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बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे वीडियो गेम

पाँच साल का एक बच्चा दिल्ली के एक मॉल में अपने माता-पिता के साथ एक दुकान से दूसरी दुकान घूमता दिखायी देता है। कुछ देर बाद वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगता है और किसी चीज़ को ख़रीदने की जिद करने लगता है। माता-पिता वह ख़रीदने से मना कर देते हैं, तो वह बच्चा वीडियो गेम (ऑनलाइन खेल) खेलने के लिए उनसे मोबाइल माँगता है। माता-पिता एकाध बार उसे समझाते हैं और फिर उसे मोबाइल देकर अपने को आज़ाद महसूस करने लगते हैं।

दरअसल बच्चों का ऐसा व्यवहार इन दिनों अपवाद नहीं है। चारों ओर यही दिखायी देता है। वीडियो गेम बच्चों में बहुत लोकप्रिय हैं। ऐसे गेम्स से होने वाले लाभ और हानि को लेकर बहुत कम लोग चिन्तित हैं। वहीं समाज, माता-पिता, अध्यापक वर्ग और शोधार्थियों की इसे लेकर अलग-अलग राय है। अभिभावकों का एक वर्ग मानता है कि वीडियो गेम बच्चों को सीखने, मुश्किलों से बाहर निकलने के लिए तैयार करते हैं। वहीं एक वर्ग का मानना है कि $फायदे की तुलना में इनके नुक़सान अधिक हैं।

ग़ौरतलब है कि वीडियो गेम का उद्योग लगभग तीन दशक पुराना है। पहले कम्प्यूटर स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों व कार्यालयों में होते थे। छात्र उनका इस्तेमाल सीमित समय के लिए ही करते थे। कम्प्यूटर गेम का इस्तेमाल शैक्षाणिक कौशल को विकसित करने के लिए किया जाता था। मगर जैसे-जैसे कम्प्यूटर, इंटरनेट का विस्तार होता चला गया, बच्चों और किशोरों तक इसकी पहुँच आसान होती चली गयी। बाद में घर-घर तक इनकी पहुँच हुई ही थी कि धीरे-धीरे मोबाइल हर हाथ तक पहुँचने गया। अब साइबर कैफे के साथ-साथ मोबाइल के ज़रिये बच्चे, किशोर और यहाँ तक कि काफ़ी संख्या में युवा, प्रौढ़ और बुज़ुर्ग लोग भी वीडियो गेम मोबाइल और कम्प्यूटर पर खेलते दिखते हैं। यही कारण है कि वीडियो गेम का धंधा भी ज़ोर पकड़ता जा रहा है। वीडियो गेम डवलेपर हर महीने दर्ज़नों वीडियो गेम का निर्माण करते हैं। बच्चों की इन नये-नये गेम्स, ख़ासकर हिंसक, आक्रामक गेम खेलने में रुचि बढ़ती जा रही है। कई बच्चे तो दिन-रात वीडियो गेम खेलते हैं और अभिभावक व अध्यापक इस पर कोई ख़ास नियंत्रण नहीं रख पाते।

बच्चों में अधिक ऊर्जा होती है। लिहाजा वे लम्बे समय तक मोबाइल और कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। इससे उनकी भूख भी मरती है। उनमें फास्ट फूड खाने के अलावा चिड़चिड़ापन भी बढ़ रहा है और पढ़ाई करने में अरुचि पैदा हो रही है। माता-पिता इस ओर ख़ास ध्यान नहीं देते। अगर देते हैं, तो सिर्फ़ अपने आस-पास चर्चा तक ही सीमित रखते हैं। टैबलेट, स्मार्ट फोन की उपलब्धता के चलते तकनीक के इस युग में वीडियो गेम बच्चों के लिए मज़ेदार व मनोरंजन के साधन बन चुके हैं। वीडियो गेम डेवलेपर बच्चों के लिए ऐसे गेम बनाने लगे हैं, जिनकी उन्हें बार-बार खेलने की लत पड़ जाए। वीडियो गेम खेलने के आदि अधिकतर बच्चे कई-कई घंटे उन्हें खेलने में बिताते हैं, जिससे उनकी आँखें भी ख़राब हो रही हैं। बच्चों के लिए रोमाचंक ऑनलाइन गेम की बाज़ार में बहुत माँग है। क्योंकि जो बच्चे एक बार गेम खेलने के चक्कर में पड़ जाते हैं, तो वे उसमें उलझे रहते हैं और शारीरिक श्रम वाले खेलों और पढ़ाई से कतराने लगते हैं। इसकी वजह यह है कि वे इन गेम में ही अपनी दुनिया तलाशने लगते हैं। वे इन गेम में जैसा हीरो हो, ख़ुद को वैसा ही समझने लगते हैं।

हालाँकि कुछ गेम तो ऐसे हैं, जो बच्चों के सकारात्मक बौद्धिक विकास में मददगार हो सकते हैं; लेकिन अधिकतर वीडियो गेम उनके बौद्धिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। ख़ासकर जिन शूटर वीडियो गेम्स में बच्चों पर ग़ुस्सैल और हथियार चलाने का इच्छुक बनाते हैं।

सात साल के बेटे की माँ डॉ. शुभ्रा का कहना है कि आजकल बच्चों को पालना आसान नहीं है। माता-पिता इस तकनीक के युग में पसोपेश में हैं कि बच्चों को तकनीक के इस्तेमाल करने की इजाज़त कब दें और किस तरह से उस पर निगरानी भी बनाये रखें? शिक्षा से सम्बन्धी गेम बच्चों को उनके विषय समझने में सहायक सिद्ध होती हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अच्छे वीडियो गेम खेलने से बच्चों, किशोरों में जीवन की मुश्किल को हल करने का गुर आता है। लेकिन सवाल यह है कि अच्छे गेम का फ़ीसद कितना है? यह भी देखा जाना चाहिए कि गेम कितना भी अच्छा क्यों न हो, उससे बच्चे की आँखों कमज़ोर होने, भूख कम लगने, शारीरिक विकास कम होने और देर तक बैठे रहने से बीमार होने का ख़तरा तो बढ़ेगा ही। मोटापा बढऩे के साथ-साथ उनमें मधुमेह (शुगर) का ख़तरा बढऩे लगता है। भारत में मोटे व मधुमेह से ग्रस्त लोगों की संख्या बढ़ रही है। यही नहीं बच्चे मानसिक रोगों के भी शिकार हो रहे हैं। उन्हें अकेलापन, अवसाद घेर लेता है। वे ग़ुस्सैल, हिंसक और आक्रामक बन जाते हैं। इसके साथ ही उन्हें कोल्ड ड्रिंक्स पीने, नशीली दवाएँ लेने, सिगरेट व शराब पीने, च्यूइंगम व गुटखा चबाने आदि की लत घेर लेती है। मोबाइल फोन से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक किरणें बहुत नुक़सान पहुँचाती हैं। इससे उनमें तनाव बढ़ता है, जो उन्हें एक और बुरी लत की ओर खींचता है। इनसे ब्रेन ट्यूमर व कैंसर भी हो सकता है। दिल्ली स्थित एम्स के एक अध्ययन से ख़ुलासा हुआ कि 10 साल तक के बच्चों द्वारा अधिक समय तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने से उनमें ब्रेन ट्यूमर का ख़तरा 33 फ़ीसदी तक बढ़ सकता है।

ग़ौरतलब है कि दो से पाँच साल के बच्चे का दिमाग़ का विकास तेज़ गति से होता है यानी उसका दिमाग़ विकास की प्रक्रिया से गुज़र रहा होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि तकनीक का असर छोटे बच्चों पर बड़ों की तुलना में अधिक तेज़ी से पड़ता है। परिणामस्वरूप उनका विकास उन बच्चों की तरह नहीं हो पाता, जो वीडियो गेम से दूरी बनाकर रखते हैं। वीडियो गेम खेलने वाले बच्चों की लत से आजकल अभिभावकों, अध्यापकों और समाज का संवेदनशील तबक़ा बहुत परेशान है। क्या इस पर सरकार कोई नियम या क़ानून बना सकती है कि बच्चों का जीवन बर्बाद करने वाले वीडियो गेम नहीं बनाये जाने चाहिए, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह सके। वीडियो गेम डेवलपर विलियम स्यू का कहना है कि मैं 13 साल से वीडियो गेम्स बना रहा हूँ। मेरी कम्पनी अब तक 50 से अधिक मोबाइल गेम बना चुकी है। इन्हें 100 करोड़ से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है। इससे मुझे 800 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा की कमायी हुई है। लेकिन में अपनी बेटियों को कभी वीडियो गेम नहीं खेलने दूँगा। क्योंकि वीडियो गेम की लत नशे की हद तक हो जाती है। मुझे नहीं लगता कि माँ-बाप अपने बच्चों को इससे दूर रखने के लिए पर्याप्त सावधानी बरत पा रहे हैं। मैं वीडियो गेम के नशे से अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ। हम बच्चों या बड़ों में इसी नशे को प्रोत्साहित करते हैं। उन्हें नशेड़ी बना देते हैं।’

