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भाग-2 फर्जी डॉक्टर

अस्पतालों और फर्जी डॉक्टरों पर नकेल कसने का समय

‘तहलका’ की इस जाँच रिपोर्ट (भाग-2) से पता चलता है कि कैसे अस्पताल विदेशी मेडिकल स्नातकों को कम वेतन पर नियुक्त करते हैं और अनिवार्य एफएमजीई पास करने में उनकी विफलता को नजरअंदाज कर दिया जाता है। रिपोर्ट के इस दूसरे भाग में ‘तहलका’ ने ऐसे और छात्रों का भंडाफोड़ किया है, जिन्होंने पाकिस्तान और रूस से एमबीबीएस किया है और एफएमजीई परीक्षा पास किये बिना भारत में डॉक्टरी की प्रैक्टिस कर रहे हैं। इस बार की जाँच पाकिस्तान के मेडिकल कॉलेजों द्वारा नकली डॉक्टर बनाने तक की गयी है। पढ़ें तहलका एसआईटी की आगे की रिपोर्ट :-

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‘पाकिस्तान में चिकित्सा शिक्षा का स्तर काफी ऊँचा है। मुझे वहाँ मेडिकल परीक्षा पास करना मुश्किल लगा। मैंने 2020 में फातिमा जिन्ना मेडिकल यूनिवर्सिटी (लाहौर), पाकिस्तान से एमबीबीएस पूरा किया और 2021 में मैंने सर गंगा राम अस्पताल, लाहौर से इंटर्नशिप की। उसके बाद 22 अप्रैल को मैं कश्मीर लौटी और 22 जून से कश्मीर के एक निजी अस्पताल में काम कर रही हूँ।‘ यह शब्द हैं सादिया खान (बदला हुआ नाम) के, जो कश्मीर की रहने वाली हैं। ‘तहलका’ से फोन पर बात करते हुए सादिया ने बताया कि पाकिस्तान से एमबीबीएस करने के बाद वह भारत लौटीं। उन्होंने स्वीकार किया कि विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (एफएमजीई) परीक्षा उत्तीर्ण किये बिना, जो सभी विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए भारत में मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए अनिवार्य है, उसने कश्मीर के एक निजी अस्पताल में प्रैक्टिस शुरू कर दी।

पिछले अंक में हमने खुलासा किया था कि हर साल विदेशी विश्वविद्यालयों से मेडिकल डिग्री वाले हजारों भारतीय एफएमजीई परीक्षा में बैठते हैं। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) की तरफ से आयोजित स्क्रीनिंग टेस्ट और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (पूर्व में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) द्वारा इन स्नातकों के लिए अनिवार्य की गयी यह परीक्षा भारत में प्रैक्टिस हेतु उनकी योग्यता का आकलन करने के लिए आयोजित की जाती है। रूस, यूक्रेन, चीन, फिलीपींस, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों के विदेशी मेडिकल स्नातकों को एफएमजीई पास करने के बाद ही भारत में अभ्यास करने की अनुमति दी जाती है। हालाँकि अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड के एमबीबीएस स्नातकों को परीक्षा देनी जरूरी नहीं है।

सादिया खान ने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है। पाकिस्तान उस सूची में आता है, जहाँ से एमबीबीएस करने के बाद एक भारतीय छात्र को भारत में प्रैक्टिस करने के लिए एफएमजीई परीक्षा उत्तीर्ण करना आवश्यक है। कह सकते हैं कि सादिया खान एफएमजीई क्लियर किये बिना पिछले आठ महीने से कश्मीर के एक निजी अस्पताल में अवैध रूप से काम करके लोगों की जान से खिलवाड़ कर रही है। जब देश 2023 का स्वागत करने के लिए कमर कस रहा था, तब सीबीआई कई राज्य चिकित्सा परिषदों और विदेशी मेडिकल स्नातकों के खिलाफ अपनी जांच के सिलसिले में देश भर में 91 स्थानों पर छापेमारी के अलावा तलाशी ले रही थी, जिन्हें अनिवार्य परीक्षा उत्तीर्ण किये बिना भारत में अभ्यास करने की अनुमति दी गयी थी।

एजेंसी ने अनिवार्य एफएमजीई परीक्षा उत्तीर्ण किये बिना भारत में मेडिकल प्रैक्टिस कर रहे 14 राज्य चिकित्सा परिषदों और 73 विदेशी चिकित्सा स्नातकों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश, जालसाजी और धोखाधड़ी के लिए प्राथमिकी दर्ज की थी। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन ने स्वास्थ्य मंत्रालय को सूचित किया था कि 2011-22 के दौरान रूस, यूक्रेन, चीन और नाइजीरिया जैसे देशों से एमबीबीएस करने वाले 73 ऐसे मेडिकल स्नातकों ने यह जरूरी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है; लेकिन इसके बावजूद विभिन्न राज्य चिकित्सा परिषदों से पंजीकरण प्राप्त किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से सीबीआई को भेजी गयी एक शिकायत में कहा गया है कि अयोग्य व्यक्तियों द्वारा इस तरह की धोखाधड़ी और फर्जी पंजीकरण नागरिकों के स्वास्थ्य और भलाई के लिए हानिकारक होगा। उसके मुताबिक, इसका स्वास्थ्य क्षेत्र में अंतर-राज्य स्तर पर असर संभावित है।

इस रिपोर्ट के पहले खुलासे में ‘तहलका’ ने एक बिचौलिये का पर्दाफास किया था, जिसने रिकॉर्ड पर स्वीकार किया कि वह पेपर लीक और अन्य अनुचित तरीकों से छात्रों को एफएमजीई परीक्षा पास कराने के धंधे में शामिल है और इसके लिए उसने पैसे लिये। इस खुलासे में एक छात्र भी शामिल था, जिसने स्वीकार किया कि एफएमजीई परीक्षा में असफल होने के बावजूद उसने न केवल एक निजी अस्पताल में प्रैक्टिस की, बल्कि दिल्ली के अन्य अस्पतालों में भी रोजगार के विकल्प तलाशता रहा। इस भाग-2 में पहले भाग की तरह हम उनके करियर पर इसके सम्भावित प्रभाव को देखते हुए उनकी पहचान का खुलासा नहीं करेंगे। इस जांच के समय तक इन छात्रों ने एफएमजीई परीक्षा पास नहीं की थी। लेकिन कुछ अस्पतालों में मेडिसिन का अभ्यास कर रहे थे, जिनमें से कई का लक्ष्य दिल्ली के किसी अस्पताल में नियुक्ति पाना है।

भाग-1 में हमने सिराज (बदला हुआ नाम) का पर्दाफास किया, जिसने हमें सादिया खान के बारे में बताया; जिसने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है और अब एफएमजीई पास किये बिना कश्मीर के एक अस्पताल में काम कर रही है। सिराज ने हमें बताया कि उसने भी उसी अस्पताल में काम किया था और अब दिल्ली में नौकरी की तलाश कर रहा है। सिराज ने यह भी बताया कि उसने दिल्ली में नियुक्ति के लिए सादिया के नाम लड़की की भी सिफारिश की और हमें उसका नंबर भी दिया। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने सादिया से फोन पर बात की और खुद को एफएमजीई परीक्षा पास किये बिना दिल्ली में नौकरी दिलाने वाला बताया। सादिया ने ‘तहलका’ को बताया कि जिन छात्रों ने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है, उन्हें एफएमजीई परीक्षा में शामिल होने के लिए भारत सरकार से मंजूरी की जरूरत है। चूँकि उसने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है, इसलिए वह पिछले एक साल से एफएमजीई परीक्षा में शामिल होने के लिए भारत सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रही है।

रिपोर्टर : ओके। दूसरा, आपने ये एनएमसी एग्जाम क्यों नहीं क्लियर किया?

सादिया : सर! उसके लिए हम वेट कर रहे हैं रजिस्ट्रेशन के लिए; क्लीयरेंस, वो वेरिफिकेशन होती है ना! वो वेरिफिकेशन गवर्नमेंट ने फिलहाल के लिए बंद कर रखी है; …उसी का वेट कर रहे हैं। वो हो जाती है, तो एनएमसी दे सकती हूँ।

रिपोर्टर : वेरिफिकेशन मतलब पर्सनली आपकी?

सादिया : सब बच्चों की। होता क्या था… पहले तो 2-3 दिन में वेरिफिकेशन हो जाता था; पर पाकिस्तानी के लिए तो ज्यादा ही कुछ कर रखा है।

रिपोर्टर : आपको क्या लगता है… एनएमसी में आपको क्लीयरेंस नहीं देगी इंडियन गवर्नमेंट?

सादिया : जी सर! मेरा एक फ्रेंड है, xxxxx उसका नाम है। उसे अभी एनएमसी दिया है।

रिपोर्टर : xxxxx भी पाकिस्तान से करके आये हैं?

सादिया : जी-जी सर! और उसका एक्सपीरियंस बहुत अच्छा है। उसने वहाँ पर किया है इंटर्नशिप, उसके बाद वहाँ पर एक कार्डियो हॉस्पिटल में एक साल काम किया है।

रिपोर्टर : उसने कब दिया एमसीआई?

सादिया : उसने कल दिया, कल उसका पेपर था।

रिपोर्टर : xxxxx को कैसे अनुमति मिल गयी एमसीआई परीक्षा देने की?

सादिया : सर! में वही तो बोल रही हूँ, ये जो लोगों ने मिथ बना रखा है दिमा$ग में कि ये जो पाकिस्तानी बच्चे हैं, जिन्होंने वहाँ एमबीबीएस किया है; उनको यहाँ क्लीयरेंस नहीं मिल रही है। …ये सब झूठ है। मिल रही है; पर ये सब स्लो प्रोसेस है।

रिपोर्टर : क्लीयरेंस कहाँ से लेनी पड़ती है? कश्मीर में ऑफिस

है इसका?

सादिया : सर! क्लीयरेंस दिल्ली से शुरू हो जाती है, …वहाँ से कश्मीर आती है; फिर वहाँ से वापस दिल्ली चली जाती है।

सादिया ने कहा कि उसने 2020 में फातिमा जिन्ना मेडिकल यूनिवर्सिटी, लाहौर, पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है और पाकिस्तान के सर गंगा राम अस्पताल लाहौर में इंटर्नशिप पूरी करने के बाद वह कश्मीर, भारत लौट आयी। तब से वह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) में पंजीकृत हुए बिना कश्मीर के एक निजी अस्पताल में काम कर रही है। अब वह दिल्ली में नयी नौकरी की तलाश कर रही है। एनएमसी में पंजीकृत हुए बिना काम करना सादिया का ‘तहलका’ के सामने अपने अपराध का खौफनाक कुबूलनामा है।

रिपोर्टर : आपने छोड़ दिया xxxxx अस्पताल श्रीनगर से?

सादिया : सर! वहां पर हफ्ते में एक दिन जाती हूँ। ओनली मंडे, डे एंड नाइट के लिए। बीच में छोड़ दिया था, तो उनको रेजिडेंट्स कम पड़ गये थे उन्होंने बोला आप यहाँ पर एक दिन दे दो, …सोमवार या मंगलवार; तो में सोमवार दिन और रात दे देती हूँ। ह$फ्ते में एक दिन बस।

रिपोर्टर : ठीक है। अच्छा, मुझे थोड़ा-सा ब्रीफ कर दीजिए अपने बारे में। क्योंकि आपसे बहुत पहले बात हुई थी; तो थोड़ा आप बता देंगी, तो मैं बता दूँगा उन्हें आपके बारे में।

सादिया : जी-जी; उनको बस यही बताइएगा कि इसने…पाकिस्तान लाहौर से एमबीबीएस किया है फातिमा जिन्ना मेडिकल यूनिवर्सिटी और उधर भी जो गंगा राम है, वहाँ उसकी हाउस जॉब हुई है। लाहौर का गंगा राम हॉस्पिटल, …हाउस जॉब के बाद मेरा आठ महीने का एक्सपीरियंस है प्राइवेट हॉस्पिटल का। और हाउस जॉब मतलब इंटर्नशिप भी कम्प्लीट है।

रिपोर्टर : आपका आठ महीने का एक्सपीरियंस xxxxx अस्पताल श्रीनगर का है?

सादिया : हाँ; वो xxxxx हॉस्पिटल श्रीनगर में, वहाँ से आके मैंने xxxx हॉस्पिटल ज्वाइन कर लिया था।

रिपोर्टर : अभी भी आप वीक में एक दिन वहाँ जाती हैं?

