मरे। मगर कोई जवाबदेही नहीं। लीबिया में 2011 में “मानवता” के नाम पर हमला किया, जो बाद में अराजकता में बदल गया। सीरिया में चुनिंदा बागियों को समर्थन देकर गृहयुद्ध को और भड़काया।

अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार मुक्ता बेंजामिन कहती हैं, “रूस के साथ यूरोप का रवैया भी दोमुंहा है। यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा तो करते हैं, मगर 2022 तक रूसी गैस पर निर्भर रहे। ऊपर से इंसाफ की बात करते हैं, नीचे से मुनाफे की। अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार में भी यही ढोंग है। यूरोपीय यूनियन के “पार्टनरशिप” समझौते गरीब देशों को फायदा कम, नुकसान ज़्यादा देते हैं। ये औपनिवेशिक लूट का नया रूप है।”

पुराने झूठ भी कम नहीं। 1953 में ईरान में मोसद्दक को हटाने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने तख्तापलट किया, क्योंकि उसने तेल का राष्ट्रीयकरण किया था। इसे साम्यवाद के खिलाफ बताया गया, मगर असल में तेल का लालच था। इससे 1979 की इस्लामी क्रांति की नींव पड़ी। सऊदी अरब जैसे दोस्तों के मानवाधिकार उल्लंघन पर चुप्पी और चीन जैसे दुश्मनों की आलोचना भी इस दोहरे चरित्र को दिखाती है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “झूठ बोलना बुरा है, लेकिन झूठ के जाल पर जीवन बसर करना और भी बुरा है। पश्चिमी राजनीति संस्थागत झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है। यूरोप रूस के साथ अपने संबंधों की बात करते समय झूठ बोलता है, यह तथ्य छिपाते हुए कि यूक्रेन के खिलाफ रूस की बिना उकसाव की आक्रामकता के बावजूद, उसने ऊर्जा क्षेत्र में पुतिन के देश के साथ संबंध तोड़े नहीं हैं। वह व्यापार और अर्थव्यवस्था में कम विकसित देशों के साथ व्यवहार करते समय भी झूठ बोलता है। ऐसे उदाहरणों की सूची लंबी है। याद करें तो पश्चिम के झूठ का पहला और सबसे चौंकाने वाला उदाहरण 2003 में सद्दाम हुसैन के इराक पर आक्रमण था। तब से वह असत्य बोलने और नैतिक बुलंदियों से गिरने का दोषी रहा है। हालाँकि, इसने पश्चिम और उसकी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया है। अब वह केवल निर्दयी स्वार्थी और लाभ के पीछे भागने वालों का समूह लगता है। संयोग से, सच्चाई के मामले में दुनिया का बाकी हिस्सा भी बेहतर नहीं कर रहा है। विश्व स्तर पर झूठ के खिलाफ एक आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता है। हम एक उच्च सभ्यता का निर्माण तभी कर सकते हैं जब हम असत्य तथ्यों का उपयोग करना बंद कर दें।”

ये सारी समस्याएं ब्रिटिश औपनिवेशिक ढोंग से शुरू हुईं, जिन्होंने वादे तोड़े, सीमाएं अधूरी छोड़ीं, और लोगों को बांट दिया। आज कश्मीर, फलस्तीन, इराक—सब उसी की देन हैं। पश्चिमी देशों का “महानता” का दावा अब खोखला लगता है। वो बस अपने फायदे के लिए झूठ बोलते हैं। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए झूठ के खिलाफ एक आंदोलन चाहिए। जब तक कहने और करने में फर्क रहेगा, पश्चिमी देशों की साख डूबती रहेगी, और दुनिया उनकी चालबाज़ी का खामियाज़ा भुगतेगी।

नूडल्स और मोमोज के बाद भारत में बिरयानी का बढ़ता साम्राज्य 

आगरा के शाही खानसामों ने ईजाद की थी मुगलई बिरयानी जो ड्राई फ्रूट्स और गोश्त के पीसेज से महकती थी। मुगल छावनियों में बड़े बड़े देगचो या पतीलों में मद्दी आंच में रात भर पकती रहती थी।