विलियम स्यू अपने इस कथन के ज़रिये क्या सन्देश देना चाहते हैं, यह साफ़ है। लेकिन सवाल यह है कि अभिभावक और समाज इससे क्या सीख लेते हैं? विलियम स्यू की सलाह है कि माता-पिता को वीडियो गेम्स से होने वाले नुक़सानों के बारे में जानें और कम-से-कम ख़राब वीडियो गेम व अधिक देर तक वीडियो गेम खेलने से अपने बच्चों को रोकें। वे बच्चों की आदतों को लेकर जागरूक रहें, उनकी मोबाइल पर रहने की आदतों व उसके समय को ट्रैक करें। गूगल का डिजिटल वेलबीइंग या एप्पल के स्क्रीन टाइम फीचर से स्क्रीन टाइम बैलेंस की आदत डालें।

बच्चों को इस बुरी लत से बचाने में अध्यापक भी एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। क्योंकि बच्चों के दिमाग़ में अध्यापकों की अच्छी छवि होती है और वे उनकी बात आसानी से मानते हैं। साथ ही स्कूल में बच्चों को दूसरे शारीरिक श्रम वाले खेल खिलाकर, पढ़ाई में आनन्दित करने वाले तरीक़े अपनाकर बच्चों का ध्यान वीडियो गेम से हटा सकते हैं। इसके अलावा वे बच्चों के अभिभावकों से संवाद करके बच्चों के घर में समय व्यतीत करने की जानकारी लेकर उन्हें अपना समय सही तरीक़े से इस्तेमाल करने के उपाय बताकर उन्हें भविष्य के ख़तरों से सतर्क करने का काम कर सकते हैं।

सभी जानते हैं कि बच्चे चंचल होते हैं और बहुत जल्दी उनका ध्यान बँटाया जा सकता है। ऐसे में अगर अभिभावक और अध्यापक चाहें, तो उनका जीवन सुधार सकते हैं और लापरवाही करके बिगाड़ भी सकते हैं। बच्चों का सही मार्ग-दर्शन करना कोई चुनौती नहीं है, बल्कि उन्हें पहले बिगाडक़र फिर सुधारना एक बड़ी चुनौती है। इसलिए देश के भविष्य बच्चों पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी होता है।

बिगड़ रहा पृथ्वी का जीवन चक्र

तेज़ी से घट रही है चीलों, गिद्धों समेत कई पशु-पक्षियों की संख्या

जीवन चक्र पृथ्वी पर तमाम जीवधारियों के बीच चलने वाला ऐसा एक चक्र है, जिससे प्रकृति में जीवन चक्र (सन्तुलन) बना रहता है। लेकिन अब ये सन्तुलन बिगडऩे लगा है, जिसकी वजह से बीमारियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ बढऩे लगी हैं। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है पृथ्वी पर साफ़-सफ़ाई करने वाले व अन्य जीवधारियों की संख्या में तेज़ी से गिरावट आ रही है।

विज्ञान की भाषा में कहें, तो शाकाहारी जीवधारियों को छोडक़र सभी जीवधारी एक-दूसरे का भोजन भी हैं। इसे प्रकृति का सन्तुलन कहते हैं। लेकिन अब पृथ्वी पर कई तरह के जीवों की संख्या लगातार तेज़ी से घट रही है, जिसके चलते असन्तुलन बढऩे के साथ-साथ आये दिन नयी-नयी बीमारियाँ पनप रही हैं।

प्रकृति ने अपने बनाये हर जीव को इतना सक्षम बनाया है कि वे अपना निर्वाह कर सकें। इंसान इन जीवों में सबसे ज़्यादा समझदार और सक्षम है। लेकिन इंसान लालच में इतना अंधा हो चुका है कि आज वह बिना आधुनिकता की चाहत में प्राकृतिक नुक़सान करता जा रहा है। इससे इंसान ख़ुद भी मुसीबतों से घिरता जा रहा है और दूसरे जीवों को भी संकट में डाल रहा है। इस प्राकृतिक बिगाड़ और बर्बादी के प्रति इंसानों ने अपनी आँखें बन्द करके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और तेज़ कर दिया है।

दूसरी तरफ़ ऐसे जीव भी हैं, जो केवल अपना पेट भरने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन वो प्रकृति के मित्र बने हुए हैं और उसे किसी भी प्रकार कोई नुक़सान नहीं पहुँचा रहे हैं। वहीं इंसान केवल अपने विषय में सोच रहा है। बहुत-ही कम ऐसे इंसान हैं, जो प्रकृति और दूसरे जीवों की रक्षा को अपना धर्म समझते हैं। ज़्यादातर को दूसरे जीवों की चिन्ता ही नहीं है। यही वजह है कि धरती पर से कई जीव विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं। हमें विलुप्त हो रहे जीवों की सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए, ताकि प्रकृति को सुरक्षित रखा जा सके।

चील और गिद्ध

चील और गिद्ध दो ऐसे मांसाहारी पक्षी हैं, जो अधिकतर मरे हुए जीवों का मांस ही खाते हैं। हालाँकि ज़िन्दा जीवों में चील साँपों, पक्षियों, मछलियों और छोटे जानवरों को और गिद्ध फ़सल बर्बाद करने वाले कीटों और बहुत मजबूरी में मछलियों को भी खाना पसन्द करते हैं। बाक़ी ज़िन्दा जीवों का शिकार करते इन्हें शायद ही देखा जाता हो। मांसाहारियों में भी चील और गिद्ध ही ऐसे जीव हैं, जो सभी प्राणियों का मांस खा सकते हैं। अफ्रीका के गिद्ध तो सभी मांसाहारियों से आगे हैं। चील अपने भोजन में 20 से 30 फ़ीसदी और गिद्ध अपने भोजन में 70 से 90 फ़ीसदी हड्डियाँ तक खा सकते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया के सभी मांसाहारी जीव मिलकर 47 फ़ीसदी मांस का भक्षण करते हैं, जबकि बाक़ी 53 फ़ीसदी मांस का भक्षण चील और गिद्ध करते हैं। चीलों और गिद्धों में हड्डियाँ पचाने की भी क्षमता होती है। इन दोनों जीवों को इंसानों का मित्र कहा जा सकता है, क्योंकि ये दोनों ही पक्षी उन जीवों और उस मांस को खाकर नष्ट कर देते हैं, जो कि लोगों के लिए घातक होता है। अगर कोई मरा हुआ जीव या मांस कहीं सड़ रहा हो, तो ये दोनों ही पक्षी और इनके साथ में कौवे ऐसे मांस को खाकर विषाणुओं और रोगाणुओं के फैलने की सम्भावना को ख़त्म कर देते हैं।

हज़ारों मीटर ऊँची उड़ान भरने में माहिर ये दोनों पक्षी आसमान की उस ऊँचाई तक जा सकते हैं, जहाँ तक हेलीकॉप्टर भी नहीं पहुँचता और अगर दूसरे पक्षियों को उस ऊँचाई पर छोड़ दो, तो उनकी मौत हो जाएगी। गिद्ध की उड़ान को सन् 1973 में रूपेल्स वेंचर ने आइवरी कोस्ट में 37,000 फीट रिकॉर्ड किया था। गिद्ध की तरह ही चील और बाज भी ऊँची उड़ानें भरने वाले पक्षी हैं। लेकिन गिद्ध के बारे में कहा जा सकता है कि गिद्ध एक ही बार में उड़ान भरकर 1,000 किलोमीटर की दूरी तक तय कर सकता है।

गिद्ध के पंख 1.8 मीटर से 2.9 मीटर तक चौड़े और बेहद मज़बूत होते होते हैं, जबकि चील के पंख 1.5 मीटर से 2.3 मीटर तक लम्बे होते हैं। इन दोनों जीवों में चील का हमला गिद्ध से भी तेज़ होता है, लेकिन दोनों का हमला इतना ख़तरनाक होता है कि ये दोनों पक्षी अपनी टक्कर से शेर को भी गिरा सकते हैं। किसी जीव पर इनकी हमले की रफ़्तार क़रीब 200 किलोमीटर प्रति घंटे से लेकर 350 किलोमीटर प्रति घंटे की हो सकती है।

जीव वैज्ञानिकों चिन्ता जताते हैं कि अगर ये दोनों महाबलशाली पक्षी धरती पर नहीं रहे, तो इंसानों का जीवन भी दुश्वार हो जाएगा। पिछले एक दशक के दौरान भारत, नेपाल, श्रीलंका, चीन और पाकिस्तान में गिद्धों की संख्या 95 फ़ीसदी तक कम हुई है। देखने में आ रहा है कि जैसे-जैसे ये दोनों पक्षी विलुप्त होते जा रहे हैं, इंसानों में रोग बढ़ते जा रहे हैं।