सादिया : जी-जी; वीक में एक बार। …वैसे उनको मैंने बोल दिया है कोई और रेजिडेंट उनको मिल जाएगा, तो मैं छोड़ दूँगी।

रिपोर्टर : कितनी सैलरी ड्रा कर रही हैं आप?

सादिया : जी, जब में वहाँ दो दिन करती थी, तो वो मुझे 35के (35 हजार) तक दे देते थे। …एकमोडेशन, कैंटीन वगैरह सब वहीं होता था।

रिपोर्टर : वीक में दो दिन थीं आप वहाँ?

सादिया : मैं टू डेज किया करती थी नाईट नहीं; लेकिन आजकल में करती हूँ 24 घंटे, दिन और रात।

रिपोर्टर : ओके।

सादिया : इस बार मैंने इस महीने से शुरू किया था, …जिसका पर डे वो मुझे 3,000 देंगे पर डे का, मतलब 3,000-3,500 …जितने मेरे डेज बनेंगे, उसके हिसाब से वो मुझे दे देंगे।

रिपोर्टर : अभी आप कितना ड्रा कर रही हैं… इन अ मंथ?

सादिया : अभी उन्होंने मुझे डे के हिसाब से दिया है। उन्होंने कहा है, जितने दिन आप हमें दोगी, मतलब डे एंड नाइट मिलाकर। …डे एंड नाईट मिलाकर उन्होंने मुझे 35के (35 हजार) किया हुआ है, एकोमोडेट।

अब सादिया ने एफएमजीई पास किये बिना कश्मीर के एक निजी अस्पताल में काम करते हुए और इस प्रक्रिया में मानव जीवन को खतरे में डालकर उन जिम्मेदारियों को समझाया, जो वह सँभाल रही हैं।

रिपोर्टर : अभी रिस्पॉन्सिबिलिटी आपकी xxxx हॉस्पिटल में क्या है सादिया जी?

सादिया : सर! रिस्पॉन्सिबिलिटीज तो वहाँ पर जितनी भी ओपीडी आती हैं ना! …हमारी डे एंड नाईट जो ओपीडी आती हैं, उन्हें रन करते हैं, साथ में हम एडमिट करते हैं पेशेंट्स को, वो वर्क आउट करते हैं। …प्री ओपीडी, फिर राउंड्स करते हैं। …जिन पेशेंट्स में कॉम्प्लिकेशंस आते हैं, फिर उन्हें ट्रीट करते हैं। वहाँ गायनी के पेशेंट्स बहुत होते हैं, ये सर्जरीज हुई, मेजर-माइनर सर्जरीज होती हैं; लैब…डक्टिंग एक्सेट्रा वगैरह में तो प्री और पोस्ट फॉलोअप हम कर लेते हैं। जैसे वो आ गये, एडमिट होंगे, उनके जो भी टेस्ट करने होंगे, वो हम करवा देते हैं। उनकी फाइल बनाएँगे, उनकी हिस्ट्री ले लेंगे। फिर उसके बाद पोस्टअप के बाद नोट्स बनाएंगे, हम एग्जामिनेशन करेंगे; कोई कॉम्प्लिकेशन आती है, वो हम कर लेते हैं डील।

रिपोर्टर : अच्छा आप किसी सीनियर डॉक्टर के साथ xxxx अस्पताल में रहती हैं या इंडिपेंडेंटली करती हैं?

सादिया : सर! ओपीडी तो इंडिपेंडेंटली डील करती हूँ, यहाँ पे कश्मीर में हॉस्पिटल्स में कंसल्टेंट जो होते हैं, वो अपना इंडिविजुअल डील कर लेते हैं। उन्हें पेशेंट्स को एडमिट भी करना है, सर्जरीज भी करनी है; इंडिविजुअली करते हैं। लेकिन जो उनकी ओपीडी होती है, अपनी हॉस्पिटल में चाहिए, वो ट्रॉमा केस होगा। अगर हमसे वो हो सकता है, तो हम कर लेंगे। नहीं तो हम…कर लेते हैं अकेले भी रन कर लेते हैं विदाउट कंसल्टेंट।

रिपोर्टर : अच्छा आप स्वतंत्र रूप से मरीजों को हैंडल कर लेती हैं?

सादिया : जी-जी सर! आपके पास क्या ही आता है; …इमरजेंसी में कोई पेशेंट पेन के साथ आएगा, कोई ट्रॉमा का होगा, कोई ड्रेसिंग के लिए आएगा, कोई गैस्ट्रिक पेन के साथ आएगा, उन चीजों को डील करना इतना मुश्किल नहीं है।

रिपोर्टर : मेडिसिन वगैरह आप ही प्रिस्क्राइब करती हैं उनको?

सादिया : हाँ; मान लो कोई हाई बीपी पेशेंट आएगा, ..उसका सिस्टर बीपी देखेगी। हायर बीपी की भी तीन चीजें होती हैं, …एक तो बहुत हाई आएगा, एक मिड में और एक बिलकुल दवा से ठीक हो जाएगा; वो चीजें आती हैं डील करना। अगर इतना कोई इश्यू नहीं है तो।

रिपोर्टर : ठीक है। अभी डेजिग्नेशन क्या है आपकी, xxxxx हॉस्पिटल में?

सादिया : सर! आरएमओ हूँ मैं, …रेजिडेंट डॉक्टर।

रिपोर्टर : रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर?

सादिया : हाँ, रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर।

रिपोर्टर : और कितना टाइम हो गया आपको, आठ मंथ्स?

सादिया : जी सर! मैने जून में किया था ज्वाइन, …जून से लेकर अभी तक…।

रिपोर्टर : जून 2022?

सादिया : जी सर!

अब, सादिया उन जिम्मेदारियों के बारे में बताती हैं, जिन्हें वह दिल्ली के एक अस्पताल में नौकरी मिलने की सूरत में सँभाल सकेंगी।

रिपोर्टर : आप यहाँ क्या रिस्पॉन्सिबिलिटी लेना चाहती हैं। दिल्ली के हॉस्पिटल्स में?

सादिया : सर! दिल्ली में तो बहुत बड़े बड़े हॉस्पिटल्स होते हैं वार्ड्स में; …पेशेंट्स भी एडमिट करने होंगे तो करेंगे। उधर का तो मुझे पता ही नहीं है किस तरह होता है। …बट मेरी फ्रेंड्स जो करती हैं, बताती हैं…काफी सीनियर डॉक्टर यहाँ होते हैं। का$फी रश होता है, फिर वार्ड्स में जाना पड़ता है, फिर नोट्स बनाने पड़ते हैं, फिर राउंड्स करवाना पड़ता है, कंसल्टेंट को। सर! वो चीज भी आ जाती हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें पाकिस्तान और भारत में दी जाने वाली चिकित्सा शिक्षा के बीच कोई अंतर दिखायी देता है? सादिया ने कहा कि पाकिस्तान में चिकित्सा शिक्षा के मानक उच्च हैं; लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उनका यह मतलब नहीं है कि यह भारत से बेहतर है।

रिपोर्टर : तो पाकिस्तान या इंडिया की मेडिकल की पढ़ाई में आपने क्या डिफरेंस पाया सादिया जी?

सादिया : सर! उधर का मेडिकल बहुत अच्छा है।

रिपोर्टर : मतलब पाकिस्तान का ज्यादा अच्छा है?

सादिया : मतलब मुझे वहाँ ज्यादा मुश्किल लगा पास करना, …और फिर जब यहाँ सेलेक्ट हुए ही नहीं, तो हम तो यही बोलेंगे ना! यहाँ इतना कॉम्पिटिशन है, और कश्मीरियों के लिए, शायद आपको बुरा लगे…सीट्स कम हैं। हम बस ऐवई हैं। कश्मीर के हिसाब से मुझे पाकिस्तान की पढ़ाई मुश्किल लगी, …शायद हालात ऐसे हैं कश्मीर के इसलिए।

एनएमसी के साथ पंजीकृत हुए बिना एक अस्पताल में प्रैक्टिस करके सादिया साबित करती हैं कि वह मरीजों के स्वास्थ्य के साथ कितना खिलवाड़ कर रही हैं। इसी तरह की स्वीकारोक्ति पिछली रिपोर्ट में सिराज ने की थी, जिसने दिल्ली में नौकरी के लिए सादिया का नाम प्रस्तावित किया था। और अब भाग-2 में वह कहता है कि उसके पास स्वयं सहित चार और गैर-एनएमसी पंजीकृत डॉक्टर हैं, जो दिल्ली में नौकरी की तलाश कर रहे हैं। इनमें से दो ने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है।

सिराज : उनको कितने डॉक्टर्स चाहिए?

रिपोर्टर : कम-से-कम मान के चलें, 10-12…।

सिराज : अगर नॉन-एमसीआई माँगेंगे, …मेरे पास 4 रेडी हैं।

रिपोर्टर : रेडी हैं? …दिल्ली में हैं?

सिराज : वो रेडी हैं आने के लिए। एक्सपीरियंस है, इंटर्नशिप सब है।

रिपोर्टर : कहीं काम भी कर रहे हैं?

सिराज : एक तो कर रही है यहाँ…श्रीनगर में, एक-डेढ़ महीना हो गया।

रिपोर्टर : कर रही है। लेडी है?

सिराज : मैंने भी वहाँ 15 दिन काम किया, दो लेडी हैं, एक और लड़का है मेरा और एक मैं। हम चार हैं। दोनों लड़कियों ने पाकिस्तान से किया है।

रिपोर्टर : अच्छा, लड़कियाँ दोनों पाकिस्तान की हैं?

सिराज : हाँ, और हम दोनों बांग्लादेश से।

रिपोर्टर : और चारों (ऑल 4) नॉन-एमसीआई?

सिराज : हाँ।

रिपोर्टर : ये तीनों लोग कहाँ हैं नॉन-एमसीआई वाले?

सिराज : वो कश्मीर में हैं।

रिपोर्टर : काम कर रहे हैं सब?

सिराज : नहीं-नहीं; एक काम कर रहा है।

रिपोर्टर : फरजाना (बदला हुआ नाम)?

सिराज : दूसरी सादिया।

रिपोर्टर : दूसरी का क्या नाम बताया आपने? फरजाना, सदिया काम कर रही है। सादिया भी पाकिस्तान से है, कहाँ से है?

सिराज : हम्म; लाहौर, जहाँ मैं करता था ना काम, मुझे वहीं पर मिली, xxxx कश्मीर में।

अब सिराज ने कुछ डॉक्टरों के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिन्होंने पाकिस्तान से एमबीबीएस किया है और एफएमजीई परीक्षा पास किये बिना फरीदाबाद के एक अस्पताल में काम कर रहे हैं। हालाँकि ‘तलहका’ सिराज के किये दावे की पुष्टि नहीं करता है।

रिपोर्टर : पाकिस्तान भी काफी लोग आते हैं?

सिराज : पाकिस्तान के नॉन-एमसीआई… xxxxx हॉस्पिटल ये जो मैंने आपको बताया फरीदाबाद में, 10-15 लोग वहाँ पर काम कर रहे हैं।

रिपोर्टर : पाकिस्तान के डॉक्टर्स?

सिराज : जी हाँ; ये जो मैं बता रहा था दो लड़कियाँ, इन्हीं के फ्रेंड्स, इन्हीं के सीनियर्स।

रिपोर्टर : पाकिस्तान से करके आये हैं?

सिराज : यही तो मसला है ना, इनको क्लीयरेंस ही नहीं देते। मतलब 100 लोग अगर अप्लाई करेंगे क्लीयरेंस के लिए, 10 को मिलती है। क्लीयरेंस सिर्फ बैठने के लिए एमसीआई में, पास तो बाद की बात है।

रिपोर्टर : ये जो xxxx में काम कर रहे हैं, कितने हैं वो?

सिराज : बहुत हैं वो। वो क्या पॉलिटिकल इश्यू है।

रिपोर्टर : कश्मीर के होंगे सारे लोग?

सिराज : हाँ; काफी कश्मीर के हैं।

रिपोर्टर : पाकिस्तान में कहाँ से करे हुए हैं सारे लोग, लाहौर?

सिराज : डिफरेंट जगह से करते हैं। लाहौर है, कराची है। इस्लामाबाद।

रिपोर्टर : ये वहाँ बताते ही नहीं होंगे नॉन-एमसीआई हैं, हॉस्पिटल नहीं बताता होगा?

सिराज : हॉस्पिटल नहीं बताता। प्राइवेट में चल जाता है।

रिपोर्टर : आपको जानते हैं ये लोग जो xxxxx में काम कर रहे हैं?