बृज खंडेलवाल द्वारा

बिरयानी: चावल और मसालों का बादशाही अफसाना

“जहाँ बिरयानी की खुशबू पहुंच जाए, वहाँ भूख खुद चलकर आ जाती है।”

आजकल आगरा की गलियों में जो महकती बिरयानी की खुशबू तैर रही है, वह किसी इत्तेफाक़ का नतीजा नहीं, बल्कि एक लंबा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सफर है। वाटर वर्क्स क्रॉसिंग हो या छीपी टोला, पीर कल्याणी हो या दीवानी का चौराहा—हर गली, हर नुक्कड़ पर बिरयानी का ताज पहने स्टॉल सजे हैं। युवा हों या बुज़ुर्ग, अमीर हों या ग़रीब—हर कोई इस जादुई व्यंजन का दीवाना है।

शाही रसोई से ठेले तक का सफर: कहते हैं, आगरा के शाही खानसामों ने ही सबसे पहले बिरयानी को भारतीय अंदाज़ में ढाला। मुगल छावनियों में बड़े-बड़े देगचों में बिरयानी को धीमी आँच (दम) पर पूरी रात पकाया जाता था, जिसमें गोश्त, केसर, मेवे और खुशबूदार चावल का संगम होता था। यह शाही पकवान न सिर्फ पेट भरता था, बल्कि दिल को भी तसल्ली देता था।

एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार, मुमताज महल ने जब देखा कि सैनिकों का आहार संतुलित नहीं है, तो उन्होंने अपने शाही बावर्चियों को आदेश दिया कि एक ऐसा भोजन तैयार करें जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पोषण से भरपूर हो। और फिर जन्म हुआ – बिरयानी का!

बिरयानी जितनी लज़ीज़ है, उतनी ही विविधता से भरपूर भी। हर क्षेत्र ने इसे अपनाया और अपने-अपने रंग-ढंग से संवारा। हैदराबादी बिरयानी: निज़ामों की रसोई से निकली यह बिरयानी कच्चे मांस और चावल को एक साथ दम पर पकाने की कला है। इसमें केसर, जावित्री, दालचीनी जैसे मसालों की जादूगरी देखने को मिलती है। लखनवी (अवधी) बिरयानी: “दम पुख्त” शैली में बनी इस बिरयानी में नफासत और नज़ाकत का अद्भुत मेल होता है। मीट का रस चावलों में समा जाता है। कोलकाता बिरयानी: जब नवाब वाजिद अली शाह को निर्वासित किया गया, तब मटन की जगह आलू और अंडे ने बिरयानी में जगह पाई – और यह आज तक लोगों की पसंद बनी हुई है। थालास्सेरी बिरयानी (केरल): इसमें खास किस्म का खयमा चावल, मालाबार मसाले, काजू और किशमिश का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। डिंडीगुल बिरयानी (तमिलनाडु): तीखे मसाले, सीरगा सांबा चावल और दमदार स्वाद इसे खास बनाते हैं।

आगरा और ब्रज क्षेत्र में अब वेज बिरयानी ने भी झंडे गाड़ दिए हैं। कभी जो व्यंजन पूरी तरह मांसाहारी माना जाता था, वह अब पनीर, सोया, मशरूम और कटहल (जैकफ्रूट) के साथ नये अवतार में लोगों के दिलों में जगह बना रहा है।

मथुरा-वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों में, जहाँ पहले पारंपरिक शुद्ध शाकाहारी भोजन की ही कल्पना की जाती थी, वहाँ अब वेज बिरयानी के खोमचे दिखाई देने लगे हैं। यह कोई मामूली बदलाव नहीं, बल्कि भारत की पाक परंपरा में एक नया अध्याय है।

बिरयानी अब न सिर्फ स्टॉल और ढाबों तक सीमित है, बल्कि स्विगी, जोमैटो और डंज़ो जैसे ऐप्स के ज़रिए हर घर तक पहुँच चुकी है। बड़े-बड़े फूड व्लॉगर्स इसे चखने के लिए शहरों के कोने-कोने में घूमते हैं। यू-ट्यूब चैनल्स पर “10 बेस्ट बिरयानी स्पॉट्स” जैसी वीडियो की भरमार है। बिरयानी अब “इंस्टाग्रामेबल डिश” बन चुकी है।