इनके विलुप्त होने के मुख्य कारणों में पशुओं की प्राकृतिक मौत से ज़्यादा उनका काटा जाना, पशुओं को विषैली दवाएँ खिलाना और फ़सलों पर कीटनाशकों का उपयोग करना है। इन पक्षियों के शिकार में भी तेज़ी आयी है। बिजली के तारों, विषैली गैसों और बढ़ते तापमान से भी इनकी मौत का कारण बने हैं। प्रकृति प्रेमियों, जीव वैज्ञानिकों और सरकारों को इन दोनों पक्षियों के बचाव के साथ-साथ इनकी संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

गैंडा और हाथी

गैंडों और एशियाई हाथियों की संख्या भी कम हो रही है। भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में हाथियों की कम होती संख्या चिन्ता का विषय है। साल 1986 से एशियाई हाथी को आई.यू.सी.एन. रेड लिस्ट में लुप्तप्राय प्राणी के रूप में दर्ज हो चुके हैं। पिछले क़रीब 75 सालों में हाथियों की संख्या में 50 फ़ीसदी की गिरावट आयी हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह हाथियों का तेज़ी से हो रहा शिकार है। साल 2003 में जंगली हाथियों की संख्या क़रीब 41,000 से 52,000 के बीच आँकी गयी थी। अब कहा जा रहा है कि इनकी संख्या 40,000 से भी कम रह गयी है। हालाँकि एक अनुमान के मुताबिक, भारत में जंगली हाथियों की संख्या क़रीब 26,000 से 28,000 के बीच है, जो एशिया के हाथियों की कुल संख्या का 60 फ़ीसदी है।

वहीं सुमात्रन गैंडों की संख्या पाँच दशक पहले क़रीब 800 थी और अब यह घटकर 275 से भी कम रह गये हैं। फ़िलहाल दुनिया में जीवित गैंडों की पाँच प्रजातियाँ मौज़ूद हैं। आज गैंडों की घटती आबादी ने अध्ययनकर्ताओं और जीव वैज्ञानिकों में चिन्ता पैदा की है। डेनमार्क के कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में कहा गया है कि गैंडे की संख्या में 20 लाख वर्षों से निरंतर लेकिन धीरे-धीरे कमी आयी है।

उल्लू और कठफोड़वा

भारत में उल्लू को धन की देवी लक्ष्मी की सवारी कहा जाता है। लेकिन यही उल्लू अब यहाँ तेज़ी से कम हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण इन पक्षियों की भारी संख्या में तस्करी होना है। काला जादू करने वाले इस जीव के अंगों का इस्तेमाल करने के लिए इसकी हत्या कर देते हैं। कहा जाता है कि उल्लू की क़ीमत 200 रुपये से कई लाख रुपये तक हो सकती है।

हरे पेड़ को काट देने वाली मज़बूत चोंच वाले कठफोड़वा पक्षी की प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है। साल 2021 में अमेरिका के मछली और वन्यजीव सेवा विभाग ने इसे विलुप्त प्रजाति घोषित कर दिया है। भारत में भी इनकी प्रजाति पर ख़तरा मंडरा रहा है। सफ़ेद उल्लू की प्रजाति तो बिलकुल विलुप्त हो चुकी है।

विलुप्त होने की ओर प्रजातियाँ

एक अध्ययन बताता है कि दुनिया में कुल 5,583 ऐसी प्रजातियाँ हैं, जो विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन प्रजातियों में 26 नयी प्रजातियों को सन् 2017 में शामिल किया गया था। इन प्रजातियों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है। हालाँकि इन प्रजातियों को बचाने के लिए वैज्ञानिक और जीव प्रेमी कई क़दम उठा रहे हैं; लेकिन जीवों को बचाने का प्रयास करने वालों की संख्या में उन्हें मारने वाले शिकारियों की संख्या कई गुना ज़्यादा है। सन् 2016 में आईयूसीएन ने अनुमान जताया था कि धरती पर बढ़ते प्रदूषण और समुद्रों में गिरायी जा रही निरंतर गन्दगी से मछलियों की संख्या भी कम हो रही है।

दवा के नाम पर ज़हर

गुणवत्ताहीन कफ सिरप से 66 बच्चों की मौत पर लीपापोती से उठ रहे सवाल

पश्चिमी अफ्रीकी देश गाम्बिया में 66 बच्चों की मौत के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की गम्भीर चेतावनी से हरियाणा की मेडेन फार्मास्यूटिकल लिमिटेड कम्पनी विवाद में फँस गयी है। इस कम्पनी की चार दवाइयाँ- प्रोमेथजाइन ओरल सोल्यूशन, कोफोक्समालिन बेबी कफ सिरप, मेकआफ बेबी कफ सिरप और मैगरिथ रन कोल्ड सिरप अफ्रीकी देश गाम्बिया के 66 बच्चों की मौत की वजह बनी। 66 में से 60 बच्चों की मौत की वजह गुर्दे (किडनी) में ख़राबी साबित हुई है। यह सब शुरुआती जाँच में नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेबोरेटरी में पूरे परीक्षण के बाद साबित हुआ है। जाँच में कम्पनी की इन चार दवाओं में डाइथेलेन ग्लायकोल और ऐथेलन ग्लायकोल की मात्रा मानकों से कहीं ज़्यादा पायी गयी। दोनों रसायनों का स्तर घटिया होने या मानक से ज़्यादा का मिश्रण करना बेहद ख़तरनाक होता है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों में डाइथेलेन और ऐथेलेन का दवाओं में इस्तेमाल प्रतिबन्धित है; लेकिन भारत में ऐसा नहीं है।

बता दें कि सन् 2020 में भी हिमाचल प्रदेश की डिजिटल विजन नामक फार्मास्यूटिकल कम्पनी द्वारा बनाये गये कफ सिरप में इन्हीं दोनों रसायनों के ज़्यादा इस्तेमाल होने के चलते जम्मू क्षेत्र के 11 से ज़्यादा बच्चों की मौत कुछ महीनों के अंतराल में हुई। जाम्बिया में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ है। ये मौतें अगस्त तक हो चुकी हैं; लेकिन सिलसिला कब से शुरू हुआ, इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विस्तृत जानकारी नहीं दी है।

ये दवाइयाँ बच्चों को सर्दी-खाँसी आदि ठीक करने के लिए दी जाती हैं; लेकिन दवा ख़राब होने पर पेट दर्द, सिर दर्द, उल्टी,डायरिया और पेशाब आने में दिक़्क़त होती है। बच्चे की तबीयत सँभलने के बजाय धीरे-धीरे ख़राब होती चली जाती है। आख़िरकार गुर्दे (किडनी) फेल होने या अन्य कारण से मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से मेडेन फार्मास्यूटिकल कम्पनी पर गम्भीर लापरवाही का ख़ुलासा होता है। कम्पनी का देश और विदेशों में बड़ा कारोबार है। कुंडली (सोनीपत) में इकाई है और पिछले 32 वर्षों से दवा निर्माण में लगी है। सवाल यह है कि निर्यात होने वाली ये दवाइयाँ केंद्रीय लेबोरेटरी में कैसे पास हो गयीं? मतलब स्पष्ट है कि दवाओं की गुणवत्ता और मानकों का पूरा ख़याल नहीं रखा गया। ज़ाहिर है कि दवा बनाने के मानक अगर बिगड़ जाएँ, तो वह ज़हर बन सकती है। इससे रोगी को घातक नुक़सान होने के अलावा उसकी जान भी जा सकती है। इसलिए किसी भी दवा कम्पनी में बनने वाली दवाइयों की जाँच कड़ी होनी चाहिए। बाहर जाने वाली दवाओं की भी जाँच होनी चाहिए, क्योंकि इससे देश की छवि जुड़ी होती है। विदेशों में इसका बड़ी सख़्ती से पालन किया जाता है; लेकिन हमारे यहाँ मानकों से समझौता कर लिया जाता है, जिसका परिणाम गाम्बिया जैसी घटना के रूप में आज हमारे सामने है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन को अन्य देशों से भी ऐसी घटनाओं के सामने आने की आशंका है। मेडेन फार्मा कम्पनी गाम्बिया में इन दवाओं का निर्यात करती आ रही है; लेकिन वहाँ से अन्य पड़ोसी देशों में ये दवाइयाँ जा सकती हैं। ऐसी आशंकाओं को देखते हुए गाम्बिया में इन दवाओं के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रमुख टेड्रोस अदनोम धेब्रेयियम के ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया को मामले से अवगत कराने के बाद देश में भी हडक़म्प सा मच गया है। मेडेन कम्पनी हरियाणा के जिला सोनीपत के कुंडली में है। लिहाज़ा राज्य सरकार की पूरी जवाबदेही है। स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने मामला प्रकाश में आते ही चारों दवाइयों के नमूने कोलकाता की सेंट्रल ड्रग लैब में भेजने की बात कही। जाँच रिपोर्ट आने के बाद सरकार की ओर से कार्रवाई की जाएगी। कम्पनी विशेष तौर पर ये दवाइयाँ निर्यात करती है; लेकिन क्या राज्य या देश के किसी हिस्से में भी इनकी बिक्री हो रही है? इसकी भी जाँच करायी जाने की बात की गयी है।

