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दिल्ली नगर गिनम चुनाव के मद्देनज़र… क्या केजरीवाल को नुक़सान पहुँचाएगा विश्वास का आरोप?

राजनीति में कोई किसी का न स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। अगर किसी का कोई दोस्त होता है, तो वह स्वार्थ ही होता है, जिस पर राजनीति टिकी होती है। आम आदमी पार्टी (आप) के संस्थापक सदस्यों में से एक कुमार विश्वास का न जाने क्यों किस बात को लेकर आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल से विश्वास टूट गया है कि अब अचानक वह संघर्ष के दिनों की बातों को याद करके दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाने लगे हैं? यह आरोप भी ऐसे-वैसे नहीं, बल्कि बहुत संगीन हैं।

कुमार विश्वास का कहना है कि अरविंद केजरीवाल अपने स्वार्थों के चलते पंजाब को देश से अलग करने की गंदी राजनीति मन में पाले हुए हैं और वह पूरी तरह से ख़ालिस्तान के समर्थक हैं। कुमार विश्वास का कहना है कि केजरीवाल ने ऐसा उनसे सात साल पहले ख़ुद कहा था। हालाँकि यहाँ सवाल यह उठता है कि अगर केजरीवाल सात साल पहले कुमार विश्वास से देश तोडऩे की बात कह रहे थे, तब विश्वास ने केजरीवाल का विरोध करते हुए यह बात देश को क्यों नहीं बतायी? क्या तब कुमार विश्वास के मन में भी कोई लालच था? या फिर अब वह केजरीवाल की प्रसिद्धि को पचा नहीं पा रहे हैं?

कुमार विश्वास के कथित आरोप को लेकर देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। क्योंकि विश्वास ने केजरीवाल पर यह आरोप उस समय पर लगाया, जब पंजाब में चार दिन बाद विधानसभा के लिए मतदान होना था। कुमार विश्वास के द्वारा लगाये गये आरोप पर जनता कितना विश्वास करती है, यह तो 10 मार्च को चुनाव परिणाम सामने आने पर ही पता चलेगा। लेकिन आगामी महीने में दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के चुनावों पर इसका असर पड़ सकता है। क्योंकि भाजपा दिल्ली में केजरीवाल को देशद्रोही बताकर उनके ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन और प्रचार करने लगी है। हालाँकि राजनीति में आरोप-प्रत्यारोपों का खेल हर पार्टी करती रहती है। लेकिन साफ़ छवि का दावा करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी पर पंजाब विधानसभा चुनाव और दिल्ली निगम चुनाव में इन आरोपों के बाद भाजपा और कांग्रेस के घेराव का क्या असर पड़ेगा? इस पर तहलका के समक्ष राजनीतिक लोगों और जानकारों ने अपनी-अपनी राय रखी।

दिल्ली की सियासत के जानकार राजकुमार सिंह का कहना है कि राजनीति में हिंसा, प्रलोभन और साज़िश आम बातें होती हैं। इस लिहाज़ से यह नहीं कहा जा सकता कि कब, किस नेता को, कौन-सी साज़िश के तहत आरोप लगाकर उसकी राजनीति को समाप्त करने का प्रयास कर दिया जाए। और किस नेता को प्रलोभन देकर कोई पार्टी अपने स्वार्थ सिद्ध करने का इंतज़ाम कर ले। मौज़ूदा समय में लोगों में प्रचलित होते केजरीवाल पर यह एक अलग तरह का राजनीतिक धब्बा लगाने का प्रयास माना जा सकता है।

जानकार और राजनीति की समझ रखने वाले तो समझ जाते हैं कि यह सब सियासी चालें हैं। लेकिन देश की भोली-भाली और राजनीतिक दाँव-पेच से अनजान जनता इन राजनीतिक पैंतरों को आसानी से नहीं समझ पाती। वह अमूमन मान लेती है कि लगाये गये आरोप सही हैं। इस समय दिल्ली में केजरीवाल पर पंजाब के टुकड़े और ख़ालिस्तान देश बनाने जैसी साज़िश करने के आरोप को लेकर जो हमला कांग्रेस और भाजपा ने किया है, उससे यह तो ज़ाहिर हो गया है कि आम आदमी पार्टी की साख पर इससे बड़ा बट्टा लगेगा।

आम आदमी पार्टी के नेता संजीव कुमार का कहना है कि कुमार विश्वास ने भाजपा के इशारे पर केजरीवाल पर तब आरोप लगाया है, जब पंजाब में आम आदमी पार्टी से भाजपा को ही नहीं, कांग्रेस को भी बड़ा ख़तरा दिख रहा था। यही नहीं, दिल्ली नगर निगम के चुनाव को लेकर भी भाजपा ख़तरा महसूस कर रही थी, उसे साफ़ मालूम है कि नगर निगम में भी आम आदमी पार्टी जीत रही है। उनका कहना है कि कुमार विश्वास तो कवि हैं। उन्होंने जो राजनीतिक बयान देकर जिस तरह दूसरी पार्टियों के सियासतदानों को साधा है, उसको देश की जनता जान गयी है। क्योंकि मुख्यमंत्री केजरीवाल पर आरोप लगाने के बाद केंद्र सरकार ने कुमार विश्वास को वाई श्रेणी की सुरक्षा दी है। यह बात सिद्ध करती है कि कुमार विश्वास ने अपना रुतबा बढ़ाने और भाजपा के गिरते स्तर को फिर से मज़बूत करने का प्रयास किया है। बताते चलें कि कुमार विश्वास और केजरीवाल की एक समय में बहुत ही गहरी दोस्ती थी, जो सम्भवत: अन्ना आन्दोलन के दौरान दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और केजरीवाल के बहुत ख़ास मनीष सिसोदिया ने करायी थी। सन् 2013 में जब पहली बार आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा था और आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिलने के बावजूद कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाने का मौक़ा मिला था, तब केजरीवाल का कुमार विश्वास पर अन्य सदस्यों की तुलना में अधिक विश्वास था। ऐसा कहा जाता है कि विश्वास पर केजरीवाल का अविश्वास पैदा करने के लिए पार्टी के कुछ लोग लगे थे, ताकि कुमार विश्वास का विश्वास केजरीवाल से टूटे और वे आगे बढ़ें; और ये लोग इसमें सफल भी हुए।

आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जब आम आदमी पार्टी दिल्ली में मज़बूत होने लगी, तो रातों-रात वे लोग केजरीवाल के पास ज़्यादा दिखने लगे, जो पार्टी के गठन और अन्ना आन्दोलन के समय पर नहीं दिखते थे। ऐसे में कुमार विश्वास ने केजरीवाल को चेताया भी कि यह सब लोग स्वार्थी लोग हैं; इन सबसे बचना है। लेकिन केजरीवाल ने कुमार विश्वास पर विश्वास न करके अन्य लोगों को ज़्यादा महत्त्व दिया। इससे दोनों के बीच तल्ख़ी के साथ-साथ दूरियाँ बढऩे लगीं। हालत यह हो गयी कि पार्टी में कुमार विश्वास के विरोधियों ने सियासी लाभ भी लिया। कई बार तो दिल्ली में कुमार विश्वास के ख़िलाफ़ पोस्टरवार भी हुए हैं। भाजपा और कांग्रेस के नेताओं व कार्यकर्ताओं ने केजरीवाल को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया है। कुमार विश्वास के आरोप का केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर क्या असर पड़ेगा? इसको लेकर एक पत्रकार ने बताया कि पंजाब विधानसभा चुनाव में अगर आम आदमी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करती है, तो निश्चित तौर पर दिल्ली के नगर निगम चुनाव में इसका अच्छा असर पड़ेगा। अन्यथा पार्टी पर निगम चुनाव में तो विपरीत असर पड़ेगा ही, देश में हो रहे पार्टी के विस्तार पर भी ख़राब असर पड़ेगा। उनका कहना है कि आम आदमी पार्टी की मुफ़्त की राजनीति, जिसमें महिलाओं को मुफ़्त बस यात्रा, हर घर में 20 हज़ार लीटर महीने मुफ़्त पानी और 200 यूनिट मुफ़्त बिजली जैसी जो सुविधाएँ दी जा रही हैं, उसका काट न तो भाजपा के पास है और न ही कांग्रेस के पास है। इसका लाभ तो आम आदमी पार्टी को मिलेगा ही मिलेगा। लेकिन जिस अंदाज में राजनीति के बीच कूटनीति करके केजरीवाल को देशद्रोही के तौर पर विरोधी पार्टियाँ पेश कर रही हैं। अगर इन आरोपों का असर जनता पर पड़ता है, तो आम आदमी पार्टी को निगम चुनाव काफ़ी नुक़सान उठाना पड सकता है।

दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी ने कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल देश की अखण्डता के लिए ख़तरा बन गये हैं। आम आदमी पार्टी की फंडिंग कहाँ से हो रही है? उसके बैंक खातों की जाँच होनी चाहिए। अनिल चौधरी ने कहा कि आम आदमी पार्टी के मंत्रियों और अधिकांश विधायकों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इसकी भी जाँच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुमार विश्वास ने केजरीवाल के देश-विरोधी चेहरे को बेनक़ाब कर दिया है।

दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा कि केजरीवाल ने ख़ालिस्तानियों के साथ मिलकर देश को तोडऩे की साज़िश की है। जब दिल्ली में शाहीन बाग़ में सीएए को लेकर आन्दोलन चल रहा था और उससे पहले जब जेएनयू में देश के तोडऩे वाले नारे लगाये जा रहे थे, तब भी केजरीवाल उन्हीं के साथ खड़े थे। जनता केजरीवाल के कई चेहरे देख चुकी है। केजरीवाल की राजनीति ख़त्म है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के आम आदमी पार्टी संगठन के छात्र नेता राहुल कुमार कहते हैं कि आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाने वाले तो पहले से ही कई तरह के आरोप लगाते आ रहे हैं। क्योंकि आम आदमी पार्टी ने जनता से जो वादे किये थे, उनको पूरा किया है। राहुल कुमार का कहना है कि अगर कांग्रेस और भाजपा इस तरह के देशद्रोही वाले आरोप लगाते रहे, तो कोई भी विशेष असर नगर निगम के चुनावों पर नहीं पड़ेगा। लेकिन कुमार विश्वास, जो भाजपा और कांग्रेस को बढ़ाने के लिए पंजाब चुनाव से ठीक पहले वहाँ के और दिल्ली नगर निगम के चुनावों में आम आदमी पार्टी को हराने की मंशा से आरोप लगाते हैं, उनकी नीयत भी लोगों को समझनी चाहिए। हालाँकि आरोप इतना बड़ा है, तो इसका कुछ असर पड़ सकता है।

कांग्रेस के नेता अमरीष कुमार का कहना है कि आम आदमी पार्टी भाजपा की ही ‘बी’ पार्टी है। कांग्रेस का वोट पाकर और अन्ना आन्दोलन के माध्यम से कांग्रेस पर आरोप लगाकर चुनाव जीतने वाली आम आदमी पार्टी की डुगडुगी बज चुकी है। कांग्रेस ही दिल्ली के विकास के लिए जनता की पहली पसन्द है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल की अगर सही तरीक़े से जाँच हो जाए, तो उनकी सरकार अब तक के इतिहास में सबसे बड़े घोटालेबाज़ी की सरकार निकलेगी।

बता दें देश तोडऩे और आतंकवादी वाले आरोप पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि मैं स्कूल-अस्पताल बनवाने वाला दुनिया का सबसे मासूम और अच्छा आतंकवादी हूँ। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के डर से सारी विरोधी पार्टियाँ मुझे आतंकवादी कह रही हैं। इसका जनता चुनाव में मुँहतोड़ जवाब देगी। लगे हाथों उन्होंने आतंकवादी के दो रूप भी बता डाले- बुरे आतंकवादी और अच्छे आतंकवादी। उन्होंने कहा मैं अच्छा आतंकवादी हूँ, जो जनता का काम करता है। इसीलिए सभी पार्टियाँ मुझसे डरी हुई हैं। जो भी हो, देखना यह होगा कि इस आरोप के बाद केजरीवाल बैकफुट पर जाते हैं, या उनका साम्राज्य देश के अन्य राज्यों में भी फैलेगा?

