16 मई 2026: नई दिल्ली/एम्स्टर्डम : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पांच देशों के दौरे के दूसरे चरण में नीदरलैंड पहुंच गए हैं। एम्स्टर्डम पहुंचने पर उनका डच अधिकारियों और भारतीय समुदाय ने स्वागत किया। यह यात्रा भारत और नीदरलैंड के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने के लिहाज से अहम मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी इस दौरान डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। बातचीत में व्यापार, रक्षा, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन, कृषि और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर फोकस रहेगा। पीएम मोदी नीदरलैंड के राजा विलेम-अलेक्जेंडर और क्वीन मैक्सिमा से भी मुलाकात करेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने एम्स्टर्डम पहुंचने के बाद कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते ने व्यापार और निवेश संबंधों को नई गति दी है। उन्होंने कहा कि यह दौरा सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी, जल प्रबंधन और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का अवसर है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत-नीदरलैंड संबंध पारंपरिक व्यापार और कृषि सहयोग से आगे बढ़कर रक्षा, समुद्री सुरक्षा, नवाचार और हरित प्रौद्योगिकी तक पहुंचे हैं। वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 27.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि नीदरलैंड भारत का चौथा सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बन चुका है। भारत में डच निवेश का कुल मूल्य लगभग 55.6 अरब डॉलर बताया गया है।
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत यूरोप के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को तेजी से विस्तार देने की दिशा में काम कर रहा है।
नई दिल्ली, 16 मई 2026: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिक्किम राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर राज्य के लोगों को शुभकामनाएं दीं और सिक्किम के निरंतर विकास के लिए केंद्र सरकार के पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि सिक्किम ने पर्यावरण संरक्षण, पर्यटन, जैविक खेती और सतत विकास के क्षेत्र में देश के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया है। उन्होंने राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, शांतिप्रिय समाज और प्राकृतिक सुंदरता की सराहना करते हुए कहा कि सिक्किम भारत की विविधता और एकता का मजबूत प्रतीक है।
पीएम मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार सिक्किम के बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी, पर्यटन और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में सिक्किम विकास और प्रगति की नई ऊंचाइयों को छुएगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा है कि “राज्य स्थापना दिवस पर मेरे सभी भाई बहनों को शुभकामनाएं।भारत के विकास में सिक्किम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय हैं। मै राज्य के लोगों को 50 वीं वर्षगांठ पर शुभकामनाएं देता हूं।
गौरतलब है कि सिक्किम 16 मई 1975 को भारत का 22वां राज्य बना था। हर वर्ष इस दिन को राज्य स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिछले पांच दशकों में सिक्किम के परिवर्तन पर ध्यान दिया है जिसमें राज्य और केन्द्र के नेताओं ने बुनियादी ढांचे,पर्यटन,कनेक्टिविटी, और सामाजिक संकेतकों में सुधार पर काम किया है। केन्द्र ने भी हाल के वर्षों में सिक्किम सहित पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में सड़क के नेटवर्क और बुनियादी ढांचे के साथ पर्यटन के विकास पर जोर दिया है। औऱ कई पहलों की घोषणाए भी की है।
16 मई 2026, नई दिल्ली/ तिरूवनंतपुरम : यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की आज होने वाली महत्वपूर्ण बैठक में नई सरकार के मंत्रिमंडल और विभागों के बंटवारे को अंतिम रूप दिया जाएगा। बैठक में मुख्यमंत्री पद, प्रमुख मंत्रालयों और सहयोगी दलों की हिस्सेदारी को लेकर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस समेत यूडीएफ के घटक दल गृह, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोक निर्माण जैसे अहम विभागों के बंटवारे पर सहमति बनाने की कोशिश करेंगे। बैठक में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन के साथ-साथ सहयोगी दलों की राजनीतिक ताकत को भी ध्यान में रखा जाएगा। मुख्यमंत्री पद के लिए नामित वी डी सतीशान और यूडीएफ संयोजक अडूर प्रकाश सुबह 10 बजे से घटक दलों के नेताओं के साथ पदों और विभागों के आवंटन पर बातचीत कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि कुछ विभागों को लेकर सहयोगी दलों के बीच खींचतान बनी हुई है, लेकिन गठबंधन नेतृत्व जल्द सहमति बनाकर नई सरकार के गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। बैठक के बाद मंत्रियों की संभावित सूची और विभागों की आधिकारिक घोषणा हो सकती है।
इस दौरान केरल कैबिनेट ने दो कैबिनेट के पदों की मांग की है। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व एक मंत्री पद के साथ मुख्य सचेतक या डिप्टी स्पीकर का पद देने की पेशकश कर रहा है। महत्वपूर्ण बात है2026 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत दर्ज करते हुए 102 सीटें जीतकर एलडीएफ के दस साल के राज्य को खत्म कर सत्ता में वापसी की है।
अमेरिका ने ढेर किया खूंखार आतंकी अबू-बिलाल | Image Source: News 18 Hindi
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि यह ऑपरेशन काफी जटिल और लंबे समय से प्लान किया गया मिशन था। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां काफी समय से अबू-बिलाल की गतिविधियों पर नजर रख रही थीं। ट्रंप के अनुसार, आतंकी को लगता था कि वह अफ्रीका में छिपकर सुरक्षित रह सकता है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को उसकी हर हरकत की जानकारी मिल रही थी।
अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई अफ्रीका के उस इलाके में की गई जहां ISIS से जुड़े कई आतंकी गुट सक्रिय हैं। अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, अबू-बिलाल संगठन की अंतरराष्ट्रीय रणनीति और नेटवर्क में अहम भूमिका निभा रहा था। उस पर कई आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने और नए लड़ाकों को जोड़ने के आरोप भी थे। माना जा रहा है कि उसके मारे जाने से ISIS की गतिविधियों को बड़ा झटका लग सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अबू-बिलाल का असली नाम अबू बक्र इब्न मुहम्मद इब्न अली अल-मैनुकी था। वह अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में ISIS से जुड़े ऑपरेशनों को संभालता था। अमेरिकी विदेश विभाग ने साल 2023 में उसे आधिकारिक तौर पर संगठन का वरिष्ठ नेता घोषित किया था। उसके कई अलग-अलग नाम भी सामने आए थे, जिनका इस्तेमाल वह पहचान छिपाने के लिए करता था।
ट्रंप ने इस ऑपरेशन के लिए नाइजीरिया सरकार और वहां की सेना का भी धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा और किसी भी आतंकी संगठन को सुरक्षित ठिकाना नहीं मिलेगा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस कार्रवाई के बाद अफ्रीका में ISIS का नेटवर्क कमजोर पड़ सकता है।
हालांकि, इस ऑपरेशन को लेकर अभी तक ISIS की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ इसे आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई मान रहे हैं।
तहलकाMagazine/Exclusive Report / Edition : 16-31st May 2026
ममता सिंह।
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर को जातीय हिंसा की आग में झुलसते तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते ही जा रहे हैं! सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां शांति की राह आसान नहीं दिख रही है। जो लड़ाई मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुई थी, उसने पहले ही पूरे राज्य को दो हिस्सों में बांट दिया है। हजारों लोग राहत शिविरों में हैं और समुदायों के बीच अविश्वास की खाई गहरी हो चुकी है। इस बीच, 2026 के ताजा घटनाक्रम ने इस संकट को और अधिक चिंताजनक बना दिया है। अब यह लड़ाई सिर्फ दो पक्षों की नहीं रही, नगा समुदाय के आने से यह मामला अब और उलझ गया है।
मणिपुर का नक्शा एक तश्तरी जैसा है। बीच में इंफाल घाटी है, जो कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 10% है। लेकिन इस छोटे से हिस्से में राज्य की 53% आबादी (मुख्य रूप से मैतेई समुदाय) रहती है। घाटी विकसित है, राजधानी यहीं है और राजनीतिक रसूख भी यहीं से तय होता है। ऐसे में यह लड़ाई सिर्फ धर्म या जाति की नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व और अधिकार’ की है। घाटी के लोग अपनी बढ़ती आबादी के लिए जगह चाहते हैं, तो पहाड़ों में रहने वाले समुदाय अपनी जमीन और पहचान को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। अब नगाओं की एंट्री ने इसे दो पक्षों की लड़ाई से हटाकर एक ऐसा त्रिकोणीय संघर्ष बना दिया है, जिसमें हर कोई अपनी ‘पैतृक जमीन’ को सुरक्षित करने की होड़ में है। फरवरी 2026 में उखरुल के लिटन गांव से भड़की चिंगारी ने अब कुकी और नगा समुदायों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। जब बिष्णुपुर के मोइरांग में घर के अंदर रॉकेट हमले ने दो मासूम जिंदगियां छीन लीं, तो लगा कि हिंसा का सबसे भयावह दौर शुरू हो गया है। लेकिन उसके तुरंत बाद नगा बहुल इलाके उखरुल के मुल्लम और सिनाकेइथेई गांवों में हुई गोलाबारी ने यह साफ कर दिया कि अब निशाना केवल मैतेई नहीं, बल्कि नगा गांव भी हैं।
उखरुल और कामजोंग जिलों में शुरू हुए ताजा संघर्ष में अब तक आधिकारिक और पुख्ता रिपोर्टों के अनुसार, 12 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, हालिया घटनाओं को लेकर कोअलिशन ऑफ इंडिजीन्स राइट्स कैंपेन (सीआईआरसीए) ने आरोप लगाया है कि मणिपुर के कामजोंग जिले के गांवों नामली, वांगली और चोरो पर हाल ही में हुए हमले म्यांमार स्थित कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा (केएनए-बी) और म्यांमार के पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) जैसे समूह शामिल थे। यानी अब की तमाम घटनाएं ‘सीमा पार आतंकी हमले‘ जैसी ही प्रतीत हो रही हैं।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि इस पूरे संघर्ष में ‘म्यांमार फैक्टर’ सबसे खतरनाक मोड़ बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय सीमा से होने वाली घुसपैठ ने मणिपुर की आग को और भड़का दिया है। म्यांमार के विद्रोही संगठन अपने सजातीय ‘भाइयों’ की मदद के नाम पर भारतीय सीमा में घुसकर हमले कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर देश की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। नगा गांवों में मची तबाही और वहां से गायब होते लोग बता रहे हैं कि यह अब कोई मामूली लड़ाई नहीं रह गई है। विद्रोहियों के पास मौजूद सैन्य ड्रोन, रॉकेट लॉन्चर और स्नाइपर राइफलें साफ इशारा कर रही हैं कि सीमा पार से उन्हें पूरी रणनीतिक मदद मिल रही है। यानी कल तक भारत सरकार जिस चारों क्षेत्र को ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया का व्यापारिक द्वार बनाना चाहती थी, वह आज मलबे और अविश्वास के ढेर में तब्दील हो चुका है।
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले तीन सालों से नगा समुदाय, कुकी-मैतेई विवाद से दूर रहा है। इस समुदाय की चुप्पी और तटस्थता ने ही राज्य को पूरी तरह बिखरने से बचाए रखा, लेकिन जब आंच उनके गांवों और घरों तक पहुंच गई तो उनके भी सब्र का बांध टूट पड़ा! नगा संगठनों का आरोप है कि कुकी विद्रोही उनके इलाकों में घुसपैठ कर रहे हैं। उनकी जमीनों पर हक जमाने की कोशिशें दिनोदिन बढ़ रही हैं। जानकारों का कहना है कि यदि नगा समुदाय की रक्षा के लिए नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड- इसाक-मुइवा यानी एनएससीएन (आईएम) जैसे बड़े और ताकतवर संगठन ‘अपने’ लोगों के समर्थन में मैदान में उतर आए, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। लंबे समय से ‘शांति वार्ता’ से बंधे ये संगठन यदि फिर हथियार उठाते हैं या ‘ग्रेटर नगालिम’ की मांग फिर से हिंसक हुई तो इसकी आंच सिर्फ मणिपुर तक नहीं रहेगी; असम, नगालैंड और मिजोरम भी इसकी चपेट में आ जाएंगे, जिससे पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है!
मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई सरकार राज्य में स्थायी शांति बहाली की कोशिश तो कर रही है, लेकिन ये प्रयास सिर्फ ऊपरी तौर पर ही दिख रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का मुद्दा बताकर सरकार को घेर रहे हैं, वहीं एन. बीरेन सिंह अब भी हिंसा की मुख्य वजह ड्रग्स और घुसपैठ को ही मान रहे हैं। हालांकि, बीते विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद चुनाव ड्यूटी से लौटे अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा तो संभाल लिया है, लेकिन फिर भी सवाल यह है कि क्या सिर्फ बंदूकों के साए में खौफजदा लोगों का भरोसा जीता जा सकता है?
यदि मई 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो मई 2023 से भड़की इस आग में अब तक 250 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 63 हजार से ज्यादा लोग अपने घरों को छोड़कर कैंपों में शरण लेने पर मजबूर हैं। तीन साल बीत जाने के बाद भी विस्थापितों की सुरक्षित घर वापसी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। समुदायों के बीच पैदा हुई नफरत की खाई को भरने के लिए अब केवल वादे नहीं, बल्कि दशकों का समय और एक ईमानदार राजनीतिक संकल्प चाहिए।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में भारत सरकार के पास ‘त्रिकोणीय शांति फॉर्मूला’ ही इकलौता रास्ता बचता है। मणिपुर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता साथ मिलकर आगे बढ़ने की ओर जाता है और दूसरा उस अंतहीन अंधेरे की ओर, जहां से लौटना नामुमकिन होगा। यदि सबको साथ लेकर चलने वाली राजनीति तुरंत शुरू नहीं हुई, तो मोइरांग के उन मासूमों और उखरुल की जली हुई बस्तियों की रौनक कभी वापस नहीं लौट पाएगी।
उखरुल और कामजोंग पर क्यों है नजर?
उखरुल और कामजोंग में छिड़ा यह नया संघर्ष मणिपुर की हिंसा का सबसे जटिल अध्याय है। यह अब केवल एक जातीय दंगा नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक और रणनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है। विश्वसनीय सूत्रों और ताजा घटनाक्रमों के आधार पर इसके पीछे की मुख्य वजहें हैं- इंफाल से उखरुल और कामजोंग का रास्ता म्यांमार सीमा तक पहुंचने का सबसे छोटा और अहम रूट है। कुकी विद्रोही इस इलाके पर कब्जा कर घाटी और पहाड़ियों के बीच अपना मजबूत आधार बनाना चाहते हैं, ताकि सीमा पार से हथियारों और रसद की सप्लाई सीधे उनके हाथ में रहे। मालूम हो कि मणिपुर से म्यांमार की करीब 390 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा है। खुफिया जानकारी के मुताबिक, ज्यादातर घुसपैठ म्यांमार सीमा से ही हो रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कामजोंग में देखने को मिला, जहां सीमापार से आए विद्रोहियों ने ड्रोन और रॉकेट हमलों से सुरक्षा एजेंसियों की नींदें उड़ाकर रख दी हैं। इन विद्रोहियों की कोशिश नगा गांवों को खाली कराकर अपने लोगों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना तैयार करने की है! उखरुल और कामजोंग लंबे समय से नगाओं का गढ़ रहे हैं, जहां 90 के दशक में भी खूब खून-खराबा हुआ था। जानकारों की मानें तो अब कुकी विद्रोही ‘अलग प्रशासन’ के लिए म्यांमार बॉर्डर से सटी जमीन चाहते हैं! मैतेई बहुल घाटी में जगह न मिलने के कारण वे अब नगा इलाकों में आबादी बसाकर राज्य का भूगोल बदलने की कोशिश में हैं। इस संघर्ष के पीछे अफीम की खेती और ड्रग्स का अरबों का कारोबार भी बड़ी वजह है। विद्रोही तस्करी के रास्तों पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। सरकार के ‘वार ऑन ड्रग्स’ अभियान ने इनके धंधे को चोट पहुंचाई है, जिसे दोबारा शुरू करने के लिए अब इन शांत जिलों को युद्ध के मैदान में तब्दील किया जा रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उखरुल-कामजोंग का यह ‘छोटा पैच’ पूरे पूर्वोत्तर की सुरक्षा की चाबी है। कुकी विद्रोहियों का लक्ष्य यहां के स्थानीय नगाओं को विस्थापित कर एक ऐसा हथियारबंद गलियारा बनाना है, जो उन्हें सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा से जोड़ दे और भविष्य में ‘स्वतंत्र प्रशासन’ की मांग को भौगोलिक मजबूती दे सके।
भारतीय राजनीति का केंद्र अब 2029 की ओर मुड़ चुका है जिसके लिए 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव एक निर्णायक ‘सेमीफाइनल’ माने जा रहे हैं। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों ने देश के पांच राज्यों की सियासी दिशा तय कर दी है। परिणामों ने बता दिया है कि मतदाताओं का मिजाज बदल रहा है। अब संकीर्ण मानसिकता की राजनीति नहीं चलेगी। पश्चिम बंगाल से केरल और तमिलनाडु तक, नए की उम्मीद और पुराने के प्रति गुस्से के चलते मौजूदा व्यवस्थाएं ढहती दिखीं। असम में जहां हिमंता की पकड़ बरकरार रही, वहीं बंगाल ने शुभेंदु अधिकारी के राजतिलक के साथ ऐतिहासिक ‘भाजपा युग’ में प्रवेश किया। दक्षिण में अभिनेता विजय की पार्टी ने तमिलनाडु की सत्ता पर कब्जा कर सबको चौंका दिया। पुडुचेरी में रंगासामी का जादू फिर चला, जबकि केरल में कांग्रेस गठबंधन की प्रचंड जीत हुई है।
नतीजों ने बता दिया है कि राजनीति अब केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध के सहारे नहीं जीती जा सकती। आज के दौर में चुनावी वैतरणी पार करने के लिए डेटा इंटेलिजेंस और हाई-टेक बूथ मैनेजमेंट जैसे आधुनिक हथियारों को अपनाना अनिवार्य हो चुका है। पुरानी वैचारिक जकड़न और घिसे-पिटे सिद्धांतों के बूते हाई-टेक संसाधनों से लैस विरोधियों को मात देना अब पूरी तरह असंभव जान पड़ता है। चुनावी मैदान में कामयाबी की डगर अब पहले जैसी सहज नहीं रह गई है, यहां हर कदम पर नई तकनीक और सटीक रणनीतिक कौशल की दरकार होती है।
कांग्रेस के लिए इन नतीजों में सबसे बड़ा सबक यह छिपा है कि राहुल गांधी को अब अपनी नीति निर्धारण में लचीलापन लाना ही होगा। केरल की सफलता और तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी ‘टीवीके’ का उदय इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जहां क्षेत्रीय क्षत्रपों को ‘फ्री हैंड’ दिया गया, वहां करिश्माई नतीजे सामने आए। अब वह समय बीत चुका है जब दिल्ली में बैठकर राज्यों की किस्मत के फैसले तय किए जाते थे। राहुल गांधी को अब क्षेत्रीय चेहरों को न केवल बड़ी पहचान देनी होगी, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की पूरी स्वायत्तता भी सौंपनी होगी।
विपक्ष को यह समझना होगा कि जीत तभी मुमकिन है जब चुनाव को केवल राष्ट्रीय विमर्श में उलझाने के बजाय राज्यों के स्थानीय मुद्दों और जनता की जमीनी जरूरतों पर केंद्रित किया जाए। ऐसे में मुख्य विपक्षी दल होने का दावा करने वाली कांग्रेस को भाजपा के ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल की काट ढूंढनी होगी। कांग्रेस को तत्काल ऐसे कैडर की तलाश शुरू कर देनी चाहिए जो तकनीकी और रणनीतिक रूप से सक्षम हों। आज कांग्रेस सेवादल की जो बदहाली है, वह किसी से छिपी नहीं है।
संदेश साफ है कि 2027 के राज्यों के चुनावों और 2029 की बिसात बिछाने के लिए अब नए चेहरे और स्पष्ट विजन का फॉर्मूला अपनाना ही होगा। सत्ता पक्ष को पटखनी देने के लिए सत्ता विरोधी लहर का सही समय पर सटीक इस्तेमाल अनिवार्य है, वरना सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। चुनाव नतीजों ने कांग्रेस और क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने जो बड़ी चुनौती पेश की है, उसे पाटने के लिए कार्यकर्ताओं को किताबी बातों के बजाय जमीनी कसरत पर अधिक ध्यान देना होगा। अब केवल ‘मोदी विरोध’ के नकारात्मक नैरेटिव से मतदाता रीझने वाले नहीं हैं। दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए महज सांगठनिक फेरबदल काफी नहीं, बल्कि आधुनिक मॉडल को आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा।