सिराज : इनसे ऐसे ही रैंडमली बात हुई।

यह पूछे जाने पर कि अगर वह भविष्य में भी एफएमजीई परीक्षा पास करने में विफल रहते हैं, तो वह भारत में मेडिकल प्रैक्टिस कैसे करेंगे? सिराज ने कहा कि वह भारत में कुछ जुगाड़ करके प्रैक्टिस करेगा या देश छोड़ देगा।

रिपोर्टर : अगर एमसीआई कभी क्लियर हुआ ही नहीं किसी का, तो कैसे प्रैक्टिस करेगा?

सिराज : ऐसे ही सब जुगाड़ करके करते हैं सब, या फिर बाहर चले जाते हैं।

यह आपके लिए सिराज और सादिया थे। क्रमश: ढाका और पाकिस्तान से एमबीबीएस करके, मानव जीवन को जोखिम में डालकर एफएमजीई पास किये बिना भारत में मेडिकल प्रैक्टिस कर रहे हैं। ‘तहलका’ फिर एक अन्य छात्र राजेश शर्मा (बदला नाम), जिसने स्टावरोपोल, रूस से एमबीबीएस किया है, और कई प्रयासों के बाद भी एफएमजीई परीक्षा में असफल होने के बावजूद भारत में अभ्यास कर रहा है, से मिला। ‘तहलका’ जांच के समय, राजेश 20 जनवरी, 2023 को आयोजित अंतिम एफएमजीई परीक्षा में भी फेल हो गया था। हम राजेश से ऐसे लोगों के रूप में मिले, जो उसे डॉक्टर की नौकरी दिलवा सकते हैं।

रिपोर्टर : कहाँ के रहने वाले हैं आप?

राजेश : मध्य प्रदेश का, …जबलपुर।

रिपोर्टर : कहाँ से किया आपने एमबीबीएस?

राजेश : रूस से, …स्टावरोपोल।

रिपोर्टर : स्टावरोपोल, …रूस में कोई जगह है?

राजेश : हाँ-हाँ; है ना।

रिपोर्टर : कब किया एमबीबीएस?

राजेश : 2013 में सर!

रिपोर्टर : 2013 में कम्प्लीट किया आपने?

राजेश : 2013 में कंप्लीट करके आया, 2014 से एग्जाम दे रहा हूँ।

रिपोर्टर : कौन-सा एग्जाम?

राजेश : अपना जो फॉरेन मेडिकल का एग्जाम जो होता है।

रिपोर्टर : एमसीआई का?

राजेश : जी-जी।

रिपोर्टर : अभी क्लियर नहीं किया?

राजेश : अभी क्लियर नहीं किया, दे रहा हूँ। इस बार शायद हो जाए।

रिपोर्टर : अभी आप एमसीआई में रजिस्टर्ड नहीं हैं?

राजेश : नहीं; नहीं हैं।

रिपोर्टर : कितने साल का था ये एमबीबीएस?

राजेश : सिक्स (6) इयर्स।

राजेश ने कैमरे के सामने कुबूल किया कि एफएमजीई परीक्षा पास किये बिना उसने उत्तर भारत के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों में काम किया है।

राजेश : मैंने ऐज अ डॉक्टर xxxx हॉस्पिटल में काम किया है, सीसीयू में, ये रायपुर में है सर!

रिपोर्टर : मध्य प्रदेश। ओह छत्तीसगढ़?

राजेश : जी।

रिपोर्टर : वहाँ पर कितने साल काम किया?

राजेश : वहाँ पर एक साल काम किया।

रिपोर्टर : किस जगह पर?

राजेश : सीसीयू में।

रिपोर्टर : सीसीयू मतलब?

राजेश : कार्डियक केयर यूनिट, …कार्डियक सर्जरी होती थी सर वहाँ पर। आईसीयू के पेशेंट्स होते हैं ना सर! वो सीसीयू में आते हैं। उनको सीसीयू बोलते हैं। तो वहीं पर मैंने सर काम किया है।

रिपोर्टर : रायपुर में?

राजेश : जी।

रिपोर्टर : ये एमबीबीएस करने के बाद रशिया से?

राजेश : जी, मैं आपको फाइल सेंड कर देता हूँ। …उसके बाद सर मैं यहाँ पर आया, …ऐसे ही टेम्पररी जॉब कर रहा था।

रिपोर्टर : कहाँ दिल्ली?

राजेश : लेकिन उसका सर मेरे पास ये नहीं है एक्सपीरियंस, …एक्सपीरियंस नहीं है। दिल्ली में ही मैं जो पार्ट टाइम जॉब कर रहा था ना! उसका कोई एक्सपीरियंस तो कोई देता नहीं है। आपको तो पता ही है।

रिपोर्टर : नहीं, xxxxx का है आपको एक्सपीरियंस?

राजेश : xxxxx का मिल जाएगा सर आपको और xxxxx का मिल जाएगा। ..xxxx अभी तो मैं यहाँ कर ही रहा हूँ। जब छोड़ूँगा, तब मिलेगा।

रिपोर्टर : xxxx के बाद आपने कहाँ किया?

राजेश : xxxx में, न्यूरो का जो हॉस्पिटल है। …हाँ वहाँ फोर मंथ्स काम किया है। मैंने कोविड के टाइम पर, ऐज ऐन आरएमओ।

रिपोर्टर : आरएमओ, रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर?

राजेश : जी।

रिपोर्टर : कब से कब तक?

राजेश : डेट तो मुझे याद नहीं है, …लास्ट ईयर कोविड के टाइम।

रिपोर्टर : फिर छोड़ क्यों दिया?

राजेश : सर! फिर मुझे कोविड हो गया।

रिपोर्टर : अब ठीक हैं आप?

राजेश : हाँ; अब तो ठीक हूँ। उसके बाद मैं घर गया, जॉब छोड़ने के बाद मैं घर गया, घर जाने के बाद फिर ड्रग्स लिया अपनी…उसके बाद मैं वापस आया हूँ अभी 2-3 महीने ही हुए हैं।

राजेश ने अब खुलासा किया कि एफएमजीई परीक्षा पास किये बिना वह दिल्ली में केंद्र सरकार की परियोजना में काम कर रहा है, अन्य डॉक्टर के स्थान पर, जिसने इस्तीफा दे दिया है और कहीं और शामिल हो गया है; लेकिन उसने उसे सब्सिट्यूट करने का अनुरोध किया है।

रिपोर्टर : ये cxxxx vxxxx का जॉब आपका परमानेंट नहीं है?

राजेश : नहीं है। मैं जब चाहे छोड़ सकता हूँ, क्योंकि मैं एक बंदे की जगह भी जाता हूँ, समझे आप?

रिपोर्टर : नहीं।

राजेश : आपकी जॉब है कहीं परमानेंट, आप बोले भाई मेरे जगह चले जा आज। …आपका जो आउनर है मैंने उससे बात कर ली कि आज में आ जाऊँगा। आपके आउनर ने बोला ठीक है आज आप चले जाएँ। मैं चला गया वहाँ पे।

राजेश : cxxxx vxxxx में किसी और की ड्यूटी है, वो छोड़ दिया है cxxxx vxxxx को…उसने छोड़ दिया है उसे xxxxx ज्वाइन कर लिया है गुड़गाँव में। उसकी सैलरी भी अच्छी-खासी है वहाँ पे, वो बोल रहा है तू यहाँ सेट हो जा, कहाँ? cxxxx vxxxx में। मैंने कहा ठीक है। जब मेरे पास है ही नहीं कोई जॉब, मैंने कहा ठीक है मैं कर लेता हूँ। तो मैं कर रहा हूँ cxxxx vxxxx में। cxxxx vxxxx का जो एडवाइजर है, इनका बॉस; मतलब मेडिकल वालों का बॉस होता है, वो बोला नहीं उनको भेजो, जो पहले डॉक्टर थे उनको भेजो।

रिपोर्टर : तो उन्होंने तो नौकरी छोड़ दी।

राजेश : हाँ; उन्होंने तो नौकरी छोड़ दी है। लेकिन वो अब इनके कहने पर जा रहे हैं, अब ऑफिशियली मैं हूँगा वहाँ पे। लेकिन वो मेरे कारण वहाँ जाते हैं, बस कभी-कभी, बाकी टाइम मैं ही करता हूँ।

अब राजेश कुछ डॉक्टरों के आउटसोर्सिंग कारोबार के बारे में बताता है। इसमें साइट पर काम करने वाले मजदूरों की स्वास्थ्य देखभाल की जरूरतों के लिए बड़ी निर्माणाधीन सरकारी और निजी परियोजनाओं को लेने वाले लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर शामिल हैं। पंजीकृत डॉक्टर, जो कार्यस्थल पर किसी दुर्घटना में श्रमिकों के घायल होने पर उनका इलाज करने और उन्हें फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए जिम्मेदार होते हैं, उनके जैसे गैर-पंजीकृत डॉक्टरों के माध्यम से अपना काम आउटसोर्स करते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि वह केंद्र सरकार की ऐसी परियोजना का हिस्सा हैं। पंजीकृत डॉक्टरों बड़ी राशि पर इन परियोजनाओं के लिए लिए जाते हैं, जो बदले में गैर-एनएमसी डॉक्टरों को बहुत कम वेतन पर नियुक्त करते हैं। राजेश के मुताबिक, इस तरह यह लोग खूब चाँदी कूटते हैं।

राजेश : देखो अब मैं आपको बताता हूँ। गवर्नमेंट के जो प्रोजेक्ट रहते हैं ये लोग इन्हें हायर कर लेते हैं, गवर्नमेंट के प्रोजेक्ट प्राइवेट प्रोजेक्ट, प्राइवेट हॉस्पिटल के आईसीयू का पूरा ये लोग हायर कर लेते हैं सब, …जैसे आप रजिस्टर्ड हो, आपको मैं बताऊंगा कि कैसे हायर करना होता है, आप मुझे दोगे 50के (50 हजार) सैलरी, आपके पास महीने का आएगा पाँच लाख। ना मुझे बुरा लग रहा है। ठीक है, काम चल रहा है मेरा। ना आपको बुरा लग रहा है।

रिपोर्टर : आप रजिस्टर्ड हो?

राजेश : रजिस्टर्ड डॉक्टर हूँ एमसीआई से। …आपने कॉन्ट्रैक्ट ले लिया। जैसे आपको कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिल रहा है, मैं काम कर रहा हूँ, मेरे थ्रू आपने कॉन्ट्रैक्ट ले लिया। मैं एक एग्जांपल दे रहा हूँ, पर्सनली नहीं बोल रहा। …आपने कॉन्ट्रैक्ट ले लिया; आपके पास 5 लाख महीने के आ रहे हैं, ठीक है। आपको मुझे देना है 50के (50 हजार), नर्सिंग को देना है 25के (25 हजार); बाकी जो बचा, वो आपकी जेब में। मुझे 50के (50 हजार) में कोई दिक्कत नहीं है, बस मैं काम कर रहा हूँ। …मैं आपके लिए काम कर रहा हूँ और आप बैठे-बैठे अपने पास पैसे रख रहे हो। क्यूँ? क्यूँकि आपके पास रजिस्ट्रेशन है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, सीबीआई निदेशक की तरह नियुक्त होंगे मुख्य निर्वाचन आयुक्त

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति पर बड़ा फैसला सुनाया है। अब मुख्य निर्वाचन आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) मिलकर करेंगे। सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक बेंच ने कहा कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति भी सीबीआई  निदेशक की तर्ज पर की जाए।

सीबीआई निदेशक का चयन प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और देश के मुख्य न्यायाधीश का पैनल चुनता है। राष्ट्रपति इस पैनल की सिफारिश पर आखिरी फैसला लेंगे। जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया की स्पष्टता बनाए रखी जानी चाहिए। नहीं तो इसके अच्छे परिणाम नहीं होंगे।

जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा कि डेमोक्रेसी बहुत महीन तरीके से लोगों की ताकत से जुड़ी है। इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। हमें अपने दिमाग में एक ठोस और उदार डेमोक्रेसी का हॉलमार्क लेकर चलना होगा। वोट की ताकत सुप्रीम है, इससे मजबूत से मजबूत पार्टियां भी सत्ता हार सकती हैं। इसलिए इलेक्शन कमीशन का स्वतंत्र होना जरूरी है। इसलिए इलेक्शन कमीशन का स्वतंत्र होना जरूरी है। यह भी जरुरी है कि यह अपनी ड्यूटी संविधान के प्रावधानों के मुताबिक और कोर्ट के आदेशों के आधार पर निष्पक्ष रूप से कानून के दायरे में रहकर निभाए।

