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मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के इस्तीफे के बाद कौन बनेंगे केजरीवाल सरकार में मंत्री

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के इस्तीफे की राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद नए मंत्रियों की नियुक्ति होनी है। बता दें मनीष सिसोदिया के पास कई प्रमुख मंत्रालय थे उन्हें दो नए मंत्रियों के बीच बांटने का प्रस्ताव दिया गया है।

मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र दोनो ही भ्रष्टाचार मामले में जेल में बंद है। दोनों मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफा मंगलवार को दिया था। जिसके बाद से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो नए मंत्रियों को शामिल करने का फैसला किया है।

बता दें, कैलाश गहलोत और राजकुमार आनंद को कैबिनेट में शामिल किया जाना है। मनीष सिसोदिया के पास 18 विभाग थे, जिन्हें दो मंत्रियों के बीच विभाजित करने का फैसला किया गया है। और नियमानुसार यह प्रस्ताव उपराज्यपाल को भेज दिया गया है।

कैलाश गहलोत के पास वित्त, गृह, सिंचार्इ, बाढ़ नियंत्रण, पीडब्ल्यूडी, बिजली, शहरी विकास, और जल विभाग होंगे। वहीं राजकुमार आनंद के पास दिल्ली को नए शिक्षा, स्वास्थ्य, सतर्कता, उद्योग, सेवाएं, पर्यटन, कला और संस्कृति, भूमि और भवन निर्माण, श्रम और रोजगार विभाग शामिल है।

आपको बता दें, मनीष सिसोदिया ने अपने त्यागपत्र में कहा है कि उन पर लगे सभी इलजाम झूठे साबित होंगे और उन्हें साजिश रचकर जेल भेजा गया है।

कांग्रेस की तैयारी

पार्टी ज़मीनी मुद्दों पर लड़ेगी आगामी विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव

दीपक बल्यूटिया

कांग्रेस का 85वाँ महाधिवेशन ख़त्म हो गया है। इस महाधिवेशन में रायपुर डिक्लेरेशन के नाम से शीर्ष नेतृत्व ने कई निर्णय लिये हैं। माना जा रहा है कि इससे न केवल कांग्रेस ने 2024 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस ली है, बल्कि उसके भविष्य का रास्ता भी प्रशस्त होगा। सही मायने में भाजपा विपक्षी दलों पर हमलावर है, जिसमें कांग्रेस सबसे ज़्यादा निशाने पर है; क्योंकि भाजपा जानती है कि देश में अगर कोई पार्टी पूरी तरह से भाजपा को टक्कर दे सकती है और कभी भी सत्ता में वापसी कर सकती है, वह सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस है।

भाजपा को अच्छी तरह पता है कि कांग्रेस ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के माध्यम से कन्याकुमारी से लेकर जम्मू-कश्मीर तक पूरे भारत से लोगों का जो समर्थन हासिल किया है, उससे उसकी सीटें 2024 में फिर बढ़ेंगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस अचानक सत्ता में वापसी करेगी। यही वजह है कि भाजपा ने कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को भी रोकने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन राहुल गाँधी के दृढ़ संकल्प और लोगों के समर्थन से भारत जोड़ो यात्रा पूर्ण हुई। अब कांग्रेस राजनीतिक एंगल से अपनी आगे की मुहिम में जुट गयी है, जो भाजपा के लिए बेचैनी का कारण बन रही है।

रायपुर महाधिवेशन में पारित हुए प्रस्ताव कांग्रेस पार्टी के लिए 2023 के विधानसभा चुनावों और 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में महत्त्वपूर्ण साबित होंगे। इससे देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार होगा। कांग्रेस ने रायपुर डिक्लेरेशन में साफ़ कर दिया है कि वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ‘फूट डालो और राज करो’ की राजनीति का मुखर विरोध करती रहेगी। कांग्रेस ने कहा कि पार्टी हमेशा भाजपा के सत्तावादी, सांप्रदायिक और क्रोनी पूँजीवादी हमले के ख़िलाफ़ अपने राजनीतिक मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ेगी। रायपुर अधिवेशन इस मामले में भी महत्त्वपूर्ण रहा कि कांग्रेस के संविधान में छ: बड़े संशोधन किये गये। इन संशोधनों के मुताबिक, कांग्रेस राजनीति में एससी / एसटी, आदिवासी, पिछड़ों महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय को उचित भागीदारी देेगी, जिससे अन्य पार्टियों को भी ऐसा करना पड़ सकता है। कांग्रेस के संशोधनों के मुताबिक, पार्टी कार्यसमिति में 50 फ़ीसदी सीटें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और युवा वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित कर दी गयी हैं। निर्णय का फ़ायदा कांग्रेस को आगामी चुनावों में मिलेगा। आरक्षण के इस महत्त्वपूर्ण निर्णय से देश के सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाले वर्गों, ख़ासतौर पर ओबीसी वर्ग को राजनीतिक तौर पर फ़ायदा होगा और देश की राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के एसटी समुदाय की भी राजनीतिक भागीदारी रायपुर महाधिवेशन में लिये गये इस निर्णय से बढ़ेगी। कांग्रेस ने इस संशोधन प्रस्ताव को ‘सामाजिक न्याय और सामाजिक बदलाव की क्रान्ति’ का नाम दिया है। पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि आने वाले समय में अपने नाम के अनुरूप ‘सामाजिक बदलाव की क्रान्ति’ साबित भी होगा।

राहुल गाँधी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की सफल भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नव ऊर्जा का संचार किया है, तो वहीं युवाओं देश के उन युवाओं, महिलाओं, किसानों समेत हर वर्ग से सीधा संवाद करने का मौक़ा दिया। दरअसल राहुल गाँधी का मक़सद पिछले नौ वर्षों में मिली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की बाँटने वाली राजनीति से युवाओं को मुक्त करते हुए भारत जोड़ो यात्रा और दूसरी योजनाओं के माध्यम से इस नफ़रत की राजनीति पर गहरी चोट करना है। इससे हाल के वर्षों में वोटर बने युवाओं को राहुल गाँधी की मोहब्बत वाली राजनीति ने आकर्षित किया है।

राहुल गाँधी की बढ़ती लोकप्रियता से भाजपा घबरायी हुई है। इसलिए ही राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा जब उत्तर भारत में पहुँच रही थी तो केंद्र सरकार ने कोरोना का शिगूफ़ा छोड़ा था और पूरी सरकारी मशीनरी कैसे भी भारत जोड़ो यात्रा को स्थगित कराने के लिए जी-जान से जुट गयी थी। फिर जैसे ही कांग्रेस का रायपुर महाधिवेशन शुरू होने वाला था, उससे पहले रायपुर में कांग्रेस नेताओं पर ईडी के छापे भाजपा की हताशा को साबित करते हैं।