मेडेन फार्मा लिमिटेड सन् 1990 से दवा निर्माण के कार्य में है। इस कम्पनी में केप्सूल, इंटेजेक्शन, सिरप, ओंटमेट्स और टेबलेट आदि बनाये जाते हैं। देश-विदेश में कम्पनी का अच्छा कारोबार है। कम्पनी मालिकों के पास तीन दशक से ज़्यादा का अनुभव है। इसके चलते कम्पनी के पास डब्लूएचओ-जीएमपी और आईएसओ-9001 है। यह सर्टिफिकेट दवा निर्माण में सभी अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों का पालन करने वाली कम्पनी को दिया जाता है। कम्पनी की वेबसाइट पर इसका विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है और इसकी फोटो भी अपलोड की गयी है।

तीन दशक पुरानी यह कम्पनी दर्ज़नों तरह की दवाइयाँ बनाती है। यह पहला और बड़ा मामला है, जब सीधे तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने किसी कम्पनी की दवाइयों पर उँगली उठायी है। ज़ाहिर है, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने तौर पर पूरी जाँच के बाद इस कम्पनी पर गम्भीर आरोप लगाये हैं, तो कोलकाता की सेंट्रल ड्रग लैब की रिपोर्ट अलग कैसे आ सकती है? दवा निर्माण और उनके निर्यात में भारत बहुत आगे है। विकसित देशों में यहाँ की दवाइयाँ बड़े स्तर अमेरिका और अन्य विकसित देशों में जाती हैं। समय-समय पर अमेरिका की एफडीए जैसी एजेंसी हमारे यहाँ की कम्पनियों की इकाइयों की जाँच करती है और $खामी पाये जाने पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई करती है। इन कम्पनियों को एफडीए के कड़े मानकों से गुज़रना होता है और इसमें किसी तरह की कोई नरमी नहीं बरती जाती; क्योंकि दवाओं के उपयोग से आख़िर सवाल मरीजों की ज़िन्दगी का जुड़ा होता है।

गाम्बिया में बड़े स्तर पर हुई बच्चों की मौत से देश की छवि को भी धक्का लगा है। देश की प्रतिष्ठा से जुड़े इस मामले की गम्भीरता को इसी से समझा जा सकता है कि घटना प्रकाश में आते ही तुरन्त ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया ने हरियाणा स्टेट रेगुलेटरी अथॉरटी से इस बारे में जवाब तलब कर लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया है कि मेडन फार्मा लिमिटेड की उक्त चारों दवाइयाँ गाम्बिया में ही निर्यात की गयी है। ये विशेषतौर पर निर्यात की जाने वाली दवाइयाँ हैं, इसलिए देश में इनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कम्पनी की चार दवाइयों की पूरी जाँच के बाद इन्हें ही मौत की वजह माना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पुष्टि हो चुकी है, लिहाज़ा कोई सन्देह नहीं रह जाता। लेकिन हमारे देश में ही अभी इसकी जाँच होनी बाक़ी है।

आज तमाम तरह की बीमारियों से दुनिया भर के ज़्यादातर लोग जूझ रहे हैं, जिसके चलते देश-विदेश में दवाइयों का कारोबार हज़ारों करोड़ रुपये का है। इसीलिए दवा कम्पनियाँ लाइसेंस और सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए बहुत कुछ करती हैं।

इस समय भारत में 3,000 से ज़्यादा दवा निर्माता कम्पनियाँ और 10,000 से ज़्यादा इनकी इकाइयाँ हैं। इन सबके मानकों को ध्यान में रखना तो बड़ी चुनौती है ही, इनसे साँठगाँठ करने वाले ड्रग्स जाँच विभागों की निगरानी करना भी एक कठिन काम है। लेकिन यह होना चाहिए। संसाधनों की कमी के चलते नियमों की अनदेखी और मिलीभगत से बहुत कुछ होता है। दवा निर्माण क्षेत्र में दवा बनाने के मानकों और गुणवत्ता से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए, वरना जम्मू और गाम्बिया जैसी घटनाएँ होती रहेंगी।

“गाम्बिया में 66 बच्चों की मौत गम्भीर घटना है। केंद्र सरकार के निर्देश के बाद मामले की जाँच शुरू कर चारों दवाइयों के नमूने कोलकाता की सेंट्रल लैब भेजे जाएँगे। रिपोर्ट आने और आरोप सही साबित होने के बाद कड़ी कार्रवाई की जाएगी, चाहे कोई कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो। अगर सैंपल में कुछ भी ग़लत मिलता है, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। किसी को भी बख़्शा नहीं जाएगा। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया और केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग को लगातार अपडेट दिया जा रहा है।”

अनिल विज

गृह और स्वास्थ्य मंत्री, हरियाणा

प्राकृतिक सम्पदा के दुश्मन

अवैध कारोबार के खेल में मज़ाक़ बनकर रह गया जल, जंगल, ज़मीन बचाओ का नारा

15 नवंबर, 2000 को बिहार से अलग हुआ झारखण्ड खनिज सम्पदा के कारण देश में प्रसिद्ध है। लेकिन अकूत प्राकृतिक सम्पदा के मालिक इस राज्य की एक बड़ी आबादी आज तक ग़रीब है। ये ग़रीब लोग आज भी जल, जंगल, ज़मीन की सुरक्षा को लेकर अपने नारों के साथ विकास की कल्पना में डूबते-उतरते रहते हैं। हक़ीक़त इससे परे है। उनके पैरों तले ये जल, जंगल, ज़मीन कब और कितने खिसक गये, इसकी जानकारी उन्हें है ही नहीं।

दरअसल यही खनिज सम्पदा उसके लिए अभिशाप बन गयी है। बड़े पैमाने पर माफ़िया, बिचौलिये और दुनिया भर के पूँजीपति इस राज्य की सम्पदा का इतनी बेदर्दी से दोहन कर रहे हैं कि यहाँ का नैसर्गिक सौंदर्य ख़त्म होता जा रहा है। अवैध कारोबार माफ़िया का ख़ूख़ार खेल है, जिसमें आड़े आने वालों की हत्या करने तक से कोई नहीं हिचकता। पत्थर के कारोबार के कारण पहाड़ विलुप्त होते जा रहे हैं। ज़मीन के भीतर से कोयला, लौह अयस्क और बेशक़ीमती पत्थर निकालने के लिए पेड़-पौधे, यहाँ तक कि जंगल-झाड़ भी साफ़ होते जा रहे हैं। बालू निकालने के लिए नदियों का दोहन हो रहा है। इस खेल में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने और लालफ़ीताशाही का साथ मिलने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा न्यायालय में फाइल चार्जशीट से भी इन सभी बातों की पुष्टि अब होने लगी है।

कोयले की काली कमायी

झारखण्ड में काले हीरे यानी कोयले का अवैध कारोबार कोई नया नहीं है। राज्य की ज़मीन के अन्दर दबी इस अकूत सम्पदा पर कई फ़िल्में भी बनी हैं। इसे लेकर वर्चस्व की लड़ाई को भी समय-समय देखा गया है। एकीकृत बिहार यानी जब झारखण्ड अलग नहीं हुआ था, तब भी कोयले के अवैध खनन का मामला उठा था। कोयले के अवैध कारोबार को लेकर सन् 1990 में बेरमो के प्रख्यात मज़दूर नेता व पूर्व विधायक स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह ने तत्कालीन केंद्रीय कोयला मंत्री को एक पत्र में लिखा था कि दक्षिण बिहार के कोयला खदानों से हर साल डेढ़ अरब रुपये के कोयले की चोरी होती है। उस समय उनके दावे पर काफ़ी शोर मचा था। जाँच भी हुई थी; लेकिन रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। झारखण्ड बनने के बाद कोयले के अवैध कारोबार का यह बाज़ार बढ़ता गया।

लौह अयस्क का धन्धा

कोयला के बाद लौह अयस्क का अवैध कारोबार भी काली कमायी का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। सारंडा इलाक़े में पाये जाने वाले लौह अयस्क या लाल मिट्टी की कहानी भी कम रोचक नहीं है। यहाँ अवैध खनन की जाँच के लिए सीबीआई से लेकर शाह आयोग तक बना; लेकिन बड़े मालिकों का कुछ नहीं हुआ। राज्य के विभिन्न ज़िलों से लौह अयस्क ओडिशा और बंगाल के साथ सीमा पार चीन तक पहुँचाया जाता है। इस अवैध खनन ने झारखण्ड के लोगों को बेघर किया। जंगलों को नष्ट कर दिया। पूँजीपतियों, माफ़िया और इससे जुड़े लोगों ने अरबों की कमायी की।