 

मौत की इमारतें

गुरुग्राम में इमारत ढहने से साबित हुआ कि यहाँ के सरकारी भवन भी असुरक्षित हैं

हाउसिंग सेक्टर किस ओर जा रहा है? ये केवल निजी बिल्डर नहीं हैं, जो लोगों को बहका रहे हैं और उनके जीवन भर की बचत से जोड़ी पूँजी को ठग रहे हैं। अब सरकार की अपनी नवरत्न कम्पनी एनबीसीसी कमोवेश इसी तरह से ख़राब साबित हुई है। गुरुग्राम (गुडग़ाँव) में 18 मंज़िला चिन्टेल्स पैराडाइसो इमारत के एक हिस्से के गिरने से दो लोगों की मौत के बाद अब गुरुग्राम में एनबीसीसी की ग्रीन व्यू सोसायटी को असुरक्षित घोषित करने की बारी है।

इस घटना के बाद सैकड़ों मकान मालिक 20 फरवरी को अनशन पर बैठे और विरोध मार्च निकाला, जिसमें चिन्टेल्स पारदीसो हाउसिंग सोसायटी के निवासियों के लिए न्याय की माँग की गयी। वहाँ 10 फरवरी को एक इमारत की कई छतें गिर गयी थीं, जिसमें दो महिलाओं की मौत हो गयी थी। महिलाओं की मौत के अलावा कई अन्य लोग मलबे के नीचे फँस गये थे। जब 18 मंज़िला चिन्टेल्स पारदीसो इमारत की छठी मंज़िल के अपार्टमेंट का फ़र्श बैठ गया और मलबा ठीक बाद की मंज़िलों से लेकर इमारत की पहली मंज़िल तक फैल गया, उसमें चार लोग फँस गये। यह पहली और दूसरी मंज़िल पर रहने वाले दो परिवारों के सदस्य थे।

एनबीसीसी भवन भी असुरक्षित

हालाँकि चिन्टेल्स पारदीसो पर पूरा ध्यान केंद्रित किया गया था। उपायुक्त निशांत कुमार यादव ने हाल में सेक्टर-37 (डी) में एनबीसीसी-ग्रीन व्यू के निवासियों को 01 मार्च तक ख़ाली करने का निर्देश दिया था, जिसमें कहा गया कि आवासीय परिसर अब रहने के लिए सुरक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी निर्देश दिया एनबीसीसी के डेवलपर को निवासियों को वैकल्पिक आवास प्रदान करना चाहिए, जब तक वे भवन की मरम्मत और परिवहन, स्थानांतरण और किराये की लागत वहन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि यह सामने आया है कि ग़लती एनबीसीसी और ठेकेदार की है। उन्होंने कहा कि भवन की संरचना के सम्बन्ध में आईआईटी दिल्ली द्वारा दी गयी रिपोर्ट को निवासियों के साथ साझा किया जाएगा। केंद्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) और आईआईटी रुडक़ी के चार सदस्यों वाली दूसरी विशेषज्ञ समिति भी जल्द ही अपनी रिपोर्ट देगी।

डीसी ने ख़ुलासा किया कि उन्होंने नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी), जो भारत सरकार का एक उद्यम है; को निर्देश दिया है कि वह उन सभी घर ख़रीदारों को पैसा वापस करें, जो समाज में नहीं रहना चाहते हैं; ताकि वे नयी सम्पत्ति ख़ुरीद सकें। ज़िला नगर योजनाकार और अन्य विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार, भवन निवासियों के लिए सुरक्षित नहीं है। आवासीय परिसर में फ़िलहाल 140 परिवार रहते हैं। एनबीसीसी-ग्रीन व्यू अपार्टमेंट ऑनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आर. मोहंती ने कहा कि एनबीसीसी-ग्रीन व्यू हाउसिंग कॉम्प्लेक्स मई, 2017 में पूरा हो गया था और इमारत में दरारें अगले ही साल से दिखायी देने लगीं। उन्होंने कहा कि वह पिछले चार साल से फ्लैट्स की संरचनात्मक सुरक्षा के मुद्दों को उठा रहे हैं; लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। यह चौंकाने वाली बात है कि 700-800 फ्लैट वाली सोसायटी चार से पाँच साल में कैसे बिगड़ सकती है?

एनबीसीसी-ग्रीन व्यू अपार्टमेंट ऑनर्स एसोसिएशन के महासचिव रणधीर सिंह ने कहा कि वह मरम्मत किये गये अपार्टमेंट नहीं लेना चाहते हैं और डेवलपर से मिलने वाले रिफंड के साथ नयी सम्पत्तियों का विकल्प चुनेंगे। एनबीसीसी के अध्यक्ष और प्रबन्ध निदेशक पी.के. गुप्ता ने कहा कि निगम पूरी  ज़िम्मेदारी लेगा; क्योंकि फ्लैटों का निर्माण उनके द्वारा किया गया है।

चिन्टेल्स पारदीसो की हालत

इस मामले में ज़िला टाउन एंड कंट्री प्लानर ने चिन्टेल्स पारदीसो-ई, एफ, जी, और एच में चार और टॉवरों को रहने के लिए अनुपयुक्त घोषित किया है। इसने उन परिवारों को स्थानांतरित करने के लिए सेक्टर-109 में चिन्टेल्स पारदीसो के चार टॉवरों में 40 अपार्टमेंट की मरम्मत और नवीनीकरण शुरू कर दिया है, जिनके अपार्टमेंट टॉवर-डी में कई छतें गिरने से क्षतिग्रस्त हो गये थे। अब निवासियों ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) से गहन जाँच की माँग की है और अधिकारियों से दु:खद घटना के लिए  ज़िम्मेदार डेवलपर और अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आग्रह किया है। उन्होंने चिन्टेल्स इंडिया लिमिटेड के प्रमोटरों और निदेशकों और अपार्टमेंट के लिए अधिभोग प्रमाण-पत्र जारी करने वाले सरकारी अधिकारियों की तत्काल गिरफ़्तारी की भी माँग की है।

चिंटेल्स पैराडाइसो सोसायटी की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश हुड्डा ने आरोप लगाया कि पुलिस प्राथमिकी में धाराओं के साथ नरमी बरत रही है। उन पर हत्या का मामला दर्ज की जाए और स्वतंत्र जाँच हो। हालाँकि यह पता चला है कि पुलिस अभी भी शहर और विभाग द्वारा संरचनात्मक ऑडिट रिपोर्ट जारी करने की प्रतीक्षा कर रही है, जो दुर्घटना के कारणों का ख़ुलासा करेगी। इसके बाद ही क़ानून के अनुसार कार्रवाई करेगी। इसने क्षतिग्रस्त संरचना से नमूने एकत्र किये हैं और उन्हें मधुबन में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिया है।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने निर्माण के दौरान डिजाइन या कारीगरी में दोषों का पता लगाने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली द्वारा गुरुग्राम के सेक्टर-109 में चिंटेल पारदीसो ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के प्रभावित टॉवर का संरचनात्मक ऑडिट करने का आदेश दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आसपास की कुछ अन्य ग्रुप हाउसिंग सोसायटीज में भी प्रारम्भिक चरण में संरचनात्मक क्षति के लक्षण दिखाये थे और नगर और ग्राम नियोजन विभाग को रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन या किसी अन्य से प्राप्त शिकायतों के आधार पर इन भवनों की पहचान करने के लिए कहा गया है। उन्होंने कहा कि स्थानीय प्रशासन को इस टॉवर के सभी प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक अस्थायी आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है; क्योंकि वह वहाँ रहने से डरते हैं।

मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग को चिनटेल्स इंडिया लिमिटेड के सभी निदेशकों, चिंटेल्स एक्सपोट्र्स प्राइवेट लिमिटेड, आवासीय टॉवर का निर्माण करने वाले स्ट्रक्करल इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स और ठेकेदारों, जिन्होंने छठी मंज़िल पर अतिरिक्त निर्माण कार्य किया; के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे। पुलिस को तत्काल प्रभाव से प्राथमिकी दर्ज करने को कहा गया है। यह भी पता चला कि सरकार ने अब सैद्धांतिक रूप से निर्णय किया है कि नगर और ग्राम आयोजना विभाग के बिल्डरों की तरफ़ से नियुक्त स्ट्रक्चरल इंजीनियरों के अलावा सरकारी संस्थानों या उनके पैनल में शामिल स्ट्रक्चरल इंजीनियरों से स्ट्रक्चरल ऑडिट भी कराया जाना चाहिए। यह सब व्यवसाय प्रमाण-पत्र देने से पहले किया जाना चाहिए।

सम्बन्धित विभाग की उदासीनता

ऐसे ही एक घटनाक्रम में हरियाणा हाउसिंग बोर्ड को अपने कामकाज में लापरवाही करने के लिए फटकार लगाते हुए, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने मुख्य प्रशासक को तलब किया। उन्हें एक मामले में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए कहा गया था, जिसमें एक पूर्व सैनिक ने देश के लिए किये गये अनुकरणीय बलिदानों के लिए आभार के प्रतीक के रूप में जारी एक योजना में आवास इकाई के आवंटन के लिए लगभग सात साल पहले आवश्यक राशि जमा की थी। बाद में बताया गया कि क्षेत्र में फ्लैट बनाने की कोई योजना नहीं थी। मामले को और बदतर बनाते हुए हाउसिंग बोर्ड ने ज़ोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता-पूर्व सैनिक को जमा राशि के 10 फ़ीसदी की ही अनुमति दी जाएगी, जिसके बाद उच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि वह बोर्ड के इस स्टैंड पर स्तब्ध है। न्यायमूर्ति तेजिंदर सिंह ढींडसा और न्यायमूर्ति ललित बत्रा की खण्डपीठ ने कहा कि यह एक अकेला मामला नहीं है, बल्कि इसी तरह की शिकायतों को उठाने वाली जनहित याचिकाओं का एक समूह अदालत के समक्ष लम्बित था।

राज पाल सिंह गहलौत द्वारा हाउसिंग बोर्ड और एक अन्य प्रतिवादी के ख़िलाफ़ वकील विवेक खत्री के माध्यम से याचिका दायर के बाद मामला उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाया गया। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि कुछ भी नहीं हुआ और याचिकाकर्ता न्याय पाने के लिए भटक रहा था। यहाँ तक कि प्रतिवादियों को एक क़ानूनी नोटिस भी दिया, जिसमें जमा राशि की वापसी की माँग की गयी थी। मामले की पृष्ठभूमि में जाने पर पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता दिसंबर, 2014 में फ़रीदाबाद के सेक्टर-65 में एक फ्लैट के आवंटन के लिए ड्रॉ में सफल रहा और मार्च, 2015 में 4,89,270 रुपये जमा किये। पीठ ने याचिका में स्पष्ट कथनों पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक ने धन जुटाने के लिए ऋण के लिए आवेदन किया था और ऋण चुकाने के लिए नियमित ईएमआई का भुगतान कर रहा था। अदालत ने कहा कि यह हाउसिंग बोर्ड है, जिसने इस मामले में लापरवाही की है। जहाँ तक सेक्टर-65, फ़रीदाबाद का सम्बन्ध है, अब तक इस परियोजना को ज़मीन पर उतारने की कोई योजना नहीं है।

जोखिम भरा क्षेत्र

विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुग्राम दिल्ली की तुलना में अधिक जोखिम में है। क्योंकि दिल्ली तीन सक्रिय भूकम्पीय फॉल्ट लाइनों की रेंज में पड़ता है। गुरुग्राम रेंज-7 पर बैठता है, जिससे यह एनसीआर में सबसे जोखिम भरा क्षेत्र बन जाता है। यदि इनमें से कोई भी सक्रिय हो जाता है, तो यह 7.5 तीव्रता तक के भूकम्प का कारण बन सकता है। साल 2015 में जब बार-बार झटकों ने गगनचुंबी इमारतों में रहने वालों में दहशत पैदा कर दी थी, तब प्रशासन ने सुरक्षा ऑडिट का आदेश दिया था। योजना कभी भी अमल में नहीं आयी। हालाँकि यह निर्णय किया गया कि प्रत्येक बिल्डर भूकम्प सुरक्षा प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करेगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि भवन आपदा प्रबन्धन जनादेश के अनुसार बनाया जा रहा है।

हालाँकि यह कभी नहीं हुआ। यह 2020 की बात है, जब दिल्ली एनसीआर में तीन महीने में 17 भूकम्प आये थे। पूरा शहर भूकम्पीय क्षेत्र-4 के अंतर्गत आता है। कई सामान्य फॉल्ट गुरुग्राम से होकर गुज़रते हैं।

इस ज़िले में प्रमुख विशेषताओं में सोहना फॉल्ट, मुरादाबाद फॉल्ट, दिल्ली-मुरादाबाद फॉल्ट, दिल्ली-हरिद्वार फॉल्ट, दिल्ली के पास अरावली और जलोढ़ का जंक्शन शामिल हैं। सिस्मिक जोन-4 में होने के कारण सन् 2020 में इस सम्बन्ध में अनिवार्य रूप से किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से परामर्श करने की एडवाइजरी जारी की गयी थी; लेकिन हुआ कुछ नहीं।

सरकारों का शराब ऑफर!