एक हालिया सर्वे के अनुसार, भारत में हर मिनट 95 प्लेट बिरयानी ऑर्डर होती हैं। पिछले पाँच वर्षों में बिरयानी की मांग 75% तक बढ़ी है। यह आँकड़े गवाही देते हैं कि बिरयानी महज़ खाना नहीं, एक जज़्बा बन चुकी है।

बिरयानी अब दुबई, न्यूयॉर्क, लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों में भारतीय रेस्तरां की जान बन चुकी है। जहाँ भी प्रवासी भारतीय हैं, वहाँ बिरयानी की मांग है। कुछ तो इसे “डिप्लोमैटिक डिश” भी कहने लगे हैं – जो भारत की नर्म छवि को विदेशों में प्रचारित करता है।

बिरयानी के इस बेइंतिहा शौक को देख कर इतना तो साफ है कि यह महज स्वाद नहीं, बल्कि एक जज़्बात है। यह चावल और मसालों की मोहब्बत है, जो ज़ुबान से शुरू होकर दिल तक पहुँचती है।

आज जब खानपान में तकरार और तंगनज़री बढ़ रही है, बिरयानी हमें याद दिलाती है कि विविधता में ही सौंदर्य है – और यही है भारत की असली पहचान।

चटोकरे पूछ रहे हैं, समोसे कचौड़ी ज्यादा पौष्टिक हैं या बिरयानी?

भारत के सड़क किनारे ठेलों से लेकर पाँच सितारा होटल्स तक, बिरयानी ने अपना जादू बिखेर दिया है। एक समय था जब अंडे की ठेलों, आलू चाट, भल्ले और गोलगप्पों का बोलबाला था। फिर मैगी और मोमो ने युवाओं के दिलों पर राज किया। लेकिन आज हर शहर, हर गली में बिरयानी की खुशबू फैली हुई है। हैदराबाद से लेकर वृंदावन तक, मटन बिरयानी से लेकर वेज बिरयानी तक – यह व्यंजन भारत की पाक संस्कृति का नया चेहरा बन चुका है। 

बिरयानी शब्द की उत्पत्ति फारसी शब्द बिरियन (भूनना) या बिरिंज (चावल) से हुई है । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह व्यंजन ईरान से मध्य एशिया होते हुए भारत पहुँचा, जहाँ मुगलों ने इसे नया स्वाद और तकनीक दी। बिरयानी के आगे खिचड़ी, पोंगल, पुलाव, सतरंगी फ्लेवर्स के चावल, सब चमक खो रहे हैं। कई रेस्तरां में स्पाइसी चटनी और रायते और प्याज के छल्ले मसाला मारकर, परोसे जाते हैं।

जानकार भोजन प्रेमी बताते हैं कि भारत में बिरयानी ने क्षेत्रीय स्वादों को अपनाकर अलग-अलग रूप ले लिए हैं। मैसूर में एक रेस्टोरेंट में किलो के हिसाब से बाल्टी में मिलती है नॉन वेज बिरयानी। श्री महादेवन बताते हैं कि दक्षिणी बिरयानी मसालों के फ्लेवर्स से महकती है जो दूर से कद्रदानों को आकर्षित कर लेती है।

आगरा, जहां बिरयानी का उदय हुआ, आजकल वेज बिरयानी में परचम लहरा रहा है।  अभी हलवाइयों ने पहल नहीं की है, पर कुछ समय बाद भगत बिरयानी भी मिलने लगे, इस व्यंजन की राइजिंग पॉपुलैरिटी को देखते हुए, तो अचरज नहीं होगा।

कामकाज के दौरान 25% महिला सांसदों को झेलनी पड़ी यौन हिंसा, 76% ने बताई मानसिक प्रताड़ना

अंजलि भाटिया 

नई दिल्ली:  जिसे देश का सबसे गरिमामयी और सुरक्षित संस्थान माना जाता है, वहीं की महिला सांसदों को अपने ही सहयोगियों से यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन (आईपीयू) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस गंभीर सच्चाई को उजागर कर पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आईपीयू द्वारा एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 42 देशों में कराए गए इस सर्वेक्षण में सामने आया कि महिला सांसद और महिला स्टाफ सदस्यों को न सिर्फ मानसिक और यौन हिंसा सहनी पड़ रही है, बल्कि कई मामलों में उन्हें शारीरिक उत्पीड़न और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का भी शिकार होना पड़ा है।