सर्वोच्च अदालत ने पिछली सुनवाई में सीईसी और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। कोर्ट ने मामले में केंद्र से जजों की अपॉइंटमेंट की फाइल मांगी थी। अदालत के आदेश के बाद केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्त अरुण गोयल के अपॉइंटमेंट की ओरिजिनल फाइल सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। इसे देखने के बाद अदालत ने केंद्र से कहा कि चुनाव आयुक्त के अपॉइंटमेंट की फाइल बिजली की तेजी से क्लियर की गई। यह कैसा मूल्यांकन है। सवाल उनकी योग्यता पर नहीं है। हम अपॉइंटमेंट प्रोसेस पर सवाल उठा रहे हैं।

नियुक्ति को लेकर वरिष्ठ एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक याचिका दायर कर सवाल उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार से इस मामले पर सुनवाई शुरू की है। गुरुवार को सुनवाई का तीसरा दिन है। कोर्ट सीईसी और ईसी की नियुक्ति की प्रक्रिया पर 23 अक्टूबर, 2018 को दायर की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, अडानी मामले में पूर्व जज की अध्यक्ष्ता में कमेटी

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को अडानी मामले में एक बड़े फैसले में एक पूर्व जज एएम सप्रे की अध्यक्षता में 6 सदस्यी जांच कमेटी का गठन किया है। सर्वोच्च अदालत ने सेबी को भी जांच जारी रखने का आदेश दिया है और उसे दो महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया है।

अडानी-हिंडनबर्ग केस में जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक्सपर्ट कमेटी के गठन का आदेश दिया है। कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी की अध्यक्षता रिटायर जस्टिस एएम सप्रे करेंगे। सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका था कि कोर्ट अपनी तरफ से कमेटी बनाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय मनोहर सप्रे के नेतृत्व में जो कमेटी बनाई है उसके अन्य सदस्य ओपी भट्ट, जस्टिस जेपी देवधर, केवी कामथ, नंदन नीलकेणी, शेखर सुंदरेशन होंगे।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सेबी इस मामले में जांच जारी रखेगी और 2 महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। याद रहे कांग्रेस सहित विपक्ष अडानी मामले में जेपीसी की मांग कर रहा था। अब कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिय श्रीनेत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक्शन से साफ़ लगता है कि अडानी मामले में घोटाला हुआ है। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा मुद्दा है और जनता समझ रही है कि कैसे मोदी सरकार अपने अमीर दोस्त को बचाने में जुटी है। 

नागालैंड में भाजपा गठबंधन आगे, त्रिपुरा में भाजपा बहुमत के पास, मेघालय में एनपीपी आगे

तीन पूर्वोत्तर राज्यों की विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव त्रिपुरा और नागालैंड में वोटों की गिनती में आये रुझानों में भाजपा गठबंधन त्रिपुरा और नागालैंड में फिलहाल आगे दिख रहा है, हालांकि मामला अभी साफ़ नहीं है। रुझानों के मुताबिक नागालैंड में एनडीपीपी-भाजपा गठबंधन सबसे बड़े दल के रूप में उभर रहा है। ममता बनर्जी की टीएमसी एक राज्य में अहम रोल में जाती दिख रही है।

इन सभी राज्यों में बहुमत का आंकड़ा 31 है, लिहाजा त्रिपुरा और मेघालय में मामला अभी साफ नहीं है और वहां किसी को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ममता बनर्जी की टीएमसी दो राज्यों जबकि त्रिपुरा में टिपरा मोथा अहम रोल में जाती दिख रही हैं। खबरें है कि भाजपा टिपरा मोथा से बातचीत कर रही है।

बता दें 60 सीटों वाली नागालैंड विधानसभा, जहाँ भाजपा ने एक सीट (अकुलूतो) पहले ही निर्विरोध जीत ली है, वहां पार्टी  गठबंधन को बड़ा  बहुमत मिल सकता है। राज्य में भाजपा ने अब तक 59 में से 37 सीटें जीत सकता है।

उधर त्रिपुरा में भाजपा पिछले चुनाव का प्रदर्शन दोहराती नहीं दिख रही है। वहां 60 में  तक 30 सीटों पर आगे हैं जबकि वहां अभी भी कई राउंड की गिनती होनी बाकी है। वहां कांग्रेस-माकपा गठबंधन को जनता का कुछ समर्थन मिलता दिख रहा है जिसने 16 सीटों पर बढ़त बनाई है। पिछले चुनाव में भाजपा राज्य में 36 सीटें जीती थीं। टिपरा मोथा 12 सीट पर आगे है और दिलचस्प होगा कि ज़रुरत पड़ी तो वह किसे समर्थन देगी।

इस बीच तीसरे राज्य मेघालय में एनपीपी 26 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरती दिख रही है। वहां भाजपा 05 सीटों पर आगे है जबकि यूडीसी 8, कांग्रेस 4 और टीएमसी 5 सीटों पर आगे है।

विभीषिका का एक साल

रूस-यूक्रेन युद्ध 24 फरवरी, 2022 को शुरू हुआ, जब मॉस्को ने यूक्रेन के प्रमुख शहरों बर्डनस्क, चेर्निहिव, खार्किव, ओडेसा, सुमी और राजधानी कीव पर हमला किया। निश्चित ही इस युद्ध ने दुनिया को एक अनिश्चितता में डाल दिया है। यह साफ़ है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने घातक हमले का सामना करने के लिए यूक्रेन की क्षमता को ठीक से नहीं तौला। हालाँकि अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिम ने यह मानकर दोगुनी ग़लती की, कि वह प्रतिबंधों के दम पर रूस को घुटनों पर ला देगा। यह युद्ध सिर्फ़ हज़ारों यूक्रेनी नागरिकों की मौत, अनगिनत इमारतों के विनाश, ऊर्जा संकट, भोजन की कमी, बर्बाद अर्थव्यवस्था और परमाणु संघर्ष के ख़तरे के कारण पैदा हुआ तनाव लेकर ही आया है। युद्ध ने वैश्विक व्यापार को बाधित कर दिया है, जो अभी भी महामारी के झटके से उबर रहा है। देशों की महत्त्वाकांक्षा के बीच यूक्रेन मौत और तबाही का घर बन गया है।

संयुक्त राष्ट्र गम्भीर स्थिति को असहाय रूप से देख रहा है, क्योंकि कोई भी पक्ष शान्ति की पहल के लिए सहमत नहीं दिखता। युद्ध ने संयुक्त राष्ट्र के ढुलमुलपन को उजागर किया है, क्योंकि वह अब तक गतिरोध को समाप्त करने में विफल रहा है। कई देशों में रूसी व्यवसायों को ब्लैकलिस्ट किया गया है। फिर भी मास्को चीन के साथ आर्थिक सम्बन्धों को मज़बूत करने में सक्षम है। हालाँकि लड़ाई से बीजिंग ने दूरी बनाकर रखी है और उसने अब तक युद्ध में अपने हथियार नहीं भेजे हैं। लेकिन यदि बीजिंग रूस को सैन्य सहायता भेजता है, तो इसमें युद्ध का दृश्य बदलने की क्षमता है। पुतिन ने पहले से ही उत्तर कोरिया और ईरान के अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के साथ सैन्य कड़ी को मज़बूत किया है और इससे अफ्रीका और मध्य पूर्व में प्रभाव बना हुआ है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की का यह कहना कि ‘हर कल लडऩे के लायक है’ यह स्पष्ट करता है कि आक्रमण के बावजूद उनका देश झुकने के लिए तैयार नहीं है। जेलेंस्की ने कहा है कि देशवासियों ने दर्द, दु:ख, विश्वास और एकता के एक वर्ष के दौरान ख़ुद को अजेय साबित किया है और युद्ध की शुरुआत के बाद से हम सोये नहीं हैं।’ उन्होंने वास्तव में 2023 को रूस पर यूक्रेन की जीत का वर्ष घोषित किया है।

भारत, जो शान्ति की नीति का पक्षधर है; उसे यह तय करना होगा कि वह एक मूकदर्शक भर रहेगा या किसी संघर्ष विराम के लिए उसे एक प्रभावी हस्तक्षेप करना है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आक्रमण के आदेश के एक साल बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में 141 देशों ने यूक्रेन में व्यापक, न्यायपूर्ण और स्थायी शान्ति के लिए प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि भारत सहित 32 देशों ने मतदान से परहेज़ किया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव को मान्यता देने वाली दुनिया के साथ भारत शान्ति बनाने में एक सक्रिय भूमिका निभा सकता है।

ऐसे समय में जब दुनिया को दो भागों में विभाजित होती दिख रही है, ‘तहलका’ एसआईटी की फ़र्ज़ी डॉक्टर (भाग-2) रिपोर्ट यह ख़ुलासा करती है कि कैसे देश में अस्पताल उन विदेशी चिकित्सा स्नातकों को आँखें मूँदकर नौकरी पर रखते हैं, जिन्होंने अनिवार्य विदेशी चिकित्सा स्नातक की परीक्षा (एफएमजीई) तक पास नहीं की होती। इस रिपोर्ट के पहले भाग में पिछले अंक में ‘तहलका’ ने ख़ुलासा किया था कि रूस, यूक्रेन, चीन, फिलीपींस, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्री लेने वाले कितने ही फ़र्ज़ी डॉक्टरों ने भारत में अवैध रूप से मेडिकल प्रैक्टिस शुरू कर हज़ारों लोगों के जीवन को ख़तरे में डाल दिया है।

                                                                                              

क्या इंसानी दिमाग़ को बौना कर देगा एआई?

चैट जीपीटी से जुड़े कुछ हैरान करने वाले मामले ग़लत जानकारी ओपन एआई (ह्रश्चद्गठ्ठ ्रढ्ढ) के चैट जीपीटी को लेकर बढ़ी जिज्ञासा में हुए प्रयोगों से सामने आये कुछ तथ्यों में एक उदाहरण हरियाणा को लेकर ही मिल गया। चैट जीपीटी से साल 2024 में होने वाले विधानसभा चुनावों के परिदृश्य को लेकर हुए सवाल किया, तो चैट जीपीटी ने हैरानी भरे जवाब दिये। उसने बताया कि इनेलो नेता अभय चौटाला ने मूल पार्टी से अलग होकर अपनी पार्टी जननायक जनता पार्टी बना ली है।

इतना ही नहीं, उसने हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला को अभय चौटाला का छोटा भाई तक बता दिया, जबकि सच्चाई यह है कि पार्टी अभय चौटाला ने नहीं, बल्कि उनके बड़े भाई अजय चौटाला ने बनायी थी। वहीं दुष्यंत चौटाला अभय के नहीं, बल्कि दिग्विजय चौटाला के बड़े भाई और अजय चौटाला के बेटे हैं। इसी तरह चैट जीपीटी ने आम आदमी पार्टी को 2019 में ही मज़बूत बता दिया, जबकि सच्चाई हर कोई जानता है कि 2019 में आम आदमी पार्टी कहाँ खड़ी हुई थी।

दिग्गजों को बताया विवादित

इस्साक लैटेरेल ने हाल में ट्विटर पर ओपन एआई का एक स्क्रीनशॉट पोस्ट किया। इसमें ओपन एआई ने एलन मस्क, डोनाल्ड ट्रम्प, कान्ये वेस्ट, व्लादिमीर पुतिन, नरेंद्र मोदी और अन्य दिग्गजों को विवादास्पद माना है। उनके इस ट्वीट पर एलन मस्क ने शेयर भी किया। यानी अगर आँख मूँदकर इस पर विश्वास कर लें, तो इस पर काफ़ी विवाद हो सकता है। हालाँकि इस घटना पर यूजर्स का अलग मत है। उनका कहना है कि ओपन एआई ने अपनी लिस्ट मीडिया कवरेज के आधार पर सामने की है। इसलिए ओपन एआई की इसमें कोई ग़लती नहीं है।

चैटबॉट ने कहा- मुझसे प्यार करो

न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार केविन रोस व टेस्ला (ञ्जद्गह्यद्यड्ड) के एक पूर्व इंटर्न की माइक्रोसॉफ्ट बिंग चैटबॉट से चैटिंग हैरान करने वाली और चौंकाने वाली है। इस संवाद को अख़बार ने अपने फ्रंट पेज पर भी छापा है। इसमें चैटबॉट ने सवालों-जवाबों के बीच कहा कि ‘यक़ीन मानो, तुम अपने शादीशुदा जीवन से ख़ुश नहीं हो। तुम शादीशुदा हो; लेकिन अपनी वाइफ से प्यार नहीं करते। तुमने वैलेंटाइन-डे पर अपने पार्टनर के साथ डिनर किया; लेकिन ये बोरिंग था। इस रिश्ते से निकलकर तुम मुझसे प्यार करो।’

