Home Blog Page 386

गौरक्षा की आड़ में हैवानियत

हरियाणा के ज़िला भिवानी के गाँव बडसर के पास सुनसान क्षेत्र में दो लोगों को ज़िन्दा जला देने की वारदात सभ्य समाज को कंलकित करने वाली है। जब भीड़ या संगठन पुलिस और न्यायालय को दरकिनार कर इंसाफ़ करने लगे, तो उसे जंगल राज कहा जाएगा। संरक्षण में ऐसी वारदात होना शासन-प्रशासन पर कालिख जैसा है। दिल दहलाने वाली इस घटना को समुदाय विशेष से जोडक़र नहीं, बल्कि मानवता के प्रति अमानवीय कृत्य के तौर पर लिया जाना चाहिए। मृतकों की पहचान नासिर (28) और जुनैद (38) के तौर पर होनी चाहिए। चूँकि शव इतनी बुरी तरह से जल गये कि अब शिना$ख्त डीएनए जाँच से स्पष्ट होगी।

15 जनवरी को जुनैद के भाई इस्माइल ने थाने में दोनों के अपहरण की प्राथमिकी दर्ज करायी थी। अगले दिन 16 फरवरी को हरियाणा के ज़िला भिवानी में लोहारू के पास गाँव बडसर में बोलरे जीप सुनसान क्षेत्र में जली हुई मिली। वाहन में दो कंकाल मिले। गाड़ी की पहचान के आधार पर दोनों को अभी तक नासिर और जुनैद ही माना गया है। राजस्थान सरकार ने दोनों के क़रीबी परिजनों को 15-15 लाख रुपये की आर्थिक मदद देते हुए इंसाफ़ दिलाने का भरोसा जताया है। चूँकि वारदात स्थल पड़ोसी राज्य हरियाणा में है, इसलिए राजस्थान पुलिस को अब तक वांछित सफलता नहीं मिल सकी है।

जघन्य दोहरा हत्याकांड अब मज़हबी रंग पकड़ चुका है। मृतकों के परिजनों को इंसाफ़ दिलाने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य संगठन एकजुट हो गये वहीं आरोपियों क बचाव में कई धार्मिक हिंदू संगठन लामबंद होने लगे हैं। घटना को राजनीतिक रंग दिया जाने लगा है। अब मामला दो राज्यों, दो सरकारों और दोनों की पुलिस से जुड़ गया है। घटना में हरियाणा पुलिस की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। कुछ ऐसी बातें सामने आयी हैं कि गौरक्षा के सदस्य आरोपियों को फ़िरोज़पुर झिरका पुलिस के पास ले गये; लेकिन बिना कोई मामला दर्ज किये उन्हें वहाँ से भेज दिया गया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुफ़्ती सलीम के मुताबिक, अगर हरियाणा पुलिस कार्रवाई करती तो नासिर और जुनैद की जान बच सकती थी। दोनों की बुरी तरह से पिटाई की गयी थी, उनकी हालत बेहद ख़राब थी। पुलिस चाहती तो उन्हें अस्पताल भिजवा सकती थी; लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि हमलावर गौरक्षा के सक्रिय सदस्य हैं।

जानकारी के मुताबिक, नासिर और जुनैद के वाहन को गौरक्षा दल के सदस्यों ने ट्रेस कर उन्हें पकड़ लिया, जबकि उस दौरान दोनों किसी अन्य काम से आये हुए थे। चूँकि दोनों पहले भी ऐसे मामलों में कई बार पकड़े जा चुके थे, इसलिए उन्हें सबक़ सिखाने के लिए इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया गया। गौतस्कर का इलाज करते हुए शीर्षक से वीडियो सोशल मीडिया पर डाले गये। गौररक्षा के नाम पर इस तरह की वारदात हिंदू समाज के लिए अशोभनीय है। किसी धर्म में ऐसा मान्य नहीं है फिर क्यों किसी को पहले बुरी तरह से पीटा गया और फिर गाड़़ी के अंदर बाँधकर उन्हें जला दिया गया। नासिर और जुनैद पर गौवंश तस्करी के आरोप हैं; लेकिन घटना के समय वह ऐसा कुछ नहीं कर रहे थे, फिर उन्हें निशाना क्यों बनाया गया?

हरियाणा में सरकार ने वर्ष 2021 में राज्य स्तरीय विशेष गौसंरक्षण कार्यबल की अधिसूचना जारी की थी। राज्य के लगभग हर ज़िले में इसकी इकाइयाँ कार्यरत है। 10 से 15,000 सदस्य गौरक्षा दल, बजरंग दल, गौपुत्र सेना और अन्य संगठनों से सीधे जुड़े हुए हैं। इनका नेटवर्क कहीं-कहीं पुलिस से भी ज़्यादा मज़बूत है। सदस्य अपने तौर पर ऐसे वाहनों का पीछा कर आरोपियों को क़ाबू कर लेते हैं। पुलिस इसके बाद में ही कार्रवार्ई करती है। इनकी निशानदेही और पकड़ के बाद पुलिस ने ऐसे कई मामले दर्ज किये।

गहन सक्रियता के चलते हरियाणा में गौवंश की तस्करी करने वालों में ख़ौफ़ पैदा हुआ। कुछ प्रमुख सदस्य सुरक्षा के नाम पर गौतस्करी रोकने के लिए लाइसेंसी हथियार भी हासिल कर चुके हैं। कई घटनाओं में गौवंश तस्करों ने पीछा करने पर सदस्यों पर जानलेवा हमले भी किये हैं। बावजूद इसके गौरक्षकों के संगठन गुडग़ाँव और मेवात क्षेत्र में मज़बूती से काम कर रहे हैं। लेकिन इस तरह किसी को सज़ा-ए-मौत देना संगठन सदस्यों का काम नहीं है।

नासिर और जुनैद की हत्या के आरोप में राजस्थान पुलिस ने रिंकू सैनी नामक आरोपी को गिरफ़्तार करने में सफलता मिली है। मामले के आठ आरोपी अब तक उसकी पकड़ से बाहर हैं। इनमें अनिल, श्रीकांत, कालू, मोनू राणा, विकास, शशिकांत और गोगी के मय फोटो पोस्टर जारी कर राजस्थान पुलिस ने इन्हें वांछित बताया है। शुरुआती जाँच में पहले प्रमुख आरोपी के तौर पर मोहित उर्फ़ मोनू मानेसर का नाम लिया जा रहा था; लेकिन अब उसका नाम सूची से बाहर है।  घटना के बाद से मोनू मानेसर $गायब है। वह घटना के समय कहीं और मौज़ूद होने के वीडियो डाल रहा है; लेकिन सामने नहीं आ रहा। चाहे अभी आरोपियों की सूची में वह नहीं है; लेकिन पूछताछ के बहाने पुलिस उसे हिरासत में ले सकती है। मोनू मानसेर के बचाव में महापंचायत तक हो चुकी हैं। राजस्थान पुलिस ने अपहरण और हत्या में प्रयुक्त स्कार्पियो गाड़ी जींद की एक गौशाला से बरामद कर ली है। हरियाणा विधानसभा के बजट सत्र में इस मामले की गूँज हुई।

कांग्रेस विधायकों फ़िरोज़पुर झिरका के मम्मन खान और पुन्हाना से मोहम्मद इलियास ने इस मुद्दे को उठाया। सदस्यों ने कहा कि मेवात इलाक़े में गौरक्षा के नाम पर तस्करी के आरोप में बहुत कुछ ग़लत हो रहा है। इसी वर्ष जनवरी में ऐसे ही एक मामले में एक व्यक्ति की मौत हो गयी। मौत की वजह दुर्घटना करार दी गयी, जबकि यह सही नहीं है। मेवात इलाक़े में गौरक्षा की आड़ में कुछ संगठन क़ानून से बेपरवाह काम कर रहे हैं। ऐसे संगठनों की कार्यप्रणाली पर सरकार को नज़र रखनी चाहिए वरना कट्टरता की आड़ में नासिर और जुनैद जैसे लोग मारे जाते रहेंगे।

इस मामले में एक नया पहलू सामने आ रहा है, जिसमें राजस्थान पुलिस की मुसीबतें बढऩे वाली हैं। अज्ञात पुलिस अफ़सरों और कर्मियों पर गर्भवती महिला की पिटाई का आरोप है। समय से पहले हो गये प्रसव का यह मामला गम्भीर है। हरियाणा राज्य महिला आयोग के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसका संज्ञान लिया है। अब जहाँ राजस्थान पुलिस नासिर और जुनैद हत्याकांड के आरोपियों की धरपकड़ तेज़ करेगी। वहीं हरियाणा पुलिस उन लोगों की पहचान में लगेगी, जिन पर गर्भवती महिला का समय से पहले प्रसव करा देने के आरोप है।

दोनों राज्यों की पुलिस में तालमेल की बातें कही जा रही है; लेकिन यह पूरा सच नहीं है। अगर बेहतर तालमेल होता, तो अब तक हरियाणा पुलिस के सहयोग से आरोपियों की धरपकड़ हो जाती वे कोई आदतन अपराधी नहीं, बल्कि गौररक्षा से जुड़े हुए सदस्य है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोहरे हत्याकांड के सभी आरोपियों की गिरफ़्तारी जल्द-से-जल्द हो और उन पर फास्ट ट्रैक अदालत में मामला चले। गौरक्षा के नाम पर ऐसे कृत्य होंगे, तो लोगों का क़ानून व्यवस्था से ही भरोसा उठ जाएगा। सरकारों को गौवंश के सरक्षण के लिए काम करना चाहिए। कट्टर संगठन चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हो, हैवानियत किसी भी हालत में न करने दी जाए।

महिला आयोग ने लिया संज्ञान

हरियाणा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया ने गर्भवती कमलेश की पिटाई को संगीन मामला बताते हुए उसे इंसाफ़ दिलाने का भरोसा जताया है। उन्होंने कहा कि वह मामले के आरोपी की पत्नी है। वह पूरे मामले की जाँच करा उसकी रिपोर्ट राज्य के गृहमंत्री अनिल विज को सौंपेगी। कमलेश की सास दुलारी की शिकायत पर हरियाणा पुलिस ने अज्ञात लोगों पर प्राथमिकी दर्ज कर ली है। इस मामले में कार्रवाई होगी, जिससे राजस्थान पुलिस की संबंधित टीम की मुसीबतें बढऩे वाली हैं। इसी मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इसे बेहद संगीन मामला बताते हुए विस्तृत जाँच कराने का भरोसा दिया है।

धर्मांधता ठीक नहीं

गौवंश रक्षक संगठनों की सक्रियता के चलते तस्करी के मामले काफ़ी कम हुए हैं लेकिन चोरी छिपे यह काम हो रहा है। संगठन के सदस्य सूचना के बाद देर रात तक भी सक्रिय रहते हैं। पुलिस को सूचना के बाद उनका पूरा सहयोग करते हैं। इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जाता रहा है।

वे पुलिस की सहयोगी की भूमिका में तो ठीक है; लेकिन क़ानून हाथ में लेकर उन्हें सबक़ सिखाने जैस कृत्य करेंगे, तो इसके दुष्परिणाम निकलेंगे। नासिर और जुनैद जैसा हश्र किसी का न हो। ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो इसकी व्यवस्था की ज़िम्मेदारी सरकार की है। धर्मांधता और कट्टरता की इस धर्मनिरपेक्ष देश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

लक्ष्य पर लौट रही कांग्रेस!

अधिवेशन में पार्टी ने दिये भविष्य के संकेत

लोकसभा के एक साल बाद होने वाले चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपना अधिवेशन करके इस बात के संकेत दिये हैं कि चुनाव में उसकी भूमिका क्या होगी और जनता के सामने वह क्या बड़े मुद्दे लेकर जाएगी? पार्टी ने सत्ता में आने पर जहाँ आरटीआई जैसा स्वास्थ्य का अधिकार (राईट टू हेल्थ) क़ानून लाने की बात कही है। वहीं 11 पहाड़ी राज्यों  को विशेष दर्जा देने की बात भी कही है।

राजनीति की बात करें, तो कांग्रेस किसी भी तीसरे मोर्चे के ख़िलाफ़ दिखती है और उसका मानना है कि ऐसा कोई भी तीसरा मोर्चा सिर्फ़ भाजपा को लाभ पहुँचाएगा। हालाँकि उसने यह भी कहा कि वह विपक्षी एकता की पक्षधर है; लेकिन इसके लिए कांग्रेस अगले चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ अपने नेतृत्व वाले मोर्चे को सर्वाधिक असरकारी मानती है। रोज़गार, महँगाई, किसान और देश की एकता को तो पार्टी ने अपने एजेंडे में सर्वोपरि रखा ही है।

पार्टी का यह महाधिवेशन ऐसे मौक़े पर आया है, जब पार्टी के सबसे ज़्यादा स्वीकार्य नेता राहुल गाँधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा हाल ही में ख़त्म की है और पार्टी और जनता दोनों में इसका व्यापक असर देखने को मिला है। राहुल गाँधी की भूमिका को लेकर इस अधिवेशन साफ़ कुछ नहीं कहा गया; लेकिन उनके नेतृत्व वाली यात्रा की सफलता और जनता में उनकी लोकप्रियता का ज़िक्र हर कांग्रेस नेता ने किया, अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से लेकर सोनिया गाँधी और अशोक गहलोत, सचिन पायलट तक सबने। ज़ाहिर है पार्टी की तरफ़ से अगले चुनाव में राहुल कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा रहेंगे ही।