 रिपोर्ट में बताया गया है कि  76% महिला सांसदों और 63% महिला स्टाफ ने मानसिक उत्पीड़न की शिकायत की। 25% महिला सांसदों और 36% महिला कर्मचारियों को यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। 24% महिला सांसदों और 27% कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा।13% महिला सांसदों और 5% कर्मचारियों ने शारीरिक हिंसा की घटनाएं बताईं।

40% महिला सांसदों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे कार्यस्थल पर खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।

85% मामलों में उत्पीड़न करने वाले उनके ही पुरुष सहयोगी या पार्टी के सदस्य पाए गए।

संसद भवन में महिलाएं सिर्फ कानून नहीं बना रहीं, बल्कि खुद को सुरक्षित रखने की भी लड़ाई लड़ रही हैं। रिपोर्ट में दर्ज शिकायतें बताती हैं कि महिला सांसदों को घूरने, छूने, अश्लील इशारे करने और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा — वो भी उन्हीं लोगों से जो देश की संसद में जनता की आवाज़ बनकर बैठे हैं।

संसद परिसर में ही पुरुष सांसदों द्वारा महिला सांसदों के साथ गलत व्यवहार किया जाता है।

कुछ महिला सांसदों ने स्वीकार किया कि बहस के दौरान उनके विचारों को नजरअंदाज किया गया, उन्हें बार-बार टोका गया और नीचा दिखाया गया।

85% महिला सांसदों ने बताया कि जब उन्होंने किसी मुद्दे पर आवाज उठाई, तो उन्हें ही टारगेट किया गया।

ऑस्ट्रेलिया, फिजी, भारत, मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड और नेपाल जैसे देशों की संसदों ने महिला सांसदों की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। भारत में 77 महिला सांसदों में से 47 ने माना कि उन्हें मानसिक या कार्यस्थल उत्पीड़न का अनुभव हुआ है।

भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फिलीपींस जैसे देशों की महिला सांसदों ने सर्वेक्षण में हिस्सा लिया। ज़्यादातर ने माना कि महिलाओं को अब भी संसद जैसे पवित्र मंच पर समान और सुरक्षित वातावरण नहीं मिल पा रहा है।

मॉनसून सत्र के पहले दिन विपक्ष का हंगामा, सरकार ‘ऑपरेशन सिंदूर’ समेत सभी मुद्दों पर चर्चा को तैयार

अंजलि भाटिया 

नई दिल्ली:  संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत तीखे राजनीतिक गर्मी के साथ हुई। पहले ही दिन लोकसभा में विपक्षी दलों ने ऑपरेशन सिंदूर, पहलगाम आतंकी हमला, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता संबंधी दावे और बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की मांग को लेकर जोरदार हंगामा किया। इसके चलते दिनभर लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही।

सरकार ने विपक्ष की मांग को स्वीकार करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विस्तृत बहस कराने पर सहमति जताई है। अगले सप्ताह इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में कुल 25 घंटे की चर्चा निर्धारित की गई है—जिसमें लोकसभा में 16 घंटे और राज्यसभा में 9 घंटे का समय तय किया गया है। यह फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को लगातार घेरने की कोशिश कर रहा है।

लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने तख्तियां लहराकर और नारेबाज़ी करते हुए सरकार से जवाब मांगना शुरू कर दिया। हंगामे के चलते पहले कार्यवाही को दोपहर 12 बजे तक स्थगित किया गया। इसके बाद दोपहर 2 बजे कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, लेकिन विरोध प्रदर्शन नहीं थमा, जिससे सदन की कार्यवाही दोपहर 4 बजे तक पुनः स्थगित कर दी गई।

पीठासीन सभापति संध्या राय ने विपक्षी सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और सहयोग देने की अपील करते हुए कहा कि “सरकार सभी विषयों पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। लोकतंत्र में संवाद जरूरी है, शोर नहीं।