पश्चिम बंगाल में वामफ्रंट का कैडर ‘वैज्ञानिक’ तरीके से बूथ की निगरानी के लिए जाना जाता था। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का बूथ प्रबंधन भी लगभग उसी वामपंथी ढर्रे पर ही आधारित रहा। तृणमूल ने 15 साल सत्ता संभाली, लेकिन आधुनिक दौर के अनुरूप अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव नहीं किया, जिसका खमियाजा उसे वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा। दूसरी ओर, भाजपा का पूरा जोर तकनीक और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर जैसे आधुनिक सुधारों पर रहा। भाजपा ने अपने कैडरों को डेटा और टेक्नोलॉजी पर केंद्रित किया, जबकि तृणमूल और कांग्रेस के दिग्गज केवल भाषणों के जरिए हमलावर रहे। विपक्ष मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए जाने का दावा करता ही रह गया, जबकि भाजपा ने तकनीक के मोर्चे पर बाजी मार ली।
दस्तावेजों की पड़ताल के नाम पर करीब करीब 27 लाख मतदाताओं को वोट डालने से रोका गया, क्योंकि निर्वाचन आयोग के अनुसार उनके कागजात अधूरे थे। ममता बनर्जी, कांग्रेस और वामदलों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, लेकिन भाजपा को घेरने के चक्कर में वे इसकी तह तक जाने में नाकाम रहे। तृणमूल कांग्रेस केवल आरोप-प्रत्यारोप में ही उलझी रही और अपने वोट बैंक को सुरक्षित व समृद्ध करने के जमीनी मोर्चे पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत, भाजपा कैडर लोगों के घरों तक पहुंच कर वोटर लिस्ट दुरुस्त करने में जुटा रहा। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में मतदाताओं की चुप्पी नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश छिपा है। जरूरत बस इस जमीनी हकीकत और जनता के संकेत को सही समय पर समझने की है।
पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि अब राज्य में ‘जय श्रीराम’ और ‘खेला होबे’ जैसे नारों की गूंज फीकी पड़ चुकी है। इनकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है और भविष्य में महज इन नारों के दम पर सत्ता की दहलीज तक पहुंचना नामुमकिन है। परिणामों का विश्लेषण करें तो ‘एसआईआर’ के अलावा कई ऐसे कारक हैं, जिन्होंने तृणमूल की विदाई तय की। हार के लिए केवल सरकारी मशीनरी पर आरोप लगाना महज खानापूर्ति के सिवाय कुछ और नहीं, असलियत कहीं अधिक गहरी है। पश्चिम बंगाल में दलित और ओबीसी वोट बैंक में हुए बिखराव ने ममता बनर्जी की बंगाल से विदाई में आग में घी का काम किया। भाजपा ने मतुआ और राजबंशी समुदायों के बीच अपनी पैठ इतनी मजबूत की कि तृणमूल के अभेद्य दुर्ग ढहते चले गए। हुमायूं कबीर और ओवैसी ने ‘दीदी’ के पारंपरिक वोट बैंक में ऐसी सेंध लगाई कि ध्रुवीकरण का सीधा लाभ भाजपा की झोली में जा गिरा। यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि मतदाता अब तुष्टिकरण नहीं, बल्कि समान अवसर चाहता है। अपनी ही सीट भवानीपुर न बचा पाने वाली ममता के पतन की पटकथा वामपंथ से आए उन ‘दागी’ कैडरों ने लिखी, जिन्हें तृणमूल ने शरण दी थी।
दूसरी ओर, तमिलनाडु में ‘टीवीके’ सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी है। यहां के मतदाता लंबे से क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के चक्रव्यूह में फंसे थे। लेकिन नायक से जननायक बने विजय ने उस राजनीतिक शून्यता को भर दिया है जो जयललिता और करुणानिधि जैसे दिग्गज नेताओं के जाने से पैदा हुई थी। तमिलनाडु की जनता अब तक थेवर, वनियार और कोंगु वेल्लालर जैसी जातियों में बंटी थी, जिसे टीवीके ने तमिल पहचान के विजन से तोड़ दिया। तमिलनाडु में दशकों पुराने द्रविड़ किलों को ढहाते हुए अभिनेता विजय की पार्टी ने 108 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। हालांकि, बहुमत के 118 के आंकड़े से वे थोड़ा दूर थे, लेकिन कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर उन्होंने तमिलनाडु में एक नए राजनीतिक युग की आधिकारिक शुरुआत कर दी है।
तमिलनाडु में क्षेत्रीय राजनीति के इस बड़े उलटफेर ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही भविष्य के लिए सतर्क कर दिया है। अब दोनों ही दल फूंक-फूंककर कदम उठाने को मजबूर हैं। जहां तक असम का सवाल है, भाजपा ने वहां जीत की हैट्रिक लगाकर अपनी पकड़ साबित की, लेकिन सबसे चौंकाने वाली खबर गौरव गोगोई की हार रही। गौरव न केवल कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा हैं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के उत्तराधिकारी भी हैं। इसके बावजूद, वह जोरहाट सीट पर भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी से 23,182 वोटों से मात खा गए।
असम में, हिमंत बिस्वा सरमा ने असमिया अस्मिता को मोदी सरकार के विकास विजन से कुछ इस तरह जोड़ा कि विपक्षी वोट बैंक पूरी तरह बिखर गया। इसी का परिणाम था कि कांग्रेस के राष्ट्रीय चेहरा गौरव गोगोई को जोरहाट में हितेंद्र नाथ गोस्वामी से 23,182 मतों से करारी हार झेलनी पड़ी। असल में असम में कांग्रेस की हार के पीछे बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) और अन्य क्षेत्रीय दलों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। भाजपा उन सीटों पर भी जीती, जहां मुकाबला त्रिकोणीय था।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो असम में भाजपा के जीत की पटकथा विधानसभा चुनाव के पहले ही लिख दी गई थी, जब नगांव के कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। बोरदोलोई ने दिसपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। उनके पाला बदलने से असम की सियासत ऐसे गरमाई कि मतदाताओं के बीच यह संदेश चला गया कि राज्य में तीसरी बार भी भाजपा ही सरकार बनाएगी। वाकई, बोरदोलोई का भाजपा में जाना असम चुनाव का सबसे बड़ा ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हुआ। साथ ही,
अल्पसंख्यक समाज को लेकर उन्होंने जो बिसात बिछाई, उसका सीधा असर 2026 के विधानसभा परिणामों में दिखाई दिया।
अब मतदाता जाति और धर्म की पुरानी बेड़ियों को तोड़कर ‘विकास’ और ‘राष्ट्रहित’ को प्राथमिकता दे रहा है। सूचना के इस दौर में आम नागरिक अब इतना सजग है कि वह नेताओं के वादों और जमीनी हकीकत के अंतर को तुरंत भांप लेता है। यानी जनता अब व्यवस्था की सुस्ती या राजनीतिक संकीर्णता को सहन करने के मूड में नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उभरा यह नया मिजाज बताता है कि लोकतंत्र अब केवल वोट देने तक सीमित नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का माध्यम बन चुका है। स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति अब भावनात्मक मुद्दों को पीछे छोड़कर ‘परफॉरमेंस’ की राह पर चल पड़ी है। जहां व्यवस्था उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती, वहां जनता का आक्रोश बड़े बदलाव लाने की ताकत रखता है।
मोदी फैक्टर: विपक्ष के हर चक्रव्यूह का जवाब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए एक ब्रांड से कहीं बढ़कर हैं। विपक्षी नेता भी अब परोक्ष रूप से स्वीकार करने लगे हैं कि मोदी न केवल भारत, बल्कि विश्व के लोकप्रिय नेताओं में शुमार हैं। पीएम का विजन स्पष्ट है और मतदाताओं में भरोसा जताने में कामयाब होते हैं कि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की कामयाबी के पीछे असल चेहरा पीएम मोदी का ही है। वहां के लोगों ने इस विश्वास के साथ मतदान किया कि देश को श्रेष्ठ बनाने के लिए बंगाल में परिवर्तन अनिवार्य है। वरना, ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को ढहाना असंभव था। इन चुनावों की जीत का लाभ अगले साल महत्वपूर्ण राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड एवं पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में मिलना तय माना जा रहा है। मोदी की हर हुंकार में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना निहित रहती है।
कांग्रेस की चुनौती: राहुल का गणित और 2029 की राह