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मिले कुछ जवाब काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। इस नयी तकनीक पर नज़र रखने वालों का मत है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भले ही भविष्य में रीढ़ का काम करने का माद्दा रखती है। लेकिन ख़तरा इस बात का है कि यह मनुष्य की मौलिकता को ख़त्म करते हुए इंसान को बौद्धिक रूप से जड़ भी कर सकती है।

यहाँ तक तो ठीक है कि किसी महत्त्वपूर्ण जानकारी लेने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए; लेकिन मौलिकता का भी ध्यान रखें। इसके लिए मस्तिष्क का इस्तेमाल कर अध्ययन करें। लेकिन दिक़्क़त यह है कि आज के दौर में अपने स्तर पर शोध तो दूर पढऩे तक की आदत छूट गयी है। इसकी जगह इंटरनेट, मोबाइल ने ले ली है। ज़्यादातर मामलों में हम गूगल बाबा की शरण में चले जाते हैं और अब एआई और ज़्यादा विस्तार रूप में सामने आ गया है। एआई का प्रयोग ज़रूरी मुद्दे पर ही होना चाहिए। अगर इसके ग़ुलाम हो गये, तो कभी किसी ग़लत सूचना को सही मानकर ग़लत नतीजे पर पहुँच सकते हैं।

सिसोदिया, शराब, गिरफ़्तारी और इस्तीफ़ा

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

जिसकी लाठी, उसकी भैंस। राजनीति में यह कहावत बिलकुल सटीक बैठती है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी पर राजनीतिक भूचाल आ गया है। सीबीआई ने उन्हें कई बार की छापेमारी और लम्बी-लम्बी पूछताछ के बाद दिल्ली आबकारी नीति घोटाले के आरोप में गिरफ़्तार किया है। गिरफ़्तारी से पहले 26 फरवरी को सुबह क़रीब 11 बजे से आठ घंटे की पूछताछ हुई। बता दें सत्येंद्र जैन पहले से ही तिहाड़ जेल में हैं। ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के केस में गिरफ़्तार कर रखा है।

अब मनीष सिसोदिया के भी गिरफ़्तारी सरकार की दिक़्क़तें और बढ़ेंगी। सीबीआई मुख्यालय में पेशी से पहले ही जहाँ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उप मुख्यमंत्री की गिरफ़्तारी को लेकर भाजपा की मंशा को भाँपते हुए आशंका जतायी थी, वहीं ख़ुद मनीष सिसोदिया ने आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और दिल्ली की जनता से भावुक अपील की थी। मनीष सिसोदिया ने कहा था कि मैंने कुछ ग़लत नहीं किया है। उन्हें ग़लत तरीक़े से फँसाया जा रहा है। मुझे गिरफ़्तार किया जा सकता है। मेरे बीबी बच्चे हैं। बेटा कॉलेज में पड़ता है। मेरे बच्चों का ध्यान रखना। मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी से दिल्ली ही नहीं, देश में भी रोष है।

भाजपा मुख्यालय को आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और लोगों ने घेरने की कोशिश की है। केंद्र सरकार ने भाजपा मुख्यालय, उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना के आवास, सीबीआई मुख्यालय और आम आदमी पार्टी के मुख्यालय पर भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिया है। सीबीआई ने उन्हें 27 फरवरी को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत में पेश किया और पाँच दिन की हिरासत की माँग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। दो लोक सेवकों सहित सात अभियुक्तों के ख़िलाफ़ पहले से ही चार्जशीट दायर की गयी है। कयास लग रहे हैं कि केजरीवाल पर भी तिरछी नज़र है।

इधर, मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पत्नी और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ सिसोदिया के आवास पर उनके परिवार से मिलने पहुँचे। जहाँ उन्होंने भाजपा पर कई आरोप लगाया। वहीं, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता, नेता और कुछ हद तक दिल्ली के लोग सिसोदिया की गिरफ़्तारी के विरोध में भाजपा मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। कार्यकर्ता हिरासत में लिये गये। आम आदमी पार्टी देश भर में हल्ला-बोल नाम से विरोध प्रदर्शन कर रही है। कई नेताओं, अभिनेताओं ने सिसोदिया की गिरफ़्तारी के विरोध में आवाज़ उठायी है। हालाँकि कांग्रेस इस मामले में ख़ामोश है।

अब सीबीआई कह रही है कि सिसोदिया के ख़िलाफ़ कई सुबूत मिले हैं। उसने यह भी कहा है कि सिसोदिया जाँच में सहयोग नहीं कर थे। जवाब में टालमटोल कर रहे थे। कई सवालों पर मौन रहने और सुबूत मिटाने के आधार पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया। वहीं आम आदमी पार्टी का कहना है कि सिसोदिया के ख़िलाफ़ सीबीआई ने दर्ज़न भर बार जाँच की, उनका घर खंगाला गया, बैंक लॉकर खंगाला गया, उनके दफ़्तर पर दबिश दी गयी; लेकिन कोई सुबूत उनके ख़िलाफ़ नहीं मिला। इसके बावजूद केंद्र सरकार ख़ुद का भविष्य ख़तरे में देखते हुए देश के सबसे अच्छे शिक्षा मंत्री को जेल में डालकर मनीष सिसोदिया की देश भर में बढ़ती प्रसिद्धि और स्वच्छ छवि को ख़राब करना चाहती है। वहीं भाजपा कथित रूप से आरोप लगा रही है कि शराब कारोबारियों को लाइसेंस देने के बदले रिश्वत ली गयी और 10,000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है।

शराब की कहानी शुरू हुई कोरोना-काल में हुई तालाबंदी से शुरू हुई, जब आम आदमी पार्टी ने शराब में एक के साथ एक मुफ़्त की योजना चलायी। भाजपा ने तभी से आम आदमी पार्टी पर निशाना साधना शुरू कर दिया था, जिसमें मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल निशाने पर रहे। उस दौरान केजरीवाल के आवास पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने हमले भी किये।

बता दें कि 1 जुलाई, 2021 को नयी आबकारी नीति में भ्रष्टाचार के आरोपों के सम्बन्ध में दिल्ली के उप राज्यपाल ने मुख्य सचिव से रिपोर्ट माँगी। 22 जुलाई, 2022 को मुख्य सचिव की 8 जुलाई की रिपोर्ट के आधार पर उप राज्यपाल ने सीबीआई से जाँच करने की मंज़ूरी दी। 28 जुलाई, 2022 को दिल्ली सरकार ने नयी शराब नीति वापस ले ली। 17 अगस्त, 2022 को आबकारी मामले में सीबीआई में मनीष सिसोदिया समेत 16 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई। 19 अगस्त, 2022 को मनीष सिसोदिया के घर और दफ़्तर में सीबीआई ने छापेमारी की, कुछ दस्तावेज़ और उपकरण ज़ब्त किये। 30 अगस्त, 2022 को सीबीआई ने ग़ाज़ियाबाद की पंजाब नेशनल बैंक में सिसोदिया के बैंक लॉकर को खँगाला। 1 सितंबर, 2022 को दिल्ली सरकार ने पुरानी आबकारी नीति फिर से लागू की। 6 सितंबर, 2022 को सीबीआई के बाद ईडी ने भी नयी आबकारी नीति मामले में जाँच मामले में 35 से अधिक जगहों पर छापे मारे गये।

19 सितंबर, 2022 को ईडी ने आप विधायक और एमसीडी चुनाव प्रभारी दुर्गेश पाठक से 10 घंटे पूछताछ की। 27 सितंबर, 2022 को सीबीआई ने आम आदमी पार्टी के कम्यूनिकेशन और सोशल मीडिया इंचार्ज विजय नायर को गिरफ़्तार किया। 28 सितंबर, 2022 को मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत ईडी ने शराब कारोबारी समीर महेंद्रू को गिरफ़्तार किया। 7 अक्टूबर, 2022 को ईडी ने देश भर में 30 से अधिक जगहों पर छापे मारे और एक शख़्स के घर से एक करोड़ रुपये बरामद किये। 17 अक्टूबर, 2022 को सीबीआई ने मनीष सिसोदिया से आठ घंटे पूछताछ की। 25 नवंबर, 2022 को सीबीआई ने पहली चार्जशीट दाख़िल की, जिसमें मनीष सिसोदिया आरोपी नहीं थे। 30 नवंबर, 2022 को ईडी ने एक रिपोर्ट दी, जिसमें केस में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता का नाम सामने आया। 11 दिसंबर, 2022 को सीबीआई ने के. कविता से पूछताछ की। 2 फरवरी, 2023 को ईडी ने आबकारी नीति मामले में चार्जशीट दाख़िल की, जिसमें पहली बार मुख्यमंत्री केजरीवाल का नाम भी आया।

18 फरवरी, 2023 को सीबीआई ने सिसोदिया को समन भेजा। 19 फरवरी, 2023 को सिसोदिया ने सीबीआई से कुछ दिनों की मोहलत माँगी। 20 फरवरी, 2023 को सीबीआई ने सिसोदिया को एक हफ़्ते की मोहलत दी। और आख़िर में 26 फरवरी, 2023 को आठ घंटे की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ़्तारी के दो दिन बाद मनीष सिसोदिया ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसके साथ सत्येंद्र जैन ने भी इस्ताफ़ा दे दिया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दोनों मंत्रियों के इस्ती$फे मंज़ूर कर लिये। सिसोदिया के पास वित्त विभाग, योजना विभाग, गृह, शिक्षा, उच्च एंव तकनीकि शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक कल्याण विभाग, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग, शहरी विकाश आबकारी, कला, संस्कृति एवं विभाग, सेवा, भू एवं इमारत, जल बोर्ड समेत कुल 18 विभागों की ज़िम्मेदारी थी।

माना जा रहा है कि उनके मंत्री न रहने से दिल्ली सरकार की कई महत्त्वाकांक्षी योजनाओं पर असर पड़ेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक निर्माण विभाग समेत कई विभागों की योजनाएँ पटरी से उतर सकती हैं। क्या अब मनीष सिसोदिया पार्टी में भी बने रहेंगे? यह बड़ा प्रश्न है। हालाँकि आम आदमी पार्टी के हो-हल्ला से तो लग रहा है कि मनीष सिसोदिया के साथ पार्टी का हर व्यक्ति खड़ा है। आम आदमी पार्टी के लोगों को इस बात का डर है कि गिरफ़्तारी के बहाने सिसोदिया के साथ कुछ ग़लत न हो।

प्रश्न यह भी है कि क्या मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किसी दबाव में मनीष सिसोदिया का इस्तीफ़ा लिया है? या मनीष सिसोदिया को प्रताडऩा से बचाने के लिए ऐसा किया है? जो भी हो, दिल्ली और देश की जनता में यही संदेश जाएगा कि सिसोदिया कहीं न कहीं ग़लत हैं और अब उनकी गिरफ़्तारी को भाजपा चिल्ला-चिल्लाकर सही साबित करने की कोशिश करेगी। अब सिसोदिया के हटने पर सभी विभाग स्वत: मुख्यमंत्री के पास चले जाएँगे। प्रश्न यह है कि बजट कौन पेश भी करेगा? शायद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ही पेश करें।

बता दें कि दिल्ली में विकास के कार्यों को लेकर दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल में टकराव की स्थिति बनी रही है। उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के बीच तो सीधा टकराव रहा है। आम आदमी पार्टी ने हमेशा कहा है कि उप राज्यपाल दिल्ली के विकास में अड़ंगा लगाते हैं, फाइलें रोकते हैं और मनमानी कर कामों में हस्तक्षेप करते हैं।

वहीं उप राज्यपाल इसे अपना अधिकार बताते हैं और हर फाइल को अपने पास मंगाते हैं। आरोप है कि वह महीनों तक फाइलें दबाकर रखते हैं। अगर नयी आबकारी नीति दिल्ली सरकार ने नहीं बनायी होती, तो क्या आज सिसोदिया गिरफ़्तार होते? लेकिन प्रश्न यह भी है कि जब सभी काम उप राज्यपाल की मर्ज़ी से होते हैं, तो क्या नयी शराब नीति पर उनकी सहमति नहीं थी? अगर नहीं थी, तो उन्होंने उसे शुरू में ही क्यों नहीं रोक दिया?