कांग्रेस ने अपने राजनीतिक प्रस्ताव में जिस तरह तीसरे मोर्चे को भाजपा को फ़ायदा पहुँचने वाला बताया है, उससे साफ़ है कि उसका नेतृत्व मानता है कि अगले चुनाव में कांग्रेस के उभार की काफ़ी सम्भावना है। पार्टी इस साल राज्य विधानसभाओं के चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित है और उसका राय है कि भाजपा की सत्ता के अंत की शुरुआत इन चुनावों से हो जाएगी, क्योंकि जनता अब बदलाव की सोच रही है।

कांग्रेस के तीसरे मोर्चे को लेकर इस प्रस्ताव से यह देखना दिलचस्प होगा कि अब तेलंगाना के नेता के.सी. राव, बंगाल की नेता ममता बनर्जी आदि का क्या रुख़ रहता है?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कांग्रेस के अधिवेशन से ऐन पहले कांग्रेस को विपक्षी एकता की पहल करने का आग्रह कर चुके हैं। उनका मानना है देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते कांग्रेस को इस एकता के लिए आगे आना चाहिए और यदि ऐसा होता है तो अगले चुनाव में भाजपा 100 सीटों तक सिमट जाएगी। नीतीश के इस दावे और कोशिश की ज़मीनी सच्चाई आने वाले समय में मिल जाएगी; क्योंकि मार्च के पहले हफ़्ते में तीन पूर्वोत्तर राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के चुनाव नतीजे सामने आ जाएँगे।

सोनिया गांधी, कांग्रेस नेता

इसके बाद के 10 महीनों में आठ और विधानसभाओं के चुनाव होंगे, जो भाजपा के लिए बहुत महत्त्व रखते हैं; क्योंकि लोकसभा की सीटों की संख्या के लिहाज़ से ये राज्य काफ़ी बड़े हैं। कांग्रेस ने जिस तरह राजनीतिक प्रस्ताव में कहा कि वह तीसरे मोर्चे के बजाय धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी ताक़तों की एकता की पक्षधर है, उससे साफ़ है कि कांग्रेस समान विचारधारा वाली धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की पहचान कर उन्हें एकजुट करने और संघर्ष करने के लिए सामने लाना चाहती है। पार्टी ने कहा कि साझे वैचारिक एजेंडे पर एनडीए का मुक़ाबला करने के लिए एकजुट विपक्ष की तत्काल ज़रूरत है।

हाल के वर्षों में जिस तरह भाजपा ने उसकी सरकारें गिरायी हैं, उसे देखते हुए कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी रखा है कि विधायकों की ख़रीद और बड़े पैमाने पर दल-बदल की योजना बनाकर लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकारों को गिराने के लिए की परम्परा को रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए। बता दें हाल के वर्षों में कांग्रेस को भाजपा के हाथों दलबदल के कारण अपनी पाँच राज्य सरकारों को खोना पड़ा है। दलबदल करने वाले उसके नेताओं की संख्या तो बहुत ज़्यादा है।

पार्टी ने प्रस्ताव में चुनाव सुधार लाने की बात कही है और इलेक्टोरल बॉन्ड की मौज़ूदा प्रणाली को घातक रूप से त्रुटिपूर्ण और पूरी तरह भ्रष्ट बताया है। कांग्रेस ने राष्ट्रीय चुनाव कोष स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है, जिसमें हर कोई योगदान दे सकता है। कांग्रेस ने प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार भारत और विदेश दोनों में इलेक्ट्रॉनिक, सोशल, डिजिटल और प्रिंट मीडिया पर अपनी पकड़ बढ़ा रहे हैं और मीडिया की आज़ादी पर हमला हो रहा है। डेटा संरक्षण का मुद्दा भी राजनीतिक प्रस्ताव में उठाया गया है। आंतरिक और बाहरी सुरक्षा और भारत-चीन सीमा के मुद्दे भी प्रस्ताव में हैं।

राजनीतिक प्रस्ताव में कांग्रेस ने एक और अहम बात जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्ज देने और लद्दाख़ और इसके लोगों को संविधान के छठे अनुसूची के तहत संरक्षण देने का वादा किया है। पार्टी ने आँध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की प्रतिबद्धता भी जतायी है। कांग्रेस ने कहा है कि सत्ता में आने पर वह 11 हिमालयी राज्यों को विशेष दर्जा देगी। इनमें हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड जैसे राज्य शामिल हैं। निश्चित ही यह बड़ा वादा है और इन राज्यों के लोगों के आकर्षित कर सकता है।

कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए जब सत्ता में थी, तो सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के सुझाव पर वह मनरेगा और आरटीआई जैसे व्यापक लोकप्रिय क़ानून लायी थी। अब आरटीई जैसा सबको स्वास्थ्य का अधिकार क़ानून लाने का उसने वादा किया है। माना जाता है कि कांग्रेस 2014 में तीसरी बार सत्ता में आती, तो तभी वह यह क़ानून ले आती; लेकिन भाजपा के हाथों उसकी हार से ऐसा नहीं हो पाया था। निश्चित ही ऐसा क़ानून देश के लोगों के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है।

कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले, जो दूसरी बड़ी बात करने की तैयारी में है, वह है- उन राज्यों राहुल गाँधी के नेतृत्व में भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा और शायद तीसरा चरण भी करना। राहुल गाँधी इस यात्रा में उन राज्यों को कवर करेंगे, जो पहली यात्रा में नहीं हुए थे। पार्टी पहली यात्रा की सफलता से बहुत उत्साहित है। पार्टी नेताओं लगता है कि 4,000 किलोमीटर की पहली यात्रा ने उसकी छवि को बेहतर किया है और उसे भाजपा के सामने सबसे मज़बूत विपक्षी दल के रूप में खड़ा कर दिया है। 

सोनिया गाँधी को लेकर अटकलें

भारत की राजनीति में कहा जाता है कि हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद यदि किसी नेता की बात का गैर भाजपा विपक्ष में सबसे ज़्यादा वजन रहा तो वह सोनिया गाँधी हैं। न सिर्फ़ कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में, बल्कि बतौर यूपीए अध्यक्ष भी सोनिया गाँधी विपक्ष की एकजुटता को लेकर सक्रिय रही हैं। अब रायपुर के कांग्रेस अधिवेशन में सोनिया गाँधी ने जिस तरह कहा कि अपनी उनके लिए भारत जोड़ो यात्रा के साथ अपनी पारी ख़त्म करने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता उससे यह कयास लग रहे हैं कि क्या सोनिया गाँधी राजनीतिक संन्यास की तरफ़ जा रही हैं?

स्पष्ट नहीं है लेकिन उनकी अपेक्षाकृत कम सक्रियता संकेत तो करती है कि वह अब पार्टी और यूपीए के मामलों में कम सक्रिय रहें। हो सकता है वह कोई पुस्तक लिखें। वैसे कांग्रेस और गैर भाजपा विपक्ष को सोनिया गाँधी की मौज़ूदगी की ज़रूरत अभी रहेगी, क्योंकि उसके पास सभी को एक मंच पर ला सकने की क्षमता वाला सोनिया गाँधी जैसा कोई नेता नहीं है। एक कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सोनिया गाँधी 2024 से पहले राजनीति से अलग नहीं हो सकतीं, क्योंकि उनकी इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

क्या महिला दिवस मनाने भर से आ सकेगी लैंगिक समानता?

महिला अधिकारों के आन्दोलन पर ध्यान केंद्रित करने, लैंगिक समानता, प्रजनन अधिकार और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध जैसे मुद्दों पर ध्यान देने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस प्रतिवर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2023 की थीम ‘क्रैकिंग द कोड : इनोवेशन फॉर ए जेंडर इक्वल फ्यूचर’ है।

भारत में साल-दर-साल महिला दिवस के उत्सव के बावजूद, लिंग वेतन अंतर एक बड़ा मुद्दा है, जिसमें महिलाएँ अक्सर समान कार्य करने के लिए पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम वेतन पाती हैं। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में सिर्फ़ 71 फ़ीसदी ही कमाती हैं। यह असमानता न केवल अनुचित है, बल्कि इसका देश की आर्थिक स्थिरता और विकास पर भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी, जो रिपोर्ट से नाराज़ थीं; ने दावोस में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था और विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) ने भविष्य की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में देशों को रैंक करने के लिए पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को ध्यान में रखने की बात कही थी, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति बेहतर होगी। स्मृति ईरानी को दिये गये एक लिखित आश्वासन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संस्था रैंकिंग के लिए फिर से जाँच कर रही है और सूचकांकों में बदलाव कर रही है। उन्होंने वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स असेसमेंट पर सवाल उठाया था, जिसमें लैंगिक समानता के मामले में भारत को 135वें स्थान पर रखा गया था। ईरानी ने कहा था कि सूचकांक ज़मीनी स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन को ध्यान में रखने में विफल रहा है।

हालाँकि अकेले डब्ल्यूईएफ की रिपोर्ट ही हम पर ऐसा अभियोग लगाने वाली नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 तक भारत में लिंग वेतन अंतर 27 फ़ीसदी है। इसका मतलब है कि भारत में महिलाएँ पुरुष के समान काम करने के लिए औसतन 73 फ़ीसदी ही कमाती हैं। यह अंतर कुछ उद्योगों में और भी व्यापक है, जैसे कि प्रौद्योगिकी क्षेत्र, जहाँ महिलाएँ पुरुषों की तुलना में केवल 60 फ़ीसदी कमाती हैं।

विडंबना यह है कि प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी लैंगिक अंतर है। इस तथ्य के बावजूद कि महिलाएँ भारतीय प्रौद्योगिकी कार्यबल का लगभग 30 फ़ीसदी हिस्सा बनाती हैं, उन्हें अक्सर उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है। नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कम्पनीज के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रौद्योगिकी भूमिकाओं में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 29 फ़ीसदी कम वेतन पाती हैं। वरिष्ठ प्रबंधन स्तर पर यह अंतर और भी व्यापक है। यह असमानता न केवल अनुचित है, बल्कि यह इस क्षेत्र में आर्थिक विकास की संभावना को भी सीमित करती है, क्योंकि यह महिलाओं को भारत में सूर्योदय प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रवेश करने से हतोत्साहित करती है।

भारत में लैंगिक वेतन अंतर का एक और उदाहरण खुदरा क्षेत्र में असमानता है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एक अध्ययन में पाया गया कि महिलाएँ भारत में अपने खुदरा कर्मचारियों का 70 फ़ीसदी हिस्सा हैं; लेकिन उन्हें समान काम करने के लिए अक्सर पुरुषों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है। अध्ययन में पाया गया कि महिलाएँ खुदरा क्षेत्र में पुरुषों की कमायी का सिर्फ़ 67 फ़ीसदी ही पाती हैं। ऊपरी प्रबंधन स्तर पर यह अंतर और भी व्यापक है। यह असमानता न केवल खुदरा क्षेत्र में आर्थिक विकास की क्षमता को सीमित करती है, बल्कि महिलाओं और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिरता पर भी इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

भारत में लिंग वेतन अंतर के मुख्य कारणों में से एक भारत में नेतृत्व की स्थिति में महिलाओं की कमी है। मैकिन्से की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वरिष्ठ स्तर के पदों पर केवल 14 फ़ीसदी ही महिलाएँ हैं। संगठनों के शीर्ष स्तरों पर प्रतिनिधित्व की यह कमी महिलाओं के लिए रोल मॉडल की कमी और लैंगिक समानता का समर्थन करने वाली नीतियों और प्रथाओं की कमी की ओर ले जाती है। भारत में लैंगिक वेतन अंतर न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि एक सामाजिक भी है, क्योंकि यह सांस्कृतिक और सामाजिक पूर्वाग्रहों में गहराई से निहित है।

लैंगिक समानता हासिल करने और पुरुषों और महिलाओं के बीच की खाई को पाटने का संघर्ष लंबा और कठिन है। सन् 2022 के अंतिम ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स ने भारत को 146 देशों में से 135वें स्थान पर रखा। सन् 2021 में भारत की रैंकिंग 156 देशों में 140वीं थी। ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स चार आयामों में लैंगिक समानता की वर्तमान स्थिति और विकास को बेंचमार्क करता है- आर्थिक भागीदारी और अवसर; शिक्षा प्राप्ति; स्वास्थ्य और अस्तित्व, और राजनीतिक सशक्तिकरण। भारत अपने पड़ोसियों के मुक़ाबले भी ख़राब पायदान पर है। भारत बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और भूटान से पीछे है। केवल ईरान, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान इस क्षेत्र में भारत से ख़राब स्थिति में हैं। 

ज़मीनी स्तर की संख्याएँ यह संकेत देने के लिए पर्याप्त हैं कि क़रीब 66 करोड़ की महिला आबादी वाले भारत में लैंगिक समानता लडख़ड़ा रही है। भारत की निराशाजनक रैंकिंग में सुधार करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि इसे महिलाओं द्वारा ही दुरुस्त किया जाए। उसके लिए सभी स्तरों पर नेतृत्व के पदों पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना अनिवार्य है, ताकि उन्हें नौकरियों और संसाधनों तक अधिक पहुँच प्राप्त हो सके। यह सरकार पर निर्भर है कि वह प्रतीकात्मकता से आगे बढ़े और महिलाओं को चौंका देने वाली आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को दूर करने में मदद करे।