नशा इंसान के जीवन के लिए अभिशाप है। नशाख़ोरी किसी भी देश की एक ऐसी समस्या है, जिसके चलते हर साल हज़ारों ज़िन्दागियाँ बर्बाद और ख़त्म होती हैं और कई घर बीरान होते हैं।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के ज़िला आजमगढ़ के अहरौला इलाक़े में ज़हरीली शराब पीने से पाँच लोग मर गये, जबकि 41 लोग बीमार हो गये। देश में ऐसी ख़बरें तक़रीबन हर एक-दो महीने के अंतराल से आती रहती हैं। यह हाल तब है, जब सरकारें नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने का न केवल दावा करती हैं, बल्कि नशामुक्ति अभियान भी चलाती हैं।

हर साल 26 जून को अंतरराष्ट्रीय मादक द्रव्य निषेध यानी विश्व नशामुक्ति दिवस मनाया जाता है। लेकिन नशाख़ोरी पर पूरी तरह प्रतिबंध हिन्दुस्तान में कभी नहीं लग सकेगा। इसकी पहली वजह यही है कि हमारे देश के हर राज्य, हर शहर, हर क़स्बे और हर गाँव में शराब और नशे की दूसरी चीज़ें आसानी से उपलब्ध रहती हैं। इन नशीली चीज़ों में शराब की बिक्री सरकारों की मर्ज़ी से खुलेआम होती है। देश के जिन दो राज्यों (गुज़रात और बिहार) में वहाँ की सरकारों ने शराब पर बैन लगा दिया है, वहाँ चोरी-छिपे ही सही; लेकिन आसानी से शराब उपलब्ध रहती है।

नशाख़ोरी बढ़ाने के तरीक़े

वैसे तो कई राज्यों में वहाँ की सरकारें शराब की बिक्री को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि शराब बिक्री से हर राज्य को मोटा कर (टैक्स) प्राप्त होता है। इससे न केवल राज्य सरकार को, बल्कि केंद्र सरकार को भी राजस्व की मोटी रक़म प्राप्त होती है। शराब की बिक्री राज्य सरकारों के लिए आमदनी का एक ऐसा ज़रिया है, जिसके बन्द होने से राज्य के राजस्व संग्रह पर काफ़ी असर पड़ता है। ऐसे में तक़रीबन हर राज्य की सरकारें शराब बेचकर या बिकवाकर करोड़ों रुपये सालाना बजट जुटाती हैं।

हाल ही में दिल्ली और हरियाणा में नशाख़ोरी को बढ़ावा मिलने के दो उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। दोनों राज्यों की सरकारों ने अपने-अपने तरीक़े से नशाख़ोरी बढ़ाने की पहल की है।

दिल्ली में मुफ़्त शराब का चक्कर

दिल्ली देश की राजधानी है, जहाँ हर रोज़ तक़रीबन 12 से 15 फ़ीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं, जिनमें आठ फ़ीसदी लोग नियमित शराब का सेवन करते हैं। इन दिनों दिल्ली सरकार ने शराब पर 35 फ़ीसदी से लेकर एक शराब की बोतल पर एक बोतल मुफ़्त देने का चलन शुरू किया है। यह ऑफर सस्ती-से-सस्ती शराब से लेकर महँगी-से-महँगी शराब पर लागू है। इसके पीछे दलील दी जा रही है कि दिल्ली सरकार पुराना स्टॉक ख़त्म करने के लिए ऐसा ऑफर लेकर आयी है। लेकिन इससे दिल्ली में शराब की बिक्री क़रीब तीन से चार गुना बढ़ गयी है। दिल्ली सरकार ने यह ऑफर ऐसे समय में शुरू किया है, जब देश के पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। यह तो पहले से ही ज़ाहिर है कि दिल्ली में शराब दूसरे राज्यों से पहले भी सस्ती हुआ करती थी, जिसके चलते दिल्ली से शराब की तस्करी दूसरे राज्यों, ख़ासकर उत्तर प्रदेश में होती थी।

अब जब चुनावों का दौर चल रहा है और आने वाले कुछ ही महीनों में दिल्ली में भी एमसीडी के चुनाव होने हैं, दिल्ली में शराब की बोतलों पर यह ऑफर शराब माफिया के लिए जमाख़ोरी और तस्करी का एक सुनहरा मौक़ा है। क्योंकि अब वे दिल्ली से सस्ती शराब ख़रीदकर दूसरे राज्यों में इसकी तस्करी और बड़े पैमाने पर करेंगे। वैसे भी होली का त्योहार निकट आ ही रहा है। इसके अलावा जो लोग एक बोतल शराब रोज़ या हफ़्ते में लेते थे, उन्हें पैसे में अब उसी पैसे में दो बोतल शराब मिल रही है। और जो दो बोतल शराब ख़रीदते थे, उन्हें अब उसी पैसे में चार बोतल शराब मिल रही है।

इसके अलावा पीने वालों को ऑफर में एक बोतल पर मुफ़्त मिलने वाली बोतल का चस्का लगना स्वाभाविक है। पिछले दिनों सामने आयी ख़बरों के मुताबिक, कई जगह एक बोतल पर एक बोतल मुफ़्त न देने पर ठेका कर्मचारियों से मारपीट की दिल्ली में कई घटनाएँ हो चुकी हैं। जानकार कहते हैं कि दिल्ली में इन दिनों जिस तरह से एक बोतल पर एक बोतल मुफ़्त का ऑफर चल रहा है, उससे शराब की तस्करी और नशाख़ोरी को बढ़ावा मिल रहा है। ठेके पर बैठे विक्रेताओं और नशा माफिया से लेकर शराब पीने वाले तक शराब का स्टॉक करने से नहीं चूक रहे हैं।

हरियाणा में घटी नशाख़ोरी और बिक्री करने की उम्र

हरियाणा सरकार ने शराब सेवन करने वालों की उम्र घटा दी है। दरअसल हरियाणा सरकार ने राज्य में शराब पीने की उम्र घटा दी है। हरियाणा में पहले शराब पीने की छूट क़ानूनी तौर पर 25 साल के युवाओं से लेकर आगे की उम्र वालों के लिए थी; लेकिन अब 21 साल के युवा भी शराब पी सकेंगे। ख़बरों के मुताबिक, इस सम्बन्ध में दिसंबर, 2021 में ही हरियाणा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में राज्य में लागू आबकारी (एक्साइज) क़ानून, 1914 की चार धाराओं, धारा-27, धारा-29, धारा-30 और धारा-62 में संशोधन करके इसे विधानसभा की तरफ़ से 31 दिसंबर 2021 को पारित कर दिया गया था।

राज्य के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने इस हरियाणा आबकारी (संशोधन) विधेयक, 2021 को स्वीकृति दे दी है और 11 फरवरी से उक्त संशोधन क़ानून हरियाणा सरकार के गजट में प्रकाशित कर दिया गया है। अब यह क़ानून पूरे राज्य में तत्काल प्रभाव से लागू है और अब 21 साल के युवाओं को भी पुलिस शराब पीने से राज्य में नहीं रोक सकती। पुराने क़ानून में धारा-27 के तहत यह प्रावधान था कि शराब और नशीली दवाओं के निर्माण, थोक या ख़ुदरा बिक्री के लिए पट्टा राज्य सरकार की तरफ़ से 25 साल से कम उम्र के व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता था। लेकिन अब नये क़ानूनी संशोधन के बाद इसे घटाकर 21 साल कर दिया गया है।

इसी तरह पहले धारा-29 के तहत कोई भी शराब या नशीली दवा का लाइसेंसधारी विक्रेता 25 साल से कम उम्र के किसी भी युवा को शराब या नशीली दवा नहीं बेच सकता था; लेकिन अब वह 21 साल के युवाओं को इनकी बिक्री कर सकता है। वहीं 10 फरवरी, 2022 तक धारा-30 के तहत 25 वर्ष से कम आयु के किसी भी युवा को शराब या नशीली दवाएँ बेचने का लाइसेंस नहीं दिया जाता था; लेकिन अब 21 साल के युवाओं को भी इनका लाइसेंस मिल सकता है।

इसी तरह धारा-62 में पहले प्रावधान था कि अगर कोई लाइसेंस प्राप्त शराब या नशीली दवा विक्रेता या इन दुकानों पर नौकरी करने वाला कोई कर्मचारी या अन्य कोई कार्य करने वाला व्यक्ति 25 साल से कम उम्र के किसी युवा को शराब या नशीली दवा देता है, तो उस पर 50 हज़ार तक का ज़ुर्माना और प्रावधान के मुताबिक अन्य दण्ड लगाया जाएगा। लेकिन अब यह नियम 21 साल से कम उम्र के युवाओं को शराब या नशीली दवा बेचने पर लागू होगा। इसके पीछे दलील यह है कि क़ानून में यह संशोधन देश के कई राज्यों, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) दिल्ली भी शामिल हैं, में लागू नियमों को देखते हुए किया गया है। वैसे नशाख़ोरी में हरियाणा के युवाओं की एक बड़ी संख्या फँसी हुई है। पिछले दो दशकों से हरियाणा में नाइट क्लब, पब, डिस्को बार आदि का चलन बढऩे से यहाँ के युवाओं में नशाख़ोरी की लत बढ़ी है।

नशाख़ोरी के नुक़सान

एक अनुमान के मुताबिक, देश में ज़हरीली शराब से हर साल तक़रीबन 1,000 लोगों की मौत होती है, वहीं शराब की अधिकता के चलते हज़ारों लोग हर साल कम उम्र में ही मौत के मुँह में समा जाते हैं। देश में लीवर और किडनी के मरीज़ों में 40 फ़ीसदी नशा करने के कारण बीमार होते हैं। आँकड़े बताते हैं कि भारत में पिछले तीन वर्षों में ही ड्रग्स का बाज़ार 455 फ़ीसदी तक बढ़ गया है। देश के 2.1 फ़ीसदी लोग ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से तस्करी किये गये नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं।

देश में शराब के सेवन में राज्यों का स्तर बताता है कि छत्तीसगढ़ पहले स्थान पर है, जहाँ क़रीब 35.6 फ़ीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं। इसके अलावा त्रिपुरा में 34.7 फ़ीसदी, पंजाब में 28.5 फ़ीसदी, अरुणाचल प्रदेश में 28 फ़ीसदी, गोवा में 26.4 फ़ीसदी लोग शराब पीते हैं। वहीं सभी प्रकार की नशाख़ोरी की अगर बात करें, तो मिजोरम नशाख़ोरी में पहले स्थान पर है। वहीं सभी प्रकार के नशे के मामले में पंजाब दूसरे और दिल्ली तीसरे स्थान पर हैं।

इसके अलावा देश में क़रीब सवा करोड़ लोग गाँजा और चरस का सेवन करते हैं। गाँजा और चरस के नशे में सिक्किम के लोग पहले, ओडिशा के दूसरे और दिल्ली के लोग तीसरे स्थान पर बताये जाते हैं। हालाँकि आबादी के हिसाब से देखें, तो मुम्बई नशाख़ोरी का एक बहुत बड़ा अड्डा है।

एक सर्वे के मुताबिक, 44 फ़ीसदी ड्रग्स लेने वाले लोग उसे छोडऩा चाहते हैं; लेकिन उनमें से 25 फ़ीसदी को ही नशामुक्ति का सहारा मिल पाता है। इसकी वजह सरकारी नशामुक्ति केंद्रों का अभाव और निजी संस्थानों में मोटी फीस है।

नशे को बढ़ावा ठीक नहीं

 

दिल्ली-एनसीआर में पाँच नशामुक्ति केंद्र चलाने वाले शान्तिरत्न फाउंडेशन के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह कहते हैं कि दिल्ली में शराब पर ऑफर देना मेरी समझ से ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ पहले से ही शराब पीने वालों की संख्या बहुत है। ऐसे में शराब पर ऑफर मिलने से पीने वालों की संख्या तो बढ़ेगी ही, लोगों के पीने की लत भी बढ़ेगी। यह एक प्रकार से नशाख़ोरी को बढ़ावा देना है। हम लोग नशामुक्ति अभियान चलाते हैं, जिस पर माफिया तो पानी फेरते ही हैं, अगर सरकारें भी वही काम करेंगी, तो इसे उचित कैसे कह सकते हैं? राजधानी में तो वैसे भी हर चीज़ बहुत तेज़ी से फैलती और असर करती है। हमारे यहाँ शराब छुड़ाने के महीने भर में 20 से 30 मामले आते हैं। लेकिन समस्या यह है कि कई परिवार भी शराब, सिगरेट और तम्बाकू पीने को उतना बुरा नहीं समझते, जितना कि ड्रग्स, चरस, गाँजा आदि को समझते हैं। ऐसे में शराब पीने वालों को बढ़ावा मिल रहा है।