भाजपा विपक्ष को दबाने के लिए सरकारी संस्थाओं का शुरू से ही दुरुपयोग कर रही है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार केवल कांग्रेस को दबाने के लिए ही सरकार मशीनरी का दुरुपयोग कर रही है, बल्कि उन सभी दलों को परेशान किया जा रहा है, जो भाजपा और संघ की विचारधारा से दूरी रखते हैं। इसी को देखते हुए रायपुर डिक्लेरेशन में कांग्रेस ने साफ़ कर दिया कि वह समान विचारधारा वाले दलों के साथ गठबंधन को तैयार है। कांग्रेस देश में बढ़ रही आर्थिक असमानता, ख़त्म होती सामाजिक समरसता के ख़िलाफ़ समान विचारधारा के दलों से गठबंधन के लिए खुले दिल से विचार कर रही है। अगर राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक आदि प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में ज़ोरदार प्रदर्शन करती है, तो विपक्ष में कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ेगी और 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में विपक्ष की एकता के लिए महत्त्वपूर्ण कारक सिद्ध होगा।

इस बार लम्बे समय बाद सोनिया गाँधी ने अपने विचार रखे, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। सोनियिा गाँधी ने कहा कि कांग्रेस सिर्फ़ राजनीतिक दल नहीं है। हम वह वाहन हैं, जिसके माध्यम से भारत के लोग स्वतंत्रता और समता और न्याय के लिए लड़ते हैं। इसलिए आगे का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन मेरा अनुभव और समृद्ध इतिहास मुझे बताता है कि जीत हमारी ही होगी। माना जा रहा है कि सोनिया गाँधी के भाषण के यह अंश हरेक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करेंगे और उन्हें देश और लोकतंत्र के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी की याद दिलाते रहेंगे।

कांग्रेस भली-भाँति समझ चुकी है कि  संसाधन से परिपूर्ण और छल-कपट में माहिर भाजपा से लड़ाई लडऩा आसान नहीं है। वहीं भाजपा भी है कि लेकिन कांग्रेस देश की एकमात्र राजनीतिक पार्टी है, जो उसे इस लड़ाई को कन्याकुमारी से कश्मीर और पासीघाट से पोरबंदर तक टक्कर दे सकती है। कांग्रेस यह भी जानती है कि भाजपा के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है; लेकिन उसे यह याद रखना होगा कि उसकी विचारधारा हमेशा सकारात्मक रही है। जब आज़ादी से पहले की कांग्रेस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ रही थी, तो अंग्रेजों के पास भी संसाधन की कोई कमी नहीं थी।

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस के पास राहुल गाँधी जैसे लोकप्रिय और जुझारू नेता हैं, जो बिना किसी भय के अपनी बात को बहुत मज़बूत तरीक़े से रखते हैं और देश की जनता उनकी बात को सुनती है। हिंडनबर्ग मामले पर उठे सवालों का जवाब नहीं देना मोदी सरकार की मंशा साफ़ करता है। लेकिन कांग्रेस ने जिन ज़रूरी सवालों को सरकार के सामने रखा है, उससे देश की जनता भी उन सवालों के जवाब माँगने लगी है। आख़िर सरकार की नाक के नीचे इतना बड़ा घोटाला कैसे हो गया? सरकार और अडानी का क्या गठजोड़ है?

अभी तक इन सवालों के जवाब देश को नहीं मिले हैं। इसी के मद्देनज़र कांग्रेस ‘भ्रष्ट यार – बचाए सरकार’ नारे के साथ रैलियाँ शुरू करेगी। इन रैलियों को राहुल गाँधी, मल्लिकार्जुन खडग़े जैसे नेता सम्बोधित करेंगे। इससे साफ़ है कि कांग्रेस अडानी के मुद्दे को ऐसे ही हाथ से नहीं जाने देगी। रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने मुद्दे शीशे की तरह साफ़ करके जनता के सामने रख दिये हैं कि सामाजिक समरसता को कांग्रेस ख़राब नहीं होने देगी। एससी, एसटी, महिला, अल्पसंख्यक और पिछड़ों के उत्थान हेतु काम करती रहेगी। दरअसल कांग्रेस देश के लोगों की खून-पसीने की कमायी को क्रोनी कैपिटलिस्टों के द्वारा लूटने के ख़िलाफ़ लड़ाई की तैयारी कर चुकी है। जनता में अब चर्चा है कि भाजपा से अच्छी तो कांग्रेस ही थी और उसे कांग्रेस ही बचा सकती है। महँगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी, भुखमरी और ऊपर से सत्ता दल की तानाशाही से ऊब चुके लोग कांग्रेस की ओर देख रहे हैं।

कांग्रेस अब ज़मीनी मुद्दों के आधार पर जनता को अपने साथ कर रही है और इन्हीं मुद्दों के आधार पर आगामी विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ेगी, जिसमें लोगों को न्याय, उचित सरकारी व्यवस्था और महँगाई से मुक्ति दिलाने के रास्ते भी निकालने को लेकर काम करेगी।

क्रिकेट की लॉबियाँ

चेतन शर्मा के स्टिंग से सामने आयी बातों की जाँच होनी चाहिए

महिला क्रिकेट में आईपीएल नीलामी में खिलाडिय़ों को अच्छा पैसा मिलने की सुखद ख़बर के बीच ही एक और ख़बर आयी कि बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता चेतन शर्मा का स्टिंग हुआ, जिसमें उन्होंने कई गम्भीर ख़ुलासे किये हैं। स्टिंग से निकले ख़ुलासों का तो पता नहीं क्या होगा? लेकिन ख़ुद चेतन शर्मा को इस कारण से अपनी नौकरी गँवानी पड़ी। स्टिंग से बाहर आयी, जो चीज़ें की इबारत पड़ें, तो लगता है देश की क्रिकेट में दिल्ली और मुंबई लॉबी की जंग और अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए दोनों में मारकाट जारी है। भले इसे बीसीसीआई या खिलाड़ी स्वीकार करने से कतराएँ; लेकिन विराट कोहली की कप्तानी जाने से लेकर अन्य कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जो ज़ाहिर करती हैं कि बाहर से भारतीय क्रिकेट में जितनी ख़ूबसूरत दिखती है, भीतर सब कुछ वैसा नहीं है।