सत्र की शुरुआत गंभीर और संवेदनशील माहौल में हुई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पहलगाम आतंकी हमले और अहमदाबाद विमान हादसे में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके साथ ही हालिया प्राकृतिक आपदाओं में मारे गए नागरिकों को भी याद किया गया। सदन में कुछ पल का मौन रखकर दिवंगत आत्माओं के प्रति शोक प्रकट किया गया।

पीठासीन सभापति जगदंबिका पाल ने सदन को जानकारी दी कि कार्य मंत्रणा समिति (BAC) की बैठक बुलाई गई है, जहां सर्वदलीय सहमति से तय किया जाएगा कि किन विषयों पर किस रूप में और कितने समय तक चर्चा की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि “सरकार विपक्ष द्वारा उठाए गए हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है।”

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में विपक्ष को आश्वस्त करते हुए कहा, “मैं सभी माननीय सदस्यों को यह विश्वास दिलाता हूं कि वे रक्षा संबंधी किसी भी विषय पर, चाहे वह जितनी भी लंबी चर्चा हो, सरकार पूरी गंभीरता से भाग लेगी। लोकसभा अध्यक्ष जो भी निर्णय लेंगे, हम उसके अनुसार पूरी भागीदारी सुनिश्चित करेंगे।

ग्राम पंचायतों ने नहीं सुने योगी के निर्देश!

सुनील कुमार

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुछ माह पूर्व ही भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिये थे; मगर भ्रष्टाचारियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। अधिकांश ग्रामीण कहते हैं कि उनका कोई भी कार्य बिना घूस के नहीं होता है। इसके अतिरिक्त जो कार्य ग्रामीण विकास के लिए किये जाते हैं, उनमें भी भ्रष्टाचार चरम पर रहता है। गाँवों के कई कार्य तो काग़ज़ों में ही हो जाते हैं; मगर धरातल पर कुछ नहीं होता।

अधिवक्ता संतोष कहते हैं कि छोटे पदाधिकारी भ्रष्टाचार तभी करते हैं, जब उन्हें ऊपर से भ्रष्टाचार करने का संकेत मिलता है। भ्रष्टाचार की काली कमायी ऊपर तक इकट्ठी होकर जाती है, जिसके चलते भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती है। अगर भ्रष्टाचार की पोल खुल जाए, तो निचले पदों पर कार्य करने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों को निलंबित करके इतिश्री कर ली जाती है; मगर किसी बड़े भ्रष्टाचारी के विरुद्ध एक रिपोर्ट तक थाने में दर्ज नहीं होती।

ग्राम पंचायत के भ्रष्टाचार की निकट से देखने वाले एक ग्राम पंचायत सदस्य नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहते हैं कि ग्राम पंचायतों में ईमानदारी अब सतयुग की गाथा जैसी लगती है। ग्राम पंचायतों में जो ईमानदार सदस्य अथवा पदाधिकारी हैं, उनको कोई नहीं पूछता एवं उन्हें आगे भी नहीं बढ़ने दिया जाता है। खड़ंजे पड़ने, नालियाँ बनने, किसी ग्रामीण को सब्सिडी मिलने का कार्य तक में भ्रष्टाचार होता है। मगर ग्राम पंचायत के एक सदस्य वीरेंद्र कहते हैं कि पंचायतों में कोई भ्रष्टाचार व्याप्त नहीं है। कुछ लोग ग्रामीणों का काम कराने के बदले चाय पानी की माँग कर देते हैं, जिसके कारण सब बदनाम हैं। वीरेंद्र के पड़ोसी ने बताया कि वीरेंद्र झूठ बोल रहा है। उसके पास ग्राम पंचायत सदस्य बनने से पहले ऐसे ठाटबाट नहीं थे, जैसे अब हैं। एक पूर्व प्रधान नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहते हैं कि ईमानदारी से कार्य करने वालों को चुनाव तक नहीं जीतने दिये जाते हैं। वह कहते हैं कि ईमानदारी दिखाएगा भी कोई क्यों? चुनाव बिना पैसे के जीत नहीं सकते। आजकल ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ने के लिए पहले तो टिकट नहीं मिलता। अगर कोई निर्दलीय लड़ भी ले, तो भी उसे चुनाव लड़ने के लिए कम-से-कम चार-छ: लाख रुपये चाहिए। चुनावों में प्रतिद्वंद्व इतना बढ़ गया है कि ग्राम पंचायत के सदस्य का चुनाव जीतने के लिए लोग दो से तीन लाख रुपये तक उड़ा देते हैं। ग्राम प्रधान बनने के लिए लोग 10 से 20 लाख का बजट रखकर चलते हैं। चुनाव ही ईमानदारी से नहीं होते, तो काम ईमानदारी से कैसे होंगे। जो व्यक्ति चुनाव जीतकर आता है, वह अगले चुनाव को जीतने के लिए चुनावी व्यय के लिए दोगुनी धनराशि इकट्ठी करता है एवं अपने जीवन स्तर को उच्चस्तरीय बनाने में लगा रहते है। उसे ग्रामीण विकास की चिन्ता से अधिक अधिकारियों से अच्छे सम्बन्ध रखने की रहती है; क्योंकि वही ग्रामीण विकास के लिए योजनाओं का बजट पास करते हैं। अंदर की बात बताऊँ, ग्रामीण विकास में होने वाले भ्रष्टाचार का पैसा मंत्रियों तक जाता है।