हालिया विधानसभा चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस को अपनी रणनीति में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। केरल में जीत के बावजूद पार्टी तमिलनाडु में जनता की नब्ज पहचानने में चूक गई। यदि राहुल गांधी ने समय रहते थलापति विजय के साथ पुख्ता गठबंधन किया होता, तो आज राज्य में दो-तिहाई बहुमत की सरकार होती। वहीं, बंगाल में ममता बनर्जी पर उनका सीधा हमला भी आत्मघाती साबित हुआ, जिसने गठबंधन की संभावनाओं को खत्म कर दिया। राहुल गांधी के लिए 2029 की राह तभी आसान होगी, जब वे क्षेत्रीय दिग्गजों के साथ 2027 के लिए बेहतर सामंजस्य बिठाएंगे।
उम्मीदों का ‘नायक’
तमिलनाडु में दशकों पुराने द्रविड़ किलों को ढहाकर अभिनेता जोसेफ विजय ने नया राजनीतिक इतिहास रच दिया है। उनकी पार्टी टीवीके ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि विधानसभा में बहुमत जुटाकर विजय ने अपनी रणनीतिक सूझबूझ से विरोधियों को दंग कर दिया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने ‘चरणबद्ध शराबबंदी’ जैसा साहसिक फैसला लेकर जता दिया कि उनके लिए जनहित राजस्व से ऊपर है। महिलाओं की सुरक्षा और भ्रष्टाचार पर उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने उनकी ‘पर्दे वाले नायक’ की छवि को असल जिंदगी में भी पुख्ता कर दिया है। विजय की सबसे बड़ी खूबी उनका संतुलन है; जहां एक ओर राहुल गांधी के साथ उनकी वैचारिक नजदीकी है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी के साथ विकासपरक तालमेल राज्य के लिए नई उम्मीदें जगाता है। खुद को किसी गठबंधन का पिछलग्गू बनाने के बजाय एक स्वतंत्र और सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर विजय ने साबित कर दिया है कि वे लंबी रेस के खिलाड़ी हैं।
हिमंता का मास्टरस्ट्रोक
असम में हिमंता बिस्वा सरमा एक ऐसे रणनीतिकार बनकर उभरे हैं, जिन्होंने ‘सत्ता विरोधी लहर’ को पूरी तरह बेअसर कर दिया। चुनाव से ठीक पहले मटक समुदाय के आरक्षण की मांग और सांस्कृतिक आइकन जुबीन गर्ग के निधन (सितंबर 2025) के बाद उपजे असंतोष ने राज्य का माहौल ‘बर्निंग’ बना दिया था। विपक्ष, खासकर अखिल गोगोई और गौरव गोगोई ने जुबीन गर्ग की मौत और जांच में देरी को सरकार के खिलाफ बड़ा चुनावी हथियार बनाने की कोशिश की। हालांकि, हिमंता की सूझबूझ ने विपक्ष की इस चाल को विफल कर दिया। उन्होंने न केवल जांच के लिए एसआईटी गठित की, बल्कि मटक समुदाय के साथ सीधा संवाद कर ऐसे फैसले लिए जिससे जनता का आक्रोश भरोसे में बदल गया।
सवाल 27 लाख मतदाताओं का
राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, लेकिन असली सवाल पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाताओं का है जो लोकतंत्र के इस पर्व से बाहर रह गए। गौर करने वाली बात यह है कि चुनाव से पहले मतदाता सूची में 91 लाख नाम हटाए गए थे, जिनमें से 34 लाख लोगों ने वोट देने के हक के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। ममता बनर्जी जिस भवानीपुर सीट से शुभेंदु अधिकारी से करीब 15 हजार वोटों से हारीं, वहां लगभग 47 हजार लोगों के वोट मतदाता सूची से गायब मिले! राजनीतिक गणित देखें तो भाजपा और तृणमूल के बीच जीत-हार का अंतर मात्र 13 लाख वोटों का है। बेशक, यदि ये लोग भी वोट डालते तो चुनावी नतीजे क्या होते, इसका अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है! यह भी सच है कि बंगाल में घुसपैठियों की समस्या पुरानी है, वामपंथियों से लेकर कांग्रेस और फिर तृणमूल तक, हर सरकार ने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। सवाल यह भी बड़ा है कि यदि वो घुसपैठिए हैं तो उन्हें उनके मूल स्थान पर भेजना चाहिए। लेकिन ऐसा न करना भी पूरे सिस्टम की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
शून्य पर सिमटा वाम: एक युग का अंत!
पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में लंबे समय तक राज करने वाले वामफ्रंट का वर्ष 2026 में पूरी तरह से सफाया हो गया। केरल के नतीजों ने वामपंथ की विदाई पर अंतिम मुहर लगा दी है, जबकि बंगाल और त्रिपुरा से मतदाता इन्हें पहले ही बेदखल कर चुके हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि वामपंथ आज भारत में अपने सबसे कठिन दौर में है। आज का युवा ‘वर्ग संघर्ष ’ जैसी अप्रासंगिक विचारधारा से खुद को नहीं जोड़ पा रहा। डिजिटल क्रांति के इस युग में वामपंथ की पुरानी नीतियां विकास की दौड़ में थक सी गई हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जनता को अब अंतहीन आंदोलनों से सरोकार नहीं रहा, वह बुद्धिमानी से हर पल बेहतर अवसर तलाश रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि 2029 में वामफ्रंट क्या करेगा। क्योंकि अब उनके पास कोई बड़ा चेहरा तक नहीं बचा। केरल कांग्रेस ने चुनाव नतीजों के बाद कई दिनों की मशक्कत और गहन मंथन करके वरिष्ठ नेता वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना।
पहलगाम में आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान से आयात पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद हिमालयी गुलाबी नमक अवैध तरीके से अनौपचारिक नेटवर्क के माध्यम से लगातार भारत में पहुंच रहा है। राजस्थान और नोएडा के बाजारों में सड़कों के किनारे विक्रेताओं द्वारा खुलेआम यह नमक बेचा जा रहा है और उपभोक्ताओं द्वारा भी यह बड़े चाव से खरीदा जा रहा है। लाहौरी नमक और सेंधा नमक के नाम से प्रसिद्ध यह पाकिस्तानी नमक भारत में बिना रोकटोक के कैसे बिक रहा है? किस तरह आ रहा है? इसी को लेकर तहलका एसआईटी की यह रिपोर्ट :
7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर डिस्प्ले पिक्चर बदली और नागरिकों से भी सशस्त्र बलों और उनकी सफलता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में ऐसा ही करने का आग्रह किया। भारत ने 7 मई, 2025 को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जो जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के खिलाफ एक सुनियोजित सैन्य प्रतिक्रिया थी। इस आतंकी हमले में 26 भारतीय नागरिक मारे गए थे। ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य सीमा पार आतंकवादी ढांचे को नष्ट करना और पाकिस्तान स्थित संगठनों द्वारा आगे के हमलों को रोकना था। चार दिनों तक चले इस अभियान में भारतीय थल सेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित कार्रवाई शामिल थी, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान में आतंकवाद से जुड़े नौ ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया, जिसके बाद अंततः युद्ध विराम हुआ। ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर तहलका ने अपनी इस पड़ताल में खुलासा किया है कि पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान से आयात पर प्रतिबंध के बावजूद कैसे एक पाकिस्तानी उत्पाद भारतीय सड़कों पर खुलेआम बेचा जा रहा है और लगभग 80 प्रतिशत भारतीय घरों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। ये प्रतिबंधित उत्पाद चावल, सब्जियां या बाजरा नहीं है, बल्कि सेंधा नमक है, जो हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक प्रमुख सामग्री है। यह नमक, जिसे आमतौर पर सेंधा नमक के नाम से जाना जाता है, हिंदू संस्कृति और परंपराओं में वैदिक ग्रंथों में निहित कारणों से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे अक्सर पाकिस्तानी नमक या लाहौरी नमक के रूप में जाना जाता है और भारत में उपवास में, विशेषकर नवरात्रि जैसे अनुष्ठानों के दौरान इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। भारत में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश सेंधा नमक ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान से आयात किया जाता है, क्योंकि यह नमक भारत में प्राकृतिक रूप से पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता है। हालांकि हाल के वर्षों में भारत ने अन्य देशों से उत्पाद आयात करके पड़ोसी देश पर अपनी निर्भरता कम करने का प्रयास किया है। गुलाबी नमक या हिमालयी नमक के नाम से प्रसिद्ध सेंधा नमक पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। वहां विशाल खेवरा नमक खदान स्थित है, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खदान है। इस खदान से सालाना लगभग 4.5 लाख टन नमक निकाला जाता है। हालांकि भारत अधिकांश वस्तुओं के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है। लेकिन सेंधा नमक उन कुछ प्रमुख वस्तुओं में से एक है, जिसका भारत में बड़े पैमाने पर- लगभग 80 प्रतिशत भारतीय घरों में उपयोग होता है। यह नमक पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर आयातित होता है। हालांकि 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की जान जाने के बाद और भारत द्वारा 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू करने से पहले पाकिस्तानी मूल के हिमालयी गुलाबी नमक पर भारत में प्रभावी रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। नई दिल्ली ने पाकिस्तान से होने वाले सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात जैसे तीसरे देशों के माध्यम से भेजे जाने वाले सामान भी शामिल हैं। 