चेतन शर्मा के ख़ुलासों पर उनकी मुख्य चयनकर्ता के पद से छुट्टी तो हो गयी। लेकिन क्या बीसीसीआई स्टिंग में आम जनता के बीच आयी कड़वी बातों की जाँच करवाएगा? बड़े दिग्गजों के अहम और चयन में दबाव जैसी चीज़ें क्रिकेट में हो रही हैं, यह जानकर देश के करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों को गहरी ठेस लगी है। नैतिकता का तक़ाज़ा है कि बीसीसीआई इस पर सच सामने लाये। भारत की पुरुष क्रिकेट टीम दुनिया में दो फॉर्मेट में नंबर-1 की, जबकि टेस्ट के दूसरे नंबर की टीम है। ऐसे में भीतर की सनसनी से भरी जो जानकारियाँ सामने आयी हैं, वो मन खट्टा करती हैं। कह सकते हैं कि भारतीय क्रिकेट के गौरव को धब्बा लगाती हैं और टीम के दुनिया भर में नंबर-1 होने के मज़े को किरकिरा करती हैं।

चेतन शर्मा, पूर्व राष्ट्रीय मुख्य चयनकर्ता

दरअसल क्रिकेट में कप्तानी छीनने या टीम से बाहर करने जैसे स्टिंग के ख़ुलासे षड्यंत्र रचने जैसे आरोप हैं। दरअसल जैसे टी-20 से सीनियर खिलाडिय़ों को आराम उनके स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए नहीं, परन्तु उन्हें टीम से बाहर करने के षड्यंत्र की तरफ़ इशारा करता है। विराट कोहली की कप्तानी एक योजना के तहत छीनी गयी, यह भी एक गम्भीर आरोप है। ज़ाहिर है देश की क्रिकेट में मुंबई और दिल्ली की जो ताक़तवर लॉबियाँ हैं, वह एक दूसरे को कमज़ोर करने में सक्रिय हैं। यह बहुत शर्म की बात है कि देश की टीम में खिलाड़ी का चयन या उसे कप्तानी प्रतिभा से ज़्यादा क्षेत्रों के आधार पर मिलती है, क्योंकि उस क्षेत्र की लॉबी मज़बूत है।

बीसीसीआई में नये अध्यक्ष रोजर बिन्नी, जिन्हें नैतिक स्तर पर बड़ा रुतबा हासिल है; के सामने यह चुनौती है कि देश की क्रिकेट से इस गंदगी की सफ़ाई करें। उन्हें दृढ़ता दिखानी होगी और बीसीसीआई, क्षेत्रों और दिग्गजों की दादागीरी को ख़त्म कर एक साफ़-सुथरा क्रिकेट ढाँचा बनाना होगा। बिन्नी ऐसा कर पाते हैं, तो भारत के क्रिकेट इतिहास में उनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

चेतन के ख़ुलासों ने पूरी दुनिया के क्रिकेट प्रशंसकों को हैरान किया है। उन्होंने अनजाने में गांगुली-कोहली विवाद, टीम में खिलाडिय़ों के चयन और फ़र्ज़ी फिटनेस सर्टिफिकेट जैसी कई सच्चाइयों पर से पर्दा उठा दिया है। चेतन का आरोप अगर सही है, तो भारतीय क्रिकेट में कई खिलाडिय़ों के इंजेक्शन लेकर फिट दिखाने वाली बात भी बहुत गम्भीर है। चेतन के मुताबिक, खिलाडिय़ों की फिटनेस 80-85 फ़ीसदी ही होती है; लेकिन फिर भी वह पेशेवर क्रिकेट खेलने के लिए इंजेक्शन लेते हैं और 100 फ़ीसदी फिट हो जाते हैं। इन इंजेक्शन में जो दवा पड़ती है, वह डोप टेस्ट में पकड़ी नहीं जाती। नक़ली फिटनेस सर्टिफिकेट खिलाड़ी बाहर के डॉक्टरों से लेते हैं। निश्चित भी यह गम्भीर आरोप हैं, जो जाँच की माँग करते हैं।

स्टिंग से जो बातें सामने आयीं, उनमें एक यह है कि टी20 फॉर्मेट में विराट कोहली और रोहित शर्मा को इसलिए आराम दिया गया, क्योंकि इसके ज़रिये उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। नये खिलाडिय़ों को अवसर मिला चाहिए। लेकिन आराम देकर दल से जगह छीनने का यह तरीक़ा सही है? चेतन शर्मा ने यह भी बताया कि रोहित शर्मा उनके बच्चे की तरह हैं और उनसे फोन पर आधा-आधा घंटा बात करते हैं और वे (रोहित) जो भी बात करते हैं, वह इस कमरे से बाहर नहीं जाती। उनके मुताबिक, खिलाड़ी सिलेक्टर्स के टच में रहते हैं और हार्दिक पांड्या उनसे घर पर मिलने आते हैं। पांड्या भारतीय क्रिकेट का भविष्य हैं, इसमें कोई संदेह नहीं और किसी से मिलने में भी कोई बुराई नहीं; लेकिन क्या यह सब चीज़ें शंका पैदा नहीं करतीं?

विराट कोहली की कप्तानी और पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली के साथ हुए विवाद पर भी स्टिंग में काफ़ी कुछ सामने आया है। चेतन के मुताबिक, विराट कोहली को ऐसा लगता था कि उनकी कप्तानी सौरव गांगुली की वजह से गयी; लेकिन ऐसा नहीं था। सिलेक्शन कमेटी की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मीटिंग में गांगुली ने कोहली से कप्तानी के बारे में कहा था कि फ़ैसले को लेकर एक बार फिर सोच लो। मुझे लगता है कि कोहली ने सौरव की बात सुनी नहीं।

चेतन ने विराट-रोहित के बीच मतभेदों को लेकर स्वीकार किया कि उन दोनों के बीच निश्चित तौर पर अहं की टक्कर है; लेकिन कोई दरार नहीं है। हालाँकि चेतन का यह भी कहना है कि दोनों खिलाडिय़ों ने हमेशा एक-दूसरे का साथ दिया है। चेतन ने जसप्रीत बुमराह की टीम में वापसी को लेकर भी सनसनी भरा ख़ुलासा किया और कहा कि बुमराह ने 2022 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ टी20 सीरीज के दौरान अपनी चोट को छिपाया था। फिटनेस सर्टिफिकेट के बावजूद सीरीज के दूसरे मैच से पहले, बुमराह का दर्द बढ़ गया था। चेतन के मुताबिक बुमराह ने इसे सिर्फ़ टी20 विश्व कप 2022 टीम में रहने के लिए छिपाया था।