पूर्व ग्राम प्रधान का यह बयान सिद्ध करता है कि भ्रष्टाचार की कड़ियाँ ऊपर तक जुड़ी हुई हैं। उत्तर प्रदेश में जल जीवन योजना के तहत बनी हुई टंकियों के एक एक करके गिरने से बड़ा इसका प्रमाण और क्या हो सकता है। मगर ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार शासन तक व्याप्त है, ऐसा कहना कठिन है; क्योंकि शासन ने ही अनेक बार ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार को पकड़ा है। मगर इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ग्राम पंचायतों में विकास की कोई भी योजना आती है, तो उसका बंदरबाँट पहले ही आरंभ हो जाता है। भ्रष्टाचार का हाल यह है कि ग्रामीण स्तरीय सुविधाओं को भी तरस रहे हैं।

भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी

आरोप प्रत्यारोप को छोड़ भी दें; मगर उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें घूस लेना, विकास कार्यों में गड़बड़ी एवं वित्तीय अनियमितताएँ देखी गयी हैं। ग्राम पंचायतों में होने वाले भ्रष्टाचार में अधिकांश सदस्यों से लेकर ग्राम पंचायत अधिकारी, ग्राम प्रधान एवं सरपंच ही भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं। बीते वर्षों में भ्रष्टाचार के सामने आये अनेक मामलों से पता चला है कि ग्राम पंचायतों के विकास का दारोमदार सँभालने वाले पंचायत राज विभाग में भी भ्रष्टाचार चरम पर है। बीते वर्ष शासन ने पाया कि फ़तेहपुर सीकरी की 13 ग्राम पंचायतों के सचिवों ने घर बैठकर 24.63 लाख रुपये का भुगतान कर लिया। शासन की तत्परता के चलते पंचायती राज निदेशालय ने आईपी एड्रेस ट्रेस करके इस भ्रष्टाचार को पकड़ा एवं प्रशासन को भ्रष्ट सचिवों के विरुद्ध कार्रवाई के आदेश दिये। जनपद के कुल 15 विकास खंडों में से आठ विकास खंडों में यह भ्रष्टाचार हुआ।

बीते कुछ ही वर्षों में शासन ने ग्राम पंचायतों के कई भ्रष्टाचार पकड़े हैं। भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि हैंपपंपों खड़ंजों गाँवों में बनने वाली सीमेंट की सड़कों पानी की टंकियों स्वच्छ भारत योजना के तहत बनने वाले शौचालयों प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले घरों के लिए दी गयी सब्सिडी ग्रामीणों को मिलने वाले ऋणों क्रेडिट कार्डों, मनरेगा एवं दूसरी अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार होने के अनेक उदाहरण अब तक सामने आ चुके हैं। स्थिति यह है कि ग्राम पंचायतों चुने गये सदस्यों प्रधानों सचिवों से लेकर ब्लॉक स्तर तक बैठे सदस्य एवं अधिकारी तक घूस लिये बिना किसी का कोई कार्य नहीं करते हैं।