जनहित में नहीं फैसले

दिल्ली के द्वारिका में एक निजी अस्पताल में सेवाएँ दे रहे जनरल फिजिशियन डॉ. मनीश कहते हैं कि शराब पर इतनी भारी छूट उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी। दिल्ली में हर शराब की दुकानों पर आजकल विकट भीड़ देखी जा सकती है, जिससे पता चलता है कि दिल्ली में शराब पीने का चलन बढ़ रहा है। रही हरियाणा की बात, तो इसमें कोई शक नहीं कि 21 साल के युवा भी बड़ी आसानी से बहक जाते हैं। इसकी पहली वजह यही होती है कि वे इस उम्र में उतने ज़िम्मेदार नहीं होते, जितने 25-26 साल की उम्र में होते हैं। वैसे भी 21 साल की उम्र में युवा कॉलेज लाइफ में होते हैं और उनमें रुतबा दिखाने का एक फैशन-सा होता है। अगर इस उम्र में उन्हें नशा करने की छूट मिलेगी, तो ज़ाहिर है कि वे नशे की ओर अग्रसर हो सकते हैं। इसलिए दोनों ही राज्य सरकारों के फ़ैसलों को अच्छा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये छूटें किसी भी तरह से देश, समाज और जन हित में नहीं हैं।

पुलिस में महिलाओं की विकट कमी

हम जब घर से बाहर निकलते हैं, तो अक्सर सडक़ों पर जो पुलिसकर्मी नज़र आते हैं, वे पुरुष ही होते हैं। सडक़ों-गलियों, बाज़ारों में घूमने वाली पुलिस वैन से बाहर झाँकता चेहरा भी पुरुष का ही दिखायी देता है। इसकी एक वजह यह है कि देश में पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी महज़ 10.3 फ़ीसदी है। पुलिस में महिलाओं के इतने कम प्रतिनिधित्व को लेकर संसद की स्थायी समिति ने भी इस पर चिन्ता ज़ाहिर करते हुए पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 33 फ़ीसदी करने के लिए रोडमैप बनाने की अनुशंसा की है। पुलिस के प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और सुधार के लिए बनी संसद की स्थायी समिति ने 10 फरवरी को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और इस संख्या को किस तरह बढ़ाया जाए? इस बाबत सरकार को सुझाव भी पेश किये।

दरअसल पुलिस का पेशा $कानून-व्यव्यथा और आमजन से जुड़ा हुआ है। आमजन को पुलिस की ज़रूरत कभी भी पड़ सकती है। जब आमजन की बात करते हैं, तो उसमें महिलाएँ भी शामिल हैं; लेकिन पुलिस बल में लैंगिक सन्तुलन नहीं है। और इसकी क़ीमत देश की आम औरत चुकाती है। पुलिस की मर्दानगी वाली छवि आम औरत के भीतर दहशत पैदा करती है। वह पुरुष पुलिसकर्मी को अपनी तकलीफ़ बताने और उसके सवालों का जवाब देने में ख़ुद को असहज महसूस करती है। पुरुष प्रधान समाज में जब भी किसी परिवार का किसी भी कारण से पुलिस से वास्ता पड़ता है, तो सबसे पहले घर की औरतों को कमरे के अन्दर जाने की सख़्त हिदायत दी जाती है। यानी पुलिस और महिलाओं के बीच एक बहुत बड़ा फ़ासला नज़र आता है। अगर पुलिस बल में महिलाओं की संख्या को बढ़ा दिया जाए, तो यह फ़ासला धीरे-धीरे कम हो सकता है। समाजशास्त्री भी मानते हैं कि पुलिसबल में महिलाओं की संख्या में इज़ाफ़ा करके इसकी छवि को और अधिक मानवीय बनाया जा सकता है।

दरअसल पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने को लेकर गृह मंत्रालय पहले भी चिन्ता जता चुका है; लेकिन अधिक सकारात्मक नतीजे नहीं देखने को मिले। ऐसा क्यों है? इसे गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों को गम्भीरता से लेना चाहिए।

ग़ौरतलब है कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने सन् 2009 में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने यहाँ महिला पुलिस बल की संख्या 33 फ़ीसदी करने वाला परामर्श दिया। इसमें यह भी कहा गया कि हर पुलिस स्टेशन में कम-से-कम तीन महिला सब इंस्पेक्टर और 10 महिला पुलिस सिपाही होनी चाहिए, ताकि महिला हेल्प डेस्क 24 घंटे अपना काम कर सके। यही नहीं, इस दिशा में कोई ख़ास प्रगति न होते देख गृह मंत्रालय ने महिला पुलिस बल का 33 फ़ीसदी लक्ष्य हासिल करने वाला यही परामर्श 2013, 2015, 2017, 2019 और 2021 में भी जारी किया; लेकिन निराशा ही हाथ लगी। एक सवाल यह भी किया जाता है कि पुलिस का काम तो नियम-क़ायदों के अनुसार चलता है, उसे तो तटस्थ हाकर अपनी भूमिका निभानी चाहिए, ऐसे में पुलिस वर्दी में पुरुष हो या महिला क्या फ़र्क़ पड़ता है? सवाल वाजिब हो सकता है, पर यह जानना भी ज़रूरी है कि पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने वाले महत्त्वपूर्ण बिन्दु को महज़ लैंगिक पहलू से नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि यह पेशा की एक ज़रूरत भी बन चुका है।

महिलाएँ इस देश की आधी आबादी हैं और इसमें कोई दो-राय नहीं कि महिलाओं व बच्चों से जुड़े ऐसे मामले, जहाँ पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ता हैं; वहाँ महिला पुलिस अधिक कारगर साबित होती हैं। यही नहीं, महिला पुलिस में अपने पुरुष सहकर्मियों की अपेक्षा अधिक सहनशीलता और सहानुभूति होती है। उनके द्वारा अधिक बल प्रयोग करने की सम्भावना कम होती है। उनके द्वारा थर्ड डिग्री के प्रयोग की सम्भावना भी क्षीण होती है, जिसकी एक लोकतांत्रिक देश की पुलिस से अपेक्षा की जाती है। उनकी अधिक संख्या होने से पुलिस की बदनाम छवि भी सुधर सकती है। देश में सन् 1991 में पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 1.18 फ़ीसदी थी और अब यह 10.3 फ़ीसदी है। 20 अगस्त, 2021 को गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि देश में महिला पुलिस बल की तादाद 10.3 फ़ीसदी है। पुलिस में महिलाओं और पुरुषों का राष्ट्रीय औसत बताता है कि देश में प्रति 10 पुलिसकर्मियों पर महज़ एक महिला पुलिसकर्मी है।

देश में इस समय बिहार एक ऐसा इकलौता राज्य है, जहाँ पुलिस बल में सबसे अधिक महिलाएँ 25 फ़ीसदी से अधिक हैं। हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की संख्या 19.5 फ़ीसदी, चंडीगढ़ में 18.78 फ़ीसदी, तमिलनाडु में 18.5 फ़ीसदी और लद्दाख़ में 18.47 फ़ीसदी है। 24 राज्य ऐसे हैं, जहाँ महिला प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय औसत से कम है। ऐसे राज्यों की सूची में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में यह संख्या महज़ 9.6 फ़ीसदी ही है। वहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, असम, केरल, कर्नाटक, सिक्किम, मणिपुर, पंजाब, हरियाणा, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, पांडिचेरी, पश्चिम बंगाल, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, तेलगांना, आन्ध्र प्रदेश भी ऐसे ही राज्य हैं, जहाँ 10 फ़ीसदी से कम महिलाएँ पुलिस में हैं। गृह मंत्रालय ने अपने बयान में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने यहाँ महिला पुलिसकर्मियों के लिए कल्याणकारी क़दमों को मज़बूत करने, कार्यस्थलों पर उनके लिए अनुकूल माहौल बनाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला सुझाव भी दिया था।

विषेशज्ञों का मानना है कि महिलाओं के प्रति अपराध कम करने के लिए पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है। अब सवाल यह भी उठता है कि आख़िर महिलाएँ पुलिस में क्यों नहीं आना चाहतीं? पुलिस की नौकरी आज नौकरी बाज़ार में किस पायदान पर आती है, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि नौकरी की तलाश में आज की युवतियाँ पुलिस की नौकरी को ज़्यादा तवज्जो न देकर कम्पनियों में नौकरी करना अधिक पसन्द करती हैं। उनका रुझान इस ओर बहुत-ही कम देखने को मिलता है। इसके पीछे की वजह सामाजिक भी होती है। शादी में दिक़्क़तें भी पैदा हो सकती हैं। फिर तबादला और रात की पारी में ड्यूटी आदि। इन सामाजिक वजहों की जड़ में महिलाओं को अध्यापक, डॉक्टर, नर्स आदि पेशे में देखने की आदत पड़ जाना और पुलिस की ऐसी कडक़ छवि बन जाना भी है, जहाँ पारम्परिक समाज महिलाओं को पुलिस की वर्दी में देखना सहजता से स्वीकार करता दिखायी नहीं देता है।

इसके अलावा यह भी अति महत्त्वपूर्ण है कि पुलिस थानों में महिलाकर्मियों की विषेश ज़रूरतों को पूरा करने वाले संसाधन, जैसे महिला शौचालय, आराम गृह और क्रैच आदि की बहुत कमी है। बड़े शहरों के थानों में तो ये सुविधाएँ मिल भी जाती हैं; लेकिन छोटे शहरों, क़स्बों और गाँवों में ये सुविधाएँ अमूमन नदारद ही होती हैं। इसके अलावा 90 फ़ीसदी महिला पुलिसकर्मी बतौर सिपाही ही सेवानिवृत्त हो जाती हैं। उच्च पदों पर बहुत ही कम महिलाएँ पहुँच पाती हैं। महिला राजपत्रित अधिकारी की संख्या बहुत-ही कम है। पुलिस बल में महिला पुलिसकर्मियों के यौन उत्पीडऩ की ख़बरें भी सामने आती रहती हैं और उनका मानना है कि शिकायत के बावजूद ऐसे मामले लम्बे समय तक लटकते रहते हैं। देश में पुलिस राज्य का विषय है। लिहाज़ा राज्य सरकारों को अपने-अपने यहाँ महिला पुलिस की संख्या में बढ़ोतरी करने के लिए विशेष ख़ाका तैयार करना चाहिए। यह वक़्त की माँग है।

पुलिस में महिलाओं की ज़रूरत की एक मुख्य वजह ऐसे क़ानूनों का बनना भी है, जहाँ मामलों में महिला पुलिस की अनिवार्यता का ज़िक्र है। जैसे लैंगिक उत्पीडऩ से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012; इस अधिनियम को पॉक्सो एक्ट के नाम से भी जाना जाता है। महिला व बाल विकास मंत्रालय ने सन् 2012 में बच्चों के प्रति यौन उत्पीडऩ, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए इसे बनाया था। इस एक्ट के तहत प्रत्येक यौन हमले की रिकॉर्डिंग और उसकी जाँच के लिए महिला पुलिस अधिकारी की ज़रूरत है।

क़ानूनी प्रावधान कहते हैं कि किसी भी महिला की गिरफ़्तारी या उनसे जुड़े मामले महिला पुलिसकर्मियों का ही सौंपे जाने चाहिए। किशोर न्याय अधिनियम, जिसके अंतर्गत नाबालिग़ द्वारा किये गये अपराध की सज़ा दी जाती है और सज़ा की अवधि के दौरान किशोर अपराधी को सुधार व बाल संरक्षण गृह में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि किशोर अपराधियों को महिला पुलिस बेहतर तरीक़े से सुधार सकती हैं। क्योंकि वे किशोरों के साथ अच्छा संवाद करने की कला जानती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि देश में 11 फ़ीसदी अपराध महिलाओं के ख़िलाफ़ होते हैं। इन मामलों में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया जाता है, उनमें पाँच फ़ीसदी महिलाएँ होती हैं। केवल इसी गणित के हिसाब से देखा जाए, तो पुलिस बल में महिलाओं की संख्या 16 फ़ीसदी होनी ही चाहिए। दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका व आस्ट्रेलिया में महिला पुलिस का फ़ीसदी 15-30 फ़ीसदी के दरमियान है। भारत की तो आबादी ही 145 करोड़ है और उसमें क़रीब आधी आबादी महिलाओं की है। आँकड़ों की ओर देखें, तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि पुलिस बल में महिलाओं की संख्या को बढ़ाने का मामला अब और नहीं टाला जाना चाहिए।

सातवीं बार जेल में लालू!