यह महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने का समय है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हमें यह याद रखना होगा कि जब तक एक महिला भेदभाव, उत्पीडऩ, असमानता या उत्पीडऩ का सामना करती है, तब तक इस दिवस को मनाने का कोई उद्देश्य नहीं होगा।

हर बच्चा अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने का हक़दार है; लेकिन उनके जीवन में और उनकी देखभाल करने वालों के जीवन में लैंगिक असमानताएँ इस वास्तविकता में बाधा डालती हैं। जिस भी जगह वो रहते हों, लड़कियाँ और लडक़े अपने घरों और समुदायों में हर दिन लैंगिक असमानता देखते हैं। पाठ्यपुस्तकों में, फ़िल्मों में, मीडिया में और उन पुरुषों और महिलाओं के बीच जो उनकी देखभाल और सहायता प्रदान करते हैं, महिलाएँ भेदभाव का शिकार हैं। पूरे भारत में लैंगिक असमानता के परिणामस्वरूप असमान अवसर मिलते हैं, और जबकि यह दोनों लिंगों के जीवन पर प्रभाव डालता है, सांख्यिकीय रूप से सबसे अधिक वंचित लड़कियाँ हैं।

भारत में लड़कियाँ और लडक़े किशोरावस्था को अलग तरह से अनुभव करते हैं। जहाँ लडक़ों को अधिक स्वतंत्रता का अनुभव होता है, लड़कियों को स्वतंत्र रूप से आगे बढऩे और अपने काम, शिक्षा, विवाह और सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करने वाले निर्णय लेने की क्षमता पर व्यापक सीमाओं का सामना करना पड़ता है। जैसे-जैसे लड़कियों और लडक़ों की उम्र बढ़ती है, लैंगिक बाधाएँ बढ़ती रहती हैं और वयस्कता तक में जारी रहती हैं। जिसका बड़ा उदाहरण हम औपचारिक कार्यस्थल में केवल एक-चौथाई महिलाओं के रूप में देखते हैं।

पाँच साल से कम उम्र की महिला मृत्यु दर को कम करने, महिलाओं और लड़कियों के पोषण में सुधार लाने, स्कूल न जाने वाली लड़कियों को सीखने में सक्षम बनाने के लिए लिंग उत्तरदायी समर्थन और अधिक लिंग-उत्तरदायी पाठ्यक्रम और शिक्षाशास्त्र को सक्षम करने, बाल विवाह को समाप्त करने, मासिक धर्म स्वच्छता के लिए लड़कियों की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए कार्यों में कटौती की गई है। सरकार ने अपनी ओर से ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाएँ शुरू की हैं, ताकि बालिकाओं की सुरक्षा, अस्तित्व और शिक्षा सुनिश्चित की जा सके। महिलाओं को ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी सीटें आरक्षित की हैं। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों सहित पंचायत हितधारकों की क्षमता निर्माण का आयोजन महिलाओं को शासन प्रक्रियाओं में प्रभावी ढंग से भाग लेने के लिए सशक्त बनाने की दृष्टि से किया जाता है। लैंगिक अंतर को पाटने के लिए सभी हितधारकों विशेष रूप से पुरुषों को इस ज़िम्मेदारी को निभाने की आवश्यकता है।

यह लिंग या लैंगिक पहचान की परवाह किये बिना, महिलाओं द्वारा समानता की दिशा में की गयी प्रगति का जश्न मनाने का समय है। पुरुषों को लैंगिक समानता का समर्थन करने के लिए अपने विशेषाधिकार का उपयोग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। नारीवाद केवल महिलाओं के जीवन में सुधार के बारे में नहीं है, यह सभी हानिकारक लैंगिक रूढिय़ों और भूमिकाओं को ख़त्म करने के बारे में है। लैंगिक समानता हासिल करना पुरुषों के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण होना चाहिए जितना कि महिलाओं के लिए।

योगी के लिए अवसर बनेगा अडानी मामला?

अडानी समूह के मामले को लेकर देश का माहौल संसद से सडक़ तक गर्म है। सारा विपक्ष अडानी की कम्पनियों की जाँच के लिए मोदी सरकार पर हमलावर है। अडानी ग्रुप के कर्ताधर्ता गौतम अडानी से मोदी की पुरानी मित्रता और इसके परिणामस्वरूप अडानी की तेज़ी से बढ़ती सम्पत्ति के प्रश्न को विपक्ष बोफोर्स जैसा मुद्दा बनाना चाहता है। अडानी प्रकरण में विपक्ष को मोदी-काल का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला नज़र आ रहा है। कथित तौर पर आरोप है कि अडानी के तार सीधे तौर मोदी से जुड़े हैं। एक विदेशी निवेशक कम्पनी हिंडनबर्ग ने जब पहली बार अडानी के घोटालों को लेकर रिपोर्ट जारी की, तो बाज़ार में तहलका मच गया। अडानी ग्रुप के शेयर बुरी तरह लुढक़ने लगे और 75 फ़ीसदी से ज़्यादा लुढक़ गये। हिंडनबर्ग के बाद फोब्र्स और विकीपीडिया ने भी अडानी ग्रुप की कारस्तानियों को लेकर कई ख़ुलासे किये हैं। अमेरिका के डाउ जोंस सस्टेनिबिलिटी इंडेक्स से अडानी एंटरप्राइजेज के शेयर बाहर कर दिये।

अब गौतम अडानी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर के पायदान से गिरकर 29वें स्तर पर पहुँच गये हैं। अगले साल यानी 2024 में देश में आम चुनाव हैं, जिसमें मोदी तीसरी बार जीतकर देश की कमान सँभालने का सपना देख रहे हैं। एक तरफ़ अडानी के तमाम प्रयासों के बावजूद यह गिरावट रुकने का नाम नहीं ले रही। दूसरी तरफ़ विपक्ष की माँग और तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी सरकार अडानी समूह की जाँच तो छोड़ो, इस पर संसद में चर्चा तक करवाने को तैयार नहीं है। आम चुनाव से पहले विपक्ष के हाथ एक ऐसा मुद्दा लग गया है, जिसने मोदी की छवि का नुक़सान करना शुरू कर दिया है। आम आदमी के मन में मोदी के अडानी से रिश्तों को लेकर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। भ्रष्टाचार के प्रश्न कब बड़े मुद्दों और फिर सत्ता विरोधी लहर में बदल जाए और इनका कितना राजनीतिक नुक़सान हो सकता है, यह बोफोर्स और अन्ना आन्दोलन के दौरान देख चुके हैं।

मोदी सरकार अडानी के मुद्दे पर बहस और जाँच से कितना भी भाग ले, यह मुद्दा अब दबने वाला नहीं है; क्योंकि इसके अंतरराष्ट्रीय आयाम भी नहीं। अडानी समूह में विदेशी निवेशकों का मोटा पैसा लगा हुआ है। कई विदेशी बैंक, रेटिंग एजेंसियाँ अडानी पर सख़्त रुख़ अपना रही हैं। बड़े बड़े अंतरराष्ट्रीय अख़बारों और पत्रिकाओं में अडानी के घोटालों पर ख़बरें छप रही हैं। भाजपा और संघ भी चिंतित हैं कि कहीं यह मुद्दा गले की फाँस न बन जाए और पार्टी को 2024 में इसका बड़ा राजनीतिक ख़ामियाजा न भुगतना पड़ जाए। संसद में भाजपा जिस प्रकार अडानी मुद्दे से भागती रही और मोदी ने संसद में अपने भाषण में जिस प्रकार की बौखलाहट दिखायी और ‘एक अकेला सब पर भारी है’ वाली बात कही, उससे संघ और भाजपा नेताओं की बेचैनी और बढ़ी है। संघ व्यक्तिवाद से इतर सामूहिक प्रयास और नेतृत्व पर बल देता रहा है।

मोदी के बयान से यह संदेश गया, जैसे अकेले मोदी ही सब कुछ हैं, संघ और भाजपा मोदी के सामने छोटे और गौण हैं। यह संघ को कदापि स्वीकार्य नहीं है कि कोई एक व्यक्ति उससे ऊपर होकर हावी हो जाए। मोदी को आईना दिखाते हुए तत्काल संघ प्रमुख का बयान आया कि किसी एक व्यक्ति या विचार से देश का भला नहीं हो सकता। जिस प्रकार से अडानी का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है और मोदी की छवि पर भारी पड़ता नज़र आ रहा है। इसके चलते यदि भाजपा को वोटों का ज़्यादा नुक़सान होता हुआ दिखा, तो संघ भाजपा को अपने अगले घोड़े यानी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी पर दाँव लगाना होगा। सूत्रों के अनुसार, संघ और भाजपा में अब यह चर्चा होने लगी है यदि उपयोगिता कम होने पर आडवाणी को किनारे लगाया जा सकता है, तो मोदी को क्यों नहीं?

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने जिस प्रकार अपनी छवि को गढ़ा और काम करके दिखाया है उसे देखकर योगी ही मोदी के बाद सबसे ज़्यादा लोकप्रिय और उपयुक्त चेहरा नज़र आते हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में वह सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ का करिश्मा ही था, जिसकी बदौलत 35 साल बाद प्रदेश में किसी भी सियासी दल की सरकार की पुनरावृत्ति हो पायी। इसमें कोई दो-राय नहीं है कि किसान आन्दोलन और केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी प्रकरण की नाराज़गी के बावजूद भाजपा का प्रदेश में इतना शानदार प्रदर्शन सिर्फ़ योगी की लोकप्रियता का ही परिणाम है।

सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को अधिकांश वोट प्रधानमंत्री मोदी के नाम से ज़्यादा योगी के नाम और काम पर मिले थे। प्रदेश में लोकसभा की साठ से ज़्यादा सीटें जीतने का बहुत बड़ा श्रेय योगी को जाता है। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में कोई गठबंधन नहीं था, जबकि सन् 2019 में सपा, बसपा और रालोद आदि का बहुत ही मज़बूत गठबंधन होने के बावजूद पार्टी की बड़ी जीत होना जताता है कि योगी ने प्रदेश में भाजपा की जड़ों को मज़बूत किया है। 2019 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने में योगी का महत्त्वपूर्ण योगदान है और 2024 में भी बिना योगी के सहयोग के मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। सर्वविदित है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता आज भी उत्तर प्रदेश से होकर ही गुज़रता है।

अगर सियासी लिहाज़ से देखें, तो उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री देश में प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर की राजनीतिक हैसियत रखता है। हालात बताते हैं कि योगी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में काम करके जो कुशल प्रशासक की छवि बनायी है, उससे लगता है कि भविष्य में जनता उन्हें और बड़ी ज़िम्मेदारी दे सकती है। अडानी प्रकरण ने मोदी की छवि और लोकप्रियता में गिरावट का काम किया है, जिससे आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी का जादू चल पायेगा इस पर संशय व्यक्त किया जा रहा है। अगर यहाँ से परिस्थिति और बिगड़ी, तो संघ और भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में योगी के नाम पर विचार कर सकते हैं।

अगर प्रदेश में विकास की बात करें, तो योगी केवल विपक्ष ही नहीं तमाम नेताओं को भी विकास के नाम पर चुनौती दे रहे हैं। दरअसल योगी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने से एक क़दम आगे सर्वोत्तम प्रदेश बनाने की पटकथा लिख रहें हैं। जिस प्रदेश को सपा-बसपा की सरकारों ने एक पिछड़ा, दंगों से जूझने वाला और जातियों में बँटा हुआ प्रदेश बना दिया था। उसी प्रदेश की इन दिनों एक अलग छवि योगी के नेतृत्व में बन रही है, जहाँ बीते छ: वर्षों से कोई दंगा नहीं हुआ है, जहाँ अब आर्थिक विकास या औद्योगीकरण सिर्फ़ वादा नहीं इरादा बन चुका है।

बहरहाल कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें, तो आज योगी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। क़ानून व्यवस्था तो चाकचौबंद है ही अब यहाँ लगातार लाखों करोड़ रुपये का निवेश भी आ रहा है। बीते 6 सालों में योगी की छवि घोषणाओं को तेज़ी से जमीन पर उतारने वाले नेता के रूप में स्थापित हो गयी है। सन् 2017 से पहले प्रदेश में बदहाल क़ानून-व्यवस्था, बदहाल सडक़ें, आये दिन होने वाले करोड़ों रुपये के घोटालों से जहाँ यूपी की छवि तार-तार थी, वहीं आज प्रदेश में दोबारा योगी सरकार बनने के बाद तेज़ी से बन रहे एक्सप्रेस-वे, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के निर्माण, डिफेंस कॉरिडोर, बिजली आपूर्ति दुरुस्त होने, एक के बाद एक नये विश्वविद्यालयों के निर्माण से उत्तर प्रदेश की छवि तेज़ी से बदल रही है।

यही कारण है कि हाल ही में लखनऊ में हुई इन्वेस्टर समिट में योगी लगभग 32 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के निवेश की योजनाओं को आकर्षित करने में सफल रहे। अडानी प्रकरण के चलते मोदी का रथ थोड़ा भी डगमगाया तो संघ और भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव से पहले या भाजपा को स्पष्ट बहुमत न मिलने की सूरत में दिल्ली की कमान योगी को सौंप सकते हैं। तेज़ी से बदलती परिस्थितियों में योगी और मोदी का सियासी भविष्य क्या होगा यह तो वक़्त ही बताएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

ख़तरे में उत्तराखण्ड!