लखीमपुर खीरी में बीते दिनों जल जीवन योजना के तहत बनी टंकी गिरी थी। इससे पूर्व वहाँ डीपीआरओ के निरीक्षण में बिजुआ ब्लॉक के कंजा गाँव के अधिकांश हैंडपंप बंद मिले, जबकि शासन से इन हैंडपंपों को ठीक करने के लिए धनराशि मिल चुकी थी। मनरेगा के तहत भी भ्रष्टाचार चरम पर है। मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों के लिए ग्रामीण श्रमिकों की संख्या एनएमएमएस एप पर डालनी होती है। ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि इस एप पर श्रमिकों की संख्या अधिक दिखाकर सरकार से प्राप्त धनराशि निकाल लेते हैं; मगर कार्य पर कम श्रमिकों को लगाते हैं। कोटरा में बीते दिनों ऐसा ही पाया गया। वहाँ एप पर 36 श्रमिकों की उपस्थिति दिखायी गयी थी, जाँच में कार्य करते हुए मात्र 19 श्रमिक मिले। चारागाह में भी तालाब खुदाई के लिए 40 श्रमिक एप पर दिखाये गये थे; मगर जाँच हुई, तो मात्र नौ श्रमिक ही मिले।

कम ही मामलों में कार्रवाई

शासन ने बीते वर्षों में अनेक भ्रष्ट अधिकारियों एवं चुने हुए ग्रामीण प्रतिनिधियों के विरुद्ध कार्रवाई की है; मगर कुछ दिनों बाद कई जाँचें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं एवं भ्रष्टाचारी बच जाते हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं लगती है कि यह सब कैसे होता है? भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई कितनी कड़ी होती है, इसका पता इस बात से ही चल जाता है कि अभी तक किसी भी बड़े भ्रष्टाचारी को जेल नहीं हुई है। निलंबन बस्ता छीने जाने एवं आर्थिक दंड के मामले भी कम ही देखने को मिलते हैं।

बीते वित्त वर्ष में पूरे प्रदेश में ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की कितनी शिकायतें दर्ज हुईं, इसका ब्योरा ग्राम पंचायत विभाग अथवा सरकार ने जारी नहीं किया है; मगर ऐसा अनुमान है कि प्रतिदिन हज़ारों शिकायतें आती हैं। अनुमानित रूप से कह सकते हैं कि एक वर्ष में शासन के पास लाखों शिकायतें दर्ज होती हैं। मगर शिकायतों की अपेक्षा कार्रवाई का अनुपात देखें, तो वह बहुत कम है। बीते वर्ष संभल जनपद की 23 ग्राम पंचायतों में 1.75 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार पाया गया। हरदोई जनपद की भी एक ही ग्राम पंचायत में 12.57 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितताएँ सामने आयीं। ऐसे अनेक मामले उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जनपद में व्याप्त पाये गये हैं। अकेले विकास खंड बड़ोखर ख़ुर्द में हुए लाखों रुपये के भ्रष्टाचार से अनुमान लगाया जा सकता है कि पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार की स्थिति क्या होगी? सपा कार्यकर्ता दिनेश कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार की ज़ीरो टॉलरेंस नीति के ढोल पीटे जाते हैं; मगर भ्रष्टाचार चरम पर है।

आदेश की अवहेलना

कैसा हो, यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री के आदेशों की अवहेलना की जाए? उत्तर प्रदेश में ऐसा ही होता है। अपनी ज़ीरो टॉलरेंस नीति को लाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अनेक बार भ्रष्टारियों अपराधियों एवं माफ़ियाओं को चेतावनी दे चुके हैं; मगर उनकी चेतावनी के उपरांत भ्रष्टाचार एवं अपराध में बढ़ोतरी ही हुई है। माफ़ियाओं का हाल यह है कि बीते दिनों मेरठ के एक माफ़िया ने सरेआम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गाली देते हुए उसका कुछ भी बिगाड़ लेने तक की चुनौती दे डाली। सेवानिवृत्त अध्यापक बलवंत सिंह कहते हैं कि अगर मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन नहीं होता है, उनकी चेतावनी का किसी पर कोई असर नहीं होता है, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि उनके आदेश एवं चेतावनियाँ मात्र जनता को शान्त करने के लिए हैं। अन्यथा ऐसा हो ही नहीं सकता कि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री कोई आदेश दे अथवा चेतावनी दे, उसका कोई प्रभाव न हो। उत्तर प्रदेश में तो प्रभाव भी उलटा हो रहा है। भ्रष्टाचार भी बढ़ रहा है अपराध भी बढ़ रहे हैं एवं माफ़िया भी लूट मचा रहे हैं। अगर वास्तव में भ्रष्टाचारियों, अपराधियों एवं माफ़ियाओं के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होती, तो उत्तर प्रदेश में वास्तव में राम राज्य होता।