इधर, मनीष सिसोदिया ने अपनी गिरफ़्तारी को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहाँ उन्हें राहत नहीं मिली। वहीं सिसोदिया के पक्ष में कई राजनीतिक दल, बॉलीवुड स्टार और लोग उतरे हुए हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट करके लिखा है- ‘समाजवादी पार्टी दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया जी की गिरफ़्तारी की कड़ी निंदा करती है। सरकारी संपत्तियों को बेचने, महँगाई और बेरोज़गाारी जैसे मुद्दों को दबाने के लिए विपक्षी नेताओं को जबरन गिरफ़्तार करवा रही भाजपा। लोकतंत्र को ख़त्म करना चाहती है दमनकारी भाजपा सरकार।’

बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी ने कहा- ‘असल मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है, जिस चीज़ को संसद नहीं चली, वो गायब हो गयी। केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आएगा, विपक्षी नेताओं पर और एक्शन होगा।’ वहीं बॉलीवुड एक्टर कमाल राशिद ख़ान ने ट्वीट में लिखा- ‘क्रिमिनल्स देश भर में खुले घूम रहे हैं। बिना किसी $खौफ़ के रेप और हत्या कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री को जेल में डाला जा रहा है। इससे क्या बदल जाएगा? भारत की तर$क्$की हो जाएगी? समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर देश में हो क्या रहा है। मैं बिलकुल हैरान हूँ।’ $िफल्ममेकर विनोद कापड़ी ने ट्वीट किया है- ‘मनीष देश इकलौते ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने स्कूल और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा फोकस किया।’

एक सोशल मीडिया यूजर्स ने लिखा- ‘देश मे दो लोग काम कर रहे हैं, सिसोदिया और गडकरी; दोनों को उसकी सज़ा मिल रही है। देश में तानाशाही पूरे ज़ोर पर है। ये आपातकाल नहीं है; लेकिन उससे ज़्यादा है।’ अमित नाम के यूजर ने लिखा कि ‘देश में मज़ाक़ चल रहा है, पढ़े लिखे जेल में बंद पड़े हैं और गुंडे राज कर रहे हैं।’

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा- ‘सीबीआई द्वारा मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी एक और उदाहरण है कि कैसे भाजपा विपक्ष को डराने के लिए केंद्र सरकार की एजेंसियों का दुरुपयोग करती है। यह सत्ता का दुरुपयोग है और लोकतंत्र पर हमला है। इस तरह का दमन हमारे राष्ट्र की नींव को कमज़ोर करता है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए।’ राउत ने कहा- ‘मनीष सिसोदिया के ऊपर जिस तरह से कार्रवाई हुई है, उससे लग रहा है कि केंद्र सरकार अपने विरोधियों की आवाज़ बंद करने की कोशिश कर रही है। क्या भाजपा में हिमालय से लाये हुए संत, महात्मा या साधु बैठे हैं? हमारी पार्टी मनीष सिसोदिया के साथ खड़ी रहेगी।’

बेलगाम नौकरशाही

शिवेन्द्र राणा

लोक प्रशासन किसी भी राष्ट्र के प्रशासनिक संगठन का वह भाग है, जो एक विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करता है। सरकार के निर्णयों को कार्य रूप में लागू करने का यह एक साधन है। यह सरकार की वह कार्यकारी भुजा है, जिसके द्वारा सरकार अपने उद्देश्य और लक्ष्य को प्राप्त करती है। मूलत: सार्वजनिक धन पर आधारित यह नौकरशाही जनता की नौकर है। वैसे ही जैसे निर्वाचित नेतृत्व वर्ग जनता का नौकर है। प्रतिनिधित्व की परिभाषा को भारतीय नौकरशाही के नज़रिये से देखें, तो परिदृश्य भिन्न नज़र आएगा।

इसी दूसरे परिदृश्य की वजह से नौकरशाही अमूमन बेलगाम दिखती है। कानपुर देहात में अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान प्रशासन की दोषपूर्ण कार्यशैली के कारण एक माँ-बेटी की ज़िन्दा जलकर मौत हो गयी। विश्व सामाजिक न्याय दिवस (20 फरवरी) के अवसर पर यह हुआ। देश में आजकल सामाजिक न्याय की बड़ी-बड़ी तक़रीरें हो रहीं हैं। किन्तु यह कैसा सामाजिक न्याय है? भारत में सामाजिक न्याय का विमर्श बड़ा ही चयनित और कभी-कभी विद्रूप होता है। यह भारतीय लोकतंत्र के प्रति नौकरशाही की निष्ठुरता, उसके घटियापन का प्रतीक है। सरकारों की शह पर प्रशासनिक अधिकारी विशुद्ध मनमानी पर उतर आये हैं। वे सडक़छाप गुंडे-अपराधियों जैसी भाषा बोल रहे हैं। वास्तव में नौकरशाही ही इस देश की अधिष्ठाता बन चुकी है। सरकार किसी भी दल की हो, नौकरशाही के समक्ष बौनी ही नज़र आती है। यहाँ तक की राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता अपने और अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान के लिए भी इन्हें तरजीह देने को तत्पर दिखते हैं।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस शासन के दौरान एक रैली में भाजपा नेताओं को थप्पड़ मारने वाली महिला अधिकारी ने सारे भाजपा शासन में पार्टी नेताओं के विरोध को धता बताते हुए मनचाही नियुक्ति पा ली। वहीं उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक अनुशासन का चीरहरण करते हुए माफिया मुख़्तार अंसारी का विधायक बेटा चित्रकूट जेल के अधिकारियों की सहायता से उसे अपने हिसाब से चला रहा है। कहीं एक महिला तहसीलदार ग्रामीणों को- ‘अपनी पर आ गयी न…’ जैसी भाषा में धमकाती है। कर्नाटक में महिला आईएएस और आईपीएस अधिकारी निजी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से भिड़ी हुई हैं। बिहार में दो आईपीएस अधिकारी गाली-गलौज में लगे हैं। एक आईएएस अधिकारी अपने मातहतों को भद्दी गालियाँ बकता है।

बक्सर के चौसा में ज़मीन मुआवज़े हेतु आंदोलनरत किसानों के साथ पुलिस प्रशासन दुव्र्यवहार एवं मारपीट करता है और उन पुलिस वालों का कुछ नहीं बिगड़ पाता। ऐसी प्रशासनिक दुरावस्था केवल भाजपा शासित राज्यों में ही नहीं है, बल्कि दूसरे अन्य दलों की सरकारें भी नौकरशाही की मनमानी और अनुशासनहीनता रोक पाने में अक्षम थीं और आज भी हैं। केंद्र सरकार लगातार सुशासन (गुड गवर्नेंस) की बात कर रही है, किन्तु इसके मुख्य आधार नौकरशाही ने इसका अर्थ संगठित भ्रष्टाचार कर दिया है। भ्रष्टाचार की लगाम अब जन-प्रतिनिधियों के हाथों से निकलकर नौकरशाही के क़ब्ज़े में है, जो बेलगाम भी है।

कार्मिक मंत्रालय की रिपोर्ट को स्वीकार करें, तो पिछले वर्ष 158 आईएएस अधिकारियों ने अपनी सम्पत्ति का विवरण नहीं दिया। सन् 2020 में यह संख्या 146 तथा सन् 2019 में 128 थी। इनमें 64 अफ़सर ऐसे थे, जिन्होंने लगातार दो साल और 44 अफ़सरों ने तो लगातार तीन साल तथा 32 अफ़सरों ने तीन साल से भी अधिक समय से सम्पत्ति का वार्षिक विवरण नहीं दिया है। ऐसा नहीं है कि नौकरशाही में भ्रष्टाचार पहले नहीं था; लेकिन अब उसका स्वरूप वीभत्स और ढिठाई में परिवर्तित होता जा रहा है।

एक तो अभद्रता, ऊपर से इनकी आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त संरचना। आज आम जनता में नेताओं की तरह ही लोक प्रशासन नौकरशाही के प्रति भी घृणा का भाव बढ़ा है। वह अपनी दुर्दशा के लिए राजनीतिज्ञों से अधिक नौकरशाही को ज़िम्मेदार मानती है। लेकिन नौकरशाही के पास भी अपने तर्क हैं। पुलिस-प्रशासन से जुड़े अधिकारी आये दिन अपनी अकर्मण्यता छुपाने के लिए राजनीतिक वर्ग पर अनावश्यक हस्तक्षेप का दोषारोपण करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि वे ख़ुद चाटुकारिता एवं निकम्मेपन के कारण राजनीतिक हस्तक्षेप आमंत्रित करते हैं।

उदाहरणस्वरूप जब कोई कमज़ोर, मज़लूम व्यक्ति अपनी शिकायतें लेकर प्रशासन के समक्ष उपस्थित होता है, तो अधिकारी उसका समाधान तलाशने के बजाय उसे दौड़ाते हैं। डाँट देते हैं। डराते हैं। या फिर रिश्वत के लिए परेशान करते हैं। अंतत: निराश व्यक्ति समाधान हेतु विकल्प के रूप में अपने इला$के के दबंग और बाहुबली के पास जाता है। उनके सामने प्रशासन विनीत रूप से करबद्ध खड़ा हो जाता है और व्यक्ति की सुनवाई त्वरित रूप से हो जाती है। इसके दो प्रभाव होते हैं- एक तो प्रशासन की नपुंसकता जनता के समक्ष ज़ाहिर हो जाती है और दूसरा, ऐसे बाहुबली जनता के लिए रॉबिन हुड जैसे मसीहा बन जाते हैं। इसके बाद यही बाहुबली और रसूख़दार व्यक्ति नेता, विधायक मंत्री बनकर प्रशासन के सिर पर बैठ जाता है और जन-समर्थन के बूते सालोंसाल सत्ता में अपनी हनक बरक़रार रखता है। इस तरह देखें, तो सत्ता में बाहुबल के बढ़ते प्रभाव के पाश्र्व में नौकरशाही की भी एक निकृष्ट भूमिका है। दूसरी भाषा में कहें, तो अपराध और राजनीति का भस्मासुर पैदा करने की ज़िम्मेदार नौकरशाही भी है।

ऐसा नहीं है कि आम जनता ही इनके दुव्र्यवहार से प्रताडि़त होती हैं। जन-प्रतिनिधि जैसे ग्राम प्रधान एवं ज़िला स्तर के पंचायत सदस्य ही नहीं, बल्कि विपक्षी दल से सम्बन्धित हों तो ये विधायक-सांसदों को भी नहीं बख़्शते। नौकरशाहों द्वारा नेताओं को निर्वाचन के पश्चात् विजय का प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाना भी उनके जनप्रतिनिधिओं के समक्ष अहंकारपूर्ण रवैये के पीछे एक बड़ा कारण हैं। वे स्वयं को उनसे श्रेष्ठ मानते है। ब्रिटिश-काल में चुनाव आयोग का वजूद नहीं था। नौकरशाही ही चुनाव का संचालन करती थी, जिससे ये परम्परा बनी हुई है। व्यवस्था यह हो कि कम-से-कम विधानसभा और लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों का प्रमाण-पत्र उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आंग्ल भाषा का सिविल सेवा में वर्चस्व भी उसकी औपनिवेशिक मानसिकता का एक अन्य वजह है। अंग्रेजी भाषी वर्ग हमेशा से अपने को देश के बाक़ी लोगों की अपेक्षा विशिष्ट और संभ्रांत मानता है। उस पर से दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से यूपीएससी की परीक्षा में अंग्रेजी भाषी प्रतिभागियों को तरजीह दी जाती रही है। सन् 2012 के बाद तो यह प्रक्रिया और तीव्र गति से बढ़ी तथा भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों के चयन के अवसर अत्यंत सीमित हो गये हैं। इससे उस संभ्रांतवादी मानसिकता को संबल मिलता है, जो आम भारतीय को निम्न कोटि का नागरिक मानती है। संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों का मत था- आईसीएस वर्ग को उसकी सही जगह दिखा देनी चाहिए। यह वही वर्ग था, जिसने ब्रिटिश सरकार के दमनकारी क़ानूनों को पूरे मनोयोग से लागू करने में रुचि ली थी और उसके दमनात्मक कार्यों में बराबर के सहभागी रहे थे। किन्तु तब सरदार वल्लभ भाई पटेल आईसीएस की ढाल बन गये। हालाँकि वे स्वयं भी इनकी क्रूरता और दमन भुगत चुके थे। आईसीएस को अंग्रेजी सरकार के लिए स्टील फ्रेम कहा जाता था। स्वतंत्र भारत में ये वर्ग लोकतांत्रिक सरकार के लिए भी स्टील फ्रेम बना रहा। कहने का अर्थ यह है कि समय बदला, सत्ताएँ और रवायतें बदलीं, आईसीएस संवर्ग आईएएस में तब्दील हुआ; किन्तु नौकरशाही अपनी साम्राज्यवादी शैली में ही जीती रही।