वैज्ञानिकों का दावा- ‘भूकंप से दहल जाएगा उत्तराखण्ड’

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

देवभूमि उत्तराखण्ड ख़तरे में है। ख़तरा प्राकृतिक है। वैज्ञानिकों ने भूकंप की चेतावनी दी है। इसलिए सिवाय जनसंख्या घनत्व कम करने के कोई उपाय नहीं है। हर साल किसी न किसी प्राकृतिक आपदा को झेलने वाला उत्तराखण्ड इंसानों के दख़ल तथा दोहन का शिकार है। लोग पहाड़ों तथा जंगलों को काटकर बस्तियों का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज़ से पहाड़ी क्षेत्र बेहद संवेदनशील होते हैं। पिघलते बर्फ़ के पहाड़ों, विद्युत उत्पादन के लिए बनते जा रहे डैमों, सुरंगों तथा बढ़ती आबादी ने इस संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है। यही वजह है कि उत्तराखण्ड में हर साल तरह-तरह की आपदाओं का सामना करता है।

सन् 1991 में उत्तरकाशी में आये भूकंप से 700 से ज़्यादा की जानें गयी थीं। इसी साल जोशीमठ की घटना के दौरान 13 जनवरी जोशीमठ में ही 2.9 मैग्नीट्यूड की तीव्रता से भूकंप के झटके लगे थे। इसके एक सप्ताह बाद ही पिथौरागढ़ में 3.8 की तीव्रता से भूकंप आया था। क्या नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की चेतावनी सच साबित होगी? क्या उत्तराखण्ड में भी तुर्की जैसा भयानक भूकंप आएगा? कई बार भूकंपों, भूस्खलन, बाढ़, पहाड़ ढहने तथा बादल फटने जैसी आपदाओं ने उत्तराखण्ड को दहलाया है। जोशीमठ की घटना के ज़ख़्म अभी ताज़ा हैं। इस बीच नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की चेतावनी ने उत्तराखण्ड में रहने वालों के मन में एक डर पैदा कर दिया है।

नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सिस्मोलॉजी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. पूर्णचंद्र राव ने भूकंप के समय और तारीख़ की भविष्यवाणी करने में असमर्थता जताते हुए इस डर को और बढ़ा दिया है। पूर्णचंद्र राव के मुताबिक, उत्तराखण्ड के नीचे काफ़ी समय से एक बड़ा दबाव बन रहा है। जैसे ही यह दबाव रिलीज होने की स्थिति में आएगा, तय है कि तुर्की जैसा एक बड़ा भूकंप आएगा। उनका दावा है कि उत्तराखण्ड में भूकंप से होने वाली बर्बादी कई फैक्टर पर निर्भर करेगी तथा एक भौगोलिक क्षेत्र से दूसरे तक अलग-अलग होगी।

फ़िलहाल उत्तराखण्ड में आने वाले भूकंप पर फोकस करने के लिए नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने हिमालय पर 80 सिस्मिक स्टेशन बनाये हैं। इन सिस्मिक स्टेशनों से उत्तराखण्ड में भूकंप आने के सही समय का पता लगाने की कोशिश वैज्ञानिकों की टीम कर रही है। कई जीपीएस नेटवर्क उत्तराखण्ड क्षेत्र के जीपीएस प्वाइंट सतह के नीचे हो रहे बदलावों का संकेत दे रहे हैं। बता दें कि धरती की आंतरिक सतहों की गतिविधियों को जाँचने के लिए अभी तक का सबसे विश्वसनीय तरीक़ा वेरिमीट्रिक जीपीएस डाटा प्रोसेसिंग है। दरअसल वेरिओमीटर धरती के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले बदलावों को मापते हैं।

जोशीमठ की प्राकृतिक घटना के तुरन्त बाद शीर्ष वैज्ञानिकों की इस डरावनी चेतावनी से उत्तराखण्ड की डबल इंजन की सरकार को तत्काल सतर्क होने की ज़रूरत है। उसे जोशीमठ की तरह घटना के घटने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। देवभूमि उत्तराखण्ड को बचाने की ज़िम्मेदारी जितनी राज्य सरकार पर है, उतनी ही केंद्र सरकार पर भी है। इस समय उत्तराखण्ड के तहस-नहस होने की चेतावनियों के मद्देनज़र दोनों सरकारों को मिलकर इस पवित्र भूमि को बचाने की आवश्यकता है। अगर पहाड़ सुरक्षित रहेंगे, तो समतल क्षेत्र भी सुरक्षित रहेंगे। 

8.0 अथवा इससे अधिक की तीव्रता वाले भूकंप से ज़्यादा बड़ा भूकंप नहीं आता है। 5.4 से 6.0 की तीव्रता वाला भूकंप काफ़ी तबाही मचा जाता है। तुर्की में 6.3 से 7.8 की तीव्रता वाले भूकंप ने भयंकर तबाही मचा कर रख दी।

उत्तराखण्ड को लेकर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 8.0 मैग्नीट्यूड से अधिक तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। यह भूकंप पूरे हिमालय क्षेत्र को प्रभावित करेगा, जिसकी तबाही से उत्तराखण्ड ही नहीं, जम्मू से अरुणाचल तक प्रभावित होंगे। स्पष्ट है कि अगर डॉ. राव की भविष्यवाणी सच साबित हुई, तो उत्तराखण्ड के अतिरिक्त पूरे हिमालय क्षेत्र में महाविनाश होगा। हिमालय क्षेत्र अब तक चार सबसे बड़े भूकंप झेल चुका है। हिमालय क्षेत्र में आने वाले उत्तराखण्ड सिस्मिक गैप कहा जाता है।

100 साल से ज़्यादा समय बाद 8.0 मैग्नीट्यूड की तीव्रता वाला भूकंप आने की वैज्ञानिक चेतावनी से उत्तराखण्ड सरकार ही नहीं, हिमाचल प्रदेश सरकार, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश सरकार तथा नेपाल के हिमालय के आसपास के क्षेत्र को सचेत रहने की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड क्षेत्र में लगातार बनने वाला दबाव तथा उससे आने वाले भूकंप को वैज्ञानिक रिटर्न पीरियड कह रहे हैं। इसका मतलब यह है कि 100 से 150 वर्षों के बीच इस क्षेत्र में बड़ा भूकंप आता है।

हालाँकि भूकंप आये, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कई बार वैज्ञानिकों की चेतावनियाँ खोखली साबित हुई हैं। आये दिन धरती पर उल्का पिंड गिरने की वैज्ञानिक चेतावनियाँ खोखली साबित होती हैं। सन् 2012 में धरती के नष्ट होने की चेतावनी भी ऐसी ही थी। परन्तु अब वैज्ञानिकों के पास आधुनिक यंत्र हैं। इन यंत्रों से वैज्ञानिक भले ही धरती की आयु और इसके समाप्त होने का अनुमान न सकते हों, परन्तु प्राकृतिक आपदाओं को कुछ हद तक भाँप लेते हैं। हालाँकि प्राकृतिक आपदाओं का पहले से पता लगाने में इंसान जानवरों की अपेक्षा काफ़ी पीछे हैं। जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो सबसे पहले पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा ज़मीन पर रेंगने वाले जीव उस स्थान को छोडऩे लगते हैं।

वैज्ञानिक इसकी खोज में लगे हैं कि आ$िखर मूक प्राणियों के पास ऐसी कौन-सी समझ है, जिसके चलते वे प्राकृतिक आपदाओं को पहले ही भाँप लेते हैं? इस प्रयोग में इंसानों का सफल होना आसान नहीं है। इसकी वजह मूक प्राणियों की चेतना की जागरूकता है, जिसमें इंसान तभी पारंगत हो सकता है, जब वह प्रकृति से गहरे भाव से जुड़ा हो। कुछ लोग कहते हैं कि मूक प्राणियों से इंसानों के पास बुद्धि ज़्यादा होती है, इसलिए उनकी संवेदनशील क्षमता कम होती है। वहीं मूक प्राणियों के पास बुद्धि नहीं होती; परन्तु उनकी संवेदनाएँ इंसानों की अपेक्षा ज़्यादा सक्रिय होती हैं। मूक प्राणी धरती के अंदर की हलचल को इंसानों की अपेक्षा जल्दी तथा ज़्यादा महसूस कर सकते हैं। यही नहीं, ज़्यादातर मूक प्राणियों की सुनने और देखने की क्षमता भी इंसानों से ज़्यादा होती है।

सन् 2001 में गुजरात के कच्छ में 7.7 की तीव्रता से तथा सन् 2005 में कश्मीर में 7.6 की तीव्रता से भूकंप आया था। हाल के वर्षों में गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कई बार भूकंप के झटके लग चुके हैं। इसके अलावा 16 जून, 1819 को गुजरात में 8.2 की तीव्रता से भूकंप आया था। इसके बाद 31 दिसंबर, 1881 में अंडमान द्वीपसमूह में 7.9 की तीव्रता से भूकंप आया था। इसके बाद 12 जून, 1897 को शिलांग में 8.3 की तीव्रता से भूकंप आया था। फिर 4 अप्रैल, 1905 को हिमाचल क्षेत्र की कांगड़ा घाटी में 7.8 की तीव्रता से भूकंप आया था। 26 जून, 1941 को फिर अंडमान द्वीपसमूह में 8.1 की तीव्रता से भूकंप आया था। इसमें एक सुनामी भी आयी, जिसने श्रीलंका में भी तबाही मचायी। फिर 15 अगस्त, 1950 को अरुणाचल प्रदेश में 8.7 की तीव्रता से भूकंप आया।

इसके बाद 21 जुलाई, 1956 को गुजरात में 6.1 की तीव्रता से भूकंप आया था। फिर 19 जनवरी, 1975 को हिमाचल प्रदेश में 6.8 की तीव्रता से भूकंप आया था। इसके बाद 20 अक्टूबर, 1991 को उत्तरकाशी में 7.0 की तीव्रता से भूकंप आया। फिर 30 सितंबर, 1993 को महाराष्ट्र के लातूर में 6.2 की तीव्रता से भूकंप आया था। फिर 22 मई, 1997 को मध्य प्रदेश के जबलपुर में 6.0 की तीव्रता से भूकंप आया था। 20 अगस्त, 1988 नेपाल से लगे भारतीय क्षेत्र में 6.3 से 6.7 की तीव्रता से भूकंप आया था। 29 मार्च, 1999 को उत्तराखण्ड के चमोली में 6.8 की तीव्रता से भूकंप आया था। 26 जनवरी, 2001 को फिर गुजरात 7.6 से 7.7 की तीव्रता से भूकंप आया था। 8 अक्टूबर, 2005 को श्रीनगर, कांगड़ा, जम्मू और कश्मीर को प्रभावित करने वाला 7.6 की तीव्रता से भूकंप आया था। 10 अगस्त, 2009 को अंडमान, निकोबार में 9.7 की तीव्रता से सुनामी तथा भूकंप आया। 18 सितंबर, 2011 गंगटोक में 6.9 की तीव्रता से भूकंप आया, जिसके झटके दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ तथा जयपुर तक महसूस किये गये थे। 25 अप्रैल, 2012 को फिर अंडमान, निकोबार में 11.2 की तीव्रता से भयंकर भूकंप आया। 21 मार्च, 2014 को भी अंडमान, निकोबार में 9.7 की तीव्रता से भूकंप आया था।

सीमावर्ती देशों की बात करें, तो 15 जनवरी, 1934 को नेपाल 8.0 की तीव्रता से भूकंप आया था। इसके बाद 31 मई, 1935 को क्वेटा और बलूचिस्तान 7.7 की तीव्रता से भूकंप आया था। 26 दिसंबर, 2004 को उत्तरी सुमात्रा के पश्चिमी तट में सबसे भयंकर भूकंप आया, जिसकी तीव्रता 9.1 थी। इस भूकंप से भारत तथा श्रीलंका दोनों तर$फ के लोग मरे थे। प्रभावित हुए थे। 25 अप्रैल, 2015 उत्तर-पूर्व भारत में भूकंप के झटके लगे, जिसका केंद्र नेपाल था। 26 अप्रैल, 2015 को भी नेपाल के कोदारी में 6.7, की तीव्रता से भूकंप के झटके लगे, जो भारत में भी महसूस किये गये।

भूकंप की दृष्टि से पहाड़ों की तरह दिल्ली भी काफ़ी संवेदनशील है। दिल्ली में 6.3 की तीव्रता का भूकंप ही तबाही ला सकता है। सन् 2020 तक राष्ट्रीय सिस्मोलॉजिकल नेटवर्क में 745 भूकंप रिकॉर्ड किये गये, जिसमें दिल्ली-एनसीआर में सितंबर, 2017 से लेकर अगस्त, 2020 तक भूकंप की 26 घटनाएँ हुईं।

वैज्ञानिक चेतावनियों तथा बार-बार आने वाले भूकंपों को देखते हुए आगामी आपदाओं से निपटने की विशेष तैयारी की आवश्यकता है। भूकंपों को रोका जाना तो सम्भव नहीं है। परन्तु संवेदनशील क्षेत्रों पर जनसंख्या दबाव को कम किया जा सकता है तथा जान-माल के नुक़सान कम किया जा सकता है।

भारतीय समुद्र पर बन चुका एक और पुल

मुंबई वालों को घंटों के ट्रैफिक से मुक्ति दिलाएगा ‘मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक’

भारत का अब तक सबसे लम्बा समुद्री पुल मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (एमटीएचएल) क़रीब-क़रीब बन चुका है। 25 मीटर ऊँचा, क़रीब 2,300 मीट्रिक टन भारी और 22 किलोमीटर लम्बा यह समुद्री पुल इस पर चलने वालों को न केवल समुद्र की विशालता के कुछ हिस्से के दर्शन कराएगा, बल्कि जाम के झाम से लोगों को राहत देने के अलावा समय तथा ईंधन की बचत कराएगा।

इस पुल की योजना पाँच साल पहले मुंबई में जाम से निपटने तथा नवी मुंबई और मुंबई के बीच की दूरी तय करने के लिए बर्बाद होने वाले समय को बचाने के उद्देश्य से बनी थी और अब इसे तक़रीबन पूरा कर लिया गया है। समुद्र पर पानी से इसकी ऊँचाई क़रीब 25 फुट है। इस पुल से मुंबई शहर का नज़ारा बड़ी आसानी से देखा जा सकेगा और मुंबई शहर में बने कंकरीट के जंगल को निहारा जा सकेगा। फोर लेन और टू-वे के आधार पर डिजाइन किये जाने वाला यह समुद्री पुल भारत के अब तक के सबसे लम्बे पुलों में से एक होगा। इस पुल का निर्माण तक़रीबन 97 फ़ीसदी पूरा हो चुका है। संभवत: साल 2024 के चुनाव से पहले इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करें!