एक वक़्त था, जब बिहार में जुमला आम था- ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।’ अब यह जुमला न के बराबर सुनने को मिलता है। यह सब चारा घोटाले का कारण हुआ। मुद्दा इतना गरमाया कि लालू और चारा घोटाला एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गये। इसके बावजूद आज भी राजनीति और सामाजिक दृष्टिकोण से लालू प्रसाद यादव का आकर्षण कम नहीं हुआ है। यह इन दिनों झारखण्ड-बिहार से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल रहा है। दरअसल लालू भारतीय राजनीति की जिस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह अनोखी है। इस धारा में तैरने वाले तो बहुत-से नेता हुए; लेकिन धारा को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता लालू से पहले किसी में नहीं दिखी। इसलिए उन्हें भारतीय राजनीति का इकलौता सामरिक समाजवादी नेता कहा जाता है। वह समर्थकों के बीच जन-नायक बनकर उभरे। लालू सियासत के वह पत्थर हैं, जिन्हें उनके समर्थक देवता मानकर पूजते हैं या फिर विरोधी नफ़रत से भरकर ठोकर मारते हैं। लेकिन उनसे बचकर कोई नहीं निकल पाता। लालू का नाम और चारा घोटाला मामला एक बार फिर समर्थकों और विरोधियों की ज़ुबान पर हैं। कारण, उन्हें चारा घोटाले के एक और मामले में सज़ा मिली है। अभी वह जेल (अस्पताल-रिम्स पेइंग वार्ड) में हैं।

देश में कई घोटाले हुए; लेकिन चारा घोटाला उस वक़्त का सबसे बड़ा घोटाला था। उस वक़्त 950 करोड़ रुपये सरकारी ख़ज़ाने से फ़र्ज़ीवाड़ा करके निकाल लिये गये। यह गबन ऐसा था कि इसका शोर सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों तक में गूँजा। सरकारी ख़ज़ाने की इस गबन में कई अन्य लोगों के अलावा बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जगन्नाथ मिश्र पर गहरे दाग़ लगे। इस घोटाले के कारण लालू यादव को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। घोटाला सन् 1996 में हुआ था। लेकिन जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ी, लालू प्रसाद यादव इसमें दोषी बनते गये। नये नियम के तहत लालू प्रसाद भारतीय इतिहास में लोकसभा के ऐसे पहले सांसद थे, जिन्हें इस घोटाले के चलते संसद की सदस्यता गँवानी पड़ी और चुनाव लडऩे पर रोक लगी।

चारा घोटाले के घोटालेबाज़ों ने पशुपालन विभाग के वार्षिक बजट से भी बहुत अधिक धनराशि सरकारी ख़ज़ाने से नक़ली बिल बनाकर निकाल ली। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, वित्त वर्ष 1992-93 का पशुपालन विभाग का बजट क़रीब 75 करोड़ रुपये का था। लेकिन ख़र्च किये गये क़रीब 155 करोड़ रुपये। इसी तरह वित्त वर्ष 1993-94 में 75 करोड़ का बजट होने के बावजूद क़रीब 240 करोड़ रुपये ख़र्च किये गये। इस लूट का बँटवारा सभी शामिल लोगों में हुआ था। आपूर्तिकर्ताओं से लेकर बड़े सरकारी अफ़सर व अनेक दलों के नेता इस लूट में शामिल थे। पटना उच्च न्यायालय ने सीबीआई को मामला सौंपते हुए कहा था कि उच्चस्तरीय साँठगाँठ के बिना ऐसा घोटाला सम्भव नहीं था।

घोटाले की कई कहानियाँ

चारा घोटाले की कई कहानियाँ हैं। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 6 दिसंबर 1985 को राँची से एक स्कूटर चला। उस पर चार साँड लादे गये थे। यह स्कूटर 344 किलोमीटर की दूरी तय करके घागरा पहुँचा। साँड ढोने के लिए 1,285 रुपये का बिल बना। इस बिल का भुगतान भी हो गया। इसी साल मई में एक कार में राँची से झिंकपानी तक चार साँड पहुँचाये गये। बिल बना 1,310 रुपये और भुगतान हो गया। यह तो छोटे-छोटे नमूने थे।

जाँच के दौरान इस तरह के कई अनोखे और अविश्वसनीय मामले एक-एक करके सामने आये। सीबीआई ने इस बड़े घोटालों में 60 ट्रक से ज़्यादा दस्तावेज़ जुटाये। क़रीब 11 करोड़ पन्नों की फोटो कॉपी हुई। कुल 64 मामले दर्ज हुए और 979 लोग इसमें अभियुक्त बने। एजेंसी ने 8,000 से ज़्यादा गवाह बनाये। 400 से ज़्यादा सीबीआई अफ़सरों ने मामले की जाँच की और 50 से अधिक जज इस मामले की सुनवाई कर चुके हैं।

अब डोरंडा कोषागार मामले में सज़ा

चारा घोटाले से सम्बन्धित चार मामलों की सुनवाई पूरी हो चुकी है और सज़ा भी मुकर्रर कर दी गयी है। झारखण्ड के चाईबासा कोषागार के दो मामलों- देवघर और दुमका के एक-एक मामले में लालू प्रसाद को सज़ा हो चुकी है। ताजा पाँचवाँ मामला राँची के डोरंडा कोषागार का है। इस कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये की निकासी की गयी।

आरसी 47ए/96 मामला 1990 से 1995 के बीच का है। सीबीआई ने इस मामले में 170 लोगों को अभियुक्त बनाया। इसमें से पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत 55 अभियुक्तों की मौत हो गयी। छ: फ़रार घोषित हो गये। आठ को सरकारी गवाह बनाया गया। दो ने अपना दोष पहले ही स्वीकार कर लिया था, शेष 99 अभियुक्तों ने न्यायिक प्रक्रिया का सामना किया। विशेष न्यायाधीश एस.के. शशि ने 15 फरवरी 2022 को चारा घोटाले के लालू प्रसाद सहित 75 को दोषी करार दिया, शेष 24 को साक्ष्यों के अभाव में रिहा कर दिया गया। दोषियों में चार राजनीतिज्ञ, एक आईएएस, एक आईआरएस, दो ट्रेजरी ऑफिसर, 32 पशुपालक हैं। अदालत ने 35 अभियुक्तों को तीन-तीन साल कारावास और 30 हज़ार से दो लाख रुपये तक ज़ुर्माने की सज़ा 15 फरवरी को ही सुना दी गयी। लालू समेत अन्य बचे अभियुक्तों को 21 फरवरी को सज़ा सुनाई गयी, जिसमें लालू प्रसाद को पाँच साल की सज़ा हुई है और 60 लाख का ज़ुर्माना लगाया गया है।

लालू को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल

लालू एक बार फिर जेल (राँची के रिम्स के पेइंग वार्ड) में हैं। साथ ही चर्चा में भी हैं। लालू को कोई भारत की राजनीति का मसखरा कहता है, तो कोई ग़रीबों का नेता, तो कोई बिहार की बर्बादी का ज़िम्मेदार उन्हें मानता है। लालू की पहचान विदेशों तक गूँजी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी भी लालू को अच्छी तरह जानती है। तमाम आरोपों और विवादों के बावजूद लालू यादव आज भी सियासत के केंद्र में हैं। उनके समर्थक, उन्हें आराध्य का दर्जा देते हैं। यही कारण है कि उनके जेल में रहने के बाद भी समर्थक राँची में जमे रहते हैं। पिछले दिनों न्यायालय में पेशी के दौरान समर्थकों का हुजूम पहुँच गया।

चारा घोटाले के पाँचवें मामले में उन्हें दोषी करार दिया गया है। लेकिन समर्थकों के बीच पहले की तरह ही उनका सम्मान बरक़रार है। इन समर्थकों का मानना है कि लालू कभी कुछ ग़लत कर ही नहीं सकते। उन्हें बेवजह फँसाया गया है। समर्थकों का राँची लगातार आना-जाना में लगा हुआ है। हर किसी में लालू की झलक देखने, मिलने और आशीर्वाद पाने की ललक दिखती है। रिम्स के पेइंग वार्ड में रह रहे लालू से मिलने की जुगत में कोई-न-कोई लगा ही रहता है। अस्पताल के आसपास के इलाक़े में लालू के कई समर्थक चक्कर लगाते नज़र आते हैं।

पिछले 15 साल से राजनीति की मुख्यधारा से अलग रहने के बावजूद लालू की यह करिश्माई व्यक्तित्व क़ायम है। यही कारण है कि उन्हें कोई पसन्द करे या न करे, कम-से-कम उन्हें नज़रअंदाज़ तो नहीं कर पाता।

अभी और बढ़ेंगी मुश्किलें

पटना उच्च न्यायालय ने 7 मार्च, 1996 सीबीआई को जाँच सौंपते वक़्त टिप्पणी की थी कि रोम जलता रहा और नीरो बंसी बजाता रहा, वही स्थिति बिहार की रही। उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का अर्थ निकाला जाए, तो सम्भवत: नीरो की तुलना लालू प्रसाद से की गयी थी। क्योंकि उस वक़्त लालू प्रसाद ही बिहार के मुख्यमंत्री थे। चारा घोटाले में पहली बार जेल जाने के बाद से उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। अभी उनकी मुश्किलें और बढऩे के आसार हैं। क्योंकि एक मामला बिहार के पटना में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है। जिसमें अभी सुनवाई जारी है।

उधर चारा घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एंट्री हो गयी है। सीबीआई विशेष न्यायालय के निर्देश पर ईडी ने दो मामलों में (झारखण्ड के देवघर कोषागार से 3.76 करोड़ रुपये और दुमका कोषागार से 34.91 करोड़ रुपये की अवैध निकासी) केस दर्ज कर लिया है। दोनों मामलों की जाँच शुरू हो गयी है। लालू को सीबीआई कोर्ट द्वारा दोनों मामलों में सज़ा सुनायी गयी है। ईडी पहले सज़ा पाने वाले लोगों की ही जाँच करेगी। इसलिए लालू प्रसाद की परेशानी बढ़ गयी है।

 

किन-किन मामलों में मिली सज़ा?

 पहला मामला : आरसी-20 ए/96 चाईबासा कोषागार से 377 करोड़ रुपये अवैध निकासी के आरोप में लालू प्रसाद यादव सहित 44 अभियुक्त बने, जिसमें लालू को पाँच साल की सज़ा हुई।

 दूसरा मामला : आरसी 64ए/96 देवघर कोषागार 84.53 लाख रुपये की अवैध निकासी के आरोप में लालू प्रसाद यादव सहित 38 अभियुक्त बने, जिनमें लालू को साढ़े तीन साल की सज़ा हुई।

 तीसरा मामला : चाईबासा आरसी 68 ए/96 कोषागार से 33.67 करोड़ रुपये की अवैध निकासी मामले में लालू प्रसाद सहित 56 अभियुक्त बने, जिनमें लालू को पाँच साल की सज़ा सुनायी गयी।

 चौथा मामला : आरसी-38ए/96 दुमका कोषागार से 3.13 करोड़ रुपये की अवैध निकासी मामले में लालू को दो अलग-अलग धाराओं में सात-सात साल (14 साल) की सज़ा हुई।

 पाँचवाँ मामला : आरसी 47ए/96 राँची के डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ की अवैध निकासी मामले में अब लालू प्रसाद को फिर पाँच साल की सज़ा हुई है।

 

कब, कितने समय रहे जेल में

 पहली बार : 30 जुलाई, 1997 को लालू जेल भेजे गये।

 दूसरी बार : 28 अक्टूबर, 1998 को 73 दिनों के लिए जेल गये।

 तीसरी बार : 5 अप्रैल, 2000 को 11 दिनों के लिए जेल हुई।

 चौथी बार : 28 नवबर, 2000 को एक दिन के लिए जेल गये।

 पाँचवीं बार : 03 अक्टूबर, 2014 को 70 दिन की जेल हुई।

 छठी बार : 23 दिसंबर, 2017 को क़रीब 3.5 साल के लिए जेल हुई, जिसमें अप्रैल, 2021 से लालू जमानत पर थे।

 सातवीं बार : 15 फरवरी, 2022 को गिरफ़्तार हुए और 21 फरवरी को पाँच साल की सज़ा सुनायी गयी।

निजी क्षेत्र में आरक्षण हरियाणा की जीत

हरियाणा के स्थानीय युवाओं में प्रदेश के निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) में वरीयता से रोज़गार मिलने की उम्मीद फिर से जीवंत हो गयी है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन आदेश निरस्त कर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से चार हफ्ते में निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के 75 फ़ीसदी आरक्षण के क़ानून की वैद्यता पर फ़ैसला करने का आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के इस क़ानून पर बिना कोई कारण बताये स्थगन आदेश का फ़ैसला देने पर भी नाख़ुशी ज़ाहिर की है।

राज्य की फ़रीदाबाद और गुरुग्राम (गुडग़ाँव) की निजी क्षेत्र की एसोसिएशन ने राज्य सरकार के स्थानीय युवाओं को 75 फ़ीसदी आरक्षण देने के फ़ैसले को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने दो मिनट से भी कम की सुनवाई में इस पर स्थगन आदेश दे दिया था, जिसकी वजह से हरियाणा सरकार ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले ने सरकार को राहत दी है, जिससे राज्य के युवाओं में निजी क्षेत्र में आरक्षण के आधार पर नौकरी मिलने की उम्मीद जगी है। राज्य सरकार के क़ानून लागू और इसकी प्रक्रिया शुरू करने के बाद अब भी इसके तहत भर्ती प्रक्रिया शुरू होना फ़िलहाल अधर में है।