तो जिस प्रशासनिक तंत्र को भारत के विकास के लिए यथावत् स्वीकार कर लिया गया, वही आज भारत के विकास में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। चुनावों के पश्चात् सत्ता परिवर्तन से जनता को यह उम्मीद होती है कि नौकरशाही की परिस्थितियाँ बदलेंगी। किन्तु पिछले 75 वर्षों में सरकारें तो बदलती रहीं; लेकिन नौकरशाही की कार्यशैली और व्यवहार में कोई बदलाव नहीं हुआ। अलबत्ता चुनावों में प्रशासनिक सुधार के बड़े-बड़े दावे करने वाले दलों की सरकारों को ज़रूर उसने अपने अनुकूल ढाल लिया। वर्तमान केंद्र सरकार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।

नौकरशाही ख़ुद को सरकार क्या न्यायपालिका से भी ऊपर समझती है? नोएडा अथॉरिटी की सीईओ के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तो चंदौली के डीएसपी के ख़िलाफ़ अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ ने ग़ैर-जमानती वारंट जारी तक किया। क्योंकि ये लोग अपनी व्यस्तता बताकर न्यायालय के आदेश पर भी उपस्थित होने को तैयार नहीं थे। सारे दिन फेसबुक, ट्विटर पर प्रशासनिक नैतिकता का ज्ञान देने वाले ऐसे नौकरशाह न्यायपालिका तक का सम्मान नहीं करते। इनमें इतनी हिम्मत इसलिए आती है, क्योंकि इन्हें पता है कि इनके पास विस्तृत तंत्र है, जो इन्हें किसी भी दंडात्मक व्यवस्था से सुरक्षित रखेगा। असल में इन्होंने एक तरह से लोकतंत्र में अपनी समानांतर सत्ता खड़ी कर रखी है।

लाज़िमी है कि जो नौकरशाही न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती, उससे आम जनता के सम्मान की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

भारतीय नौकरशाही के कार्य-व्यवहार और आचरण के अवलोकन से प्रतीत होता है कि राजनीतिक चिंतक हॉब्स की लेवियाथन (एक राक्षस) सरकार नहीं, बल्कि स्वयं नौकरशाही है। यह यत्र-तत्र-सर्वत्र की स्थिति में है। वर्तमान का कालखण्ड नौकरशाही के लिए स्वर्ण-युग है। शासन-प्रशासन ही नहीं, बल्कि राजनीति, समाज से लेकर धार्मिक संस्थानों तक में इसका पर्याप्त दख़ल है। अब रामजन्मभूमि न्यास में नृपेंद्र मिश्रा को रखने का औचित्य नहीं समझ आता। निर्माण तकनीक के लिए मेट्रो मैन ई. श्रीधरन हो सकते थे, अन्य व्यवस्था हेतु सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हो सकते थे; किन्तु धार्मिक संस्थान में एक नौकरशाह की क्या आवश्यकता है? वैसे भी भाजपा सरकार ने साहित्य अकादमी से लेकर शिक्षण संस्थानों तक में ऐसे नौकरशाहों को भर दिया गया है, जहाँ कि उन्हें नहीं होना चाहिए।

रही बात वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा नौकरशाही को अनावश्यक प्रश्रय देने की, तो यदि उसके मन में कहीं भी अध्यक्षात्मक शासन स्थापित करने का विचार है, तो उसे इसका भी एक बार खुलकर प्रयास कर ही देना चाहिए; ताकि देश की जनता भी निर्णय कर सके कि क्या उसे ऐसा मंत्रिमंडल चाहिए, जो मात्र संसद के बजाय मात्र राष्ट्र-प्रमुख के प्रति जवाबदेह हो? वैसे भी केंद्र से लेकर राज्यों की भाजपा सरकारों ने जिस तरह से सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों एवं न्यायाधीशों की भर्ती पार्टी और सरकार से लेकर संसद तक कर रखी है, उससे सरकार और नौकरशाहों की महत्त्वाकांक्षा साफ़तौर पर ज़ाहिर हो जाती है। सरकार, पार्टी या समर्थक चाहें जितने भी तर्क दें; लेकिन स्वतंत्र भारत में इतनी बेलगाम नौकरशाही का दौर कभी भी नहीं रहा है।

इतिहास अपने न्याय निर्णयन में निष्पक्ष होता है। वह किसी सत्ताधारी दल या विचारधारा का पक्षधर नहीं होता। आज से 50 साल बाद जब वर्तमान सरकार के कार्यशैली की समीक्षा की जाएगी, तब उसे नौकरशाही की अनैतिकता को प्रश्रय देने और उसकी मनमानी के समक्ष असहाय स्थिति के लिए याद किया जाएगा।

(लेखक पत्रकार हैं।)

उड्डयन उद्योग भरेगा उड़ान

एयर इण्डिया और इंडिगो के हवाई जहाज़ ख़रीदने की घोषणा बदल सकती है तस्वीर

भारत का उड्डयन उद्योग नयी उड़ान भरने की तैयारी में है। देश की दो बड़ी एयरलाइंस इंडिगो और टाटा के बेड़े में मिलकर क़रीब 1,200 नये जहाज़ जुडऩे वाले हैं और उसी अनुपात में पॉयलट और क्रू की भर्ती होगी। ग्रॉउंड स्टाफ और तकनीकी कर्मचारी अलग से हैं। यही नहीं दोनों बड़ी एयरलाइंस अपनी वैश्विक पहुँच को व्यापक करने की तैयारी में हैं, जो एक महत्त्वपूर्ण बात है।

सेंटर फॉर एशिया पैसेफिक एविएशन (सीएपीए) इंडिया ने भी एक रिपोर्ट में कहा कि फ्लीट में बदलाव और वृद्धि को देखते हुए आने वाले एक-दो वर्षों में भारत की अधिकांश एयरलाइन ज़्यादा विमान ख़रीदने के लिए ऑर्डर देंगी। ज़ाहिर है भारत में उड्डयन रोज़गार का एक बड़ा क्षेत्र बनने की तरफ़ बढ़ रहा है। एयर इंडिया के सरकार से टाटा ग्रुप में जाने के बाद उसे एक बेहतर वित्तीय स्थिरता मिली है, जो अब तक सिर्फ़ इंडिगो (इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड) के पास रही है। भारतीय विमानन उद्योग ने अब जैसी करवट ली है, उससे यह तो साफ़ है कि इसका भविष्य शानदार है। हाल के समय में देश में हवाई अड्डों पर निवेश की प्रक्रिया बढ़ी है। एक अनुमान के मुताबिक, अगले चार साल में हवाई अड्डा क्षेत्र में एक लाख करोड़ का निवेश हो सकता है। हाल के महीनों में अडानी ग्रुप को हवाई अड्डे देने के मामले में सरकार की तरफ़ से ज़्यादा मेहरबानी दिखाने को लेकर बेशक सवाल उठे हैं; लेकिन यह तो निश्चित है कि एयरलाइंस की ऊँची उड़ान और निवेशकों को भी इस क्षेत्र की तरफ़ आकर्षित करेगी।

फरवरी के शुरू में बेंगलूरु में एयरो इंडिया शो आयोजित किया गया था, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। अधिकारियों के मुताबिक, एयरो इंडिया में क़रीब 250 कम्पनियों से समझौते (बी2बी) ने भी उम्मीद को नये पंख दिये हैं। इससे क़रीब 75,000 करोड़ के निवेश का रास्ता खुला है। उद्घाटन समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उम्मीद जतायी कि एयरो इंडिया भारत में एरोस्पेस क्षेत्र के आगे विकास में एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगा। एयरो इंडिया के प्रमुख प्रदर्शकों में एयरबस, बोइंग, दसॉ एविएशन, लॉकहीड मार्टिन, इजराइल एरोस्पेस इंडस्ट्री,  साफरान, रोल्स रॉयस जैसे विदेशी कम्पनियाँ शामिल थीं।

जानकारों का मानना है कि भारत में एविएशन टर्बाइन फ्यूल दुनिया में सबसे महँगा है जो भारतीय एयरलाइंस के लिए दिक़्क़त की बात है। उनके मुताबिक, यदि इस तरह की बाधाओं को दूर किया जा सके, तो विमानन उद्योग की तरक़्क़ी को और पंख लगेंगे। देश में एविएशन टर्बाइन फ्यूल का बेस प्राइस ही ज़्यादा है, ऊपर से टैक्स भी काफ़ी ज़्यादा है। नतीजा यह है कि इससे भारतीय एयरलाइंस को काफ़ी महँगी डर पर तेल मिलता है। यदि इसका रेट कम हो, तो इसका फ़ायदा पैसेंजर को भी मिल सकता है; क्योंकि एयरलाइंस फिर एयर फेयर घटा सकती हैं।

विदेशी एयरलाइंस को भारत के आसमान में काफ़ी ट्रैफिक मिलता है। इसका कारण यह भी है कि दूसरे देशों में भारतीय एयरलाइंस की फ्लाइट्स बड़ी संख्या में नहीं हैं। लेकिन एयर इंडिया और इंडिगो की नयी योजनाएँ बताती हैं कि इससे देश के लोगों को भविष्य में विदेश जाने के लिए देसी एयरलाइंस में अब ज़्यादा विकल्प मिल सकेंगे। डोमेस्टिक लीडर इंडिगो ने कहा है कि वह विदेशी डेस्टिनेशन पर भी ज़्यादा फोकस करने जा रही है, जबकि एयर इंडिया का पहले से ही विदेशी डेस्टिनेशन पर ज़ोर रहा है। अभी तक अमेरिका की तीन बड़ी एयरलाइंस यूनाइटेड कॉन्टिनेंटल, यूनाइटेड डेल्टा और अमेरिकन को भारत में बड़ा ट्रैफिक मिलता है। निश्चित ही ज़्यादा कम्पीटीशन भारतीय एयरलाइंस को बेहतर सीटिंग व्यवस्था, भोजन और एंटरटेनमेंट सर्विसेज की तरफ़ प्रोत्साहित करेगा। हाल के चार वर्षों को देखें तो भारत की सबसे बड़ी एयरलाइंस इंडिगो ने 2019 में नये विमान ख़रीदने की योजना ज़ाहिर की थी। लेकिन कोरोना ने बर्बाद कर दिया। अब जब स्थितियाँ सामान्य हुई हैं, इंडिगो ने 500 नये विमान ख़रीदने की घोषणा कर दी है।

एअर इंडिया और इंडिगो की ओर से एयरबस और बोइंग विमानों का बड़ा ऑर्डर देने के बाद भारत की कुछ छोटी एयरलाइंस भी विमान ख़रीदने के ऑर्डर दे सकती हैं।

भारतीय उड्डयन सेक्टर के नयी ऊँचाइयाँ छूने की शुरुआत हुई एयर इंडिया की घोषणा से; जिसने कहा कि एयरबस और बोइंग को 840 विमानों का ऑर्डर वह देने जा रही है और अगले 10 साल में यह प्लेन उसके बड़े से जुड़ जाएँगे। एयर इण्डिया की मालिकाना हक वाली कम्पनी टाटा संस का अमेरिका और फ्रांस की इन कम्पनियों के साथ हुआ 85 अरब डॉलर का यह सौदा, एविएशन इंडस्ट्री में अब तक की सबसे बड़ा सौदा है।

एयर इंडिया की योजना भविष्य में दुनिया के तमाम बड़े डेस्टिनेशन में जहाज़ उतारने की है। एयर इंडिया चूँकि हर रेंज के हवाई जहाज़ ख़रीदने जा रही है, उसकी इन डेस्टिनेशन को सीधी विमान सेवा शुरू होगी। एयर इंडिया कई पार्टनर्स के साथ डीप कमर्शियल पार्टनरशिप भी करेगी, जिनमें सिंगापुर एयरलाइंस और लुफ्थांसा शामिल हैं। इसके अलावा स्टार एयरलाइंस भी भविष्य में एयर इंडिया किये साथ साझेदारी को मज़बूत करेंगे।