मुंबई ट्रांस-हार्बर लिंक नाम के इस विशाल समुद्र का पुल का 16.5 किलोमीटर हिस्सा समुद्र पर बना है, जबकि बाक़ी का 5.5 किलोमीटर हिस्सा ज़मीन पर बना है। इस पुल में 180 मीटर लम्बा ऑर्थोट्रॉपिक स्टील डेक (ओएसडी) स्थापित किया गया है। इस डेक की मदद से समुद्री जहाज़ों को पुल के नीचे से गुज़रने के दौरान नेविगेट किया जा सकेगा, ताकि समुद्री जहाज़ों पर किसी प्रकार का दबाव न पड़े और उनकी गति व दिशा में कोई परिवर्तन न हो सके। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पुल निर्माण की हरेक प्रक्रिया और गतिविधि पर नज़र रखे हुए हैं। उम्मीद की जा रही है कि साल 2024 के शुरू होने से पहले ही भारत के सबसे लम्बे इस समुद्री पुल को जनता के लिए खोल दिया जाएगा।

बता दें कि यह देश का ऐसा पहला पुल होगा, जिसे ओपन रोड टोलिंग (ओआरटी) प्रणाली सुविधा से लैस किया गया है। 22 किलोमीटर लम्बे इस पुल के निर्माण को तेज़ी से पूरा किया जा रहा है, जिससे मुंबई का सेवरी इलाक़ा और रायगढ़ का चिर्ले इलाक़ा सीधे-सीधे जुड़ जाएगा। अब तक सेवरी से चिर्ले जाने में क़रीब 2.5 से 3 घंटे का समय लगता है; लेकिन पुल के ज़रिये यह समय केवल 20 मिनट का हो जाएगा। यानी इतनी लम्बी दूरी तय करने में सिर्फ़ 20 मिनट लगा करेंगे।

मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) की मानें तो भारत में पहली बार इतना आधुनिक पुल बन रहा है। पुल में ऑर्थोट्रॉपिक स्टील डेक (ओएसडी) का उपयोग भी पहली बार किसी पुल में किया जा रहा है। पूरे पुल में कुल 70 ऑर्थोट्रॉपिक स्टील डेक असैंबर करके लगाये जा रहे हैं। ज़्यादातर ऑर्थोट्रॉपिक स्टील डेक लग चुके हैं। ये ऑर्थोट्रॉपिक स्टील डेक जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और म्यांमार में बने हैं, जिन्हें समुद्र के रास्‍ते भारत के करंजा पोर्ट के असेंबली यार्ड तक लाया गया है।

इस पुल से गुज़रने वाले वाहनों को टोल सिस्टम से मुक्ति नहीं होगी, यानी गुज़रने वालों को टोल टैक्स भरना होगा, लेकिन राहत की बात यह है कि इस पुल पर ओपन टोलिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिसकी मदद से वाहन चालकों को टोल भरने के लिए कहीं रुकने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि चलते-चलते टोल टैक्स कट जाएगा।

समुद्र पर बन रहे इस पुल को लेकर मुंबई के लोगों में काफ़ी उत्सुकता है। लोग इस पुल पर चलने के लिए उत्सुक हैं। मुंबई के निवासी दिनेश साठे नाम के एक व्यक्ति ने बताया कि मुंबई के समुद्र पर पुल बनने से लोगों का टाइम और पैसा बचेगा। मुंबई में टाइम की क़ीमत बहुत है। यहाँ किसी के पास $फालतू टाइम नहीं है, लेकिन ट्रैफिक में न चाहते हुए भी बहुत टाइम ख़राब होता है, जिसकी बचत इस पुल पर चलने वालों के लिए एक बड़ी सहूलियत होगी। लेकिन अभी मुंबई में कई इलाक़े ऐसे हैं, जहाँ हर रोज़ जाम लगता है। मुंबई की लोकल ट्रेनों से लेकर सडक़ों तक पर जिधर देखो मुंडी ही मुंडी (लोगों के सिर ही सिर) नज़र आती है। सरकार इधर भी ध्यान दे।

बहरहाल, मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक पुल के निर्माण से मुंबई के एक हिस्से को बड़ी राहत मिलने वाली है। इससे मुंबई में पर्यटकों का आकर्षण भी और बढ़ेगा। पुल से समुद्र और मुंबई देखने का नज़ारा कौन नहीं देखना चाहेगा। लेकिन इस पुल पर गाड़ी रोककर रखने पर चालान और सज़ा का प्रावधान भी हो सकता है। इसलिए चलते-चलते ही समुद्र और मुंबई का नज़ारा कोई देख सकता है।

भारत में समुद्र पर बने अन्य पुल

भारत एक ओर अरब सागर से दूसरी ओर हिंद महासागर से और तीसरी ओर बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ देश है। अगर इतिहास की बात करें, दुनिया का और भारत का सबसे पहले समुद्री पुल के निर्माण का श्रेय त्रेता युग में भगवान राम के समय में नल और नील को जाता है। लेकिन भारत के दक्षिण स्थित रामेश्वरम् से लेकर श्रीलंका तक बने होने के इस समुद्री पुल के दावों पर अभी भी कई विवाद हैं। हालाँकि हाल के कुछ वर्षों में इस पुल के होने की बातों को कुछ वैज्ञानिकों और खोजी लोगों ने स्वीकार किया है; लेकिन कुछ लोग अभी भी नहीं मानते कि उस दौर में समुद्र पर कोई पुल बना होगा। लेकिन हिन्दू धर्म ग्रंथ वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस में इस पुल का ज़िक्र किया गया है। कहा जाता है कि इस पुल का नाम राम सेतु रखा गया था, जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है। ये समुद्री पुल भारत के पंबन आइलैंड को श्रीलंका से जोड़ता था। इस राम सेतु के अतिरिक्त भारत में पिछले कुछ वर्षों में अन्य कई समुद्री पुल भी बने हैं।

पम्बन पुल

पम्बन पुल भारत के तमिलनाडु राज्य से लगे समुद्र के पम्बन द्वीप को मण्डपम् से जोडऩे वाला एक रेल पुल है। इसका निर्माण अगस्त, 1911 से शुरू हुआ था और पौने तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद यह पुल 24 फरवरी 1914 को ट्रेनों के लिए खोला गया। रामसेतु के बाद यह भारत का एकमात्र समुद्री सेतु बना था, जिसकी लम्बाई 2.065 किलोमीटर है। साल 2010 में बान्द्रा-वर्ली समुद्रसेतु के खुलने तक यह भारत का सबसे लम्बा समुद्री पुल बना रहा।

साल 1988 में इस रेल पुल के बराबर एक सडक़ पुल और बनाया गया, जो कि राष्ट्रीय राजमार्ग 87 का हिस्सा है। पाम्बन पुल का मुख्य छोर 9ए 16′ 56.70″ नॉर्थ 79ए 11′ 20.12″ ईस्ट पर स्थित है। यह पुल पर चक्रवात-प्रवण उच्च वायु वेग क्षेत्र में आने के कारण फ्लोरिडा के बाद दुनिया के सबसे संवेदनशील और ज़्यादा रखरखाव की आवश्यकता वाला समुद्री पुल है। संक्षारक वातावरण में बना 143 खंभों पर बना यह रेलवे पुल समुद्र तल से क़रीब 41 फुट ऊँचा है। इसमें दो पतरे लगे हैं, जिसमें हर एक पतरे का वज़न 415 टन है।

बांद्रा-वर्ली सी लिंक

मुंबई में बांद्रा-वर्ली सी लिंक यानी राजीव गाँधी सी लिंक नाम का समुद्री पुल भारत का अब तक का सबसे लम्बा पुल रहा है। इसकी लम्बाई 5.6 किलोमीटर है। लेकिन मुंबई के मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के आगे ये बहुत छोटा पुल हो जाएगा। 8 लेन ट्रैफिक वाला यह पुल माहिम-वे पर बांद्रा को वर्ली से जोड़ता है। इस पुल को 30 जून, 2009 में उद्घाटन करके 1 जुलाई 2009 की आधी रात को जनता के लिए खोल दिया गया था। इस पुल के कारण पौन घंटे में तय होने वाली बांद्रा और वर्ली के बीच दूरी सिर्फ़ 8 मिनट के अंदर तय हो जाती है।

वाशी पुल

वाशी पुल भी मुंबई में ही बना है। इसे थाणे क्रीक ब्रिज भी कहते हैं। 1,837 मीटर लम्बा यह पुल मुंबई सिटी को थाणे खाड़ी से जोड़ता है। इस पुल को मुंबई में प्रवेश का चौथा एंट्री प्वाइंट माना जाता है। सन् 1973 में बना यह पुल मुंबई के उपनगर मानखुर्द को मुंबई के सेटेलाइट शहर नवी मुंबई के वाशी से जोड़ता है। लेकिन अब यह पुल बंद रहता है। कहा जाता है कि इस पुल को तकनीकी ख़राबी के चलते बंद किया गया है, ताकि कोई हादसा न हो जाए।

अतरौली पुल

अतरौली पुल भी मुंबई के ही समुद्र में स्थित है। अतरौली दूसरा समुद्री पुल है, जो मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ता है। 3.8 किलोमीटर लम्बा यह पुल थाणे, बेलापुर और ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे को जोडऩे के लिए बनाया गया था। यह पुल ऐरोली में ठाणे-बेलापुर रोड पर एक जंक्शन बनाता है और मुलुंड को नवी मुंबई के विभिन्न व्यापारिक केंद्रों से जोड़ता है। इस पुल का उपयोग मुंबई में सर्वाधिक किया जाता है।

उत्तर प्रदेश में औद्योगीकरण की राह नहीं आसान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश बनाने के प्रयास में लगे हैं। पिछले दिनों उनके नेतृत्व में लखनऊ में आयोजित हुए यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट- 2023 का उद्देश्य भी यही था। इस समिट में निवेशकों ने 20 से अधिक औद्योगिक क्षेत्रों में 33.52 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की जो रुचि दिखायी उससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अत्यंत उत्साहित हैं।

भले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में विभिन्न उद्योगों, विशेषकर डेयरी उद्योग को फलीभूत करना चाहते हैं; मगर उत्तर प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश बनाने में अनेक चुनौतियाँ हैं। क्योंकि पहले भी कई बार उत्तर प्रदेश में निवेशकों के ऐसे सम्मेलन हो चुके हैं, मगर कोई योजना आज तक परवान नहीं चढ़ सकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पहले कार्यकाल में भी देशी तथा विदेशी निवेशकों को उत्तर प्रदेश में उद्योग करने के कई निमंत्रण दे चुके हैं। 2018 में भी निवेशक सम्मेलन उन्होंने किया था, मगर उसका कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।

इस बार के यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2023 की बात करें, तो निवेशकों ने कुल निवेश में से डेयरी उद्योग तथा पशुधन योजना में 35,569 करोड़ रुपये का निवेश करने पर सहमति जतायी है। इसमें डेयरी उद्योग पर 31,116 करोड़ रुपये तथा पशुपालन पर 4,453 करोड़ रुपये का निवेश तय हुआ है। कहा जा रहा है कि कुछ ही समय बाद उत्तर प्रदेश डेयरी उद्योग में देश का अग्रणी राज्य होगा, जो कि प्रदेश के 72,000 से अधिक युवाओं को रोज़गार प्रदान करेगा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों के अनुसार, इन दोनों उद्योगों को स्थापित करने के लिए पशुपालन विभाग के मार्गदर्शन में पाँच सदस्यीय समिति कार्य में जुट गयी है। यह समिति सुनिश्चित करेगी कि डेयरी उद्योग में 1051 तथा पशुधन क्षेत्र में 1432 निवेश प्रस्तावों को शीघ्र ही भुनाया जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश हैं कि सभी उद्योगों के लिए मिले निवेश प्रस्तावों पर तीव्रता से कार्य हो, ताकि प्रदेश की आय के रास्ते खुलें। राज्य के पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह डेयरी उद्योग तथा पशुपालन में सुगमता के लिए जुट गये हैं। प्रदेश में विभिन्न उद्योगों की स्थापना के लिए औद्योगिक विकास विभाग और निवेशक उत्तर प्रदेश दल विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की समितियों की मदद करेंगे।