ग़ायब हो गये दर्ज़नों पहाड़

संताल क्षेत्र से एक-एक करके पहाड़ ग़ायब होते जा रहे हैं। वहाँ के रहने वाले लोग बताते हैं कि पिछले 22 वर्षों में इस इलाक़े के दर्ज़नों पहाड़ ग़ायब हो गये। साहिबगंज, दुमका, पाकुड़ व संताल के अन्य इलाकों से पहाड़ से पत्थर तोडक़र निकलाने का कारोबार धड़ल्ले से चलता है। यह पत्थर देश के अन्य हिस्सों तक नहीं बांग्लादेश तक भेजा जाता है। इसका ख़ुलासा ईडी ने भी किया है। ईडी ने साहिबगंज में एक बड़े जहाज़ को ज़ब्त किया। इस जहाज़ पर अवैध रूप से ट्रकों पत्थर लादकर भेजा जाता था। पत्थर का अवैध कारोबार इतना फैल गया कि हर तरफ़ क्रेशर मशीन दिखती हैं। छोटे-छोटे स्तर पर भी लोग इससे जुड़ गये हैं। इसी तरह राज्य की नदियों से बालू का अवैध खनन बदस्तूर जारी है। जिस वजह से नदियों की स्थिति दयनीय है।

बेशक़ीमती पत्थरों पर नज़र

राज्य की ज़मीन के अन्दर हीरा, पन्ना, प्लेटिनम, लिथियम, क्रोमियम, निकेल, मून स्टोन, ब्लू स्टोन समेत कई दुर्लभ और बेशक़ीमती खनिज छिपे हैं। सरकार अभी तक कोयला, लोहा और बॉक्साइट को लेकर अटकी हुई है। इस तरफ़ ध्यान नहीं है। वैध तरीक़े से इसकी नीलामी और खनन शुरू नहीं हुआ। जबकि इसके अवैध कारोबारी इन बेशक़ीमती पत्थरों को निकालकर चाँदी काट रहे हैं। सूत्रों की मानें तो झारखण्ड से निकलने वाले पन्ना की चमक जयपुर की जौहरी मंडी तक है। एक अनुमान के मुताबिक, केवल पन्ना का ही 800 करोड़ रुपये सालाना का अवैध कारोबार होता है। अन्य बेशक़ीमती खनिज सम्पदा के कारोबार का अंदाज़ा भी इसी से लगाया जा सकता है।

करोड़ों का कारोबार

राज्य में इन दिनों ईडी की कार्रवाई तेज़ है। ईडी अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच कर रही है। ईडी ने गिरफ़्त में आये लोगों के बारे में न्यायालय में दाख़िल चार्जशीट और प्रेस विज्ञप्ति में 1,000 करोड़ के अवैध खनन का ज़िक्र किया है। यह कितने दिन या कितने महीने में हुआ है?

इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। एक बात साफ़ है कि चूँकि ईडी पत्थर के अवैध खनन का जाँच कर रहा, इसलिए यह रकम केवल पत्थर खनन से सम्बन्धित होगी। चूँकि राज्य में कोयला, अभ्रक, लौह अयस्क आदि का भी अवैध कारोबार चल रहा, इसलिए काली कमायी का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है।

एक ग़ैर-सरकारी संगठन द्वारा एकत्र आँकड़ों से पता चलता है कि झारखण्ड में खनिजों के अवैध कारोबार में हर महीने क़रीब 965 करोड़ रुपये से अधिक का लेन-देन होता है। इसमें अकेले कोयले का योगदान क़रीब 350 करोड़ रुपये का है। लौह अयस्क का 200 करोड़ रुपये और पत्थर का 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा का हर महीने का अवैध कारोबार है। इसी तरह बालू, अभ्रक, अन्य बेशक़ीमती खनिजों का 200 करोड़ रुपये से अधिक का अवैध कारोबार है। अभ्रक का पूरा कारोबार सरकार की नज़रों में अवैध है।

इसी तरह बेशक़ीमती पत्थरों का कारोबार भी पूरा का पूरा अवैध ही है। हालाँकि कुछ जानकारों का कहना है कि सभी तरह के अवैध खनन का कारोबार कितने का होता है, इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है। यह कारोबार मनी लॉन्ड्रिंग का मुख्य स्रोत है। ईडी ने भी अपनी जाँच में मनी लॉन्ड्रिंग का भी ज़िक्र किया है।

गठजोड़ से हो रहा अवैध खनन

ईडी ने मनरेगा घोटाला से जाँच शुरू किया। जैसे-जैसे जाँच बढ़ी, मनरेगा घोटाला पीछे छूटता गया और अवैध खनन व मनी लॉन्ड्रिंग का मामला उभरता गया। ईडी के गिरफ़्त में राज्य के वरिष्ठ अधिकारी, कारोबारी, राजनीति से जुड़े लोग आने लगे। निलंबित आईपीएस पूजा सिंघल, कारोबारी अमित अग्रवाल, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा, राजनीतिक और ब्यूरोक्रेसी में पैठ रखने वाले बच्चू यादव व प्रेम प्रकाश जैसे लोग गिरफ़्त में आये, तो परत-दर-परत अवैध कारोबार के राज़ खुलने लगे।

राज्य के कई नेता, अधिकारी और कारोबारी ईडी के रडार पर हैं, जो कभी भी गिरफ़्त में आ सकते हैं। ईडी ने न्यायालय में गिरफ्तार लोगों के ख़िलाफ़ पाँच हजार से अधिक पन्नों का चार्ज शीट फाइल किया है। इसमें ईडी ने अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग का ज़िक्र किया है। दूसरी बात ईडी ने यह भी कहा है कि इस अवैध खनन को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। तीसरी बार ईडी ने इसमें कई बड़े नेताओं और अधिकारियों के शामिल होने की आशंका जाहिर की है। इन सभी बातों ने झारखण्ड में खनिज सम्पदा के अवैध खनन और नेता-अधिकारी गठजोड़ की पुष्टि कर दी है।

पिस रही जनता

जल, जंगल, ज़मीन को अपना जीवन मानने वाली झारखण्ड की जनता इस माफ़िया तंत्र की चक्की में पिस रही है और उसे चौतरफ़ा घाटा हो रहा है। वैध तरीक़े से खनन में केंद्र व राज्य सरकार कई बातों का ध्यान रखती है। विकास के लिए निर्माण कार्य के साथ-साथ पर्यावरण का भी ख़याल रखा जाता है। सरकार को राजस्व भी मिलता है, जिससे विकास के कई काम होते हैं और जनता तक लाभ पहुँचता। अवैध खनन के कारोबार में राजस्व का घाटा तो है ही, जनता को कोई लाभ भी नहीं मिलता।

अवैध खनन की गहराई ज़मीन के अन्दर इतनी है कि कभी-कभार प्रशासनिक कार्रवाई में छोटी-छोटी मछलियाँ तो फँसती हैं; लेकिन बड़ी मछलियों तक जाँच की आँच भी नहीं पहुँचती। नेता, अफ़सर और बाहुबली गठजोड़ इस अवैध कारोबार को सींचता है। खनिज सम्पदाएँ अब अकूत नहीं रहीं। बेशुमार दोहन से इनके भण्डार भी तेज़ी से घट रहे हैं। लिहाज़ा प्रकृति के समक्ष पारिस्थतिकी तंत्र के सन्तुलन का संकट गहराने के साथ बड़ी आबादी के जीने का अधिकार भी ख़तरे में पड़ता जा रहा है। क्योंकि प्रकृति के ख़ज़ाने लूट लिये जाएँगे तो संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गये जीने के अधिकार के प्रावधान का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इसलिए अवैध खनन को योजनाबद्ध तरीक़े से रोकना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो झारखण्ड वासियों की जल, जंगल, ज़मीन बचाओ सिर्फ नारा ही रह जाएगा।

प्रतिभा की अनदेखी

हर चीज़ की एक उम्र होती है। खेल में तो यह बात बहुत क़ायदे से लागू होती है। प्रतिभा अवसर देती है। लेकिन प्रतिभा होते हुए भी समय पर अवसर न मिले, तो प्रतिभा को कुंद होने में कितना वक़्त लगता है। क्रिकेट की बात करें, तो कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो प्रतिभावान होते हुए भी समय पर अवसर न मिलने से अँधेरे में खो गये। यह सिलसिला दशकों से चल रहा है और आज भी यही स्थिति है। बात करते हैं क्रिकेट की। एक खिलाड़ी उमरान मलिक हैं। कह सकते हैं कि आज की तारीख़ में देश में सबसे तेज़ गेंद उमरान ही फेंकते हैं। उम्र है 22 साल। हालाँकि तेज़ गेंदबाज़ी में उम्र मायने रखती है। क्योंकि तकनीक के साथ-साथ इसमें शारीरिक ताक़त भी ज़रूरी होती है। उमरान दोनों ही चीज़ें कर लेते हैं। यानी उनकी गेंदों में गति भी है और स्विंग भी। उनकी उम्र है कि उन्हें राष्ट्रीय टीम में अवसर दिया जाए। लेकिन न जाने क्यों ऐसा हो नहीं रहा। दुनिया की सबसे अमीर क्रिकेट संस्था होते हुए भी शायद बीसीसीआई के पास योजना की कमी है।बी