2 मई, 2025 से विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने हिमालयी गुलाबी नमक यानी सेंधा नमक सहित सभी पाकिस्तानी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध आज भी लागू है। हालांकि तहलका की इस पड़ताल में पता चला है कि प्रतिबंधों के बावजूद पाकिस्तानी गुलाबी नमक या सेंधा नमक भारतीय सड़कों पर अवैध रूप से बेचा जा रहा है। पड़ताल के दौरान तहलका को राजस्थान के झुंझुनू और उत्तर प्रदेश के नोएडा में ट्रकों और टेम्पो से गुलाबी नमक बेचने वाले विक्रेताओं की बढ़ती संख्या का पता चला। इनमें से कई विक्रेता, जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल हैं; राजस्थान से हैं। जबकि कुछ उत्तर प्रदेश से हैं। ये लोग अपना कारोबार सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी गाड़ियों को सड़क किनारे खड़ा करते हैं। तहलका रिपोर्टर ने जब इन विक्रेताओं से बात की, तो उन्होंने दावा किया कि बेचा जा रहा नमक पाकिस्तान से पंजाब और राजस्थान के रास्ते लाया जाता है। ऐसे में अगर प्रतिबंध के बावजूद पाकिस्तान से नमक का आयात जारी है, तो कानून प्रवर्तन एजेंसियों को इस मामले की तत्काल जांच करनी चाहिए। ‘यह गुलाबी नमक तस्करी के जरिए पाकिस्तान से आ रहा है। मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन मेरे बेटे को है। पंजाब और राजस्थान के बड़े व्यापारी पाकिस्तान से यह नमक खरीदते हैं और हम उनसे एक बार में लगभग 2-3 टन नमक खरीदते हैं।’ -राजस्थान के झुंझुनू में गुलाबी नमक बेचने वाली एक स्ट्रीट वेंडर रोशनी ने तहलका के गुप्त पत्रकार को बताया। ‘पिछले 10 वर्षों से मैं झुंझुनू की सड़कों पर खुलेआम यह पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेच रही हूं। लोग मुझसे इसे क्विंटलों में खरीदते हैं।’ -उसने कहा। ‘भारतीयों को पाकिस्तानी गुलाबी नमक पसंद है। वे भारतीय टाटा नमक को पसंद नहीं करते और इसकी बिक्री हमारे यहां न के बराबर है। पाकिस्तानी गुलाबी नमक को भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। इससे बीमारियों की संभावना कम हो जाती है।’ -रिपोर्टर से बात करते हुए रोशनी ने यह दावा किया। ‘पिछले साल पहलगाम हमले के बाद जब भारत ने पाकिस्तान के साथ सभी तरह के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था, तब व्यापारियों ने पाकिस्तानी गुलाबी नमक के पुराने स्टॉक को ऊंची दरों पर बेचा था। अब यह पाकिस्तानी गुलाबी नमक एक बार फिर पाकिस्तान से भारत में आने लगा है।’ -उसने कहा। ‘यह पाकिस्तान का लाहौरी नमक है और यह राजस्थान के रास्ते मुझ तक पहुंचता है। यह नमक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। अगर आपके शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन है, तो यह पाकिस्तानी गुलाबी नमक उसे कम करने में मदद करता है।’ -उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक अन्य स्ट्रीट वेंडर शिव कुमार चौधरी ने तहलका के गुप्त पत्रकार से कहा।
‘मैं गारंटी दे सकता हूं कि मैं जो गुलाबी नमक बेच रहा हूं, वह पाकिस्तान का है। अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है, तो मेरा फोन नंबर ले लीजिए और अगर आपको पता चले कि नमक पाकिस्तानी नहीं है, तो उसे वापस कर दीजिए।’ -शिव कुमार ने कहा। ‘मैं नोएडा के सेक्टर-78 में सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक पाकिस्तानी लाहौरी नमक बेचता हूं और इसकी शुद्धता की गारंटी देता हूं। यदि आप चाहें, तो मैं 100-150 किलोग्राम पाकिस्तानी लाहौरी नमक उपलब्ध करा सकता हूं।’ -नोएडा के एक अन्य स्ट्रीट वेंडर अरविंद ने हमारे गुप्त रिपोर्टर से कहा। तहलका के गुप्त कैमरे ने सबसे पहले रोशनी को, जो केवल अपने पहले नाम से जानी जाती है; झुंझुनू में प्रतिबंधित पाकिस्तानी हिमालयी गुलाबी नमक बेचते हुए पकड़ा, जिसे लोकप्रिय रूप से सेंधा नमक यानी लाहौरी नमक के नाम से जाना जाता है। उसने अपना ट्रक सड़क किनारे खड़ा कर रखा था और खुलेआम नमक बेच रही थी। हमारे गुप्त पत्रकार की रोशनी के साथ संक्षिप्त बातचीत जल्द ही रहस्योद्घाटन में बदल जाती है, क्योंकि हमारे गुप्त पत्रकार ने जब बार-बार उससे पूछा कि पाकिस्तानी गुलाबी नमक भारत कैसे पहुंचता है, तो उसने बिना ज्यादा झिझक के वह स्वीकार किया करती है कि नमक सीमा पार से आता है और अंततः मानती है कि यह तस्करी के माध्यम से आता है। हालांकि वह दावा करती है कि उसके बेटे को मार्ग और नेटवर्क के बारे में अधिक जानकारी है, लेकिन उसके जवाबों से संकेत मिलता है कि प्रतिबंध के बावजूद व्यापार जारी है। यह चैट इस बात को भी दर्शाती है कि सड़क किनारे के विक्रेता कितनी लापरवाही से ऐसे दावे कर रहे हैं।
रिपोर्टर : ये आता कैसे है पाकिस्तान से? रोशनी : पाकिस्तान से लाकर देते हैं। रिपोर्टर : बॉर्डर पार करके आता होगा? रोशनी : हां, उसका बॉर्डर पार करते हैं… पता न क्या करते हैं, लड़के को पता है। रिपोर्टर : वो स्मगलिंग जो होती है, वो? रोशनी : हां। रिपोर्टर : स्मगलिंग होकर आता है? रोशनी : हां।
आगे की बातचीत में रोशनी बताती है कि पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद हुए ऑपरेशन सिंदूर के कारण पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने पर पाकिस्तानी गुलाबी नमक की आपूर्ति कैसे प्रभावित हुई थी। उनका कहना है कि संघर्ष के बाद कुछ समय के लिए नमक की आपूर्ति बंद हो गई थी, जिसके कारण व्यापारियों को पुराने स्टॉक को काफी ऊंची कीमतों पर बेचा था। बातचीत के दौरान वह बार-बार उत्पाद को लाहौरी नमक कहकर संबोधित करती है और दावा करती है कि उस समय यह नमक 150-200 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहा था। उनके बयानों से पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद आपूर्ति माध्यमों के फिर से खुलने के बाद इसका व्यापार फिर से शुरू हो गया। रिपोर्टर : अभी पाकिस्तान से लड़ाई चल रही थी, तब आ रहा था? रोशनी : जब नहीं आ रहा था, जब तो बंद हो जाता है। तब तो महंगा देते हैं ये सेठ माल।
रोशनी
रिपोर्टर : अभी पिछले साल लड़ाई हुई थी पाकिस्तान से? रोशनी : जब बंद हो गया था आना… जब बंद हो जाता है ना, तब सेठ महंगा देते हैं माल। रिपोर्टर : अच्छा, तब पाकिस्तानी माल तुम्हें महंगा दे रहे थे। तो तुम्हें कितने का दे रहे थे तब, पिछले साल जब लड़ाई हुई थी? रोशनी : पिछले साल बहुत महंगा खरीदकर लाए थे हम। सबसे महंगा ये वाला- लाहौरी। रिपोर्टर : लाहौरी नमक है ये? रोशनी : कभी इसको लाहौरी बोलते हैं, कभी पिंक साल्ट बोलते हैं। रिपोर्टर : अच्छा, ये लाहौर से आता होगा? क्या रेट था पिछले साल? रोशनी : बेच रहे थे 150-200 रुपए किलो।