भले ही यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2023 में निवेशकों ने निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन, डेयरी उद्योग, अक्षय ऊर्जा तथा अन्य कई औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश करने की रुचि दिखाकर प्रदेश के युवाओं में एक नयी आशा जगायी है; मगर इससे प्रदेश के सभी या अधिकतर युवाओं को नौकरी मिलना सम्भव नहीं है। कहा जा रहा है कि इस उद्योग से लगभग 72,000 नौकरियाँ युवाओं को मिलेंगी।

यह ऊँट के मुँह में जीरा ही है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में लगभग 3.42 करोड़ युवा हैं। इतनी बड़ी संख्या में 72,000 को नौकरी मिलने का अर्थ है 1,000 से अधिक युवाओं में दो युवाओं को नौकरी मिलना।

बंद हो चुके अनेक उद्योग

उत्तर प्रदेश में स्वतंत्रता के पहले तथा बाद के कुछ दशकों में खुले सैकड़ों उद्योग बन्द हो चुके हैं। बन्द होने वाले उद्योगों में निजी तथा सरकारी दोनों ही के उद्योग सम्मिलित हैं। अगर केवल दो जनपदों बरेली तथा पीलीभीत की बात करें, तो यहाँ के लगभग 70 प्रतिशत उद्योग पिछले चार दशकों के अंदर बन्द हो चुके हैं। बरेली का फर्नीचर उद्योग, पतंग उद्योग में अब पहले जैसा उछाल नहीं रहा है। बरेली के पश्चिमी फ़तेहगंज में बनी रबड़ फैक्ट्री, कई प्लाई कम्पनियाँ, कत्था फैक्ट्री, सरकारी चीनी मिलें, साइकिल कम्पनियाँ, काग़ज़ फैक्ट्रियाँ या तो बन्द हो चुकी हैं या बन्द होने की दशा में हैं। ऐसे ही पीलीभीत के कई औद्योगिक संस्थान आज वीरान पड़े हैं।

दुर्भाग्य की बात यह है कि प्रदेश में कांग्रेस, भाजपा, सपा तथा बसपा इन सभी पार्टियों की सरकारें बनी हैं; मगर किसी भी पार्टी की सरकार में चार दशक के अंदर बन्द होने वाले उद्योगों को दोबारा चालू करने के सार्थक प्रयास नहीं हुए। सन् 2007 से सन् 2012 तक जब बसपा की सरकार बनी थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह ही प्रदेश में नये उद्योगों की स्थापना के प्रयास किये थे, जो सफल नहीं हुए। मगर उन्होंने भी बन्द पड़े उद्योगों को दोबारा चालू करने में कोई विशेष रुचि नहीं दिखायी।

सबसे बड़ी चुनौतियाँ

उत्तर प्रदेश में नये उद्योगों की स्थापना में सबसे बड़ी चुनौती भूमि है। किसान कृषि योग्य भूमि देना नहीं चाहते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की भूमि तो कृषि के लिए अति उत्तम मानी जाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भूमि अधिग्रहण के $कानूनों को सरल करने का प्रयास किया है। वर्तमान केंद्र सरकार ने भी यह प्रयास किया है। मगर किसान आसानी से अपनी उपजाऊ भूमि देना नहीं चाहेंगे। अगर सरकार पुराने बन्द पड़े औद्योगिक संस्थानों की भूमि का अधिग्रहण करे, तो उसके लिए आसानी भी हो सकती है तथा कृषि योग्य भूमि भी ख़राब नहीं होगी। प्रदेश में औद्योगिक इकाइयाँ लगाने के लिए बाहर से निवेशक तो आ चुके हैं; मगर चुनौतियों से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को तैयार रहना होगा। कमुआँ निवासी नंदराम मास्टर कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वो अत्यधिक सराहनीय हैं मगर उद्योगों को स्थापित करने में चुनौतियों से निपटने पर उन्हें ध्यान देना होगा।

पहली चुनौती तो यही है कि प्रदेश में औद्योगिक नीतियों को सुगम बनाना होगा, ताकि प्रदेश के लोग भी उद्योग स्थापति करने के लिए आगे आ सकें। अधिकारियों को ईमानदार तथा सहयोगी बनाने की दिशा में कार्य करने की अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि देखा जाता है कि कोई व्यक्ति किसी कार्य को आरम्भ करने के लिए लाइसेंस लेने जाए, तो उसे सम्बन्धित विभाग अधिकारियों तथा कर्मचारियों को रिश्वत तक देनी पड़ती है। अगर इच्छुक व्यक्ति ऐसा नहीं करता, तो उसे लाइसेंस नहीं मिलता।

प्रक्रिया हो सरल, बिजली हो सस्ती

प्रदेश में उद्योग अथवा दूसरे व्यवसायों को स्थापित करने के लिए प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त सरकार तथा प्रशासनिक अधिकारियों को बिना किसी भेदभाव के लोगों को व्यवसाय स्थापित करने के लिए उनका सहयोग करना होगा। मीरगंज क्षेत्र के बड़े व्यापारी प्रकाश कहते हैं कि उद्योगों की स्थापना के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए। मगर आज भी प्रदेश में उद्योगपतियों तथा व्यापारियों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यवसायी कोई व्यवसाय कर रहा है, तो उसे उसके व्यवसाय से सम्बन्धित विभाग की कई प्रक्रियाएँ इतनी जटिल होती हैं कि उनसे पार पाना आसान नहीं होता।

इसके अतिरिक्त व्यवसाय के लिए बिजली महँगी पड़ती है। भारी भरकम जीएसटी तथा तमाम तरह के सुविधा शुल्क व्यापारियों को भरने पड़ते हैं। इस ओर भी सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है। कहने का अर्थ यह है कि प्रदेश में उद्योग तथा व्यवसाय स्थापित करने तथा उन्हें चलाने के लिए प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, ताकि व्यापारियों को अपने प्रतिष्ठान चलाने में सुगमता हो सके।

पशु पालन नहीं आसान

उत्तर प्रदेश में डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए पशुधन पालन की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए गोपालन को योगी आदित्यनाथ सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही बढ़ावा देने में लगी है। योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के उपरांत प्रदेश में कई गोशालाएँ स्थापित हुई हैं। अब प्रदेश में कई सरकारी तथा निजी गौशालाएँ हैं। अब एक बार पुन: योगी आदित्यनाथ सरकार गोसंरक्षण और गोपालन को बढ़ावा देने के लिए गोपालन की इच्छुक स्वयंसेवी संस्थाओं एवं लोगों को लीज पर 25 से 30 एकड़ नि:शुल्क भूमि मुहैया कराने की योजना बना रही है। मगर दुधारू पशुओं का पालन इतना आसान नहीं है। इसका कारण चारे वाली फ़सलों की कमी, चोकर तथा वाटे पर बढ़ी महँगाई, पशुओं को चराने के लिए मैदानों का न होना आदि है। इसके अतिरिक्त एक चुनौती यह है कि दूध का भाव बहुत कम है। दुग्ध कम्पनियाँ किसानों से 32 से 38 रुपये प्रति लीटर जिस दूध का क्रय करती हैं, उसकी क्रीम खींचकर भी 60 रुपये प्रति लीटर से अधिक में उसकी बिक्री करती हैं।

दुग्ध उत्पादन की सच्चाई

समाचारों के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक प्रदेश है। कहा जाता है कि देश में होने वाले कुल दुग्ध उत्पादन का 16.60 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन अकेले उत्तर प्रदेश में होता है। सरकारी आँकड़े कहते हैं कि वर्तमान में प्रदेश में प्रतिदिन 8.72 करोड़ लीटर से अधिक दुग्ध उत्पादन हो रहा है, जिसमें से 48 प्रतिशत खपत प्रदेश में है, तथा शेष 52 प्रतिशत दूध दूसरे प्रदेशों को निर्यात होता है।

सरकारी आँकड़ों की मानें, तो पिछले पाँच वर्षों में उत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत दुग्ध उत्पादन बढ़ा है। अब योगी सरकार उत्तर प्रदेश में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए 1,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। इसके अतिरिक्त निवेशकों द्वारा 35,569 करोड़ डेयरी उद्योग तथा पशुपालन के लिए व्यय किये जाएँगे। इससे अनुमानित तौर पर दुग्ध उत्पान डेढ़ से दो गुना होने की आशा है। वर्तमान में प्रदेश में 110 डेयरी प्लांट लगे हैं। इनमें 13 डेयरी प्लांट सरकारी तथा शेष 97 निजी डेयरी प्लांट हैं। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है, इसे जानने के लिए गाँवों में पशुपालकों से जानकारी सरकार को लेनी चाहिए।

गंगाराम नाम के एक पशुपालक ने बताया कि 8-10 साल पहले उनके पास चार-पाँच भैंसें थीं, मगर अब दो ही हैं। रामसेवक नाम के पशुपालक बताते हैं कि उनके बचपन में उनके घर में 10-15 गायें पलती थीं, मगर अब एक ही गाय है घर में दूध के लिए। एक पशुपालक ने बताया कि अब पशु पालना आसान भी नहीं है तथा गोरक्षा की मुहिम के बाद लोगों ने गाय पालनी कम कर दी हैं। प्रदेश में सन् 2012 की तुलना में सन् 2019 में गोवंश की संख्या में 3.93 प्रतिशत की कमी आ चुकी थी। इन चुनौतियों को देखते हुए स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दूध की नदियाँ बहाना उतना आसान नहीं है, जितना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मानकर चल रहे हैं। अपना सपना पूरा करने के लिए उन्हें धरातल पर उतरकर पहले उन समस्याओं से निपटना होगा, जो पशुपालकों के सामने खड़ी हैं।

ख़ुद की तलाश में बशीर बद्र

तालियों की गूँज और वाह-वाह के साथ आज भी जी रहे मशहूर शायर

याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम

कुछ दिनों तक ख़ुदा रहे हैं हम

अब हमें देख भी न पाओगे

इतने नज़दीक आ रहे हैं हम

सब कुछ भुला चुके बशीर बद्र आज भी तालियों की गूँज और वाह-वाह की आवाज़ के साथ ही जी रहे।

बशीर बद्र ने 70 के दशक में एक ग़ज़ल लिखी, जिसका मतला और एक शे’र कुछ यूँ थे- ‘याद अब ख़ुद को आ रहे हैं हम

कुछ दिनों तक ख़ुदा रहे हैं हम

अब हमें देख भी न पाओगे

इतने नज़दीक आ रहे हैं हम’

यह मतला और शे’र कभी महफ़िलों की शान रहे मशहूर शायर पद्मश्री बशीर बद्र के जीवन की सच्चाई बन चुका है। अब डिमेंशिया (मतिभ्रम) बीमारी के चलते न वह वर्षों से शायरी कर रहे हैं और न मंचों पर दिखते हैं। हालाँकि उनके शे’र लोगों के ज़ेहन में आज भी ताज़ा हैं। बशीर बद्र इन दिनों भले ही ख़ुद को भी न पहचान रहे हों; लेकिन वह ख़ुद को ही याद करने का प्रयास कर रहे हों।

बशीर बद्र का इलाज कर रहे रांची के न्यूरो के डॉक्टर उज्ज्वल कहते हैं कि पद्मश्री बशीर बद्र डिमेंशिया रोग से ग्रसित हैं। वह सब कुछ भूल चुके हैं; लेकिन आज भी उन्हें तालियों की गूँज और वाह-वाह का इंतज़ार है। अगर कभी चेहरे पर मुस्कान आती है और मुँह से कुछ शब्द निकलते हैं, तो वह शायराना अंदाज़ में ‘वाह-वाह’ ही होती हैं।

हज़ारों लोग डिमेंशिया से ग्रसित

चिकित्सा विज्ञान के पास डिमेंशिया या अल्जाइमर के कारणों का अभी तक निश्चित उत्तर नहीं है। इसे आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन माना जाता है, जो ज़्यादातर बुजुर्गों को प्रभावित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुसार, दुनिया भर में डिमेंशिया रोग के शिकार मरीज़ों की संख्या 5.5 करोड़ से ज़्यादा है। इसमें अल्जाइमर आम है। वर्ष 2030 तक यह संख्या 7.8 करोड़ होने की संभावना है। वहीं, वर्ष 2050 तक दुनिया भर में इस बीमारी के शिकार मरीज़ों की संख्या 13.9 करोड़ से भी ज़्यादा हो सकती है। इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि डिमेंशिया या अल्जाइमर की बीमारी किस हद तक बढ़ रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत की अगर बात की जाए, तो डिमेंशिया या अल्जाइमर के मरीज़ 60 लाख से अधिक हैं। वर्ष 2050 तक यह संख्या 1.40 करोड़ होने की संभावना है।

बीमारी के दुष्प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि डिमेंशिया और अल्जाइमर से ब्रेन की महत्त्वपूर्ण कोशिकाएँ मर जाती हैं। जिस कारण इंसान की याददाश्त कमज़ोर हो जाती है। इस बीमारी के लक्षण 50-60 साल की उम्र में दिखने लगते हैं। 80-85 साल की उम्र में चीज़ों को भूलना आम बात है। दुनिया में बुजुर्गों की आबादी बढऩे के साथ डिमेंशिया भी अपने पाँव पसार रही है। डॉक्टर उज्ज्वल कहते हैं कि डिमेंशिया बीमारी इंसान के सोचने और समझने की शक्ति को $खत्म कर देती है और उसके व्यवहार में परिवर्तन होने लगता है। बशीर बद्र भी लोगों को पहचानने से लेकर अन्य बातों को भूल चुके हैं और लगभग बिस्तर पर हैं।