हाल के महीनों में उमरान ने बताया है कि उनके पास देश के लिए खेलते हुए अपनी गति से क्रिकेट की दुनिया के दिग्गजों को छका सकने की क़ुव्वत है। आईपीएल में दुनिया भर के दिग्गज हिस्सा लेते हैं और इसके पिछले संस्करण में उमरान ने कितना कमाल किया था, सभी जानते हैं। उनकी गति कई बार बल्लेबाज़ों को भयभीत करती है और कई बार अपनी स्विंग से वह कब विकेट बिखेर देते हैं, यह बल्लेबाज़ को भी समझ नहीं आता। उमरान को बेहतर कोच की देखरेख में और तराशे जाने से वह देश की गेंदबाज़ी की पूँजी बनने की क्षमता रखते हैं; यह बात क्रिकेट के जानकार ही कह चुके हैं।

पड़ोसी देश पाकिस्तान, जहाँ क्रिकेट के चयन को लेकर कई तरह की राजनीतियों के आरोप लगते हैं; वहाँ भी तेज़ गेंदबाज़ हर दौर में भारत के मुक़ाबले बेहतर रहे हैं। कारण यह है कि वहाँ तेज़ गेंदबाज़ों को सही समय पर अवसर दिये जाते हैं। भारत में ऐसा नहीं होता। उमरान को बेझिझक शुद्ध तेज़ गेंदबाज़ की श्रेणी में रखा जा सकता है। उनकी अधिकतम गति 157 किलोमीटर प्रति घंटा (केएमपीएच) मापी गयी है, जबकि टीम के रेगुलर तेज़ गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह 153.26 केएमपीएच है। पिछले क़रीब एक दशक की बात करें, तो इन दोनों के अलावा इरफ़ान पठान 153.7, मोहम्मद शमी 153.3, नवदीप सैनी 152.85 और इशांत शर्मा 152.6 और उमेश यादव 152.5 केएमपीएच की गति से गेंद फेंकते रहे हैं।

आईपीएल में उमरान की टीम सनराइजर्स हैदराबाद (एसआरएच) के गेंदबाज़ी कोच डेल स्टेन, जिनके दक्षिण अफ्रीका की तरफ़ से खेलते हुए टेस्ट मैचों में 439 विकेट सहित तीनों फार्मेट में 699 अंतरराष्ट्रीय विकेट हैं, वह भी उमरान की गति के मुरीद हैं। स्टेन उमरान को लम्बी रेस का घोड़ा बताते हैं। ख़ुद स्टेन ने 155.7 केएमपीएच की अधिकतम गति से गेंद फेंकी है और अपने समय में उनकी गति बल्लेबाज़ों को भयभीत करती थी।

आज दुनिया में तीव्रतम गेंद फेंकने वाले न्यूजीलैंड के लोकी फर्गुसन 157.3, दक्षिण अफ्रीका के एनरिक नॉरजे 156.22 और पाकिस्तान के शाहीन अफ़रीदी 157 केएमपीएच को गति के मामले में अपने उमरान ही टक्कर देते दिखते हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारत में उमरान सबसे तेज़ हैं। ऐसे में उमरान को ज़्यादा अवसर और प्रोत्साहन और भी बेहतर गेंदबाज़ बना सकते हैं। जसप्रीत बुमराह और उमरान मलिक भारत के लिए गेंदबाज़ी की घातक जोड़ी बन सकते हैं। उनके अलावा मोहम्मद शमी, प्रसिद्ध कृष्णा, आवेश खान और मोहम्मद सिराज भी कम नहीं हैं। ये सब भी एक ताक़तवर पेस बैटरी बनने की क्षमता रखते हैं। लेकिन उमरान को अवसर नहीं मिल पा रहा।

जम्मू-कश्मीर के इस युवा ने कहा था कि देश की टीम में आना उनका सपना है। वह टीम में शामिल भी किये गये हैं; लेकिन तीन मैच ही उनके हिस्से आये हैं, जिसमें उनके दो विकेट हैं। उमरान ने पहला अंतरराष्ट्रीय मैच इसी साल 26 जून को डबलिन में आयरलैंड के ख़िलाफ़ खेला था, जिसमें उन्हें एक ही ओवर करने का अवसर मिला था। उनके पास अनुभव की कमी ज़रूर है; लेकिन प्रतिभा की नहीं।

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ़ उमरान के मामले में हुआ है। इतिहास पर यदि नज़र दौड़ाएँ, तो ज़ाहिर होता है कि कई खिलाड़ी समय पर अवसर न मिलने के कारण फिर कभी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाये और अँधेरों में खो गये। कई बार होता यह है कि महत्त्वपूर्ण सीरीज या बड़े टूर्नामेंट के कारण प्रबंधन अनुभवी खिलाडिय़ों पर भरोसा करता है। वे नहीं भी चलें, तो भी उनसे उम्मीद ख़त्म नहीं होती, और यह सिलसिला चलता रहता है। चयनकर्ता उन पर भरोसा दिखाते जाते हैं और इस फेर में कई अच्छे युवा खिलाडिय़ों का भविष्य चौपट हो जाता है। बात कप्तान पर भी निर्भर होती है। धोनी को देखें, तो उनका स्पिनर्स पर ज़्यादा भरोसा रहता था। उन्होंने अपने समय में स्पिनर्स को ज़्यादा अवसर दिये। हालाँकि जब विराट कोहली कप्तान बने, तो उन्होंने तेज़ गेंदबाज़ों पर ज़्यादा भरोसा दिखाया। उनके समय में टीम के कोच रवि शास्त्री, जो ख़ुद एक स्पिनर थे; ने भी कोहली की सोच का हमेशा समर्थन किया।

रिकॉड्र्स पर नज़र दौड़ाएँ, तो ज़ाहिर होता है कि तेज़ गेंदबाज़ों ने विदेशी दौरों में भारत की जीत का प्रतिशत बढ़ाया है। हाल के वर्षों में जबसे देश में 145 केएमपीएच से ज़्यादा की गति वाले गेंदबाज़ देश में उभरे हैं। हमारी टीम ने विदशी दौरों में ज़्यादा मैच जीते हैं। सन् 2000 तक विदेशी दौरों में हमारी जीत का प्रतिशत आठ था, जो आज की तारीख़ में 45 से 50 के बीच रहता है।

निश्चित ही भारत के पास आज जो तेज़ गेंदबाज़ हैं, वे दुनिया के तेज़ गेंदबाज़ों को मज़बूत टक्कर देते हैं। चाहे गति का मामला हो या स्विंग या एक्यूरेसी का। वर्तमान में हमारे पास आठ ऐसे तेज़ गेंदबाज़ हैं, जो 150 के आसपास या उससे भी ऊपर की गति से गेंद फेंक रहे हैं। यहाँ तक कि शार्दुल ठाकुर और दीपक चाहर जैसे मध्यम तेज़ गेंदबाज़ भी 140 से 145 की गति से गेंद डालते हैं।

हाल के दशकों में जब स्पिनर्स टीम में दबदबा रखते थे, तब भारत की जीत का प्रतिशत कम था; लेकिन तेज़ गेंदबाज़ों ने इस खाई को कम किया है। सन् 2010 से सन् 2020 के बीच तेज़ गेंदबाज़ों ने 922 विरोधी खिलाडिय़ों के विकेट उखड़े, जबकि स्पिनर्स ने 877 विकेट। इस दौर में धोनी सन् 2014 तक कप्तान रहे, जिनका स्पिनर्स पर ज़्यादा भरोसा रहा। दिसंबर, 2014 में विराट कोहली ने जब टेस्ट टीम की कप्तानी सँभाली, तो तेज़ गेंदबाज़ों को अपेक्षाकृत ज़्यादा अवसर मिलने शुरू हुए। कोहली लगातार पाँच तेज़ गेंदबाज़ों के साथ खेलते रहे।