इस विक्रेता ने दावा किया कि व्यापार प्रतिबंध लागू होने के बाद भी व्यापारियों ने पाकिस्तानी गुलाबी नमक का पुराना स्टॉक बेचना जारी रखा। इसके बाद वे सीमित मात्रा में आपूर्ति प्राप्त करने में कामयाब रहे। वह कहती है कि पहले माल बहुत बड़ी मात्रा में आता था और वर्तमान में उन्हें अमृतसर स्थित डीलरों से फोन ऑर्डर के माध्यम से उत्पाद प्राप्त होता है। रिपोर्टर : सेठों के पास कहां से आ रहा था माल, जब पाकिस्तान से बंद हो गया था? रोशनी : वो पहले का रखा हुआ बेचते थे। थोड़ा-बहुत थोड़ी मंगवाते हैं, वो 100 की 10 गाड़ी आती है। रिपोर्टर : पाकिस्तान की? रोशनी : हां, पाकिस्तान की। रिपोर्टर : ये सेठ कहां रहते हैं सब? रोशनी : हम तो अमृतसर से लेते हैं। रिपोर्टर : अमृतसर से कैसे आता है? रोशनी : हमारे ऐसे फोन पर कर देते हैं।
पहलगाम आतंकी हमले के एक साल बाद पाकिस्तानी वस्तुओं पर प्रतिबंध लागू होने के बावजूद भी रोशनी ने खुलासा किया कि पाकिस्तानी नमक फिर से भारत में आने लगा है। विक्रेता का दावा है कि प्रतिबंध लागू होने के बाद पाकिस्तानी गुलाबी नमक की बाजार में पहुंच अस्थायी रूप से बंद हो गई थी। हालांकि बाद में आपूर्ति फिर से शुरू हो गई और स्थानीय बाजारों में इस उत्पाद की बिक्री दोबारा शुरू हो गई है। रिपोर्टर : अब ये कब से आ रहा है पाकिस्तानी नमक? बीच में बंद हो गया था? रोशनी : हां, बंद हो गया था। उसके बाद फिर आना शुरू हो गया। रिपोर्टर : फिर बिक रहा है? रोशनी : हां।
इस बातचीत में रोशनी ने दावा किया कि बेचा जा रहा गुलाबी नमक पाकिस्तानी नमक है और यह अमृतसर, बीकानेर तथा जैसलमेर जैसे शहरों के व्यापारियों के माध्यम से स्थानीय विक्रेताओं तक पहुंचता है। रोशनी आरोप लगाती है कि बड़े व्यवसायी दो से तीन टन की थोक खेप में स्टॉक खरीदते हैं और फिर उसे छोटे विक्रेताओं को बेचते हैं। रिपोर्टर : ये सारा पाकिस्तानी नमक है? रोशनी : हां, पाकिस्तानी नमक है।
पाकिस्तानी गुलाबी नमक
रिपोर्टर : पाकिस्तानी नमक खिला रही हो हिंदुस्तानियों को? रोशनी : हम क्या लेते हैं, पीछे से सेठ लोग लेते हैं। अमृतसर से लेते हैं हम तो गाड़ी मंगवा लेते हैं। रिपोर्टर : ये पाकिस्तानी नमक अमृतसर से आता है? रोशनी : हां, बड़े बड़े शहरों में आता है ये, बीकानेर, जैसलमेर…। रोशनी (आगे) : बड़े-बड़े सेठ माल खरीदकर देते हैं हमें। रिपोर्टर : बड़े-बड़े सेठ खरीदते हैं पाकिस्तान से? रोशनी : हां, हम सारे (वेंडर्स) मिल के एक बड़ी गाड़ी मंगवा लेते हैं, 2-3 टन का माल।
नीचे दी गई बातचीत में विक्रेता खुले तौर पर दावा करती है कि वह ग्राहकों को बताती है कि बेचा जा रहा गुलाबी नमक पाकिस्तान से आता है। वह कहती हैं कि लोग लगभग एक दशक से इसे बड़ी मात्रा में उससे खरीदते आ रहे हैं। वह पिछले 10 वर्षों से राजस्थान के झुंझुनू में इस उत्पाद को बेच रही है। रिपोर्टर : तो तुम ये नमक सबको बताकर बेचती हो कि पाकिस्तान का है? रोशनी : हां, झूठ क्यूं बोलेंगे भाई! रिपोर्टर : ले जाते हैं लोग? रोशनी : हां, 10 साल हो गए, क्विंटल-क्विंटल ले जाते हैं लोग। रिपोर्टर : आप कब से बेच रही हो ये नमक? रोशनी : हमें 10 साल हुए हैं। रिपोर्टर : ये कौन-सी जगह है राजस्थान की? रोशनी : ये झुंझुनू है।
रोशनी के अनुसार, लोग पाकिस्तान के हिमालयी गुलाबी नमक को इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। उसका दावा है कि पाकिस्तानी गुलाबी नमक न केवल शहरों में, बल्कि गांवों में भी बेचा जा रहा है। उसका कहना है कि यह नमक स्वास्थ्यवर्धक और रोग संबंधी जोखिमों से मुक्त करने वाला है, इसलिए ग्राहक टाटा नमक जैसे भारतीय नमक ब्रांडों को पसंद नहीं करते हैं और इसीलिए वे भारतीय नमक के बजाय पाकिस्तानी नमक को चुनते हैं। रिपोर्टर : गांव-गांव बेचती हो नमक? रोशनी : लड़का बेचने गया है गांव। रिपोर्टर : हिंदुस्तान का क्यों नहीं बेचतीं? रोशनी : वो लेते नहीं। टाटा नमक हमारे पास नहीं बिकता, ये खान में से निकलता है? रिपोर्टर : मतलब हिंदुस्तान का नमक आपसे कोई नहीं खरीदता? रोशनी : नहीं लेता। ये ज्यादा अच्छा है, कोई बीमारी नहीं होती इससे। रिपोर्टर : कौन कह रहा है नहीं होती? रोशनी : नहीं होती। रिपोर्टर : तुम्हें कैसे पता? रोशनी : हम खुद खाते हैं।
अब रोशनी ने हमें पाकिस्तान के गुलाबी नमक का भाव बताया। उसने कहा कि एक किलो नमक की कीमत 50 रुपए है और अगर हम इसे पाउडर के रूप में लें, तो इसकी कीमत 100 रुपए प्रति किलो है। उसने हमें यह भी बताया कि वह पुलिस के बिना किसी हस्तक्षेप के एक दिन में 50 किलो पाकिस्तानी नमक बेच देती है। रिपोर्टर : क्या रेट है ये? रोशनी : कौन सा? रिपोर्टर : पाकिस्तानी नमक। रोशनी : ये 50 रुपए का है, वो 100…। रिपोर्टर : ये 50 रुपए है? रोशनी : हां, इसका पाउडर 100 रुपए पर केजी। रिपोर्टर : एक पैकेट में कितना है? रोशनी : 1 किलो। रिपोर्टर : कितना बिक जाता है एक दिन में? रोशनी : बिक जाता है बोरी। रिपोर्टर : कोई तंग तो नहीं करता पुलिस वाला? रोशनी : न…।
नीचे दी गई संक्षिप्त बातचीत में रोशनी ने दावा किया कि इलाके में कई अन्य विक्रेता भी पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेच रहे हैं। वह आगे कहती है कि भारतीय नमक की बाजार में मांग बहुत कम है। रिपोर्टर : और कौन बेचता है पाकिस्तानी नमक तुम्हारे अलावा? रोशनी : सारे बेचते हैं। रिपोर्टर : सारे बेच रहे हैं, और हिन्दुस्तान का क्यूं नहीं बेच रही? रोशनी : बिक रा नहीं।
बातचीत के इस अंश में विक्रेता इस बात को दोहराती है कि ग्राहक टाटा नमक को त्याग रहे हैं और इसके बजाय पाकिस्तान से प्राप्त लाहौरी या सेंधा नमक को पसंद कर रहे हैं। वह पाकिस्तानी गुलाबी नमक को सेवन के लिए अधिक स्वास्थ्यवर्धक बताती है। रिपोर्टर : टाटा साल्ट इस्तेमाल ही नहीं हो रहा? रोशनी : ये खान में से निकल रहा है। ये है सेंधा, लाहौरी नमक खाने का। वो तो बीमारी का कारण है।
रोशनी
रिपोर्टर : टाटा साल्ट बीमारी का कारण है? और ये पाकिस्तानी नमक? रोशनी : अच्छा है खाने में। रिपोर्टर : वो सेंधा नमक है, वो भी पाकिस्तान से आता है? रोशनी : आता सारा पाकिस्तान से है। ये मसाला डालकर बनाया जाता है काला…।
रोशनी की दुकान से निकलने से पहले रिपोर्टर ने उससे पूछा कि क्या वह दिल्ली में उन्हें एक टन (1,000 किलोग्राम) पाकिस्तानी गुलाबी नमक की आपूर्ति कर सकती है? रोशनी ने सकारात्मक जवाब दिया। वह खेप को दिल्ली भेजने के बारे में भी चर्चा करती है और कहती है कि अगर आपके द्वारा डिलीवरी का खर्च वहन किया जाता है, तो यह व्यवस्था की जा सकती है। रिपोर्टर ने उससे कहा कि परिवहन का खर्च हम वहन करेंगे। रिपोर्टर : तुम्हारा नाम क्या है? रोशनी : रोशनी। रिपोर्टर : एकाध टन चाहिए हो, तो मिल जाएगा? रोशनी : मिल जाएगा। रिपोर्टर : पाकिस्तानी? रिपोर्टर (आगे) : दिल्ली कैसे भेजोगी? रोशनी : दिल्ली भेजना है, इतना तो किराया-भाड़ा हो जाएगा। रिपोर्टर : वो हम सब दे देंगे आपको।
यह कहानी राजस्थान की है, जहां हमने रोशनी को झुंझुनू की सड़कों पर खुलेआम पाकिस्तानी हिमालयी गुलाबी नमक बेचते हुए पाया। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के साथ सभी प्रकार के व्यापार पर प्रतिबंध जारी है। फिर भी पाकिस्तान का सेंधा नमक यानी लाहोरी नमक भारतीय बाजारों में खुलेआम बिक रहा है। इसके बाद तहलका रिपोर्टर ने उत्तर प्रदेश के नोएडा का रुख किया, जहां सेक्टर-45 में उनकी मुलाकात शिव कुमार चौधरी से हुई, जो सड़क किनारे साइकिल रिक्शा पर पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेचते हुए मिला। शिव ने रिपोर्टर को बताया कि वह जो गुलाबी नमक बेच रहा है, वह पाकिस्तान से आया है। उसने दावा किया कि यह नमक स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है, खासकर शरीर की सूजन को कम करने में मदद करता है। शिव ने दावा किया कि यह नमक लाहौर (पाकिस्तान) से राजस्थान पहुंचता है और फिर स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है। उसने बताया कि उसने पाकिस्तानी नमक राजस्थान से मंगवाया है और उसे 80 रुपए प्रति किलो के भाव से बेचता है। रिपोर्टर : ये तो वहां का होगा शायद, पाकिस्तान का? शिव : हां। रिपोर्टर : ये भी, दोनों? शिव : ये लाहौरी है, बहुत फायदे का काम करता है, हाथ-पैर में सूजन हो।
शिव कुमार चौधरी