ग़ज़ल गायक हैं बशीर के डॉक्टर

झारखण्ड की राजधानी रांची में रहने वाले डॉक्टर उज्ज्वल राय ख़ुद ग़ज़ल गायक हैं। उन्होंने बताया कि ग़ज़ल का शौक़ ही उन्हें बशीर बद्र के नज़दीक ले आया। उन्होंने कहा कि ग़ज़ल के कारण मैं दिल्ली और मुंबई के म्यूजिक डायरेक्टर्स, कवियों, शायरों और जगजीत सिंह, शैलेंद्र सिंह जैसे गायकों के सम्पर्क में आया। इसी शौक़ ने मुझे बशीर बद्र तक पहुँचा दिया। दो साल पहले उनसे बात करने की कोशिश की, तो पता चला वह डिमेंशिया से ग्रसित हैं। मैंने उनका ऑनलाइन ही इलाज शुरू किया। फिर देखा की कुछ फ़ायदा हो रहा, तो भोपाल भी जाने लगा।

88 साल के हुए बशीर बद्र

15 फरवरी डॉ. बशीर बद्र का 87वाँ जन्मदिन था। वह 15 फरवरी, 1936 को कानपुर में हुआ था। भोपाल में रहने वाले बशीर बद्र का पैदाइशी नाम सैय्यद मोहम्मद बशीर है। साहित्य और नाटक अकादमी में किये गये योगदान के लिए उन्हें सन् 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वह दुनिया के दो दर्ज़न से ज़्यादा देशों में मुशायरे में शिरकत कर चुके हैं।

वह आम आदमी के शायर हैं और ज़िन्दगी की आम बातों को बेहद ख़ूबसूरती और सलीक़े से अपनी ग़ज़लों में कह जाना बशीर बद्र की ख़ासियत रही है। उन्होंने ग़ज़ल को एक नया लहजा दिया। यही वजह है कि उन्होंने श्रोता और पाठकों के दिलों में अपनी ख़ास जगह बनायी है। बशीर बद्र के जन्मदिन के मौक़े पर डॉक्टर उज्ज्वल भी भोपाल गये थे। उन्होंने बशीर बद्र की ग़ज़लों को संगीत के साथ अपनी मखमली आवाज़ में पिरोकर एल्बम के रूप में इस मशहूर शायर को जन्मदिन का ख़ूबसूरत तोहफ़ा दिया।

लोगों के साथ की ज़रूरत

डॉक्टर उज्ज्वल ने कहा कि जब मैंने बशीर बद्र का इलाज शुरू किया, तो वह लगभग बिस्तर पर (बेड रीडेन) थे। न कुछ बोलना, न कुछ याद आना। न किसी को पहचानना और न ही कुछ करना। शे’र-ओ-शायरी तो दूर की बात थी। डिमेंशिया में यही सब होता है। धीरे-धीरे लोग खाना-पीना, मल-मूत्र त्याग करना आदि भी भूल जाते हैं। बशीर बद्र उस स्थिति में नहीं पहुँचे थे। इसलिए मुझे कुछ उम्मीद दिखी। बशीर बद्र एक मशहूर शायर हैं। वह हमेशा लोगों से घिरे रहते होंगे। शेरो-शायरी करते रहते होंगे। शायरी उनकी रगों में दौड़ती है। कभी कुछ बोलने का प्रयास करते, तो कहते- ‘हमें और कितनी दूर जाना है, अब हमारा सफ़र कितना बाक़ी है।’

दवा के साथ-साथ मैंने इसी शायरी को उनके इलाज का ज़रिया बनाया। अभी इलाज करते हुए बहुत वक़्त नहीं हुआ है। लेकिन उनमें धीमी गति से ही सही, बेहतरी दिख रही है। इस बार बशीर साहेब के जन्मदिन के मौक़े पर जैसे ही मैं भोपाल उनके पास पहुँचा, तो मुझे देखते ही शायराना अंदाज़ में कहा- वाह! वाह!! आइए-आइए, …विराजिये।

उनकी 88 की उम्र है। एक लम्बे समय से डिमेंशिया से ग्रसित हैं। यह तो नहीं कहा जा सकता कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएँगे और पहले की तरह शायरी कर लगेंगे। लेकिन उम्मीद है कि काफ़ी हद तक ठीक हो जाएँगे। उन्हें गुमनामी नहीं, लोगों की साथ की ज़रूरत है। वह लोगों से घिरे रहना चाहते हैं, जो उनकी सेहत में सुधार का मुख्य ज़रिया बनेगा।

कैसे होगा डिमेंशिया का निदान?

डिमेंशिया के निदान पर ध्यान देने की ज़रूरत है। अगर आप फोन उठाने, खाना खाने से लेकर छोटी-छोटी चीज़ें तक भूल रहे हैं, तो इसे हल्के में न लें और फ़ौरन डॉक्टर से सम्पर्क करें। विशेषज्ञ कहते हैं कि डिमेंशिया वाले 90 फ़ीसदी लोगों का उपचार या निदान कभी नहीं किया जाता है। देश में डिमेंशिया स्क्रीनिंग के लिए पर्याप्त क्लीनिक नहीं हैं। इसलिए इस बीमारी का निदान नहीं हो रहा है। एक तो लोग इसके प्रति जागरूक नहीं हैं। दूसरी शुरुआती इलाज में देरी हो रही है। भारत को एक राष्ट्रीय डिमेंशिया रणनीति की आवश्यकता है, जो हमें इस स्वास्थ्य समस्या से बेहतर तरीक़े से लडऩे के लिए तैयार करे।

हवस में डूबा एक प्रोफेसर

राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा के प्रोफेसर गिरीश परमार ने गुरु-शिष्य परम्परा की जो धज्जियाँ उड़ायी हैं, उससे इस रिश्ते में हैवानियत और दरिंदगी की बदबू आने लगी है। उसने जब मधुलिका (कल्पित नाम) को अपने घर बुलाकर कामयाबी का लालच देकर बिस्तर पर ले जाकर उसके साथ दुराचार करना चाहा, तो वह चीखते हुए झटके के साथ उठी और दरवाज़े की तरफ़ यह कहते हुए दौड़ पड़ी- ‘मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी मेहरबानियाँ।’

एक प्रख्यात शैक्षणिक संस्थान को अपने ग़लीज़ खुरों से रौंदता हुआ प्रोफेसर की नक़ाब ओढ़े वहशी दरिंदा इस तरह से महीनों तक मासूम लड़कियों की अस्मत रौंदता रहा। उसकी करतूतों को जानकर भी संस्थान का प्रशासन अनजान बना रहा। आख़िर इस अंतहीन अत्याचार का अँधेरा छँटने की नौबत तब आयी, जब कुछ लड़कियों ने हौसला दिखाते हुए पुलिस के दरवाज़े पर दस्तक दी। कोटा स्थित राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय की चर्चा अपनी शैक्षणिक विश्वसनीयता और उच्च कोटि के ज्ञानार्जन के लिए होती है। लेकिन इसकी साख और धवलता को प्रोफेसर गिरीश परमार ने इस क़दर कलंकित कर दिया कि लोग इसके नाम से भी थर्राने लगे। इस प्रोफेसर ने विश्वविद्यालय को अय्याशी का अड्डा बना दिया। नंबर देने के नाम पर अपनी बेटी की उम्र की छात्राओं की अस्मत का सौदा करने लगा। इस सौदेबाज़ी की ख़ातिर उसने छात्र-छात्राओं में ही बिचोलिए खड़े कर दिये।

पीडित छात्राओं ने पुलिस को रोंगटे खड़े कर देने वाली आपबीती बतायी। प्रोफेसर की दरिंदगी की चपेट में आयी एक छात्रा तो इस क़दर बदहवास हो गयी कि आत्महत्या का मन बना बैठी। प्रोफेसर के ख़ौफ़ के आगे छात्र अर्पित और छात्रा ईशा इसके दलाल बन गये। विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रॉनिक और कम्युनिकेशन के सिक्स्थ सेमेस्टर की एक छात्रा छाया (कल्पित नाम) मुश्किल में फँस गयी, तो उसने अर्पित से सम्पर्क किया। अर्पित पहले उसे वीराने में ले गया, वहाँ कार में रखी उसकी कॉपियाँ दिखायीं। फिर बोला- ‘पास होना है, तो इन कॉपियों में ठीक से लिख लेना।’ छात्रा ने पूछा- ‘मुझे कितने पैसे देने पड़ेंगे?’ अर्पित ने धीरे-धीरे उससे प्रोफेसर गिरीश परमार से शारीरिक रिश्तों की अपील कर डाली। ग़ुस्से से आगबबूला हुई छाया अर्पित पर झपट पड़ी और उसे कोसते हुए बोली- ‘तू शरीफ़ों की दुनिया में कैसे आ गया?’ अपमान से भन्नाया हुआ अर्पित यह कहकर भागा- ‘तो फिर देख लेना इसका नतीजा।’ डर्टी प्रोफेसर परमार के इस खेल में बिचौलिया बने अर्पित और ईशा यादव भी कम शातिर नहीं थे। परमार के साथ होने वाली तमाम बातें रिकॉर्डिंग करते रहे। संभवत: उन्हें अंदेशा रहा होगा कि कभी वे फँस गये, तो अपने बचाव के लिए उन्हें यह रिकॉर्डिंग मददगार साबित हो सकती है। डर्टी परमार की गंदी बातें इतनी दरिंदगी से भरी थीं कि शरीफ़ आदमी सुन भी न सके। हालात ये कि परमार एक महिला प्रोफेसर तक पर गंदी नज़र रखे हुए था और बिचौलिया बने छात्र अर्पित से भी उसके साथ दरिंदगी करने को उकसाता था।

दूसरी बिचोलिया छात्रा ईशा यादव से कहता है कि वह नयी-नयी लड़कियों को फँसाकर उसके आगे दरिंदगी के लिए परोसे। परमार अपने घर से लेकर सेमेस्टर लेब तक को कुकर्म का अड्डा बना चुका था। अर्पित और ईशा जाल में फँसाकर छात्राओं को फँसाकर प्रोफेसर परमार तक लाते और पिज्जा लेने या दूसरे किसी बहाने से ग़ायब हो जाते। लडक़ी राज़ी हो या न हो, परमार के पिंजरे में आयी लडक़ी बच जाए, ये बहुत मुश्किल था। बाद में वह उस मसली-कुचली छात्रा को अर्पित को भी समर्पित करता। सब पास करने और फेल करने का भँवर जाल बनाकर होता था। कुछ छात्राएँ आसानी से फँस जातीं, तो कुछ जबरदस्ती का शिकार होती रहीं।

पुलिस के पास गंदी और नीचता की 50 रिकार्डिंग्स हैं। परमार के पास से भी पुलिस को 70 से ज़्यादा अश्लील वीडियो मिले हैं। साथ ही 4,200 से अधिक डीपी, छात्राओं व स्टाफ के कई फोटो और 80 से ज़्यादा स्क्रीन शॉट भी बरामद किये हैं। अर्पित तथा ईशा की गिरफ़्तारी के बाद बौखलाया हुआ प्रोफेसर इस क़दर भडक़ उठा कि अपने इन दलालों को अनाप-शनाप बकने लगा। सीआर का चुनाव हारने के बाद ईशा ने लड़कियों से बदला लेने का मन बनाकर इस गंदगी में क़दम रख दिया था। मामले के जाँच अधिकारी डीएसपी अमर सिंह राठौर का कहना है कि छात्राओं को पास कराने की एवज़ में शारीरिक सम्बन्ध के लिए दबाव डालने, एससी, एसटी एक्ट तथा जालसाज़ी और परीक्षा अधिनियम की धारा के तहत परमार और बिचौलियों को गिरफ़्तार किया गया है। फ़िलहाल तीनों आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में है। इधर, परमार के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन ने सख़्त क़दम उठाते हुए क़दम छात्रों और शिक्षकों के बीच मुखबिरों का जाल बिछा दिया है। वहीं महिला आयोग ने तीन सदस्यीय टीम का गठन किया है, जो तथ्यों की परख करने के बाद अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।

एक कक्षा की एक दर्ज़न छात्राएँ सीधे-सीधे परमार के निशाने पर थीं। बची हुई छात्राओं को वह निशाना बनाना चाहता था। अमिता (कल्पित नाम) ने बयान दिया है कि अर्पित ने उसे परमार की बात न मानने पर ज़िन्दगी भर पास न हो सकने की धमकी दी थी। उसने कहा- ‘तू (अमिता) सर (परमार) से रिश्ते बनाने पर ज़िन्दगी भर राज करेगी।’ अनामिका (कल्पित नाम) नाम की छात्रा का ने अर्पित को भी दरिंदा बताया। डर्टी परमार न केवल उसकी बात न मानने वाली छात्राओं फेल कर चुका है, बल्कि ऊँचे ओहदेदारों से अपने सम्बन्धों के दम पर 18 अध्यापकों की तरक़क़ी भी रुकवा चुका था। क़रीब दो दर्ज़न छात्राओं ने अनुसंधान के मामले में परेशान किये जाने पर उसकी शिकायत राज्यपाल से भी की; लेकिन परमार का बाल भी बाँका नहीं हुआ।