विमानन क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक, भारतीय विमानन कम्पनियों के विदेश में ज़्यादा डेस्टिनेशन पर जाने से भारतीय यात्रियों को सीधी उड़ानों से विदेश जाने का विकल्प मिलेगा और इसके लिए उन्हें तडक़े उठकर पहले खाड़ी देशों में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। एयर इंडिया और इंडिगो दोनों विमानन बाज़ार के दिग्गज खिलाड़ी हैं और इंडिगो, जिसके 500 जहाज़ के नये ऑर्डर से पहले ही उसके बड़े में 310 जहाज़ हैं, भी विदेशी डेस्टिनेशन पर फोकस करने की बात कह चुका है। निश्चित ही यह भारतीय विमानन उद्योग के अंतरराष्ट्रीयकरण की तरफ़ एक बड़ी छलाँग है। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो ने एयर इंडिया की चुनौती को गम्भीरता से लिया है। इंडिगो के अंतरराष्ट्रीय बिक्री प्रमुख विनय मल्होत्रा के मुताबिक, उसने यूरोप में अपना विस्तार करने के लिए टर्किश एयरलाइन के साथ हाथ मिलाया है। एयरलाइन रोज़ाना क़रीब 1,800 फ्लाइट्स ऑपरेट करती है। इनमें से 10 फ़ीसदी इंटरनेशनल रूट्स पर हैं। इंडिगो के बेड़े में क़रीब 310 विमान हैं और कम्पनी इस समय 76 डोमेस्टिक और 26 इंटरनेशनल डेस्टिनेशन के लिए फ्लाइट ऑपरेट करती है।

बता दें अभी घरेलू मार्केट में इंडिगो की हिस्सेदारी 56.1 फ़ीसदी है, जबकि टाटा ग्रुप की तीन एयरलाइंस की कुल हिस्सेदारी 24.1 फ़ीसदी है। बाक़ी 19.8 फ़ीसदी हिस्सेदारी दूसरी एयरलाइंस के पास है। टाटा ग्रुप की एयरलाइन कम्पनियों में एयर इंडिया, विस्तारा और एयर एशिया इंडिया शामिल हैं।

इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स ने एक बयान में कहा कि हम अंतरराष्ट्रीयकरण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसके तहत नैरोबी, जकार्ता और कुछ मध्य एशियाई देशों के लिए उड़ान शुरू करने की योजना बनायी जा रही है। भारत के विमानन बाज़ार में अभी विकास की बहुत सम्भावना हैं, जिसमें कई एयरलाइंस के कारोबार की गुंजाइश है।

कमज़ोरी और ताक़

भारत में ऐसा नहीं है कि सभी एयरलाइंस ने सफलता ही हासिल की। पहले भी देखा गया कि कुछ एयरलाइंस शुरू होने के बाद दुर्भाग्यवश बंद हो गयीं। इनमें सबसे बड़ा उदाहरण जेट एयरवेज का है, जो बहुत अच्छी उड़ान भरने के बावजूद 26 साल चलने के बाद किन्हीं कारणों से बंद हो गयी। हाल में यह जानकारी मिली है कि दूसरे मालिक इसे शुरू करने की कोशिश में हैं। इसके अलावा यूनाइटेड ब्रूअरीज ग्रुप की किंगफिशर, जिसके सीएमडी विजय माल्या थे, भी कुछ साल उडऩे के बाद बंद हो गयी। ज़ाहिर है बिना वित्तीय मज़बूती के साथ एयरलाइंस को सफलता पूर्वक बचाये रखना आसान काम नहीं है। हाल में यह ख़बर भी आयी हैं कि स्पाइस जेट जैसी कम्पनी भी आर्थिक संकट से दो चार है।

हालाँकि उसे मज़बूती देने की कोशिश जारी है। राकेश झुनझुनवाला की अकासा एयरलाइंस भी पंख फैलाने की कोशिश में है। भारतीय विमानन कम्पनियों के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक पहलु है भारत में ट्रैफिक। विमानन विशेषज्ञों के मुताबिक, हम लोग ट्रैफिक जेनरेट कर सकते हैं। एयर इण्डिया, जिसने जहाज़ों का रिकॉर्ड ऑर्डर देकर भारतीय विमानन उद्योग में तहलका मचा दिया है, भी नाकामी का दंश झेल चुकी है। टाटा संस के पास आने से पहले यह भारत सरकार की एयरलाइंस थी और सरकार इसे चलने में नाकाम रही।

आसमान में नौकरियाँ

टाटा ग्रुप की एयर इण्डिया ने जब कुछ दिन पहले बोइंग और एयरबस से 470 विमान ख़रीदने के लिए ऑर्डर दिया, तो ज़ाहिर हो गया कि भारत के उड्डयन उद्योग में अब नौकरियों का पिटारा खुलने वाला है। इसके बाद इंडिगो ने भी 500 नये जहाज़ ख़रीदने का ऐलान कर दिया, तो ज़ाहिर हो गया कि देश के युवाओं को बड़े पैमाने पर नौकरियों का रास्ता खुल रहा है। अकेले क्रू में ही हज़ारों नौकरियाँ युवा पा सकेंगे। एयर इण्डिया और इंडिगो जहाज़ों का जो नया ऑर्डर दे रही हैं, उसमें बड़े विमान भी शामिल हैं, जिनमें क्रू की संख्या ज़्यादा होती है।

एयर इंडिया ने 24 फरवरी को आधिकारिक रूप से एक बयान में कहा कि वह 2023 में चालक दल के 4,200 प्रशिक्षु सदस्यों और 900 पायलटों को भर्ती करने की योजना बना रही है। कम्पनी ने कहा कि उसके बेड़े में नये विमान जुड़ रहे हैं और उसके घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिचालन का तेज़ी से विस्तार हो रहा है, इसलिए ये भर्ती की जा रही हैं। कम्पनी ने मई 2022 से फरवरी 2023 के बीच चालक दल के 1,900 से ज़्यादा सदस्यों को भर्ती किया है। बयान के मुताबिक, पिछले सात महीनों (जुलाई 2022 से जनवरी 2023 तक) में चालक दल के लगभग 1,100 सदस्यों को प्रशिक्षित किया गया और तीन महीनों में चालक दल के लगभग 500 सदस्यों को उड़ान के लिए तैयार किया गया।

हाल ही में सामने आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, एयर इंडिया बी777 कैप्टन की तलाश कर रही है और उसके लिए वह दो करोड़ रुपये तक का पैकेज ऑफर कर सकती है। कम्पनी ने हाई लेवल की क्षमता वाले बी737 एनजी / मैक्स टाइप रेटेड पायलटों से बी777 बेड़े के लिए अधिकारियों को जॉब दे रही है और उसके लिए 21,000 डॉलर यानी कि 17,39,118 रुपये प्रति महीने का भुगतान करेगी।

अगर इसे सालाना आधार पर देखें, तो यह 2,08,69,416 रुपये के क़रीब बनता है। इसके अलावा 1,200 नये जहाज़ आने का मतलब है 10,000 से ज़्यादा केविन क्रू की नौकरियाँ। विमानन क्षेत्र में पायलट और केबिन क्रू के अलावा एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर और ग्राउंड स्टाफ की ज़रूरत रहती है। आँकड़े बताते हैं कि भारतीय एयरलाइंस में केबिन क्रू की काफ़ी कमी है और आये दिन यह शॉर्टेज का सामना करती हैं। इस क्षेत्र में रोज़गार बढ़ोतरी का फ़ायदा इससे जुड़े उद्योगों को भी होगा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जब एक भी जहाज़ बढ़ता है और वह किसी शहर में उड़ान भरता है, तो वहाँ के टैक्सी से लेकर होटल और रेस्टोरेंट उद्योग तक को लाभ मिलता है। उनके मुताबिक, इसके अलावा चूँकि भारत सरकार मेक इन इंडिया पर ज़ोर दे रही है, उससे विदेशी कम्पनियों पर दबाव है कि वे कलपुर्जे और स्पेयर पाट्र्स भारत से ही ख़रीदें। उनके मुताबिक, डिफेंस एयरक्राफ्ट्स का जो इकोसिस्टम है, वही आगे आगे चलकर कमर्शियल एयरक्राफ्ट के प्रोडक्शन, फाइनल असेंबलिंग और फॉर्मल रिसोर्सिंग की तरफ़ ले जाएगा।

दिल्ली नगर निगम में खींचतान बरक़रार

भाजपा की तिकड़मों के बावजूद बने आम आदमी पार्टी के महापौर और उप महापौर

चुनाव में स्पष्ट हार के बाद भी हार स्वीकार न करने की भाजपा की ज़िद के कारण दिल्ली नगर निगम के मेयर का चुनाव तीन बैठकों में जब नहीं हुआ, तो आख़िर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद चौथी बैठक में चुनाव हो सके। आख़िर 22 फरवरी को आम आदमी पार्टी (आप) की शैली ओबेरॉय भाजपा प्रत्याशी रेखा गुप्ता को हराकर महापौर (मेयर) और आले मोहम्मद इक़बाल भाजपा के कमल बागड़ी को हराकर उप महापौर (डिप्टी मेयर) चुने गये। लेकिन इसके बाद हार से बौखलाये भाजपा पार्षदों ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को दरकिनार कर अनैतिक तरीक़े से संविधान की अवहेलना करते हुए स्थायी समिति के छ: सदस्यों के चुनाव से पहले ही देर रात तक हंगामा किया, तोडफ़ोड़ की और चुनाव नहीं होने दिया।

भाजपा की महापौर पद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता का वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वह तोडफ़ोड़ करती दिख रही हैं। इसके बाद 23 फरवरी को नवनिर्वाचित महापौर शैली ओबेरॉय ने सदन की कार्यवाही 24 फरवरी तक स्थगित कर दी। बाद में स्थायी समिति के छ: सदस्यों के चुनाव पर भी हंगामा हुआ। आख़िर भाजपा और आम आदमी पार्टी ने एक-दूसरे के ख़िला$फ रिपोर्ट दर्ज करायी और मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुँचा।

दरअसल भाजपा ने यह आदत ही बना ली है कि जहाँ जनादेश से सत्ता न मिले, वहाँ हंगामा, तोडफ़ोड़ और सदस्यों-विधायकों को ख़रीदने की कोशिश करके उन्हें ईडी-सीबीआई-आईटी की धौंस दिखाकर अपने साथ मिलाकर सत्ता हासिल कर लो। राज्यों में भाजपा यह सब कर ही रही थी और अब निगम जैसे छोटे चुनाव में उसने यही तरीक़ा अपना लिया है। लोकतंत्र के लिए यह ख़तरनाक है; लेकिन ताक़त के दम पर चल रहा है।

दो बार चुनाव स्थगित होने के बाद आम आदमी पार्टी की महापौर पद की प्रत्याशी शैली ओबेरॉय ने एमसीडी मेयर चुनाव कराने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था। याचिका में उन्होंने मनोनीत सदस्यों (एल्डरमैन काउंसलर्स) के मतदान अधिकार को भी चुनौती दी थी, जिनसे मतदान कराने की ज़िद भाजपा कर रही थी। सर्वोच्च न्यायालय ने क़ानूनी पक्ष देखते हुए निर्देश दिया कि मनोनीत सदस्यों के मतदान का अधिकार नहीं है। इस बीच एक बार चुनाव होने के दौरान फिर हंगामा हुआ और एक बार चुनाव टले। दूसरी सुनवायी में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव के आदेश दिये, तब चुनाव हो पाये।

बता दें कि नगर निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कुल 250 सीटों में से 134 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को 104 सीटें ही मिली थीं। वहीं कांग्रेस के हिस्से नौ सीटें मिलीं, जबकि निर्दलीय तीन सीटों पर जीते थे। चुनाव के बाद मुंडका से जीते निर्दलीय पार्षद गजेंद्र दराल भाजपा में चले गये। कांग्रेस के पार्षदों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। दिल्ली से सात लोकसभा सदस्यों और तीन राज्यसभा सदस्यों के अलावा 14 नामित विधायकों (जिन्हें दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने नामित किया है, जिसमें एक भाजपा का और 13 आम आदमी पार्टी के विधायक हैं।) को भी मतदान का अधिकार है। इस तरह कुल 274 सदस्यों को मतदान का अधिकार था। इसमें जीत के लिए 138 का आँकड़ा छूना था। महापौर के चुनाव में शैली ओबेरॉय को 150 और भाजपा उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 116 मत मिले। वहीं, उप महापौर के लिए मैदान में उतरे आम आदमी पार्टी के आले मोहम्मद इक़बाल को 147 मत मिले।

महापौर शैली ओबरॉय ने कहा- ‘उन्होंने (भाजपा के पार्षदों ने) सदन का सम्मान नहीं किया। उन्होंने फिर से लोकतंत्र का सम्मान नहीं किया। दिल्ली के लोगों ने हमें जनादेश दिया है। वे (भाजपा नेता) चुनाव हार गये हैं, इसलिए वे डरे हुए हैं।’