हरियाणा देश का पहला राज्य नहीं है, जहाँ निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को आरक्षण देने का क़ानून बनाया है। इससे पहले आंध्रप्रदेश, झारखण्ड, और महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने ऐसी व्यवस्था की है। लेकिन अभी तक इस आरक्षण के तहत किसी को नौकरी मिली नहीं है; क्योंकि मामले सम्बन्धित राज्यों के न्यायालयों में है। जब भी किसी राज्य में इस तरह का फ़ैसला होगा, उन राज्यों के स्थानीय युवाओं को लाभ होगा। नवंबर, 2020 में विधानसभा में पास किया गया। मार्च, 2021 में राज्यपाल ने इसे मंज़ूरी दे दी। इसी वर्ष 15 जनवरी से यह अमल में आया था; लेकिन इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गयी।

निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के आरक्षण तो सरकार में भागीदार जननायक जनता पार्टी (जजपा) के चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल रहा है। इसे क़ानून का रूप देने में इसी पार्टी की अहम भूमिका रही है और सबसे पहली प्रतिक्रिया उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की रही, जिन्होंने इसे युवाओं के अधिकार से जोड़ते हुए फ़ैसले को सराहा। जजपा की पहल पर राज्य सरकार हरियाणा स्टेट एंप्लाटमेंट केंडीडेट्स एक्ट-2020 बनाया। चूँकि इससे राज्य में बेरोज़गारी की दर में कमी आएगी। लिहाज़ा विपक्ष की ओर से किसी तरह का कोई विरोध नहीं किया गया।

15 जनवरी, 2020 में इसे लागू कर दिया गया। क़ानून में जहाँ कम्पनियों को सरकारी पोर्टल पर पूरी जानकारी देकर पंजीकृत करना था। निजी क्षेत्र का रुझान अच्छा रहा, वहीं युवाओं ने भी अपने को पंजीकृत किया। तब क़ानून में 50,000 रुपये तक की नौकरी के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी, जिसका निजी क्षेत्र के कारोबारी संगठनों ने विरोध किया था। उनकी राय में इससे न केवल उनका काम प्रभावित होगा, बल्कि कम्पनियाँ अन्य राज्यों के प्रतिभावान युवाओं से भी वंचित होंगी। विशेषकर स्थापित आईटी क्षेत्र की कम्पनियों ने इसे मन से स्वीकार नहीं किया। नये क़ानून के तहत 50,000 रुपये तक की नौकरियों में बाध्यता की बात उन्हें जँच नहीं रही थी, लिहाज़ा इसका अन्दरख़ाने विरोध होना शुरू हो गया।

राज्य सरकार का दावा है कि निजी क्षेत्र में 75 फ़ीसदी आरक्षण का क़ानून कारोबारी संगठनों से मंत्रणा के बाद ही अमल में आया। कई स्तरों की बातचीत के बाद इसका प्रस्ताव बना, जिसे निजी क्षेत्र की विभिन्न एसोसिएशन्स ने स्वीकार किया। निजी क्षेत्र में ऐसे आरक्षण को राज्य सरकार अपने तौर पर बनाती है, तो वह न्यायालय में टिक नहीं पाएग। राज्य में गुरुग्राम और फ़रीदाबाद में निजी क्षेत्र की हज़ारों कम्पनियाँ हैं, जिन्हें राज्य सरकार अपेक्षाकृत कम दाम पर ज़मीन से लेकर करों (टैक्सों) और क़िफ़ायती बिजली जैसी सुविधा देती है। ऐसे में राज्य सरकार क्यों नहीं चाहेगी कि ये कम्पनियाँ राज्य के स्थानीय युवाओं को रोज़गार भी मुहैया कराएँ।

कारोबारी संगठनों के ऐतराज़ के बाद राज्य सरकार ने 50,000 रुपये तक की नौकरी के आरक्षण को 30,000 तक कर दिया। निजी क्षेत्र में लाखों रुपये के पैकेज होते हैं। क़ानून के तहत कम्पनियाँ या औद्योगिक संस्थान इससे ज़्यादा वेतन वालों को देश के किसी भी राज्य के रख सकती है। राज्य सरकार का मक़सद रोज़गार सृजन करने का है, उच्च पदों में ऐसे किसी आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गयी है। क़ानून का उल्लंघन करने पर कम्पनी मालिकों पर ज़ुर्माने या अन्य दंडात्मक कार्रवाई की व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय ने सही नहीं माना है। निजी क्षेत्र में छोटी नौकरियों के लिए आरक्षण का क़ानून बहस का विषय हो सकता है। सवाल उठाया जा सकता है कि इससे अन्य राज्यों के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए नौकरी के मौक़े कम हो जाएँगे? फ़िलहाल किसी भी राज्य का युवा देश के किसी भी हिस्से में नौकरी कर सकता है। निजी क्षेत्र में कहीं कोई आरक्षण नहीं है। देश में आरक्षण केवल जातिगत आधार पर है, स्थानीय आधार पर नौकरी देने की व्यवस्था नयी है।

युवाओं को अपने ही प्रदेश में रोज़गार मिले तो यह अच्छी बात है। भविष्य में अगर क़ानून अमल में आता है, तो अन्य राज्य सरकारें भी ऐसे क़ानून ला सकती हैं। कुछ राज्य सरकारों के ऐजेंडे में यह मुद्दा भी है। चूँकि अभी तक किसी राज्य में इसके तहत रोज़गार दिया नहीं जा सका है, इसलिए कोई आगे बढ़ नहीं रहा है। हरियाणा सरकार निजी क्षेत्र के इस आरक्षण क़ानून को अमलीजामा पहनाने में कोई कमी नहीं रखना चाहती। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के मुताबिक, सरकार चाहती है कि नामी कम्पनियाँ राज्य में स्थापित हों। सरकारी स्तर पर उन्हें जारी विभिन्न छूटों के अलावा बेहतर सुविधाएँ मिलेंगी। राज्य का गुरुग्राम सूचना प्रोद्योगिकी का प्रमुख शहर है। इसके अलावा औद्योगिक नगरी के तौर पर फ़रीदाबाद है। निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ सरकार के साथ पूरा सहयोग करें, तो सरकार बहुत कुछ करने को तैयार है। राज्य में बेरोज़गारी दर देश में सबसे ज़्यादा फ़िलहाल 23.4 फ़ीसदी के आँकड़ें को वह सही नहीं मानते। उनकी राय में राज्य में बेरोज़गारी की दर छ: से आठ फ़ीसदी तक है। हालाँकि राज्य सरकार के पास ऐसा पुख्ता सुबूत नहीं हैं, जिससे यह फ़ीसदी दर साबित हो। मुम्बई की ग़ैर-सरकारी एजसी सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के जनवरी, 2022 के आँकड़ों को मानें, तो देश भर में सबसे ज़्यादा 23.4 फ़ीसदी की बेरोज़गारी दर है। हरियाणा से तीन से चार गुना ज़्यादा आबादी वाले राज्य में यह दर 18.9 फ़ीसदी। इसके बाद त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य में यह दल 17.1 फ़ीसदी और जम्मू-कश्मीर में 15.0 फ़ीसदी है। बेरोज़गारी देश के ज्वलंत मुद्दों में प्रमुख है। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बेरोज़गारी का मुद्दा हमेशा से अहम रहा है। हरियाणा में बेरोज़गारी का फ़ीसदी अपेक्षाकृत ज़्यादा है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। अक्टूबर, 2021 के आँकड़ों के मुताबिक, राज्य में बेरोज़गारी का फ़ीसदी 30.7 था; जो जनवरी, 2022 में 23.4 फ़ीसदी रह गया। जबकि इस दौरान सरकारी तौर पर इतनी नौकरियाँ सृजित नहीं हुईं।

चुनावी घोषणा-पत्र के मुताबिक, राज्य सरकार अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है। इस लक्ष्य को सरकारी क्षेत्र से पूरा नहीं किया जा सकता, इसलिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था सरकार के लिए कारगर क़दम है। सर्वोच्च न्यायालय के स्थगन आदेश निरस्त करने का मतलब यह नहीं कि तुरन्त प्रभाव से निजी क्षेत्र में भर्ती खुल जाएगी। मामला पंजाब और हरियाणा में लम्बित है, जब तक कोई सकारात्मक फ़ैसला नहीं आता, तब तक निजी क्षेत्र में बिना आरक्षण के योग्यता के बूते ही नौकरी मिल सकेगी। हरियाणा सरकार ने निजी क्षेत्र में 75 फ़ीसदी आरक्षण के क़ानून को पूरी शिद्दत से लागू करने की पूरी तैयारी तो की है; लेकिन उससे पहले सहमति बनाने में कहीं-न-कहीं चूक हुई है। निजी क्षेत्र के पंजीकृत सभी कारोबारी संगठनों के प्रतिनिधियों को भरोसे में नहीं लिया गया। अगर सर्वसम्मति बना ली जाए, तो सम्भव है कि इसके तहत भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो जाए।

 

“कारोबारी संगठनों से विभिन्न चरणों में हुई बातचीत के बाद सभी तरह के प्रावधान किये गये हैं। राज्य सरकार की सुविधाएँ हासिल करने वाली निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ अगर स्थानीय युवाओं की उपेक्षा करती हैं, तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। हरियाणा में प्रतिभाशाली युवक-युवतियों की कोई कमी नहीं है। वे उच्च पदों की योग्यता भी रखते हैं। सरकार अपने तौर पर युवाओं को नयी तकनीक से दक्ष करेगी, ताकि उन्हें निजी क्षेत्र में रोज़गार के मौक़े मिल सकें।’’

मनोहर लाल खट्टर

मुख्यमंत्री, हरियाणा

 

“सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला सराहनीय है। यह किसी पार्टी विशेष के ऐजेंडे से ज़्यादा राज्य के युवाओं को रोज़गार देने की व्यवस्था है। आरक्षण केवल 30,000 रुपये की नौकरी तक के लिए है। इससे ज़्यादा वेतन वालों के लिए कोई बाध्यता नहीं है। क़ानून अमल में आएगा और राज्य में लाखों नौकरियाँ निजी क्षेत्र में स्थानीय युवक-युवतियों को मिलेंगी।‘’

                                  दुष्यंत चौटाला

उप मुख्यमंत्री, हरियाणा

अहम् का टकराव

सियासत भी ग़ज़ब की चीज़ होती है। इसमें जब तक किसी के हित सधते रहते हैं, तब तक तो सब ठीक रहता है; लेकिन जैसे ही अहित होने की सम्भावना जगती है, आदेशों की अनदेखी, विरोध परोक्ष / अपरोक्ष रूप से होने लगते हैं। फिर चाहे कोई कितने भी बड़े संवैधानिक पद पर ही क्यों न बैठा हो। मामला सत्ता के गलियारों में गूँजने लगता है। और मीडिया की सुर्ख़ियाँ बनने लगता है। ऐसा ही मामला आजकल केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को लेकर चल रहा है। उन्होंने अपने निजी स्टाफ में अपने परिचित को नियुक्त कर लिया, तो परिचित की नियुक्ति का विरोध किसी और ने नहीं, बल्कि उन्हीं के एक वरिष्ठ अधिकारी ने राज्यपाल को पत्र लिखकर जता दिया। जब विरोध एक अधिकारी द्वारा राज्यपाल के आदेश का किया गया, तो मामला निश्चित तौर पर भूचाल लाने वाला बनना ही था। इस नियुक्ति को लेकर सरकार राज्यपाल की क्या राजनीति मंशा है?