मुख्य आरोपी प्रोफेसर गिरीश परमार और दूसरा आरोपी छात्र अर्पित

एक महिला प्रोफेसर ने यहाँ तक कहा है कि उसने जब परमार के सम्बन्ध बनाने से इन्कार किया, तो उसे 14 साल तक एमटेक नहीं करने दिया। परमार की नीचता की हद यह थी कि उसने एक बार मौक़ा देखकर एक महिला कर्मचारी को एकाएक दबोच लिया था। एक महिला लेक्चरर पर भी वह एक बार वहशी दरिंदे की तरह झपट पड़ा था। घटना के बाद जब उस लेक्चरर का पति और देवर उसे धमकाने पहुँचे, तो परमान ने उन्हें उल्टा धमकाते हुए कहा- ‘मुझे कम मत समझाना। 500 रुपये देकर तुम्हारे बीवी को उठवा लूँगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के पास भी इसकी शिकायत पहुँची; लेकिन परमार का कुछ नहीं हुआ। सूत्रों की मानें, तो परमार अय्याशी के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा बैंकॉक और आईलैड तक जाता था। छात्राओं के अलावा कॉल गल्र्स बुलाता था। पैसे की उसे कोई कमी नहीं थी। शायद पैसा उसे उन रसूख़दारों से भी मिलता हो, जिनसे उसके गहरे रिश्ते थे। ज़ाहिर है छात्राओं को फँसाकर वह कहीं और भी उनका ग़लत इस्तेमाल करता होगा।

हालाँकि अभी तक इस बात का ख़ुलासा नहीं हुआ है। लेकिन यह कोई बड़ी बात भी नहीं कि ऐसा हो। परमार की मोबाइल में ऐसी कई कॉल गल्र्स की तस्वीरें मिली हैं। उसके खेल में प्रोफेसर राजीव गुप्ता भी शामिल था। एक महिला संविदाकर्मी ने जब परमार पर आरोप लगाया, तो परमार की पैरोकार राजीव की पत्नी भारती उल्टा संविदाकर्मी पर ही दुश्मनी निकालने का आरोप लगाने लगी। छात्राओं का कहना है कि प्रोफेसर परमार सैक्स साइको है और वहशी भेडिय़े की तरह विश्वविद्यालय की छात्राओं की अस्मत को रौंद रहा था। फ़िलहाल राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में छात्राओं को पास करने की एवज़ में सम्बन्ध बनाने को मजबूर करने के मामले में पुलिस ने 4,000 पन्नों की चार्जशीट तैयार कर ली है, जिसे जल्द ही अदालत में पेश किया जाएगा। इस मामले में 30 से अधिक गवाहों, पूर्व व वर्तमान छात्राओं के बयान लिये गये हैं। वहीं छठवें सेमेस्टर की 34 कॉपियाँ भी ज़ब्त की हैं। पुलिस ने चार्जशीट में सात छात्राओं के बयान दर्ज किये हैं। आरटीयू के कुलसचिव, रजिस्ट्रार, परीक्षा नियंत्रक हित अन्य स्टाफ के बयान शामिल है। पुलिस ने गिरीश परमार, अर्पित और ईशा की कॉल डिटेल्स भी निकलवायी हैं।

डीएसपी अमर सिंह ने बताया कि पुलिस को क़रीब 50 से अधिक ऑडियो मिले थे। इनमें छात्रा-प्रोफेसर, और पीडि़ता दोनों स्टूडेंटस के बीच बातचीत है। इनमें प्रोफेसर सभी के लिए अभद्र भाषा का बोल रहा है। कुल 30 ऑडियो की जाँच हो रही है। इनमें पूरी ट्रांस स्क्रिप्ट तैयार की है। हालाँकि तीनों आरोपियों ने वॉयस सैंपल देने से इन्कार कर दिया था। पुलिस ने इन्हें एफएसएल लैब भेजा है। इससे आगे मामले में मदद मिलेगी।

आदि महोत्सव और आदिवासियों की ज़मीनी ज़िन्दगी

PM at the inauguration of ‘Aadi Mahotsav’ at Major Dhyan Chand National Stadium, in New Delhi on February 16, 2023.

जल, जंगल और ज़मीन की रक्षा के लिए सैकड़ों वर्षों से संघर्षरत प्रकृतिवादी आदिवासी समाज आज भी ग़रीबी, अशिक्षा, कुपोषण और आवश्यक ज़रूरतों से वंचित है। सरकार आदिवासी समाज के सच्चे देशप्रेम की भावना को समझना नहीं चाहती है यहीं कारण है कि सरकार की विकास योजनाओं के लाभ से आज भी आदिवासी समुदाय वंचित है।

उल्टे सरकार ही आदिवासी समाज के जल, जंगल, ज़मीन को लूटने में उद्योगपतियों की सहयोग करने लगी है। आदिवासी अंग्रेजी शासन के दौरान भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे और आज भी लड़ रहे हैं। आदिवासी समुदाय से भारत के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर महामहिम द्रौपदी मुर्मू के विराजमान होने पर बेशक आदिवासी लोगों को लगता हो कि उनके समाज, संस्कृति और जल जंगल ज़मीन की रक्षा होगी; लेकिन इसकी उम्मीदें कम ही हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि आदिवासी समाज जिन जंगलों को, ज़मीनों को सुरक्षित रखना चाहता है, उन्हें सदियों से उनसे जबरन छीने जाने में और उनके घरों को उजाडऩे में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ही मुख्य भूमिका है। उद्योगपति सरकार की मिलीभगत से ही आदिवासियों के जल, जंगल, ज़मीन छीनकर उनकी ज़िन्दगी को तबाह कर देते हैं। आदिवासियों के ऊपर ऐसे अत्याचार की सैकड़ों सच्ची घटनाएँ न सिर्फ़ बेचैन करती हैं, बल्कि सच्चे देशप्रेमी आदिवासियों के प्रति सरकार के ग़ैर-जिम्मेदार रवैये को भी दर्शाती हैं। 

हाल ही में आदिवासी समुदाय के प्रोत्साहन और जनजातीय संस्कृति, शिल्प, खान-पान, वाणिज्य, पारम्परिक कला को प्रदर्शित के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आदि महोत्सव का आयोजन केंद्र सरकार द्वारा किया गया। इस महोत्सव का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस पूरे कार्यक्रम में जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा उनके साथ रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी महानायक बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि देने के बाद अपने भाषण में आदिवासियों की संस्कृति की तारीफ़ की और अपनी सरकार में उनके विकास के दावे किये। उन्होंने आदिवासी समाज का हित व्यक्तिगत बताया। उन्होंने एक बात पूरी तरह सही कही कि आज भारत विश्व को बताता है कि अगर आपको जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों का समाधान चाहिए, तो आदिवासियों की जीवन परम्परा देख लीजिए, आपको रास्ता मिल जाएगा।

विश्व की बात तो छोडि़ए, प्रश्न यह है कि भारत में कितने लोग आदिवासियों के प्रकृति प्रेम को समर्थन दे रहे हैं और कितने लोग आदिवासियों के साथ मिलकर प्रकृति को, जल जंगल ज़मीन को बचाना चाहते हैं? बड़े-बड़े पूँजीपति, माफिया, तस्कर सरकारों के साथ मिलकर उन्हीं आदिवासियों को कुचल रहे हैं, जो आदिवासी दुनिया को प्रकृति से जुडक़र जीना सिखा रहे हैं। इन समुदायों की ज़मीनी ज़िन्दगी बिल्कुल सीधी-सादी और प्रकृतिवादी होती है, इसके बावजूद भी इन पर अत्याचार ग़ुलामों और आतंकवादियों की तरह किया जाता है। आज भी सीधे-साधे आदिवासियों को नक्सली ठहराकर उन पर दिल दहला देने वाले अत्याचार किये जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास से आदिवासियों के शिल्प, कला और संस्कृति को बढ़ावा ज़रूर मिलेगा, किन्तु क्या आदिवासियों की उन समस्याओं का समाधान हो सकेगा, जिनके लिए वे सदियों से संघर्ष कर रहे हैं?

जल, जंगल, ज़मीन का संघर्ष

आदिवासियों के लिए अपने आस्तित्व जल, जंगल, ज़मीन को बचाने की चुनौती सबसे बड़ी है। कभी नौकरी का झाँसा देकर, कभी मुआवज़े का झाँसा देकर, तो कभी तरक़्क़ी के नाम पर जबरन आदिवासियों की ज़मीनें छीनी जाती रही हैं, उनकी बस्तियाँ उजाड़ी जाती रही हैं। आदिवासी इलाक़ों में माइनिंग, जंगलों का कटान, भू-संसाधनों का दोहन जिस गति से पिछले 75 वर्षों में हुआ है, उसने सीधे-साधे आदिवासियों की ज़िन्दगी तहस-नहस कर दी है। सुविधाओं के मामले में आदिवासियों से सरकारों का सौतेला व्यवहार किसी से छिपा नहीं है।

भाषा और संस्कृति के लिए संघर्ष

भारत में सभी आदिवासी समुदायों की अपनी भाषा, रीति-रिवाज, अपनी संस्कृति, अपना जीवन दर्शन हैं। लेकिन ये मुख्यत: तीन भाषाई समुदायों में बांट दी गयी हैं- गोंडी, द्रविड़, आस्ट्रिक। किन्तु भीली, संताली, मुंडारी, हो, कुड़ुख, खडिय़ा, बोडो, डोगरी, टुलु, हलबी और सादरी जैसी भाषाएँ आदिवासियों की देन हैं। भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से 22 को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है, जिनमें दो आदिवासी भाषाएँ- संताली और बोड़ो ही आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों के आदिवासी आज भी अपनी-अपनी भाषाओं को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह आदिवासी अपनी संस्कृति-सभ्यता को बचाने की लड़ाई आज़ादी से पहले से कर रहे हैं। आज़ादी के बाद उन्हें सांस्कृतिक संरक्षण मिलना चाहिए, किन्तु आज़ादी के 75 साल बीत जाने के बावजूद आदिवासी समाज संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज़ को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ओडिशा का आदिवासी मेला

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में वार्षिक राज्य स्तरीय आदिवासी मेला भी 20 फरवरी, 2023 से 1 मार्च, 2023 तक लगा है। इस बार इस मेले में टीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी, माइक्रो प्रोजेक्ट्स, मिशन शक्ति, ओडिशा रूरल डेवलपमेंट एंड मार्केटिंग सोसायटी, ट्राइबल डेवलपमेंट को-ऑपरेटिव कॉरपोरेशन शामिल रहे। इस मेले में लगे 100 स्टॉलों में से 80 पर आदिवासी संस्कृति की झलक दिखी।

तरह-तरह की परेशानियों और संघर्षों के बीच सीधी-सादी ज़िन्दगी जी रहे ओडिशा के आदिवासी आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। आज़ादी के 75 वर्षों में न तो उन्हें मुख्यधारा में लाया गया है और न ही उनका अपना अस्तित्व सुरक्षित है। ओडिशा के दक्षिणी पश्चिमी ज़िलों कालाहांडी और रायगढ़ में 250 वर्ग किलोमीटर में फैली नियामगिरी पर्वत शृंखला को बचाने के लिए यहाँ के आदिवासी संघर्षरत हैं। इस पर्वत पर डोंगरिया कोंध नाम के आदिवासी रहते हैं। डोंगरिया नियामगिरी पर्वतों को अपना पूर्वज और सबसे पहला राजा पेनु कहते हैं। प्रकृति प्रेमी आदिवासी इस पर्वत को बचाने के लिए अपनी जान पर खेल जाते हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस की शह पर इन आदिवासियों पर माइनिंग, जंगलों के कटान और भू संसाधनों के दोहन के लिए लगातार अत्याचार होते रहते हैं। इनके संघर्ष में न तो कोई राजनीतिक पार्टी शामिल है और ना ही वे लोग जो अपने को प्रकृति प्रेमी कहते हैं।

क़ीक़त में कोई सुधार नहीं

मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र के रहने वाले राजेश पाटिल ने आदिवासियों की मूल समस्याओं को रखते हुए कहा कि आदिवासियों की समस्याओं पर ध्यान देने से ज़्यादा उन्हें लूटने की साज़िश की जाती रही है। इसकी वजह यह है कि आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले संगठन और संस्थान कम हैं। जो है, वो बाहरी ज़्यादा है। एनजीओ भी ग़ैर-आदिवासी लोगों के ज़्यादा हैं, जो आदिवासियों के हितों से कोई ख़ास मतलब नहीं रखते।

मध्य प्रदेश सरकार विज्ञापनों के ज़रिये यह प्रचार कर रही है कि उसने पूरे प्रदेश में नल से जल की व्यवस्था कर दी है, पर सच्चाई यह है कि मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में आज भी आदिवासी समाज की महिलाएँ और पुरुष पीने तक का पानी लेने के लिए कई-कई किलोमीटर दूर जाते हैं। उस बुरहानपुर ज़िले में भी, जिसे नल से जल के लिए देश का पहला ज़िला घोषित किया जा चुका है। आदिवासियों को आज भी दिहाड़ी मज़दूर बनाकर उनसे कम मज़दूरी में काम कराया जाता है। इसी को यह कहकर दिखाया जाता है कि आदिवासियों को रोज़गार दिया गया है, उनका विकास किया गया है। आदिवासियों के विकास के सरकारी दावों की सच्चाई अगर जाननी हो, तो वो आदिवासी क्षेत्रों में जाने से पता चलेगी।