रिपोर्टर : पिंक नमक भी कहते हैं इसे। ये क्या पाकिस्तान से आता है? शिव : हां, लाहौर से आता है राजस्थान। वहां से यहां आता है। रिपोर्टर : ये क्या भाव है, लाहौरी? शिव : 80 रुपए पर केजी। रिपोर्टर : काला कहां से आता है? शिव : काला राजस्थान से आता है…। रिपोर्टर : ये पिंक साल्ट है पाकिस्तान का? शिव : हां।
अब शिव ने हमें बताया कि वह आमतौर पर नोएडा के सेक्टर-18 के मार्केट में अपनी दुकान लगाता है, जिसे शहर के सबसे पॉश इलाकों में से एक माना जाता है। हालांकि रिपोर्टर के दौरे वाले दिन उसने पाकिस्तानी नमक से लदे अपने साइकिल रिक्शा को नोएडा के सेक्टर-45 में लगाया हुआ था। उसने कहा कि वह मांग होने पर 50-60 किलोग्राम लाहौरी नमक की व्यवस्था कर सकता है। वह इस बात पर भी जोर देता है कि यह नमक वास्तव में पाकिस्तान से है और खरीदार को आश्वस्त करने के लिए अपना फोन नंबर भी देता है कि यदि इसकी उत्पत्ति के बारे में कोई संदेह हो, तो वह इसे वापस लेने को तैयार है। रिपोर्टर : पहली बार देख रहा हूं आपको, दुकान कहां लगाते हो? शिव : 18 सेक्टर में। रिपोर्टर : ये बताओ, लाहौरी नमक हमें चाहिए हो 50-60 किलो? शिव : हो जाएगा। रिपोर्टर : अभी कितना है तुम्हारे पास? …और क्या गारंटी है पाकिस्तानी है…? शिव : लाहौरी है। आप किसी से भी पता कर लीजिए। अगर आपको डाउट हो रहा हो, आप हमारा नंबर ले लीजिए। रिपोर्टर : हां, नाम और नंबर दे दो। शिव : हमारा एक दिन का काम नहीं है…।
रिपोर्टर ने शिव कुमार से कहा कि हमें इस बात का यकीन नहीं है कि आप जो गुलाबी नमक बेच रहे हो, वह वास्तव में पाकिस्तान से है या नहीं! क्योंकि पहलगाम हमले के बाद भारत में पाकिस्तानी उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। रिपोर्टर ने शिव से पूछा कि उसे अभी भी पाकिस्तानी नमक कहां से मिल रहा है? इसके जवाब में शिव ने कहा कि उसने यह नमक राजस्थान से मंगवाया है। उसने आगे कहा कि यह उत्पाद दिल्ली के बदरपुर इलाके में भी उपलब्ध है। हालांकि उसने व्यक्तिगत रूप से इसे राजस्थान से खरीदा है। रिपोर्टर : मैं पाकिस्तान का इसलिए डाउट कर रहा हूं, क्यूंकि पाकिस्तान की चीजें बैन हैं इंडिया में, वो पहलगाम के बाद बैन हो गया था। शिव : पाकिस्तान से राजस्थान आता है, वहां से दिल्ली आता है। रिपोर्टर : दिल्ली से तुम्हें कौन देता है…? शिव : बदरपुर की तरफ भी मिलता है, लेकिन हम डायरेक्ट राजस्थान से लाते हैं। रिपोर्टर : स्मगलिंग करवा रहे होंगे, क्यूंकि वैसे तो बैन है ये। शिव : हम्म…।
नीचे दिए गए अंश में विक्रेता से पाकिस्तानी नमक यानी लाहौरी नमक के रूप में बेचे जा रहे गुलाबी नमक की प्रामाणिकता के बारे में सवाल किया जाता है। वह आश्वासन के तौर पर अपना फोन नंबर देने की पेशकश करता है और यहां तक कि बिक्री के लिए उपलब्ध उत्पाद को खुलेआम दिखाता भी है। वह आगे दावा करता है कि मांग होने पर वह 50-100 किलोग्राम की बड़ी मात्रा की व्यवस्था कर सकता है। रिपोर्टर : तो गारंटी कैसे दोगे पाकिस्तान का है ये..? शिव : आप नंबर ले लो। रिपोर्टर : तुम्हारे नंबर से कैसे गारंटी होगी? शिव : ये लो लाहौरी। रिपोर्टर : इस पर तो लिखा हुआ है। खुलेआम बेच रहे हो? रिपोर्टर (आगे) : मुझे बताओ, 50-60 किलो मिल जाएगा? शिव : अभी ले जाओ, 100 किलो से कुछ कम होगा अभी। रिपोर्टर : रोज लगाते हो आप? रिपोर्टर (आगे) : काफी सालों से बेच रहे होंगे आप? शिव : हमको तो ज्यादा टाइम नहीं हुआ है। हम जिससे माल खरीदते हैं, वो बहुत दिनों से बेच रहे हैं। रिपोर्टर : ठीक है, मैं फोन करके बताऊंगा।
अगली बातचीत में शिव को फिर से यह सुनिश्चित करने के लिए याद दिलाया जाता है कि आपूर्ति किया जा रहा गुलाबी नमक वास्तव में पाकिस्तान से ही हो। वह अपना संपर्क नंबर साझा करके आश्वस्त करता है और कहता है कि यदि सामान में कोई कमी पाई जाती है, तो उसे वापस किया जा सकता है। उसका यह भी दावा है कि फिलहाल लगभग 100 किलोग्राम से कुछ कम स्टॉक उपलब्ध है, जिसका कुछ हिस्सा पहले ही अन्य खरीदारों को बेचा जा चुका है। चर्चा आगे चलकर बड़े पैमाने पर आपूर्ति और वितरण व्यवस्थाओं पर केंद्रित हो जाती है। रिपोर्टर : बस ये याद रखना, प्योर होना चाहिए, पाकिस्तान का ही हो? शिव : आपको अगर डाउट हो रहा है, नंबर ले लिए हैं, आप वापस कर देना। रिपोर्टर : ज्यादा चाहिए हमें, 100 किलो? शिव : सर! ये 100 किलो से थोड़ा कम है अभी। एक आदमी 24 किलो ले गया है…। रिपोर्टर : लाहौरी? शिव : हां, और एक ले गया है 12 किलो। रिपोर्टर : अभी ले गया है..? शिव : घंटे 2 घंटे पहले। रिपोर्टर : तुम 100 केजी से ऊपर भी दे सकते हो, 200-250 किलो? शिव : हां। रिपोर्टर : लेकिन पहुंचाना आपका काम होगा फिर? शिव : पहुंचा देंगे। रिपोर्टर : हम पैसे दे देंगे। पहुंचाना आपका काम होगा? शिव : किराया दे देना। रिपोर्टर : रिक्शा का किराया देना होगा? शिव : ठीक है।
इस बातचीत में आगे शिव ने बताया कि गुलाबी नमक की आपूर्ति एक कंपनी के साथ नियमित रूप से ऑर्डर देकर कैसे प्रबंधित की जाती है। उसने कहा कि स्टॉक हमेशा रोजाना उपलब्ध नहीं होता है, लेकिन ऑर्डर देने के कुछ दिनों के भीतर आ जाता है। शिव ने यह भी बताया कि सामान की डिलीवरी से पहले ही भुगतान अग्रिम रूप से किया जाता है। इस चर्चा का मुख्य विषय यह है कि आपूर्ति श्रृंखला व्यवहार में कैसे काम करती है। रिपोर्टर : आप रोज मंगवाते हो? शिव : कंपनी से मंगवाते हैं। रिपोर्टर : रोज आता है? शिव : हम कंपनी को ऑर्डर देते हैं, 2-4 दिन में आ जाता है। रिपोर्टर : अभी है तुम्हारे पास या मंगवाना है? शिव : पैसा पहले देना पड़ता है उसके पास, फिर आता है। रिपोर्टर : अकाउंट में डाल दिया उनके, फिर आता होगा? शिव : हां, फिर आता है…।
जैसा कि ऊपर देखा गया है कि पहलगाम हमले के बाद भारत में पाकिस्तानी वस्तुओं पर प्रतिबंध के बावजूद शिव कुमार चौधरी नाम का व्यक्ति भी खुलेआम पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेचते हुए पाया गया। शिव से बातचीत करने के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाकात नोएडा के सेक्टर-78 में एक अन्य स्ट्रीट वेंडर अरविंद से हुई, जो अपने पहले नाम से जाना जाता है। पहलगाम हमले के बाद भारत में पाकिस्तानी सामानों पर प्रतिबंध के बावजूद अरविंद को नोएडा में सड़क किनारे अपनी गाड़ी के जरिए खुलेआम पाकिस्तानी गुलाबी नमक, जिसे लाहौरी नमक भी कहा जाता है; बेचते हुए देखा गया था। जब अरविंद से उसकी बिक्री की दिनचर्या के बारे में पूछा गया, तो उसने बताया कि वह सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक रोजाना पाकिस्तानी नमक बेचता है। उसने रिपोर्टर को 100 किलोग्राम पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेचने पर भी सहमति जताई। रिपोर्टर : ठीक है, मैं कब आ जाऊं? अरविंद : टाइम बता दो? रिपोर्टर : आप कब मिलते हो यहां? अरविंद : मैं रोज मिलता हूं, 10 से 7 बजे तक शाम को। रिपोर्टर : मैं 100-150 किलो ले जाऊंगा, रखवा लेना अपने पास। अरविंद : 100 किलो? रिपोर्टर : 100 किलो लाहौरी। अरविंद : 50 किलो का आता है एक कट्टा। रिपोर्टर : 2 कट्टे आएंगे ना? अरविंद : हां। रिपोर्टर : मैं फोन कर दूंगा इसी नंबर पर, मेरा नाम राजीव है…। अरविंद : फोन कर देना। रिपोर्टर : आने से एक दिन पहले फोन कर दूंगा।
इस बातचीत में अरविंद इस बात की पुष्टि करता है कि वह लाहौरी नमक बेच रहा है। वह इस नमक की कीमत 60 रुपए प्रति किलोग्राम बताता है। मिलावट के बारे में संदेह को खारिज करते हुए वह इस बात पर जोर देता है कि नमक असली है और उसमें कृत्रिम रंग नहीं मिलाया गया है। आपूर्ति और उपलब्धता के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा कि वह मांग के अनुसार स्टॉक की व्यवस्था कर सकता है और वह नोएडा के सेक्टर-78 में प्रतिदिन अपना काम करता है। उसने यह भी बताया कि यह नमक दिल्ली से मंगाया जाता है। रिपोर्टर : ये लाहौरी नमक है? अरविंद : हां। रिपोर्टर : क्या रेट है? अरविंद : 60 रुपए किलो। रिपोर्टर : इसकी क्या गारंटी है कि असली है? अरविंद : इसमें क्या नकली होगा?