इसी मामले को लेकर ‘तहलका’ के विशेष संवाददाता को राजनीतिक चिन्तक और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के प्रोफेसर हरीश खन्ना ने बताया कि राज्यपाल की नियुक्ति देश का राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस लिहाज़ से संवैधानिक तौर पर राज्यपाल का पद मुख्यमंत्री से ऊँचा होता है। इसलिए किसी भी राज्य की चुनी हुई सरकार अगर किसी मामले में राज्यपाल से असहमत है, तो उसका विरोध उसे एक मर्यादा के भीतर शिष्टतापूर्वक करना चाहिए। राज्यपाल के पास कुछ विशेष शक्तियाँ भी हैं, तो सीमित अधिकार भी हैं। जो कि लोकतंत्र के लिए ज़रूरी हैं। मगर मौज़ूदा दौर में सियासत में कुछ ज़्यादा ही उग्रता देखी जा रही है। इसके कारण संवैधानिक पदों पर बैठे राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की अवहेलना अक्सर देखने, सुनने को मिल रही है।

राजनीति विश्लेषक प्रो. हंसराज का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वहाँ टकराव होता है, जहाँ पर अलग-अलग चुनी हुई सरकारें होती हैं। उनका कहना है कि केरल में कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की सरकार है, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकार है, यही कारण है कि दोनों राज्यों में राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की बीच वैचारिक और राजनीतिक स्तर पर टकराव होता रहता है। यही हाल दिल्ली का है। यहाँ आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार और उप राज्यपाल में आये दिन टकराव होता रहा है।

प्रो. हंसराज कहते हैं कि केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन है, जिसकी छवि एक मंजे हुए राजनीतिक की तरह है। वह अक्सर राजनीति में अपनी बात रखने के लिए अधिकारियों को दाँव-पेच के खेल में उलझाकर काम कराया करते हैं। क्योंकि जब राज्यपाल ने एक व्यक्ति की नियुक्ति की और उन्हीं के एक अधिकारी ने विरोध कर दिया। यह हिम्मत तो अधिकारी की हो ही नहीं सकती है। इसके पीछे ज़रूर मुख्यमंत्री का हाथ हो सकता है। क्योंकि राजनीति में प्रलोभन और राजनीतिक चालें छिपी हुई होती हैं, जिसका ख़ुलासा देर-सबेर होता है। लेकिन तब तक सियासी खेल बन-बिगड़ जाते हैं।

जब एक अधिकारी ने राज्यपाल के आदेश का पालन नहीं किया, तो राज्यपाल को ग़ुस्सा आना स्वाभाविक है। राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने बाक़ायदा तर्क देते हुए कहा है कि केरल सरकार के मंत्री अपने लोगों को व्यक्तिगत तौर पर अमला (स्टाफ) की नियुक्ति करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन राज्यपाल को अपना निजी सहायक रखने के लिए कोई अधिकार और स्वतंत्रता नहीं है! यह तो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का मज़ाक़ है।

कामरेड सुनील शर्मा ने कहते हैं कि एक दौर था, जब कई राज्यों में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकारें होती थीं और केंद्र सरकार भी कम्युनिस्टों के सहयोग से चला करती थी। तब केंद्र सरकार राज्य सरकारों पर राज्यपालों के माध्यम से हस्तक्षेप नहीं करती थीं। लेकिन मौज़ूदा सरकार के चलते ज़्यादा हस्तक्षेप बढ़ा है, जिसके चलते मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच विवाद और टकराव हो रहा है।

सियासत के जानकार कृष्ण देव का कहना है कि एक दशक से देश की सियासत में एक तरह की राजनीति कुछ अलग ही तरीके से चल पड़ी है, जिसके चलते छोटे-छोटे मामलों पर बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के पास अक्सर इस बात का रोना रहता है कि फलाँ-फलाँ काम उप राज्यपाल के यहाँ अटका पड़ा है। क्योंकि केंद्र में भाजपा की सरकार है। इसलिए काम की फाइल अटकना तो बहाना है, उसके पीछे की सियासत कुछ और ही है। उनका कहना है कि यही हाल पश्चिम बंगाल का है। जहाँ पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच किसी-न-किसी मुद्दे पर विवाद छिड़ा रहता है।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि राज्यपाल की नियुक्ति भले ही महामहिम राष्ट्रपति करते हों और वह उनके अधीन भी हों; लेकिन असल में राज्यपाल तो केंद्र सरकार का ही माना जाता है। भाजपा नेता का कहना है कि केरल हो या अन्य राज्य, वहाँ के राज्यपाल को पूरा अधिकार है कि वह अपने पसन्द के व्यक्ति की नियुक्ति कर सकते हैं। लेकिन इसमें अगर कोई विरोध सरकार या उसका अधिकारी करता है, तो निश्चित तौर पर यह बात सबको समझनी चाहिए कि ज़रूर कोई गड़बड़ है। ऐसा क्या है कि केरल में राज्यपाल एक नियुक्ति करें और वहाँ के मुख्यमंत्री अपरोक्ष रूप से उनका विरोध करने के लिए एक अधिकारी को कहें। केरल की राजनीति से जुड़े पूर्व अधिकारी ने बताया कि देश में इस समय राजनीति समीकरण साधने के जो प्रयास किये जा रहे हैं, उसके लिए एक-एक आदमी पर नज़र रखी जा रही है। कौन-सा नेता, कौन-से आदमी को नियुक्त कर रहा है? अन्यथा संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल के आदेश को कोई काट सकता है? बात इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि अब राज्य सरकारें देखती हैं कि राज्यपाल जिस व्यक्ति की नियुक्ति कर रहे हैं, वह किसका आदमी है? और किस विचार धारा से जुड़ा है? यहाँ भी इसी के चलते एक नियुक्ति को लेकर हो-हल्ला हो रहा है।

बता दें कि केरल की राजनीति में राज्यपाल का मामला इस क़दर तूल पकड़ रहा है कि अब केरल के लोगों ने और कम्युनिस्ट नेताओं ने यह आवाज उठानी शुरू कर दी है कि राज्यपाल का पद ही समाप्त कर दिया जाए। केरल के नेताओं का कहना है कि मौज़ूदा केंद्र सरकार का संवैधानिक ढाँचा चरमराने लगा है। इसलिए अब केरल की विधानसभा को ही यह अधिकार मिलना चाहिए या उसकी सहमति से वहाँ के राज्यपाल की नियुक्ति हो। मौज़ूदा समय में ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों में इस बात को लेकर एकता पर बल दिया जा रहा है कि उनके राज्य में राज्यपाल के मार्फ़त केंद्र सरकार हस्तक्षेप कर रही है। राज्य सरकार के काम में बाधा डाल रही है। केंद्र सरकार ही राज्यपाल के माध्यम से अपने लोगों को राज्य में बड़े पदों पर नियुक्तियाँ करा रही है। यही वजह है कि राज्य सरकारों को काम करने बाधा आ रही है।

राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच हो रहे टकराव और विवाद के बीच समाधान को लेकर अंबेडकर कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एस.के. गौर का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध तो होते रहते हैं। लेकिन विरोध किन-किन लोगों के बीच हो रहा है? यह भी महत्त्वपूर्ण होता है। वैसे संवैधानिक पद पर विराजमानों के बीच टकराव हो, तो ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों के माध्यम से और क़ानूनविदों की सहायता से समाधान निकाला जाना चाहिए। क्योंकि लोग तो यह जानते हैं कि अगर केंद्र सरकार में किसी अन्य दल की सरकार है और राज्य सरकार में अन्य दल की सरकार है। ऐसे में लोगों के बीच यह सन्देश होता है कि राज्यपाल तो केंद्र का होता है, इसलिए प्रदेश सरकार के काम में रुकावट तो आनी ही है। डॉ. एस.के. ग़ौर का कहना है कि किसी भी राज्य का क़ानून हो या मंत्री परिषद् को लेकर कोई काम हो, वो बिना राज्यपाल के हस्ताक्षर के सम्भव ही नहीं है। यानी राज्य के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल के कामकाज पर सवालिया निशान लगाना या नियुक्ति जैसे मामले पर विरोध करना ज़रूर राज्य सरकार की सियासी चाल हो सकती है। अगर यह सियासी चाल है, तो निश्चित तौर पर लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। दिल्ली के उप राज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री के बीच तमाम कामों और फ़ैसलों को लेकर तनातनी की ख़बरें अक्सर मीडिया में सामने आती रहती हैं। जैसा कि कोरोना-काल में पाबंदियों और छूट को लेकर काफ़ी विवाद दोनों के बीच चला, जिसको लेकर यह बात सामने आयी है कि ये भी सियासी पैंतरे हैं। लेकिन इन पैंतरबाज़ी में अगर कोई पिसता है, तो वह है जनता। ऐसे में ज़रूरी यह हो जाता है कि राज्यपाल / उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अहम का टकराव नहीं होना चाहिए। कई बार चुनी हुई सरकार के मंत्री अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर जाते हैं, जिससे मामला बेवजह ही तूल पकड़ जाता है।

मज़बूत अर्थ-व्यवस्था के बिना विकास का सपना

कोरोना वायरस से दूसरे सबसे ज़्यादा प्रभावित देश भारत की अर्थ-व्यवस्था कब और कैसे दोबारा उछाल मारेगी? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। देश के सामने इस समय कई बड़ी चुनौतियाँ हैं। जैसे पिछले दो साल में क़रीब 1.5 से 1.7 करोड़ लोगों का रोज़गार छिना है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि फँसा क़र्ज़ यानी एनपीए कुल क़र्ज़ का 7.5 फ़ीसदी से बढक़र 13.5 फ़ीसदी तक पहुँच सकता है। ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों के औसत उपभोग में वृद्धि की बात तो छोड़ दीजिए, उसमें गिरावट आयी है।

पिछले पाँच साल में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए खपत न केवल धीमी हुई है, बल्कि लगातार गिरती चली गयी है। पाँच साल पहले की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति खपत में 8.8 फ़ीसदी की कमी आयी है। इसके साथ-साथ देश में ग़रीबी की दर में वृद्धि हो रही है। देश की दूरगामी अर्थ-व्यवस्था के लिए ग्रामीण क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है। बेरोज़गारी के आँकड़े देखेंगे, तो यह पिछले 45 साल में सर्वाधिक है। इससे पहले कभी भी बेरोज़गारी की दर इतनी अधिक नहीं रही।

 

पीएचडीसीसीआई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष साकेत डालमिया कहते हैं कि कोरोना के कारण भारत की अर्थ-व्यवस्था पर असर पड़ा है, जिससे लोगों की आमदनी प्रभावित हुई है। केंद्र सरकार विकास का सपना काफ़ी पहले से लोगों को दिखा रही है। कहा जा रहा है कि वह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र पर ध्यान दे रही है। लेकिन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें इस क्षेत्र के लिए पूँजी का निवेश करना होगा। विकास को पुनर्जीवित करने और इसे बेहतर ढंग से विस्तारित करने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बारे में विचार करना होगा।

सवाल यह उठता है कि दीर्घकालिक विकास कैसे सम्भव होगा? देश में निवेश की दर में लगातार कमी आ रही है। 2008-2009 में जीडीपी के भीतर क़रीब 39 फ़ीसदी हिस्सा निवेश का था, जो कम होकर 30 फ़ीसदी तक पहुँच गया। इससे यह बात तो साफ़ हो गयी है कि पाँच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की अर्थ-व्यवस्था अगले 4-5 साल में तो असम्भव है; क्योंकि इसकी गणना यूएस डॉलर के आधार पर होती है। अब तो विकास दर गिरकर 4.5 फ़ीसदी पर पहुँच गयी है। पिछले कुछ साल में अर्थ-व्यवस्था के विरोधाभासी और सन्देहास्पद आँकड़ों को लेकर भी सवाल उठ रहे है। देश में आँकड़ों को एकत्रित करने के लिए सांख्यिकीय प्रणाली उपयोग में लायी जाती है।

सवाल उठ रहा है कि सरकार अर्थ-व्यवस्था में जान कैसे फूँकेगी? वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गाँवों में ग़रीबों और मज़दूरों को सहारा देने वाली मनरेगा योजना का आवंटन भी पहले से घटा दिया है। जैसा कि हम जानते हैं इस योजना के तहत ग्रामीणों को माँगने पर 100 दिनों का सुनिश्चित रोज़गार देने का प्रावधान है। लेकिन गाँवों में भी बेरोज़गारी की समस्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

राज्यसभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि बेरोज़गारी की वजह से 2018 से 2020 तक 9,140 लोगों ने आत्महत्या की है। साल 2018 में 2,741, 2019 में 2,851 और 2020 में 3, 5480 लोगों ने बेरोज़गारी की वजह से आत्महत्या की। साल 2014 की तुलना में 2020 में बेरोज़गारी की वजह से आत्महत्या के मामलों में 60 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है।

इसी तरह आर्थिक संकट के कारण आत्महत्या करने के आँकड़े भी भयावह हैं। बेरोज़गारी की तरह ही सन् 2018 से सन् 2020 तक दिवालियापन और क़र्ज़ की वजह से आत्महत्या करने वालों में भी बढ़ोतरी हुई है। गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि ऐसे मामलों में इन तीन वर्षों में कुल 16,091 लोगों ने आत्महत्या की है। साल 2019 में दिवालियापन और क़र्ज़ के चलते आत्महत्या करने वालों की संख्या 5,908 है, जो तीन वर्षों में सबसे अधिक है। देश में नौकरी का संकट बड़ा है। लाखों युवक नौकरी की तैयारी कर रहे हैं; लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। लेकिन सरकार के पास रोज़गार देने की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। देश में आर्थिक मोर्चे पर किस तरह की ग़फलत हो रही है, इसका ख़ुलासा पिछले दिनों, जिसमें पता चला कि एनएसई की पूर्व सीईओ किसी हिमालय वाले योगी के कहने पर बहुत-से काम किया करती थी, यहाँ तक कि एक शख़्स की नियुक्ति भी ईमेल के ज़रिये योगी बाबा के कहने पर मोटा वेतन देकर की गयी।

भारतीय स्टॉक मार्केट नियामक (सेबी) ने यह जानकारी दी कि देश के सबसे बड़े एक्सचेंज की पूर्व प्रमुख सीईओ चित्रा रामकृष्ण ने एक योगी के साथ गोपनीय जानकारी साझा की और उनकी सलाह से कई महत्त्वपूर्ण फ़ैसले लिये। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने यहाँ तक कहा कि चित्रा रामकृष्ण ने योगी के साथ बिजनेस प्लान, बोर्ड बैठकों का एजेंडा और वित्तीय अनुमान साझा किये थे। चित्रा रामकृष्ण ने 2016 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज से इस्तीफ़ा दिया था। सेबी ने कहा है कि अब तक उन्होंने जो दस्तावेज़ एकत्रित किये हैं, उससे साफ़ हो गया कि स्टॉक एक्सचेंज को पीछे से एक योगी चला रहे थे।