क्रिकेट की लॉबियाँ

जहाँ तक दिल्ली और मुंबई लॉबी की बात है, यह पहले भी रही है। भारतीय क्रिकेट में लॉबी की चर्चा हमेशा रही है। आरोप यह हैं कि मुंबई लॉबी के पास इतने ताक़तवर लोग हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों से बनी राष्ट्रीय चयन समितियों और ग़ैर-मुंबई बीसीसीआई अध्यक्षों को दबाव में लाती हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारतीय क्रिकेट में महाराष्ट्र (मुंबई) लॉबी हमेशा से ताक़तवर रही है। यह कहा जाता है कि विराट कोहली ने जब टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों की कप्तानी छोडऩे का फ़ैसला किया, तो वास्तव में इसके पीछे मुंबई की ताक़तवर लॉबी थी, जो कप्तानी रोहित शर्मा के हाथ में देना चाहती थी।

हाल के दशकों में गौतम गम्भीर और वीरेंद्र सहवाग और उनके बाद विराट कोहली दिल्ली के मज़बूत चेहरे रहे हैं, जिन्होंने क्रिकेट में दबदबा क़ायम किया। उनकी ताक़त दीवानगर भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रहे अरुण जेटली थे। उनके जाने के बाद दिल्ली के खिलाडिय़ों को मुश्किलें आयीं। जेटली के निधन पर वीरेंद्र सहवाग ने ट्वीट में लिखा था कि जेटली के सार्वजनिक जीवन में योगदान के अलावा एक बड़ा योगदान यह भी था कि दिल्ली क्रिकेट के कई खिलाड़ी भारत के लिए खेल सके। मुंबई में सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज रहे हैं और अब रोहित शर्मा हैं। अब दिल्ली बनाम मुंबई लॉबी की बात करें, तो लगता है कि विराट कोहली को इसी लॉबी ने निशाना बनाया। तो क्या विराट कोहली के कप्तानी छोडऩे (या दबाव से हटने के लिए मजबूर करने) के पीछे भी लॉबीवाद ही है? लगता तो यही है।

चलते-चलते

महिला आईपीएल 2 मार्च से शुरू हो रहा है। इसके लिए महिला खिलाडिय़ों की नीलामी से ज़ाहिर होता है कि भले वे पुरुषों के मुक़ाबले कम पैसों में बिकी हों, उन्हें आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए यह एक अच्छी शुरुआत है। मुंबई में हुई इस ऑक्शन में 448 खिलाडिय़ों में से 87 पर बोली लगी, जिनमें से 57 भारतीय हैं। पाँच फ्रेंचाइजी, मुंबई इंडियंस, दिल्ली कैपिटल्स, यूपी वॉरियर्स, गुजरात जाएंट्स और रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने मिलकर 59.50 करोड़ रुपये ख़र्च किये। चार खिलाडिय़ों को फ्रेंचाइजी ने दो करोड़ से तीन करोड़ के बीच और तीन खिलाडिय़ों को तीन करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि में ख़रीदा। भारत की डैशिंग बैटर स्मृति मंधाना पर ऑक्शन में सबसे महँगी 3.40 करोड़ रुपये की बोली लगी। इंग्लैंड की नताली स्कीवर और ऑस्ट्रेलिया की एश्ले गार्डनर 3.20 करोड़, दीप्ति शर्मा 2.60, जेमिमा रॉड्रिग्स 2.20, शेफाली वर्मा और बेथ मूनी 2-2 और रेणुका ठाकुर को उनके फ्रेंचाइजी ने 1.60 करोड़ में ख़रीदा।

खेलों में लड़कियों की कमी

हाल ही में राजस्थान के बाड़मेर के कानासर गाँव की मूमल मेहर नाम की 15 वर्ष की किशोरी रेत के मैदान पर चौके-छक्के जड़ते दिख रही है। इस बच्ची की मदद के लिए कई हाथ आगे बढ़े हैं। आँकड़े कहते हैं कि भारत इस समय एक युवा देश है अर्थात् भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम है। इस 50 प्रतिशत आबादी में क़रीब 48 प्रतिशत महिलाएँ हैं। प्राइमरी, मिडिल व हायर सेकेंडरी स्कूलों में पढऩे वाली लड़कियों के झुण्ड स्कूलों के बाहर अक्सर नज़र आते हैं; लेकिन क्या कारण है कि अधिकांश स्कूलों के खेल के मैदानों में यह दृश्य नदारद है।

गली, मोहल्लों, पार्कों में खेलने वालों की आवाज़ ही बता देती है कि यहाँ पर भी लडक़ों की ही क़ब्ज़ा है। खेल की सामग्री बेचने वाले दुकानों पर भी अक्सर यही नज़ारा देखने को मिल जाता है। ऐसे बहुत-से सवालों का समाधान हम क्या तलाशते हैं? तलाशते हैं, तो उनके साथ कितनी दूर तक चलते हैं? खेल का कोई लिंग नहीं होता; पर हक़ीक़त कुछ और ही है। खेल में लड़कियों, महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है, उन्हें पुरुष खिलाडिय़ों से कमतर आँकने की अवधारणा साफ़ दिखायी देती है। इस तस्वीर का एक अहम पहलू यह भी है कि इस अवधारणा को बदलने के प्रयास जारी हैं। पर इसके बावजूद इसका वाजूद साफ़ दिखायी देता है।

हाल ही में देश में 13 फरवरी को महिला प्रीमियर लीग (डब्लयूपीएल) की नीलामी का आयोजन किया गया। 406 महिलाओं में से 87 महिला खिलाडिय़ों के साथ अनुबंध किये गये। इन 87 में से 30 विदेशी और 57 भारतीय हैं। इस महिला प्रीमियर लीग ने 87 महिला खिलाडिय़ों को लखपति-करोड़पति बना दिया है। अब चर्चा इस ओर मुड़ गयी है कि इस लीग ने महिला खिलाडिय़ों के भीतर एक नयी ऊर्जा का संचार कर दिया है। अब देश की लड़कियाँ खेल को एक करियर के तौर पर देखने इससे इन्कार नहीं किया जा सकता; लेकिन इसके समानांतर यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या अन्य खेलों की भी तस्वीर बदलेगी? दूर-दराज़ इलाक़ों में लड़कियों के लिए खेल की ज़रूरी सुविधाओं से लैस ढाँचा विकसित किया जाएगा? क्या उसका विस्तार होगा? दिल्ली के एक पार्क में धूप सेंकती एक महिला से जब सवाल पूछा गया कि क्या उन्हें महिला प्रीमियर लीग के बारे में पता है? तो जबाव नहीं मिला। क्या उन्हें किसी महिला खिलाड़ी का नाम याद है? नहीं। बताया कि वह विराट कोहली को पहचानती है।