भारत में स्पिनर्स बनाम तेज़ गेंदबाज़ देखें, तो सन् 1971 से सन् 1980 के दौर में स्पिनर्स ने टेस्ट में 643, जबकि तेज़ गेंदबाज़ों ने महज़ 291 विकेट लिये। इसी तरह सन् 1981 से सन् 1990 के बीच यह आँकड़ा 546-528, सन् 1991 से सन् 2000 के बीच 517-471 और सन् 2000 से सन् 2010 के बीच 868-783 रहा। हालाँकि सन् 2011 से सन् 2021 के बीच तेज़ गेंदबाज़ 922 विकटों के मुक़ाबले स्पिनर्स 877 विकेट ही ले पाये। टेस्ट चैंपियनशिप, जिसमें भारत फाइनल तक पहुँचा; के कुल खेले 17 मैचों में भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों ने 303 विरोधी बल्लेबाज़ों की किल्लियाँ उखाड़ीं।

उमरान को लेकर दिग्गज तेज़ गेंदबाज़ों के बयान ज़ाहिर करते हैं कि वह अच्छे बॉलर हैं और उन्हें अवसर मिलना चाहिए। डेल स्टेन ने उमरान से कहा था कि उन्हें लाइन-लेंथ की चिन्ता न करके स्ट्रेंथ पर ध्यान देना चाहिए। स्टेन की उमरान को सलाह है कि जितनी तेज़ डाल सकते हो, उतनी तेज़ी से गेंद डालो। उधर वेस्ट इंडीज के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ इयान बिशप कहते हैं- ‘उमरान जैसे युवा गेंदबाज़ तेज़ी से सीखते हैं। इससे वे जल्दी अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार होते हैं।’

भारत के गतिमान

  1. उमरान मलिक 157 केएमपीएच
  2. जसप्रीत बुमराह 153.26 केएमपीएच
  3. मोहम्मद शमी 153.3 केएमपीएच
  4. नवदीप सैनी 152.85 केएमपीएच
  5. उमेश यादव 152.5 केएमपीएच
  6. प्रसिद्ध कृष्णा 152.22 केएमपीएच
  7. आवेश ख़ान 149 केएमपीएच
  8. मोहम्मद सिराज 145.7 केएमपीएच
  9. भुवनेश्वर कुमार 145 केएमपीएच

(गति केएमपीएच में)

धर्म का रास्ता

धर्म सत्य, अहिंसा, और परहित के लिए बने हैं, जो मानव उत्थान का मार्ग हैं। परन्तु अब यही धर्म पाखण्ड, हिंसा और स्वहित का संसाधन बनते जा हैं, जिसके चलते आज के मानव का पतन हो रहा है। इतिहास गवाह है कि आज दुनिया का एक भी ऐसा धर्म नहीं है, जिसके कट्टर अनुयायियों के हाथ कभी-न-कभी ख़ून से न रंगे हों। आज के दौर में यह कट्टरता और भी बढ़ती जा रही है। आश्चर्य होता है कि जो धर्म लोगों को पाप कर्म और पतन से बचाने के लिए बने थे, आज उन्हीं धर्मों को बचाने के लिए उनके कट्टर अनुयायी पाप कर्म करके पतन का रास्ता चुन रहे हैं। सीधे-सीधे कहें, तो कट्टरपंथियों के लिए अब हिंसा ही धर्म का पर्याय बन चुकी है। उन्हें लगता है कि धर्म को बचाने के लिए हिंसा ज़रूरी है। लेकिन ये लोग भूल चुके हैं कि किसी भी धर्म में हिंसा और हिंसकों के लिए कोई जगह नहीं है।

असल में लोगों को वास्तविक धर्म की पहचान करनी होगी। हालाँकि संसार में एक ऐसा वर्ग है, जो वास्तविक धर्म पर है। वास्तविक धर्म से तात्पर्य उस धर्म से है, जो बिना भेदभाव के प्राणी मात्र के हित में काम करने के लिए प्रेरित करता है। यह धर्म सनातन, इस्लाम, ईसाई, पारसी, सिख, जैन, बौद्ध, यहूदी, वहाबी, पेगन, वूडू और शिंतो आदि के नाम से नहीं, बल्कि मानव धर्म के नाम से जाना जाता है। ये प्राणी मात्र का हित करने वाले वास्तविक धर्मावलंबी संसार के इन सभी एक दर्ज़न धर्मों में हैं और सदैव पैदा होते रहेंगे। परन्तु इन धर्मों के अधिकतर अनुयायी अपने ही प्रिय धर्म से ही भटके हुए हैं। क्योंकि हर धर्म मानवता सिखाता है। इसलिए अगर कोई मानवता पर नहीं है, तो फिर वह धर्म के रास्ते पर कहाँ हुआ?

सोचिए, अगर कोई अमानवीय है। किसी से भेदभाव करते हुए व्यवहार करता है। किसी को दु:ख पहुँचाता है; तो उसे धर्मपरायण कैसे कहा जा सकता है? यह धर्म का रास्ता तो नहीं हो सकता। इस तरह किसी धर्म पद्धति के अनुरूप होकर दिखावे और ढोंग को धर्म कहना अथवा मानना भी नहीं चाहिए। इसलिए धर्म की परिभाषा किताबों में नहीं, बल्कि प्राणियों के हित वाले संस्कारों में तलाशनी चाहिए। परन्तु आजकल के तथाकथित धार्मिक लोग स्वहित के लिए तथाकथित कर्मकाण्डी धर्मांधता में फँसे हुए हैं। उन्हें ढोंग और पाखण्ड में धर्म दिखता है। इसीलिए वे अमानवीय होते जा रहे हैं। इसीलिए हर धर्म में अनेक तथाकथित धर्माचार्य पनपते जा रहे हैं, जो अपने-अपने धर्मों में एक कट्टरपंथी भीड़ बढ़ाने के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे हैं। आजकल ये आसान और ऐश-ओ-आराम का धन्धा है। ये तथाकथित धर्माचार्य चाहते हैं कि सब लोग इनके पाखण्ड के चंगुल में ऐसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी फँसे रहें। लोग उन पर विश्वास ही नहीं, बल्कि अंधविश्वास करें। क्योंकि लोगों द्वारा इन पर किये गये इसी अंधविश्वास के कारण इनका धन्धा-पानी चलेगा। पापकर्म करने पर भी इनकी सुरक्षा के लिए असंख्यों मूर्खों की फ़ौज हमेशा मरने-मारने के लिए इनके इर्द-गिर्द खड़ी रहेगी। इस फ़ौज को, इस भीड़ को अन्धभक्तों की भीड़ कहना अनुचित नहीं है। क्योंकि यह अन्धी भीड़ इतनी भ्रमित रहती है कि धर्म और ईश्वर की रक्षा के जुनून में पलों में हिंसक हो जाती है। धर्म के नाम पर कपोल कथाएँ सुनाकर इसे भटकाये रखना तथाकथित धर्माचार्यों के लिए बहुत आसान होता है।

असल में धर्म और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप से लोग परिचित नहीं है। जो थोड़े-बहुत भी इनसे परिचित हैं, उन्हें परमार्थ में आन्नद आता है। उन्हें परहित, परसेवा में सुख मिलता है। उन्हें पाखण्ड करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्हें किसी तथाकथित धर्माचार्य की बातों पर एक अन्धे के तरह अन्धविश्वास करना भी नहीं आता। वे अपनी बुद्धि से विचार करते हैं और अपने अंतर्मन से निर्णय लेते हैं। इन धर्मपरायण लोगों की अंतरात्मा सदैव जागरूक रहती है। ऐसे लोग कुटिल, कपटी नहीं, बल्कि सरल और सौम्य होते हैं। ऐसे लोग किसी की मेहनत से कमाये हुए की लालसा नहीं करते हैं। किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाते। किसी पर अत्याचार नहीं करते। किसी और को चोट लगे, तो उसका दर्द महसूस करते हैं। दूसरों के दु:ख से उनका हृदय द्रवित होता है। उनके लिए सभी प्राणी एक ही ईश्वर की संतानें हैं। ये लोग जानते हैं कि ईश्वर की उपासना अहंकार, भ्रम, ढोंग और पाखण्ड को त्यागकर निर्मल मन से होती है। इसके लिए किसी विशेष व्यवस्था, तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। सही मायने में यही लोग तो धर्म पर हैं।

इसके विपरीत जो तथाकथित धर्माचार्य अपनी दुकान चलाने के लिए धर्मों के नाम पर पाखण्ड, ढोंग और अन्धविश्वास को बढ़ावा देते हैं, वे वास्तविक धर्म को न तो समझते हैं और न ही समझ सकते हैं। उनके बौद्धिक चक्षु खुले नहीं, बल्कि बन्द हैं। ऐसे ही लोगों के लिए मैंने लिखा है :-

मुल्ला, पण्डित, पादरी, सबके अपने स्वार्थ।

कोई भी समझा नहीं, धर्म अर्थ, परमार्थ।’