अरविंद
रिपोर्टर : हां, वो नकली कलर लगा देते हैं? अरविंद : ऐसे नहीं होता है। रिपोर्टर : मैंने सुना है पिंक कलर कर देते हैं, पिंक साल्ट बोल देते हैं? अरविंद : अरे, ऐसे नहीं होता, पक्का है ये…। रिपोर्टर : कितना दे सकते हो हमें, 100-200-300 किलो मिल जाएगा? अरविंद : मेरे पास तो यही है। रिपोर्टर : ये मंगवाते कहां से हो लाहौरी नमक? अरविंद : दिल्ली से आता है। रिपोर्टर : यहां डेली लगाते हो आप? अरविंद : हां। रिपोर्टर : ये कौन सा सेक्टर है? अरविंद : सेक्टर-78, नोएडा।
तहलका रिपोर्टर को झुंझुनू और नोएडा की सड़कों पर पाकिस्तानी गुलाबी नमक बेचते हुए तीन लोग मिले। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तानी आयात पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पाकिस्तानी गुलाबी नमक, जिसे सेंधा नमक या लाहौरी नमक के नाम से भी जाना जाता है, भारत के अन्य हिस्सों में भी उपलब्ध है। अपने विशिष्ट रंग और स्वाद के लिए प्रसिद्ध यह नमक कथित तौर पर पूरे भारत में बेचा जा रहा है। इसके स्वास्थ्य लाभों के बारे में अप्रमाणित दावे राजस्थान और नोएडा में सड़क किनारे विक्रेताओं से इसे खरीदने के लिए खरीदारों को आकर्षित करते रहते हैं। इन दावों के अलावा सेंधा नमक का हिंदू परंपराओं में वैदिक ग्रंथों में निहित कारणों से भी महत्व है। रॉक सॉल्ट, जिसे अक्सर पाकिस्तानी नमक या लाहौरी नमक कहा जाता है, नवरात्रि के व्रत अनुष्ठानों के दौरान आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है और यह बड़े पैमाने पर पाकिस्तान से आयात किया जाता है, क्योंकि यह भारत में नहीं पाया जाता है। सामान्य सफेद नमक की तुलना में सेंधा नमक या रॉक सॉल्ट को आयुर्वेद में इसके कथित स्वास्थ्य लाभों के लिए भी मान्यता प्राप्त हुई है। सोशल मीडिया के माध्यम से बढ़ती जागरूकता और डॉक्टरों की सिफारिशों ने अधिक लोगों को सेंधा नमक अपने आहार में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया है। सड़क पर बिकने वाले नमक की कीमत पैकेटबंद नमक की तुलना में लगभग आधी है, जिससे इसकी मांग में भारी वृद्धि हुई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त निकाय है; सभी खाद्य उत्पादों को बेचने से पहले उनकी मंजूरी अनिवार्य करता है। इस तरह की मंजूरी के बिना खाद्य उत्पादों की बिक्री, भंडारण या उत्पाद करना अवैध है। इसका उल्लंघन करने वालों को आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। तहलका रिपोर्टर ने जिन विक्रेताओं से बात की, उनका दावा है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद वे बड़ी मात्रा में जो नमक बेच रहे हैं, वह पाकिस्तान से मंगाया जाता है। विक्रेताओं ने यह भी दावा किया कि अनौपचारिक वितरण चैनलों के माध्यम से आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी है। हालांकि हैरानी की बात यह है कि प्रवर्तन एजेंसियां स्थानीय बाजारों में प्रतिबंधित पाकिस्तानी गुलाबी नमक की खुलेआम बिक्री से अनभिज्ञ प्रतीत होती हैं। चिंता की बात यह है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा उन चैनलों की स्पष्ट रूप से जांच का अभाव है, जिनके माध्यम से प्रतिबंधित पाकिस्तानी गुलाबी नमक कथित तौर पर पंजाब और राजस्थान की सीमाओं के रास्ते भारतीय घरों में प्रवेश कर रहा है। ऐसा लगता है कि भारतीय सड़कों पर ट्रकों और टेम्पो से पाकिस्तानी गुलाबी नमक या सेंधा नमक बेचने वाले विक्रेताओं की संख्या में भी काफी वृद्धि हो रही है।
धार भोजशाला विवाद फैसला : एएसआई के वैज्ञानिक साक्ष्य और अकाट्य पुरातात्विक सत्य, वैश्विक ज्ञान केंद्र का संकल्प और वाग्देवी की घर वापसी...Pic Sourcs : Timesnownews
तहलका डेस्क।
नई दिल्ली/भोपाल। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक भोजशाला को स्पष्ट रूप से हिंदू मंदिर करार देना और हिंदुओं को निरंतर पूजा-अर्चना का अधिकार सौंपना न्यायशास्त्र के इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ है। न्यायालय ने सुदृढ़ साक्ष्यों के आधार पर रेखांकित किया कि इस पावन स्थल पर हिंदू उपासना की निरंतरता कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
सन 1034 में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा स्थापित यह ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ केवल एक संरचना नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सभ्यतागत अस्मिता का जीवंत प्रतीक था। यद्यपि वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी, 1401 में दिलावर खान गौरी और 1514 में महमूद शाह खिलजी जैसे आक्रांताओं ने इस भव्य मंदिर को क्षतिग्रस्त कर मस्जिद का स्वरूप देने का बार-बार प्रयास किया, किंतु इसकी दीवारों और स्तंभों में अंकित संस्कृत शिलालेखों ने इसके मूल चरित्र को जीवित रखा।
इस ऐतिहासिक निर्णय का सबसे मजबूत आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक और अकाट्य सर्वे रिपोर्ट है। निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया के तहत किए गए इस सर्वे में परिसर से भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसे देवी-देवताओं की 94 प्राचीन मूर्तियां, अवशेष और परमार कालीन सिक्के बरामद हुए, जिन्होंने विवादित ढांचे के पीछे दबे वास्तविक सच को सार्वजनिक कर दिया। विद्वान न्यायाधीशों द्वारा स्वयं किए गए प्रत्यक्ष निरीक्षण, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक साहित्य (जैसे कवि मदन के नाटक) ने इस बात पर अंतिम मुहर लगा दी कि यह वाग्देवी मां सरस्वती का ही पावन धाम था।
यह निर्णय केवल एक स्थल की मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक आत्मा की पुनर्स्थापना है। अब समाज और सरकार के समक्ष इस परिसर को पुरातन काल की भांति संस्कृत और धर्मशास्त्रों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बनाने की महती जिम्मेदारी है। इसके साथ ही, वर्ष 1875 में ब्रिटिश काल के दौरान खुदाई से प्राप्त और वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की मूल वाग्देवी प्रतिमा को भारत वापस लाने की अदालती टिप्पणी अत्यंत स्वागत योग्य है।
यह फैसला किसी समुदाय की पराजय नहीं बल्कि ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है, जिसे संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर सभी को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।
यह फैसला किसी जल्दबाजी में नहीं बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया और वैज्ञानिक जांच के बाद आया है... बोले - VHP के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष Alok Kumar
नई दिल्ली: विश्व हिन्दू परिषद की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि धार स्थित भोजशाला का मूल स्वरूप हिन्दू मंदिर का रहा है और यहां लगातार पूजा की परंपरा बनी रही। अदालत ने हिंदुओं को पूरे परिसर में पूजा का अधिकार देने की बात कही है। वहीं मुस्लिम पक्ष के लिए अलग स्थान की मांग सरकार से करने का रास्ता खुला रखा गया है।
आलोक कुमार ने कहा कि यह फैसला किसी जल्दबाजी में नहीं बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया और वैज्ञानिक जांच के बाद आया है। उन्होंने बताया कि अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई की रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन किया। दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया गया और न्यायाधीशों ने खुद मौके पर जाकर निरीक्षण भी किया। उनके मुताबिक इसी आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि भोजशाला प्राचीन समय में देवी वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
वीएचपी ने यह भी कहा कि भोजशाला केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ मुद्दा है। संगठन ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और एएसआई मिलकर इस स्थल के संरक्षण और संस्कृत अध्ययन की पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करने की दिशा में काम करेंगे।
बयान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग का भी समर्थन किया गया। आलोक कुमार ने कहा कि यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है और इसे भोजशाला में दोबारा स्थापित किया जाना चाहिए।
अंत में वीएचपी ने सभी पक्षों से शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की। संगठन का कहना है कि यह फैसला किसी की हार या जीत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य और सांस्कृतिक न्याय की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जाना चाहिए।
West Bengal में विकास की नई पटरी, रेलवे का बड़ा प्लान... | Image Source:
News18 Hindi
नई दिल्ली: Ministry of Railways की तरफ से सबसे बड़ी मंजूरी Shalbani-Adra तीसरी रेल लाइन परियोजना को मिली है। करीब 107 किलोमीटर लंबी इस परियोजना के लिए फाइनल लोकेशन सर्वे और डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अधिकारियों का मानना है कि इस नई लाइन से कई इलाकों में रेल कनेक्टिविटी मजबूत होगी और ट्रेनों की आवाजाही भी आसान बनेगी। इससे मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों दोनों को फायदा मिलने की संभावना है।
इसके अलावा Kolkata के Santragachi से Rajasthan के Khatipura तक नई एक्सप्रेस ट्रेन चलाने की मंजूरी भी दी गई है। यह ट्रेन खड़गपुर के रास्ते चलेगी। लंबे रूट पर सफर करने वाले यात्रियों के लिए इसे बड़ी राहत माना जा रहा है। अभी तक इस रूट पर यात्रा करने वाले लोगों को कई बार ट्रेन बदलनी पड़ती थी, लेकिन नई एक्सप्रेस शुरू होने से सफर आसान हो सकता है।
रेल मंत्रालय ने न्यू जलपाईगुड़ी से सिलीगुड़ी जंक्शन तक करीब 7 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन के दोहरीकरण सर्वे को भी मंजूरी दी है। उत्तर बंगाल में बढ़ते रेल ट्रैफिक को देखते हुए इस परियोजना को काफी अहम माना जा रहा है। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि डबल लाइन बनने के बाद ट्रेनों की रफ्तार और समय दोनों में सुधार होगा। साथ ही ट्रैफिक दबाव भी कम किया जा सकेगा।
राजनीतिक गलियारों में भी इन परियोजनाओं को लेकर चर्चा तेज है। माना जा रहा है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने का असर अब विकास परियोजनाओं पर दिखाई देने लगा है। रेलवे से जुड़ी कई योजनाएं, जो पहले लंबे समय से अटकी हुई थीं, अब तेजी से आगे बढ़ सकती हैं। आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी और भी बड़ी घोषणाएं देखने को मिल सकती हैं।