लड़कियों को खेल के मैदान में खेलने के लिए भेजने पर उन्होंने बताया कि उनकी नज़र में लड़कियों की सुरक्षा एक बहुत बड़ी समस्या है। लड़कियों को पढऩे भेजने के लिए तो जोखिम उठाते ही हैं, खेल के लिए नहीं उठा सकते। बहरहाल लड़कियों की सुरक्षा देश में एक बहुत बड़ा मुद्दा है। यहाँ पर प्रसंगवश पापुआ न्यू गिनी देश का ज़िक्र किया जा रहा है। इस देश की महिला फुटबॉल टीम को खेल की चुनौतियों के साथ ही सामाजिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। इस टीम के कोच स्पेंसर प्रायर ने मीडिया को बताया कि देश की राजधानी पोर्ट मोर्सबी महिलाओं के लिए ख़तरनाक है। यहाँ अर्केी महिला के साथ आपराधिक घटना आम बात है। ऐसे में सपोर्टिंग स्टाफ रात में किसी भी महिला को अकेले नहीं निकलने देता। लेकिन इन सबके बावजूद यहाँ की महिला फुटबॉल टीम मज़बूती से खेलती हैं और अपने दम पर महिला फीफा वल्र्ड कप के लिए क्वालीफाई की तैयार कर रही हैं।

इसमें कोई दो-राय नहीं कि खेल एक सामाजिक मंच भी है। यह इंसान के अंदर खेल भावना, अनुशासन, दूसरों से मेल-मिलाप, आत्म विश्वास सरीखी कई भावनाओं को विकसित करने में मददगार साबित हो सकता है। आगे बढऩे के कई मौक़े मुहैया कराता है। और यहीं पर लड़कियाँ पीछे छूटती साफ़ नज़र आती हैं। बहुत साल पहले चक दे इंडिया फ़िल्म महिला हॉकी पर बनी थी। इस फ़िल्म के लेखक ने इस मुद्दे को उठाने की वजह यह बतायी कि राष्ट्रीय महिला हॉकी की उपलब्धि को मीडिया ने अख़बार के एक कोने में जगह दी।

इस फ़िल्म को सराहा गया और महिला खिलाड़ी खेल संघों में भी कमतर आँकी जाती हैं, इस नज़रिये को बेबाक रखा गया। महिला खिलाडिय़ों का संघर्ष पुरुषों के संघर्ष से मिलता भी है; लेकिन खेल के मैदान तक पहुँचने व उन पर लम्बे समय तक टिके रहने की जद्दोजहद पुरुषों से अलग भी है, जिन्हें एड्रस करने व उनके ठोस समाधान की दिशा में तेज़ी से आगे बढऩे की दरकार है। महिला प्रीमियर लीग में महिलाओं को अनुबंधित करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भारतीय महिला क्रिकेट की पूर्व कप्तान मिताली राज ने कहा कि पहले महिला क्रिकेटर जल्द ही मैदान को इसलिए अलविदा कह जाती थीं; क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके पास अवसरों की कमी है। मगर अब महिला प्रीमियर लीग उन्हें अपना करियर आगे ले जाने के लिए प्रेरित करेगी।’

देखा जाए, तो इंडियन प्रीमियर लीग, जिसकी शुरुआत आज से 15 साल पहले सन् 2008 में हुई थी; उसने क्रिकेट का चेहरा ही नहीं बल्कि क्रिकेट को लेकर दर्शकों के जुनून को एक अलग स्तर तक पहुँचा दिया है। दूर-दराज़ से खिलाड़ी आकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा से पहचान बना रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि अगर आईपीएल नहीं होता, तो भारत शायद तेज़ गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह को नहीं खोज पाता। इसी तरह हार्दिक पांड्या, कुलदीप यादव, उमरान मलिक और अक्षर पटेल को भी अपनी प्रतिभा को तेज़ी से निखारने का मौक़ा आईपीएल ने ही दिया।

आईपीएल ने उन्हें विश्व के सबसे बढिय़ा क्रिकेटरों के साथ खेलने का मौक़ा दिया और जो वो सामान्य तौर पर 10 साल में सीखते, वह उन्होंने पाँच साल में ही सीख लिया। यानी अपने खेल में सुधार करते हुए आगे बढ़ते चले गये और यह सिलसिला जारी है। प्रतिभा-पूल बनाने के लिए फ्रेंचाइजी टीम भी बहुत मेहनत करती है।

अब देखना यह है कि महिला क्रिकेटरों की तलाश व उन्हें निखारने में ये टीमें अपने बजट का कितना ख़र्च करती हैं? 13 फरवरी को महिला प्रीमियर लीग में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने भारत की स्टार सलामी बल्लेबाज़ स्मृति मंधाना के साथ 3.4 करोड़ रुपये में सबसे महँगा अनुबंध किया। महिला क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। टीम खेल में सर्वाधिक वेतन अक्सर फुटबॉल में मिलता है, जहाँ सबसे अधिक कमायी करने वाली आस्ट्रेलियाई समांथा केर इंग्लैंड में महिला सुपर लीग में चेल्सी महिला के लिए फुटबॉल खेलती हैं। उनकी सालाना कमायी 4,10,000 डॉलर से 5,06,000 डॉलर के बीच रहती है, भारतीय मुद्रा के अनुसार यह राशि चार करोड़ है।