रूस का यूक्रेनी राजधानी कीव पर हफ्ते भर में दूसरा हमला, धमाकों की आवाजें  

मिसाइलों से हमले के बाद रूस ने सोमवार को यूक्रेन की राजधानी कीव पर एक बार  फिर भीषण हमला किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूक्रेन की राजधानी कीव में सोमवार को कई धमाके सुनाई दिए हैं। दो दिन पहले ही रूस के सैनिकों के अभ्यास शिविर के पास हुए धमाके में 11 लोगों की मौत हो गयी थी।

आज रूस की तरफ से किये गए हमले की पुष्टि यूक्रेन के राष्ट्रपति के चीफ ऑफ स्टाफ एंड्रिए येरमाक ने की है। उन्होंने कहा कि राजधानी कीव के केंद्र में कई धमाके हुए हैं। येरमाक ने कहा – ‘उन्हें (रूस) को लगता है कि इससे उन्हें मदद मिलेगी लेकिन यह उनकी बेचैनी को जाहिर करता है।’

विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि रूसी हमले से पहले कीव में एयर रेड सायरन बजते सुने गए। इसके बाद 6:35 से 6:58 बजे तक धमाकों की गूँज सुनाई देती  रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक कीव के मेयर विटाली क्लिटशेंको ने अपनी जनता से कहा – ‘इनमें से एक धमाका शहर के बीचों बीच शेवचेंकिव्सी डिस्ट्रिक्ट में हुआ। सभी सेवाएं मदद के लिए पहुंच रहीं हैं। आप शेल्टर्स में रहें।’

रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रूस के यह हमले कामिकाज़े ड्रोन की मदद से किये गए हैं।  याद रहे इससे पहले 10 अक्टूबर को रूसी हमले में कीव और यूक्रेन के अन्य शहरों पर मिसाइलें बरसाई गई थीं। हाल के महीनों में रूस का यह यूक्रेन पर सबसे बड़ा हमला बताया गया है। इसमें कई लोग हताहत हुए थे।

हिमाचल में उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा और कांग्रेस आज करेंगे बैठक

हिमाचल प्रदेश के लिए विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है और अब भाजपा और कांग्रेस पर उम्मीदवारों की घोषणा के लिए नजर है। आम आदमी पार्टी भी उम्मीदवारों के नाम पर मंथन कर रही है। भाजपा की आज दिल्ली में बैठक हो रही है जिसमें पार्टी उम्मीदवारों के नाम पर मंथन होगा।

भाजपा आज उम्मीदवारों को लेकर बैठक कर रही है जिसमें पार्टी मुख्यालय में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के अलावा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता हिस्सा लेंगे। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक भाजपा कम से कम 14 वर्तमान विधायकों/मंत्रियों का टिकट काट सकती है।

कांग्रेस भी उम्मीदवारों को लेकर मंथन कर रही है और वह भी इस सिलसिले में बैठक करने जा रही है। कांग्रेस राज्य में विपक्ष में है और उसे भरोसा है कि जनता उनकी सरकार बनाने जा रही है।

दोनों ही पार्टियों में टिकटों के तलबगार दिल्ली में डेरा जमाये बैठे हैं। दोनों ही पार्टियों में हरेक सीट पर एक से ज्यादा दावेदार हैं। यह माना जा  रहा कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के दावेदार की घोषणा नहीं करेगी और साझा नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात की जाएगी।

याद रहे हिमाचल में 12 नवंबर को मतदान होगा और आठ दिसंबर को मतगणना होगी। हाल में चुनाव आयोग ने प्रदेश में चुनावी तारीखों का ऐलान किया है। एक ही चरण में मतदान होगा।

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिए वोटिंग शुरू, खड़गे और थरूर में है सीधा मुकाबला

कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए मतदान शुरू हो गया है। दो वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर में सीधा मुकाबला है। चुनाव में देश भर में 9800 के करीब डेलीगेट वोट डालेंगे। नतीजे 19 अक्टूबर को घोषित किये जाएंगे। मतदान शाम 4 बजे तक जारी रहेगा। करीब 24 साल बाद कोई गैर गांधी कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए 2000 में चुनाव हुआ था जब सोनिया गांधी के मुकाबले उतरे जितेंद्र प्रसाद को कड़ी हार का सामना करना पड़ा था।

जानकारी के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और प्रियंका गांधी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वोट डालेंगे। उधर ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का नेतृत्व कर रहे राहुल गांधी कर्नाटक के बेल्लारी में मतदान करेंगे, जहाँ अस्थाई विश्राम कैम्प मको मतदान केंद्र का रूप दिया गया है। इस मतदान केंद्र में राहुल गांधी सहित 40 डेलीगेट, जो यात्रा में उनके साथ हैं, वोट डालेंगे।

कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव करीब 22 साल बाद हो रहा है। साथ ही 24 साल बाद कांग्रेस का अध्यक्ष कोई गैर गांधी बनेगा। वैसे कांग्रेस के 137 साल के इतिहास में अध्यक्ष पद के लिए छठी बार चुनाव हो रहा है क्योंकि कई चुनाव ऐसे भी हुए जिसमें उम्मीदवारों को किसी ने चुनौती ही नहीं दी।

पद के लिए मैदान में उतरे मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर दोनों ही पार्टी के वरिष्ठ नजीता हैं। बेशक खड़गे काफी अनुभवी और वरिष्ठ हैं, थरूर पार्टी में बदलाव के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, भले उनका कहना है कि चाहे कोई भी जेते, यह पार्टी की जीत होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि जी-23 जो अब काफी कमजोर पड़ चूका है उसका क्या रोल रहता है। यह माना जाता है कि इस गुट के नेता थरूर को समर्थन कर सकते हैं।

चुनाव में प्रदेश कांग्रेस समितियों (पीसीसी) के 9,800 से अधिक प्रतिनिधि गुप्त मतदान के जरिये नया अध्यक्ष चुनेंगे। दिल्ली कांग्रेस मुख्यालय और देशभर के 65 से ज्यादा केंद्रों पर मतदान किया जाएगा।

खड़गे, जिन्हें गांधी परिवार का करीबी माना जाता है, को ज्यादातर वरिष्ठ नेता समर्थन करते दिखे हैं। राज्यों में राहुल गांधी के लिए जबरदस्त समर्थन को देखते हुए खड़गे की जीत तय मानी जा रही है। खड़गे राहुल गांधी की टीम के सदस्य रहे हैं। उधर थरूर भी चुनाव प्रचार के समय वे भी गांधी परिवार को पार्टी में महत्वपूर्ण मानने की बात कह चुके हैं।

इस बीच  कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री ने आज सुबह कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव गुप्त मतदान के जरिये होगा और किसी को पता नहीं चलेगा कि किसने किसे वोट डाला। उन्होंने कहा कि दोनों उम्मीदवारों के लिए समान अवसर मुहैया कराए गए हैं।

भारत ने श्रीलंका को 8 विकेट से हराकर सातवीं बार महिला एशिया कप जीता

स्मृति मंधाना की शानदार बल्लेबाजी और माध्यम तेज गेंदबाज रेणुका सिंह की घातक गेंबाजी के बूते भारत की महिला टीम ने श्रीलंका को हराकर महिला एशिया कप पर सातवीं बार कब्ज़ा कर लिया है। बांग्लादेश के सिल्हट इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए फाइनल में भारत ने 8 विकेट से जीत दर्ज की।

श्रीलंका की टीम पहले बल्लेबाजी करने उत्तरी लेकिन माध्यम तेज गेंदबाज रेणुका सिंह की घातक गेंदबाजी के सामने श्रीलंका की बैटर की बिलकुल नहीं चली और उसने एक के बाद एक विकेट गंवाए। एक मौके पर श्रीलंका की टीम का स्कोर 15 रन पर 5 विकेट था।

रेणुका की घातक गेंदबाजी के बाद स्मृति मंधाना ने आतिशी पारी खेली। उन्होंने शानदार अर्धशतक ठोका। स्मृति मंधाना ने तूफानी बल्लेबाजी खेली और मैदान के चारों और शांत खेले। स्मृति ने 25 गेंदों में 51 रन बनाए जिसमें 6 चौके और 3 जोरदार  छक्के शामिल हैं।

कप्तान हरमनप्रीत कौर ने 11 रनों का योगदान दिया। दोनों ही खिलाड़ी अंत तक आउट नहीं हुईं और टीम इंडिया को जीत दिला दी। जेमिमाह रोड्रिगेज ने 2 रन और शेफाली वर्मा ने 5 रन बनाए।

इससे पहले श्रीलंका ने भारत को जीत के लिए 66 रन का लक्ष्य दिया। हालांकि, रेणुका की शानदार गेंदबाजी की बदौलत भारतीय महिला टीम ने श्रीलंका की पारी को 20 ओवर में 9 विकेट पर 65 रन पर रोक दिया।

श्रीलंका ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय किया। हालांकि, यही फैसला सही साबित नहीं हुआ। भारत के लिए रेणुका सिंह ने तीन जबकि राजेश्वरी गायकवाड़ और स्नेह राणा ने दो-दो विकेट लिए।