ग्राम पंचायतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अधिकांश ग्रामीण मौन साध लेते हैं। उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने कुछ कहा, तो उनके कार्य ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि एवं अधिकारी नहीं करेंगे। मगर कुछ ग्रामीण ऐसे हैं, जो इसकी परवाह नहीं करते वे भ्रष्टाचार की शिकायतें करते रहते हैं, जिससे भ्रष्टाचार की परतें खुलती रहती हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि ग्राम पंचायतों में होने वाले भ्रष्टाचार पर संज्ञान लें एवं भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के आदेश दें। भ्रष्टाचार की शिकायतों एवं कार्रवाई का अनुपात देखकर भी लंबित पड़े एवं ठंडे बस्ते में डाल दिये गये मामलों में कार्रवाई की जा सकती है।

इंडिया गठबंधन की रणनीति पर अहम बैठक 19 जुलाई को, संसद सत्र से पहले विपक्ष की एकजुटता की अग्निपरीक्षा

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ ने साझा रणनीति तैयार करने के लिए कमर कस ली है। शुक्रवार, 19 जुलाई को दिल्ली स्थित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास 10, राजाजी मार्ग पर विपक्ष के दिग्गज नेताओं की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। बैठक में संसद सत्र के दौरान उठाए जाने वाले अहम मुद्दों और सरकार को घेरे जाने की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।
इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), वाम दलों सहित इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के शीर्ष नेता शामिल होंगे। हालांकि आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की भागीदारी को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भी शामिल होने की संभावना है। यह बैठक न केवल आगामी सत्र की तैयारी के लिहाज से अहम मानी जा रही है, बल्कि इंडिया गठबंधन की आंतरिक एकजुटता की परीक्षा के रूप में भी देखी जा रही है। जबकि आम आदमी पार्टी और टीएमसी के पिछले दौर की बैठकों से दूरी बनाने के चलते विपक्ष की एकता को लेकर भी सवाल उठे हैं।
सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी या पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी वर्चुअल रूप से बैठक में शामिल हो सकते हैं। टीएमसी की ओर से एक वार्षिक पार्टी कार्यक्रम का हवाला देते हुए बैठक में फिजिकल तौर पर शामिल न हो पाने की बात कही गई है।
बैठक में कई ज्वलंत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की संभावना है, जिनमें बिहार की विवादास्पद मतदाता सूची, पहलगाम आतंकी हमला, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की अचानक समाप्ति, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवादित बयान, भारत की विदेश और व्यापार नीति, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, महिलाओं पर अत्याचार, बालासोर आत्मदाह कांड, एयर इंडिया दुर्घटना और गुजरात में पुल ढहने की घटनाएं प्रमुख हैं।
सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दल संसद में इन मुद्दों को संगठित और प्रभावी ढंग से उठाने के लिए साझा रणनीति तैयार करेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि क्षेत्रीय मुद्दों को भी राष्ट्रीय मंच पर उठाकर विपक्ष की आवाज को और धार दी जाए।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने संकेत दिया है कि विपक्ष केंद्र की विदेश और व्यापार नीति को लेकर सरकार से जवाब मांगेगा। वहीं, शिवसेना सांसद संजय राउत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में गड़बड़ियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में मतदाता सूची में गंभीर अनियमितताएं हैं, जिन्हें संसद में उठाया जाएगा।

संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चलेगा। सरकार ने  रविवार 20 जून को एक सर्वदलीय बैठक भी  बुलाई  है