स्मृति मंधाना के बाद देश की दूसरी सबसे महँगी बिकने वाली खिलाड़ी आलराउंडर दीप्ति शर्मा है, जिनके साथ यूपी वारियर्स ने 2.6 करोड़ रुपये का अनुबंध किया है। इस महिला प्रमीयिर लीग में पाँच फ्रेंचाइजी- दिल्ली कैपिटल्स, रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर, गुजरात जाएंट्स, मुंबई इंडियस और यूपी वारियर्स ने हिस्सा लिया और 87 महिला खिलाडिय़ों के साथ 59.5 करोड़ रुपये के अनुबंध किये। महिला प्रमीयिर लीग के तहत बनाये गये नियम के मुताबिक, प्रतयेक फ्रेंचाइजी खिलाडिय़ों पर 12 करोड़ ही ख़र्च कर सकती है। लेकिन आईपीएल का पिछले साल 2023 की नीलामी का बजट 90-95 करोड़ था। खेलों में निवेश करने वाले निजी प्लेयर यानी निवेशक खेलों की सांस्कृतिक, सामाजिक भावना से अधिक महत्त्व खेलों से होने वाली कमायी, मुनाफ़े को देते हैं। खेल में महिलाओं को बराबरी के मौक़े मुहैया कराना एक बहुत बड़ी चुनौती है। इसी के मद्देनज़र आईसीसी और यूनिसेफ ने एक वैश्विक भागीदारी की है। यूनिसेफ इंडिया के रिसोर्स मोबाइलाजेशन एंड पार्टनरशिप चीफ रिचर्ड बीगटन ने बीते दिनों दिल्ली में मीडिया को बताया कि ‘इस भागीदारी के तहत बीए चैंपियन फॉर गल्र्स यानी एक करने वाले संदेश के ज़रिये एक ऐसी दुनिया बनाने की बात कही जा रही है, जहाँ लड़कियाँ खेल सकती हैं और अपनी क्षमताओं को पूरा कर सकती हैं। खेल एक ऐसा शक्तिशाली उपकरण है, जो सामाजिक बदलाव ला सकता है। हमारा मक़सद ऐसे प्रयास करना है, जो दुनिया भर के बच्चों व किशोरों की ज़िन्दगी पर सकारात्मक प्रभाव ला सकते हैं।’

राजस्थान में महिला जन अधिकार समिति नामक गैर-सरकारी संगठन भी खेल को लड़कियों की ज़िन्दगी में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। यह संगठन फुटबॉल खेल के ज़रिये लड़कियों को सशक्त करता है, ताकि वे अपने बाल विवाह को न कह सकें। लड़कियाँ, किशोरियाँ स्कूल, कॉलेज में अधिक समय तक पढ़ाई करेंगी, खेल खेलेंगी, पेशेवर खिलाड़ी बनने के लिए ख़ास प्रषिक्षण लेंगी तो अपने लिए एक ठोस आधार भी तैयार करने की सम्भावना बढ़ती चली जाएगी। खेलतंत्र जो पुरुषों की ओर झुका हुआ है, उसे सन्तुलित करने की दरकार है।

घरेलू गैस का सिलेंडर 50 रुपए महंगा, लोगों को महंगाई में एक और झटका  

जबरदस्त महंगाई के बीच सरकार ने गरीबों पर एक और मार मारी है। घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) सिलेंडर की कीमत सीधे 50 रुपये बढ़ा दी गयी है। कीमत बढ़ने के बाद एलपीजी घरेलू सिलेंडर (14.2 किलो बजन) अब राजधानी दिल्ली में बढ़कर 1103 रुपये हो गई है।

कामर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में भी बढ़ोतरी की गई है जिसकी कीमत  350.50 रुपये की बढ़ोतरी के बाद  2119.50 रुपये हो गई है। जाहिर है आम और गरीब आदमी पर इसकी सीधी मार पड़ी है।  

इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने घरेलू रसोई गैस सिलेंडर और वाणिज्यिक गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।

उन्होंने सरकार से सवाल करते हुए पूछा – ‘लूट के फरमान कब तक जारी रहेंगे? घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दाम 50 रुपये बढ़े, वाणिज्यिक गैस सिलेंडर 350 रुपये महंगे हुए। जनता पूछ रही है – अब कैसे बनेंगे होली के पकवान, कब तक जारी रहेंगे लूट के ये फरमान ?’

सिलेंडर की कीमत बढ़ने से लोगों पर अब और बोझ सरकार ने डाल दिया है। कुछ महीने पहले ही घरेलू रसोई गैस सिलेंडर 150 रुपये महंगा हुआ था। कामर्शियल गैस सिलेंडर के दाम पिछली बार 25 रुपये बढ़े थे।

निर्जीव वस्तुओं के उपासक

आजकल हर किसी को सबसे बड़ा डर अपने स्मार्टफोन को खो देने का रहता है। बाक़ी कुछ भी खो जाए, उतनी परवाह नहीं रहती। क्या वजह है कि अधिकतर लोग फोन में पूरी तरह डूब गये हैं? बड़ी हैरानी होती है कि एक निर्जीव वस्तु ने लोगों को अपने वश में कर रखा है। बहुत लोगों को मोबाइल के आगे सगे रिश्ते भी अब फीके लगने लगे हैं और इससे ऐसे रिश्ते ईजाद होते जा रहे हैं, जिनमें अधिकतर किसी काम के नहीं हैं।

फोन की तरह ही लोगों को संसार और सांसारिक वस्तुओं से मोह है, जो कि परमात्मा से होना चाहिए। यही वजह है कि लोगों को धर्म के तथाकथित ठेकेदार अपने लाभ के लिए निर्जीव वस्तुओं, मरी हुई बातों, कपोल कथाओं में उलझाकर, स्वरचित अचम्भों का कायल बनाकर, इनका डर दिखाकर निर्जीव वस्तुओं का उपासक बनाने में सफल हैं। कह सकते हैं कि एक तरह का $गुलाम बना लिया है। आज सभी धर्मों में यही हो रहा है। 99.99 फ़ीसदी लोग निर्जीव और बेकार वस्तुओं की उपासना कर रहे हैं। जबकि परमात्मा की कृपा से ही सब हैं और जी रहे हैं। लेकिन उसे बाँटने के भ्रम में हमने निर्जीव वस्तुओं को परमात्मा समझ लिया और सारहीन, तथ्यहीन, तर्कहीन, मनगढ़ंत, अंधश्रद्धा के पीछे पड़े हुए हैं। हमारी भौतिक चाहत ने लालच और शारीरिक सुखों की आकांक्षा को इतना बढ़ा दिया है कि आत्मा की भूख को हमने अँधेरी गुफा में उसी तरह बन्द कर दिया है, जिस तरह किसी क्रूर और अज्ञानी व्यक्ति ने एक छोटी सी सत्ता मिलने पर किसी पुण्यात्मा को किसी पाप के घड़े में बन्द कर दिया हो। यही कारण है कि हम लगातार सत्य से दूर होते जा रहे हैं, जिसके चलते झूठी और दिखावे की ज़िन्दगी जी रहे हैं। धर्म के रास्ते से भटके हुए ये लोग भूल चुके हैं कि वे हैं कौन?