सवाल यह है कि आख़िर वह हिमालय वाला योगी कौन है? इस सवाल के जवाब में कई नाम सामने आ रहे हैं। यह मामला किसी संदेहास्पद भूतिया फ़िल्म जैसा बन गया है, जिससे पर्दा तब ही उठ सकता है, जब ख़ुद चित्रा रामकृष्ण उस योगी का नाम पता और पहचान बता दें। सीबीआई ने पूर्व सीईओ चित्रा रामकृष्ण, रवि नारायण और पूर्व सीईओ आनंद सुब्रमण्यम के ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया है। मामले की छानबीन करने से पता चलता है कि चित्रा रामकृष्ण चेन्नई के एक योगी मुरुगादिमल सेंथिल, जिसे तमिल भाषा में स्वामिगल कहते हैं; के सम्पर्क में रहती थीं। वह उन्हें अपना गुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शक (स्प्रिचुअल गाइड) मानती थीं। अभी उस योगी की मौत हो चुकी है। दिलचस्प है कि वह योगी आनंद से भी जुड़े हुए थे, जिसे चित्रा रामकृष्ण ने भारी पैकेज पर नियुक्त किया था।

आनंद सुब्रमण्यम का सालाना पैकेज 14 लाख रुपये के क़रीब था। लेकिन जब अप्रैल, 2013 में उन्हें एनएसए नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में एम.डी. और सीईओ चीफ स्ट्रेटेजिक एडवाइजर के तौर पर नियुक्त किया, तो उन्हें क़रीब डेढ़ करोड़ रुपये का सालाना पैकेज ऑफर किया गया और दो से तीन साल के अन्दर ही सुब्रमण्यम का पैकेज बढक़र पाँच करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। योगी के इशारों पर ही आनंद को तगड़े इनक्रिमेंट दिये गये और उस पर ख़ूब पैसे लुटाये गये। यही नहीं, रामकृष्ण प्रदर्शन के मूल्यांकन (परफॉर्मेंस अप्रेजल) की रेटिंग देते हुए भी बाबा से सलाह लेती थीं और सुब्रमण्यम को हमेशा ए+ रेटिंग देती थीं। चित्रा रामकृष्ण की इस करतूत ने नियामक संस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिये हैं। लेकिन देश की अर्थ-व्यवस्था जिस दौर से गुज़र रही है; बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है, तो ऐसे ख़ुलासे लोगों के भरोसे को तोड़ते हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी की वृद्धि दर 7.8 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया है, जबकि संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में यह दर 8.5 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है। सकल घरेलू उत्पाद यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी सामानों और सेवाओं के कुल मूल्य (वैल्यू) को कहते हैं।

जीडीपी किसी भी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है। अधिक जीडीपी का मतलब है कि देश में आर्थिक बढ़ोतरी हो रही है। अगर जीडीपी बढ़ती है, तो इसका मतलब है कि अर्थ-व्यवस्था ज़्यादा रोज़गार पैदा कर रही है। इसका यह भी मतलब है कि लोगों का जीवन स्तर भी आर्थिक तौर पर समृद्ध हो रहा है। इससे यह भी पता चलता है कि कौन-कौन से क्षेत्र में विकास हो रहा है? कौन-सा क्षेत्र आर्थिक तौर पर पिछड़ा है?

कपड़ों की औक़ात

यह दुनिया बड़ी विचित्र है। इसमें भी सबसे विचित्र प्राणी इंसान है। इंसान की फ़ितरत भी बड़ी विचित्र है। किसी भी हाल में हो, या तो बेचैन रहता है, या असन्तुष्ट। इंसान ही वह प्राणी है, जो अपना स्वार्थ साधने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। अब स्वार्थ ही एक ऐसी कड़ी बन चुकी है, जो एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़े रहती है। अगर स्वार्थ दोनों तरफ़ से न भी हो, तो एक तरफ़ से तो ज़रूर होता  यही वजह है कि एक इंसान दूसरे इंसान से उतना ही मिलकर रहता है, जितना उसका स्वार्थ जुड़ा होता है। हालाँकि अगर किसी को संसार अथवा इंसानी समाज से अलग कर दो, तो वह जी भी नहीं सकेगा। क्योंकि सच्चाई यही है कि इंसान का अस्तित्व दूसरों के बग़ैर, ख़ासकर जिन लोगों और चीज़ें पर वह निर्भर है, उनके बग़ैर कुछ भी नहीं है। लेकिन इतने पर भी उसे यह भ्रम रहता है कि उसके बग़ैर न तो दूसरे का कोई अस्तित्व है और न ही उसके बग़ैर कुछ होगा।

यह भ्रम मज़हबी कट्टरपंथियों में हद से ज़्यादा ही दिखता है। इसकी वजह यह है कि ये मज़हबी कट्टरपंथी अपनी असली पहचान भूलकर ख़ुद के अस्तित्व से बाहर दिखावे की पहचान को ही अपनी असली पहचान समझते हैं। ऐसे लोगों ने यह पहचान मज़हबों में खोज रखी है। जब सिर्फ़ मज़हबों से काम नहीं चला, तो इन लोगों ने शरीर की प्राकृतिक बनावट में ऊपरी बदलाव किया। इससे भी काम नहीं चला, तो वेशभूषा में बदलाव किया और रंगों को मज़हबों की पहचान से जोड़ दिया।

विडम्बना यह है कि इन कट्टरपन्थियों ने न केवल मज़हबों को, बल्कि उनसे जुड़ी शारीरिक बनावट, वेशभूषा और रंगों को अपनी जान से भी क़ीमती समझ लिया। हद तो यह है कि कई बार इन कट्टरपंथियों ने अपने दिखावे अथवा इन दिखावे की पहचानों को बचाने की मूर्खता में एक-दूसरे की जान भी ली है; और अब भी इस पर बहुत-से मूर्ख आमादा हैं। यह लोग इस बात को भी नहीं समझते कि जिस शरीर को इन्होंने मज़हब के हिसाब से दिखाने की कोशिश की है, वह शरीर भी मर जाएगा। और ज़िन्दगी भर उस मज़हब में ख़ुद को ढाले रहने के लिए हज़ारों बार नश्वर शरीर को बनावटी रूप देना पड़ेगा। कितनी ही बार मज़हबी कपड़े बदलने पड़ेंगे। इन लोगों को यह बात भी समझ नहीं आती कि किसी की कोई भी बाहरी पहचान स्थायी नहीं है; शरीर के बराबर भी स्थायी नहीं। प्रकृति बार-बार इन पहचानों को नष्ट करती है और कट्टरपंथी बार-बार इसे मज़हबी रूप देते रहते हैं; चाहे वो शारीरिक बनावट हो, चाहे वेशभूषा हो। इन्हीं सब चीज़ें की बिना पर इंसान इस क़दर बँट गया कि उसे अपने ही भाइयों में दुश्मन, विरोधी और ग़ैर इंसान नज़र आने लगा।

सन्त कहते हैं कि दुनिया के प्राणियों में शरीरों का भेद ऊपरी है। लेकिन आत्मा सबकी एक ही परमपिता का अंश है। इस प्रकार पृथ्वी की गोद में पलने वाले सभी प्राणी एक ही प्रकाश से प्रकाशित हैं; अर्थात् एक ही परमेश्वर के अंश हैं। प्रकृति की गोद में सब एक जैसे हैं। लेकिन इतने पर भी एक-दूसरे की पहचान कपड़ों से करते हैं।

अभी हाल में उठा हिजाब का मुद्दा इसी का एक उदाहरण है। हैरत की बात यह है कि जो मज़हबी कपड़े अन्तिम यात्रा के दौरान ख़ुद मज़हब वाले ही उतार देते हैं, उन्हीं कपड़ों के लिए कट्टरपंथी लोग ज़िन्दगी भर लड़ते हैं और उनकी रक्षा के लिए दूसरों की हत्या जैसा जघन्य पाप करने तक से नहीं चूकते। ये लोग इतना भी नहीं समझते कि कपड़े तो शरीर ढँकने का साधन मात्र हैं। रही रंगों की बात, तो ऐसा कोई रंग नहीं, जिससे कोई ख़ुद को अलग रख सके। क्या विडम्बना है कि जिस इंसान को मरने के बाद यह भी पता नहीं रहता कि उसके शरीर के साथ क्या हो रहा? वह जीते-जी इंसानियत की सारी हदें लाँघकर उन कपड़ों के लिए लड़ता है, जिन्हें उसे फटने पर जीते-जी फेंकना पड़ता है। यह भ्रम क्यों? क्योंकि लोगों के विचारों में फ़र्क़ है। पहले लोगों के मतभेद पर तर्क-वितर्क होते थे, अब मनभेद होते हैं। मतभेदों से मनभेद तक पहुँचने वालों की मूर्खता की पराकाष्ठा यह है कि वे एक-दूसरे से हद से ज़्यादा नफ़रत करने लगते हैं।

लोगों को समझना चाहिए कि दुनिया में कोई एक सत्य स्थायी नहीं है। एक व्यक्ति को जो सच लगता है, वह दूसरे व्यक्ति को झूठ भी लग सकता है। अथवा एक व्यक्ति के लिए जो सही है, वह किसी दूसरे के लिए ग़लत भी हो सकता है। जो बात किसी एक को सन्तुष्ट करती है, वह दूसरे को असन्तुष्ट भी कर सकती है। रंगों और कपड़ों के मामले में भी यही बात लागू होती है। फिर झगड़ा किस बात का? लेकिन झगड़ा है। ज्ञानी लोग कहते हैं कि झगडऩा मूर्खों का काम हैं। मशहूर शाइर ग़ालिब ने इसे बड़े अनोखे अंदाज़ में बयाँ किया है। वह कहते हैं-

‘‘बाग़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे’’

अर्थात् ग़ालिब कहते हैं कि मेरे सामने यह दुनिया बच्चों के खेलने का मैदान है, जिसमें रात-दिन मेरे सामने तमाशा होता रहता है। यह बात शायद सब लोगों की समझ में न आये; ख़ासकर उनकी, जिनकी आँखों पर मज़हबी पर्दा पड़ा है। दुनिया की नश्वरता समझने वाले कभी रंगों, कपड़ों और मज़हबों के लिए किसी की जान नहीं ले सकते; किसी को परेशान नहीं कर सकते। अफ़सोस यह है कि इस तरह के कट्टर लोग आज दुनिया के हर मज़हब में हैं। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या यह कट्टरपंथी इंसान हैं?

महाशिवरात्रि के पर्व पर मंदिरों में शिव भक्तों की धूम

हर साल की भाँति इस साल भी महाशिवरात्रि के पर्व पर मंदिरों में शिव भक्तों ने भगवान शिव की पूजा अर्चना और भगवान से आर्शीवाद प्राप्त कर देश–दुनिया में शांति की आपील की है। दिल्ली में आज तड़के से ही मंदिरों पूजा-पाठ और टन-टन घंटो की आवाज सुनने को मिलने लगी थी । लोगों ने अपने भगवान को बेल पत्ती, भांग और फूलों के साथ पूजा की।सबसे बड़ी बात तो मंदिर में इस बार देखने को मिली कि मंदिरों में कोरोना महामारी की समाप्ति के लिये लोगों ने भगवाने से प्रार्थना की अब कोरोना जैसी घातक बीमारी फिर से ना आये।

मंदिरों के पुजारियों ने तहलका संवाददाता को बताया कि कोरोना महामारी का ताडंव शिव ताडंव के आगे नतमस्तक हो गया है। अब धीरे-धीरे कोरोना चला जायेगा।राधा कृष्ण और शिव मंदिर के पुजारी ने बताया कि पिछले कई सालों की तरह इस साल भी महाशिवरात्रि का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस पर्व में स्कूली छात्र भी बढ़चढ़ कर भाग ले रहे है।

मंदिरों के बाहर रेहड़ी–पटरी में बैल–पत्ती बेचनें वाले और पूर्जा अर्चना का सामान बेचने वालों में बड़ा उत्ताह देखने को मिला है। उनका कहना है कि दो सालों से कोरोना के कारण कई त्यौहारों पर उनके रोजगार फीकें रहे है। जिससे माली हालत कमजोर हुई है। रेहड़ी लगाने वाले बलराम ने बताया कि शिवरात्रि को लेकर उनके काम दो-तीन से अच्छा चल रहा है। उन्होंने भी भगवान शिव से प्रार्थना करते हुये कहा कि वह कोरोना का नाश करें और देश–दुनिया में सुख–शांति और समृद्रि के लिये आर्शीवाद दें। ताकि लोगों का जीवन शांति के साथ व्यतीत होता रहें।