भटके हुए लोगों की समस्या यह है कि वे अपनी जड़ों से कटकर भी हरे-भरे अर्थात् परम् सुख और परम् सत्ता को प्राप्त करना चाहते हैं, वो भी सहज ही और मुफ़्त में। सब उडऩा चाहते हैं। लेकिन अपने दम पर नहीं, दूसरों के दम पर। दूसरे के ज्ञान और अज्ञान को सुनकर ज्ञानी होना चाहते हैं। और दूसरे भी वो, जिन्हें ख़ुद नहीं पता कि वे कौन हैं? सब मूढ़ता की कीचड़ में पड़े हैं और कह रहे हैं कि देखो! हम अमृत के सरोवर में नहा रहे हैं। जबकि उन्हें अपने मूल का ज्ञान ही नहीं है। वे कौन हैं? उनका परमात्मा से क्या रिश्ता है? उससे मिलने का तरीक़ा क्या है? कुछ नहीं मालूम। बस, उन्हें जो दिख ही नहीं रहा है, वे उसे दूसरों को दिखाने में लगे हैं। उनसे कोई यह पूछे कि अगर वे वास्तव में परमात्मा के इतने निकट हैं, तो फिर सांसारिक मोह से अभी तक मुक्त क्यों नहीं हुए? उन्हें अन्न, वस्त्र और धन की क्या आवश्यकता है? उन्हें तरह-तरह के चढ़ावे क्यों चाहिए?

सच तो यह है कि उन्हें भी ऊपरी वस्तुओं से आनन्द मिल रहा है। ऊपरी ज्ञान उन्हें आनंद दे रहा है। लोगों को उन भरोसा हो जाता है, इसलिए वही सच लगता है, जो वे कहते हैं। सोचिए, फूल की सुगंध अगर लेनी हो, तो फूलों के बाग़ में जाना ही पड़ेगा। किसी और से फूलों की सुगंध के बारे में सुनकर कोई कैसे सुगंध का आनंद ले सकता है। सोचने का विषय है, जब कोई किसी सुगंध का स्वाद, नहीं बता सकता। क्योंकि वह नाक का स्वाद है। उसके आनंद का सही स्वरूप से किसी और को अवगत नहीं करा सकता। क्योंकि उसका स्वरूप अहसास में है। तो फिर उस परमपिता परमात्मा के बारे में किसी को क्या बता सकता है, जिसकी न क्षमता का कोई पार है और न उसकी संरचना को कोई आज तक समझ सका है? उसकी भक्ति का पूरा स्वाद तो बड़े-बड़े भक्तों को नहीं मिल पाता। उसका अहसास करने वाला मौन हो जाता है। एक अनंत आनंदानुभूति में लीन हो जाता है। उसे न भूख लगती है और प्यास। उसे न जग की चिन्ता रहती है और न अपनी। उसे न भूख लगती है और न प्यास। वह तो उस अनंत की अनवरत साधना में चला जाता है। उसे न दिन का एहसास रहता है और न रात का। वह सुख और दु:ख से परे हो जाता है। आंतरिक आनन्द से वंचित ये तथाकथित लोग, जो धर्मों के ठेकेदार बने हुए हैं; ईश्वर के अलग-अलग नामों को गढक़र-पढक़र उन पर झगड़ा करते हैं। हास्यास्पद यह है कि ईश्वर की रक्षा का दम्भ भरते हैं। जो ख़ुद अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं, वे इतने विशाल ब्रहाण्ड की रचना करने वाले परमात्मा की रक्षा का दम्भ भरते हैं, जिसने दिया है, जिसके एक छोटे से ग्रह पर सब एक कीड़े की भाँति रेंग रहे हैं। जहाँ रहते हैं, वहीं का पूरा ज्ञान नहीं है। लेकिन पूरे ब्रह्माण्ड का ज्ञान बघारते फिर रहे हैं। और सब का सब निरा झूठ है। निरी कल्पना है। किसी-किसी की बातों में लेश मात्र का सत्य है। लेकिन सब ढोंग कर रहे हैं। हर रोज़ नये-नये स्वाँग भर रहे हैं। और इसे ही धर्म समझ रहे हैं। इसे ही भक्ति समझ रहे हैं। इसे ही अपना ज्ञान समझ रहे हैं। कितने ग़ज़ब की बात है कि जिनका अपनी एक साँस तक पर वश नहीं है, वे दूसरों को धमकियाँ दे रहे हैं। जो कुछ भी नहीं हैं, उनका अहंकार चरम पर है। यह समझने की बात है, कुछ लोग दुनिया भर के लोगों को धर्म के नाम पर भटका रहे हैं। क्या यह अपराध नहीं है?

यूपी के कानपुर में छह साल की बालिका का शव खेत में मिला, तीन हिरासत में  

उत्तर प्रदेश में अपराध बढ़ने का सिलसिला थम नहीं रहा है। अब राज्य के कानपुर के सजेती थाना क्षेत्र में अनुसूचित जाति की एक 6 साल की बालिका का शव एक सुनसान खेत पड़ा मिला है। पुलिस को प्रथम दृष्टया लगता है कि हत्या से पहले बालिका का यौन उत्पीड़न हुआ है। फिलहाल तीन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक बालिका का शव मंगलवार को खेत में मिला। पुलिस ने बताया कि तुरंत कार्रवाई करते हुए चंद्रभान, उसकी पत्नी सुधा और भाई सुल्तान सहित तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है।

जानकारी के मुताबिक बालिका 25 फरवरी को यह कहकर घर से निकली थी कि वह उसी गांव में अपने चाचा के घर जा रही है, हालांकि, बाद में लापता हो गई। काफी खोजबीन करने के बाद पीड़ित परिवार ने उसी दिन देर रात सजेती पुलिस थाने में चंद्रभान, उसकी पत्नी सुधा, भाई सुल्तान और पिता राम प्रकाश समेत चार लोगों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कराया।

पुलिस के मुताबिक बालिका का शव मंगलवार शाम उसके घर से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर एक सुनसान खेत में मिला था। पुलिस के मुताबिक उसने  मौत के सही कारण का पता लगाने के अलावा पोस्टमार्टम में बलात्कार के पहलू से भी जांच करने का फैसला किया है। पुलिस बालिका को मारने से पहले उससे दुष्कर्म किए जाने की आशंका से इनकार नहीं कर रही।

ट्रिम दाढ़ी के साथ ब्रिटेन के दौरे पर गए राहुल गांधी, कैम्ब्रिज में भी देंगे लेक्चर  

भारत जोड़ो यात्रा के बाद देश भर में चर्चा के केंद्र चल रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ब्रिटेन के दौरे पर पहुंचे हैं। ट्रिम दाढ़ी के साथ नए लुक में दिख रहे राहुल गांधी  कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में लेक्चर देंगे। राहुल, जो खुद  कैम्ब्रिज के बिजनेस स्कूल के छात्र रह चुके हैं, छात्रों को ‘लर्निंग टू लिसन इन द 21वीं सेंचुरी’ विषय पर संबोधित करेंगे।

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान बढ़ी उनकी दाढ़ी नए फोटो में कम दिख रही है और बाल भी उन्होंने ट्रिम किये हैं। राहुल इन दिनों ब्रिटेन के दौरे पर हैं और उनको कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भी लेक्चर देना है। कुछ  वीडियो में नए लुक में कांग्रेस नेता काफी आकर्षक दिख रहे हैं।

राहुल गांधी ‘लर्निंग टू लिसन इन द 21वीं सेंचुरी’ विषय पर छात्रों को संबोधित करेंगे।  इस दौरान वह भारत और चीन के संबंधों पर भी बात करेंगे।  

याद रहे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनकी दाढ़ी बढ़ने के बाद उन्हें लेकर भाजपा के नेता और असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्व सरमा ने उनकी तुलना ईराक के दिवंगत नेता सद्दाम हुसैन से कर दी थी जिसकी काफी निंदा हुई थी। उनके अलावा कई भाजपा नेताओं ने उनके उस लुक का मजाक उड़ाया था, हालांकि, यात्रा में राहुल गांधी को जनता की तरफ से जबरदस्त समर्थन मिला था।

पूरी यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने न तो शेव की थी और न ही बाल कटवाए थे। वह काफी अलग दिख रहे थे। हालांकि, अब राहुल गांधी अब एक बार फिर नए लुक में सामने आए हैं। टाई – सूट में वे काफी अलग दिख रहे हैं। राहुल ने अपनी दाढ़ी को ट्रिम करा लिया है और उनकी फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं।

राहुल गांधी का ब्रिटेन में सात दिन रहने का कार्यक्रम है। गांधी के दौरे की शुरुआत कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में लेक्चर से होगी। यहाँ यह दिलचस्प है कि राहुल गांधी कैम्ब्रिज के बिजनेस स्कूल के छात्र रह चुके हैं।

एमसीए ने दिया सचिन तेंदुलकर को उनके 50वां जन्मदिन का तोहफा, वानखेड़े स्टेडियम में लगेगी प्रतिमा

सचिन तेंदुलकर को उनके 50वें जन्मदिन पर मुंबई के वानखेड़े क्रिकेट स्टेडियम में आदमकद प्रतिमा लगाए जाने का तोहफा मिलने जा रहा है। सचिन तेंदुलकर इसी मैदान से उन्होंने 2013 में अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच वेस्टइंडीज के खिलाफ खेला था। हालांकि वानखेड़े स्टेडियम में सचिन के नाम से एक स्टैंड पहले से ही है।

प्रतिमा का अनावरण इस साल भारत में होने वाले वनडे वर्ल्ड कप के दौरान किया जाएगा। अपनी पत्नी अंजलि तेंदुलकर के साथ सचिन वानखेड़े स्टेडियम पहुंचे और उनके साथ मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोल काले भी थे।

सचिन तेंदुलकर ने वानखेड़े स्टेडियम में अपनी प्रतिमा लगाए जाने पर कहा कि, “मुझे बहुत खुशी हो रही है। यहीं से मेरा करियर शुरू हुआ था। ये मेरे ले बहुत खास जगह है। इस जगह से मेरी बहुत ही खास चीजें जुड़ी हैं। इस जगह पर मेरी प्रतिमा बनेगी, ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात है।”

वहीं मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोल काले ने कहा कि, “मुझे उम्मीद है कि इस साल अक्टूबर-नवंबर में भारत में होने वाले एकदिवसीय विश्व कप के दौरान प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा। सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट में योगदान को पूरी दुनिया जानती है। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट का गौरव और भारत रत्न हैं। ”

आपको बता दें, सचिन तेंदुलकर ने अपना पहला और आखिरी विश्व कप खिताब वानखेड़े स्टेडियम में ही जीता था। साथ ही आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच भी इसी मैदान पर खेला था। सचिन तेंदुलकर के अलावा सुनील गावस्कर के नाम भी एक स्टैंड है किंतु यह पहली बार है जब किसी खिलाड़ी का स्टैच्यू लगाया जाएगा।

एक बार फिर दुनिया के सबसे अमीर शख्स बने एलन मस्क, कुल संपत्ति 187.1 अरब डॉलर

टेस्ला के सीईओ एलन मस्क एक बार फिर से दुनिया के सबसे अमीर शख्स बन गए है। एलन मस्क ने 187 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ फ्रांस की लग्जरी ब्रांड लुइस वित्तों के सीईओ बर्नार्ड अरनॉल्ट को पीछे छोड़कर यह स्थान दोबारा हासिल किया है।

ट्वीटर डील और टेस्ला के शेयरों में गिरावट के चलते एलन मस्क की नेटवर्थ में काफी कमी आई थी। जिसके बाद वे दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में फिसलकर दूसरे नंबर पर पहुंच गए थे।

ताजा आंकड़ों के अनुसार एलन मस्क की कुल संपत्ति 187.1 अरब डॉलर है। और लुइस वितो के सीईओ बर्नार्ड अरनॉल्ट की संपत्ति 185.3 अरब डॉलर आंकी गयी है।

आपको बता दें, 44 अरब डॉलर में ट्वीटर खरीदने के एक सप्ताह बाद से ही कंपनी के राजस्व में भारी गिरावट देखने को मिली थी, और इसके लिए एलन मस्क ने विज्ञापनदाताओं पर दबाव डालने वाले कार्यकर्ता समूहों को जिम्मेदार ठहराया था।

इन सब के बाद मस्क ने अपनी कंपनी में आधे से ज्यादा कर्मचारियों को कम कर दिया था और माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर ब्लू सब्सक्रिप्शन सेवा शुरू की थी इतना ही नहीं उन्होंने सैन फ्रांसिस्को मुख्यालय से कुछ यादगार वस्तुओं की नीलामी भी की थी।